Author: umeemasumaiyyafuzail

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“یہاں امیروں کی محفلیں جمتیں ہیں، جہاں بے خوف لڑکیاں آیا کرتی ہیں… یہاں شرم و حیا کی حدیں اتنی سختی سے برقرار نہیں رہتیں۔ وقت گزرنے کے ساتھ تم خود ہی سمجھ جاؤ گی کہ یہی تمہارے حق میں بہتر ہے۔” مہر کی آواز میں تلخی نمایاں تھی۔ “اوہ… کیا تم واقعی اتنی بدتمیز ہو؟” اس نے جھجکتے ہوئے اس نازک چہرے کو دیکھ کر کہا۔ “ہاں، میں بدتمیز ہی ہوں۔” مہر نے سنجیدگی سے جواب دیا۔ وہ نم آنکھوں سے مہر کو دیکھتی رہ گئی۔ مہر نے مزید کچھ کہنے کی ضرورت محسوس نہ کی اور باہر نکل…

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                                                                                                     “ہاں بابا سائیں۔” شاہ نے فون کان سے لگایا اور آہستہ قدموں سے باہر آ گیا۔ “آپ کہاں ہیں؟” اس نے نرم لہجے میں پوچھا۔ “سب خیریت ہے۔” شاہ نے تفصیل بتانا مناسب نہ سمجھا۔ “شاویز کے بارے میں معلوم کرو۔ ہم نے سنا ہے کہ آج برہان کے ساتھ ایسا…

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لاک یہ میرا جہاں ہے۔ اثر تمہارا سا لگتا ہے۔ تمہاری آنکھوں میں کوئی جادو ہے، یہ دل اب تک اسی میں کھویا ہوا ہے۔ یہ اب تک کیوں ہے یہ محبت کی فطرت ہے شرابی دل تمہارا چور ہے۔ پیارے پیارے تو کوئی ہوش نہیں ہے اس کا اثر کیا ہے؟ کوئی شعور نہیں ہے اس کا اثر کیا ہے؟ دلبر تم سے ملنے کے بعد جب شاہ پرندوں کے نظارے سے اندر آیا تو لڑکیاں دھن پر ناچ رہی تھیں۔ مدھم روشنیوں میں خوبصورتیاں ناچ رہی تھیں، چاروں طرف اندھیرا تھا اور ان پر روشنیاں جل رہی تھیں۔…

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तकमील आरज़ू ……..  जिस वक़्त इल्यास ने झंडा लहराया ठीक उसी वक़्त कई ख़ुशी मुसलमानो ने मिल कर सुबह की अज़ान दी। एक तो सुबह का  वक़्त था दूसरा तूफान के बाद का सा सुकून छाया हुआ था अज़ान  की दिलकश आवाज़ तमाम क़िला में गूँज उठी अज़ान सुनते ही मुस्लमान जहा कही  भी थे खामोश खड़े हो गए। अज़ान  खत्म होते ही हर मुस्लमान ने दुआ पढ़ी और  अमीर के झंडा की तरफ चला। थोड़े ही देर में तमाम मुस्लमान वहा आकर जमा हो गए जोकि क़िला के अंदर वाले तमाम मैदान  में लाशे पड़ी…

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 काबुल की फतह ….  मौसम सरमा आहिस्ता आहिस्ता ख़त्म होने लगा। सर्दी भी बूढी हो गयी। नरम गर्म दिन होने लगे मुस्लमान सर्दी गुज़रने का ही इंतज़ार कर रहे थे अब उन्होंने हमला की तैयारी शुरू की ३५ हिजरी शुरू हो गया था। मुहासरा को एक अरसा गुज़र गया था इसलिए क़िला वाले भी तंग आगये थे वह चाहते थे की क़िस्मत का फैसला जल्द से जल्द हो जाये राजा भी तंग हो गया था। उसे यह ख्याल नहीं था की मुस्लमान काबुल के सख्त सर्दी बर्दाश्त करते हुए मुहासरा किये पड़े रहेंगे वह समझ रहा था की जब सख्त…

