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Home»Hindi Novel»Ins Wa Jaan

Ins Wa Jaan (Hindi Novel) part 5

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailApril 14, 2026 Ins Wa Jaan No Comments38 Mins Read
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عبداللہ और परी ने जाकर सलाम किया।

“बैठ जाओ,” उन्होंने हुक्म दिया।
वे दोनों घुटनों के बल बैठ गए।

“कहाँ से भगा कर लाए हो लड़की? तुम्हारी उम्र भी ज़्यादा नहीं लगती।”

عبداللہ (अब्दुल्लाह) इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, वह घबरा गया।

“इमाम साहब, मैं इसके साथ भागकर नहीं आई। मैं अपनी मर्ज़ी से निकाह कर रही हूँ,” परी ने जवाब दिया।

“लड़की, तुम्हारे माँ-बाप कहाँ हैं?”

“उनका इंतकाल हो गया है। मैं खुद मुख्तार हूँ।”

“किसी सरपरस्त (संरक्षक) के बिना निकाह नहीं हो सकता।”

“और तेरे माँ-बाप?”

उन्होंने अब्दुल्लाह पर तेज़ नज़र डाली।

अब्दुल्लाह को लगा था कि यह आसान होगा, लेकिन यह उतना आसान नहीं था।

“जी, इसके माँ-बाप उमरा करने गए हैं। मैं इसके वालिद के चाचा का बेटा हूँ। यह बेसहारा बच्ची है। मैंने इसके माँ-बाप को सब कुछ बता दिया है। उनकी रज़ामंदी से ही यह निकाह हो रहा है। आप बिस्मिल्लाह करें, इमाम साहब। नेक काम में देर कैसी?”

इससे पहले कि इमाम साहब कुछ कहते, एक अधेड़ उम्र के गवाह ने बात बनाई।

“तुझे मालूम भी है? इस लड़की से निकाह करके तू कितनी बड़ी जंग लड़ने जा रहा है?”

“जी?”

अब्दुल्लाह ने नासमझी से पूछा।

“इसका पूरा खानदान तेरे खानदान को जला कर राख कर देगा। इंसानों से मुकाबला करना उतना मुश्किल नहीं है जितना जिन्नात से, जो बिना दिखे तकलीफ़ देते हैं।”

यह सुनकर अब्दुल्लाह का सिर घूम गया। उन्हें इस बात का कैसे पता चला कि वह जिन्नात के खानदान से है?

“कभी फुर्सत में आना, फिर बताऊँगा,” उस आदमी ने जैसे उसके ज़हन में आए सवाल को पढ़ लिया।

“इमाम साहब, आप निकाह पढ़ाएँ, ऐसा कुछ नहीं है,” परी ने संजीदगी से कहा।

“मैं यह निकाह नहीं पढ़ा सकता। जाओ, किसी और से संपर्क करो,” उन्होंने इनकार कर दिया और अपने कमरे में चले गए।

अब्दुल्लाह हैरान-परेशान उन्हें जाता देखता रहा।


निकाह करवाने से इनकार

वहाँ से मायूस होकर वे किसी और मौलवी के पास गए, लेकिन वहाँ से भी इनकार ही मिला।
कोई भी उनका निकाह पढ़ाने को तैयार नहीं था।
रात आधी बीत चुकी थी। शायद रब को मंज़ूर ही नहीं था।

“अब्दुल्लाह, तुम घर जाओ। तुम्हारे घरवाले परेशान हो रहे होंगे,” परी ने कहा।

“लेकिन परी…”

“देखो, अब कुछ नहीं हो सकता। हम इस बारे में कुछ और सोचते हैं। मुझे अभी जाना है, मैं और नहीं रुक सकती। अपना ख़याल रखना।”

वह शायद अब और कोई बात नहीं करना चाहती थी।
अब्दुल्लाह भी शायद अंदर से उसकी बात से सहमत हो गया था।
वह तेज़ी से चलती हुई आँखों से ओझल हो गई।

“अरे भाभी ग़ायब क्यों नहीं हुई? चलकर क्यों जा रही है?”

अली ने उसे जाते देख कहा।
अब्दुल्लाह ने उसे बस घूरकर देखा।

“अरे तुझ पर भी भाभी का असर होने लगा है! ऐसे मत घूर, मुझे डर लग रहा है!”

“मुझे टेंशन हो रही है और तुझे मज़ाक सूझ रहा है!”

“अच्छा, अब रात काफ़ी हो गई है। तू मेरे घर रुक जा, सुबह चला जाना,” अली ने कहा।

“नहीं यार, दादा जी मुझे रोस्ट कर देंगे अगर मैं पूरी रात घर से ग़ायब रहा।”

“जंगल का सफ़र है, कहीं ऐसा न हो कि तुझ पर कोई और चुड़ैल आशिक हो जाए! फिर दो चुड़ैलों की खूनी लड़ाई होगी!” अली ने मज़ाक किया।

“तू बस बकवास ही करता रह। मैं जा रहा हूँ,” अब्दुल्लाह ने बाइक स्टार्ट की।

“चल भाई, मैं तेरे लिए दुआ करूँगा,” अली ने उसे गले लगाया।

दोनों एक-दूसरे को अलविदा कहकर अपनी-अपनी मंज़िल की तरफ़ चल पड़े।


रात का सफ़र और रहस्यमय बाबा

रात के बारह बजे का समय था।
अब्दुल्लाह अंधेरी सड़क पर बाइक चला रहा था।
दोनों तरफ़ पहाड़, कहीं ऊँचे-लंबे पेड़, और कहीं-कहीं इक्का-दुक्का घर थे।
रात के इस पहर हर तरफ़ सन्नाटा था।
सड़क पर सिर्फ़ बाइक के चलने की आवाज़ थी।
उसे अपनी धड़कन भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
अचानक से उसे तन्हाई और अंधेरे का डर सताने लगा।

सर्दी भी तेज़ हो गई थी। रास्ता धुंधला रहा था और वह हल्के-हल्के काँपने लगा।
अब उसे अली की बात सही लग रही थी। उसे उसके घर रुक जाना चाहिए था।

अभी वह कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा कि कुछ साए उसकी तरफ़ बढ़ रहे हैं।
उसने मन ही मन अल्लाह को पुकारा।

अचानक एक बूढ़ा आदमी उसकी बाइक के सामने आ गया।
उसने झटके से ब्रेक लगाए।

वह एक झुकी हुई कमर वाला बूढ़ा था।
पूरा काले चादर में लिपटा हुआ।
उसका चेहरा ढका हुआ था।
सिर्फ़ उसकी आँखें दिख रही थीं, जो किसी दीये की तरह चमक रही थीं।

“बाबा जी, आप कौन हैं?” अब्दुल्लाह ने पूछा।

बूढ़े ने बाइक का हैंडल पकड़ लिया।

“आपको कहीं जाना है? मैं छोड़ दूँ?”

