परी सर्दी बहुत ज़्यादा हो गयी है। हमें कॉलेज से छुट्टियाँ हो रही हैं और…
अब मैं… वह झिझका।
वह अपनी नीलगूं आँखों से गौर से उसके चेहरे के उतार-चढ़ाव देख रही थी।
“अब मैं रोज़ नहीं आ पाऊँगा। दादाजी कहीं जाने नहीं देंगे। सर्दी बहुत ज्यादा है, हम सब घर में ही रहते हैं।”
“ठीक है, मर्जी है तुम्हारी!” वह नाराज़ लहज़े में बोली।
वे पहाड़ी की ढलान पर बैठे थे। सामने सड़क बिल्कुल ख़ामोश थी और पहाड़ों पर बर्फ़ जमनी शुरू हो गई थी।
“देखो, मेरी मजबूरी है! तुम फोन भी तो नहीं लेती, मैं क्या करूँ? मेरी तो तुम कोई बात नहीं मानती, बस अपनी मनवाती हो!”
“तुम रोज़ नहीं आ सकते, लेकिन मैं तो आ सकती हूँ।” वह मुस्कुराती आँखों से उसे देखते हुए बोली।
“क्या मतलब?” उसने नासमझी से उसे देखा।
“मतलब यह कि मैं तुम्हारे गाँव आया करूँगी, रोज़ तुमसे मिलने।”
“तुम पागल हो गई हो?”
वह अपनी जगह से उछला।
“वह तो मैं हूँ!” वह मुस्कुराई।
“तुम कैसे आओगी इतनी दूर और इतनी बर्फबारी में? और तुम्हारे घरवाले? अगर उन्हें पता चल गया… तो? मेरे घरवालों ने हमें देख लिया… तो?”
“कुछ भी नहीं होगा। न तुम्हारे घरवाले देखेंगे, न मेरे घरवाले कुछ कहेंगे। तुम उनकी फ़िक्र मत करो।”
“तुम वहाँ नहीं आओगी, मैंने कह दिया बस!”
“तुम मुझे नहीं रोक सकते! हिम्मत है तो रोक कर दिखाओ!” वह ज़िद्दी लहज़े में बोली।
“तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है, प्री! कैसी दीवानों वाली बातें कर रही हो?”
“तुमने ही दीवाना किया है, अब भुगतो!” वह मज़े से कह रही थी।
अब्दुल्ला अपना सिर पीटकर रह गया।
आसपास हल्की-हल्की बर्फ गिरनी शुरू हो गई थी। मरी का आसमान अपने तेवर बदल रहा था और उन दोनों को इस सुनसान वादी में बैठे देखकर हैरान था।
“कल शाम चार बजे मैं आऊँगी, तुम अपने घर के पीछे वाले पहाड़ पर आ जाना।” वह कहकर जाने लगी।
“तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी! रुको… प्री… मेरी बात सुनो!”
अब्दुल्ला ने उसका लहराता दुपट्टा थामना चाहा, पर वह उसके हाथ से फिसलता हुआ निकल गया।
और वह खुद भी बिजली की रफ्तार से पहाड़ी के दूसरी तरफ उतरने लगी और उसकी निगाहों से ओझल हो गई।
“क्या चीज़ है ये लड़की!” वह सोचकर रह गया।
तुझे शर्म नहीं आई ऐसी हरकत करते हुए? न तेरा बाप ऐसा है, न दादा, न भाई!”
ज़ैनत ने अपने बेटे हातिम को झिंझोड़ा, जो सिर झुकाए मार खा रहा था।
“अम्मी जान, क्या हुआ?”
अब्दुल्ला अभी वापस आया था। उसने भाई को मार खाते देख पूछा।
“इस बेशर्म से पूछ, क्या हुआ है?”
वह अब भी ख़ामोश था और ज़ैनत थक-हारकर बैठ गई थी।
“हाय मेरी क़िस्मत! पता नहीं ये क्यों ऐसा निकल आया? किसका मनहूस साया पड़ गया इस पर?” वह शिकवे करने लगी।
“ओए, बोल ना! क्या किया है तूने?”
अब्दुल्ला ने उसे बाज़ू से पकड़ा और उसकी ठोड़ी उठाकर उसका चेहरा ऊपर किया।
“कुछ नहीं।” उसने नज़रें चुराईं और बाज़ू छुड़ाकर बाहर भागा।
“बेग़ैरत! एक तो बदमाशी करता है, फिर झूठ भी बोलता है! आने दे तेरे दादा और बाप को, चमड़ी उतरवाती हूँ तेरी!”
ज़ैनत ने खींचकर उसे जूता दे मारा, जो ठीक निशाने पर लगा।
वह दरवाज़े से अंदर आते अपने दादा, मास्टर अय्यूब से टकरा गया।
“रुक जा, लड़के!”
वह उनसे लिपट गया।
“क्या हुआ है बहू? क्यों चिल्ला रही हो इतना? देखो, मार-मार के बेचारे का मुँह लाल कर दिया। पता नहीं तुम औरतें बच्चों को क्यों मारती हो?” वे अफ़सोस भरे लहज़े में बोले।
“अब्बा जी, आपको अपने लाडले के करतूत पता चलेंगी ना, तो आप भी उसके साथ यही सुलूक करेंगे!”
“ऐसा क्या कर दिया इसने?”
वह अब तक उनसे चिपका खड़ा था, जैसे कोई महफूज़ ठिकाना मिल गया हो।
“वह जो इसके साथ बच्ची पढ़ती है ना स्कूल में, उसको ख़त लिखता है ये… ‘लव लेटर’! आज उसकी माँ ने उसके बैग से बरामद किए हैं ख़त, और मुझे इतनी बातें सुनाकर गई है कि मेरा दिल चाह रहा था कि डूब मरूँ!”
वह ग़ुस्से में ऊँची आवाज़ में बोली।
“अरे, मेरा पोता ऐसा नहीं है! जरूर उस औरत को ग़लतफ़हमी हुई है।”
अब्दुल्ला मुजरिम सा एक तरफ खड़ा था। अगर कभी उसका भांडा फूट गया, तो बड़े बेटे होने के नाते उसके माँ-बाप उसे कभी माफ़ नहीं करेंगे। कितनी उम्मीदें उससे वाबस्ता थीं। उसकी शराफ़त की मिसालें दी जाती थीं। और अगर सबको पता चल जाता कि वह प्री से छुप-छुपकर मिलता है, तो उसकी सारी इज़्ज़त ख़ाक में मिल जाती।
“हाँ जी, मैं भी यही समझती थी! अब आँख खुल गई है मेरी। लिखावट मिला के देख लो, कोई फ़र्क़ नहीं!”
दादा जी ने हातिम का चेहरा ग़ौर से देखा। उसने चोर नज़रें झुका लीं।
“अच्छा चलो, मैं पूछता हूँ इससे। बहू, तुम ग़ुस्सा ख़त्म करो।”
वे उसे अपने साथ कमरे में ले आए।
“बैठो इधर।”
उन्होंने उसे सोफ़े पर बिठाया और खुद सामने बैठ गए।
“यह लो, पानी पियो।”
वह एक ही साँस में सारा पानी पी गया।
वे उसे गौर से देख रहे थे। उसके लाल-सफेद चेहरे पर शर्मिंदगी और उलझन के मिले-जुले भाव थे।
तेरह साल की उम्र में ही वह काफ़ी बड़ा दिखता था। कद भी अच्छा-खासा था और बाकी भाइयों की तरह वह भी स्वस्थ और सुंदर था। घने काले बाल माथे पर बिखरे हुए थे।
“क्या हुआ था? असल मामला क्या है?”
जब वह थोड़ा शांत हुआ तो उन्होंने बात की शुरुआत की।
“वह मुझे अच्छी लगती है।”
उसने सिर झुकाए ही तुरंत स्वीकार कर लिया।
“और तुम्हें वह कैसी लगती है?”
“अच्छा लगता हूँ।”
“वह खत तुमने लिखे थे?”
उसने हामी में सिर हिलाया।
“उसने भी तुम्हें जवाब दिया?”
