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Home»Hindi Novel»Qara Qaram Ka Taj Mahal

QARA QARAM KA TAJ MAHAL ( PART 3 )

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailMay 22, 2026Updated:May 22, 2026 Qara Qaram Ka Taj Mahal No Comments70 Mins Read
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छठी चोटी

शनिवार, 30 जुलाई 2005

घोड़े की तेज़ रफ्तार टापों की आवाज़ सुनकर उसने पलटकर देखा।
दूर तंबुओं के पास से उफ़ुक घोड़ा दौड़ाता हुआ उसकी तरफ़ आ रहा था। वह अब भी उसी जगह बैठी थी, जहाँ पिछली रात उफ़ुक उसे छोड़कर गया था। क्षितिज पर सुबह की हल्की सुनहरी रोशनी फैलने लगी थी। माहोड़ंड झील का पानी हल्के हरे रंग में डूबा दिखाई दे रहा था, क्योंकि सूरज की किरणें अभी पूरी तरह उस तक नहीं पहुँची थीं।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
उसके करीब पहुँचकर उफ़ुक ने घोड़े की रफ्तार धीमी कर दी।

“ज़िंदगी में पहली बार हार का दंड भुगत रही हूँ।”
उसने हाथ में पकड़ी फिशिंग रॉड को देखा।
“लेकिन या तो माहोड़ंड की मछलियाँ बहुत चालाक हैं… या फिर मेरी किस्मत बेहद खराब है।”

उफ़ुक की आँखों में हैरानी उभर आई।
“ओह खुदाया! क्या तुम पूरी रात यहीं बैठी रही?”

“सोई नहीं?” उसने पूछा।

“किसी फ़लसफ़ी ने कहा था कि नींद वक़्त की सबसे बड़ी बर्बादी है।”
वह हल्का-सा मुस्कुराई, हालांकि सच यह था कि उसे पूरी रात नींद आई ही नहीं थी।

“बहुत अफ़सोस के साथ बताना पड़ रहा है…”
उफ़ुक ने घोड़े की लगाम थामे शरारती अंदाज़ में कहा,
“मैं तुम्हें यह बताना भूल गया था कि इन दिनों माहोड़ंड में मछलियाँ मिलती ही नहीं हैं।”

“क्या?”
वह तुरंत खड़ी हो गई। उसकी गोद में रखा हैट नीचे घास पर गिर पड़ा।

“तो तुमने मुझे यह बेकार वाला डेयर क्यों दिया?”

“उसी फ़लसफ़ी ने यह भी कहा था…”
वह हँस पड़ा,
“कि इंसान के पास वक़्त बर्बाद करने के हजार तरीके होने चाहिए।”

“बहुत खूब!”
गुस्से में उसने उसकी फिशिंग रॉड उठाई और सीधे झील में फेंक दी।
रॉड पानी में एक बार उछली और फिर गहराई में गायब हो गई।

“मैं यह रॉड ट्राउट पकड़ने के लिए लाया था।”
उफ़ुक ने अफ़सोस जताने का नाटक किया,
“अब तुम खुद ही ट्राउट खाने से महरूम रहोगी।”

“मैं ट्राउट के बिना भी बहुत अच्छी ज़िंदगी जी रही हूँ!”
उसने हैट फिर सिर पर रखा और आगे बढ़ गई।

“सुनो… काराकोरम की परी!”

उसके कदम रुक गए। उसने मुड़कर घोड़े के पास खड़े उफ़ुक को देखा।

“तुम्हारे साथ एक यादगार तस्वीर लेने का दिल कर रहा है।”

“नहीं!”
वह दो कदम और आगे बढ़ गई।

“लेकिन मेरा दिल तो बहुत ज़ोर दे रहा है!”
वह फुर्ती से घोड़े से उतरा और उसके पीछे आ गया।

एक झटके में उसने उसका हैट उतार लिया।

“ये क्या कर रहे हो?”
वह तुरंत उसकी तरफ़ मुड़ी।

उफ़ुक ने अपनी कैप उसके सिर पर रख दी।
फिर अपनी जैकेट, घड़ी और लाल मफलर भी उसे थमा दिए और बदले में उसकी घड़ी खुद पहन ली।

“आख़िर करना क्या चाहते हो?”