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शरारत…….       इस दूसरे लोगो से भी काबुल वालो ही को हार हुई। उनके सिपाहियों की भारी तादाद मैदान जंग में खेत रही हज़ारो ज़ख़्मी हो गए हज़ारो मुसलमानो का दबाओ पड़ने से इधर उधर भाग गए और राजा के कैंप में जिस क़द्र सामान और दौलत थी सब मुसलमानो के हाथ लगा मुसलमानो को इस फतह से बड़ी ख़ुशी हुई। क़िला कुछ ऐसे मुक़ाम पर और ऐसा वाक़्या हुआ था की उसका मुहासरा दुश्वार था फिर भी  अब्दुर्रहमान  ने तीन तरफ से उसका मुहासरा कर लिया उस ज़माना में यह क़िला लंगड़ा क़िला कहलाता था काबुल वाले महसूर…

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 दूसरा हमला ……  कई रोज़ में जाकर इल्यास इस क़ाबिल हुए कि उनकी ज़िन्दगी की उम्मीद हो चली। इस अरसा में  अम्मी ,फातिमा (बिमला) कमला और राबिआ  ने उनकी तीमारदारी में दिन रात एक कर दिए। खास कर राबिआ सारा सारा दिन और सारी सारी रात जगती रही। सबसे ज़्यादा तीमारदारी उसने की उसने अम्मी को रात को जागने नहीं दिया सब कुछ करती रही। अबू तय्यब ने भी बड़ी कोशिश और जा निशानी से इलाज किया। लीडर अबुर्रहमान भी क़रीब क़रीब रोज़ ही अयादत के लिए आते रहे। इल्यास तो सब ही  के मश्कूर थे लेकिन राबिआ के खास…

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 सेहर हुस्न ……  इल्यास के काफी गहरा ज़ख्म आया था। लेकिन वह बेहोश नहीं हुए थे अलबत्ता तकलीफ इतनी थी कि वह बेचैन थे  उनके ज़ख़्मी शाने से खून का फवारा उबल रहा था। एक मुजाहिद ने खून बंद करने के लिए ज़ख्म मिला कर अमामा की पट्टी ज़ोर से कस दी इस तदबीर से खून निकलना बिलकुल बंद तो नहीं हुआ लेकिन बड़ी हद तक कमी हो गयी। इल्यास को सख्त तकलीफ थी  लेकिन उन्होंने फिर भी अपनी क़रीब वालो से दुश्मनो का पीछा करने को बोला। उनसे लोगो ने कह दिया अमीर ने पीछा करने को मना…

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जंग का आगाज़ ……   जिस रोज़  राजा को चरवाहे से राजकुमारी का हाल मालूम हुआ  उसके दूसरे रोज़ इस्लामी लश्कर  काबुल के सामने आ धमका। मुसलमानो ने पहाड़ी पर जो ऊँचा नीचा था खेमे लगाए।  राजा ने क़रीब के ब्रिज में बैठ कर उनकी तादाद  का अंदाज़ा किया मुसलमान आठ हज़ार  से भी कम रह गए  थे। कुछ तो शहीद हो गए  थे। कुछ उन क़िला में छोड़ दिए गए थे  जिन्हे फतह किया था। इस वक़्त अब्दुर्रहमान के अलम के निचे मुश्किल से सात हज़ार मुजाहिदीन थे। राजा ने आठ दस हज़ार का अन्दाज़ा किया। उसके…

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 तलाश …..                                                         महारजा काबुल के पास अगरचे जाबुल के हाकिम का खत मदद के लिए आगया था। मगर वह समझता था कि जाबुल के हाकिम के पास काफी फ़ौज है। मुसलमान उसे ज़ेर न कर सकेंगे इसलिए उसने मदद नहीं भेजी थी। वह इस फ़िक्र में  था की जब जाबुल से दुबारा मदद की दरख्वास्त आएगी तब वह मदद देगा उसे ख्वाब में भी यह ख्याल था कि मुस्लमान आसानी से जाबुल की…

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