“जी…”
वह सिर झुकाए जूते से कालीन को रगड़ रहा था। मास्टर अय्यूब को अपना तेरह साल का यह पोता एकदम बड़ा लगा। वह अपने ताया इस्माइल से बहुत मिलता-जुलता था।
“क्या तुम्हें उससे मोहब्बत हो गई है?”
उसने हाँ में सिर हिलाया।
“अभी उम्र कम नहीं है? शादी भी नहीं हो सकती। बच्चे हो अभी तुम। अब क्या करें?”
दादा जी की नज़रें उसी पर टिकी थीं।
उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह अभी भी सिर झुकाए बैठा था।
अब्दुल्ला अंदर आकर चुपचाप दूसरे सोफे पर बैठ गया।
“इधर देखो, मेरी तरफ।”
हातिम ने सिर उठाकर अपने दादा को देखा। उनकी भूरी आँखों में कुछ खो देने की कसक थी और उसकी अपनी शहद-रंगी आँखें विनती करती सी लग रही थीं। वह वैसे ही उन्हें देखता रहा।
“जानते हो मोहब्बत होती क्या है? जिससे मोहब्बत हो, उसकी खातिर क्या कुछ करना पड़ता है?”
उन्होंने एक ठंडी आह भरी। बाहर बर्फ गिरने की आवाज़ थी। खिड़कियों से बर्फ के नन्हे-नन्हे गोले टकराकर ढेर होते जा रहे थे और रास्ते बंद कर रहे थे।
“काश तुम आज से सत्तर साल पहले पैदा होते, तब तुम मोहब्बत को अपनी आँखों से देखते।”
उनकी आँखों में टूटन थी।
“मैंने मोहब्बत को अपनी इन आँखों से देखा है। वह आज भी ज़िंदा है। मोहब्बत करने वाले मर जाते हैं, पर मोहब्बत नहीं मरती। यह मिलन का नाम नहीं है, यह कुर्बानी माँगती है।”
“जब पाकिस्तान बना था, तब मैं आठ साल का था। दंगाइयों ने हमारे गाँव पर हमला किया। मेरे दादा के दोस्त का घर था। मर्द सारे बाहर थे या शायद मार दिए गए थे। घर में सिर्फ़ बूढ़े दादा और दर्जन भर औरतें थीं – बेटियाँ, बहुएँ, पोतियाँ और भतीजियाँ।”
“दादा रोने लगे – मैं तुम्हें कहाँ छुपाऊँ? मेरी तो ज़िंदगी पूरी हो चुकी है, लेकिन मेरी बेटियाँ…”
“बेटियों ने कहा – अब्बा जी, आप चिंता न करें, हमें आपकी सीख याद है।”
“और फिर दंगाइयों ने देखा कि दर्जन भर औरतों ने ‘अल्लाह-हु-अकबर’ का नारा लगाया और एक-एक करके आँगन में बने कुएँ में कूद गईं। वे गुस्से से पागल हो गए। उस घर से मुसलमानों की एक भी औरत उनके हाथ नहीं आई।”
“मैं बच्चा था, उनके घर खेलने जाता था। मैं अंदर छुपा यह सब देख रहा था। उन्होंने बूढ़े दादा को किन-किन यातनाओं से मार डाला, मैं बयान नहीं कर सकता।”
उनकी आँखें छलकने को तैयार थीं, जैसे वे अब भी उसी दृश्य का हिस्सा हों।
“वे एक पल में पूरा घर उजाड़ गए। उनके जाने के बाद मैं रोता-बिलखता घर को भागा। घर वाले भरा-पूरा घर छोड़कर जा रहे थे। मेरी माँ मुझे ढूँढ रही थी। मुझसे छोटे तीन भाई-बहन थे। हम उन्हें उठाकर वहाँ से बचते-बचाते निकल गए।”
“रास्ते में हमने कितनी लाशें देखीं – बच्चे, बूढ़े, औरतें, मर्द – गाजर-मूली की तरह कटे पड़े थे। उन्हें भी एक तरतीब से काटा जाता था, यह नहीं कि जहाँ मन आया, छुरी फेर दी।”
वे सांस लेने को रुके, आवाज़ भारी हो गई थी।
“इतना खून देखकर मैं गुमसुम हो गया था। बस मुझे जो बात याद रही थी वह यह थी कि हम अपने वतन जा रहे हैं। हमें अपने वतन और अपने दीन से इतनी मोहब्बत थी कि हमने अपनी हर चीज़ उस पर कुर्बान कर दी।”
“क्या इतनी मोहब्बत भी कोई करता है? कि सिर न झुकाए गुलामी स्वीकार न करे और तड़प-तड़प कर जान दे दे?”
कमरे में उनकी सिसकियाँ गूँज रही थीं।
“यह होती है मोहब्बत।”
“या उन फ़ौजियों की मोहब्बत के जैसी जो जान हथेली पर लिए फिरते हैं। तुम्हारे ताया को देखा होता, तो तुम्हें पता होता मोहब्बत क्या होती है।”
“मेरा पहला बेटा था इस्माइल, और पहली औलाद कितनी अज़ीज़ होती है, तुम जब बाप बनोगे तो समझोगे।”
“अट्ठारह साल का था जब मैंने उसे फौज में भर्ती कराया था। कहता था – अब्बा, आप शहीद के बाप कहलाएँगे।”
“मोर्चे पर गया, बर्फ़ीले पहाड़ों पर उसकी ड्यूटी थी। दुश्मन ने हमला किया, उसने डटकर मुकाबला किया और उन्हें मार भगाया। बड़ा जिगर वाला था।”
“जंग ख़त्म होने के बाद सब शहीदों के शव मिल गए थे, वह न ज़िंदा मिला, न शहीदों में।”
“एक साल हमने इंतज़ार किया। उसकी माँ के तो आँसू सूखते नहीं थे।”
“आख़िर एक दिन खबर आई – आपका बेटा मिल गया है।”
“शहादत के बाद वह पहाड़ी से नीचे खाई में गिर गया था। लेकिन एक साल बाद भी उसके जख़्मों से खून रिस रहा था। उसकी एक टांग कटी हुई थी, बहुत ढूंढ़ी, पर नहीं मिली।”
“मुझे आज भी अपने शहीद बेटे पर फख्र है।”
“यह होती है मोहब्बत। मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ।”
“क्या ऐसी मोहब्बत करते हो तुम उससे? सब कुछ छोड़ सकते हो? अपना शरीर कुर्बान कर सकते हो?”
हातिम ने तुरंत ना में सिर हिला दिया।
“तो जाओ मेरे बच्चे, खाओ-पीओ और पढ़ाई करो। जब मोहब्बत को अपनी आँखों से देख लेना, फिर मुझे बताना मोहब्बत कैसी होती है।”
फिर मैं तेरी शादी इस बच्ची से करवा दूँगा- तब तक उसे भूल जा-
वह किसी की बेटी है, अपनी शैतानी और गुमराही में उसे बेवकूफ न बना- और न ही उसे बदनाम कर- लड़कियाँ तो वैसे ही कमजोर दिल की होती हैं- बड़ी जल्दी झूठी बातों और तारीफों पर विश्वास कर लेती हैं- प्यार नाम की तितली हमेशा उन्हें अपने पीछे भगाते-भगाते थका देती है। और हासिल कुछ नहीं होता।
लड़कियाँ काँच से ज़्यादा नाज़ुक होती हैं- अगर इस काँच में दरार पड़ गई न- तो मैं तुझे मुजरिम ठहराऊँगा हातिम-
तू लड़का है- कल को मर्द बनेगा- अगर तेरा दिल किसी और पर आ गया तो तू इस बेचारी को छोड़ने में देर नहीं लगाएगा-
वह जो पागल तेरी बातों में आकर विश्वास किए बैठी है फिर उसका क्या होगा? कच्ची उम्र का प्यार अज़ाब होता है, औरत की जान नहीं छोड़ता- नादानी की उम्र का पहला अनुभव मार डालता है- जब कोई चीज़ पहली बार चखी जाए न तो वह बड़ी स्वाद लगती है। यह प्यार का जज़्बा जब पहली बार जन्म लेता है न तो बड़ा अनोखा लगता है और इंसान इसके ख्याल से बाहर नहीं निकल पाता।
मैं तो तुझे अब तक बच्चा ही समझता था, पर तू इतना बड़ा हो गया है कि मेरी बातें तुझे समझ आ रही होंगी-
आगे से तूने इसको न तो कोई ख़त लिखना है और न उससे लेना है-
समझ गया या नहीं?
