Lagan Part 10 , आफ़ाक जब बाथरूम से बाहर निकला तो फ़लकी ने उसके कपड़े निकाल लिए थे। कई दिनों से फ़लकी ने उसके वे सारे काम भी अपने ज़िम्मे ले लिए थे, जो पहले नहीं करती थी। पहले उसने कभी उसके कमरे में जाकर उसके लिए कपड़े नहीं निकाले थे। मगर अब वह उठकर पहले रसोई में जाती, अब्दुल करीम को ज़रूरी बातें समझाकर आफ़ाक के कमरे में आ जाती। उसकी शेव के लिए पानी बाथरूम में रख देती। जब वह बाथरूम में चला जाता तो उसकी वार्डरोब खोलकर उसके लिए कपड़ों का चुनाव करती। आफ़ाक की पसंद बहुत…
Author: umeemasumaiyyafuzail
Lagan Hindi Novel Part 9, ऐसे में फलकी का दिल चाहा कि वह कोई गीत सुने। दर्द भरा गीत। उसने उठकर देखा। सब लोग जा चुके थे। बाहर घुप्प अँधेरा था। अंदर भी सारी रोशनियाँ गुल हो चुकी थीं। अभी-अभी आफ़ाक सफेद कुर्ता-पायजामा पहने उसके पास से गुजर गया था। फ़लकी को उसकी विशेष खुशबू महसूस हुई थी। पता नहीं उसने फ़लकी को देखा नहीं था या वैसे ही नज़रअंदाज़ कर गया था। फ़लकी को बेचैनी -सा महसूस होने लगा। ऐसी बेचैनी जिसका कोई नाम नहीं होता। ऐसी बेचैनी जिसे महसूस करने का अंदाज़ भी नहीं आता। पता नहीं…
Lagan part 8… “आपको और कुछ चाहिए?” उसने जाने से पहले पूछा। “चाहिए।” आफ़ाक़ ने गंभीर आवाज़ में कहा। वह सिर से पाँव तक जैसे इंतज़ार बनकर खड़ी रह गई। “पहले चाय बनाइए।” फलकी ने हमेशा की तरह उसके प्याले में चाय बनाकर सामने रख दी। “एक प्याली और बनाइए।” फलकी ने दूसरी प्याली भी बना दी। “वहाँ कुर्सी पर बैठकर यह चाय पी लीजिए।” वह कुर्सी पर बैठकर चाय पीने लगी। अब तक फलकी समझ चुकी थी कि उसके सामने बहस या आनाकानी नहीं करनी चाहिए। उसकी भलाई इसी में थी कि एक रोबोट की तरह उसकी हर…
“अब क्या होगा…?” “अब क्या होगा…?” वह घबराकर बार-बार यही सोच रही थी। वह झाड़न से अपने हाथ पोंछती हुई रसोई में आई। तभी आफ़ाक भी उसके पीछे-पीछे अंदर आ गए। चूल्हे पर रखी देगची तेज़ आँच पर चढ़ी हुई थी और उसके किनारों से भाप निकल रही थी। “खाना तैयार हो गया?” आफ़ाक ने पूछा। “जी… नहीं।” फ़लकी ने नज़रें झुकाकर कहा। “असल में सफ़ाई करते-करते…” “अच्छा…” आफ़ाक मुस्कराते हुए बोले, “मैंने सोचा कि आज दोपहर का खाना घर आकर ही खा लिया जाए।” फिर वह आगे बढ़े, देगची का ढक्कन उठाकर अंदर देखा और बोले, “लगता है अभी सालन बनने के कोई…
Lagan part 6…. खूबसूरत चेहरा जलकर इतना बदसूरत हो जाएगा कि लोग उसे देखना भी पसंद नहीं करेंगे। तौबा… तौबा… उसका इरादा बदल जाता। “तो फिर आसान और आरामदायक तरीका कौन-सा होगा? कोई गोली खा ली जाए?” इस घर में तो उसे कोई दवा भी नज़र नहीं आती थी। आए दिन वह फिल्मों की अभिनेत्रियों के बारे में सुनती थी कि वे नींद की गोलियाँ खा लेती हैं। फिर उन्हें अस्पताल भी पहुँचा दिया जाता था और वे बच भी जाती थीं। उसे भी कुछ ऐसा ही इंतज़ाम पसंद था। असल में वह आफ़ाक़ को धमकाना चाहती थी—ऐसा कि साँप…
