रात के तीन बज रहे थे। वह इशा की नमाज के बाद से ही जानमाज़ पर बैठी थी। सिर झुकाए, कभी शून्य में घूरती, वह तसबीह के दाने गिराती जा रही थी। अब तो उसकी आँखें भी सूख चुकी थीं, ऐसा लग रहा था जैसे वह अपना सारा पानी बहा चुकी हो।
अब वे डरावनी हद तक खाली लग रही थीं। यह तीसरी रात थी जब वह इसी तरह बैठी हुई थी। उसे उसी पल का इंतज़ार था जब उसके इस विर्द (प्रार्थना) का मकसद पूरा होना था। आज इस घर का हर शख्स उसके साथ जाग रहा था। कुछ दिन पहले इस घर पर एक छोटी कयामत टूट पड़ी थी, और वह, जिसे इसका जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, खुद को लगातार तकलीफ में डाले हुए थी।
हर कोई खामोशी से बीतते हुए हर पल को गिन रहा था। हर घड़ी इतनी भारी लग रही थी कि सब उसका बोझ उठाते-उठाते थक चुके थे।
एक वही थी, जो अब वक्त के हिसाब-किताब से बेपरवाह हो गई थी।
उसका दिल धड़क-धड़क कर रुक सा जाता। सब किसी अनहोनी के इंतजार में थे। एक अनहोनी तो पहले ही हो चुकी थी। अब भी सब कुछ इतना अजीब लग रहा था कि अगर कोई बाहर का व्यक्ति सुन लेता, तो कहता कि इब्राहीम विला का हर शख्स पागल हो गया है, बेतुकी बातें कर रहा है। लेकिन, उन पर जो बीत चुकी थी, उसे कोई कैसे समझता?
घड़ी की सुई धीरे-धीरे ढाई से साढ़े तीन बजाने के लिए बढ़ रही थी। लिविंग रूम में बैठे सभी लोग अपनी जगह स्थिर थे। जैसे ही सुई छह पर पहुँची, लॉन से ज़ोरदार धमाके की आवाज़ आई—जैसे किसी ने कोई भारी पत्थर दे मारा हो। पूरे विला की दीवारें और फर्श हिल गए थे।
उसके मुँह से निकला—
“हाय, मेरी बच्ची!”
वह उठकर दौड़ पड़ी। ऐसा लग रहा था कि जो इतने समय से गुमसुम बैठी थी, अब होश में आ गई थी।
“रुक जाओ शमा! अपनी जगह से मत हिलो!”
सफ़िया बीबी ने चीखकर कहा।
इब्राहीम ने तेज़ी से दौड़कर उसे पकड़ा।
“मत जाओ! क्यों अपनी और हमारी जान की दुश्मन बनी हो?”
उसने ज़बरदस्ती उसे पकड़कर वापस जानमाज़ पर बैठा दिया।
“देखो, सारा किया-धरा बर्बाद हो जाएगा, तुम अपना समय पूरा करो!”
वह फिर से तेज़ी से तसबीह के दाने गिराने लगी।
अब बाहर अजीबो-गरीब आवाज़ें उठ रही थीं, जैसे वहाँ कोई भयंकर लड़ाई छिड़ी हो। फिर कोड़े बरसाने की आवाज़ें आने लगीं—साथ ही शिज़ा की दिल दहला देने वाली चीखें, जो रात की खामोशी को चीरती और भी भयानक बन रही थीं।
“मम्मा! बचाओ! मम्मा! प्लीज़!”
उसकी गिड़गिड़ाती हुई आवाज़ ने शमा को फिर से विचलित कर दिया।
वह पूरी ताकत से उठकर भागी।
इब्राहीम ने उसे पकड़ लिया, लेकिन वह उसकी पकड़ से छूट गई।
“जिब्राईल! पकड़ो उसे!”
तीनों आदमी दौड़कर आए और माँ को पकड़ लिया। बाहर की चीखों में और भीषणता आ गई थी।
“मुझे जाने दो! वह… वह मर जाएगी!”
वह चार लोगों की पकड़ में भी नहीं आ रही थी। जाने उसमें इतनी ताकत कहाँ से आ गई थी!
“नहीं मरेगी! होश में आओ!”
इब्राहीम ने उसे ज़ोर से खींचा।
“मम्मा! मम्मा! मैं मर जाऊँगी! मुझे बचा लो!”