समझ गया दादाजी- उसके चेहरे का اضطرाब कम हो गया था- और वह शांत लग रहा था- शायद दादाजी की बातें उसके दिल पर असर कर गई थीं-
अकल कुछ बड़ी हो गई थी पर उम्र अभी बच्ची थी- और बच्चा हर नई चीज़ की तरफ भागता है- दुनिया के हर नए अनुभव को करना चाहता है- हर जज़्बा उसके लिए नया होता है- जिनमें से एक प्यार और सख्स-ए-मुखालिफ़ भी है- यह एक फितरी खींच है।
अब्दुल्ला रात भर दादाजी की बातें सोचता रहा था- और रह-रह के इस दीवानी का ख्याल उसे आता था-
मुझे दादाजी से बात करनी चाहिए- मैं बीस साल का हो गया हूँ और तीन-चार साल में MBBS करके अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँगा-
इस रिश्ते को कोई नाम देना चाहिए- लेकिन पहले परी से बात करनी होगी- उसके तो घर का भी मुझे नहीं पता-
अब आएगी तो पूछूंगा- वह अपनी तरफ से संतुष्ट होकर सो गया था-
पर उसे नहीं पता था कि यह इतना आसान नहीं था जितना वह समझ रहा था- परी के साथ उम्र भर का रिश्ता बनाना किसी जंग के बराबर था- क़िस्मत उसके साथ क्या खेल खेल रही है, वह एकदम बेखबर था।
उसने खिड़की से बाहर झांका।
बाहर तेज बर्फबारी हो रही थी। मरी का आकाश हर ओर सफेदी बिखेर रहा था। उसके कमरे की खिड़की बाहर की ओर खुलती थी। हालांकि आगे एक छज्जा बना हुआ था, फिर भी बर्फ के गोले तेज तूफानी हवा के असर से कांच से टकरा रहे थे। कभी-कभी उनके टकराने से एक मधुर सी ध्वनि पैदा होती थी, जो उसके कानों में किसी परी की सुरीली आवाज़ घोल देती थी।
वह खिड़की से सिर टिकाए बाहर गिरती सफेदी को देख रहा था। हर चीज़ इतनी सफेद थी कि आंखें चुंधिया जाती थीं।
उसे लगा, वह उसके पीछे खड़ी हंस रही है। उसने मुड़कर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था।
“मैं भी पागल हो गया हूँ, हर जगह वही दिखाई देने लगी है।” वह धीमे से मुस्कुराया।
अभी दोपहर थी। उसे याद आया कि परी ने उसे चार बजे मिलने को कहा था। इतनी तेज़ बर्फबारी में वह कैसे आ सकती है?
उसने सोचा और पर्दा ठीक कर के रॉकिंग चेयर पर बैठ गया। वह आंखें मूंदे धीरे-धीरे कुर्सी हिला रहा था। उसकी कल्पना में वही अप्सरा बार-बार उभर रही थी, जैसे ही वह आंखें खोलेगा, वह सामने खड़ी मुस्कुरा रही होगी।
वह वहां थी भी और नहीं भी।
“तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता।”
मौसम इतना खराब था कि आज कोई ग्राहक भी नहीं आने वाला था। सास-बहू हीटर के सामने बैठी थीं।
सफिया बेगम तो अपने लिए कोई न कोई व्यस्तता ढूंढ ही लेती थीं। अभी भी वह बच्चों के लिए ऊनी जुराबें बुन रही थीं और शमा अपने पार्लर के अस्थायी रूप से बंद होने का अफसोस मना रही थी।
सर्दियों में टीवी लॉन्ज से बच्चों का कमरा ही उनका मनोरंजन स्थल बन जाता था, और वे तीनों अब मज़े से बिस्तर में दुबके हुए टीवी देखते हुए मूंगफली और चिलगोजे खा रहे थे।
माँ को थोड़ी राहत मिली थी कि बच्चे किसी काम में व्यस्त थे।
“बहू, सामान पैक कर लो। जैसे ही मौसम ठीक होगा, हम निकल जाएंगे।”
“खाला जी, इस बार रहने दीजिए, गाँव नहीं जाते। यहीं छुट्टियाँ बिता लेते हैं।”
“अरे, क्यों भई? यहाँ क्या करेंगे?”
“ना कोई रिश्तेदार, ना कोई व्यस्तता। मेरा तो दिल नहीं लगेगा। मैं तो तुम लोगों की वजह से यहाँ ठहरती हूँ। उधर भरा-पूरा घर है, मैं अपने पोतों से भी मिल लूँगी। सफूरा तो बहुत याद आती है मुझे। देखो, उसके लिए जुराबें बनाई हैं, जब उसे दूँगी, तो बहुत खुश हो जाएगी।” उन्होंने अपनी दूसरी पोती का नाम लिया।
मास्टर अय्यूब और सफिया बेगम की सिर्फ दो ही पोतियाँ थीं – एक शज़ा और दूसरी सफूरा, जो पाँच भाइयों के बाद बड़ी दुआओं के बाद मिली थी। वह शज़ा से एक साल बड़ी थी और अपने ददिहाल की पहली लड़की होने के नाते सबकी लाड़ली थी।
“और तुम्हें अपनी माँ के घर भी तो जाना है। मुझे भी अपनी बेटियों से मिलना है। बस, तुम तैयारी रखो। मुझे लगता है, जल्द ही मौसम ठीक हो जाएगा।” वे फिर से बुनाई में लग गईं।
“अच्छा, जाती हूँ।”
शमा अनमने मन से सामान पैक करने के लिए उठ खड़ी हुई।
शाम के चार बजने वाले थे। अब्दुल्ला ने खिड़की से बाहर झांका। बर्फबारी लगभग थम चुकी थी, बस हल्की-हल्की बर्फ के फाहे उड़ रहे थे।
वह इसी उधेड़बुन में था कि वह आएगी या नहीं। बर्फ ने रास्तों को ढक दिया था। वह नाज़ुक सी लड़की इतना लंबा सफर तय करके कैसे आ सकती है?
उसने खुद ही अंदाज़ा लगाया।
“छत पर जाकर देखना चाहिए। उसने कहा था कि तुम्हारे घर के पीछे जो पहाड़ी है, वहाँ आ जाना।”
वह कमरे से निकलकर छत की ओर बढ़ा। पहाड़ी के आस-पास कई पेड़ थे, जिनकी शाखाएँ बर्फ के बोझ से झुक गई थीं।
उसके दोनों तरफ दो छोटी-छोटी सड़कें थीं। एक सड़क शहर की ओर जाती थी, जिससे होकर वह रोज़ अपने कॉलेज जाता था। दूसरी सड़क गाँव के उस हिस्से की ओर जाती थी, जहाँ ज़्यादातर खेत, बाग़ और कुछ खंडहर थे।
दोनों सड़कें बिल्कुल खामोश थीं। उन पर कोई हलचल नहीं थी। अभी चार बजने में थोड़ा समय बाकी था।
उसने रुख बदलकर दूसरी ओर देखा, जहाँ घर थे। ठंड के कारण सभी अपने-अपने घरों में दुबके हुए थे।
मरी के लोग बर्फबारी का मौसम शुरू होने से पहले ही राशन और ईंधन का पर्याप्त भंडारण कर लेते थे और फिर मौसम के सुधरने तक घरों में ही रहते थे। बर्फबारी खत्म होने के बाद रास्तों को भी साफ़ करना पड़ता था।
यह सिर्फ़ अत्यधिक बर्फबारी के दौरान होता था। वरना हल्की बारिश या हल्की-फुल्की बर्फबारी में रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलती रहती थी। गाँवों में तो यह परंपरा थी, लेकिन शहरों में ज़िंदगी कुछ अलग थी। वहाँ जीवन ठहरता नहीं था। बाज़ारों और सड़कों पर थोड़ी बहुत हलचल बनी रहती थी।
मास्टर अय्यूब के घर के सभी लोग इस मौसम में सूखे मेवे, हलवे और तरह-तरह के पकवान खाकर और किताबें पढ़कर समय बिताते थे।
बच्चों के लिए मासिक पत्रिकाएँ आती थीं और इसके अलावा, मास्टर अय्यूब के घर में बच्चों और बड़ों के लिए एक छोटी सी लाइब्रेरी भी थी। उनके घर में पले-बढ़े सारे बच्चे पढ़ने के शौकीन थे।
उस इलाके में केबल नहीं थी, बस दो-एक चैनल ही टीवी पर आते थे। इसलिए बच्चे टीवी के सामने ज़्यादा समय नहीं बिताते थे। लेकिन सर्दियों की छुट्टियों में वे बिल्कुल भी बोर नहीं होते थे। बल्कि वे इनका बेसब्री से इंतजार करते थे, क्योंकि उनके पास खुद को व्यस्त रखने के कई बहाने थे।
वह फिर से पहाड़ी की ओर देखने लगा। उसे गाँव के अंदर से आने वाली सड़क पर कोई लाल सी चीज़ नजर आई।
अभी वह इतनी दूर थी कि यह साफ़ नहीं था कि वह क्या है।
वह लगातार उसी दिशा में देखता रहा। उसने देखा कि वह चीज़ तेज़ी से करीब आ रही थी।
उसके सिर पर लाल हुड वाला कोट था और उसमें से कुछ लटें निकलकर लहरा रही थीं।
“ओह, परी! यह तो सच में आ गई!”