अब्दुल्लाह अंदर से घबरा रहा था।
बाबा जी की अंधेरे में बिल्ली जैसी चमकती आँखें उसी पर टिकी थीं।
उनकी ज़ुबान बिल्कुल खामोश थी।

अब्दुल्लाह को लगा कि वह बहरे या गूँगे हैं।
उनकी पलकों में कोई हरकत नहीं थी।
वह बस एकटक उसे देख रहे थे।

अब्दुल्लाह को डर लगने लगा।
जो उसके चेहरे और आँखों से साफ़ झलक रहा था।
बस यही वह लम्हा था जब सामने वाले ने उसे डराकर काबू कर लिया।

अचानक, बाबा जी के इशारे पर एक अजीब-सा, विशालकाय जानवर उड़ता हुआ आया।
उसने अपनी लंबी पूँछ में अब्दुल्लाह को लपेटा और अपनी पीठ पर पटक दिया।
फिर वह उड़कर हवा में तैरने लगा।

अब्दुल्लाह का दिमाग़ जाग रहा था,
उसे सब कुछ महसूस हो रहा था,
लेकिन उसकी ज़ुबान, आँखें और शरीर जैसे सुन्न हो गए थे।
वह न पूरी तरह होश में था, न पूरी तरह बेहोश।

उस अजीब मख़लूक़ (प्राणी) की पीठ से चिपका वह किसी अनजान मंज़िल की ओर बढ़ रहा था।

यह अजीब-ओ-गरीब जानवर बिजली की तेजी से सफर कर रहा था। अब्दुल्ला आधे बेहोश था, उसे यह नहीं पता था कि उसे कहां ले जाया जा रहा है।
लगभग एक से डेढ़ घंटे के सफर के बाद, वह एक अजनबी स्थान पर उतरा। वहां चारों ओर बड़े-बड़े हथियार उठाए पहरेदार खड़े थे। वे बेहद विशालकाय प्राणी थे।
यह एक विशाल जंगल था, जिसमें सफेद धुआं बादलों की तरह उड़ रहा था, और एक अप्रिय सी महक चारों ओर फैल रही थी।

अब्दुल्ला को उठाकर किसी के सामने फेंक दिया गया। डरावनी हंसी उसकी चारों ओर गूंज रही थी।
होश में आते हुए उसने अपनी आंखें उठाईं, और जो उसने देखा, उससे उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं।
वहां एक बहुत बड़ा और खौ़फनाक दानव बैठा था।

अब्दुल्ला ने आयतुलकुर्सी पढ़ने की कोशिश की, मगर उसकी जुबान जैसे तालू से चिपक गई थी। दिल में लगातार अल्लाह का जिक्र कर रहा था, मगर वह बोलने से असमर्थ था।
वह नहीं समझ पा रहा था कि वे लोग किस भाषा में बात कर रहे थे।

कुछ देर की बहस के बाद, वह दानव अब्दुल्ला से मुखातिब हुआ:
“तुमने हमारी लड़की को बहकाने की कोशिश की है। शिकार खुद ही हमारे पास आ गया है! तुम इंसान… कीड़े जैसे निकृष्ट इंसान… हमारा मुकाबला नहीं कर सकते। जिन्नात के सम्राट अब तुम्हें दिखाएगा कि असली ताकत किसके पास है!”

“यह ज़मीन हमारी थी, तुम इंसानों ने इस पर कब्जा कर लिया। यह दुश्मनी सृष्टि के आरंभ से चली आ रही है और अनंत तक जारी रहेगी।”

“तुम इंसान अंधे हो, हमें देख नहीं सकते, बहरों की तरह हो, मूर्ख हो। तुम कभी नहीं समझ सकोगे कि हम तुम्हें कब तक कब्र तक पहुंचा देंगे। तुम सब जानकर भी अनजान बने रहते हो।”

“तुम्हारे खाने में हमारा जहर मिलाना, तुम्हारी औलाद को बहकाना, लड़ाई-झगड़े करवाना, हत्या, खून-खराबा, फसाद… कितना मजा आता है यह सब देख कर! हाहा!”

“तुम हमेशा हमारे शिकार बनते रहोगे। हम जिन्नात हैं, आग से बने हुए! और तुम मट्टी के खिलौने… हम तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। तुम साठ-सत्तर साल जीकर मर जाते हो, जबकि हम सदियों तक जीवित रहते हैं!”

“काफ़ी समय बाद आज कोई इंसान हमारे जाल में फंसा है… हाहा!”

उसकी आवाज इतनी गरजदार थी कि अब्दुल्ला की आत्मा भी कांप गई। उसके मुँह से शोले निकल रहे थे, और पास का एक पेड़ जल कर राख हो गया।
दानव ने उस धुएं को अपनी नथुनों से खींचना शुरू कर दिया, जैसे वह धुआं उसके लिए कोई खुशबू हो।

“उसे ले जाओ!”
दानव ने अपना काला, सियाह हाथ उठाकर किसी को इशारा किया।
उसके आदेश पर दो जिन्नात अब्दुल्ला के पास आए, उसे जंजीरों में जकड़कर घसीटते हुए एक अंधेरे गुफा में ले गए।
अब्दुल्ला के सारे इंद्रियां पूरी तरह शिथिल हो चुकी थीं, और वह कुछ भी सोचने-समझने से काबिल नहीं था।

“यह मैं किस मुसीबत में फंस गया हूँ? और यहाँ से कैसे बाहर निकलूंगा?”
उसे कुछ भी मालूम नहीं था।


“मेरी बच्ची, ध्यान से जाना। आज कॉलेज का पहला दिन है, और ज्यादा किसी से दोस्ती मत करना। ध्यान रखना!”

“दादी! बस करो ना, कल से एक ही बात दोहरा रही हो। मैं अब बच्ची नहीं रही, बड़ी हो गई हूं!”

“हां, बड़ी हो गई हो! अपनी मां मत बनो, ज्यादा!”

नाश्ते की मेज पर बैठे सब एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे।
दादी और पोती की नोक-झोंक कभी खत्म नहीं होती थी।

“चले उठो मोटी! और कितना खाओगी? देर हो जाएगी!”
जिब्राइल खड़े होते हुए बोला।

“मोटे हो तुम! तुम्हारा पूरा परिवार मोटा है!”
शज़ा ने भी तात्कालिक जवाब दिया।

“बुरी बात है बेटा, बड़ा भाई है तुम्हारा।”
इब्राहीम ने बेटी को समझाया।

वह अपना बैग उठाकर बाहर की ओर दौड़ पड़ी।

“दुपट्टा सिर पर ले लो! और यह घोड़े की पुंछ भी बांध लो!”
दादी ने पीछे से आवाज दी।

शज़ा के बाल कमर से नीचे तक आते थे, घने और रेशमी। वह हमेशा ऊंची पोनी बना लेती और उसके बाल कमर पर लहराते रहते।
दादी ने कई बार उसे समझाया था, मगर शज़ा वही थी जो अपनी मर्जी की मालिक थी।

उसका बचपन अब खत्म हो चुका था। अब वह लड़कपन की दहलीज़ पर कदम रख चुकी थी।
वैसी ही शरारती, चंचल, जिद्दी, अड़े हुए स्वभाव की, कभी-कभी बदतमीज़ और हमेशा अपनी मर्जी करने वाली।

छोटी सी, गोल-मटोल, फूल जैसे गालों वाली शज़ा अब एक प्यारी सी सोलह साल की किशोरी बन चुकी थी।

समय यूं ही बह निकला जैसे पुलों के नीचे पानी बहता है। जब समय गुजरता है तो महसूस होता है, डर भी लगता है, लेकिन जब वह गुजर चुका होता है तो लगता है जैसे कुछ था ही नहीं।

इंसान केवल सोच कर हैरान रह जाता है कि कैसे सालों का सफर पल भर में तय हो गया।

समय को तो गुजरना ही होता है।
हम इच्छा करते हैं कि समय रुक जाए, लेकिन अगर समय सच में रुक जाए, तो हम उसे सहन नहीं कर पाएंगे।

दीवार पर लगे घड़ी की टिक-टिक तब तक अच्छी लगती है जब तक वह अपनी सुईयों के साथ समय बढ़ाती रहती है।
लेकिन अगर कभी उसकी पावर सेल खत्म हो जाए, तो वही सुईयाँ एक जगह पर रुक कर टिक-टिक करती रहती हैं, और शांति से भरे कमरे में इससे ज्यादा बदसूरत आवाज कोई नहीं होती।

 

समय का रुक जाना बहुत भयानक लगता है। इसका बहता रहना ही अच्छा है।
और समय की क़ीमत वही जान सकता है, जिसने बुरे पलों को महसूस किया हो और वक्त जैसे कटने का नाम ही ना ले।

