Lagan Part 12….. बिल्कुल पढ़ाएगा, बेगम साहब! यह तो आपका नौकर है। “अच्छा… गुलचहरा! तुम कब खाली होती हो?” “यह तो जी, सारा दिन खाली होती हूँ।” “नहीं?” फ़लकी ने कहा, “मुझे मालूम है, बच्चों वाली माँ को बहुत काम होता है। अच्छा, ऐसा करो, दिन के ग्यारह बजे तुम आ सकती हो?” “हाँ बेगम साहब! हम नाश्ता करके ड्यूटी पर चले जाते हैं, तो फिर यह आ जाएगा।” “अच्छा, यूँ करते हैं। दस-ग्यारह बजे के बीच जब भी मैं खाली होऊँगी, तुम्हें बुला भेजूँगी… ठीक है?” “बिल्कुल ठीक है, बेगम साहब!” गुलचहरा ने कहा। फ़लकी उठकर घर आ…
Author: umeemasumaiyyafuzail
Lagan Part 11, फलकी की आँख खुली तो उसने चारों तरफ़ देखा और बड़बड़ाते हुए उठ बैठी। दोपहर का समय था। धूप घर के आँगन को पार कर चुकी थी। दिन भी हमेशा की तरह व्यस्त दिखाई दे रहा था… मगर वह अब तक सो रही थी। बल्कि अभी-अभी उठी थी। वह जल्दी से उठकर बैठ गई। वह अपने कमरे की बजाय टीवी लॉन्ज में सो रही थी। वह लॉन्ज में कैसे पहुँच गई? क्या रात फिर कोई झगड़ा हुआ था? वह इधर-उधर देखने लगी तो उसकी नज़र सिरहाने रखी जानमाज़ पर टिक गई, जिसे उसने खुद ही तह…
Lagan Part 10 , आफ़ाक जब बाथरूम से बाहर निकला तो फ़लकी ने उसके कपड़े निकाल लिए थे। कई दिनों से फ़लकी ने उसके वे सारे काम भी अपने ज़िम्मे ले लिए थे, जो पहले नहीं करती थी। पहले उसने कभी उसके कमरे में जाकर उसके लिए कपड़े नहीं निकाले थे। मगर अब वह उठकर पहले रसोई में जाती, अब्दुल करीम को ज़रूरी बातें समझाकर आफ़ाक के कमरे में आ जाती। उसकी शेव के लिए पानी बाथरूम में रख देती। जब वह बाथरूम में चला जाता तो उसकी वार्डरोब खोलकर उसके लिए कपड़ों का चुनाव करती। आफ़ाक की पसंद बहुत…
Lagan Hindi Novel Part 9, ऐसे में फलकी का दिल चाहा कि वह कोई गीत सुने। दर्द भरा गीत। उसने उठकर देखा। सब लोग जा चुके थे। बाहर घुप्प अँधेरा था। अंदर भी सारी रोशनियाँ गुल हो चुकी थीं। अभी-अभी आफ़ाक सफेद कुर्ता-पायजामा पहने उसके पास से गुजर गया था। फ़लकी को उसकी विशेष खुशबू महसूस हुई थी। पता नहीं उसने फ़लकी को देखा नहीं था या वैसे ही नज़रअंदाज़ कर गया था। फ़लकी को बेचैनी -सा महसूस होने लगा। ऐसी बेचैनी जिसका कोई नाम नहीं होता। ऐसी बेचैनी जिसे महसूस करने का अंदाज़ भी नहीं आता। पता नहीं…
Lagan part 8… “आपको और कुछ चाहिए?” उसने जाने से पहले पूछा। “चाहिए।” आफ़ाक़ ने गंभीर आवाज़ में कहा। वह सिर से पाँव तक जैसे इंतज़ार बनकर खड़ी रह गई। “पहले चाय बनाइए।” फलकी ने हमेशा की तरह उसके प्याले में चाय बनाकर सामने रख दी। “एक प्याली और बनाइए।” फलकी ने दूसरी प्याली भी बना दी। “वहाँ कुर्सी पर बैठकर यह चाय पी लीजिए।” वह कुर्सी पर बैठकर चाय पीने लगी। अब तक फलकी समझ चुकी थी कि उसके सामने बहस या आनाकानी नहीं करनी चाहिए। उसकी भलाई इसी में थी कि एक रोबोट की तरह उसकी हर…
