शज़ा बेटा, उठ जाओ, शाम हो गई है।
शमा ने प्यार से उसके बालों को समेटते हुए उसे जगाया।
“अब तबीयत कैसी है? सर दर्द ठीक है?”
काफी देर तक वह खाली-खाली निगाहों से अपनी माँ को देखती रही, फिर धीरे से बोली—
“पानी…”
इस कड़ाके की सर्दी में भी उसे प्यास लग रही थी। शमा ने अपने हाथों से उसे पानी पिलाया।
“सर दर्द ठीक है ना?” उसने उसका बुखार चेक किया। अब बुखार उतर चुका था।
शज़ा ने हल्के से सिर हिला दिया।
“शुक्र है…”
वह देखने में तो ठीक लग रही थी, लेकिन अब भी गुमसुम थी।
“अच्छा, मैं तुम्हारे लिए सूप लाती हूँ।”
कुछ देर बाद शमा उसके लिए सूप ले आई और चम्मच से उसे पिलाने लगी।
शज़ा एक स्वस्थ, गोरी-गुलाबी गालों वाली, शहद जैसी आँखों वाली और कमर तक लंबे, घने काले बालों वाली प्यारी-सी बच्ची थी, जो पहली ही नजर में लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। ऊपर से उसकी शरारतें और अपनी उम्र से बड़ी बातें करना तो सोने पर सुहागा था।
उसकी दादी, सफ़िया, तो अक्सर उसकी नज़र उतारा करती थीं। सफ़ोरा भी ऐसी ही खूबसूरत बच्ची थी, बस उसके बाल भूरे रंग के थे। दोनों देखने में काफी हद तक एक जैसी थीं, लेकिन आदतें थोड़ी अलग थीं।
सफ़ोरा अभी सात साल की थी और उसे दुपट्टा ओढ़ने की आदत थी। वह हमेशा सिर ढककर रखती थी, जैसा कि इस घर की परंपरा थी। लेकिन शज़ा तो इंडियन हीरोइनों की नकल करने की कोशिश में अपनी जुल्फें खुली रखती थी। कुछ उसे शमा की ओर से भी छूट मिली हुई थी।
दादी बार-बार कहती थीं, लेकिन बहू पर कोई असर नहीं होता था—
“हमारे ज़माने में औरतें सिर ढककर रखती थीं, तभी घर में बरकत होती थी। औरत की बेपर्दगी से समाज में बहुत-सी बुराइयों को बढ़ावा मिलता है। जो लड़कियाँ खुले बाल रखती हैं, उन पर जिन-भूत आशिक हो जाते हैं।”
बड़ी-बूढ़ियों का कहना था कि जब औरतें सिर खुला रखेंगी, तो घर और समाज से बरकत उठ जाएगी, और बेइज़्ज़ती व बेहयाई बढ़ जाएगी। क्योंकि एक क़ौम की परवरिश की ज़िम्मेदारी माँओं पर होती है।
लेकिन शमा जवाब देती—
“ख़ाला, ये सब पुरानी बातें और अंधविश्वास हैं। इनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है।”
“अरे, तुम्हें कौन समझाए? जब तक ठोकर नहीं लगती, तब तक किसी को अक्ल नहीं आती। नहीं तो सारी नसीहतें बेकार लगती हैं।”
और बात वहीं खत्म हो जाती। शमा तो फैशन और मॉडर्निज़्म की दीवानी थी। उसे इन दकियानूसी बातों से क्या लेना-देना था।
शज़ा अब भी पूरी तरह होश में नहीं आई थी। उसे सिर पर भारीपन सा महसूस हो रहा था। कुछ देर तक वह ठीक रही, लेकिन रात को फिर से उसका सिर दर्द शुरू हो गया। और इस बार इतना तेज़ था कि वह रोने के साथ-साथ चीखने भी लगी।
एक छह साल की बच्ची के लिए ऐसा दर्द सहना नामुमकिन था। अब मास्टर अय्यूब के घर में शज़ा की चीखें गूंज रही थीं। शमा उसका सिर दबा रही थी और चुप करवाने की कोशिश कर रही थी। पूरा घर वहां जमा था। सबके चेहरों पर चिंता साफ़ झलक रही थी।
“मुझे हवेली जाना है!”
उसने रोते हुए और चीखों के बीच ज़िद पकड़ ली।
शमा के लिए उसे संभालना मुश्किल हो गया। वह उसकी गोद से मछली की तरह फड़फड़ा रही थी।
“मुझे हवेली… जाना है… मुझे वहाँ खेलना है… भैया… मुझे घर नहीं जाना…”
वह बेतरतीब बातें कर रही थी।
वे सब अब्दुल्ला की ओर बढ़ते चले आ रहे थे। उसका दिल दहलने लगा। वह पेड़ के सामने खड़ा हो गया और परी उसके पीछे थी।
उनके घर के सामने ऊबड़-खाबड़ ज़मीन वाला एक मैदान था, जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अलग-अलग तरह के पेड़ लगे हुए थे। और इस वक्त तो सब कुछ बर्फ़ से ढका हुआ था।
अब्दुल्ला ने मन ही मन अल्लाह से मदद मांगी।
“भैया, किससे बातें कर रहे थे?”
“किसी… किसी से भी नहीं।”
वह पेड़ के और करीब चला गया।
हातिम पेड़ के पीछे घूमकर गया।
“यहाँ तो कुछ भी नहीं है, भाइयो!”
अब्दुल्ला ने पलटकर देखा— परी वहां नहीं थी!
उसे ज़ोरदार झटका लगा।
“सिर्फ़ दो मिनट में वह कहाँ जा सकती है?”
बाक़ी पेड़ तो यहाँ से बहुत दूर थे। उसकी छठी इंद्रिय ने किसी अनहोनी का एहसास दिलाया।
“अच्छा चलो, बहुत खेल लिया। अब घर चलते हैं, इससे पहले कि दादाजी हमें ढूँढने आ जाएं।”
उसने उनका ध्यान हटाने के लिए बहाना बनाया।
“ओके भैया, चलो! अब तो बहुत भूख भी लग रही है।”
वे सब सड़क पार करके घर के अंदर चले गए।
अब्दुल्ला सबसे पीछे था। उसे ऐसा लगा कि परी उसे पुकार रही है।
उसने मुड़कर देखा— वह वही थी, उसी पेड़ के पास!
बाकी सब घर के अंदर जा चुके थे। अब्दुल्ला ने गेट बंद किया और भागता हुआ उसके पास पहुँचा।
वह सफ़ेद कपड़ों में इस सफ़ेद नज़ारे के बीच खड़ी थी, मुस्कुरा रही थी। और इसी दृश्य का एक हिस्सा लग रही थी, जैसे किसी महान चित्रकार ने इसे बड़ी खूबसूरती से बनाया हो।
“तुम अभी यहाँ नहीं थी… अब…?”
उसने ध्यान से उसे देखा।
“मैं छुप गई थी! तुम्हारे भाइयों के इरादे मुझे कुछ ख़तरनाक लग रहे थे।”
वह हंस पड़ी।
“परी, तुम क्या हो? आज सच-सच बता दो। मुझे अंधेरे में मत रखो।”
वह मानसिक तनाव में लग रहा था।
“लड़की हूँ और क्या हूँ?”
“नहीं, तुम आम लड़कियों जैसी नहीं हो। तुम्हारे अंदर कुछ असामान्य और अजीब बात है।”
वह उसके हाथ पकड़ने ही वाला था कि रुक गया।
“असामान्य तो मैं बिल्कुल नहीं हूँ। मैं बहुत खास हूँ!”
वह मुस्कराई।
“देखो, मज़ाक मत करो! सच-सच बताओ। वरना मैं खुद से सोच-सोचकर पागल हो जाऊंगा। तुम दो मिनट में यहाँ से कैसे गायब हो सकती हो? और इस मैदान में ऐसी कोई जगह भी नहीं जहाँ तुम इतनी जल्दी छुप सको। और तुम इतनी दूर अकेली कैसे आ जाती हो?”
वह चुपचाप उसे देख रही थी।
“मुझे देर हो रही है, मैं जा रही हूँ।”
“तुम ऐसे नहीं जा सकती।”
“कल मिलते हैं। शायद तब तुम्हारे सारे सवालों के जवाब भी मिल जाएं।”
वह संजीदगी से बोली और तेज़ी से चलती हुई दूर चली गई।
वह वहीं खड़ा उसे देखता रहा, जब तक कि वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गई।
फिर वह छोटे-छोटे क़दमों से घर की ओर चल पड़ा।
यह सब तो उससे पहले ही अंदर चले गए थे और दादा जी ने उन्हें आते देख भी लिया था। उन्होंने बता दिया था कि वे बाहर खेलने गए थे। उनका मूड अच्छा था, इसलिए उन्होंने किसी को डांटा नहीं।
वह सीधे अपने कमरे में चला गया, कम्बल ओढ़े बस उसी के बारे में सोच रहा था।
“कहीं वह सच में कोई परी तो नहीं? मुझे तो वह इंसानों जैसी नहीं लगती!”