बाहर से आती हुई चीखों में और भी तीव्रता आ गई थी।
शमा ने इब्राहीम को ज़ोर से धक्का दिया, जिससे फ़ाइज़ और फ़ाइक भी गिर पड़े।
जिब्राईल के बाज़ू पर उसने ज़ोर से काटा और फिर लिविंग रूम का दरवाजा खोलकर बाहर भाग गई।
आगे जो होने वाला था, उसे सोचकर सबकी रूह कांप गई।
उसके लंबे काले बाल बिखरे हुए थे। आँखें सुर्ख अंगारे जैसी जल रही थीं। लाल रंग का अजीब सा लिबास उसके पैरों तक लहरा रहा था।
वह खड़ी होकर उसे घूर रही थी।
“शिज़ा! तुम ठीक हो?”
वह लड़खड़ाते क़दमों से उसकी ओर बढ़ी। शिज़ा ने कोई हरकत नहीं की।
“क्यों बुलाया मुझे?”
उसकी भारी, डरावनी आवाज़ सुनकर शमा का दिल दहल गया।
“इधर आओ मेरे पास, मेरी बच्ची!”
वह, जो अब तक पत्थर बनी खड़ी थी, अचानक बिजली की गति से आगे बढ़ी और शमा के बाल पकड़ लिए।
“छोड़ो! यह क्या कर रही हो, शिज़ा?”
शमा ने भागने की कोशिश की, लेकिन उसने एक झटके में उसे ज़मीन पर पटक दिया और बालों से पकड़कर घसीटने लगी।
शमा की चीखें सबकी रूह निकालने के लिए काफ़ी थीं।
लिविंग रूम के दरवाज़े पर खड़े लोग यह भयानक मंजर देख रहे थे।
“अम्मा! अम्मा! वह मार डालेगी उसे!”
इब्राहीम ने सुन्न खड़ी सफ़िया को झंझोड़ा।
“सब पढ़ो! वही जो वह पढ़ रही थी!”
सफ़िया ज़ोर से चिल्लाई।
सब ऊँची आवाज़ में आयतुल कुर्सी पढ़ने लगे।
“अब्दुल्लाह! आज तुम इतनी देर से आए हो, मैं तुमसे बात नहीं करूँगी!”
“मेरी प्यारी परी! अब तो मेरी खातिर आ ही गई हो, फिर ये गुस्सा क्यों?”
वह बाइक पेड़ के पास खड़ी करके उसके पास एक बड़े पत्थर पर बैठ गया।
“बस, आज प्रैक्टिकल बहुत मुश्किल था, इसलिए देर हो गई।”
“तुम हमेशा बहाने बनाते हो!”
वह गुस्से में मुँह फुलाए बैठी थी।
“परी! कभी-कभी मुझे लगता है कि तुम सच में कोई परी हो।”
“तुम हर रूप में इतनी खूबसूरत लगती हो कि मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता! या फिर शायद तुम जन्नत की कोई हूर हो!”
“तुम लड़के इतनी मीठी-मीठी बातें कैसे बना लेते हो?”
वह खिलखिला कर हँस पड़ी। उसके सफेद मोती जैसे दाँत उसके चेहरे पर बहुत प्यारे लग रहे थे।
“जैसे तुम लड़कियाँ उन पर यक़ीन कर लेती हो!”
वह उसे टकटकी लगाए देख रहा था।
“मुझे बाकी लड़कियों से मत मिलाना, मैं उनसे अलग हूँ!”
“ऐसा क्या देख रहे हो? पहली बार देखा है क्या?”
वह शरारत से मुस्कुराई।
जिब्राईल ने दिल पर हाथ रखा
“हाय! तुम्हारी अदाएँ कितनी कातिल हैं… तुम इतनी खूबसूरत क्यों हो, परी? आज बता ही दो…” उसने जुनून भरे अंदाज़ में उसके चेहरे पर गिरी काली लट हटाई। उसने अपनी नीली आँखें झुका लीं। सफेद दुपट्टे में छिपा गुलाबी चेहरा और उस पर वो गहरी नीली आँखें… ऐसा लग रहा था जैसे सफेद बादलों के पीछे से झाँकता नीला आसमान।
वो दोनों इस छोटी-सी घाटी में आमने-सामने बैठे थे। आस-पास दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। दो पहाड़ियों के बीच यह हरी-भरी घाटी थी, जहाँ स्ट्रॉबेरी की बेलें फैली हुई थीं और कुछ पेड़ खड़े थे। पहाड़ियाँ फूलों और बेलों से ढकी थीं, और उनके पार बस्ती थी।
अज़ान की आवाज़ गूँजी। वह उठ खड़ी हुई।
“मैं चलती हूँ।”
“मैं छोड़ आऊँ तुम्हें?”