वह शाम को अक्सर छत पर टहलने आ जाती थी। उसे इधर-उधर झांकना बहुत पसंद था। कुछ दिनों से उसे एक अजीब सा एहसास होने लगा था जैसे कोई कहीं छिप कर उसे देख रहा हो। उसने तीसरी बार आसपास निगाह दौड़ाई, लेकिन सारी छतें खाली थीं। फिर वह दीवार से लटककर नीचे गली में झांकने लगी।

कुछ देर बाद वह बोर होने लगी और दूसरी दीवार के पास जाकर लटक गई।
“कैसी बोरिंग सी लाइफ है?”
“कोई चलता-फिरता नहीं है, कुछ तो नया होना चाहिए,” उसने बेजारी से सोचा।

वह ग्रिल्स कॉलेज में पढ़ती थी, लेकिन यहां की रंग-बिरंगी लड़कियों को देखकर उसे अपना आप बहुत पुराना सा लगने लगा था। उसकी दोस्ती भी ज्यादा तर ऐसी ही लड़कियों से हुई थी, जिनके लिए ज़िंदगी सिर्फ एंजॉयमेंट का नाम थी। उनके रोज नए-नए बॉयफ्रेंड्स बनते रहते थे, और उन्हें मिलने वाली तारीफें और गिफ्ट्स देखकर शज़ा दिल ही दिल में हीन भावना का शिकार हो गई थी।

“तुम्हारा कोई भी बॉयफ्रेंड नहीं है, कम ऑन शज़ा, यू आर सो बोरिंग। इतनी हसीन तो हो, तुम्हारे एक इशारे पर लाइनें लग जाएंगी।”
वह जब अपनी दोस्तों के ग्रुप में बैठती, तो ऐसी ही बातें सुनने को मिलतीं।

“मेरी दादी बहुत सख्त हैं, वो मुझे जान से मार देंगी,” यही उसका जवाब होता।
और वे सब हंसी मजाक में उसका मजाक उड़ातीं।

“दादी से इतना डरती हो, तुम तो बच्ची हो बिल्कुल! वो कौन सी तुम्हारे साथ कॉलेज आती हैं? चूहिया हो तुम!”

अब इन सभी की बातें उसके दिमाग में घूमती रहती थीं।

“कम से कम मेरा एक बॉयफ्रेंड तो होना चाहिए, सबका होता है इसमें क्या बुराई है? वरना तो सब मुझे ताने दे-देकर मार डालेंगी।”

 

वह काफी देर सोचती रही और फिर कोई फैसला करके नीचे आ गई।

 

शज़ा ने अपनी हेली से पूछा-

“तुमने बॉयफ्रेंड्स कैसे बनाए हैं? मेरा मतलब है कि तुम दोस्ती कैसे करती हो?”
वह एकदम अपने बालों को झटककर हंसी- “ओ प्यारी लड़की, ये भी कोई मुश्किल काम है! ये वही बॉयज कॉलेज है न, वहीं से किसी को पटालो!” उसने हाथ झाड़ते हुए कहा।
“पर कैसे?”
“तुम मेरे साथ रहोगी तो सब सीख जाओगी, बस ये बताओ कितने बॉयफ्रेंड्स चाहिए?”
“बस एक,” उसने एक अंगुली लहराई, जैसे कह रही हो, बस एक जूता चाहिए।
“हाहाहा…” ज़मल का ठहाका गूंजा, “बस एक?”
“हां,” उसने मासूमियत से कहा।
वह शौक़ीन, चंचल और बेक़ाबू लड़की जरूर थी, मगर दादी ने उस पर कड़ी नजर रखी थी और उसे विपरीत लिंग से यथासंभव दूर रखा था। स्कूल में जिब्राइल भी उसकी हर हरकत पर नजर रखता था। इसलिए वह कभी इस तरह के मामलों में शामिल नहीं हो पाई थी।
ज़मल, उसकी कॉलेज की दोस्त, एक अपर क्लास फैमिली से ताल्लुक रखती थी, जहां हर तरह की आज़ादी होती है और लड़के-लड़कियों का मिलना-जुलना सामान्य माना जाता है। ऐसी लड़कियां गैर-मर्दों से अपनी तारीफ सुनकर ही जीती हैं।
“मैं तुम्हें कुछ लड़कों से मिलवाऊंगी, जो तुम्हें पसंद आएं, उनसे दोस्ती कर लेना… सिंपल!”
वह ऐसे कह रही थी, जैसे किसी जानवर को पसंद करने की बात हो रही हो।
“मगर कैसे और कब?”
“एक तो तुम सवाल बहुत करती हो!”
“देखो, जिस दिन कॉलेज में फन फेयर है न, उस दिन कोई रोक-टोक नहीं होगी, हम लंच पर चलेंगे… वहीं…”
सोलह साल का बचकाना दिमाग और दुनिया की ऊंच-नीच से पूरी तरह अनजान था। जो लड़की कभी बाप और भाई के बिना अकेली घर से बाहर ना निकली हो, उसे क्या पता कि दुनिया के मर्द कैसे होते हैं?
वह तो बस खुद को एक हीरोइन समझती थी। उसकी एक सहेली उसके बालों की तारीफ करती, कोई रंगत की और कोई सरपने की। अब इस हीरोइन को एक हीरो चाहिए था, जैसे फिल्मों में हमेशा होता है। उसके लिए ज़िन्दगी बिल्कुल किसी फिल्म की तरह थी, जहां एक बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड की तारीफ करता है, उसे गिफ्ट्स देता है, उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखता है और उससे प्यार भरी बातें करता है। फिर अक्सर उन दोनों की शादी हो जाती है।
अब तक उसका दिमाग हीरोइन और उसके जीवन के तरीके की तुलना करने से अनजान था, और इसके अंतर भी उसे स्पष्ट नहीं थे। दादी की रोक-टोक उसे बिल्कुल पसंद नहीं थी, और मां की तरफ से कभी उसे इतनी पाबंदियों का सामना नहीं करना पड़ा था। और ना ही कभी उन्होंने उसके तंग या ऊंचे कपड़े, खुले बालों या सिर नंगे घर से बाहर जाने पर कुछ कहा था, क्योंकि शमा का मानना था कि जमाना बदल गया है और उसकी बेटी को भी उसी के अनुसार फैशनेबल और मॉडर्न होना चाहिए, वरना लोग उसे पिछड़ी मानेंगे।
अब बस दादी ही आंखों में खटकती थी, या जिब्राइल था, जो उसे कॉलेज छोड़ने आता और अच्छे से दुपट्टा ओढ़ने की सलाह देता रहता था।


