शज़ा—शज़ा—कहाँ हो तुम-?
दादू नीचे बुला रही हैं-
जिब्रईल धम से दरवाजा खोलकर उसके कमरे में आया- वह जो मगन सी मोबाइल पर कुछ देख रही थी- एक दम घबराई- जल्दी से उसने मोबाइल छिपा दिया-
“हाँ क्या कह रहे थे तुम?”
उसने ज़बरदस्ती मुस्कराने की कोशिश की- पकड़े जाने के डर से हाथ धीरे-धीरे कांप रहे थे-
“मैं इतना ऊँचा-ऊँचा ऐलान कर रहा था और तुम्हें मेरी आवाज़ ही नहीं सुनाई दी…
क्या कर रही थी तुम?”
उसने शक भरी नज़र से उसे देखा-
“क–कुछ नहीं–भाई पढ़ रही थी बस–”
“लग तो नहीं रहा…” उसने उसके आस-पास नज़र दौड़ाई, वहां कोई किताब नहीं थी-
उसकी ज़े़रक नज़रें उसके चेहरे पर जमी थीं, जिस पर परेशानी और झूठ साफ दिख रहा था- वह उन्नीस साल की उम्र में काफी समझदार और संजीदा था- बचपन से ही वह अपने बाकी बहन-भाइयों से अलग था- उनकी तरह बेतकलीफ और शरारत नहीं करता था-
“अच्छा चलो—दादू बुला रही हैं–”
“आई..”
वह अपने बाल समेटते हुए बोली- असल में वह उसके बाहर जाने का इंतजार कर रही थी ताकि मोबाइल को किसी सुरक्षित जगह छिपा सके-
“अच्छा जल्दी आओ-!” वह शक भरी नज़रों से उसे देखता हुआ बाहर जाने को मुड़ा-
“अफ–कहाँ छुपाऊँ तुझे–” वह कुछ देर तक उपयुक्त जगह ढूँढती रही और फिर मैट्रेस के नीचे मोबाइल छिपाकर बाहर निकल आई-
“सुनाओ शज़ा जी–कैसी जा रही है फ्रेंडशिप-?”
ज़मल ने उसके पास बैठते हुए मुस्कुराते हुए पूछा-
“बहुत ज़बरदस्त–यह देखो उसने मुझे गिफ्ट भी दिया है–” उसने फख्र से गर्दन उठाकर कहा-
“अरे वाह–यह तो बहुत महँगा फोन लगता है–”
“हां ना–बहुत अच्छा है–”
उसकी आँखें चमकने लगीं-
“कोई डेट शीट–?” उसने शज़ा को आँख मारते हुए पूछा-
“नहीं–नहीं–मेरी दादू को पता चल जाएगा-.”
“अफ्फ–कितनी डरपोक हो तुम–”
“ऐसी बेज़ल लड़की मेरी दोस्त नहीं हो सकती- चिड़ीया जितना दिल है तुम्हारा। मुझे तो तुम्हें दोस्त कहते हुए शर्म आती है। इतनी डरपोक हो तुम..। मुझे देख कर भी कुछ नहीं सीखा।”
“अच्छा –अच्छा तुम तो नाराज़ ही हो गई–सॉरी–”
“तुम्हारी दादू ने भी अपने दौर में बहुत कुछ किया होगा स्वीटी–” उसने मानीखेज़ी से मुस्कुराते हुए कहा-
“हैं—?” शज़ा हैरान हुई–
“हां–बड़ी बूढ़ियाँ सिर्फ बच्चों पर पाबंदियाँ लगाती हैं- अपने ज़माने में बड़ी चीज़ होती थीं ये–ऐसी ही दिखने में शरीफ लगती हैं–सब अपने दौर में इंजॉय करते हैं-
तुम्हें क्या पता–मेरी दादी के भी बड़े किस्से हैं– सिनेमा जाती थीं मूवीज़ देखने और दोस्त के घर का बहाना करके किसी लड़के से मिलने जाती थीं–पर शादी मेरे दादा से हो गई- हाहा-
वह मज़े से उसे अपनी दादी की बातें सुना रही थी– और शज़ा की आँखें हैरानी से फैल रही थीं-
वह दोनों इस समय कॉलेज के लॉन में पड़े एक बेंच पर बैठी थीं–
बहुत देर ज़मल उसे इस तरह की कहानियाँ सुनाती रही– जो उसकी दादी से शुरू होकर– उसकी फूफियों और खालाओं से होती हुई उसकी माँ पर खत्म हो रही थीं-
“हां देखो यह सब लोग छुप-छुप के वही करते हैं जिससे हम बच्चों को मना करते हैं और डराते हैं– इसमें ऐसी घबराने की कोई बात नहीं- सब के अफेयर होते हैं– मुझे तो ऐसी लड़कियाँ बिलकुल पसंद नहीं जो दबी-दबी सी —लिपटी-लिपटी सी और हर वक्त डरी रहती हैं– किसी लड़के से बात नहीं करतीं– कहती हैं— यह तो गुनाह है– गैर लड़कों से हंसकर बात नहीं करनी चाहिए– फालतू नहीं बोलना चाहिए– दोस्ती न लगाओ गिफ्ट्स न लो– फोन पर बात न करो– फ्लाँ फ्लाँ— ऐसी शरीफ ज़ादियाँ हैं तो घर से बाहर ही न निकलें– फिर भी तो मर्द देखते हैं– उनके साथ बैठ कर पढ़ती हैं- और मेल टीचर्स से भी पढ़ती हैं–
भला यह भी कोई बात है– छोटी सोच के लोग–” उसने नख़त से सिर झटका- “यह सब बातें छोटे दिमाग के लोग करते हैं- इंसान को ब्रॉड-माइंडेड होना चाहिए-”
वह और भी बहुत कुछ कह रही थी जो शज़ा के दिमाग में जड़ें पकड़ता जा रहा था-
जब शज़ा वहाँ से क्लास में जाने को उठी तो उसका ब्रेन अच्छे से वॉश हो चुका था- उसे ज़मल की हर बात ठीक लग रही थी-
“हंन्ह–भला यह भी कोई बात है कि लड़कों से बात नहीं करनी चाहिए– डरपोक लड़कियाँ– हमेशा डरती रहती हैं–” उसने नाखुशी से सोचा और क्लास में चल दी-
वह घर आई तो लाउंज में टीवी चल रहा था- उस पर कोई इस्लामी चैनल लगा हुआ था- जिसमें कोई मुफ्ती साहब मसाइल बयान कर रहे थे-
दादू वहीं बैठकर सलाद के लिए सब्ज़ियाँ काट रही थीं-
वह भी बैग रखकर सोफे पर आधी लेटी हुई थी-
“क्या बोरिंग चीज़ है–” उसने बेज़ारी से स्क्रीन पर दिख रहे मुफ्ती को देखा-
“दादू रिमोट कहाँ है–?”
“क्यों–? क्या करना है तुझे–?” उन्होंने खीरे छीलते हुए पूछा-
“दादू यह चैनल चेंज करें– कोई अच्छी सी चीज़ लगाएं ना-”
“चल जा इधर से– अच्छी सी चीज़ लगाएं– जुबान ही चलती है बस तेरी अक्ल तो नाम की नहीं है–”
दादू उसे घूरते हुए रिमोट टांग के नीचे दबाकर बैठ गईं। दादू को शायद गुस्सा आ गया था-
शज़ा ने कोई जवाब नहीं दिया-
“आप कहते हैं ये दकियानूसी बातें हैं छोटे लोगों की छोटी सोच है– नामहरम से दूर रहना– मर्दों से कतराना और घुलने-मिलने से परहेज़ करना — ये सब बزدली के काम हैं–”
“क्या सोच कर आप यह बात करते हैं–?”
“कभी अपना इज़्ज़ाम करें- आप लोगों पर नहीं बल्कि सीधे रब करीम पर बात कर रहे हैं, उसे नाऊज़ बिल्लाह दकियानूसी कह रहे हैं–”
“क्या आपने कभी गंभीरता से इस पहलू को सोचा–? इस पर कोई रिसर्च की–?”
