Author: umeemasumaiyyafuzail

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lagan novel introduction; Lagan Novel एक दिल को छू लेने वाली उर्दू नॉवेल है, जिसमें मोहब्बत, रिश्तों, त्याग और भावनाओं को बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। कहानी के किरदार अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव, गलतफहमियों और कठिन फैसलों से गुजरते हुए पाठकों को अपने साथ बांधे रखते हैं। इस नॉवेल की सबसे बड़ी खासियत इसकी भावनात्मक गहराई और किरदारों की वास्तविकता है, जो हर पाठक को कहानी से जुड़ने पर मजबूर कर देती है। इस भाग में कहानी एक नए मोड़ पर पहुंचती है, जहां कुछ पुराने रहस्य सामने आते हैं और किरदारों की जिंदगी में नई चुनौतियां दस्तक…

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“चौदहवीं चोटी” भाग 1 और 23 अक्टूबर 2005 वह भूकंप प्रभावित लोगों को इंजेक्शन लगा रही थी। “फराह, तुम इस्लामाबाद वापस जा रही हो, तुम चलोगी या यहीं और रुकना चाहोगी?” “अगर तुम जा रही हो तो मैं भी चलती हूँ। तुम हवाई मार्ग से जा रही हो?” “हाँ, अभी बशीर आकर बताएगा कि हेलीकॉप्टर खाली है या नहीं।” इसी दौरान एक कैप्टन अंदर आया, “मैडम, हेलीकॉप्टर बस आने ही वाला है। कर्नल तारिक उसमें कुछ लोगों को लेकर आ रहे हैं।” “वे बस आते ही होंगे।” वह झुककर एक बच्चे को इंजेक्शन लगा रही थी, फिर चिंतित होकर उसकी…

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करनल फारुक तो चले गए परेशे को लगा उसने गलत सुना कहाँ चले गए? वापस सकर्दू जैसे पूरा ग्लेशियर उसके सिर पर फट पड़ा, वह रेडियो को कंग से देख रही थी वह कैसे चले गए? उन्होंने तो हमें रेस्क्यू करना था, उससे शब्द निकल नहीं पा रहे थे, जैसे सारी ताकत छीन ली गई हो वह कह रहे थे मौसम खराब है और भी कोई समस्या आ सकती है, डोन्ट नो, सुबह ही चले गए तब परेशे को अहसास हुआ, वह खुले आसमान के नीचे अकेली बेबस पड़ी है अहमद, वह कैसे जा सकते हैं? हमने उनके…

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आठवीं चोटी शुक्रवार, 11 अगस्त 2005  उसने मेस टेंट की मेज़ पर रखे कई पावर बार्स और एनर्जी बार्स उठाकर अपने रक्सैक में रख लिए और जूतों के नीचे क्रैम्पॉन्स कसकर बाहर निकल आई। बाहर अर्सा, फ़रीद और अफ़क अपने भारी बैकपैक कंधों पर डाले, बूट्स, ग्लासेज़ और ऊनी टोपियाँ पहने तैयार खड़े थे। योजना के मुताबिक उन्हें पोर्टर्स के साथ कैम्प फ़ोर तक जाना था, मगर सुबह सूरज निकलते वक्त शेर ख़ान ने बिना ग्लासेज़ लगाए राकापोशी की चमक देख ली थी और अब सन ब्लाइंड होकर अपने घर में पड़ा था। उनके पास इतना अतिरिक्त ईंधन और सामान…

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छठी चोटी शनिवार, 30 जुलाई 2005 घोड़े की तेज़ रफ्तार टापों की आवाज़ सुनकर उसने पलटकर देखा। दूर तंबुओं के पास से उफ़ुक घोड़ा दौड़ाता हुआ उसकी तरफ़ आ रहा था। वह अब भी उसी जगह बैठी थी, जहाँ पिछली रात उफ़ुक उसे छोड़कर गया था। क्षितिज पर सुबह की हल्की सुनहरी रोशनी फैलने लगी थी। माहोड़ंड झील का पानी हल्के हरे रंग में डूबा दिखाई दे रहा था, क्योंकि सूरज की किरणें अभी पूरी तरह उस तक नहीं पहुँची थीं। “तुम यहाँ क्या कर रही हो?” उसके करीब पहुँचकर उफ़ुक ने घोड़े की रफ्तार धीमी कर दी। “ज़िंदगी में…