उसके मन में हज़ारों खयाल उमड़ रहे थे।
“पर यह कैसे हो सकता है? ऐसा तो सिर्फ कहानियों और फिल्मों में होता है! असल ज़िंदगी में कोई इंसान परियों से कैसे मिल सकता है? हाँ, सुना था कि लड़कियों पर जिन आ जाते हैं, लेकिन यह सब क्या है?”
उसने अपना सिर पकड़ लिया।
वह बहुत देर तक जाने क्या-क्या सोचता रहा और इन्हीं उलझनों में डूबते-डूबते उसे नींद आ गई।
शज़ा के मुँह से हवेली का नाम सुनकर दादा जी चौंक गए।
अब्दुल्ला की आँख किसी शोर से खुली। वह कुछ देर तक समझने की कोशिश करता रहा कि वह कहाँ है और यह शोर कैसा है।
फिर उसे शज़ा के जोर-जोर से रोने की आवाज़ सुनाई दी। रात के सात बज रहे थे, ठंडी सर्दियों की रात थी और चारों ओर सन्नाटा था। वह फौरन बिस्तर से निकला और वहाँ पहुँच गया।
दादा जी शज़ा के सिर पर हाथ रखकर दुआ पढ़ रहे थे। उसकी चीखें और रोना धीरे-धीरे कम होता जा रहा था।
“क्या हुआ शज़ा को?”
उसने घबराकर पूछा।
दादा जी ने उसे एक गहरी नज़र से देखा और फिर दुआ पढ़ते रहे। अब शज़ा धीरे-धीरे शांत हो रही थी। पूरा घर वहाँ इकट्ठा था, लेकिन सब चुपचाप खड़े थे।
दुआ के असर से वह पूरी तरह शांत होकर सो गई। सबने अल्लाह का शुक्र अदा किया।
“शमा, तुम इसके पास ही रहना और इसे अकेले कहीं मत जाने देना,” उन्होंने बहू को हिदायत दी।
“जी अच्छा,” शमा ने सिर हिलाया।
“अब्दुल्ला, मेरे साथ आओ।”
दादा जी की आवाज़ में गहरी गंभीरता थी।
वह चुपचाप उनके पीछे चल पड़ा।
“क्या तुम शज़ा को हवेली लेकर गए थे?”
दादा जी की एक खास आदत थी कि वे किसी भी बच्चे को दूसरों के सामने डांटने के बजाय उसे अकेले में बुलाकर समझाते थे। इससे बच्चों की इज्जत बनी रहती थी और उन्हें अपनी गलती का अहसास भी हो जाता था।
“नहीं दादा जी, मैं उसे लेकर नहीं गया। वह खुद चली गई थी।”
अब्दुल्ला ने उन्हें सब कुछ सच-सच बता दिया।
“दादा जी, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं। मैंने पूरी कोशिश की थी कि वह हवेली में जाने से पहले ही उसे रोक लूँ, लेकिन मैं कामयाब नहीं हो सका।”
उसने अफसोस के साथ सिर झुका लिया।
“तुम्हें मुझे बताना चाहिए था!”
दादा जी ने गहरी सांस ली।
“वह हवेली इतने सालों से वीरान पड़ी है। पता नहीं वहाँ कैसी-कैसी बलाएँ और मुसीबतें बसी होंगी! अब इस बच्ची पर किसी बुरी ताकत का असर हो गया है। हवेली की नकारात्मक ऊर्जा ने उसे जकड़ लिया है।”
उन्होंने चिंतित स्वर में कहा।
“लेकिन दादा जी, क्या ये सब सच में होता है?”
अब्दुल्ला को यकीन नहीं हो रहा था। “मैंने तो सिर्फ कहानियों में सुना था!”
“हाँ, बेटे, यह दुनिया सिर्फ इंसानों की नहीं है। हमारे साथ और भी बहुत-सी मखलूक़ात रहती हैं। जिन्नात भी इंसानों की तरह अलग-अलग होते हैं—कुछ अच्छे और कुछ बुरे।”
“कुछ जिन्न मुसलमान होते हैं और कुछ काफिर। और जो शरारती जिन्न होते हैं, उनका मकसद सिर्फ इंसानों को तकलीफ देना होता है। वे हमसे जलते हैं, हमें गुमराह करते हैं और हमारी ज़िंदगी में परेशानियाँ खड़ी करते हैं।”
“तो क्या कुछ जिन्न अच्छे भी होते हैं?”
“हाँ, होते हैं, लेकिन बेटा, उनकी न दोस्ती अच्छी होती है और न ही दुश्मनी।”
अब्दुल्ला मंत्रमुग्ध होकर उनकी बातें सुन रहा था।
“जिन्नात भी हमारी तरह ज़िंदगी जीते हैं—वे खाते-पीते हैं, काम करते हैं, और यहाँ तक कि इंसानों के रूप में कारोबार भी चला सकते हैं। लेकिन उनकी खुराक हमसे अलग होती है।”
“कैसे?” अब्दुल्ला की आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
“कुछ जिन्न सिर्फ खुशबू और धुएँ से अपना पेट भरते हैं, तो कुछ इंसानों के साथ खानों में शरीक होते हैं।”
“क्या यह सच है?”
“हाँ, और एक राज़ की बात बताऊँ?”
दादा जी की आँखों में एक चमक थी।
“क्या?”
“इंसान की बहुत-सी परेशानियों और बीमारियों की जड़ उसकी خورाक होती है।”
“वो कैसे?”
“आजकल के लोग बाहर का खाना खाना फैशन समझते हैं। होटल्स और रेस्टोरेंट्स में जाने को शान मानते हैं। लेकिन वे यह नहीं सोचते कि वहाँ जो खाना बनता है, वह साफ-सुथरा भी है या नहीं। रोज़ टीवी पर दिखाया जाता है कि होटलों में कितनी गंदगी होती है, फिर भी लोग ललचाकर वहाँ जाते हैं।”
अब्दुल्ला गौर से सुन रहा था।
“जो लोग होटल में खाना पकाते हैं, वे सिर्फ अपने पैसे बनाने की नीयत से पकाते हैं, उनमें बरकत नहीं होती। और बेटा, नीयत का बहुत असर होता है।”
“कैसे?”
“एक हदीस में कहा गया है कि हर अमल का दारोमदार नीयत पर होता है। और किसी समझदार का भी कहना है कि ‘कौमों का फैसला उनके दस्तरख़ान पर होता है।’ यानी इंसान जो खाता है, उसका सीधा असर उसकी सोच और उसके स्वभाव पर पड़ता है।”
“जितनी मोहब्बत और ख़याल से तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए खाना बनाती होगी—साफ़-सफ़ाई, तुम्हारी पसंद और सेहत का ध्यान रखते हुए—उतना तो कोई पेशेवर शेफ भी नहीं बना सकता। और दूसरी बात, बाहर के खाने में सिर्फ़ तात्कालिक स्वाद और ज़बान का चटखारा होता है, उनमें असली पोषण नहीं होता। ऐसे खाने से कोई ताकत नहीं मिलती।”
“जितना अधिक मसालेदार और चिकना खाना, कोल्ड ड्रिंक्स वगैरह इंसान खाता है, उतना ही उसका मिजाज बिगड़ता जाता है। आजकल के बच्चों से इसलिए ही तहज़ीब, शराफ़त और हया खत्म होती जा रही है। वे उम्र से पहले ही मानसिक और शारीरिक रूप से बड़े हो जाते हैं।”
“हमने अपने बच्चों के हाथों में पापड़, टॉफ़ी, नमकीन और इस तरह की बेकार चीज़ें पकड़ा दी हैं। कभी माता-पिता इन चीज़ों के नुकसान के बारे में सोचते भी नहीं।”
“कभी उन विकसित देशों पर रिसर्च करो, जो वैज्ञानिक और बड़े-बड़े स्कॉलर्स को जन्म देते हैं। देखो कि वे क्या खाते हैं और अपने बच्चों को क्या खिलाते हैं। हम प्राकृतिक और सेहतमंद खाने से बहुत दूर हो गए हैं। और फिर शिकायत करते हैं कि बच्चे पढ़ते नहीं, दिमाग़ी तौर पर कमजोर हैं, बदतमीज़ी करते हैं, बड़ों की बात नहीं मानते, हर वक्त शरारतें करते हैं। फिर हम उन्हें सुधारने के लिए मारपीट करने लगते हैं, लेकिन असली वजह नहीं ढूंढते।”
“हम खुद भी तरह-तरह की बीमारियों का शिकार हो चुके हैं। जो कमाया, वह डॉक्टरों की जेब में डाल दिया, लेकिन अपनी दिनचर्या नहीं बदली। हाय! पता नहीं कब हमें अक़्ल आएगी!”