उसके मुँह से अनायास निकला।
“पर यह इस तरफ से क्यों आई?”
वह उलझन में पड़ गया और जल्दी से नीचे उतरने लगा।
उसने सावधानी से इधर-उधर देखा—दादा जी शायद अपने कमरे में सो रहे थे। वह धीरे-धीरे गेट खोलकर बाहर निकल आया, क्योंकि अगर वे देख लेते, तो ज़रूर उससे सवाल-जवाब करते।
बाहर निकलकर वह बर्फ पर छलांग लगाता हुआ पहाड़ी की ओर बढ़ा।
“तुम्हें मना भी किया था कि यहाँ मत आना। इतनी ठंड में कैसे आई हो?”
वह दस्ताने भूल आया था, अब हाथों को रगड़कर गर्म कर रहा था।
“तुम्हारी मोहब्बत खींच लाई।”
“अच्छा, चलो, यहाँ खड़ा होना ठीक नहीं, कहीं और चलते हैं।”
वह उसके साथ-साथ चलने लगी। वह उसे सेब के बाग में ले आया, जहाँ बर्फ से ढके अनगिनत पेड़ खड़े थे। वे पत्थरों के एक ढेर पर बैठ गए।
“तुम इस तरफ़ से क्यों आई हो? तुम्हारा घर तो शहर की ओर है,” उसने सीधे पूछा।
वह अचानक चौंकी, “तुम्हें कैसे पता कि मैं उधर से आई हूँ?”
“मैं छत पर खड़ा था। मुझे लगा था कि तुम इतनी पागल नहीं हो कि रास्ते बंद होने के बावजूद आओगी। पर तुम तो मेरी सोच से भी ज्यादा पागल निकली,” वह हंसा।
“तुम क्या मुझसे कम पागल हो?”
वह हंसी, तो उसकी नीली आँखों में तारे चमक उठे।
और वह उसकी आँखें देखकर ही अपने सारे सवाल भूल गया।
“परी, मैं दादा जी से हमारे बारे में बात करूँ?”
“किस बारे में?” वह संजीदगी से बोली।
“मैं उन्हें तुम्हारे घर रिश्ता लेकर भेजूँगा।”
“नहीं!” उसके लहज़े में तीखापन था।
“अभी नहीं!”
“पर क्यों?”
“बस कहा ना, अभी नहीं!”
वह अपनी जादुई आँखों से उसे देख रही थी।
“हम यूँ छुप-छुपकर कब तक मिलते रहेंगे? मुझे अच्छा नहीं लगता। यह सही नहीं है।”
“इसमें क्या बुराई है? हम कुछ गलत तो नहीं कर रहे।”
“पर… यह ठीक भी नहीं है, परी। तुम क्यों नहीं समझती? मैं अपने घर वालों को भेजता हूँ, हमारा कोई रिश्ता तो होना चाहिए। अगर तुम्हारे घर वालों ने कहीं और तुम्हारी शादी कर दी तो?”
“ऐसा नहीं होगा।”
वह पूरे विश्वास से कह रही थी।
“और अगर हो गया तो?”
“कहा ना, नहीं होगा!”
“तो तुम्हारे घर में किसी को हमारे बारे में पता है? तुम यहाँ किसके साथ आई हो?”
“अकेली आई हूँ।”
“अकेली? छह-सात किलोमीटर? किस चीज़ पर?”
वह हैरानी से बोला।
“है एक सवारी।”
“मुझे तो कहीं नजर नहीं आ रही। और इस बर्फ पर तो गाड़ी भी नहीं चलती!”
“अच्छा, ज्यादा सवाल मत किया करो तुम!”
वह झुंझलाकर बोली।
“नहीं, मैं करूँगा और तुम्हें जवाब देना पड़ेगा।”
“अब्दुल्ला, तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है क्या?”
वह उसकी आँखों में गहराई से झाँकते हुए बोली।
“यह तुमने कैसे सोच लिया कि मुझे तुम पर भरोसा नहीं?”
“अगर मैं किसी दिन खो गई या बहुत लंबे समय के लिए तुमसे बिछड़ गई, तो क्या करोगे?”
उसकी नीली आँखों में दर्द की एक परछाई थी।
“ऐसा हो ही नहीं सकता।”
वह हंसते हुए कह रहा था।
“अगर हो गया तो?”
“तुम्हें तो यह बर्फबारी भी नहीं रोक पाई, तो और कौन रोक सकता है? ऐसा नहीं होगा।”
“अगर हो गया तो? अगर मैं तुमसे बिछड़ गई तो?”
उसने फिर दोहराया।
“तो मैं पागल हो जाऊँगा!”
उसने गंभीरता से कहा।
“तुम ऐसा क्यों कह रही हो?”
उसके दिल को कुछ हुआ, जैसे वह सच कह रही हो।
उसने कोई जवाब नहीं दिया और गर्दन मोड़कर दूर तक फैले घने पेड़ों को देखने लगी।
कुछ पल खामोशी छाई रही।
“परी, क्या हुआ?”
“मैं चलती हूँ।”
वह उठ खड़ी हुई।
“तुम कैसे जाओगी?”
उसे चिंता हुई।
“जैसे आई थी।”
वह मुस्कराई, मगर उसकी आँखें उदास थीं।
“तुम जाओ, मैं चली जाऊँगी।”
“नहीं, मैं तुम्हें जाते हुए देखूँगा।”
“कहा ना, तुम जाओ, मैं चली जाऊँगी!”
“एक तो तुम अपनी हर बात मनवा लेती हो!”
वह बाग से निकलकर घर की ओर चल पड़ा। वह बार-बार मुड़कर उसे देख रहा था, यहाँ तक कि वह मोड़ तक पहुँच गया, जहाँ से दाएँ मुड़कर उसका घर था। उसने एक आखिरी बार उसे देखा और फिर कुछ कदम चलकर घर के अंदर दाखिल हो गया।
अंदर जाते ही वह तुरंत छत की तरफ दौड़ा। वह देखना चाहता था कि वह कैसे जाएगी।
यहाँ से बाग का वह हिस्सा नजर आता था, जहाँ कुछ देर पहले वे बैठे थे। उसने देखा—वह कहीं नहीं थी!
वह छत पर इधर-उधर देखने लगा। बाग और सड़कें दोनों सूनी थीं। वहाँ न परी थी, न उसका कोई निशान। न कोई गाड़ी थी, न कोई और सवारी। वह बुरी तरह उलझ गया।
“आखिर यह लड़की है क्या?”
न उसके घर का पता था, न उसके परिवार वालों को जानता था। और तो और, उसने अपना नाम तक नहीं बताया था। वह कितनी पढ़ी-लिखी है, यह भी उसे मालूम नहीं था। लेकिन अब वह उससे ऐसा बंध चुका था कि उसे छोड़ने का ख्याल भी उसकी जान निकाल सकता था।
वह इसी उलझन में नीचे आ गया।
“तुम ऊपर क्या कर रहे थे?”