“नहीं, मैं चली जाऊँगी, कोई देख लेगा।”
“रोज़ जो चोरी-छिपे घर से निकल आती हो, तब कोई नहीं देखता?”
वह अपने मुँह पर हाथ रखकर हँस दी। उसकी सफेद कलाई में खनकती लाल चूड़ियाँ बज उठीं, और वह उसी लम्हे में कैद होकर रह गया।
उसके साथ बिताया हर पल जिब्राईल के लिए एक हसीन ख़्वाब था। सफेद दुपट्टे से उसके घुटनों तक आते घने काले बाल झलक रहे थे। वह जाते हुए एक ठहराव और रफ्तार के साथ पहाड़ी पर चढ़ रही थी।
जिब्राईल ने अपनी बाइक स्टार्ट की और घर की राह ली। अभी उसे लंबा सफर तय करना था।
“बहू, फाइज़ और फ़ाइक अभी तक घर नहीं आए?”
“खाला, आ जाएँगे, बाहर ही खेल रहे होंगे।”
उसने ग्राहक की भौंहों पर थ्रेड चलाते हुए लापरवाही से जवाब दिया।
“तुमसे कितनी बार कहा है कि बच्चों को मगरिब (सूर्यास्त) से पहले घर बुला लिया करो। पर तुम्हें तो इस पार्लर से फुर्सत ही नहीं मिलती!”
“खाला, आप ऐसे ही वहम करती रहती हैं, कुछ नहीं होता!”
“अरे, वहम नहीं करती, सच्ची कह रही हूँ। तुम मुझसे ज्यादा पढ़ी-लिखी हो, लेकिन तुमने किताबों में यह नहीं पढ़ा? हमारे सच्चे नबी (ﷺ) ने फरमाया है कि मगरिब के वक़्त बच्चों को गलियों में मत छोड़ो, उस समय जिन्नात वहाँ से गुजरते हैं और नुकसान पहुँचा सकते हैं!”
“गली में खेलना बच्चों के लिए ठीक नहीं। यही वजह है कि आजकल के बच्चे ज़िद्दी और बदतमीज़ होते जा रहे हैं।”
“हाय अल्लाह, मैं ही जाकर देखती हूँ!”
शमा चुप रही और सफ़िया बेगम बाहर चल दीं।
लाउंज से गुजरते हुए सफ़िया ने छह साल की पोती शज़ा को देखा, जो पूरी तल्लीनता से इंडियन ड्रामा देख रही थी।
गेट तक पहुँची ही थीं कि फाइज़ और फ़ाइक मिट्टी में सने घर में दाखिल हुए। उनके गंदे हाथों में कुरकुरे, पापड़ और न जाने क्या-क्या भरा था।
“कहाँ थे तुम दोनों?”
“दादो, खेलने गए थे!”
फ़ाइक ने हँसते हुए जवाब दिया। दूध के दाँत टॉफी खाकर गिर चुके थे, अब बस नाम मात्र के बचे थे।
“तुम लोगों को स्कूल में नहीं सिखाया कि खाना खाने से पहले हाथ धोते हैं?”
“दादो, बार-बार हाथ नहीं धोते, पानी ज़ाया होता है!”
“टीचर कहती हैं, पानी ज़ाया करना गुनाह होता है!”
“और साबुन भी!” फ़ाइज़ ने मुँह में पापड़ ठूंसते हुए कहा।
दादी ने अपना माथा पीट लिया।
“चलो अंदर जाकर कपड़े बदलो!” उन्होंने दोनों के कान मरोड़े।
“अरे-अरे, जा तो रहे हैं! कान टूट गया तो हम बाली कहाँ पहनेंगे?”
“हाय तौबा! कैसी बातें कर रहे हो?”
“दादो, आजकल फैशन है, लड़के भी बाली पहनते हैं!”
वे कान छुड़ाकर भाग गए। दोनों जुड़वाँ थे, शक्ल से लेकर हरकतें तक एक जैसी।
“ये तो हाथ से निकलते जा रहे हैं। या अल्लाह, इन्हें हिदायत दे!”
दादी ने दुआ की और अंदर चली गईं।
शज़ा अभी भी ड्रामे में डूबी थी। तभी दोनों लड़कों ने रिमोट छीनकर अपना पसंदीदा कार्टून लगा दिया। तीनों के बीच जबरदस्त लड़ाई छिड़ गई।
“क्यों जंगली जानवरों की तरह लड़ रहे हो? छोड़ दो एक-दूसरे को!”