“एक फ़िलॉस्फ़र का मशहूर क़ौल है—’अगर स्वस्थ जीवन चाहते हो, तो अपनी खुराक को ही अपनी दवा बना लो।'”
“अब तुम खुद ही फ़र्क़ देख लो अपने भाइयों और अपने चाचा इब्राहीम के बच्चों के मिज़ाज में। मैंने कभी तुम्हें इन बेकार चीज़ों का आदी नहीं बनाया और आज लोग तुम्हारी शरीफ़ी और फ़रमाबरदारी की मिसाल देते हैं।”
अब्दुल्ला यह सब सुनकर अंदर ही अंदर शर्मिंदा हो गया।
“हाँ, तो मैं क्या कह रहा था?”
“आप जिन्नात की बात कर रहे थे।”
“हाँ… कुछ बदजिन्नात गंदगी और बदबू से अपनी खुराक हासिल करते हैं और शौचालय जैसी गंदी जगहें उनका ठिकाना होती हैं।”
अब्दुल्ला हैरानी से यह सब सुन रहा था।
“हम अगर नमाज़, क़ुरआन की तिलावत और सुन्नत की दुआओं का एहतमाम करें, तो इनकी शरारतों से बच सकते हैं।”
“ये आपस में बहुत जलन रखते हैं, एक-दूसरे पर जादू करते हैं और इंसानों से भी ज्यादा लड़ाई-झगड़ा करते हैं। क्योंकि ये आग और धुएं से बने होते हैं और आग का काम जलाना होता है।”
“और वे भी हम इंसानों से उतना ही डरते हैं, जितना हम उनसे डरते हैं। अगर इंसान उनसे डर जाए, तो वे उस पर हावी हो जाते हैं। लेकिन अगर इंसान न डरे, तो वे खुद ही डरकर भाग जाते हैं।”
“दादा जी, आपको ये सब जानकारी कहाँ से मिली?”
“बेटा, बहुत कुछ तो हमारी पाक किताब से, और बाकी एक बहुत ही प्रामाणिक स्रोत से, जिसमें कोई शक नहीं।”
अब्दुल्ला हैरानी से उन्हें देख रहा था।
“बात कहाँ से कहाँ चली गई! दुआ पढ़ने से शज़ा तो ठीक हो गई है, मगर वह शरारती जिन उसे बार-बार तंग करेगा। कुछ करना पड़ेगा। और जब तक बच्चे यहाँ हैं, तुम्हें ध्यान रखना है कि कोई दोबारा उस ओर न जाए।”
“ठीक है, दादा जी,” उसने फ़रमाबरदारी से सिर हिलाया।
“इसका मतलब है कि परी भी…”
दादा जी की बातों से अंदाजा यही हो रहा था।
“कल तो उससे पूछकर ही रहूंगा!”
उसने ठान लिया और सो गया। अगली सुबह का उसे बेसब्री से इंतजार था।
रात की सियाही को सुबह की रोशनी ने छीन लिया था। अगला दिन अपनी पूरी रौनक़ के साथ उगा था। कहीं सूरज अपनी तमाम चमक के साथ दमक रहा था, लेकिन इस इलाके से जैसे नाराज़ था। कहीं चाँद अभी भी आसमान में दिखाई दे रहा था, और धरती पर बहते पानी में उसका अक्स हल्के-हल्के तैर रहा था। और कहीं दोपहर की धूप चटख थी।
यह भी कुदरत का ही निज़ाम है, जो इख़्तिलाफ़ (अंतर) पर क़ायम है। और यही कायनात की ख़ूबसूरती भी है। इंसानों के मिज़ाज और आदतों का अंतर भी कुदरत की ही देन है, वरना एकरूपता (एक जैसी चीज़ें) तो बोरियत पैदा कर देती है। एक ही ढंग से तो सिर्फ़ जानवर ही जी सकते हैं।
शज़ा आज पहले से काफ़ी बेहतर थी और दिनभर खेल-कूद में मशगूल रही।
अब्दुल्ला चार बजे से पहले ही सेब के बाग में जाकर बैठ गया था। उसे आज परी का शिद्दत से इंतजार था।
वह तय वक़्त पर बाग़ के अंदर दाखिल हुई। वह काफ़ी गंभीर और उदास लग रही थी। भूरा रंग का लिबास उसकी उदासी को और बढ़ा रहा था।
वह उसके करीब एक पत्थर पर बैठ गई।
“परी…”
“हूँ…”
“क्या सोच रही हो?”
“कुछ नहीं।”
“तुम पूछो, क्या पूछना है। तुम्हें हर सवाल का जवाब मिलेगा। उसके बाद तुम्हारी मर्ज़ी, चाहे तो छोड़ दो या अपना लो। लेकिन पहले बर्दाश्त करने की हिम्मत तो पैदा कर लो।”
अब्दुल्ला का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
“तुम्हारा असली नाम क्या है?”
“ज़ैनब शाहसवार।”
“कहाँ रहती हो?”
“इसी पहाड़ी के पीछे। वैसे तो कहीं भी रह सकती हूँ।”
अगला सवाल पूछने के लिए उसने हिम्मत जुटाई…
“तुम इंसानों के क़बीले से नहीं हो, ना?”
“नहीं… मैं जिन्नात के क़बीले से हूँ। मैं इंसान नहीं हूँ।”
अब्दुल्ला का शक़ सही निकला। उसका दिमाग़ सुन्न हो गया।
“और कुछ…?”
वह कह रही थी, लेकिन अब्दुल्ला के कानों में सन्नाटा गूंज रहा था।
वह एक जिन्नी से इश्क कर बैठा था!
“कहा था ना… बर्दाश्त नहीं कर पाओगे।”
वह पागलों की तरह उसे देख रहा था। अचानक उस पर डर की एक लहर दौड़ गई।
उसके सामने एक जिन्नी खड़ी थी!
वह वहीँ खड़े-खड़े उसकी आँखों के सामने ग़ायब हो गई। और वह चक्कर खाकर बेहोश हो गया…
वह बहुत मजबूत आत्मविश्वास वाला इंसान था। लेकिन कभी-कभी जिंदगी ऐसी धोखा देती है कि इंसान मुँह के बल ज़मीन पर गिर जाता है। यह अचानक मिला हुआ सदमा अब्दुल्ला के होश उड़ा चुका था।
वह कुछ देर वहीं बेहोश पड़ा रहा। अब उसे धीरे-धीरे होश आ रहा था। ज़मीन बहुत ठंडी थी। और उतनी ही ठंडी थी उस पर होने वाला… उद्घाटन।
“परी…परी…तुम कहाँ हो?” वह चकराते सिर के साथ बड़बड़ाया।
“ओह परी… तुम सच में…!” वह सिर थाम कर बैठ गया। मौसम की ठंड ने उसके होश और भी छितरा दिए थे।
“यह कैसा मजाक है, या अल्लाह!”
उसने नज़र उठाकर आसमान की ओर देखा। वहाँ केवल दो रंग थे। सफेद और काला… और इन दोनों रंगों के मिश्रण से बनती घटाएँ और तैरते हुए बादल। उसकी नज़र वापस लौट आई। हर तरफ झिलमिलाहट थी, रंग थे।
उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि जिस सुंदरता की देवी को वह चाहता था, वह कोई इंसान नहीं बल्कि एक जिन्न है, जो कोई भी रूप बदल सकती है। उसका असली चेहरा क्या था, वह नहीं जानता था।
अब्दुल्ला पेड़ का तना पकड़ कर खड़ा हुआ। ठंड से उसकी टाँगें सुन्न हो रही थीं। वह धीमी गति से घर की ओर बढ़ने लगा।
एक इंसान और जिन्न की शादी कैसे हो सकती है? …लेकिन दादी अम्मा की कहानियों में तो ऐसा होता था। लेकिन… जिंदगी तो एक जीती जागती हकीकत है, कहानी नहीं।
तरह-तरह के सवाल उसके दिमाग में उथल-पुथल मचाए हुए थे।
“अगर वह अचानक गायब हो गई? मुझे हमेशा के लिए छोड़ गई? तो क्या होगा? मैं उसे कहाँ ढूँढता फिरूँगा?” ऐसे ढेर सारे सवाल उसे परेशान कर रहे थे। लेकिन उनका जवाब न उसके पास था और न ही वह किसी से पूछ सकता था।
वह भारी कदमों से कमरे में आकर ढह सा गया। पिछले एक साल के सारे घटनाएँ, बातें और मुलाकातें उसके दिमाग में घूम रही थीं। उसने थककर आँखें बंद कर लीं।
वह जोर जोर से चिल्लाता हुआ उसके पीछे दौड़ रहा था।
“परी…परी…ज़ैनब…!”