“मां, मेरा अच्छा सा पार्टी मेकअप कर दो, जल्दी जल्दी!”
वह हाफ स्लीव्स लाल घेरदार फ्रॉक पहने खड़ी थी, जिस पर डल गोल्डन कलर का काम था। दोनों कलाइयों में भर-भर के चूड़ियां पहनी हुई थीं, और ऊंची हिल्स में उसका मध्यम कद लंबा नजर आ रहा था। उसकी मलाई जैसी रंगत पर लाल रंग बहुत अच्छा लग रहा था।
“कितनी प्यारी लग रही है मेरी बेटी,” शमा ने कस्टमर से नजरें हटाकर उसका जायजा लिया। “तुझे तो जरूरत ही नहीं मेकअप की!”
“नहीं मां, आंखें तो बना दो, और अच्छा सा हेयर स्टाइल भी!”
“अच्छा, बैठ, बस दो मिनट!”
शमा ने उसका आई मेकअप किया और लाल लिपस्टिक लगाई। बालों को सामने से स्टाइल करके बाकी खुले छोड़ दिए।
“चल जा अब, नजर ना लगे मेरी बेटी को!”
अब घर पर तो कोई नहीं है जो तुझे छोड़ आए। दस बज रहे हैं, तेरे बाबा भी चले गए और भाई भी।
शमा ने सवालिया नजरों से बेटी को देखा।
“वो मेरी दोस्त है न ज़मल, वही पास से गुजर रही है, मुझे भी पकड़ लेगी।”
“अच्छा, चलो ठीक है!” शमा फिर से कस्टमर के साथ व्यस्त हो गई।
उसने नेट का बारीक दुपट्टा सिर पर ओढ़ा और जाने के लिए निकल पड़ी।
“अरे! इतनी सज़-धज के क्या किसी के ब्याह में जा रही है?” दादी ने चश्मे के नीचे से उसे घूरा।
“दादी, कॉलेज में फंक्शन है!”
“तो वहां जाकर नाचेगी क्या?” जैसे स्कूल में नाचती थी। “हड्डियां तोड़ दूंगी अगर तूने ये बेहयाई की!”
दादी को उसकी तैयारी देखकर ही गुस्सा आ गया।
“आप कौन सा कॉलेज में आकर देख सकती हो वहां क्या हो रहा है?” वह ऊंची आवाज में बड़बड़ाई।
“आकर देख लूंगी!” उन्होंने उसकी बड़बड़ाहट सुन ली थी।
“अरे, किसके साथ जा रही है?” दादी ने पीछे से आवाज लगाई।
“दोस्त के साथ जा रही हूं, और क्या? यहां मेरे लिए कोई नौकर बैठा है या गाड़ियां खड़ी हैं जो मुझे छोड़ आएं?”
वह बदतमीजी से कहती बाहर निकल गई।
बाहर ज़मल का ड्राइवर लगातार हॉर्न बजा रहा था।
“तुम सेल क्यों नहीं ले लेती?” शज़ा के कार में बैठते ही उसने कहा।
शज़ा ने उसकी बात अनसुनी कर दी। अब वह उसे ये बताते हुए अच्छी नहीं लग रही थी कि उसके घर में लड़कियों को इतनी आज़ादी नहीं दी जाती और वह अभी भी अपनी मां का मोबाइल इस्तेमाल करती है।
“मैं कैसी लग रही हूं?”
“हां, ठीक लग रही हो!” उसने सामान्य तरीके से कहा।
“बस ठीक?”

“हाँ, अच्छी लग रही हो—हेयर स्टाइल भी—

वो खुद जो स्लीवलेस टॉप में मلبूस थी और दुपट्टा ندارد—तो उसे ये अनारकली टाइप ड्रेस कहां भाना था—
रास्ते भर ज़मल मोबाइल पर मस्रूफ रही—और शज़ा बाहर देखती रही—
वो कॉलेज पहुंचे तो वहां अच्छी ख़ासी रौनक थी—लड़कियों को अपनी मनमर्जी करने का मौका मिल गया था—
प्रोग्राम शुरू होने ही वाला था, शज़ा की डांस परफॉर्मेंस थी—और उसकी बाकी दोस्तों ने ग्रुप डांस परफॉर्मेंस करनी थी—
हम दो बजे यहां से निकल पड़ेंगे—लंच पर जाएंगे—ज़मल ने उसे बताया—
ओके—वो मुस्कुराई—
जैसे जैसे इंसान बड़ा होता जाता है, उसे अपनी ज़ात का शऊर आता जाता है—एक बच्चे को ये बिलकुल इल्म नहीं होता कि वो खूबसूरत है या बदसूरत—काला है या गोरा—न ही वो दूसरों के बारे में इस चीज का शऊर रखता है—ये बेशऊरी बहुत बड़ी नीयमत है—
लेकिन बड़े होने के साथ-साथ उसे अपनी खूबसूरती या बदसूरती नजर आने लगती है और एक पर वो फख्र करने लगता है और दूसरी पर शिकवे और नाशुक्राई—
किसी को अपना ज़ाहिरी हुस्न नजर आता है और किसी को बारीकी—और फिर वो उसे और संवारने की कोशिश करने लगता है—
ज़ाहिरी हुस्न का नजर आना बड़ा खतरनाक होता है—क्योंकि फिर इंसान चाहता है कि उसे कोई सराहने वाला हो—कोई चाहने वाला हो।
और लड़कियाँ अगर अपने हुस्न से नाबिना ही रहें तो यही उनके लिए बेहतर है—या वो अपने आपको बदसूरत समझें और सब से छुपने की कोशिश करें तो भी यही उनके हक में बेहतर है—या उन्हें अपना हुस्न सिर्फ उसी वक्त नजर आए जब वो इसकी तहरीफ की जरूरत महसूस न करती हो।
जाने क्यों हर तहरीफ करने वाला उन्हें हमदर्द लगता है—किसी दाना का قول है कि—
ज़रूरी नहीं जो आपको मोहब्बत भरी नज़रों से देखे, वो आपका ख़ैर ख़्वाह हो—बिल्ली भी तो कबूतर को मोहबत्त भरी नज़रों से देखती है—
लड़कियाँ भी शायद कबूतर की तरह बज़दिल होती हैं जो बिल्ली को देख कर आँखें बंद कर लेती हैं—अपनी पंखों पर भरोसा नहीं करतीं—और फिर आसानी से उसका शिकार बन जाती हैं—लड़कियाँ भी किसी की मोहब्बत भरी आँखें देख कर उसकी हवस से अपनी आँखें बंद कर लेती हैं—
जैसे एक कबूतर को शिकार बनते देख कर बाकी कबूतर नसीहत नहीं पकड़ते, वैसे ही लड़कियाँ कभी भी दूसरी लड़की के अंजाम से नसीहत नहीं पकड़तीं—
उन्हें खुद पर जमी नज़ाहें दुनिया की पाकीज़ा और सच्ची तऱीन नज़ाहें लगती हैं—मोहब्बत की वादी उनके कदमों के लिए अनछुई होती है और इसमें कदम रखते ही वो हमेशा के लिए खो जाती हैं—
उसका तस्सम उन्हें कुछ और सोचने ही नहीं देता—पर वो नहीं जानतीं कि इस वादी के अंत में एक दलदल है जिसमें कदम रखते ही इंसान पूरा का पूरा धंस जाता है…काश कोई उन्हें समझा सके…काश…
कॉलेज से कुछ दूर एक रेस्टोरेंट था—शज़ा ज़मल के साथ उसकी गाड़ी में वहां पहुँची—टेबल पर बैठ कर उसने जूस ऑर्डर कर दिया—
आयन सामने पांच लड़कों का एक ग्रुप बैठा था—सब एक से बढ़कर एक थे—उनकी उम्रें सत्रह से बीस साल के बीच थीं—लापरवाह अंदाज—छिछोरा पन—बेफ़िक्री—अयाशी—
उनके हर अंदाज से साफ था—वो हाथ पर हाथ मारकर हंसी लगा रहे थे—आस पास मौजूद हर लड़की को जाँचती नज़रों से देख रहे थे—
देखो इन में से कौन ज्यादा अच्छा है—?
मुझे तो सब ही अच्छे लग रहे हैं—तुम ही बता दो—उसने नर्वस होकर अंगुलियाँ मरोड़ी—
उसके होशरबा सरापे ने उनको उसकी तरफ़ खींच लिया था—वो अब इन दोनों पर नज़रे जमाए उन्हें देख रहे थे और आँखों ही आँखों में एक दूसरे को इशारे कर रहे थे—
एक नीलें आँखों वाला लड़का उठ कर उनकी टेबल के पास आया—उसने हाथों में बैंड्स—रंग्स और जाने क्या अलम ग़लम पहन रखा था—वो लंबा कद, वज़ीह और शानदार पर्सनैलिटी का मालिक था—पर उसकी शख्सियत में कोई वक़ार नहीं था—
हैलो प्रिटी—
वो कुर्सी खींच कर बैठ गया और हाथ शज़ा के सामने बढ़ा दिया—और अब वो गहरी नज़रों से उसे देख रहा था—
ज़मल मुस्कुरा रही थी—
ड्रामों में ऐसा होता था, वो देखती थी—कॉलेज यूनिवर्सिटीज में ये सब चलता है—
उसने कुछ झिझकते हुए अपना हाथ उसके हाथ में थमा दिया—
तबरिज़ खान—
उसने गर्मजोशी से उसका हाथ दबाया।
शज़ा इब्राहीम—
उसके पूरे बदन में सनसनी सी दौड़ गई—कुछ था जो एक पल में महसूस हुआ था—कोई तबदीली या कोई अंजाना सा एहसास—कोरे कागज़ पर सियाह धब्बा।
मेरी गर्लफ्रेंड बनोगी—?
वो सीधे मुद्दे पर आ गया—उसकी चमकती आँखें बहुत कुछ कह रही थीं—
वो मुस्कुरा कर रह गई—
यू आर सो प्रिटी एंड क्यूट—क्या हुस्न है…बिलकुल पुरानी देवमालाई कहानियों की किसी देवी जैसा—और तुम्हारे बाल—उसने उसके चेहरे की अतराफ़ लहराती लंबी लटों को देखते हुए कहा—
अफ़—क्या बात है—वो खुमार जदी आँखों से कह रहा था—लहजे में सताइश थी—
सिर्फ़ फ्रॉक और नेट के दुपट्टे में उसका हुस्न छुपा नहीं छुप रहा था—और मुकाबिल अक़ाब की सी आँखों से उसे तक रहा था—
उसे ये अल्फ़ाज़ बेहद भले लगे थे—ये सत्ताइश…ये वालाहनापन और मुकाबिल की जज़्बे लटाती आँखें।
गाड़ी से निकलकर रेस्टोरेंट के अंदर जाने तक हर शख्स ने उसे अपनी नज़रों से सराहा था और अब सामने बैठे हर लड़के की नज़रें भी यही कह रही थीं—शज़ा हवाओं में उड़ रही थी—उसे एकदम से अपना आप अहम लगने लगा था—
मेरा नंबर ले लो—फिर बात होगी—
म्म—मेरे पास सेल नहीं है—मामा का नंबर है—
ओह—शिट—उसके चेहरे पर नाखुशगी आई पर वो फौरन ही संभल गया।
अच्छा इन्ही का दे दो—किसी लड़की के नाम से मेरा नंबर सेव कर लेना और दोस्त कह कर बात कर लेना—
मैं तुम्हें सेल गिफ्ट कर दूँगा—फिर कोई मसला नहीं होगा।
ज़मल खामोशी से जूस पी रही थी—
बाय—स्वीट हार्ट—
वो कहता हुआ वहाँ से उठ गया—
चलो चलें—
शज़ा—ज़मल उठ खड़ी हुई—
रास्ते भर वो उसे बॉयफ्रेंड को काबू में रखने के गुर बताती रही और वो सिर हिला हिला कर उसे सुनती रही—
कितना घटिया शब्द था ये—गर्लफ्रेंड—!!
जिसे पुराने ज़माने में लोंडी कहा जाता था—
लोंडी—औरत का कमतर दर्जा—जिनके आगे पीछे कोई नहीं होता था उन्हें लोंडी बना के बेच दिया जाता था—वो भी एक ही मालिक की ग़ुलाम होती थी—पर गर्लफ्रेंड—आज एक की तो कल दूसरे की होती है—उसे टिशू पेपर की तरह इस्तेमाल करके कूड़े दान में फेंक दिया जाता है—
कोरे काग़ज़ पर सिर्फ़ एक सियाह नुक्ता भी बदनमा लगता है।
किसी नामहरम से वाहियात गुफ़्तगू करके कभी ज़िन्दगी सुकून नहीं होती—आलूदा हो जाती है—
जैसे कचरे का कोई ढेर जिस पर ढेरों मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं—पर अक़ल के अंधों को बैक्टीरिया और वायरस तो नज़र आते हैं मगर—रूह की—लफ़्ज़ों की और अमल की गंदगी नहीं नज़र आती—
शज़ा इब्राहीम गंदगी के इस ढेर में खुद ही आकर गिर गई थी—उसकी सारी हस्सियात नकारा हो चुकी थीं—वो अपने जिस्म में फैलने वाली बदबू सोंग सकती थी और न ही किसी की आँखों में भरी ग़लाज़त—उसे किसी की गर्लफ्रेंड बनना था—सो वो बन गई थी—
शायद समाज उन लड़कियों को क़बूल नहीं करता जिनका कोई बॉयफ्रेंड नहीं होता…या लोग किसी लड़की की पाकबाज़ी का यकीन नहीं करते?
क्या ऐसी लड़कियाँ भी होती हैं जिन्होंने कभी अपनी समातों को किसी नामहरम की बेवजह की गुफ़्तगू से आलूदा नहीं किया हो? जिने कोई नामहरम से بلا वजह बात करने से और अपनी तहरीफ सुनने से घिन आती हो।
क्या ऐसी लड़कियाँ भी होती होंगी…?
पर उनकी पाकबाज़ी का यकीन कौन करेगा?
किसी को यकीन दिलाने की जरूरत ही क्या है? एक हस्ती है ना…जिसे कुछ बताने की जरूरत नहीं।