दादा जी उसे देखकर पूछने लगे।
“वो… मैं बस यूँ ही चला गया था, कमरे में बैठे-बैठे थक गया था।”
“अच्छा… तुम्हारे चाचा इब्राहीम, उनकी फैमिली और तुम्हारी दादी आ रहे हैं। तुम उन्हें बस अड्डे से ले आओ। बस पहुँचने ही वाली होगी। सामान वगैरह होगा, तो उन्हें दिक्कत होगी।”
“जी, अच्छा।”
दो-तीन मिनट में वह कहाँ जा सकती है?
वह बड़बड़ाता हुआ बाहर की ओर बढ़ा। यहाँ से कुछ ही दूरी पर बस स्टॉप था, जहाँ से उसे चाचा के परिवार को लेना था। वह तेज़ी से चलता हुआ वहाँ पहुँच गया।
“जीते रहो, अब्दुल्ला!” दादी ने उसे दुआएँ देते हुए गले लगाया।
“सलाम, चाची! और सुनाइए, जिब्राईल कैसा है?” उसने जिब्राईल के गोल-मटोल गालों को खींचा। दोनों की आपस में खूब बनती थी।
वह उनके साथ-साथ चलता हुआ बातें कर रहा था, उसका मूड भी खुशगवार हो गया था।
शमा ने बमुश्किल फैज़ को गोद में उठाया हुआ था, और फाएक रोते हुए पीछे-पीछे घसीट रहा था कि उसे गोद में क्यों नहीं उठाया जा रहा।
“मेरी बूढ़ी हड्डियों में इतना दम नहीं कि इतने बड़े बच्चे को उठा सकूँ,” दादी ने उसकी शिकायत सुनकर कहा।
“दादी, मैं उठा लेता हूँ इस नटखट को,” अब्दुल्ला ने भारी-भरकम फाएक को गोद में उठाया। “हाय, चाची, यह तो बहुत भारी है!”
कुछ उसका अपना वजन था और रही-सही कसर ऊनी कपड़ों ने पूरी कर दी थी।
“हाय, अब्दुल्ला! नजर लगा देगा मुझे!” उसकी गोद में बैठे फाएक ने लाड़ से कहा।
“शर्म नहीं आती! इसे भाई कहते हैं, और कितना बड़ा है तुझसे!” दादी ने उसे डाँटा।
“हूँ!” उसने मुँह बनाया।
“मैं भी थक गई हूँ, मुझसे नहीं चला जा रहा!” शज़ा शिकायत करते हुए रास्ते में ही बैठ गई और अपने पैर सहलाने लगी। “हाय, मेरे जोड़ों में दर्द हो रहा है!” उसने दादी की नकल की।
“यह बहुत बड़ी ड्रामेबाज़ है, अब्दुल्ला भाई!” जिब्राईल ने शज़ा को घूरते हुए कहा।
“बस गुड़िया, वह सामने ही घर है, थोड़ा और चल लो।”
वे पहाड़ी के करीब पहुँच चुके थे।
“नहीं, भैया, मुझसे अब और नहीं चला जाएगा! मुझे गोद में उठा लो!”
“शज़ा, उठो आराम से, ज्यादा बदतमीजी मत करो!” शमा ने डाँटा, मगर वह अपनी जिद्द पर अड़ी रही।
“मम्मा, मेरे पैरों में बहुत दर्द हो रहा है, मैं कैसे चलूँ?” उसने रोनी सूरत बना ली।
कोई और मौका होता तो शमा उसे दो थप्पड़ लगा ही देती, पर शायद ठंड की वजह से छोड़ दिया। ठंड में तो हल्की-सी चोट भी बहुत लगती है।
“चाची, एक काम करते हैं, हम जिब्राईल को शज़ा के पास छोड़ देते हैं और मैं घर तक यह सामान और बच्चों को छोड़कर वापस आकर उसे ले जाऊँगा।”
“हाँ, ठीक है!” शज़ा तुरंत बोली।
“पर ऐसे छोड़ना ठीक नहीं, बेटा!”
“दादी, सामने ही तो घर है, कुछ नहीं होगा, यहाँ कोई गैर नहीं आता।”
“अच्छा चलो, ठीक है, मैं तो बहुत थक गई हूँ,” उन्होंने घुटनों पर हाथ रखा।
“तुम दोनों यहीं रुको, मैं बस दो मिनट में आया।”
“जिब्राईल, बेटे, बहन का ख्याल रखना!” दादी ने जाते-जाते हिदायत दी।
“आप चिंता मत करें, दादी!” उसने पूरी ज़िम्मेदारी से जवाब दिया।
वे चलते-चलते मोड़ मुड़ गए। अब्दुल्ला तेज़ रफ्तार था, पर उनका साथ देने के लिए धीरे-धीरे चल रहा था।
उन्हें घर के गेट पर छोड़कर वह वापस मुड़ा।
“जिब्राईल, वह देखो कितनी प्यारी चिड़िया!” वे दोनों साथ बैठे थे, शज़ा ने उसके पीछे इशारा किया।
“हैं? चिड़िया यहाँ कैसे आ गई?” उसने हैरानी से चारों ओर देखा। “मुझे तो नहीं दिख रही… कहाँ है?” वह अपनी ही धुन में बोल रहा था।
उसने मुड़कर देखा तो शज़ा गायब थी!
“शज़ा… शज़ा!”
जब अब्दुल्ला वापस आया तो उसने देखा कि जिब्राईल बाग़ की ओर जाने वाली सड़क पर भागता हुआ चिल्ला रहा था।
कुछ दूरी पर, शज़ा मस्ती में हँसती हुई उसे चिढ़ाती हुई भाग रही थी। “अब मैं गुम हो जाऊँगी और तुम्हें मार पड़ेगी!” वह वहीं से चिल्लाकर बोली।
उसके सिर से टोपी उतरकर रास्ते में गिर गई थी और उसके लंबे रेशमी बाल हवा में लहरा रहे थे।
मौसम में काफी ठंडक थी। सूरज का नाम-ओ-निशान नहीं था।
सड़क पूरी तरह वीरान थी, और वे तीनों एक-दूसरे के पीछे भाग रहे थे।
“शज़ा, रुक जाओ! मैं कह रहा हूँ, रुक जाओ!”
वह बाग़ से भी काफी दूर निकल गई थी, और अब उसका रुख दाएँ ओर बर्फ़ से ढके कच्चे रास्ते की तरफ था, जो पुरानी हवेली के खंडहरों पर जाकर खत्म होता था।
उस तरफ कोई नहीं जाता था, क्योंकि उस हवेली के बारे में बहुत सी डरावनी बातें मशहूर थीं—कि वहाँ जिन्नों का साया है, वहाँ से खौफनाक आवाज़ें आती हैं, और जो भी वहाँ जाता है, उस पर जिन्नों का असर हो जाता है। दादा जी ने उन्हें कभी उस ओर जाने नहीं दिया था।
“जिब्राईल, पकड़ो उसे!”
अब्दुल्ला ने शज़ा को उस तरफ जाते देखा तो उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। उसके दिमाग़ में वे सारी बातें गूंजने लगीं, जो उसने बचपन से उस हवेली के बारे में सुनी थीं।
उसकी छठी इंद्रिय खतरे का संकेत दे रही थी।
शज़ा हर चीज़ से बेखबर हवेली के जंग लगे, खुले फाटक से अंदर चली गई थी…
वर्षो वीरान पड़ी हवेली बेहद डरावना दृश्य पेश कर रही थी।
गेट के सामने उजड़ा हुआ बागीचा था, जिसमें धूल उड़ रही थी।
उसके बाद एक लंबी राहदारी थी, जिसके दोनों तरफ कमरे थे। उनमें से ज्यादातर की इमारत टूट-फूट का शिकार होकर ढह चुकी थी। हर जगह कूड़े-करकट के ढेर लगे थे—गंदगी, हड्डियाँ, जानवरों के पिंजर और उनकी बची-खुची लाशें पड़ी थीं। अब यह जगह आवारा कुत्तों और बिल्लियों का ठिकाना बन चुकी थी। यहाँ की हवा में दहशत के साथ-साथ एक अजीब-सी दुर्गंध फैली हुई थी। दिन के समय भी यहाँ अर्ध-अंधेरा छाया रहता था।
पीछे के आंगन से ऊपर जाने के लिए सीमेंट की सीढ़ियाँ बनी थीं, जो कई जगह से टूटी हुई थीं। अपने समय में यह एक शानदार इमारत रही होगी। इसकी बनावट ही कला का जीता-जागता नमूना थी। पर अब इसकी वीरानी और जर्जर हालत दुनिया के नश्वर होने की चीख-चीख कर गवाही दे रही थी। किसी दौर में यह अपने रहने वालों के लिए एक सुरक्षित और स्नेह से भरा स्थान रहा होगा। इसके निवासी यहाँ शान-ओ-शौकत और ठाठ-बाट से रहते होंगे। लेकिन अब यह इमारत तो खड़ी थी, पर इसके रहने वाले वर्षों की धूल और कब्र की मिट्टी की भेंट चढ़ चुके थे। अब यहाँ चमगादड़ों, उल्लुओं और अन्य जानवरों का बसेरा था।
जिब्राईल के पीछे-पीछे तेजी से छलांग लगाता अब्दुल्लाह भी वहाँ पहुँच चुका था।
दोनों आयत-उल-कुर्सी का ورد करते हुए अंदर दाखिल हुए।
“शज़ा!”