इस नाम पर उसने मुड़कर उसे देखा। वह उससे बहुत दूर थी। किसी ऊँचे पहाड़ की चोटी पर।
“परी, खुदा के लिए लौट आओ।” वह हांफते हुए उससे गुज़ारिश कर रहा था।
उसके आस-पास उसे पतंगे उड़ते हुए दिख रहे थे। धीरे-धीरे वे परी के पास आ गए। और घेरे की तरह उसे घेर लिया। वह बेबस नज़रों से अब्दुल्ला को देख रही थी। और फिर वह किसी चक्रवात की तरह ऊपर उड़ने लगी। परी उनके घेरे में उड़ते-उड़ते गायब हो गई।
“परी…!” वह चीखकर उठ बैठा।
रात का कौन सा पहर था, यह नहीं जानता। कमरे में आधा अंधेरा था। उसका गला सूख रहा था। उसने डरावना सपना देखा था कि परी उससे बहुत दूर चली गई है। अब्दुल्ला की हालत अजीब थी। उसे नींद में भी चैन नहीं मिल रहा था।
यह मोहब्बत उसकी नस-नस में समाई हुई थी… बेचैनी थी… बेचैनी थी… वह उस ख्वाब के बारे में सोचता रहा… मुझे इतना पागल नहीं होना चाहिए, खुद पर काबू रखना चाहिए।
अचानक कमरे की बत्ती जल उठी। उसने देखा कि वह दरवाजे के पास खड़ी थी। वह एकटक उसे देखे जा रहा था। पीले रंग के कपड़ों में वह सूरजमुखी के फूलों से भी ज़्यादा खूबसूरत लग रही थी। अब्दुल्ला की धड़कनें असमंजस में पड़ गईं।
वह खुद आकर बिस्तर के पायंट पर बैठ गई। उसे देखकर अब्दुल्ला की जुबान गंग हो गई थी। कुछ देर दोनों खामोश बैठे रहे। और शायद वह इस हकीकत को भी स्वीकार करने की कोशिश कर रहा था।
“मुझे लगता है कि अगर मैं तुमसे नज़र हटा लूँ, तो तुम हवा में घुल जाओगी।” आखिरकार उसने खामोशी तोड़ी।
“तुम मुझे यह सब पहले ही बता देतीं, मैं तो अनजान था, पर तुम तो नहीं थीं, एक इंसान और जिन्न का मिलाप कैसे हो सकता है, परी?” वह कम्बल में समट कर बैठा हुआ था। और वह पायंट पर सिर झुकाए बैठी थी।
उस वक्त उस दृश्य को देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि यह लड़की इंसान के अलावा भी कोई और मخلूक हो सकती है। वह आम लड़कियों जैसे अंदाज़ में बैठी हुई थी।
“मुझे तुम्हारी आवाज का जादू पकड़ लिया था अब्दुल्ला, मुझे नहीं पता था कि हम एक-दूसरे से…
मोहब्बत कर बैठेंगे,
मेरे माता-पिता का निधन हो चुका है। मैं एक मुस्लिम घराने से हूँ, मेरे चार भाई हैं, और वे चारों निकम्मे, शरारती और आवारा हैं, मुस्लिम होते हुए भी उनका शगल लोगों को तंग करना और दुख देना है, मेरे पिता की बहुत बड़ी जायदाद है, महल जैसे घर हैं, और इन सब चीजों का ख्याल अब तक मैं ही रख रही हूँ, रिश्तेदारों की भी नजर मुझ पर है, भाई तो किसी काम के नहीं हैं।” परी ने बताया।
“क्या जिन्नों में भी ऐसा होता है?” अब्दुल्ला ने हैरानी से पूछा।
“हां! हम भी इंसानों की तरह रहते हैं, हमारा घर, कारोबार, जायदाद, रिश्तेदार सब कुछ होता है, जलन, नाइंसाफी, और दूसरों का माल खाना हमारे यहाँ भी आम है, मुझे डर है कि मेरे रिश्तेदार माल हड़पने के लिए मुझे नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेंगे, हो सकता है वे मुझे क़ैद करने या मार डालने की कोशिश करें, मैं मुस्लिम लड़की हूँ,
और अब मुझे लगता है कि मैंने सब गलत किया है,
क्या गलत किया है?
काश, मैं तुमसे पहले खुद को जाहिर नहीं करती तो बात आज यहाँ तक न पहुँचती, पर तुम्हारी आवाज ने मुझे बेखूद कर दिया था, मुझे आज तगड़ा एहसास हो रहा है अब्दुल्ला कि हमें यूं नहीं मिलना चाहिए था, हम नामहरम हैं, मेरे माता-पिता ने मुझे यह सब नहीं सिखाया था।” वह अफसोस से कह रही थी।
“उनकी मौत के बाद मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूँ, न कोई बहन है, और न कोई सहारा, मैंने नमाज़ें पढ़ना भी छोड़ दी थीं, और अपनी मर्जी की जिंदगी जीने लगी थी, कोई रोक टोक करने वाला नहीं था, मैं भूल गई थी कि मेरा अल्लाह मुझे देख रहा है,
छुपकर जो काम किया जाए वह अक्सर गुनाह ही होता है।”
अब्दुल्ला को भी शर्मिंदगी ने घेर लिया कि वह ठीक कह रही थी। उसकी तालीम भी तो ऐसी नहीं हुई थी। लेकिन… यह चार दिन की मोहब्बत इंसान को अंधा कर देती है। अच्छे-बुरे की पहचान भुला देती है। और सालों की तालीम पर पानी फेर देती है।
मोहब्बत जुर्म नहीं है, पर छुपकर मुलाकातें करना और नामहरम से दिल लगाकर रब की नाराज़गी कमाना जुर्म है। और वे दोनों इस जुर्म के مرتकिब हो गए थे। मोहब्बत की एक ही मंज़िल है… और वह है निकाह।
“परी… मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।” अब्दुल्ला ने कहा।
“अब्दुल्ला, नसीब तो ऊपर वाला लिखता है, मेरे हाथ में कुछ नहीं है, लोग समझते हैं कि जिन्नों के काम मिनटों में हो सकते हैं, पर ऐसा नहीं है, खुदा ने हमें भी सीमित क़ाबिलियत दी है, मैं नसीब नहीं बदल सकती। और न ही पल भर में ज़िंदगी बदल सकती हूँ। मैं भी तुम्हारी तरह एक बेबस मخلूक हूँ। कुरान में अल्लाह ने इंसानों के साथ-साथ जिन्नात को भी مخاطब किया है।
सूरۃ الرحمٰن में इरशाद है:
“يا معشر الجن والإنس إن استطعتم أن تنفذوا من أقطار السماوات والأرض فانفذوا”
“ऐ जिन्नात और इंसानों के समुदाय! अगर तुम आकाश और ज़मीन के किनारों से बाहर जा सकते हो तो निकल जाओ…”
फिर खुद ही इरशाद हुआ:
“لا تنفذون إلا بسلطان”
“तुम नहीं निकल सकते उसकी सल्तनत के अलावा कहीं और।”
हर तरफ उसी की बादशाहत है।
उसके सामने हर ज़िंदा चीज़ बेबस है।
मैं भी दुआ और कोशिश ही कर सकती हूँ।
तेरे हाथ में डोर है सैयाँ
पुतली का क्या जोर है सैयाँ
अब्दुल्ला हैरान था कि वह दूसरी मخلوق होकर भी इतना ज्ञान रखती है।
वह उसकी हैरानी को भांप गई थी।
हमारे पास भी ज्ञान होता है। हम लोग भी तुम्हारी तरह ज्ञान प्राप्त करते हैं। इंसानी रूप में तुम इंसानों के साथ ही पढ़ते हो। और क़ुरआन करीम सबसे ज्यादा हमारे यहाँ ही खरीदी और पढ़ी जाती है। शायद तुम्हें यह जानकर हैरानी हो कि हम लोग क़ुरआन बहुत ज्यादा पढ़ते हैं।
वे दोनों रात के इस पहर उस कमरे में बातचीत में व्यस्त थे। बाहर उतरती हुई कड़वी धुंध खिड़कियों से उनके शब्दों को सुनने में व्यस्त थी और फड़फड़ाती हवा के अदृश्य शरीर पर उनके शब्द अंकित हो रहे थे।
तहज्जद का वक्त धीरे-धीरे पास आ रहा था। उजाले की उम्मीद लिए रात अपनी काली चादर ओढ़े धीमे-धीमे सफर तय कर रही थी।
वे दोनों चुप थे। कमरे में सिर्फ वॉल क्लॉक की टिक-टिक की आवाज गूंज रही थी।
या दिल की धड़कनों का शोर जो अपनी-अपनी सुनने वाली धारियों को जगाता था।
हमारा इस तरह मिलना सही नहीं है…
मैं जा रही हूँ, और अब उसी वक्त तुमसे मिलूंगी जब हमारे रिश्ते को कोई शरई हैसियत मिल सके।
यह कैसे होगा? उसने चिंतित होकर पूछा।
तुम कोशिश करो कि अपने घर वालों को मना लो, उन्हें मेरे बारे में सब बता दो, अगर वे राजी हो जाते हैं तो ठीक है, वरना…! उसने बात अधूरी छोड़ दी।