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पांचवीं चोटी बुधवार, 27 जुलाई 2005 वह कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर लंबे बरामदे में आ गई। बरामदा बेहद विशाल था और हर कमरे के दरवाज़े के दोनों ओर रंग-बिरंगे फूलों से सजे गमले रखे थे। बरामदे के सामने सफ़ेद संगमरमर जैसे खंभे कतार में खड़े थे। वह जाकर एक खंभे से टिक गई और सामने फैले दृश्य को देखने लगी। सामने फैले आयताकार लॉन पर हरी मुलायम घास चमक रही थी। लॉन के किनारे बनी झाड़ियों की बाड़ के पास एक छोटा बंदर गोल-गोल घूम रहा था। उसके हाथ में आधा खाया हुआ हरा सेब था। फ़ज्र का वक़्त…

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नवा-ए-वक्त, मंगलवार, 16 अगस्त 2005 “राकापोशी पर ग्लेशियर फटने से पर्वतारोही लड़की गिरकर हلاک” हुनजा (AFP) – राकापोशी फतह करने वाली टीम की एक लड़की ग्लेशियर फटने से कई फीट गहरे दरार में गिरकर हلاک हो गई। विदेशी समाचार एजेंसी के अनुसार, बीती सुबह तीन से चार बजे के बीच पाक-तुर्क-ब्रिटिश अभियान की एक पर्वतारोही, चढ़ाई के दौरान बर्फ फटने से बनी दरार में गिर गई। अभियान दल ने लड़की की तत्काल मौत की पुष्टि कर दी। अधिक जानकारी नहीं मिल सकी। बुधवार, 20 जुलाई 2005 – एक माह पहले सफेद गेट पार कर उसने कुछ पल…

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शज़ा—शज़ा—कहाँ हो तुम-? दादू नीचे बुला रही हैं- जिब्राईल धड़ाम से दरवाज़ा खोलकर उसके कमरे में दाखिल हुआ। वह पूरी तल्लीनता से मोबाइल में कुछ देख रही थी, मगर उसे देखते ही बुरी तरह घबरा गई और फौरन मोबाइल छिपा लिया। “हाँ… क्या कह रहे थे तुम?” उसने जबरन मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन पकड़े जाने के डर से उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे। “मैं इतनी देर से ऊँची आवाज़ में बुला रहा था और तुम्हें सुनाई ही नहीं दिया? क्या कर रही थी तुम?” उसने शक भरी नज़रों से उसे देखा। “क… कुछ नहीं भाई… बस पढ़…

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عبداللہ और परी ने जाकर सलाम किया। “बैठ जाओ,” उन्होंने हुक्म दिया। वे दोनों घुटनों के बल बैठ गए। “कहाँ से भगा कर लाए हो लड़की? तुम्हारी उम्र भी ज़्यादा नहीं लगती।” عبداللہ (अब्दुल्लाह) इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, वह घबरा गया। “इमाम साहब, मैं इसके साथ भागकर नहीं आई। मैं अपनी मर्ज़ी से निकाह कर रही हूँ,” परी ने जवाब दिया। “लड़की, तुम्हारे माँ-बाप कहाँ हैं?” “उनका इंतकाल हो गया है। मैं खुद मुख्तार हूँ।” “किसी सरपरस्त (संरक्षक) के बिना निकाह नहीं हो सकता।” “और तेरे माँ-बाप?” उन्होंने अब्दुल्लाह पर तेज़ नज़र डाली। अब्दुल्लाह को…

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वे शिष्टता से अंदर प्रवेश किए। आगे-पीछे दो कमरे थे। फर्श पर चटाई बिछी थी और बाबा जी दीवार से तकिया लगाए उस पर बैठे थे। वे काफी उम्रदराज़ थे, चेहरे पर सफेद दाढ़ी थी, सिर पर टोपी पहने और गर्म ऊनी शॉल लपेटे हुए तسبीह कर रहे थे। उनका चेहरा बिल्कुल दुबला और अत्यधिक लाल-गुलाबी था। अब्दुल्लाह ने देखा कि उनके हाथ, कंपन के कारण, कांप रहे थे। कमरे में कोई खास सामान नहीं था, कुछ बर्तन पड़े थे और एक तरफ ऊंचे ताखे पर कुरान शरीफ सजा हुआ था। इस खाली से घर में अजीब सा शांति…

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