“अब क्या होगा…?” “अब क्या होगा…?” वह घबराकर बार-बार यही सोच रही थी। वह झाड़न से अपने हाथ पोंछती हुई रसोई में आई। तभी आफ़ाक भी उसके पीछे-पीछे अंदर आ गए। चूल्हे पर रखी देगची तेज़ आँच पर चढ़ी हुई थी और उसके किनारों से भाप निकल रही थी। “खाना तैयार हो गया?” आफ़ाक ने पूछा। “जी… नहीं।” फ़लकी ने नज़रें झुकाकर कहा। “असल में सफ़ाई करते-करते…” “अच्छा…” आफ़ाक मुस्कराते हुए बोले, “मैंने सोचा कि आज दोपहर का खाना घर आकर ही खा लिया जाए।” फिर वह आगे बढ़े, देगची का ढक्कन उठाकर अंदर देखा और बोले, “लगता है अभी सालन बनने के कोई…
Lagan part 6…. खूबसूरत चेहरा जलकर इतना बदसूरत हो जाएगा कि लोग उसे देखना भी पसंद नहीं करेंगे। तौबा… तौबा… उसका इरादा बदल जाता। “तो फिर आसान और आरामदायक तरीका कौन-सा होगा? कोई गोली खा ली जाए?” इस घर में तो उसे कोई दवा भी नज़र नहीं आती थी। आए दिन वह फिल्मों की अभिनेत्रियों के बारे में सुनती थी कि वे नींद की गोलियाँ खा लेती हैं। फिर उन्हें अस्पताल भी पहुँचा दिया जाता था और वे बच भी जाती थीं। उसे भी कुछ ऐसा ही इंतज़ाम पसंद था। असल में वह आफ़ाक़ को धमकाना चाहती थी—ऐसा कि साँप…
बेहद ख़तरनाक क़दम है। फिर उसे कई ग़रीब लोगों का ख़याल आया। फ़क़ीरों की याद आई। जब भी उसकी कार बाज़ार में जाकर रुकती, कई फ़क़ीर और बच्चे हाथ फैला कर कहते— “रात से भूखा हूँ, रोटी खिला दो!” अगरचे वह पैसे दे देती, मगर दिल में सोचती— उन्हें खाने की क्या ज़रूरत है? ये सूखी हड्डियाँ और काली चमड़ी… खाने-पीने से क्या फ़ायदा? अगर ये लोग न भी खाएँ तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा? अगर ग़रीब ज़िंदा भी रहें तो कौन-सी कमी हो जाएगी? अगर लोगों के पास रोटी नहीं है तो इसमें मेरी क्या गलती? फिर क्या ये ज़रूरी…
Part 4 मम्मी के यहाँ तो इस शख़्स ने शोर मचाया हुआ था कि डिनर पर जाता है, और यहाँ सब कुछ भूल गया था। उस वक्त शायद आठ बजे रहे थे। फलक़ी ने फिर से अपनी घड़ी देखी, तो आफ़ाक़ उसकी तरफ़ देख कर बोला— “फलक़, तुम तैयार हो जाओ, हमें आठ बजे एक डिनर पर जाना है। कोई बात नहीं, मैं इन लोगों को फोन कर देता हूँ कि हम साढ़े आठ बजे तक पहुँच जाएंगे और रिज़वान और भाई भी हमारे साथ ही जाएंगे।” “नहीं यार, तुम लोग पहुँच जाओ, हम अब जाते हैं।” “वो जगह…
Falki ki khamoshi …. फ़लकी का दिल चाहा कि झटके से अपना बाज़ू छुड़ा ले, मगर फिर उसे रात वाली बेबसी का ख़याल आ गया। वह चुपचाप अलग हो गई। “भला रोने की क्या बात है, चाँद!” अम्मी अपनी साड़ी सँभालती हुई सोफ़े पर बैठ गईं। “इकलौती बेटी है, पहली बार अलग हुई है। आख़िर कोई ना कोई एहसास आ ही जाता है!” आफ़ाक़ ने हँसते हुए कहा। “रुख़सती के वक़्त तो आपने इसे रोने नहीं दिया। अब आपको देखते ही थोड़ी एक्साइटेड हो गई है!” आफ़ाक़ ने इतनी खूबसूरती से यह बात कही कि सबको सच लगने लगा। सिर्फ़ एक फ़लकी थी, जो अंदर ही…