दादी ने उन्हें अलग करने की कोशिश की।
शोर सुनकर शमा बाहर आई और सबको दो-दो घूंसे जड़ दिए।
“कमबख्तों, और कोई काम नहीं आता? चलो कमरे में जाकर होमवर्क करो!”
उसने दोनों को घसीटते हुए उठाया, लेकिन वे बेफिक्री से हँस रहे थे।
“शज़ा, तुम्हारी तो मैं हड्डियाँ तोड़ दूँगी! बंद करो ये तमाशा! पूरा दिन टीवी में घुसी रहती हो!”
“आदत भी तो तुमने ही लगाई है, अब उसे दोष दे रही हो? क्या यह पैदा होते ही टीवी देखने लगी थी?”
पीछे से दादी ने टोक दिया।
यह तो इस घर का रोज़ का किस्सा था।
बच्चों की पिटाई, जिससे वे और भी ज़िद्दी होते जा रहे थे। पर माँ को कोई और तरीका नहीं आता था।
“जिब्राईल, बेटे, सो जाओ, बहुत पढ़ाई कर ली।”
दादी ने प्यार से अपने बड़े पोते से कहा, जो शाम से अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था।
“दादो, कल मेरा ग्रैंड टेस्ट है और मुझे सबसे अच्छे नंबर लाने हैं!”
“इंशा अल्लाह।”
उन्होंने उसके घने बालों पर प्यार से हाथ फेरा।
चारों भाई-बहनों में नौ साल का जिब्राईल सबसे बड़ा था और सबसे आज्ञाकारी। वह फजर के वक्त दादी और पिता के साथ उठ जाता था और मस्जिद में नमाज़ पढ़ता था।
बाकी भाई-बहन और माँ स्कूल जाने के वक़्त ही उठते थे। तब घर में अफरा-तफरी मच जाती थी। दादी पहले ही नाश्ता बना देती थीं। फिर किसी की किताब गुम हो जाती, कोई होमवर्क भूल जाता, और किसी का लंच किसी और के बैग में चला जाता।
फाइज़ और फ़ाइक नर्सरी में थे और टीचर से बदतमीज़ी करना उनका शौक था। शज़ा पहली कक्षा में थी और पहले से ही उसकी ज़ुबान तेज़ थी।
दादी कोशिश करती थीं कि बच्चों को सुधारें, पर वे छोटे-छोटे शैतान थे।
जिब्राईल की परवरिश उनके प्यार और अनुशासन की वजह से अच्छी हुई थी। वह हमेशा अपनी चीज़ें सँभालकर रखता था।
उसके दादा गाँव में ही रहते थे और लोग उन्हें “मास्टर अयूब” कहते थे। सब उनकी बहुत इज्जत करते थे।
पर अब दादी छोटे बेटे इब्राहीम के साथ शहर आ गई थीं ताकि बच्चों को उनकी देखभाल मिले। शमा भी यही चाहती थी कि सास बच्चों की परवरिश करे।
लेकिन बच्चे किसी की सुनते ही नहीं थे…
प्यारे प्यारे बच्चो,
कहानी सुनोगे?
जी मास्टर जी!
सभी बच्चे उत्सुकता से उनके सामने धूप में पालथी मारकर बैठे थे।
दिसंबर का महीना था और चारों ओर हल्की सुनहरी धूप फैली हुई थी। आज बादल नदारद थे।
“पिछली बार मैंने तुम्हें बाबा आदम और अम्मा हव्वा की कहानी सुनाई थी, याद है ना?”
“जी याद है!”
“तो बताओ, क्या याद है?” मास्टर जी ने मुस्कुराते हुए उनके मासूम चेहरों की तरफ देखा।
“आपने बताया था कि अल्लाह तआला ने आदम अलैहिस्सलाम और अम्मा हव्वा को बनाया और वे जन्नत में रहते थे। फिर शैतान ने उन्हें बहका दिया, उन्होंने नाफरमानी की और उन्हें धरती पर भेज दिया गया।”
एक छह-सात साल के बच्चे ने पूरे जोश से बताया।
“शैतान ने भी तो नाफरमानी की थी, उसने सजदा करने से इनकार कर दिया था और घमंड व जलन की थी,”
एक और बच्चे ने आगे बढ़कर बात पूरी की।
“बिल्कुल सही, शाबाश!”