उनकी आवाज़ गूँज कर वापस लौट आई।
“आओ, ऊपर देखते हैं।”
वह जिब्राईल का हाथ पकड़कर धड़कते दिल के साथ सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। यह इतनी भयानक जगह थी कि तेज़ सर्दी में भी उसका दम घुटने लगा।
छत बहुत विशाल थी। वहाँ कुछ कमरेनुमा इमारतें और बालकनियाँ बनी हुई थीं।
वे दोनों उसे लगातार आवाज़ें देते हुए हर कोने में ढूँढ रहे थे। आखिरकार, जिब्राईल को वह टूटे-फूटे सामान के ढेर में छिपी हुई नजर आई। उसने पीछे से जाकर उसे पकड़ लिया और साथ ही एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
“तुम्हें पता भी है कि यह कितनी खतरनाक जगह है? यहाँ कोई नहीं आता! तुम्हारे पैरों में दर्द था और तुम दौड़ते-दौड़ते यहाँ तक पहुँच गई? तुम्हें शर्म नहीं आती?” उसने उसका बाजू पकड़कर झकझोर दिया।
“इतनी अच्छी जगह तो है!”
वह ढिठाई से बोली।
“वह देखो, ऊपर छत पर एक आंटी बैठी हैं। वे यहीं रहती हैं।”
उसने छत की ओर इशारा किया, लेकिन जिब्राईल ने नहीं देखा क्योंकि पहले भी वह इसी तरह बहला-फुसलाकर भाग चुकी थी।
अब्दुल्लाह दूसरी तरफ से दौड़ता हुआ आया और आगे बढ़कर उसे गोद में उठा लिया।
“चलो, जल्दी यहाँ से निकलो!”
उसने डांट-डपट में वक्त बर्बाद करना सही नहीं समझा। वे तेजी से सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आए और साइड की गली से बाहर की ओर बढ़े।
“भैया, कितना मोटा चूहा!”
शज़ा ने उसकी गोद में लटके हुए अब्दुल्लाह के पैरों की ओर इशारा किया।
जिब्राईल आगे चल रहा था।
“चुप करो, शैतान की नानी! अब ये नाटक ज्यादा देर नहीं चलेंगे!”
अब्दुल्लाह ने उसके कान खींच दिए।
“अल्लाह की कसम, भैया! मैं झूठ नहीं बोल रही, आपके पैर के पास चूहा है!”
“कसमें मत खाया करो, शज़ा! अल्लाह कोई मामूली हस्ती नहीं कि तुम हर बात पर उसकी कसम खाओ!”
जिब्राईल ने उसे रौब से डांटा।
फिर वह रुका और देखा, तो सच में अब्दुल्लाह के पैरों के पास एक मोटा-ताजा चूहा चल रहा था।
“भैया, रुकें!”
वे गेट के करीब पहुँच चुके थे।
वह रुका, तो चूहा भी उसके साथ ही रुक गया और मुँह उठाकर अपनी गोल-गोल आँखों से टकटकी लगाए उन्हें देखने लगा।
“भैया, यह कितना अजीब चूहा है! यह हमें घूर क्यों रहा है?”
शज़ा ने कहा।
उन्होंने “शी शी” कहकर उसे भगाने की कोशिश की, लेकिन वह भागने के बजाय उन्हें काटने के लिए दौड़ा।
अब्दुल्लाह मुश्किल से उसे झटक कर गेट की ओर बढ़ा।
पर आगे एक नई मुसीबत खड़ी थी।
गेट के दोनों किवाड़ आपस में मिले हुए थे, जैसे किसी ने बाहर से उन्हें कसकर बंद कर दिया हो।
उसने गेट को जोर से धक्का दिया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ।
यह गेट काफी ऊँचा और मजबूत लकड़ी का बना था।
“हैरत है! अभी तो यह खुला था, बल्कि यह हमेशा खुला रहता है। अब अचानक बंद कैसे हो गया?”
“इसकी तो कोई कुंडी भी नहीं है, ऊपर से जंग भी लगी हुई है। तो यह बंद कैसे हुआ?”
बाहर निकलने का और कोई रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था।
“अब क्या करें?”
वे दोनों वहीं खड़े परेशान थे।
“यह सब तुम्हारी वजह से हुआ है, शज़ा!”
जिब्राईल ने उसे घूरते हुए कहा।
“मैंने क्या किया है? कब से डांटे जा रहे हो! मैं बाबा को बताऊँगी!”
“यहाँ से निकलोगी, तो बताओगी ना!”
“ऐसा करो, तुम दोनों किसी तरह चले जाओ और मुझे यहीं छोड़ जाओ! मैं खेलकर खुद ही वापस आ जाऊँगी!”
वह ऐसे बोली, जैसे वे किसी प्लेग्राउंड में खड़े हों।
उन्होंने एक बार फिर गेट को जोर से धक्का देकर खोलने की कोशिश की, लेकिन वह हिला तक नहीं।
अब वहाँ और भी मोटे, काले रंग के चूहे उनके आसपास मँडरा रहे थे। वे अपने छोटे-छोटे पंजों से जिब्राईल और अब्दुल्लाह की जींस का पायंचा पकड़कर ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, और उन्हें बार-बार झटक कर हटाना पड़ रहा था।
स्थिति बेहद डरावनी हो चुकी थी।
वे दोनों लगातार आयत-उल-कुर्सी का ورد कर रहे थे।
उनके दादा-दादी ने उन्हें यही सिखाया था कि हर मुश्किल में अल्लाह को पुकारो, हिम्मत मत हारो, बल्कि डटकर मुकाबला करो। अपने डर को खुद पर हावी मत होने दो, चाहे अंदर से कितनी भी घबराहट हो, खुद को शांत रखो।
बस, एक शज़ा थी, जिस पर किसी सीखी हुई बात का कोई असर नहीं था।
“आंटी, यह गेट कैसे खुलता है?”
“आप तो यहाँ रहती हैं, आपको पता होगा! प्लीज़ बताइए, हमें घर जाना है!”
शज़ा, अब्दुल्लाह की गोद में लटकी हुई, हवेली की छत की ओर देखकर किसी से बात कर रही थी।
“यहाँ तो कोई नहीं है! तुम किससे बात कर रही हो?”
अब्दुल्लाह ने घूमकर छत की ओर देखा।
“भैया, आपको इतनी बड़ी आंटी नजर नहीं आ रही? वे छत पर बैठी हैं। देखो, वे स्माइल कर रही हैं!”
“आंटी, आप कितनी प्यारी हैं! बस थोड़ी मोटी हैं… ही ही ही…”
दोनों ने फिर देखा, पर वहाँ किसी ज़िंदा चीज़ का नामो-निशान नहीं था।
“तुम पागल हो गई हो, शज़ा?”
“एक तो इस मुसीबत में फंसा दिया, ऊपर से अजीब-अजीब बातें कर रही हो!” जिब्रील गुस्से से बोला।
“आंटी, ये अंधे हो गए हैं, इन्हें आप नज़र नहीं आ रही हैं!” शज़ा ने फिर ऊपर देखते हुए कहा।
“आंटी, प्यारी आंटी, प्लीज़ ये गेट खोल दें। मैं जाऊँगी नहीं, तो वापस कैसे आऊँगी?”