“बड़ी-बड़ी उच्च डिग्रियाँ तो ली हैं। मशहूर संस्थाओं से पढ़े हैं– कांसेप्ट्स क्लियर किए हैं- रिसर्च थिसिस लिखे हैं मेहनत की है- पोज़ीशंस ली हैं- नाम कमाया है–
मगर— कभी क़ुरान में लिखे हुक्मात पर थोड़ा सा गौर किया है–?”
“नहीं—ना —ना –आपके पास वक़्त ही नहीं– कि इस किताब को पढ़ें– मखमल के घलाफ में लपेट कर ऊँचे ताखे पर सजा दिया– घर में बरकत के लिए रखा है– बस पड़ा रहे–”
मुफ्ती साहब निहायत धीमे अंदाज़ में अपनी बात को दलीलों से समझा रहे थे। शब्द वजनदार थे मगर लहजा ऊँचा या हुक्मी नहीं था।
“अरे अल्लाह के बंदों– तुम अल्लाह के बंदे कहलाते हो बस– बन के नहीं दिखाते– लौट कर तो वहीं जाना है– यह क्यों भूल जाते हो-”
“सूरत अल-अहज़ाब खोलकर पढ़ो.. इसमें उम्माहातुल मुमिनीन को मुक़ातिब करके कहा गया है..
कि किसी नामहरम से लचकदार लहजे में बात मत करो– मबादा जिस के दिल में रोग हो वह लालच में आ जाए- और अपने घरों में ठहरे रहो।
अगर इतनी पाकीज़ा औरतों को यह हुक्म दिया जा रहा है- जिनका दर्जा सब औरतों से अफ़ज़ल है और जो सबसे ज्यादा हया वाली और ताहिरा हैं। जिनसे किसी फितने का शक नहीं।
तो आम औरतों पर कितनी एहतियात لازم है।?
अरे सोचो… अल्लाह के बंदों यह लम्हा फ़िकरी है। हम तो उनके कदमों की धूल के भी बराबर नहीं जिनको यह हुक्म दिया गया है।”
“यह मैं नहीं कह रहा– तुम्हारे– तुम्हारे रब का हुक्म है–”
“अब इसमें क्या हिकमत है- शब्दों पर गौर करो कि जिस के दिल में रोग हो वह लालच में आ जाए-
इस रोग से मुराद– बदनियत है- शहवत है- औरत की हिर्स है-
कि अगर औरत किसी गैर मर्द से नर्म लहजे में बात करेगी तो उस मर्द के दिल में औरत का कोई रौब नहीं होगा- वह उससे बात करते हुए एहतियात नहीं करेगा- उसे कमजोर समझेगा- और उसे कमजोर किरदार की मालिक समझेगा। और उस औरत का शिकार करना। उसे अपनी बातों के जाल में फंसा लेना। और रिश्ते बढ़ाने की मक्सद से बात को लंबा करना उसके लिए आसान होगा।”
और वह औरत अगर अपने लहजे में सख्ती नहीं रखती, किसी से बातचीत में एहतियात नहीं बरतती, अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारती है, अपने किरदार की दुश्मन खुद होती है, और रिश्ते बढ़ते चले जाते हैं जो तबाही पर खत्म होते हैं। शब्द ‘औरत’ का तो मतलब ही यही है, छिपी हुई चीज। वह जितना खुद को छिपा कर रखेगी, उतनी ही इज्जतदार होगी। अगर ना-महरीम से रिश्ते रखना इतना घिनौना और नाजायज न होता, तो तुम्हारा रब निकाह को क्यों रिवाज बनाता? औरत को एक वक्त में एक ही मर्द से क्यों जोड़ता? उसे अपनी सिंगार-ओ-ज़ीनत छिपाने का हुक्म क्यों दिया जाता?
अरे अल्लाह के बंदों, तुम्हारे रब ने तो यह भी कहा है कि बच्चा जब सात साल का हो जाए तो उसका बिस्तर अलग कर दो, वह माँ और बहन के साथ न सोए, वह तो बच्चा है, महرم है, फिर भी यह हुक्म दिया गया। जानते हो क्यों? समाज को पाक बनाने के लिए, उसमें अमन और सुकून के लिए, शैतानियत से बचने के लिए। बच्चा है, जब उसका दिमाग बड़ा होगा और वह नई बातें सीखेगा तो सबसे पहले माँ और बहन ही नजर आएंगी। शरीर की बनावट और आकार तो सभी का एक जैसा है, तो खुदा न खास्ता अगर उसके दिल में अपनी मह्रम औरतों के लिए बुराई आ जाए तो क्या होगा?
अब आपको मेरी बातें शायद बकवास लग रही हों, लेकिन आप रोज सुनते हैं और पढ़ते हैं कि बेटे ने बाप को या माँ को मार डाला, बहन को, माँ-बाप ने अपनी औलाद को मार दिया। सगे रिश्ते, खून के रिश्ते, एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं। अगर यह हो सकता है तो इस फानी दुनिया में क्या नहीं हो सकता? लेकिन लोगों को यह बात समझ नहीं आती, उन्हें ये सारे हुक्म बेकार लगते हैं। मुफ्ती साहब और भी बहुत कुछ कह रहे थे, लेकिन शज़ा अपना बैग उठाकर धपधप करती वहां से उठकर अपने कमरे में आ गई। उसने कान बंद कर लिए थे, यह सारी बातें उसके लिए बेकार और बेमानी हो चुकी थीं क्योंकि उसके दिल पर मुहर लग चुकी थी।
उसके दिल की अनछुई ज़मीन पर तबरेज ख़ान के नाम की हवाएँ चलने लगी थीं। वह अब उसके लिए सिर्फ एक बॉयफ्रेंड नहीं रहा था, बल्कि वह उसके साथ भविष्य के ख्वाब भी देखने लगी थी। बाकी लड़कियों की तरह उसका भी यही मसला था कि वह मीठी बातों के घेरे में खुद को सुरक्षित समझने लगी थी। जब वह कहता था कि — तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो और मैंने आज से पहले कभी किसी लड़की से दोस्ती नहीं की, तुम मेरी जिंदगी में आने वाली पहली लड़की हो, मैं तुम्हें कभी धोखा देने का सोच भी नहीं सकता — तो शज़ा इब्राहीम तुरंत उसकी बातों पर विश्वास कर लेती थी। बिल्कुल वैसे ही जैसे बच्चों को कहा जाता है कि अगर तुम खाना नहीं खाओगे तो भूत आ जाएगा, और वह विश्वास कर लेते हैं।
बिलकुल वैसे ही वह भी उसकी हर बात पर विश्वास कर लेती थी। फोन पर तो लगभग हर रोज़ ही बात होती थी, और अक्सर रात के दूसरे या तीसरे पहर वे छत पर मिलते थे। वह अब तक नहीं जानती थी कि वह उसके घर की छत पर कैसे आता है और उसका घर कहाँ है। न ही कोई और जानता था। शज़ा के घरवालों को इस बात की भनक भी नहीं पड़ी थी। सब कुछ बहुत आसानी से चल रहा था।
आपके द्वारा दिए गए नंबर से इस वक्त जवाब नहीं मिल रहा है।
यह बात वह तीन दिनों में करीब सात सौ बार सुन चुकी थी। तबरेज का फोन तीन दिनों से लगातार बंद था। उसके पास न कोई संपर्क था, न ही कोई पता। ज़मल ने भी इंकार कर दिया था, उसे भी इसके बारे में कुछ नहीं पता था। शज़ा दो दिन से कॉलेज भी नहीं जा रही थी, बस तबियत खराब होने का बहाना करके कमरे में बंद रहती थी। दादू उसके लिए तरह-तरह की चीजें बनाती रहतीं, कभी नजर उतारती और कभी टोटके करती।
“कितना तो समझाती हूँ तुझे, लेकिन तू मेरी बात मानती ही नहीं, बाल मत खोल, नजर लग जाती है।” अब वह फिर उसके सिरहाने बैठ कर कह रही थीं और वह किसी और ही दुनिया में खोई हुई थी। वह उसे सोता समझ कर चली गई थीं, और उसकी तो नींद, भूख, प्यास सब खत्म हो चुकी थी।
ऐसे ही कई दिन गुजर गए थे। अब वह पहले जैसी नटखट और जिंदादिल सी शज़ा नहीं रही थी। हमेशा बुझी-बुझी और चुप-चुप रहती थी। कॉलेज वह जाने लगी थी, लेकिन पढ़ाई में भी उसका ध्यान नहीं था। लेक्चर के दौरान भी वह हेडफोन लगा कर म्यूजिक सुनती रहती। घर आकर या तो टीवी देखती रहती या फिर पढ़ाई के बहाने कमरे में बंद हो कर मोबाइल पर व्यस्त रहती। सब ने उसकी इस बदलाव को नोटिस किया था, लेकिन वजह किसी को नहीं पता थी। उन्होंने शायद अब उसकी आदतों से समझौता कर लिया था, या उन्हें लगा था कि वह गंभीर और जिम्मेदार हो गई है। उसका लापरवाहपन और शरारतें न के बराबर हो गई थीं और वे संतुष्ट थे कि वह अपनी पढ़ाई में ज्यादा रुचि लेने लगी है, लेकिन यह सिर्फ गलतफहमी थी।
यह सर्दी का मौसम था। रात के एक बजे का समय था। शज़ा कुछ देर पहले ही सोई थी। अचानक उसके तकिए के नीचे पड़ा फोन वाइब्रेट करने लगा। वह चौंक कर उठी। यह नंबर सिर्फ तबरेज के पास था। उसने स्क्रीन पर नंबर देखा, वह कोई अजनबी नंबर था। उसने तुरंत कॉल रिसीव कर के कान से लगा लिया।
“कैसी हो शज़ा डियर?”