“शैतान ने तकब्बुर (घमंड) किया था, लेकिन घमंड और गुरूर करना सिर्फ अल्लाह को ही शोभा देता है। अगर कोई इंसान या दूसरी मख़लूक़ (प्राणी) यह काम करे, तो अल्लाह नाराज़ हो जाते हैं।
अल्लाह बहुत बड़ा है और हम सब उसके सामने बहुत छोटे हैं।”
“लेकिन मास्टर जी, हम सब तो छोटे हैं, आप तो बहुत बड़े हैं!”
एक बच्ची खड़े होकर बोली और बाकी सब बच्चे हंसने लगे।
“नहीं बेटा, मैं तो बस कद और उम्र में बड़ा हो गया हूँ, अंदर से तो मैं तुम सबसे भी छोटा हूँ!”
“हैं? वो कैसे मास्टर जी?”
एक बच्चा हैरान होकर बोला।
“देखो न, मैं सब कुछ जानता हूँ – अच्छा-बुरा, गुनाह-नेक़ी। फिर भी कभी-कभी जानबूझकर गुनाह कर बैठता हूँ।
कभी खुद को दूसरों से बेहतर समझ लेता हूँ, यह सोचता हूँ कि मैं सबसे ज्यादा अक़्लमंद और इल्म वाला हूँ।
तो बताओ, मैं अंदर से छोटा हुआ कि नहीं?”
“जो अपने आपको दूसरों से बड़ा समझता है, असल में वही सबसे छोटा होता है।
दूसरों को छोटा और खुद को बड़ा समझना बहुत बुरी बात है।”
“तो फिर बड़ा कौन होता है?”
एक बच्चे ने उत्सुकता से पूछा।
“जो दूसरों की अच्छाइयाँ और अपनी बुराइयाँ देखता है, वही बड़ा होता है।”
“मास्टर जी, बड़े कैसे बनते हैं?”
एक और बच्चे ने सवाल किया।
“मेरे बच्चे, बड़ा बनने के लिए खुद को बहुत छोटा बनाना पड़ता है!”
“वो कैसे?”
उनका कौतूहल (जिज्ञासा) बढ़ता जा रहा था।
“ऐसे कि बिना किसी स्वार्थ के हर किसी के काम आओ।
अगर किसी को तुम्हारी ज़रूरत हो, तो उसकी मदद करो।
घमंड में आकर किसी की मदद से इनकार मत करो।
सबसे अच्छे अंदाज़ में पेश आओ, हंसकर मिलो।
किसी के लिए बुरा मत सोचो और न ही अपने दिल में किसी के लिए नफरत रखो।
अगर कोई तुम्हारे साथ बुरा करे, तो उसे अल्लाह पर छोड़ दो, क्योंकि वही सबसे बेहतर फैसला करने वाला है।”
“मास्टर जी, बड़े बनने के लिए इतने सारे काम करने पड़ते हैं?”
एक बच्चे ने सिर खुजलाते हुए कहा।
“हाँ बेटा, लेकिन ये सारे काम बहुत आसान हैं। बस अपने अंदर विनम्रता (अज़मत) ले आओ, तो ये सब अपने आप होता जाएगा।”
“बच्चे, ये सब बड़ा बनने के लिए करना पड़ता है, बड़ा होने के लिए नहीं!”
“तो मास्टर जी, बड़ा होने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता?”
“नहीं बेटा, बड़ा होना तो कुदरत का नियम है। हर ज़िंदा चीज़ अपनी उम्र और समय के साथ बढ़ती रहती है।
बड़ा होने के लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, बस खाओ, पियो और जियो!”
“बस! यह तो बहुत आसान है, मैं तो यही करूंगा!”
एक आलसी बच्चा बोला।
मास्टर जी हंस पड़े।
“मास्टर जी, शैतान के बच्चे कैसे होते हैं?”
एक बच्चे को एक नया सवाल सूझा।
“वे भी शैतान की तरह होते हैं!
जो सबको तंग करते हैं, बहकाते हैं, बच्चों से शरारत करवाते हैं।
ये जिन, भूत और चुड़ैलें, ये सब शैतान के बच्चे हैं।
हर इंसान के साथ एक शैतान भी पैदा होता है, जो उसके मरने तक उसके साथ रहता है और उसे गुमराह करता रहता है।”
“मैं उस शैतान के बच्चे को बहुत मारूंगा! मास्टर जी, वो कहाँ है? मुझे बताइए!”
एक मोटा सा बच्चा अपनी बाहें चढ़ाते हुए बोला।
“अरे! ऐसे नहीं मरेगा वो!”
“तो फिर कैसे मरेगा?”