अब्दुल्ला को जब क़ैद में डाला गया तो उसके ह्वास शल से थे पर उसे हैरान था कि वो इतने हेबतनाक मंज़र देख कर भी जिंदा कैसे है?
वो बहुत देर चकराते सिर के साथ इस निम अंधेरे ग़ार में बैठा रहा—उसका पूरा बदन टेसीं मार रहा था और दमاغ बिल्कुल सुन हो चुका था—कानों में अजीब सी साईं साईं की आवाजें आ रही थीं—आंखें पूरी खुलने से क़ासर थीं—
वो जगह अत्यंत हेबतनाक और बदबूदार थी—फ़र्श पर सैलन थी—जिस दीवार से उसने टेक लगाई थी वो भी अजीब टेढ़ी मेढ़ी थी—
पता नहीं एक दिन गुजर गया था या एक रात—वक्त का कोई हिसाब नहीं था—ना रौशनी दिखाई दी थी ना
अंधेरा छटा था—महौल में कोई तबदीली नहीं आई थी—उसे लग रहा था कि वो किसी जहन्नम में क़ैद है।
वो इसी तरह शल सा वहां पड़ा था—लगता था उसका दमاغ काम करना छोड़ चुका है—
उसने अपना नाम याद करने की कोशिश की—
अब्द…अज़…बाज़…ल…अल…अबल—
टूटे फूटे शब्द उसके ज़ेहन में आ रहे थे—
अब्दुल…ल—
अब्दुल्ला—बिला अखीर बहुत देर ज़ेहन पर जोर डालने पर उसे अपना नाम याद आ गया—
अब्दुल्ला—हाँ—मेरा नाम अब्दुल्ला है—
अल्लाह—अल्लाह—हाँ वो तो है ना—
अल्लाह तो है—किधर है—? वो उठ कर पागलों की तरह दीवारें टटोलने लगा—
अल्लाह तो किधर है—? सामने आ—
लेकिन मैंने तो उसे देखा ही नहीं—तो पहचानूंगा कैसे—?
वो कैसा है—? उसने شدت से सोचा—पर ज़ेहन खाली था जैसे कोई कोरा काग़ज़—
अल्लाह—अल्लाह—वो जोर जोर से चिल्लाने लगा—
ग़ार में रौशनी बढ़ी और उसने चारों तरफ़ से बड़े बड़े अजधों को अपनी तरफ बढ़ते देखा—
वो खौफ से काँपने लगा—इसके ज़ेहन में एक दम धमाका हुआ—
अल्लाह—अल्लाह हू—अल्लाह हू ला इलाहा इलल्लाह—उसकी ज़बान पर आयत अलक़रसी जारी हो गई—वो अपनी पूरी ताकत से पढ़ रहा था—अब उसे कुछ कुछ समझ आने लगा था—वो कौन है—कहाँ है—और क्यों है—
वो पूरे यकीन और दिल की गहराइयों से हलक के बल आयत अलक़रसी पढ़ रहा था—
अजधें छोटे होते जा रहे थे और कुछ देर बाद उनको आग लग गई और वो धुंआ बन के फिजा में घुल गए—
कोई ताकत थी जो उसकी ज़बान को ना रुकने दे रही थी और ना थकने दे रही थी—
वो दीवाना वार आयत अलक़रसी का ورد कर रहा था—एक जोरदार धमाका हुआ और
ग़ार का पत्थर लड़़क गया—बाहर से रौशनी अंदर आने लगी—रास्ता मिलने पर वो بلا ताखीर भागा—
ग़ार से बाहर एक सुरंग नुमा रास्ता था जहां मुकम्मल रौशनी नहीं थी—सामने से बड़े बड़े जिन हाथों में लोहे के गरज़ उठा आए दौड़ते चले आ रहे थे—अब्दुल्ला ने अपनी पूरी ताकत और यकीन के साथ ورد जारी रखा—
हर गुजरते पल के साथ उसकी आवाज़ بلند होती जा रही थी और ताकत बढ़ती जा रही थी—
जो तू पढ़ रहा है उसे छोड़ दे—मैं कहता हूँ अभी बाज आ जा—वरना तेरा वो हश्र होगा कि एक बाल भी नहीं मिलेगा—उससे गर्जदार आवाज़ सुनाई दी—
पर वो अपनी धुन में था किसी की धमकी उस पर कोई असर नहीं दिखा रही थी—वो खौफ का सामना करके अब उससे आज़ाद हो चुका था—
उसे ऊँचा ऊँचा रोने पीटने और बीन करने की आवाज़ें आने लगी—वो सुरंग में भागता जा रहा था—आचनक से दादा जी सामने आ गए—
अब्दुल्ला बस कर—चुप हो जा—न पढ़—अब कुछ नहीं हो सकता—हम सब खत्म हो जाएंगे—बस कर…
वो नाकाम आवाज में कंधे झुका के उससे दुआस्तीन कर रहे थे—
दादा जी आप यहाँ? वो शशदर खड़ा था—