उसकी आवाज़ उसकी सुनने की क्षमता से टकराई। वह खुद पर काबू नहीं रख पाई, और उसकी सिसकियाँ कमरे के सन्नाटे को तोड़ने लगीं।
“तुम कहाँ थे? मुझे छोड़ क्यों चले गए थे?” वह ज़ार-ज़ार रोते हुए उससे पूछ रही थी।
“रिलैक्स, रोओ तो मत, मुझे तुम्हारे रोने से तकलीफ होती है, अब आ गया हूँ न, मैं बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गया था, बहुत मुश्किल से निकला हूँ।”
“तुम अब तो नहीं जाओगे मुझे छोड़ के?” वह अब भी रो रही थी।
“नहीं अब कभी नहीं,” उसने पूरी तसल्ली से कहा।
“अच्छा रोना बंद करो, दरवाजा खोलो, मैं बाहर खड़ा हूँ।”
“बाहर—हाआ?” वह नंगे पांव कमरे के दरवाजे की तरफ दौड़ी और झट से उसे खोल दिया। वह सामने खड़ा था, उसने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।
शज़ा के आंसुओं में तीव्रता आ गई। “अच्छा अंदर तो चलो, यहां कोई आ न जाए।” तबरेज ने उसके कान में सरगोशी की, और उसे साथ ले कर अंदर आकर कमरे का दरवाजा लॉक कर दिया।
रोने से उसका चेहरा लाल हो रहा था और लंबे बाल बिखरे हुए थे।
“तुम इस वक्त चाँद को भी देखाओ तो वह भी छिप जाएगा, तुम रोते हुए और भी खूबसूरत लगती हो।” वह उसकी तारीफ कर रहा था, और वह खुद को दुनिया की सबसे खुशकिस्मत लड़की समझ रही थी।
शैतान आज़ाद था और इन दोनों के बीच में खड़ा था। शज़ा ने खुद को उसकी रहमत और करम पर छोड़ दिया था, उस वक्त उसके लिए कोई चीज़ क़ीमती या अहम नहीं थी। इज्जत जो रब से उसे तोहफे में मिली थी, उसे उसकी भी परवाह नहीं थी। बस तबरेज को देख कर वह सब कुछ भूल गई थी। वह जादूगर था, उसने जाने कौन सा मंत्र उस पर फूंका था कि वह ना तो विरोध कर पाई, और ना ही इनकार कर पाई।
सदियों के इंतजार के बाद, बारिश की एक बूँद जो सीप के अंदर बंद हो कर सच्चा मोती बन गई थी, साफ, शفاف, बेदाग और चमकता हुआ, उसे झूठी मोहब्बत के कीचड़ ने दागदार कर दिया था। रात के इस आखिरी पहर, जो क़बूलियत और नूर का पहर था, इस पहर में, उस सच्चे मोती की कोई कीमत नहीं रही थी। वह अनमोल से हमेशा के लिए बेमूल हो गया था।
फ़जर की अज़ानें हो रही थीं।
“तबरेज तुम जाओ, दादू उठ जाती हैं इस वक्त,” शज़ा ने खुमार زدہ आँखों से उसे देखते हुए कहा।
“ओके डियर, मैं चलता हूँ, अपना ख्याल रखना, फिर मिलेंगे,” वह मतलब से कहते हुए जाने की तैयारी करने लगे।
वह मुस्कुराते हुए उसे बाहर जाने तक देखती रही।
इस बात से बेपरवाह कि वह मोहब्बत के नाम पर अपनी क़ीमती दौलत गवा चुकी है। आधुनिक दौर की आधुनिक मोहब्बत अपने तलब पूरा कर चुकी थी और हर नुकसान से परे अपने अंजाम तक पहुँच रही थी। वह हर डर से आज़ाद हो कर करवट बदल कर सो गई।
क्या तुम परेशान हो…? फंस गए हो?
रास्ता भी समझ में नहीं आ रहा… वह हल्के से मुस्कराए।
अब्दुल्लाह चुपचाप उन्हें देख रहा था।
तुम्हें पता है तुम पिछली मुसीबत से यहां क्या चीज़ निकालकर लाए हो?
उन्होंने रेत पर अपनी उंगलियां घुमाते हुए अचानक सिर उठाकर उससे पूछा।
उसका सिर अनायास न में हिल गया।
तवक्कुल…
बस एक चीज़ है तवक्कुल…जिसने तुम्हें बचाया है…अगर तुमने यह तवक्कुल न किया होता तो आज तुम्हारी हड्डियों का सुरमा भी नहीं मिलता।
वह बड़ी हैरानी से उनकी बातें सुन रहा था।
यह देख… उन्होंने रेत पर गवाह की उंगली से तीन समानांतर लकीरें खींचीं। वह गौर से उन लकीरों को देखने लगा।
जैसे मुझे यकीन था कि मैं रेत पर उंगली घुमाऊँगा और यहाँ लकीरें पड़ जाएंगी। मेरे दिमाग में कोई शक नहीं था। क्या ऐसा हो सकता है कि मैं रेत पर उंगली घुमाऊं और कोई निशान ही न पड़े?