उसका जोश ठंडा पड़ गया और वह मायूस होकर बोला।
“जो दुआएं तुमने सीखी हैं –
बाथरूम जाने की दुआ, खाना खाने की, घर से बाहर जाने की, आयतुल-कुर्सी,
कुरआन पढ़ना और नमाज़ पढ़ना –
अगर तुम यह सब करते रहोगे, तो वो तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा!”
“और बाथरूम जाने की दुआ तो जरूर पढ़ा करो, क्योंकि वहाँ बहुत गंदे जिन रहते हैं।
वो तुम्हें देखते हैं और फिर तुम्हारे साथ ही चिपक जाते हैं।
वे तुम्हें बीमारियों, बुरे कामों और परेशानियों में डाल देते हैं।
जिसकी वजह से इंसान की ज़िंदगी जहन्नुम बन जाती है।
बहुत कम लोगों को इस बात का पता है और ज़िंदगी की बहुत सी मुश्किलों की यही असली वजह होती है।
अब तुम सबको यह बात बतानी है और यह दुआ सिखानी है!”
“मास्टर जी, क्या सच में बाथरूम में जिन होते हैं?”
एक बच्चा घबराकर बोला।
“हाँ बेटा, तभी तो बाथरूम की दुआ सिखाई गई है।
अगर यह झूठ होता, तो हदीस में इसका ज़िक्र न मिलता।”
“तुम्हें पता है इस दुआ का मतलब क्या है?”
सभी बच्चों ने सिर ना में हिला दिया।
“اللھم انی اعوذبک من الخبث والخبائث”
“ऐ अल्लाह! मुझे नर और मादा जिन्नातों से बचा।”
“तो इससे साबित होता है कि जिन्न वाकई होते हैं!”
इतने में छुट्टी की घंटी बज गई।
“अरे! मैं तो कहानी सुना रहा था, और बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई!”
“अब तो छुट्टी का वक्त हो गया, चलो सब अपनी चीज़ें समेट लो।”
“मास्टर जी, आप बहुत अच्छे हैं!”
एक बच्चा बोला।
मास्टर जी ने प्यार से उसका गाल खींचा,
“और तुम बहुत प्यारे हो!”
बच्चे अपने बैग उठाए अपने-अपने घर जा रहे थे,
और मास्टर जी संतोष के साथ उन्हें देख रहे थे।
वो एक सरकारी स्कूल के रिटायर्ड मास्टर थे।
वह रोज़ उसी रास्ते से कॉलेज जाता था।
एक दिन उसने वहाँ से गुज़रते हुए देखा कि उस छोटी-सी घाटी में रंग-बिरंगे परिंदों का झुंड उतरा हुआ था। वह बाइक रोककर बेख़याली में उस दिशा में बढ़ गया।
नीले रंग की दो पहाड़ियों के बीच यह एक बेहद ख़ूबसूरत घाटी थी।
यह सड़क से थोड़ी हटकर थी। वहाँ खुबानी, बादाम और अखरोट के कुछ पेड़ थे। एक ओर छोटी-सी नदी थी, जो ऊपर से गिरते झरने से प्राकृतिक रूप से बनी थी।
उसके किनारे बेहद ख़ूबसूरत जंगली फूल उगे हुए थे। नदी का पानी इतना साफ़ था कि इसकी तह तक साफ़ नज़र आ रही थी। परिंदे उस पानी से अपनी प्यास बुझा रहे थे।
नदी के किनारे कुछ छोटे-बड़े पत्थर इतने सलीके से रखे थे कि ऐसा लगता था जैसे कोई वहाँ बैठता है।
इस जगह में एक अजीब सा जादू था।
अगस्त का महीना था, और मौसम में हल्की ठंडक घुलने लगी थी।
अब्दुल्लाह कुछ देर वहाँ बैठा रहा। उसे वहाँ एक अजीब सा सुकून महसूस हुआ।
अचानक, उसके लबों पर खुद-ब-खुद नात आ गई।
वह बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ का मालिक था। उसकी आवाज़ सुनने वाले को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
कुछ देर बाद उसकी नज़र पहाड़ी की चोटी पर खड़ी एक लड़की पर पड़ी।
वह उसी को देख रही थी।
लाल कपड़ों में लिपटी वह सच में किसी परी जैसी लग रही थी।
अब्दुल्लाह उसकी ख़ूबसूरती देखता रह गया।
उस पूरे इलाके में और उसके अपने परिवार में भी सब लोग गोरे-चिट्टे थे, पर उस लड़की की रंगत तो जैसे चाँदी को भी मात दे रही थी।
और उसकी गहरी नीली आँखें…
इतनी गहरी कि समझ ही नहीं आता था कि पहाड़ों ने उसकी आँखों का रंग चुराया है या उसने पहाड़ों से यह रंग उधार लिया है!