 

हां बेटा, देख अगर तू हम सब की भलाई चाहता है, तो जो ये कहते हैं, उसे मान ले… नहीं पढ़ बेटा… ये सब बहुत ताकतवर हैं। तू इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। दादाजी, आप ये सब कह रहे हैं? आप? जो मुझे हमेशा बहादुरी का पाठ पढ़ाते रहे हैं। मेरा अल्लाह इन सब से बड़ा और ताकतवर है और उसका क़लाम भी… इस वक़्त मैं आपकी बात नहीं मान सकता, उसने गुस्से से कहा। बुज़ुर्गों के जब अल्लाह के रास्ते से रोकने पर उनका हुक्म नहीं मानना चाहिए। हट जाइए मेरे रास्ते से। मेरा वक़्त बर्बाद मत कीजिए। वह कोई और ही अब्दुल्ला लग रहा था। उसका दिमाग अब तेजी से काम कर रहा था और उसकी इंद्रियां पूरी तरह से जागृत हो चुकी थीं। उसने आयतुल कुर्सी पढ़ कर अपने चारों ओर एक घेरे का निर्माण किया, अब कोई भी बुरी आत्मा इस घेरे के अंदर नहीं आ सकती थी। दादाजी ने जोर से चीख मारी और धुआं बन गए… उसे पूरा खेल समझ आ गया, वह दादाजी की छाया थी जो उसे गुमराह करने के लिए सामने आ खड़ी हुई थी। वह तेज़ी से सुरंग में दौड़ता जा रहा था। दोनों ओर जिन्नात ही जिन्नात थे। वह आग की लपटें उसकी तरफ़ फेंक रहे थे, जो उसकी फूँक से बुझती जा रही थीं और वे जिन्नात चीखते हुए धुंआ बन जाते। उसकी फूँक में क़लाम-ए-इलाही की तासीर थी। उसके सामने कौन दम मार सकता था? काफ़ी लंबा रास्ता तय करने के बाद वह एक मैदान में आ गया। वह एक बंजर रेगिस्तान था, जिसमें दूर-दूर झाड़ियाँ और रेत के बड़े-बड़े टीले थे। जाने यह समय का कौन सा पहर था। एक मद्धम सा अंधेरा हर जगह फैला हुआ था। सूखे और सड़े हुए पेड़ों के तने रेत में गड़े हुए थे। उनकी चरमराती शाखाएँ बिलकुल वीरान थीं। न कोई पत्ता, न कोई जीव-जन्तु। हर जगह खामोशी थी। अब्दुल्ला एक झाड़ी के पास ढेर हो गया। उसका वज़ा अभी भी उसकी ज़बान पर था, लेकिन आवाज़ मद्धम हो गई थी। रेत बहुत ठंडी थी, शायद यह रात का अंत था। उसने थक कर आँखें बंद कर लीं। इस वीराने में वह अकेला था। या अल्लाह… यह क्या हो गया मेरे साथ? पता नहीं मैं कहाँ हूँ और वापस कैसे जाऊँगा? वह दिल ही दिल में वीराने के मालिक से मुखातिब था। इस अकेलेपन में उसका एहसास तीव्र हो गया। कोई था जो यहाँ उसके बेहद करीब था, जिसे इतनी तीव्रता से उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। दुनिया के बेहंगम शोर-शराबे ने कभी अकेलेपन का मौका नहीं दिया था। बंद कमरे में भी कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ था। घड़ी की कृत्रिम टिक-टिक और आसपास की भौतिक वस्तुएं अकेलेपन में विघ्न डालती थीं। और दीवार के पार मौजूद घर के लोग अकेलेपन का मतलब स्पष्ट नहीं होने देते थे। कभी अपनी जात के साथ पूरी तरह से अकेलापन महसूस नहीं हुआ था। कभी खुद के साथ मिलकर बैठने का मौका नहीं मिला था। कभी अपने शह-रग से करीब मौजूद किसी जोड़ी की पहचान नहीं हुई थी। कभी पूरे ध्यान, यकीन और जोश से उसे जानने और महसूस करने का मौका नहीं मिला था। अब यह सब था। एक सीमा दृष्टि फैलाए हुए वीराना… झाड़ियों और मुरझाए पेड़ों से सजी ठंडी चुभती रेत। हवा का खामोश माहौल। मद्धम सा अजनबी अंधेरा। जिसमें वह अंधा होता जा रहा था और अपनी आँखें खोलकर सामने फैली दृश्य को देख रहा था। वहाँ वह था… और एक और था… बस वह था… और उसका खालिक़। वह अपनी धड़कनों को गिन सकता था और अपने फेफड़ों में आने-जाने वाली हवा में फर्क कर सकता था। उसे न भूख थी, न प्यास। वह बस किसी बे-जान लाश या मरने के कगार पर खड़े व्यक्ति जैसा वहाँ ढेर था। उसकी बेइख्तियार धड़कनों की तरह उसकी ज़बान भी बेइख्तियार हो गई थी और रुक नहीं रही थी, बस अपने खालिक़ के बोल दोहराए जा रही थी। शायद वह सालों से प्यासा थी। सालों से इंतजार कर रही थी कि वह इस क़लाम के सिवा कुछ और न बोले। वह खुद को एक ही ताल में मगन रखे। बहुत से पल सरक गए थे। अब्दुल्ला को वहाँ किसी ने न देखा था। सिर्फ वही देखता था, जिसका वह ‘अब्द’ था, गुलाम था। दाएँ से, बाएँ से, ऊपर से… और चारों ओर से वह उसे देखता था। झाड़ी में सरसराहट हुई थी, जो उसकी सुनवाई को जगा नहीं सकी। उस सरसराहट पैदा करने वाले रेंगते हुए अस्तित्व ने माथे पर रखी दो आँखों से… उस अस्तित्व को देखा। भले ही वह बहरा था पर उस अस्तित्व की ज़बान से निकलते शब्दों को सुन सकता था। इस वीरान रेगिस्तान में और कोई ऐसी ज़िंदा चीज़ नहीं थी, जिससे वह अपना ज़हर जमा सकता। उसे जीने के लिए ताजा लाल रक्त चाहिए था। उसका सरसराता हुआ शरीर झाड़ी से बाहर निकला और वह उसे लपेटते हुए फन फैलाए उसके चेहरे के बिल्कुल सामने खड़ा हो गया। वह झूम रहा था। ऐसा सुरूर कभी नशे की धारा में नहीं पाया था, जैसा अब उसकी ज़बान से निकलते शब्दों ने दिया। उस आवाज़ में लहर थी, नशा था। रंग और शराब की सी स्थिति थी। दो अस्तित्व एक-दूसरे के सामने, इसमें समाहित थे, एक बेखबर था और दूसरा ख़बरदार। उस रेगिस्तानी आकाश पर कालेपन के खत्म होने के संकेत दिखाई देने लगे थे। अंधेरे में इतनी सी राहत हुई थी कि अब आँखें फाड़-फाड़ कर नहीं देखनी पड़ रही थीं। हर क्षण सरक रहा था, काइनात का यह हिस्सा अपने रब के नूर से चमकने की तैयारी कर रहा था। बंद आँखों के सामने फैले अंधेरे में कुछ रौशनी की मिलावट हुई थी और धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। परदे उठ गए थे और सामने का दृश्य अब साफ़ हो रहा था। वह कुंडली मारे, उसके चेहरे के सामने फन फैलाए बैठा था। उसकी काली खाल और लंबा चौड़ा शरीर चमक रहा था। गुलाम के पूरे शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई। निरंतरता टूटने पर मांस का लोथड़ा भी स्थिर हो गया। उसने सामने की आँखों में आँखें डाल कर देखा। शराब खत्म हो चुकी थी। रँग और नशे की स्थिति फीकी पड़ने लगी। प्याले भरे हुए थे, पर छलकते नहीं थे। गुलाम अपने सामने बैठे उस काले कोबरा को निडर होकर देख रहा था। जो काफी देर से उसकी ज़बान से निकलने वाली अपने मालिक की तारीफों को सुनने में मगन था। जो उसके मालिक की प्रशंसा कर रहा था, वह उसे अपना ज़हर नहीं खिला सका था। उसने अपना फन ज़मीन पर रखा और लहराते हुए उसकी ओर पीठ करके चल पड़ा… बहुत दूर जाकर उसने पलटकर एक नज़र उस स्थिर बैठे गुलाम को देखा और फिर सरसराता हुआ गायब हो गया। एक रेगिस्तानी कोबरा उसे काटे बिना चला गया था। वह अशرف उल-मखलूकात नहीं था, पर अपने खालिक़ का एहसास रखता था। वह हिंसक और जहरीला था, पर अपने मालिक का नाफरमान नहीं था। उसे सिर्फ एक ही मालिक दिखता था और वह उसी पर भरोसा करता था। वह अशرف उल-मखलूकात नहीं था… कि अपने पैदा करने वाले को भूल जाता। या अपने ज़हर को किसी भलाई के लिए इस्तेमाल करता। वह जहरीला, हिंसक, दरिंदा और जानवर सब कुछ था, बेअकल था, पर… बेहोश नहीं था। नाफरमान नहीं था। अपने मालिक के अलावा किसी की तारीफ नहीं करता था। उसके सिवा किसी पर यकीन नहीं रखता था। पत्थरों को नहीं पूजता था। रेत में रेंगते हुए एक तुच्छ सा शरीर… अपने मालिक के नाम लेने वाले को कोई नुक्सान पहुँचाए बिना जा चुका था। गुलाम उसकी नज़रों से ओझल हो जाने तक उसे देखता रहा। फिर सूरज की उन छूने वाली किरणों में चारों ओर का जायज़ा लेने लगा। वह उठकर खड़ा हुआ और दाएँ दिशा में चलने लगा… हर जगह एक जैसी थी। झाड़ियों की शक्ल और आकार में कोई फर्क नहीं था। वह रेत में धंसते पैरों को घसीट-घसीटकर चल रहा था। कुछ कदम ही चला था कि वह घुटनों तक रेत में धंस गया। उसने मुश्किल से खींचकर खुद को बाहर निकाला। ठंडी रेत अब तपती जा रही थी। वह असमर्थ था। या अल्लाह… मुझे इस मुश्किल से निकाल दे। मैं क्या करूँ? वह थककर बैठ गया। लेकिन जलती रेत उसका शरीर काट रही थी। उसे निःशक्तता महसूस हो रही थी। शरीर की ताकत भूखा-प्यासा रहने से कम हो रही थी। बहुत दूर कुछ खजूर के पेड़ थे। उसे उस जलती रेत पर घिसटते हुए वहां तक पहुँचने का था।