वह रुककर उसे देखने लगे। उनका सफेद मलमल का कुर्ता गर्म हवा से फड़फड़ा रहा था, और सफेद बालों से ढके उनके भृकुटियाँ आँखों पर झुकी थीं। उन आँखों में रेत की सी चमक थी। जो सामने वाले को अपने काबू में करने की ताकत रखती थीं।
नहीं… अब्दुल्लाह सिर्फ इतना ही कह पाया।
तो बस… यह है तवक्कुल… भरोसा… यकीन… सिर्फ एक ज़ात पर…
उन्होंने रेत से हाथ उठाकर आसमान की ओर इशारा किया।
ऐसा तवक्कुल लाओ… ऐसा यकीन लाओ… जिसमें कोई शक न हो, इतना सा भी नहीं… उन्होंने रेत की चुटकी भरी और हवा में उछाल दी।
तू पार लग जाएगा…
तुझे एक औरत का इश्क… मخلوق का इश्क… बेचैन करके यहाँ ले आया है… अब फिर इश्क कर… बार-बार कर लेकिन खुदा से… यही तेरी मुअराज है। यह जो इश्क मज़ाजी है न, यह इश्क हकीकी तक पहुँचने का रास्ता है और कुछ नहीं।
तू भटक मत जाना, यह राह बड़ी हरी-भरी है। धोखा देती है। सिराब है। इस रेत की तरह।
जा अल्लाह तेरा निगहबान हो।
वह उठे और रेत पर आसानी से चलते हुए विपरीत दिशा में जाने लगे।
“मेरी निया पार लगा दे… मेरी निया पार लगा दे…”
रेतले रेगिस्तान के सन्नाटे में उस अजनबी बुज़ुर्ग की सुरिली आवाज़ें गूंज रही थीं…
वह बहुत दूर जा चुके थे, अब्दुल्लाह ने आँखें मसलकर उनका आक्स ढूंढने की कोशिश की… लेकिन अब सब कुछ धुंधला हो रहा था…
यह सपना था मगर बिलकुल हक़ीकत जैसा… उसे बुज़ुर्ग की सफेद दाढ़ी और मलमल का कुर्ता बिल्कुल साफ याद था…
दोपहर ढल रही थी। खजूर के पेड़ के नीचे पड़ी सूखी हो चुकी खजूरें खाकर वह किसी साए की तलाश में यहाँ आ गया था… यह रेत का बड़ा सा टीला था जो सूरज के सामने उसके लिए आड़ बन गया था और वह उसकी छांव में बहुत देर बेमकसद बैठा रेत के इस समंदर को ताकता रहा था। उसकी चमकदार आँखें उसे चुभ रही थीं… उसकी आँखें दुखने लगीं तो उसने उन्हें बंद कर लिया। और इसी दौरान… नींद के कुछ पल में उसने यह सपना देखा था…
सारे शब्द शब्दशः उसे याद थे। सब स्पष्ट था इसमें कोई संदेह नहीं था…
वह रेत के टीले की ओट से बाहर आया। वही चांदी सी चमकती सत्ता उसके सामने थी… हर तरफ पानी की मौजूदगी का एहसास होता था… पर वह जानता था ये सिराब है… वहां पानी नहीं था… उसका गला सूख रहा था।
हाथ खाली थे… जेबें खाली थीं। उसका सारा सामान खो गया था और वह एक लुटे-पिटे मुसाफिर की तरह इस बेइंतिहा रेगिस्तान में खड़ा था।
उसने अपने बिखरे बालों से रेत झाड़ी जो नीचे गिरकर फिर से उसके कदमों के नीचे रेत के रूप में बन गई थी।
उसे याद आया कि उसने इतने दिनों से नमाज़ भी नहीं पढ़ी थी। यहाँ वक्त का कोई हिसाब नहीं था। वह घड़ी से वक्त देखने वाला, साए से वक्त कैसे माप सकता था? उसने अपनी कलाई को देखा, वहाँ बंधी घड़ी अब नहीं थी।
यहाँ कोई अज़ान की आवाज़ नहीं थी। मस्जिदों से पाँच वक्त के बुलावे नहीं थे। कोई बताने वाला नहीं था कि तुम्हारा रब तुम्हें सफलता की ओर बुला रहा है दौड़ते हुए आओ।
और जो ये बुलावे सुनते थे, उनमें से कुछ को छोड़कर बाकी उठते नहीं थे। उनके पैर थे, मगर वह सफलता की ओर दौड़ने की ताकत नहीं रखते थे। वह बुलावा सुनकर भी बहरे थे। उनकी ज़ुबान खुदा की तारीफ करने से थक जाती थी। उनके पास वक्त नहीं था।
पर यहाँ तो कोई नहीं था जो उसे बुलाता…
उसने सिर उठाकर आसमान को देखा… वह बिल्कुल सपाट था… बेभाव और तड़कता हुआ।
यहाँ वह था जिसके बुलावे का उसकी नाइब, मुनादी करने वाले… उसकी मخلوق… अपने जैसी दूसरी मخلوق को सुनाती थी।
यहाँ कोई मुनादी करने वाला नहीं था मगर वह खुद था जिसके पैगाम की मुनादी पूरी दुनिया में गूंजती है।
उसने साए को देखा, वह ढल रहा था। सूरज की जलन मंद सी पड़ रही थी। शायद यह عصر का वक्त था। जाने कौन सा दिन था? कौन सी तारीख थी?
उसने रेत से तिमाम किया… और वहीं टीले की छांव में नीयत बांध कर खड़ा हो गया।
सोचने को कुछ नहीं था… दिमाग बिल्कुल खाली था जैसे बे-हिस हो गया हो।
उसने العصر की नमाज़ की नीयत की।
سبحانک اللہم وبحمدک
ए अल्लाह तू पाक है… और तमाम तारीफें तेरे लिए हैं।
वह इस कलाम के मानी जानता था, पर आज से पहले कभी नमाज़ में अदा करते हुए उसे नहीं सोचा था। उसकी दुनिया में वक्त कम था। पर इस अजनबी दुनिया में वक्त का कोई हिसाब नहीं था। वह भरपूर था… बे-जा था…
الحمد للہ رب العالمین
तमाम तारीफें अल्लाह के लिए हैं जो तमाम जहानों का रब है।
अब वह सुरह फातिहा पढ़ रहा था। पूरे ध्यान से। हर शब्द को महसूस करते हुए।
इस जहान में पानी नहीं था। वह प्यासा था।
पर उसके अंदर भी एक जहान था। और वह भी प्यासा था। बरसों से उस वक्त का जो… सारा का सारा एक हस्ती की तारीफ में बसर हो। वह लम्हात जब उसे… उसके कलाम से महसूस किया जा सके… जब वह कल्पना में मुजस्सम हो।
उसके अंदर का जहान प्यासा था, मगर उसमें शरा थी… जो उसकी आँखों से बूँदों के रूप में बहने लगी थी।
इस रेगिस्तान में उसकी तिलावत गूंज रही थी वह बहुत ठहर ठहर कर पढ़ रहा था।
ورتل القرآن ترتیلاo ….القرآن
और क़ुरआन को ठहर ठहर कर पढ़ो।
उसके आँसू रेत पर गिर रहे थे। और उसकी सिसकियाँ रेत के हर कण में समाहित हो रही थीं। वीरान रेगिस्तान आबाद हो गया था। कोई खालिक काइनात का नाम लेने वाला उसे कलाम इलाही से आबाद कर रहा था।
रेगिस्तान और वीराने इंसानों से नहीं, अपने रब के नाम से आबाद होते हैं। भरे-पूरे शहर वीरान कब्रिस्तान हैं अगर उनमें कोई अब्द नहीं… कोई उसका नाम लेने वाला नहीं…
मालिक अपने गुलाम की जुबान से अपनी तारीफ सुन रहा था। और इस बेइंतिहा रेगिस्तान का हर कण उस चाशनी को अपने अंदर جذب कर रहा था।
उसकी ज़िन्दगी की डोर लगता था तबरेज़ खान के साथ बंध गई है- वह फोन न करता तो वह घंटों बैठकर उसके फोन का इंतजार करती रहती थी- वह उससे बात किए बिना सारा दिन बोलाई बोलाई फिरती थी- जब उसका दिल चाहता तो वह मिलने आ जाता और हसरत भरी मोहब्बत जताता- और शजा इब्राहीम किसी कठपुतली की तरह उसके हाथों में नाच रही थी- वह रस्सी खींचता तो नृत्य रुक जाता- छोड़ देता तो नृत्य शुरू हो जाता-
कुछ ही दिनों में उसकी सेहत खराब होना शुरू हो गई थी- उसे अपने घर वाले भी बुरे लगने लगे थे- उनके साथ बैठने बात करने और हंसी मजाक करने को दिल नहीं करता था- खाने पीने की पहली सी वह शौकीन नहीं रही थी- घर वालों को यही पता था कि उसके एग्जाम्स पास हैं इसलिए पढ़ाई कर कर के यह हाल हो गया है-
सत्रह बरस की उम्र में ही वह अपनी शोख मिजाजी खो बैठी थी- आज़ाद लड़कियों की सी बेफिक्री उसकी ज़िन्दगी में नापید होती जा रही थी- बस ज़िन्दगी का एक ही नाम रह गया था– तबरेज़ खान-
घर में मेहमान जमा थे- दादा जी और उसके चचा यूसुफ फैमिली समेत आए हुए थे- सब खुश गपियों में व्यस्त थे- हलचल हो रही थी।
पर उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी- वह अपने कमरे में बंद थी- जब सफ़ोरा उसे बुलाने आई-
तुम यहाँ अकेली क्यों बैठी हो? सब तुम्हारा ही पूछ रहे हैं-
सफ़ोरा बे तकلفी से उसके बेड पर बैठ गई- उसके चेहरे पर बच्चों जैसी मासूमियत थी- उसने हिजाब के स्टाइल में दुपट्टा ओढ़ रखा था- उसके चेहरे पर तसल्ली और आसूदी थी- किसी झूठी मोहब्बत का दर्द नहीं था-
वह बस –मैं सो रही थी-
उसने बहाना बनाया-
अरे वाह– यह फोन कब लेकर दिया चाचू ने-?