“वरना?” अब्दुल्ला ने टूटे हुए नजरों से उसे देखा।
“वरना मैं खुद कोई कोशिश करूंगी, अल्लाह हाफिज़”।
वह अब वहां नहीं थी। पर उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह कहीं गई ही न हो।
जहां عقل काम न कर सके
वहीं आंखें डाल बैठीं।
अगले कई दिन बे-रौनक और फीके-फीके से गुज़रे थे। सब कुछ खाली-खाली लगता था। वह रात के बाद फिर कभी नहीं आई थी।
अब्दुल्ला के पास कोई खास व्यस्तता नहीं थी। बस सर्दियों की छुट्टियाँ बर्फ़बारी में कट रही थीं। शमा अपने बच्चों के साथ मायके चली गई थी। मौसम थोड़ा बेहतर हुआ तो दादा-दादी भी अपनी बेटियों से मिलने चले गए।
अब्दुल्ला का ज्यादातर वक्त कमरे में ही गुजर रहा था। कभी उसके छोटे भाई उसे भी अपने खेलों में शामिल कर लेते थे, तो कभी वह किताबों में सिर दिए खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करता था।
दुनिया की लाखों करोड़ों लड़कियों को छोड़कर उसका दिल एक दूसरी दुनिया की लड़की से मिलना चाहता था… वह अक्सर सोचता था। पता नहीं इसमें भी क्या राज़ था? मैं घर वालों से क्या बात करूं? कैसे बात करूं? शब्द नहीं सूझते थे। पहले तो उसकी मानसिक हालत पर शक किया जाता। और शायद उसे किसी मानसिक चिकित्सक के पास ले जाया जाता। और अगर यकीन कर भी लिया जाता तो दुनिया वालों को कौन यकीन दिलाता? कि ऐसी अनहोनी भी संभव हो सकती है…
यही सोचें उसे परेशान किए हुए थीं। वैसे तो उसके बहुत से दोस्त थे, पर अली सबसे करीब था। और वह हर बात उससे शेयर कर लेता था। पर प्री वाली बात तो उसे भी नहीं मालूम थी। वह नहीं चाहता था कि एक अजनबी लड़की को हर किसी से डिस्कस करता फिरें। पर उसे कुछ और समझ भी नहीं आ रहा था।
आखिरकार फैसला करके उसने अली को कॉल मिलाई।
रश्मी दुआ सलाम के बाद वह इधर-उधर की बातें करने लगा।
“यार, तुझसे एक बहुत जरूरी बात करनी है, कहीं मिल सकता है क्या?” अब्दुल्ला मुद्दे पर आया।
“इतनी भी क्या जरूरी बात हो गई? फोन पर ही कर ले।” अली ने कहा।
“यानी तू मुझसे मिलना नहीं चाहता…”
“अरे नहीं यार… यह किसने कहा… मैं तो ऐसे ही कह रहा था…”
“नहीं अली, फोन पर नहीं, सामने बैठकर।”
“अच्छा! चल ठीक है फिर, मेरी गेस्ट हाउस में मिलते हैं, पार्टी शार्टी भी कर लेते हैं।” अली ने कहते हुए अतिरिक्त सलाह दी।
“ठीक… फिर आज दोपहर का प्लान बना लेते हैं।” अब्दुल्ला ने हामी भर दी।
“ठीक है यार, मैं ज़ुहर के बाद पहुंच जाऊंगा।” अली ने अल्लाह हाफिज़ कहकर फोन रख दिया।
आज मौसम काफी खुशगवार था। मरी का आकाश बरस-बरस कर थक चुका था। और अब आंखें मूंदे आराम कर रहा था। सूरज और बादल की आँख-मिचौली जारी थी। धूप अपनी हल्की सी ज़र्दी दिखला रही थी जैसे कोई रंग उड़ाए सरसों का फूल हो। और फिर सफेद रंग हर तरफ छा जाता था।
अब्दुल्ला गेस्ट हाउस पहुँच चुका था। यह एक हरे-भरे पहाड़ी पर स्थित गेस्ट हाउस और रेस्टोरेंट था। ज़्यादातर सैलानी यहाँ आकर रुकते थे। पहाड़ी से नीचे घाटियों में दिखाई देती हरियाली आँखों को चकित कर देती थी। पहाड़ी के बीच में एक केंद्रीय इमारत थी और आस-पास पेड़ और फूल उगे हुए थे।
यह तीन मंजिला इमारत थी और इसके कमरे इस तरह से बनाए गए थे कि हर कमरे की खिड़की से बाहर का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता था।
बाकी सारे परिसर में हर तरह के फलदार और सजावटी पेड़ थे। पूरी पहाड़ी की चोटी पर हरियाली का बिछा हुआ था। और खुले क्षेत्र में टेबल और कुर्सियाँ सजी थीं। बर्फबारी थम चुकी थी, लेकिन मौसम अब भी ठंडा था।
कुछ देर के इंतजार के बाद अली भी पहुँच गया। दोनों खड़े होकर गर्मजोशी से एक-दूसरे से गले मिले।
“क्या खाएगा बोल?” अब्दुल्ला ने पूछा।
“यार बड़ी भूख लगी है, कुछ अच्छा सा खिला दे।” अली ने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा।
वेटर मेनू कार्ड लेकर आ गया था। अब्दुल्ला ने सजी का ऑर्डर दिया। और साथ ही आइसक्रीम भी लंच के बाद मंगवा ली।
“यार तू बड़ा चुप चुप सा लग रहा है, ठीक तो है ना?” अली ने उसके चेहरे की बेचैनी पढ़ते हुए पूछा।
“हाँ यार, बस ऐसे ही है।” अब्दुल्ला ने अफसोस से जवाब दिया।
“तो बस यूँ ही मुझे बुलाया था, या कोई खास बात है?” अली ने गौर से उसकी उदास चेहरे को देखते हुए पूछा।
“नहीं, बात तो है, पर पहले खाना खा लें…”
“यार, तूने तो मुझे परेशान ही कर दिया है, एक तो इतनी मासूम सी शक्ल बनाई हुई है, ऐसे तो खाना हजम ही नहीं होगा, कहीं कोई… इश्क़-आशिकी का चक्कर तो नहीं है?” अली ने ताने मारते हुए कहा।
इससे पहले कि अब्दुल्ला कोई जवाब देता, अली का फोन बजने लगा। वह उठ कर एक साइड पर चला गया।
जब वह वापस आया तो वेटर खाना सर्व कर चुका था। दोनों ने हल्की-फुल्की गपशप के दौरान खाना खाया।
“हां, अब बोल, अब और सहन नहीं हो रही तेरी चुप्पी,” अली ने हाथ साफ करते हुए कहा।
“यार, पता नहीं तू यकीन करेगा या नहीं? या मुझे पागल समझेगा,” अब्दुल्ला ने संकोच करते हुए कहा।
“अरे, सीधी बात बता, पहेलियां न बुझा,” अली ने नकली गुस्से से कहा।
“असल में बात ये है कि… मुझे… मुहब्बत हो गई है,” अब्दुल्ला ने धमाका किया।
“ओह हो… मुझे तो पहले ही शक था, मुबारक हो,” अली ने सीधा होते हुए कहा।
“कौन है वह? कहीं वह कॉलेज वाली नताशा तो नहीं, जो हर वक्त तेरे आगे-पीछे घूमती रहती थी!” अली ने ताना मारा।
“अरे नहीं यार, अब मैं तुझे कैसे बताऊं?” अब्दुल्ला बेचैनी से बोलने लगा।
“वह परी है… मतलब वह इंसान नहीं है, जिन्नों के परिवार से है,” अब्दुल्ला ने एक और नकली बम फोड़ा।
“हाहाहाहाहा!” अली ने जोरदार हंसी लगाई। आस-पास के लोग उनकी तरफ मुड़े थे।
“दफा हो, मैं जा रहा हूं,” अब्दुल्ला ने कुर्सी से उठते हुए तुनक कर कहा।
“ओ हो! अच्छा बैठ, तो सही,” अली ने उसका हाथ पकड़ कर बैठाया।
“अब बताओ, अब नहीं हंसूंगा,” अली ने गंभीरता से कहा।
फिर वह उसे अल्फ़ से य तक सारी कहानी सुनाने लगा। हर बात अली के लिए पहले से भी ज्यादा हैरान करने वाली थी। उसकी आंखें हैरानी से फैल गईं। अब वह मजाक की बजाय पूरी तरह गंभीर हो चुका था और उसकी जगह गहरी हैरानी ने ले ली थी।
“अब तू ही बता, मैं क्या करूं?” परी के दीवाने अब्दुल्ला ने सारी बात बताकर आखिर में पूछा।
“यकीन जान, अगर तेरी जगह यह कहानी मुझे किसी और ने सुनाई होती न, तो मैं उसे इस पहाड़ से उठा कर नीचे फेंकता, लेकिन मुझे पता है तू सच ही कह रहा है, ये तो बड़ी पेचीदा स्थिति है,” अली ने सोचते हुए कहा।
“हम्म! और कोई भी मेरा यकीन नहीं करेगा, बल्कि दादाजी तो मुझे उल्टा लटका देंगे,” अब्दुल्ला ने डरते हुए कहा।