मम्मी- अपना फोन दे दो, मुझे अपनी फ्रेंड से व्हाट्सएप पर कुछ नोट्स मँगवाने हैं। शजा, अभी तो फोन दे कर गई हो फिर मांगने आ गई हो? मम्मी आप भी तो सोने जा रही हैं, क्या करोगी फोन का? रात के दस बजे रहे हैं, तुम भी जाकर सो जाओ। भई, क्या बहस कर रही हो इस वक्त? इब्राहीम ने आदी नींद में कहा। साहिबजादी, आजकल फोन ज्यादा इस्तेमाल करने लगी है, पढ़ाई की तरफ जैसे ध्यान ही नहीं रहा। शम’अ, फुर्सत से बैठी थी, इसीलिए आज साहिबजादी की हरकतें शक्ल लग रही थीं। मम्मी, आप तो ऐसे ही… मैं तो पढ़ाई के लिए ही फोन लेती हूँ। वह भी ज़िद की पक्की थी। दे दो ना… क्यों बेकार की बहस लगाई हुई है। इब्राहीम दिन भर की थकावट से अब चिड़चिड़े हो रहे थे, नींद की वजह से। बाबा, आप मुझे फोन दे दो ना… अच्छा अच्छा… अब जाकर सो जाओ… कल बात करेंगे। वह करवट लेकर फिर से खर्राटे लेने लगे। शम’अ ने उसे घूरते हुए फोन उसके हाथ में थमा दिया। अफ, मम्मी, आपके नेल्स तो मुझसे भी लंबे हैं। उसे शम’अ के नुकीले नाखून चुभे थे। चलिए, ज्यादा दिमाग मत खाओ… वह फोन लेकर खुशी से छुपाती हुई कमरे में आ गई। उसका कमरा अलग था। बचपन में तो वह अक्सर दादी के कमरे में ही सोती थी, पर अब पढ़ाई का बहाना था, वह रात भर लाईट जलाए रखती थी। दादी को रोशनी में नींद नहीं आती थी, इसलिए मजबूरी में उसका कमरा अलग किया गया था। अब वह स्वतंत्र थी। उसे तबारिज से बात करनी थी। धड़कते दिल के साथ उसने मैसेज किया। वह तो जैसे इंतजार में था। फौरन उसकी कॉल आ गई। उसने चेहरा कम्बल के अंदर कर लिया ताकि आवाज बाहर न जाए। दूसरी तरफ से उसकी चंचल और मीठी आवाज़ गूंजी। उसके दिल की धड़कन और तेज हो गई। रात धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थी, समय का कोई एहसास नहीं हुआ। वह दो घंटे बातें करते रहे।