उसके चेहरे पर नक़ाब था, सिर्फ़ उसकी आँखें और उसके सफ़ेद, काँच जैसे हाथ नज़र आ रहे थे।
कुछ देर तक वे दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
जब अब्दुल्लाह की नात खत्म हुई, तो वह लड़की भी वापस मुड़ गई।
अब्दुल्लाह वहीं बैठा रहा। उसे खुद नहीं पता था कि वह इस तरह क्यों ठहर गया था।
पर जब वहाँ से उठा, तो किसी अजीब-से ख़ुमार में डूबा हुआ था।
अगले दिन, उसके क़दम खुद-ब-खुद फिर उसी ओर चल पड़े।
वह वहाँ पहुँचा और फिर से नात पढ़ी।
और वह लड़की फिर से उसी जगह खड़ी थी।
बस उसे देख रही थी।
ऐसा अगले कई दिनों तक चलता रहा।
अब अब्दुल्लाह को उसकी खामोशी बेचैन करने लगी थी।
वह उससे बात करना चाहता था, किसी भी क़ीमत पर।
लेकिन वह कभी कोई जवाब नहीं देती थी, बस सुनने आ जाती थी।
यकीनन, उसका घर पहाड़ी के दूसरी तरफ़ होगा, अब्दुल्लाह ने सोचा।
उस दिन उसने ठान लिया कि आज वह उस पहाड़ी पर चढ़ेगा और उस लड़की से मिलेगा।
वह पहाड़ी पर चढ़ने लगा।
ठीक वहीं पहुँच गया, जहाँ वह रोज़ खड़ी होती थी।
उसने रुक कर साँस दुरुस्त किया, फिर आगे बढ़ने लगा।
“रुक जाओ!”
अचानक, एक मीठी और दिलकश आवाज़ हवा में बिखर गई।
अब्दुल्लाह ठिठक गया। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उसने इसे अपना वहम समझकर फिर से चढ़ाई शुरू की।
“रुक जाओ वहीं! आगे मत बढ़ना… अच्छा नहीं होगा।”
आवाज़ दूसरी तरफ की ढलान से आ रही थी। इतने में वही लड़की उधर से आती दिखाई दी। आज उसने काला लिबास पहना था, और उसकी चाँदी जैसी रंगत उसमें इतनी दमक रही थी कि आँखें चौंधिया गईं। वह धीरे-धीरे क़दम बढ़ा रही थी। वह उसे देखता ही रहा। नज़र हटने का नाम नहीं ले रही थी।
“मैं आपसे बात करना चाहता हूँ।” जब वह करीब आई तो अब्दुल्लाह की डर-डर कर आवाज़ निकली। “क्यों?” “आप रोज़ मेरी आवाज़ सुनते ही इस पहाड़ी पर आ जाती हैं, अगर मैं पूछूँ क्यों?” “मुझे तुम्हारी आवाज़ बहुत पसंद है। मैं खुद को यहाँ आने से रोक नहीं पाती।” उसने आसानी से स्वीकार कर लिया। “और मुझे आप बहुत अच्छी लगती हैं।” उसके स्वीकार करने से उसे भी हौसला मिल गया।
वह हँसी, “अच्छा, सोच लो… वापसी का रास्ता नहीं मिलेगा।” “सोच लिया। इतने दिनों से और क्या किया है, बस यही सोचा है… आप को… और आप के बारे में… और कुछ सूझता ही नहीं।” “तुम तो काफी गंभीर लगते हो।” वह हँसते हुए बोली।
वह ढलान पर बैठ गई और सोचती नज़रों से सामने खड़ी नीली पहाड़ी को देखने लगी। “हाँ, मैं बहुत गंभीर हो गया हूँ… मुझे आप से… मुझे…” वह हिचकिचाया। उसने नीली आँखें उठाकर उसे सवालिया नज़रों से देखा। “तुम्हें मुझ से…?” “मैं… समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ…” उसने नज़रें झुका लीं और जूते से नीचे पड़े पत्थर को कुचलने लगा। वह उठकर उसके सामने आ खड़ी हुई और सीधा उसकी शहद जैसी आँखों में देखने लगी। वह बिना पलक झपकाए उसकी नीली आँखों में देखता रहा।