अपनी तरफ से तो उसने फोन छुपाकर रखा हुआ था मगर उसकी कज़िन को वह नजर आ गया था-
यह—- यह तो— मेरी फ्रेंड का है- उससे कोई बात नहीं बन रही थी- दिल जोर-जोर से धड़क रहा था-
इतनी अच्छी फ्रेंड है तुम्हारी इतना महंगा फोन तुम्हें दे दिया-?
वह सादगी से कह रही थी।
वह अब उसकी स्क्रीन पर अंगुलियां फेर रही थी- शज़ा के हाथ कांप रहे थे- उसने फोन उसके हाथ से ले लिया- कहीं वह मैसेज न पढ़ ले।
“नहीं— यह तो मजाक में ले आई थी, मैं वह—- रख कर भूल गई थी, मैंने उठा लिया और उसे बताया नहीं। कल वापस कर दूंगी।” उसने जबरदस्ती मुस्कराते हुए फोन ऑफ करके साइड पर रख दिया।
“अच्छा, चलो न बाहर आओ- इतने दिनों बाद मिल रहे हैं और तुम मुझे लिफ्ट ही नहीं दे रही।”
“नहीं, तुम यहीं बैठो — यहाँ बैठकर ही बातें करते हैं।”
“अरे शज़ा– तुम इतनी बोर कब से हो गई- बाहर चलो न- कोई शरारत नहीं सूझ रही तुम्हें आज-?” वह मुस्कराई तो उसकी मुस्कान में कितनी सच्चाई और सादगी थी।
“मेरा दिल नहीं कर रहा।”
“चले उठो– बस अब मैं कुछ नहीं सुनूंगी- यहाँ कोई और लड़की होती तो मैं तुम्हारी मिन्नतें न कर रही होती।”
सफोरा उठकर खड़ी हो गई और उसका हाथ पकड़कर खींचा— “छोड़ो न–” शज़ा प्रतिरोध की कोशिश कर रही थी।
पर उसने उसे बेड से नीचे खींच लिया– इसी खींचतान में शज़ा का हाथ छूटा और उसका सिर साइड टेबल से जा टकराया।
“ओह, सॉरी,” सफोरा परेशान हो गई, उसने जल्दी से उसे सीधा किया लेकिन वह बेहोश हो गई थी।
सफोरा के तो हाथ-पैर फूल गए- वह उसे वहीं छोड़कर बाहर भागी।
“दादा जी— वह शज़ा—”
“क्या हुआ शज़ा को?”
सभी लाउंज में बैठे थे जब वह भागती हुई आई।
“वह… उसे… चोट लग गई है।”
“परेशान क्यों हो रही हो? डॉक्टर तो घर में ही मौजूद है।”
अब अब्दुल्ला के बाद हातम भी डॉक्टर बन चुका था।
“चलो भई, برخوردार,” दादा जी ने उसे संबोधित किया।
“बल्कि छोटी बहू, तुम भी आ जाओ।”
डॉक्टर साल्विया भी वहीं मौजूद थी।
वे सभी उसके कमरे की ओर बढ़े- शज़ा बेड पर बेहोश पड़ी थी- साल्विया ने आगे बढ़कर उसकी नब्ज चेक की, वह धीमी गति से चल रही थी- उसके माथे पर मामूली सा नीला पड़ गया था।
“आंतरिक चोट है, बशर्ते कोई घाव नहीं है।”
“हातम, तुम इंजेक्शन ले आओ,” उसने एक पेन किलर इंजेक्शन का नाम लिया।
“परेशानी की कोई बात नहीं है, अभी ठीक हो जाएगी।” दादा जी, आप परेशान न हों- साल्विया ने उन्हें तसल्ली दी।
“ठीक है बहू, तुम अपनी डॉक्टरी आज़माओ, हम बेफिक्र हो जाते हैं,” दादा जी मुस्कराए।
“शमां, उसे कंबल ठीक से ओढ़ाओ,” शमां कंबल ओढ़ाते हुए आ गई। “मैं इसके लिए गर्म दूध लाती हूँ।” सभी बाहर चले गए थे।
साल्विया जानबूझकर वहीं रुक गई थी- शज़ा की हालत उसे कुछ और ही समझा रही थी- वह गहरी विचारशील निगाहों से उसे देख रही थी। उसने दो-तीन बार उसका चेहरा थपथपाया तो उसने धीरे-धीरे आँखें खोल दीं।
साल्विया ने उससे डॉक्टर के तौर पर कुछ सवाल किए तो उसका शक यकीन में बदलने लगा।
लेकिन वह बिना किसी सबूत के कुछ नहीं कह सकती थी- वह इस नाबालिग लड़की को हैरानी से देख रही थी, जिसके घरवालों को उसकी हरकतों का आभास भी नहीं था। वह अफसोस से उसे देखती रही, जो अब आँखें बंद किए किसी सोच में डूबी थी।
वह उसे इंजेक्शन लगाकर वहां से आ गई थी- लेकिन उसका दिमाग वहीं अटका हुआ था और उसके दिल को निजी तौर पर तकलीफ हो रही थी। शायद मेरा वहम हो- उसने सोचा।
“मम्मी– शज़ा कमजोर होती जा रही है, उसकी सेहत पहले जैसी नहीं रही और वह बता रही थी कि उसे थकावट भी बहुत जल्दी होती है। अगर आप बुरा न मानें तो मैं उसे क्लिनिक ले जाऊं, एक-दो टेस्ट होंगे तो पता चल जाएगा क्या प्रॉब्लम है और उसके हिसाब से डाइट प्लान भी बना दूँगी,” उसने शमां से बात की।
“हां– हां– इसमें भी कोई पूछने वाली बात है, घर के डॉक्टर का कोई तो फायदा हो,” शमां ने कहा। “मैं भी नोट कर रही थी, पर उसके एग्ज़ाम्स हो रहे हैं न तो टेंशन बहुत लेती है। मैंने सोचा ठीक हो जाएगी।”
साल्विया ठंडी सांस भरकर रह गई- वह कैसी माँ थी? जो बेटी में इतनी बड़ी तब्दीली को महसूस नहीं कर पाई थी।
शज़ा चेक अप करवाने के लिए राज़ी नहीं थी- साल्विया उसे ज़बरदस्ती क्लिनिक ले गई थी- और अब उसकी हालत ऐसी थी कि काटो तो बदन में लहू नहीं। टेस्ट रिपोर्ट्स ने उसका पर्दा फाश कर दिया था- साल्विया का सिर चकरा गया- मास्टर जी की इज़्ज़त को धक्का लग गया था। वह तो यह सोचकर ही कांप गई कि जब सबको पता चलेगा तो क्या हंगामा मचेगा।
“कौन है वह–?”
साल्विया ने सख्ती से उससे पूछा।
“कौन–?” शज़ा ने सिर झुकाकर उठाया।
“तुम अच्छी तरह जानती हो मैं तुमसे क्या पूछ रही हूँ?”
“मुझे आपकी बात समझ नहीं आ रही- घर चलें।”
“शज़ा देखो- इससे पहले कि पूरे परिवार को यह बात पता चले तुम शराफत से मुझे सच बता दो,” उसने उसे धमकाया।
“कौन सी बात-?”
वह अभी भी अनजान बन रही थी लेकिन उसका चेहरा धुंआ-धुंआ हो रहा था।
“यह देखो अपनी रिपोर्ट्स,” साल्विया ने उसके हाथ में रिपोर्ट्स थमाईं।
उसमें देखने की ताकत नहीं थी क्योंकि वह जानती थी कि उनमें क्या लिखा है।
उसके आंसू टप-टप गिरने लगे।
“देखो अगर कोई हादसा वगैरह था तो बता दो, इसमें तुम्हारा कसूर नहीं होगा,” साल्विया अब नरमी से बोली।
उसने नफी में सिर हिलाया।
“आप किसी को मत बताइएगा, मैं उससे बात करती हूँ,” उसने तबरेज़ को कॉल मिलाई।
दूसरी ही बेल पर उसने कॉल उठा ली- “हैलो शज़ा डार्लिंग–” उसकी चहकती आवाज़ उभरी।
साल्विया ने उसके हाथ से फोन ले लिया- “इधर दो, मुझे बात करने दो।”
“क्या मिला तुम्हें एक लड़की की जिंदगी तबाह करके?” “तुम्हें उससे निकाह करना होगा।”
उसका मक़रूह हंसी गूंजी-
“निकाह— हाउ फनी!!!”