एक तीसरा— जो हर जगह मौजूद होता है, वह हर एक शब्द का प्रमाण रख रहा था- हर एक हरकत को अपने नादیدہ कैमरे में कैद कर रहा था- और फैसले के दिन उसने हर एक ऑडियो और वीडियो को सबूत के तौर पर सामने लाना है- सारे गवाह और सबूत अपराधी के खिलाफ होंगे और वह अपनी सफाई में कुछ न कह पाएगा- जो खुद अपने लिए बेइज्जती का रास्ता चुन चुका है, किसी के सामने अपना सम्मान गिरवी रख चुका है- उसके लिए उस दिन भी बेइज्जती होगी- जब बंद कमरों में हुए हर काम को एक दुनिया भर की एलसीडी पर दिखाया जाएगा।

इन बंद कमरों की हर दीवार पर लिखा जाना चाहिए— “ध्यान रखो, कैमरे की आँख तुम्हें देख रही है।”

जब जुबान, खाल, उंगलियाँ, आँखें, कान सभी गवाही देंगे और दिल की तरह बेबस होंगे- उसका बस नहीं चलेगा कि उन्हें रोक दे या चुप करा दे- अपराधियों के सिर झुके होंगे और उन्हें उनके ठिकानों पर खींच कर ले जाया जाएगा- जो अपने रब के सामने खड़े होने से नहीं डरते थे, जो खुद को उससे छुपाते थे, फिर मخلوق के सामने बेइज्जत होंगे।

हाँ, लेकिन जो सच्ची तौबा कर ले, जो अपनी हिदायत के लिए दुआ करे, उसके लिए गुमराही के रास्ते कठिन हो जाएंगे- जो हिदायत नहीं माँगेगा, उसे वह नहीं मिलेगी। “والمن خاف مقام ربه جنتین”
और जो अपने रब के सामने खड़े होने से डरता है, उसके लिए दो जन्नतें हैं।

उसने कॉल और मेसेज के सारे प्रमाण मिटा दिए और फोन साइड टेबल पर रख कर सोने के लिए लेट गई-
लेकिन अब नींद कहाँ आनी थी- दो घंटे की बातचीत को सोचते हुए शायद रात ही खत्म हो जाए।

वह धीमे-धीमे मुस्कुराते हुए उसकी बातें सोच रही थी- एक नशा था या जादू जो सिर चढ़कर बोल रहा था- हराम का नशा जिसने उसे हर चीज़ की सही-गलत और अच्छे-बुरे का फर्क भुला दिया था।

हर वह चीज़ जो आदत बन जाए और धीरे-धीरे इंसान को निगल जाए, उसकी हया, इंसानियत, शराफत, सेहत, और मासूमियत को चाट जाए, नशा होती है- वह चाहे किसी के शब्द हों या कोई खाने-पीने की चीज़ हो।

यूं ही वह लगभग रोज़ बहाने बना कर शमा से फोन ले लेती थी- और अब वह उसकी आदत होती जा रही थी- उसके बिना उसे चैन नहीं आता था-

“शज़ा, मैं तुम्हें फोन देना चाहता हूँ, तुम आज मुझसे मिलने आओ।”

“अभी–? पर कैसे–?”

“रात के ग्यारह बजे मैं कैसे आ सकती हूँ?”

“छत पर आ सकती हो?”

“छत पर–? मगर क्यों?”

“मैं कह रहा हूँ ना–”

“तुमने मुझसे वादा किया था कि मेरी हर बात मानी जाएगी– सवाल मत करो, नकारो मत।”

“हाँ, ठीक है, सॉरी–”

“मैं आ रही हूँ।”

वह चप्पल पहन कर खड़ी हुई, सेल जर्सी की जेब में डाली और अत्यधिक सावधानी से दरवाजा खोला।

बाहर कोई नहीं था- वह धीरे-धीरे लिविंग रूम में आई- सभी के कमरे के दरवाजे बंद थे और लाइट्स भी ऑफ थीं।

और वह उतनी ही सावधानी से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

जैसे ही उसने छत का दरवाजा खोला, ठंडी हवा का एक झोंका उसके शरीर में समा गया।

सर्दी का मौसम शुरू हो चुका था और बर्फीली हवाएँ साईं साईं कर रही थीं।

उसने पलट कर दरवाजा बंद किया और चौड़ी छत पर बिना कोई आवाज़ किए चलने लगी- दूर तक फैले घरों में कहीं कहीं रोशनी और कहीं अंधेरा था- एक अंधेरा, दूसरा अकेलापन और सर्दी ने उसे कांपने पर मजबूर कर दिया।

वह छत के बीच में खड़ी थी।

उसने कॉल करने के लिए सेल फोन निकाला–

“मैं यहाँ हूँ–” उसकी पीठ से आवाज़ आई-

हमारे डर से शज़ा की घिग्गी बंध गई।

शज़ा ने पलट कर देखा- उसकी गहरी नीली आँखें मुस्कुरा रही थीं और हल्के भूरे बाल हवा में उड़ रहे थे- वह ग्रे जीन्स की जेब में हाथ डाले खड़ा था- गहरे बैंगनी रंग की शर्ट का ग्रीबन खुला था- गर्दन से सोने की मोटी चेन चिपकी थी- चाँद की रोशनी उसकी एक साइड पर पड़ रही थी-

“तुम यहाँ–?” उसके लहजे में हैरानी थी।

“हाँ, मैं यहाँ– क्या मुझे यहाँ आना अच्छा नहीं लगा?”

वह उसके पास आया और उसका हाथ थाम लिया- जो बर्फ की तरह ठंडा था।

“पर तुम कैसे—?” “बस, नो मोर क्वेश्चंस—”

उसने उसके होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप कर दिया- और उसकी आँखों में देखने लगा।

वह जैसे चारों ओर से बेखबर हो गई थी- मंद चाँदनी में नीली आँखों में उसका प्रतिबिंब दिख रहा था- वह मगन थी।

“अब बस करो— नजर लगाओगी?”

उसने उसकी मगनता तोड़ी-

वह नज़रें चुराने लगी-

“यह लो तुम्हारा सेल फोन– इसमें सिम लगाकर मैंने अपना नंबर सेव कर लिया है- तुम यह नंबर किसी को नहीं दोगी- सिर्फ मुझसे बात करोगी।”

“और अगर घरवालों को पता चल गया—?”

“नहीं, पता नहीं चलेगा- तुम इसे छिपा कर रखना और साइलेंट मोड पर लगा के वाइब्रेशन पर रखना- ताकि मेरे फोन का पता चल जाए।”

“थैंक यू—”

“अरे, थैंक यू किस बात का– तुम्हारे लिए तो क्या है सब कुछ?”

वह जोर से हंसा—

“आहिस्ता– कोई आ न जाए—” उसने सीढ़ियों के दरवाजे की तरफ डर से देखा-

“कोई नहीं आएगा- तुम्हारे घर वाले सो रहे हैं–”

“चलो यहाँ बैठो बातें करते हैं—”

उसने उसे पकड़ कर एक आधा टूटा हुआ सोफा पर बिठाया- जो पता नहीं कब से यहाँ कबाड़े में पड़ा था-

“डर क्यों रही हो—? मैं हूँ ना—”

उसके सिर से चादर सरक गई थी- और अब लटें हवा से खेल रही थीं-

उसने उसकी एक लट को अपनी अंगुली पर लपेटते हुए कहा–

“मैं हूँ ना…” और वह उसी ठंडी हवा में खुद को उड़ता हुआ महसूस करने लगी।

वे बहुत देर वहाँ बैठे रहे- चाँद उन्हें निहारते हुए ऊँचा उठता जा रहा था और वे उसके सामने बेज़ार होते जा रहे थे।

 

फासला नाम के लिए रह गया था- शर्म और हया अपना सामान बांध रही थी- शज़ा पूरी तरह से भावनाओं के जाल में फँस चुकी थी- अब शिकारी ने उसके पंख काटने थे।

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