“अब्दुल्ला! तुम अभी किसी से भी इसका जिक्र न करना, मैं कुछ करता हूं, एक बाबा जी हैं मेरे नज़र में, उनसे इस मसले का कोई हल पूछता हूं, शायद वह कोई अच्छा मशविरा दे दें, तो परेशान मत हो, वैसे एक बात पूछूं?” अली ने उसे तसल्ली देते हुए आखिर में पूछा।
“कौनसी बात?” अब्दुल्ला ने अजीब तरीके से पूछा।
“क्या तुम… उसे भूल नहीं सकते? इस कहानी को यहीं खत्म कर दो,” अली ने झिझकते हुए कहा।
“कैसी बात कर रहा है यार! न तो मुहब्बत करना इंसान के बस में होता है, न उससे छुटकारा पाना,” अब्दुल्ला ने अफसोस से कहा।
“पर तुम दोनों का मिलन कैसे हो सकता है? और अगर हो भी गया तो तुम नॉर्मल इंसानों की तरह जिंदगी कैसे गुजार सकते हो? कितना अजीब है ये सब, मैं तो अभी तक शॉक में हूं।”
“और तू मेरा सोच, मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे मैं लगातार इलेक्ट्रिक शॉक के असर में हूं।”
इस बात पर दोनों बेख़बर हंस पड़े।
कुछ देर और वह दोनों वहीं बैठकर बात करते रहे, और आस-पास के पेड़ और उनके सरसराते पत्ते कान लगाकर उनकी बातें सुनते रहे।
उनके पैरों तले बिछी हरी घास बेहद गोपनीय तरीके से उनकी बातचीत अपनी नाज़ुक पत्तियों पर लिखती रही। और इस पूरे दृश्य में तेज़ी से दौड़ती हवाएं उनकी बातें interrupted करती रहीं।
और जब वह दोनों एक दूसरे से गले मिलकर वहां से रवाना हुए, तो शरारत करने वाली हवा हर एक के कान में सरगोशी करने लगी… “सुना… तुमने… क्या ऐसा भी मुमकिन है? क्या कहानियां भी हकीकत बन सकती हैं? क्या विचार इतने मजबूत होते हैं कि वे हकीकत का आभास कराएं?”
आस-पास के सारे फूल और पौधे, हैरानी से इनकी सरगोशियों को सुनते हुए और अपनी-अपनी ताकत के मुताबिक आश्चर्य व्यक्त करते हुए एक-दूसरे को देख रहे थे। कुछ ही देर में यह कहानी हर पत्ते की ज़बान पर थी। और उन सब से बहुत दूर और बहुत ऊंचे बादलों की ओट में छुपा सूर्य कभी-कभी अपना चेहरा बाहर निकालकर उन्हें देखता और फिर उनकी अफवाहों की ताब नहीं सहन करते हुए वापस उसी जगह जा छुपता।
दादा जी ने जाते हुए शमा को खास हिदायत दी थी कि शजा का खास ख्याल रखे। उसे किसी भी वीरान जगह पर न जाने दे और उन्होंने उसे दम करने का तरीका और क्रम भी बता दिया था कि इसमें नाहा न हो। वह कुरान की सूरतें पढ़ कर दम करते थे। और अक्सर लोग उनसे अपने बच्चों को दम करवाने आते थे।
उस दिन के बाद से वह लगातार खुद शजा पर दम कर रहे थे। और वह बिलकुल ठीक हो गई थी।
मेकें जाकर शमा थोड़ी लापरवाह हो गई थी और शजा के सिर में फिर से दर्द होने लगा था। सारी बात पता करके उसकी मां ने भी शमा को बहुत डांटा था। और बिलकुल दादी जी की तरह उसे नसीहतें दी थीं कि बच्ची का ख्याल रखा करो। ऐसे कपड़े न पहनाया करो आदि। उन्होंने खुद उसे दम करने की जिम्मेदारी ले ली थी। बल्कि वह उसकी आदत बनाने की कोशिश कर रही थीं कि वह खुद यह आयतें और सूरतें पढ़ने की आदत डाल ले। ताकि वह शैतानी चीजों और बुराइयों से सुरक्षित रह सके। धीरे-धीरे उसकी हालत बेहतर हो गई थी।
दादा और दादी बेटियों से मिलकर वापस आ गए थे। वह उनके घर नहीं ठहरते थे बस कुछ घंटे बिताकर वापस चले आते थे। और रिश्तेदारों से मिलने में दो तीन दिन लग गए थे। उनके साथ बड़ी नानी भी रहने के लिए आई थी। वह सेकेंड ईयर की स्टूडेंट थी और हर साल छुट्टियों में रहने के लिए नाना नानी के घर आती थी। उसकी मां सलमा यानी अब्दुल्ला की फूफी कुछ दिनों के लिए आती थीं लेकिन सालविया हफ्तों रहकर जाती थीं। इस बार फूफी ससुराल में व्यस्तता की वजह से नहीं आई थीं। मगर सालविया लगभग दो तीन हफ्ते का सामान बांध कर आई थी।
कैसे हैं डॉक्टर साहब? उसने खुशगवार मुस्कान से पूछा। वह हमेशा अब्दुल्ला को डॉक्टर साहब ही कहकर चिढ़ाती थी। “ठीक ठाक हूँ गड़िया”। अब्दुल्ला ने कहा। ओह हो! अब मैं बड़ी हो गई हूँ, अब गड़िया न कहा करो मुझे, ….. सालविया कहा करो। “अच्छा गड़िया! ओह सॉरी! …… सालविया। पढ़ाई ठीक जा रही है? अब्दुल्ला ने पूछा। “जी डॉक्टर साहब”। उसने फिर मुस्कुराते हुए जवाब दिया। वह दुबली पतली लंबी कद, ग्रे आंखों, गोरी रंगत वाली दिलकश सी लड़की थी। अब्दुल्ला ने कभी उसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं ली थी। क्योंकि उस वक्त तक उसकी कोई बहन नहीं थी। और वह उससे सिर्फ दो तीन साल ही छोटी थी। इसलिये वह अब तक उसे अपनी छोटी बहन ही समझता था। और बड़े लोगों ने भी उसे यही सिखाया था।
“कहीं जा रहे हैं आप? उसने उसे बाहर जाते हुए देखा और पूछा। नहीं, बस यह साथ दुकान तक जा रहा हूँ”। उसने बताया। “अच्छा चलें, आप आ जाएं फिर साथ बैठकर गप्पें मारेंगे”। उसने कहा। अब्दुल्ला ने उसे संदिग्ध नजरों से देखा। उस वक्त वह नीले रंग की गर्म ऊनी फ्रॉक और ट्राउज़र में मلبूस थी। और सिर पर सलीके से गर्म स्कार्फ लिपटा हुआ था। समंदर से नीले रंग के स्कार्फ में लिपटे उसके चेहरे पर ग्रे आंखें बहुत प्रमुख हो रही थीं। दो साल पहले तक वह उसे अब्दुल्ला भैया कहती नहीं थकती थी और अब डॉक्टर साहब के अलावा किसी और उपनाम से संबोधित नहीं करती थी। उसने कभी यह बदलाव महसूस नहीं किया था। पर अब उसके व्यवहार में आई बदलाव ने अब्दुल्ला को चौंका दिया था। वह अपने ख्याल को नकारते हुए गेट खोलकर बाहर निकल गया। और वह उसे जाते हुए देखती रही।
डॉक्टर साहब — मुझे तीन दिन हो गए हैं आपके घर आए हुए कहीं लेकर ही नहीं गए आप — मेहमानों के साथ यह सलूक करते हैं मैं तो घर बैठे बैठे बोर हो गई हूँ। वह किताबों में सिर दिए बैठे था कि सालविया अचानक से उसके कमरे में आकर मौजूद हो गई और अब सामने सोफे पर बैठी उससे शिकवा कर रही थी। हां तो जाओ न गड़िया घूमने फिरने — मैं तो बहुत बिजी हूँ — ऐसा करो तुम बच्चों के साथ चली जाओ हातिम है — और इमाद अफ़ान हैं उन्हें तो वैसे ही घूमने फिरने का बड़ा शौक है। उसने किताबों से सिर उठाकर एक सरसरी नजर उस पर डाली।
आप नहीं चलेंगे साथ बच्चों को क्या पता — वे तो अपने ही खेल खेलेंगे — मेरी कोई सहेली भी नहीं है यहाँ — उसका मुँह लटक गया। तो तुम अपनी किसी सहेली को साथ ले आती — उसने हंसते हुए मजाक किया। आप नहीं बन सकते मेरी सहेली — वह अपनी बात पर खुद ही हंस पड़ी। अब्दुल्ला ने उसे ऐसे देखा जैसे उसका दिमाग चल गया हो। क्या हुआ? इतने हैरान क्यों हो रहे हैं आप –? मैंने कुछ गलत कह दिया क्या –? नहीं — पर मैं तो लड़का हूँ — और सहेलियाँ तो लड़कियाँ होती हैं। ओह — कंपनी देने के लिए तो बंदा बन ही सकता है दोस्त। तो फिर कहाँ ले जा रहे हो आप –? उसने उत्सुकता से पूछा। दादा जी डांटेंगे — उसने उसे टालना चाहा। क्यों डांटेंगे भाई मैं अभी उनसे पूछ आती हूँ। वह कहती हुई उनके कमरे की ओर चल दी। वह लगभग सत्रह वर्ष की एक शोक और चंचल सी लड़की थी। वैसे तो सालभर में वह कई बार फैमिली के साथ मिलने आती थी और पिछली सर्दियों की छुट्टियों में भी वह अपने नाना नानी के घर रहकर गई थी लेकिन वह अब्दुल्ला से इतनी फ्रैंक नहीं होती थी। लेकिन इस बार वह उसके व्यवहार में उल्लेखनीय बदलाव महसूस कर रहा था। वह बहाने बहाने से उससे बात करने की कोशिश करती रहती थी।