“इस बदकार लड़की से-?” स्पीकर से गूंजती आवाज़ ने शज़ा के मुंह पर तमाचा मारा।
“तुम घटिया नीच आदमी-…” साल्विया का बस नहीं चल रहा था, उसे गोली मार दे।
“ओह— हाउ स्वीट—” उसने फिर हंसी लगाई- “और मुहतरमा शज़ा को क्या خطاب देना पसंद फरमाएंगी आप?”
“मैंने तो नहीं कहा था कि मुझे बॉयफ्रेंड बनाओ और फरमाइशें करो- मुफ्त की मिठाई मिल रही हो तो कौन पागल नहीं खाता?” “मुफ्त की शराब काज़ी को भी हलाल— यह मुहावरा नहीं पढ़ा आपने-? हाहाहा!”
“मैं तुम्हें कोर्ट में घसीटूंगी, तब तुम्हें अपने जुर्म का इقرار करना पड़ेगा।” वह गुस्से से लाल हो रही थी।
“ओह— मैं डर गया— हाहाहा!”
“मैं भी फिर वह सारी तस्वीरें और कॉल रिकार्ड्स पेश करूंगा जो आपकी शरीफ ज़ादी की शराफत का मुँह बोलता प्रमाण हैं।”
साल्विया को चुप लग गई- रो-रो कर शज़ा की हालत बदतर हो रही थी।
“वह जो तुम्हारे गुनाह का बोझ उठाए फिर रही है उसका क्या कसूर है?” उसने हार के साथ कहा।
“वह उसका मामला है अब, वह जाने और उसके घरवाले।” उसने कहकर फोन बंद कर दिया।
साल्विया ने गुस्से और करुणा की मिली जुली भावना से उसे देखा, जो अपना सब कुछ बर्बाद कर बैठी थी।
“गुनाह के खेल में बोझ हमेशा औरत ही उठाती है– दाग उसके माथे पर ही सजाया जाता है। इज़्ज़त उसे ही ज्यादा अज़ीज़ होती है- और फिर पता नहीं क्यों— और कैसे वह उस इज़्ज़त पर समझौता कर लेती है-?” “मामूली से कीड़े-मकोड़े से डरने वाली औरत, आदमी से क्यों नहीं डरती?”
“और बेमोल हो जाती है- किसी और के अंजाम से कभी عبرत नहीं पकड़ती- जब तक खुद जलती आग में कूदकर झुलस न जाए।”
“इस मामले में औरत बड़ी ढीठ निकलती है- और मर्द बहुत बेरहम-!!!”
रेत बेतहाशा उड़ रही थी- तूफान के तंद-तेज चक्कर हर तरफ रेत उड़ा रहे थे- वह जिस टीले की ओट में बैठा था हवा उसे खा रही थी- निगल रही थी- रेत यूं एक जगह से दूसरी जगह منتقل हो रही थी जैसे बहुत से मजदूर अपनी टोकरी भर-भर के फेंक रहे हों- वह घुटनों में सिर दिए इस तूफान से बचने की कोशिश कर रहा था पर रेत उसके ऊपर ढेर होती जा रही थी।
हर चीज से और हर जज़बे से मावरा तूफान… एक इंसान को रेत के समंदर में डुबो रहा था- उसके बदन पर रेत सुईयों की तरह चुभ रही थी- वह सख्ती से आँखें मीचे उस तूफान के थमने का इंतजार कर रहा था।
उसने तूफान सहे थे—बारिश के ठंडे तूफान- गर्मियों में मिट्टी के तूफान- और नदियों में आने वाले तूफान जो हर खर-पतवार को बहा ले जाते हैं- पर यह तूफान सबसे ज्यादा कष्टकारी था- यहां कोई अपना नहीं था… न माँ थी जिसकी गोदी में वह पनाह ले लेता और इससे बच जाता- वह निहत्थे योद्धा की तरह इसके सामने बेबस थे- प्रकृति अपनी ताकत दिखा रही थी- चाँद पर पहुँच जाने वाला—सितारों पर डोरी डालने वाला—हवाओं में उड़ने वाला इंसान—प्रकृति के सामने बेबस था।
रेत के साथ वक्त भी सरक रहा था- मगर उसकी रफ्तार धीमी थी- कठिन वक्त हमेशा तेजी से आता है और धीमी रफ्तार से जाता है- यह वक्त की खासियत है उसकी रफ्तार कभी एक सी नहीं रहती-
वक्त की रफ्तार वक्त के हिसाब से बदलती रहती है-
उसे लगा था कि शायद यह रेत उसे भी अपने साथ उड़ा ले जाएगी और फिर किसी और अनजानी ज़मीन पर फेंक देगी या उसकी रूह को उसके बदन से खींच लेगी- उसे घर याद आ रहा था अपने माँ-बाप- बहन- भाई- वह ठंडी रात जब वह अपने घर लौट रहा था- और अब… गुमराह होकर दर-बदर भटक रहा था- लेकिन सारे दरों का मालिक एक ही है- वह ज्यादा देर अपने गुलामों को रांद दरगाह नहीं रहने देता।
अजीब बात थी उसे वह याद नहीं आई थी- जिसकी वजह से वह यहां था- उसके मन की स्लेट से जैसे उसकी याद मिट गई थी-
परी—उसकी ज़बान पर आज उसका नाम आया था- तुमने छोड़ दिया न मुझे- तुम्हारे पास तो बहुत सी ताकतें हैं तुम मुझे यहाँ से निकाल सकती थी- मेरी मदद कर सकती थी पर शायद तुम्हें मेरी याद ही नहीं आई- उसने बंद आँखों से सोचा- जिनकी पलकों पर बेहिसाब रेत थी।
रेगिस्तान के बाशिंदे जाने कैसे यहाँ बसते होंगे? क्या उनके बदन को रेत नहीं खाती होगी? या वे लोहे के बदन के मालिक होते हैं? उनका खाना-पीना कैसा होता होगा? और बेकार दिन कैसे कटते होंगे? और वे ठंडी रात से कैसे बचते होंगे? वे तो अज़ल से यहाँ रहते थे… जाने कैसे? वह अज्ञात लोगों को सोच रहा था।
गर्ज़ते तूफान थम चुका था- हल्की सी रोशनी बाकी थी- रात आने को थी- उसने आँखें खोलकर चारों ओर देखा- वह कंधों तक रेत में धंसा हुआ था- रेत को मुश्किल से झाड़कर वह बाहर निकला- रेत का टीला वहाँ नहीं था- वह अपनी जगह बदल चुका था- और उसकी हाइट और आकार भी पहले जैसा नहीं रहा था-
रेगिस्तान की रातें ठंडी और दिन गर्म होते हैं- उसके तन पर एक जोड़ा था और एक उसकी जैकेट- जो इस ठंडी रात में उसे सुरक्षित रखने में नाकाम थी-
वह इस जगह से निकल जाने की उम्मीद में रेत पर चलने लगा- पर वह वैसी ही थी जैसे पहले दिन थी- गुमराह करने वाली- होशियार इंसान को पागल करने वाली। और चुभने वाली।
इसमें कोई खास निशानी नहीं थी कोई रास्ता नहीं था कोई मंज़िल नहीं थी- रेत के ढेर इधर से उधर हो गए थे फिर भी इस रेगिस्तान की शक्ल-ओ-शुबाहत में कोई बदलाव नहीं आया था- वह चलते-चलते बहुत दूर निकल आया था-
कुछ पुराने चीथड़े तूफान कहीं से उड़ा लाया था और अब वह रेत के इस समंदर में बिखरे हुए थे- चलते-चलते उसके पैरों के नीचे कोई बड़ी सी चीज आई- उसने रुककर देखा यह एक गदड़ी थी- रंग-बिरंगे कपड़े के टुकड़ों से बनी एक चादर जैसी चीज- जो आमतौर पर फकीर या दरवेश पहनते हैं- उसने इसे उठाया- वह इसे ठंड से बचाने के लिए काफी थी- ऐसा लगता था जैसे रेतले तूफान ने किसी फकीर से उसकी यह गदड़ी छीन ली हो या उससे उसकी जिंदगी छीन ली हो कि वह विरोध न कर सके-
वह एक झाड़ी के पास बैठ गया और इस गदड़ी को अच्छे से अपने चारों ओर लपेट लिया- रात गिर रही थी- आसमान पर तारे बहुत रोशन थे- चाँद बहुत दूर दिखाई दे रहा था- वह आधा था- आधा काला और आधा सफेद-