“तुम्हें… मुझ से…” “मोहब्बत हो गई है… यही कहना चाहते हो न?” उसने हैरानी में सिर हिलाया। “मैं तुम्हें कुछ दिन देती हूँ, अच्छी तरह सोच लो, क्योंकि तुमने एक गलत जगह दिल लगाया है।” यह कहकर वह रुकी नहीं और बिजली की तेज़ी से चलती हुई पहाड़ी के दूसरी ओर उतरती चली गई। वह वहीं खड़ा रह गया, हैरान और परेशान। अगले कई दिनों तक वह उसे नहीं दिखी। उसकी आवाज़ सुनकर भी वह नहीं आई। वह पागलों की तरह रोज़ जाकर वहाँ बैठा रहता। आखिरकार, उसका घर ढूँढने के इरादे से वह पहाड़ी पर चढ़ने लगा तो उसकी आवाज़ सुनाई दी।
“अब्दुल्लाह।” उसने देखा, वह सफेद लिबास पहने उसके पीछे खड़ी थी। “आपको मेरा नाम कैसे पता चला?” वह खुलकर हँसी। “बताऊँगी, पर अभी नहीं।” “मैं तुम्हें आज़मा रही थी और तुम इस आज़माइश में कामयाब हो गए।”
उसने चेहरे से नक़ाब हटा दिया। उसके गुलाबी होंठ, चाँदी सा चमकता चेहरा, गहरी नीलम जैसी आँखें और दिलकश हुस्न देखकर वह साँस लेना ही भूल गया।
“नज़र लगा दोगे क्या?” “आप इतनी खूबसूरत क्यों हैं?” वह दीवानगी में बोला। “हाहाहा।” उसकी हँसी में भी एक सुर था।
“आपका नाम क्या है?” “जो तुम रख दो।” वह बेख़याली में बोली। “परी।” उसके मुँह से झट से निकला। “ठीक है, आज से मैं तुम्हारी परी।” वह ऐसे कह रही थी जैसे वे सदियों से एक-दूसरे को जानते हों।
अब्दुल्लाह अपनी क़िस्मत पर नाज़ कर रहा था। वह अपने काम से काम रखने वाला इंसान था। उसकी तबीयत में लापरवाही या बचपने की कोई बात नहीं थी। कॉलेज में उसकी क्लास की लड़कियाँ एक से बढ़कर एक थीं, लेकिन आज तक कोई भी उसे प्रभावित नहीं कर पाई थी। पर यह लड़की सीधा उसके दिल में उतर गई थी।
स्कूल का रिजल्ट डे और दादी का ग़ुस्सा
दादी सफ़िया सुबह के वक़्त ज़िक्र में मशगूल थीं। बाहर निकलीं तो देखा कि बच्चे मज़े से टीवी देख रहे थे। “अरे बहू, नौ बज गए हैं, आज बच्चों को स्कूल नहीं जाना?” शज़ा ने झट से चैनल बदल दिया। जाने क्या चल रहा था, जो दादी के देखने में हरज था।
“दादू, आज हमारा रिजल्ट डे है, देर से जाना है।” “अच्छा, हाँ, तुमने बताया था, मैं भूल गई। तुम्हारी माँ किधर है?” “मामा तो पार्लर में दुल्हन बना रही हैं।”
“हैं? दुल्हन बना रही है?” “अरे दादू, किसी लड़की का मेकअप कर रही हैं, उसे दुल्हन बना रही हैं।” शज़ा ने माथा पीटा।
थोड़ी देर बाद, सफ़िया स्कूल पहुँचीं। वहाँ उन्होंने शज़ा को स्टेज पर देखा, जहाँ वह किसी हीरो के साथ भारतीय गाने पर डांस कर रही थी। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था। स्टेज से उतरते ही उन्होंने शज़ा को ज़ोरदार थप्पड़ लगाया। “शर्म नहीं आती तुझे?”
“दादू, मैंने क्या किया?” “अगर अब तूने यह सब किया तो मैं तुझे स्कूल से हटा लूँगी।”
घर लौटने पर सफ़िया ने अपने बेटे इब्राहीम को सारी बात बताई। “बेटा, अगर अभी से बच्चों को सही-गलत नहीं सिखाया तो बड़े होकर क्या समझेंगे?” इब्राहीम ने गंभीरता से सुना और कहा, “माँ जी, आप ठीक कह रही हैं। मैं शमा से इस बारे में बात करूँगा।”
सफ़िया ने समझाया, “लेकिन बहू से लड़ाई मत करना, प्यार से समझाना।” “आप बेफिक्र रहें माँ जी, और अपनी परवरिश पर भरोसा रखें।”
इब्राहीम ने माँ को तसल्ली दी और अपने कमरे की तरफ चला गया।