बेहद ख़तरनाक क़दम है। फिर उसे कई ग़रीब लोगों का ख़याल आया। फ़क़ीरों की याद आई। जब भी उसकी कार बाज़ार में जाकर रुकती, कई फ़क़ीर और बच्चे हाथ फैला कर कहते— “रात से भूखा हूँ, रोटी खिला दो!” अगरचे वह पैसे दे देती, मगर दिल में सोचती— उन्हें खाने की क्या ज़रूरत है? ये सूखी हड्डियाँ और काली चमड़ी… खाने-पीने से क्या फ़ायदा? अगर ये लोग न भी खाएँ तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा? अगर ग़रीब ज़िंदा भी रहें तो कौन-सी कमी हो जाएगी? अगर लोगों के पास रोटी नहीं है तो इसमें मेरी क्या गलती? फिर क्या ये ज़रूरी…
Part 4 मम्मी के यहाँ तो इस शख़्स ने शोर मचाया हुआ था कि डिनर पर जाता है, और यहाँ सब कुछ भूल गया था। उस वक्त शायद आठ बजे रहे थे। फलक़ी ने फिर से अपनी घड़ी देखी, तो आफ़ाक़ उसकी तरफ़ देख कर बोला— “फलक़, तुम तैयार हो जाओ, हमें आठ बजे एक डिनर पर जाना है। कोई बात नहीं, मैं इन लोगों को फोन कर देता हूँ कि हम साढ़े आठ बजे तक पहुँच जाएंगे और रिज़वान और भाई भी हमारे साथ ही जाएंगे।” “नहीं यार, तुम लोग पहुँच जाओ, हम अब जाते हैं।” “वो जगह…
Falki ki khamoshi …. फ़लकी का दिल चाहा कि झटके से अपना बाज़ू छुड़ा ले, मगर फिर उसे रात वाली बेबसी का ख़याल आ गया। वह चुपचाप अलग हो गई। “भला रोने की क्या बात है, चाँद!” अम्मी अपनी साड़ी सँभालती हुई सोफ़े पर बैठ गईं। “इकलौती बेटी है, पहली बार अलग हुई है। आख़िर कोई ना कोई एहसास आ ही जाता है!” आफ़ाक़ ने हँसते हुए कहा। “रुख़सती के वक़्त तो आपने इसे रोने नहीं दिया। अब आपको देखते ही थोड़ी एक्साइटेड हो गई है!” आफ़ाक़ ने इतनी खूबसूरती से यह बात कही कि सबको सच लगने लगा। सिर्फ़ एक फ़लकी थी, जो अंदर ही…
Lagan part 2 घर में शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कार्ड बाँटे जा चुके थे। खाने की सूची तैयार हो गई थी। हर रोज़ घर में व्यवस्थापकों की एक टोली आती, जिन्हें डैडी सारी व्यवस्थाओं के बारे में हिदायतें देते। पूरे घर में नया पेंट हो गया था, ऐसा लग रहा था जैसे घर की भी शादी हो और उसे दुल्हन की तरह सजाया जा रहा हो। और तो और, थी भी अपने सारे काम छोड़कर शादी की तैयारियों में लगी रहतीं। ज्यादा से ज्यादा यह होता कि उनकी सारी सहेलियाँ सुबह आ जातीं और घर में एक कॉफी पार्टी…
आफ़ाक़ आज सोची समझी स्कीम के तहत दफ्तर देर से था बल्कि पिछले एक हफ्ते से उसने आने के वक़्त में हैरत अंगेज़ तब्दीलिया कर ली थी। कभी बहुत जल्दी ,और कभी बहुत देर से अचानक दफ्तर में ऐसे दाखिल होता जैसे छापा मारने की गरज़ से आया हो। सारे दफ्तर के लोग इस बेहवियर से हैरान थे क्युकि सब जानते थे कि आफ़ाक़ वक़्त की पाबन्दी का सख्ती से क़ाएल था। दुसरो को इस उसूल पर लाने के लिए वह हमेशा दफ्तर खुलने से १५,२० मिंट पहले आजाता था। कभी सड़क पर टहलता रहता और कभी मोटर में बैठ…