ग्रे आँखों में — हल्की भूरी आँखों और लाली मائل भूरे बालों वाले अब्दुल्ला को देख कर एक खास चमक आ जाती थी- और अब्दुल्ला की नजरों से यह चीज छिपी नहीं रहती थी। लेकिन वह परी के अलावा किसी और का सोच भी नहीं सकता था — और वह ग्रे आँखों और काले बालों वाली लड़की इस बात से पूरी तरह अन्जान थी।
“इस्माइल की माँ —मैं सोच रही थी कि एक दावत रख लेते हैं घर पर–कितना समय हो गया अपने सभी बच्चों को एक साथ नहीं देखा–अब तो छुट्टियाँ भी खत्म होने वाली हैं–अच्छा है सभी भाई-बहन एक साथ मिलें एक-दूसरे से मिल लें–
सोचा तो आपने बहुत अच्छा है–तो देर किस बात की–आप कह दें सभी को –और इंतजाम करा लें–वैसे तो सभी मिलते रहते हैं पर कोई साल के किसी महीने आता है, कोई किसी महीने–कितना अच्छा लगेगा कि मेरे सारे बच्चे और …उनके बच्चे एक साथ हों तो घर में रौनक लग जाएगी–अब तो खाली-खाली सा घर लगता है–सभी अपने-अपने घरों में बस गए हैं–एक बस यूसुफ है और उसके बच्चे–उन्होंने एक ठंडी आह भरी।
अरे चिंता क्यों करती हो नेक बख्त –तुम्हारे यूसुफ को अल्लाह ने पांच बेटे दिए हैं बहुएं आएंगी तो देखना कैसी रौनक लगेगी फिर तो शांति को तरसोगी तुम–वो हंसते हुए अपनी बीवी को तसल्ली दे रहे थे–
यह तो शुक्र है रब तआला का कि हमारे सारे बच्चे नेक फरमाबरदार और अच्छे स्थान पर हैं।कोई शकी नहीं निकला कि हम दुनिया के सामने शर्म से सिर झुकाएं… नेक औलाद भी बड़ी नेमत है इस्माइल की माँ…वो आज भी अपनी बीवी को अपने शहीद बेटे की तुलना से बुलाते थे।
मेरा तो दिल करता है अब्दुल्ला के सिर पर आज ही सेहरा सजाऊं माशाल्लाह बीस साल का हो गया है–
अरी भोली —इतनी भी क्या जल्दी है अभी तो उसके डॉक्टर बनने में भी तीन-चार साल बाकी हैं–और लड़की देखी है क्या तुमने–?
देखने की क्या जरूरत है–घर में ही मौजूद हैं लड़कियां—
हैं—?
अरे मेरी बेटियों की बेटियां हैं ना–स्लिमा की बेटी सलविया भी कॉलेज में पढ़ रही है और नज्म की बड़ी वाली इस साल मेट्रिक कर लेगी–बाकी तो थोड़ा छोटी हैं अभी–मैं तो कहती हूं कि बच्चों के आपस में ही रिश्ते करा दूं ताकि मेरे बच्चे एक-दूसरे से दूर न हों–
इस्माइल की माँ—अब ज़माना बदल गया है अब बच्चों की अपनी पसंद भी होती है–अब वो हमारे वाला दौर नहीं है कि चेहरा देखा नहीं नाम का पता नहीं और शादी हो गई–हमें तो कोई पूछता ही कहां था बस बताते थे बेटा दुल्हा बन जाओ فلां दिन तुम्हारी शादी है–
अब तो बच्चे हंगामा खड़ा कर देते हैं–
ऐसे नहीं हैं मेरे बच्चे–आप रहने दें बस–
हा हा–तुम तो अपने ही दौर में जी रही हो अब तक–इतनी उम्र गुजार के भी उतनी ही भोली हो जितनी पहले दिन थी–
वो पुरानी बातें याद करके हंसने लगे–
नाना अबू—दो दिन हो गए हैं मुझे यहाँ आए हुए घर बैठ-बैठ के बोर हो गई हूँ–
कहीं बाहर ले चलें ना–दोनों मियां-बीवी बैठ के बातें कर रहे थे कि सलविया ने आकर फरमाइश की–
अरे मेरी बच्ची बोर हो रही है—मेरी गुड़िया –मुझे पहले ही बताया होता–नाना अबू ने प्यार से उसे अपने पास बैठाया–
बेटा मैं कहां तुम्हें ले कर जाऊं–? तुम बच्चे चले जाओ –बल्कि मैं अब्दुल्ला से कहता हूं वो ले जाएगा तुम सभी को घुमाने-फिराने–
धन्यवाद नाना अबू–उसकी तो दिल की मुराद पूरी हो गई थी–
वो खुशी-खुशी वहां से बाहर आ गई थी–
बिल्कुल अपनी माँ की तस्वीर बनती जा रही है–वैसी ही आँखें हैं कद-काठी रंगत सब कुछ–सफीया बीगम उसके जाने के बाद बोलीं–और इस पल में वहां बैठे-बैठे जाने वो क्या-क्या सोच रही थीं और दिल ही दिल में कुछ फैसले भी कर बैठी थीं–
बेटा ध्यान से गाड़ी चलाना–और बच्चों तुम भी ज्यादा शरारतें मत करना–सलविया तुम बड़ी बहन की तरह इन सभी का ख्याल रखना–
दादा जी उन्हें जाते हुए हिदायतें दे रहे थे–
वे सभी गाड़ी में ठंसे हुए थे और अब्दुल्ला ड्राइविंग सीट संभाले तैयार था- दादा दादी के कहने पर वह उन्हें पिकनिक पर ले जा रहा था-हालाँकि उसका मूड बिल्कुल नहीं था पर यह सब सलविया की करतूत थी–
वे सभी खुश दिखाई दे रहे थे सिवाय अब्दुल्ला के–
वो प्री की वजह से पहले ही परेशान था और ऊपर से सलविया का बदलता रवैया उसे खटक रहा था–वो नहीं चाहता था कि वो मासूम सी लड़की उससे कोई उम्मीद बांध ले और फिर उसके टूटने पर खुद को तबाह कर डाले–इसलिए उसके साथ उसका व्यवहार थोड़ा दूर-दूर सा था–
मौसम काफी बेहतर था–कई दिन से बर्फबारी थम चुकी थी–पर कभी-कभी बादल अपना गुबार निकालने आ जाते थे–आज तो हल्की हल्की धूप भी निकली थी सुबह के दस बजे वे घर से रवाना हो गए थे–
मरी का सबसे खूबसूरत इलाका भोरबिन यहां से नजदीक ही था–वही उनकी मंजिल थी–अब्दुल्ला खामोशी से ड्राइव कर रहा था-पीछे की सीट पर सलविया, इमाद, अफ़ान और हतिम बراجमां थे और उनकी खुशगप्पियां और ठहाके चरम पर थे–आगे की सीट पर सफ़ोरा अकेली ही फैली हुई थी–
भैया–वो देखो बंदर का बच्चा–कितना प्यारा है ना–वे उस इलाके से गुजर रहे थे जहां बंदरों की आबादी मक्खियों से भी ज्यादा थी–
सफा–मुझे ड्राइव करने दो–चुप करके बैठो–
अब्दुल्ला ने अपने उथल-पुथल में उस बेचारे को डांट दिया था–वो मुँह बनाकर खिड़की से बाहर देखने लगी–और पूरा रास्ता चुप रही–पीछे वालों पर हालांकि कोई असर नहीं हुआ था–उनकी हंसी-ठहाके वैसे ही जारी थे–
करीब आधे घंटे के सफर के बाद वे भोरबिन हिल स्टेशन पहुंच गए थे–यहां सैलानी अक्सर आते-जाते रहते थे इसलिए मनोरंजन के काफी साधन थे–सबसे बड़ा पीसी होटल भी अपनी तमाम सुविधाओं के साथ यहां मौजूद था।
और प्राकृतिक सुंदरता बिना रोक-टोक चारों ओर फैली हुई थी–आंखें उसका आहाता करते-करते थक जाती थीं–लगता था यहां की ज़मीन सारी काइनात का हरा-भरा हिस्सा ले आई है और …पहाड़ों की ढलानें और चोटियां अपनी सजावट के लिए दुनियाभर के पेड़ ले आई हैं–यहां इतने रंग थे कि इंद्रधनुष भी हैरान रह जाए–हर दृश्य दूसरे से कहीं अधिक दिलकश था–देखने वाले उस शिल्पकार के हुनर पर दांतों तले उंगली दबा लेते जिन्होंने “कُن” कहा और इस धरती का यह हिस्सा …अलौकिक सुंदरता से सुसज्जित हो गया—जाने वह शिल्पकार खुद कैसा होगा–?