“तुम यहाँ हरगिज़ नहीं आओगी!” अब्दुल्ला ने सख़्ती से डांटा। वो पहले ही बहुत परेशान था, उसे लग रहा था जैसे मौत सामने खड़ी हो।
अब्दुल्ला ने पलटकर देखा तो उसे कई कुत्तों का झुंड अंदर की तरफ से निकलता नज़र आया। उसके होश उड़ गए।
“ऊँची आवाज़ में पढ़ो!” उसने जिब्रील से कहा और खुद भी ज़ोर से आयत-उल-कुर्सी का विर्द करने लगा।
अब उन कुत्तों की चाल धीमी हो गई थी, लेकिन वो फिर भी उनकी ओर बढ़ रहे थे।
अब्दुल्ला ने दिल से अल्लाह से मदद मांगी और कुत्तों की तरफ देखना छोड़ दिया।
“मैं इन आंटी के बच्चों से मिलने आऊँगी, उनसे खेलूँगी। वो भी इन्हीं की तरह होंगे, प्यारे-प्यारे…” शज़ा को इस हालात की कोई परवाह नहीं थी। बस वही बातें कर रही थी जो उसे पसंद थीं।
“वो आ रही हैं, अब गेट खुल जाएगा!” उसने खुशी से ताली बजाई।
कुछ ही देर में गेट के दोनों फाटक अलग हो गए, जैसे सच में किसी ने उन्हें आकर खोला हो।
अब्दुल्ला और जिब्रील ने पीछे मुड़कर देखा—कुत्ते ग़ायब हो चुके थे।
वो तेज़ी से बाहर की ओर भागे।
मगरिब की अज़ानें शुरू हो चुकी थीं और अंधेरा घिरने लगा था। एक तो बादलों की वजह से और दूसरा रात की वजह से। मौसम ठंडा होता जा रहा था। वो बर्फ़ पर दौड़ते हुए घर पहुंचे। कुछ देर पहले जो खौफ़नाक वाकया हुआ था, अब वो किसी बुरे ख्वाब जैसा लग रहा था।
दिल अब भी डर से कांप रहा था।
“जिब्रील, घर में किसी को मत बताना कि हम कहाँ थे। और तुम भी, शज़ा… अपनी ज़ुबान बंद रखना!” अब्दुल्ला ने सख्ती से कहा।
जब वो घर पहुंचे, तो सब लोग आपस में बातें करने में इतने मशगूल थे कि किसी को उनके देर से आने का एहसास भी नहीं हुआ।
“दादाजी!” जिब्रील दौड़कर उनके गले लग गया।
“अरे, मेरा बच्चा! कैसा है?”
सब घरवाले आग के पास बैठे थे। किचन काफी बड़ा था और उसमें एक तरफ़ आग जल रही थी। सर्दियों में सब लोग वहीं इकट्ठा होते थे।
“चलो भाई, पहले नमाज़ पढ़ लो, बाकी बातें बाद में होती रहेंगी।”
शज़ा और सफ़ूरा एक साथ बैठकर खेलने लगीं।
जिब्रील ने आँखों ही आँखों में शज़ा को घूर कर इशारा किया कि वो ये बात अपनी सहेली को न बताए।
फाएक और फ़ाएज़ के अलावा सभी लड़के दादा जी के साथ नमाज़ पढ़ने चले गए।
नमाज़ के बाद सबने खाना खाया, जिसका ज़ीनत ने पहले ही इंतज़ाम किया हुआ था।
थोड़ी देर बाद अब्दुल्ला के पिता यूसुफ़ भी आ गए। सब बड़े लोग बैठकर बातें करने लगे और साथ में चाय-क़हवा चलता रहा।
बाकी पाँचों लड़के—अब्दुल्ला, हातिम, उनके छोटे भाई इमाद और अफ़ान, और जिब्रील—ने अपनी अलग महफ़िल जमा ली। अफ़ान और जिब्रील हमउम्र थे, और इमाद हातिम से दो साल छोटा था। यानी इन सबकी उम्र नौ से तेरह साल के बीच थी।
अब्दुल्ला सबसे बड़ा था। उसके बाद हातिम, फिर इमाद और अफ़ान।
अब्दुल्रहमान इस महफ़िल का हिस्सा नहीं था क्योंकि वो सियालकोट के कैडेट कॉलेज में फ़ौजी बनने की ट्रेनिंग ले रहा था।
लड़कियाँ सिर्फ दो ही थीं—शज़ा और सफ़ूरा। वो अपनी गुड़ियों और खिलौनों में मगन थीं।
फ़ाएज़ और फ़ाएक दोनों छोटे थे, इसलिए उनकी कोई खास जगह नहीं थी। कभी वो लड़कों के बीच जाकर उनकी बातें सुनने की कोशिश करते और कभी लड़कियों के खेल बिगाड़ देते।
ईशा की नमाज़ के बाद मास्टर अयूब ने सबको सोने का हुक्म दे दिया। उनके घर में सभी लोग वक्त पर सोने और सुबह जल्दी उठने के आदी थे।
अगली सुबह
जिब्रील को पूरी रात अजीबोगरीब सपने आते रहे। वह पूरी रात उसी हवेली में घूमता रहा था।
अब्दुल्ला को तो नींद में या जागते हुए बस परी ही दिखती रही।
सुबह सब अपने रोज़मर्रा के रूटीन के मुताबिक जाग गए।
मौसम खराब होता जा रहा था। नाश्ता हो चुका था, और अब दिन के नौ बज रहे थे। यह इतवार का दिन था।
इब्राहीम भी यहाँ आ चुका था।
“शमा, बच्चे अब तक नहीं उठे?” उसने अपनी बीवी से पूछा।
“जिब्रील तो जाग रहा है, पर बाकी तीनों अभी भी सो रहे हैं।”
“उठ गए होंगे!”
“तो उन्हें नाश्ता करवाओ। बल्कि मैं खुद जाकर देखता हूँ कि वे कहाँ हैं। इतनी देर तक सोना भी अच्छी बात नहीं है।”
इब्राहीम नाश्ता करने के बाद उनके कमरे की तरफ़ चल दिया।
उसने उनके ऊपर से कंबल हटाया। दोनों शरारती लड़के बेसुध सो रहे थे।
“उठो बेटा, नौ बज गए हैं!” उसने उनके गाल थपथपाए।
“ओं…ओं…” कहकर वो फिर सोने लगे।
इब्राहीम ने दोनों को उठाकर बिठा दिया।
“चलो, जल्दी मुँह हाथ धो लो और नाश्ता कर लो।”
अब वो शज़ा की तरफ़ बढ़े।
वो ऐसे सो रही थी जैसे सदियों से थकी हुई हो।
उसके घने काले बाल उसके गोरे-लाल चेहरे पर बिखरे हुए थे।
वो बिल्कुल गुड़िया जैसी लग रही थी।
“उठ जाओ, शहज़ादी साहिबा!” उन्होंने मुस्कुराते हुए उसके बाल समेटे।
लम्स महसूस कर के वो थोड़ी कसमसाई और करवट बदलने लगी, पर इब्राहीम ने उसे ज़बरदस्ती उठा कर बैठा दिया।
उसने भारी पलकों को मुश्किल से खोला।
“बाबा…” वह उनके कंधे से लग गई।
“चलो नीचे उतरो!”
“नहीं… मेरे… सिर… में दर्द…” उसने अटक-अटक कर कहा और फिर आँखें बंद कर लीं।
“क्या हुआ?”
इब्राहीम ने उसकी आँखें खोलीं, जो लाल हो रही थीं और सूजी हुई लग रही थीं।
उसका माथा भी तेज़ गर्म था।
“शमा! शमा!”
“जी, आई।”
“इसे उठा कर मुँह हाथ धुलाओ, कुछ खिलाओ-पिलाओ। मुझे लगता है इसे ठंड लग गई है और बुख़ार हो गया है।”
“जी अच्छा।”
शमा ने उसे मुश्किल से उठाया।
“क्या हुआ, शज़ा?”