उसका डर धीरे-धीरे खत्म हो रहा था- अब उसे अकेलापन और इस वीरान रेगिस्तान से डर नहीं लग रहा था- वह निडर हो गया था- तवक्कल बढ़ने लगा था- उसे लगता था कि जिंदगी अब शुरू हो रही है- इस रेगिस्तान से- पहले वह इस कदर अहम नहीं था- न ही उसकी शख्सियत उसके लिए अहम थी और न ही सारी कायनात के मालिक से इतना संपर्क था- अब लगता था कि सिर्फ उसी से वास्ता है… उसी से संपर्क है- उसके सिवा न कुछ समझ आता था और न कुछ दिमाग में समाता था-
रात अपना सफर तय कर रही थी और उसकी सोचों को समेटते समेटते नींद की वादी में क़ैद कर रही थी- नींद तो सولی पर भी आ जाती है- और उसे भी इस रेत ने अपनी गोदी में थपक-थपक कर सुला दिया था-
दिन का उजाला फैल रहा था- सूरज की चुभती किरणों ने उसे जगा दिया था- पानी के बिना उससे साँस लेना मुश्किल हो रहा था- उसने दूर तक निगाह दौड़ाई पानी कहीं नहीं था- वह यहाँ रहते-रहते थक चुका था- भूख-प्यास जन्मजात स्वभाव हैं जो किसी भी हालत में इंसान को आज़ाद नहीं होने देतीं वह भी इनकी जंजीरों में खुद को बंधा हुआ महसूस कर रहा था-
उसने खड़े होकर आस-भरी नजरों से इस ज़मीन को देखा- बहुत दूर एक कैक्टस का पौधा था- उसे थोड़ी तसल्ली हुई और बहुत देर चलने के बाद वह उस तक पहुँच गया- सूरज उसके साथ-साथ सफर कर रहा था जैसे उसकी रखवाली पर नियुक्त हो-
वह हांफता हुआ उस पौधे तक पहुँच गया।
वह उसके कद से भी ऊँचा मोटे-मोटे कांटों से भरा पौधा था- कैक्टस का पौधा सख्त छाल वाला बड़े-बड़े कांटों से भरा एक रेगिस्तानी पौधा होता है- ऐलोवेरा की तरह उसके अंदर जेल जैसा गूदा भरा होता है- जो कठिन परिस्थितियों में पानी के विकल्प का काम दे सकता है-
उसे हाथ लगाना अपने आप को घायल करने के बराबर था- अब मसला यह था कि उसे कैसे खोला जाए- अब्दुल्ला बहुत देर परेशान खड़ा रहा-
उसने आसमान की तरफ देखा और रब से मदद मांगी- तवक्कल का एक और जामा पार हो चुका था- वह अपनी जरूरत के लिए अपने परवरदिगार पर भरोसा करके उससे रुख कर रहा था- अब किसी भी الوسीले के न होने पर उसकी नजर सीधे रब की तरफ ही उठती थी। मسبب अल-असबाब की तरफ।
जब दुनियावी الوسीले और कारण थे तो उन्हीं पर तकीया होता था। इंसान की फितरत ही ऐसी है कि वह थक-हार के और हर जगह से मायूस और नाकाम होने के बाद कहता है…
“या अल्लाह अब तो बस तू ही है”
वह पहले दिन से ही क्यों अपने परवरदिगार पर भरोसा नहीं करता? जिसके बुज़ुर्ग… जो जूते के तस्मे की जरूरत भी शाहंशाह आलम से मांगते थे। वह दर-दर का भिखारी बन जाता है। और पूरी रियाया… पूरी सल्तनत से ठुकराए जाने के बाद उसे ख्याल आता है कि इस सल्तनत का एक बादशाह भी है अब उसके दरबार में जाना चाहिए। और वह ऐसा सख़ी है ऐसा रहमाँ है कि नाराज़ ही नहीं होता कि तू मेरे पास पहले क्यों नहीं आया?
उसने आसपास नज़र दौड़ाई- रेत पर कुछ टूटे बर्तनों के टुकड़े पड़े थे- मिट्टी के टूटे बर्तनों के टुकड़े- शायद यहाँ भी कभी कोई आबाद था- कोई बस्ती थी जिसमें इंसान अपने दौर की तहذیب और संस्कृति समेत जीते थे- और जाने वक्त के कौन से पहर वह बेनिशान हो गए थे-? उनकी बस्ती शायद किसी आफत या तूफान का शिकार हो गई होगी या वे इस वीराने को छोड़कर कहीं और जाकर बस गए थे-
उसने एक तेज धार वाली नोकदार सी टूटती चाकरी उठाई और उसे कैक्टस की एक शाखा के बीच में उतार दिया- वह बीच से कट गई थी- उसके अंदर का गूदा उसकी प्यास बुझाने में काम आया था- उसने उस पौधे की कई शाखाएँ चीर डाली थीं-
अब उसके पास करने को कुछ नहीं था- इसलिए वह उसी पौधे के पास बैठ गया-
रेत पर एक सक्रिय साया सा दिखाई दिया- उसने ऊपर की तरफ नज़र की- बड़े बड़े काले पंखों वाले गिद्ध उसके सिर पर मंडरा रहे थे-
कुछ देर चक्कर काटने के बाद वह उससे कुछ दूर आकर बैठ गए- उनकी गर्दनें गुलाबी और नाजुक थीं- पंजे सख्त थे और उनके पंजों से कुछ ऊपर सफेद पंखों का हल्का सा आभा बना था- उनके पंख बड़े-बड़े और काले रंग के थे जो उनके आस-पास में झलके हुए थे- और उखड़े उखड़े से थे- आँखें मुरझाई हुई और किसी मुर्दा के इंतजार में थीं- वे अपनी तेज़ चोंचें खोलकर हांफ रहे थे- और उसे तक रहे थे- वे शायद उसके मरने का इंतजार कर रहे थे- ताकि उसके मरे हुए बदन से अपनी भूख मिटा सकें- शायद यहां उन्हें कोई और मरा हुआ या जिंदा नहीं मिला था इसलिए वे अब उसकी तरफ आश भरी नजरों से देख रहे थे- वह झुरझुरी लेकर उनसे और दूर हो गया-
वह حافظ था- उसने कुरान को फिर से दोहराने का इरादा किया- अलहमदु लिल्लाह से वाल नास तक-
वह हल्की आवाज में तلاوة कर रहा था- और रेत का हर कण हमे तन गोश हो गया था- जाने क़यामत की सुबह तक फिर ऐसा कलाम सुनने को मिले या न मिले? इसलिए यह पूरी सल्तनत मस्त हो गई थी- सूरज सवा नज़े पर था और झुक कर नीचे बैठे इस गुलाम को देख रहा था- जो उसके रब की सना कर रहा था-
पूरा दिन जलता सूरज—सफेद सेरमी सा आसमान…
आस भरी आँखों वाले गिद्ध–कैक्टस का पौधा और उस पर लगे कांटे- –दूर दूर उगी झाड़ियाँ और उनमें छिपे छोटे छोटे कीड़े मकोड़े–उन्हें सुनने और देखने में मशगूल रहे थे–
शाम हुई तो सूरज अपनी रोशनी समेटने पर मजबूर था और गिद्ध बुझी आँखों के साथ मुड़ गए थे- कीड़े मकोड़े अपनी खुद की बिलों में घुस गए थे- उजाड़ झाड़ियाँ… और कैक्टस का पौधा… और गहरा सेरमी आसमान और अब्दुल्लाह फिर वही थे- उसने पूरा कुरान दोहराया था- और अब डुबते रात उसे शांत कर रही थी।
जब उसकी आँख खुली…
जब उसकी आँख खुली, तो उसे किसी नरम बिस्तर पर होने का एहसास हुआ। उसके सामने पत्थरों से बनी एक दीवार थी। लेकिन वह तो रेत पर सोया था, तो यह सब क्या था? वह नरम और गर्म बिस्तर पर लेटा हुआ था। किसी मधुर आवाज़ में सूरह अर-रहमान की तिलावत हो रही थी—
“فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ”
“तो तुम अपने रब की कौन-कौन सी नेमतों को झुटलाओगे?”