इंसान सोचने से अक्षम था और इस तरह के अरबों दृश्य मिलकर भी उसकी तारीफ और प्रशंसा का हक अदा करने से मुअज्ज़र थे–
~अक्ल है महव तमाशाए लब बाम अभी”
वह सब उस दिन को खूब आनंद ले रहे थे। अब्दुल्लाह का दिल बुझा-बुझा सा था। सामने अनगिनत सुंदरता अपनी छटा बिखेर रही थी, लेकिन उसे कोई चीज़ भी पसंद नहीं आ रही थी। वह ज़्यादा वक्त उन्हें हंसते-खेलते देख कर बिता रहा था।
वे नाव में सवार थे और वह… झील में खिले कमल के फूलों के बीच से तैरती हुई आगे बढ़ रही थी। नाविक बड़ी दक्षता से चप्पू चला रहा था। बच्चे हाथ बढ़ा कर कभी फूल तोड़ लेते और कभी झील के ठंडे पानी से खेलते हुए हंसी में डूब जाते। साल्विया उन सबके साथ घुल-मिल कर बिल्कुल बच्ची जैसी लग रही थी। वे हर दृश्य को अपने फोन में कैद कर रहे थे। साल्विया का तो अपना फोन था, लेकिन बाकी लड़के अब्दुल्लाह का फोन ही इस्तेमाल कर रहे थे और तस्वीरें बना-बना कर उसकी मानसिक शांति छीन चुके थे।
“भैया, आपका फोन,” इमाद ने उसे मोबाइल थमाया।
अब्दुल्लाह ने देखा तो अली का कॉल था।
“हां यार, कैसे हो?” वह खुशी के साथ पूछा।
“ठीक…ठीक…” दूसरी तरफ से वह कुछ बता रहा था और अब्दुल्लाह पूरी तन्मयता से सुन रहा था। साल्विया ने उसके व्यवहार में बदलाव महसूस किया था। अब तक वह बिल्कुल चुप और उलझा हुआ सा था, जबकि साल्विया उसे कई बार बहाने-बहाने से हंसाने की कोशिश कर चुकी थी, लेकिन वह बस फीकी सी मुस्कान दे देता। अब उसके चेहरे पर चमक सी आ गई थी।
उसने फोन बंद करके वापस उन्हें थमाया और दूर कहीं अव्यक्त दृश्य को देखने लगा।
नाव झील का भ्रमण करके वापस किनारे की ओर लौट रही थी।
“हां भाई बच्चों, वापस चलें?”
“नहीं…नहीं…” सबने एक साथ कहा, “अभी से क्यों? अभी तो चेयर लिफ्ट झूले भी बाकी हैं और अभी तो हमने कुछ खाया भी नहीं ठीक से।”
उनका वापसी का कोई इरादा नहीं था।
“अच्छा, फोन दो जरा,” वे सब गोलगप्पे खाने जा रहे थे। अब्दुल्लाह ने फोन लेकर थोड़ा दूर बैठ गया।
“हां यार, अब बताओ, उस समय ठीक से बात नहीं कर सका,” उसने अली को कॉल किया।
“वो बाबा जी क्या कर सकते हैं?”
“कोई ठग तो नहीं हैं?”
“बहुत पहुँचे हुए हैं, कोई ऐसे वैसे नहीं हैं, न लूटों-पैर हैं। उनके पास तुम्हारे मसले का कोई न कोई हल जरूर होगा,” अली ने बताया।
“ऐसा करते हैं, कल सुबह चलते हैं।”
“चल ठीक है,” उसने सहमति दे दी।
वे घर लौटे तो शाम के चार बज चुके थे। शमा और बच्चे वापस आ चुके थे और वे घर में शोर मचाते फिर रहे थे।
सारा दिन घूम-घूम कर सब इतना थक गए थे कि आते ही सो गए, सिवाय अब्दुल्लाह के।
सब बड़े किचन में बैठ कर शाम की चाय पीते हुए किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार कर रहे थे।
“मैं अंदर आ जाऊं?” अब्दुल्लाह ने अंदर झांकते हुए पूछा।
“हां हां, अच्छा हुआ तुम आ गए। हम सब दावत के योजना पर विचार कर रहे थे,” उसके पिता यूसुफ ने कहा।
“क्या दावत?”
“तुम्हारी सारी फूफियाँ, ताई और चाचा की दावत, ताकि सभी भाई-बहन एक जगह जमा हों और घर में रौनक हो,” दादा जी ने बताया।
“तो कौन सा दिन रखा जाए जो उचित रहे?”
“मेरा ख्याल है शनिवार का दिन ठीक रहेगा,” इब्राहीम ने राय दी।
“जी चाचू, बिल्कुल उचित रहेगा,” अब्दुल्लाह ने भी हां में हां मिलाई।
“तो आज बुधवार है, हमारे पास दो दिन हैं इंतजामात के लिए,” दादा जी ने उसके हिस्से का काम बताने लगे। वह सिर हिलाते हुए उनकी बातें सुन रहा था। इसके बाद उन्होंने महिलाओं से बात कर उनकी जिम्मेदारियां उन्हें सौंप दीं।
अब्दुल्लाह वहां से उठकर कमरे में आ गया। बड़े लोग मीटिंग में लगे थे, जो देर तक जारी रही, जिसमें कुछ महत्वपूर्ण निर्णय भी लिए गए थे।
अगले दिन सुबह ही अब्दुल्लाह को दावत के सिलसिले में कुछ सामान लेने के लिए बाजार जाना था और उसे आराम से मौका मिल गया था कि बाबा जी से भी मिल आए।
उसने अली को उसके घर से पकड़ा और उसके बताए रास्ते पर चल पड़ा।
लगभग एक घंटे की यात्रा के बाद वे उस जगह पहुंच गए थे, यह एक दूर-दराज़ गांव का क्षेत्र था। एक पहाड़ी श्रृंखला के नीचे यह एक घाटी थी। यहां आबादी बहुत कम थी। पहाड़ों की चोटियां सपाट नहीं, बल्कि नुकीली थीं और उनमें कोई आबादी नहीं थी।
“आगे का रास्ता हम पैदल तय करेंगे,” अली ने उसे सूचित किया।
इस गांव से एक तरफ हटकर एक अकेला सा पहाड़ पूरी शान से सिर उठाए खड़ा था, उसकी चोटी पर दूर से एक कुटिया दिखाई दे रही थी। वे चढ़ाई चढ़कर वहां तक पहुंचे। अली ने चुपके से लकड़ी के दरवाजे पर दस्तक दी।
“आ जाओ… दरवाजा खुला है,” अंदर से मुस्कराती हुई आवाज आई।