“सिर… में… बहुत… दर्द…”
उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।
उसकी हालत देखकर लग रहा था कि उसे सच में तेज़ सिर दर्द हो रहा है।
शमा ने उसे नाश्ता करवा कर दवा खिलाई और फिर सुला दिया, यह सोचकर कि दोपहर तक ठीक हो जाएगी।
लेकिन यह उसकी ग़लतफ़हमी थी…
बर्फीली शरारतें
“भैया, घर बैठे-बैठे तो बोर हो गए हैं, कहीं बाहर चलते हैं!” – अफ़ान ने अब्दुल्ला से फ़रमाइश की।
“अरे, कहाँ चलें बाहर? बर्फ गिर रही है! अपनी कुल्फ़ी बनवानी है क्या?”
“ओहो भैया… ये कोई पहली बार थोड़ी हुआ है? हम बचपन से ही यही बर्फ़ देख रहे हैं, ये हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती!” – इमाद ने भी अफ़ान का समर्थन किया।
“न भाई, मैं तुम लोगों को कहीं नहीं ले जा रहा। मुझे दादा जी से मार नहीं खानी!”
“दादा जी तो सो रहे हैं, उन्हें पता ही नहीं चलेगा! हम बाहर चलकर बर्फ़ में खेलेंगे, स्नोमैन बनाएंगे, कितना मज़ा आएगा!” – हातिम भी कूद पड़ा।
“हाँ… फिर तुम लोग भी शज़ा की तरह बुखार चढ़ा कर इंजेक्शन लगवाओगे और दवाइयाँ खाकर पूरा दिन सोए रहोगे। मैं बेचार आधा डॉक्टर, हर घंटे तुम्हारे मुँह में थर्मामीटर लगाकर उसका पारा हाई कर रहा होऊँगा!”
“भैया, आप तो बात को ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं! हम लोग खुद ही चले जाते हैं, आप रहने दें। चलो दोस्तों!” – हातिम ने सबको जोश दिलाया।
वो तो पहले ही तैयार बैठे थे। तुरंत उठ खड़े हुए।
“अरे, तुम लोगों को मेरी बात समझ नहीं आती? बैठ जाओ आराम से!” – अब्दुल्ला ने रौब झाड़ने की कोशिश की, पर उसकी सुनने वाला कोई नहीं था।
सब टोली बनाकर बाहर निकल गए। अब्दुल्ला भी अपना नावेल अधूरा छोड़कर कम्बल से निकल पड़ा और उनके पीछे भागा, क्योंकि उसके पास कोई और चारा नहीं था।
“अच्छा, दूर मत जाना! यहाँ भी बहुत बर्फ है, जो करना है यहीं कर लो!” – उसने बाहर आते ही हिदायत दी।
हल्की-हल्की बर्फबारी हो रही थी, पर वो सब उसका कोई असर नहीं ले रहे थे। लग रहा था जैसे ये किसी कॉटन फ़ैक्टरी का दृश्य हो, जहाँ ज़मीन पर सफ़ेद रुई बिछी हो और हर ओर उड़ रही हो। वहाँ के मज़दूर रुई इकट्ठी कर उससे कुछ बनाने की कोशिश कर रहे हों।
कुदरत के इस हसीन और सफ़ेद चमकते दृश्य में उनकी अठखेलियों और ठहाकों ने रंग भर दिए थे। ऐसे रंग, जो दिखाई नहीं दे रहे थे, बस महसूस किए जा सकते थे।
वे सब स्नोमैन बनाने की प्रतियोगिता कर रहे थे और अब्दुल्ला एक किनारे खड़ा मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था।
“भैया, आप भी कुछ बना लो!” – जिब्राइल ने स्नोमैन का सिर बनाते हुए कहा।
“मैं क्या बनाऊँ?” – उसने खुद से सवाल किया।
उसी वक़्त उसकी आँखों के सामने एक चेहरा उभर आया, जैसे कह रहा हो – सोचने की क्या ज़रूरत है? तुम्हें क्या बनाना है, ये भी मैं बताऊँ?
उसने जल्दी से बर्फ के गोले बनाने शुरू किए और अपने काम में जुट गया।
“भैया, आप भी स्नोमैन बना रहे हैं, पर आप तो हार जाएँगे! हमारा तो बन ही गया!” – अफ़ान ने तेज़ी से हाथ चलाते हुए कहा।
“मैं स्नोमैन नहीं, स्नो डॉल बना रहा हूँ, और तुम्हारे स्नोमैन का इससे कोई मुकाबला नहीं!”
“ओओओओ…” – सबने एक साथ कहा। “ये डॉल कौन है वैसे?”
हातिम ने काम करते-करते पूछा।
“मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ, ऐसे मज़ाक नहीं करते!” – उसने उसे घूरा।
“अच्छा, सॉरी भैया!” – हातिम ने बर्फ़ का एक गोला उठाकर उसकी स्नो डॉल पर निशाना साधकर मारा।
लेकिन वो खुशनसीब थी, निशाना चूक गया और उसकी डॉल अस्तित्व में आने से पहले ही खत्म होने से बच गई।
“तुझे तो मैं छोड़ूँगा नहीं, हातिम के बच्चे!”
अब्दुल्ला ने दाँत पीसे और उसकी कमर पर बर्फ का गोला मारा। निशाना पक्का था।
“हाय हाय!” – वह चिल्लाया और फिर से अपने काम में लग गया। बाकी सब उसकी पिटाई पर हँस रहे थे।
मोटे कोट ने उसे बचा लिया था, फिर भी उसने नाटक करना अपना फ़र्ज़ समझा।
अब सबने मिलकर उस पर बर्फ़ के गोले मारने शुरू कर दिए। वह भी बराबर जवाब दे रहा था। हर तरफ़ बर्फ़ उड़ती नजर आ रही थी। धमाचौकड़ी मच गई थी और इसी में जिब्राइल का अधूरा स्नोमैन ज़मीन पर गिर गया।
“मेरी सारी मेहनत खराब कर दी!” – वह चिल्लाया और बदला लेने के लिए सबसे पहले इमाद का स्नोमैन तोड़ दिया।
अब सब हँसते हुए एक-दूसरे के स्नोमैन तोड़ रहे थे और अपने वाले को बचाने की कोशिश कर रहे थे।
अब्दुल्ला शांति से एक तरफ़ अपनी स्नो डॉल बनाने में लगा रहा। वह बड़ी बारीकी से उसे गढ़ रहा था।
अब उनका शोर कम हो गया था, क्योंकि सबके अधूरे स्नोमैन अपने बुरे अंजाम तक पहुँच चुके थे।
उन्होंने आँखों में इशारा किया और फिर एक साथ अब्दुल्ला की स्नो डॉल पर गोले बरसा दिए। वह बेचारी ढेर होकर उसके पैरों में गिर पड़ी।
“अरे बेवकूफ़ों, ये क्या किया?”
“तुम्हें तो मैं छोड़ूँगा नहीं!” – वह उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ा।
पर वे हाथ आने वाले कहाँ थे?
अब वह भी उन पर बर्फ़ के गोले बरसा रहा था और निशाना साध-साधकर मार रहा था।
“अब्दुल्ला…”
वह उसके सामने थी, एक पेड़ की आड़ में खड़ी। कुछ देर पहले फेंका गया गोला उससे टकराकर उसकी पैरों तले पड़ी बर्फ़ का हिस्सा बन गया था।
“परी…”
वह हैरानी से बुदबुदाया।
“पहले डॉल… अब परी…”
सबने शरारत भरी हँसी लगाई। “ये क्या माजरा है?”
अब्दुल्ला के तो पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
ये राज़ उसके भाइयों के सामने इस तरह खुल जाएगा, उसने सोचा भी नहीं था।
उसने एक नज़र परी को देखा, जो सफेद लिबास में लिपटी थी, और फिर पलटकर उन चारों को, जो उसी को घूर रहे थे।
“परी, तुम छुप जाओ, प्लीज़!”
उसने उससे गुजारिश की।
वह पेड़ की आड़ लेकर छिप गई।
“भैया, किससे बातें कर रहे हो?”
वे चारों दनदनाते हुए उसकी ओर बढ़े।
“हाय, अगर उन्होंने परी को देख लिया तो?”
उसकी तो जान ही सूख गई…