जब वह पूरी तरह से होश में आया, तो उठकर बैठ गया। उसके सिरहाने वही बाबा जी तिलावत कर रहे थे, जिनके पास उसे अली लेकर गया था। वही बाबा जी, जो पहाड़ की चोटी पर कुटिया बनाए रहते थे। यह सुबह-सवेरे का समय था। पूरी फिज़ा में एक अजीब सा जादू था।
वह हैरानी से उन्हें देख रहा था— वह यहाँ कब और कैसे पहुँचा? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। लेकिन बाबा जी उससे पूरी तरह बेखबर, अपने मौला से गुफ्तगू में मगन थे।
“उठ गया तू?”
तिलावत पूरी करके उन्होंने उसे प्यार भरी मुस्कान से देखा।
“जी… मैं यहाँ… कैसे?”
उसके लहजे में गहरी हैरानी थी।
“यह ले, पानी पी ले। बहुत प्यासा है तू… पर अब सैराब भी हो गया है।”
बाबा जी ने मिट्टी के घड़े से पानी निकालकर एक प्याले में उसे दिया। मिट्टी के प्याले में पानी बहुत मीठा लग रहा था, और उसकी ठंडक उसके दिल को सुकून दे रही थी।
“बाबा जी… मैं यहाँ कैसे?”
“क्या मैंने कोई सपना देखा था?”
“हाँ, यही समझ ले बेटे।”
“क्या मतलब?”
“मतलब यह कि तू इस सब को याद रख। इसे भूलना मत। जो वक्त तूने वहाँ गुज़ारा, वह सोने के समान है। लेकिन किसी को अपने इस राज़ से आगाह मत करना।”
“राज़?”
**”हाँ… यह कायनात के रहस्य हैं। यह वही पर खोलता है, जिसे चाहता है। हर किसी की अक़्ल इन्हें समझ नहीं सकती। तूने भी कायनात के छुपे हुए राज़ों में से एक राज़ पा लिया है— ‘वक्त का राज़।’
“इस कायनात में हर जगह वक्त एक जैसा नहीं चलता। कहीं यह ठहर जाता है, और कहीं पलक झपकते ही गुज़र जाता है। यह हमारे-तुम्हारे लिए ही वक्त का चक्कर है— दिन, महीने, साल, घड़ियाँ, और उनकी चलती सुइयाँ।”
“क्योंकि हमारी अक़्ल इन्हें मानती है। जिस चीज़ को अक़्ल न माने, हम उसके लिए अंधे होते हैं। वह हमें दिखती नहीं।”
वह उलझन में उन्हें देख रहा था।
“तू यहाँ आ गया है, जैसे वहाँ से लाया गया था। तुझे फरेब ने एक दूसरी दुनिया में गुम कर दिया था, और तवक्कुल (भरोसे) ने फिर से तुझे यहाँ पहुँचा दिया है। यह तवक्कुल मत छोड़ना। यही तुझे राहे-हक़ तक ले जाएगा। तेरा दिल कभी डगमगाएगा, शंकाएँ आएँगी, लेकिन तू इस राह पर कायम रहना।”
“बहुत सफर किया है तूने, थक गया होगा।”
बाबा जी लगातार बोल रहे थे, और वह ध्यान से सुनता जा रहा था।
“यह सफर भी बहुत ज़रूरी था। इसके बिना आदमी, इंसान नहीं बनता।”
“कुरआन कहता है—”
“قُلْ سِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ”
“कहो, ज़मीन की सैर करो और देखो, झुटलाने वालों का अंजाम कैसा हुआ।”
“यह सफर बहुत कुछ सिखाता है। दोनों तरह का सफर— उर्दू वाला भी और अंग्रेजी वाला भी।”
“कभी किसी भिखारी को गिड़गिड़ाते देखा है?”
वह रुक गए।
उसने सिर हिलाकर हामी भरी।
“उस पर गौर करना। जब तू पहली बार भिखारी को देखेगा, तो तेरा उसे कुछ देने का कोई इरादा नहीं होगा। अगर वह अपाहिज न हो, तंदुरुस्त हो, तो लोग भिक्षा देने से हाथ रोक लेते हैं।”
“लेकिन अगर उसे माँगने का हुनर आता हो, तो वह तुझसे कुछ न कुछ ले ही लेता है। वह तुझसे गिड़गिड़ाता है, अपनी मजबूरियाँ बताता है, झूठी-सच्ची कहानियाँ सुनाता है, मासूम और लाचार चेहरा बनाता है, और फिर एक कठोर से कठोर दिल वाला इंसान भी पिघल जाता है।”
“यही फलसफा है… रब से माँगने का।”
“भिखारी बन जा। गिड़गिड़ा। अपनी मजबूरियाँ बयान कर। उससे ऐसे माँग कि उसकी रहमत जोश में आ जाए। वह बहुत रहीम है। सत्तर माँओं से भी ज्यादा चाहने वाला। उसका खज़ाना भरा हुआ है।”
“और याद रख, अल्लाह किसी को उसकी औक़ात देखकर या उसके ज़ाहिर को देखकर नहीं नवाजता। अगर ऐसा होता, तो दुनिया के सारे मुश्रिक भूखे मर रहे होते।”
“वह सिर्फ इंसान का ज़र्फ (धैर्य) देखता है। उसकी मज़बूती और उसका भरोसा— कि वह कब तक और कितना भरोसा करता है?”
“क्या तू माँगते-माँगते थक तो नहीं जाएगा?”
“क्या तू ज़रूरतें माँगता है, या ख्वाहिशें?”
“सिर्फ अपने लिए माँगता है, या मख़लूक के लिए भी?”
“और उसकी तलब कितनी सच्ची है? वह दुनिया माँगता है, या आखिरत?”
“जो साबित क़दम रहते हैं, वे पा लेते हैं। फिर एक वक्त आता है जब उनकी हर दुआ क़बूल होती है।”
“मेरी बातें याद रखना, ऐ अल्लाह के बंदे!”
“यह बरतन पड़े हैं, खा ले इनमें से जो तेरा नसीब है।”
अब्दुल्लाह को अब बाबा जी की बातें धीरे-धीरे समझ में आने लगी थीं। उसने बरतन खोला और खाना खाने लगा— रात की बची हुई रोटी, दही और खजूर। खाना सादा था, लेकिन बहुत लज़ीज़।
इतने में फज्र की अज़ान हुई। उसने बाबा जी के पीछे नमाज़ पढ़ी और उसके बाद सूरह यासीन की तिलावत की।
फिर अचानक उस पर नींद तारी होने लगी।
“सो जा… आराम से… जब तेरा दिल भर जाए, तो घर चला जाना।”
बाबा जी ने उसे नींद में जाते देखा और कहा।
“पर बाबा जी, मैं घर जाकर क्या कहूँगा? कोई मेरा यक़ीन नहीं करेगा!”
“कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, बेटा। कोई तुझसे पूछेगा ही नहीं।”
वह हैरान हुआ, लेकिन आगे सवाल करना मुनासिब न समझा।
जब वह पहाड़ से नीचे उतरा, तो उसे अहसास हुआ कि वह एक लंबी जंग के बाद अपने घर लौट रहा है।
बस स्टॉप पर खड़ा एक लड़का अपने फोन में व्यस्त था। अब्दुल्लाह ने उसकी स्क्रीन पर नज़र डाली और चौंक गया।
“भाई साहब, आज कौन सी तारीख़ है?”
“20 फरवरी।”
अब्दुल्लाह का दिमाग़ चकरा गया!
“क्या सच में?”
“हाँ भाई!”
उसे साफ़ याद था कि जिस रात वह इस मुसीबत में फँसा था, वह 19 फरवरी की रात थी— और अब 20 फरवरी थी!
क्या यह मुमकिन था?
क्या वह बस चार घंटे उस अनजानी दुनिया में रहा था? लेकिन वहाँ तो उसने कई दिन और रातें गुज़ारी थीं!
वक्त का यह खेल… इंसानी समझ से परे था!
“إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ”
“बेशक, अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।”