“मिडिल ईस्ट टेक्निकल यूनिवर्सिटी में हमारे आखिरी दिन…”
वह मुस्कुराया,
“मैं और जेनिक एक-दूसरे की कैप, जैकेट, घड़ी, टाई और सनग्लास पहनकर तस्वीरें खिंचवाते रहे थे। आज तक वह तस्वीरें मेरी सबसे पसंदीदा यादों में हैं।”

उफ़ुक की चीज़ें पहनकर उसने खुद को देखा और हँसी रोक नहीं पाई।

“हम दोनों कितने अजीब लग रहे हैं!”

“हम दोनों नहीं… सिर्फ तुम!”
उफ़ुक ने उसे छेड़ा।

फिर उसने पास खड़े अमीर हसन को आवाज़ देकर बुलाया और पोलरॉइड कैमरा उसके हाथ में पकड़ा दिया। इशारों से उसे तस्वीर खींचने का तरीका समझाया।

तस्वीर के लिए वे दोनों घोड़े के पास आकर खड़े हो गए।
उफ़ुक ने एक हाथ से घोड़े की लगाम पकड़ रखी थी।

“फोटो आने के बाद नीचे लिख देना कि घोड़ा मेरी दाईं तरफ़ खड़ा था!”
पुरानी बात याद दिलाकर वह खुद ही हँस पड़ी।

उसी पल अमीर हसन ने कैमरे का बटन दबा दिया।
तेज़ फ्लैश चमका और कुछ ही सेकंड में तस्वीर बाहर निकल आई।

“एक फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर तुम्हारा भविष्य बहुत शानदार है, मिस्टर!”
उसके “रेडी” कहने से पहले तस्वीर खींच लेने पर वह झुंझलाते हुए बोला।

अमीर हसन बस उसकी तरफ़ हैरानी से देखता रह गया।

छठी चोटी

शनिवार, 30 जुलाई 2005

घोड़े की तेज़ टापों की आवाज़ सुनकर उसने पलटकर देखा। दूर तंबुओं के पास से उफ़ुक घोड़ा दौड़ाता हुआ उसकी तरफ़ आ रहा था। वह अब भी वहीं बैठी थी, जहाँ पिछली रात उफ़ुक ने उसे आख़िरी बार देखा था। क्षितिज पर एक नई सुबह जन्म ले रही थी। झील का पानी हल्का हरा दिखाई दे रहा था, क्योंकि सूरज की किरणें अभी उस पर पूरी तरह नहीं उतरी थीं।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
घोड़े को उसके पास लाकर उफ़ुक ने रफ़्तार धीमी कर दी।

“ज़िंदगी में पहली बार हारने की सज़ा भुगत रही हूँ। मगर या तो माहोड़ंड की मछलियाँ बहुत चालाक हैं, या फिर मेरी किस्मत बहुत खराब।”

उसके हाथ में अब भी फिशिंग रॉड थी।

“या ख़ुदा! क्या तुम पूरी रात यही करती रही?”
उसकी शहद रंग आँखों में हैरानी उतर आई।

“सोई नहीं?”

“किसी फ़लसफ़ी ने कहा था कि सोना वक़्त की बरबादी है।”
वह कैसे बताती कि उसे पूरी रात नींद ही नहीं आई थी।

“माफ़ करना, लेकिन मैं तुम्हें बताना भूल गया कि इन दिनों माहोड़ंड में मछलियाँ मिलती ही नहीं।”
घोड़े की लगाम पकड़े वह शरारती मुस्कान के साथ उसे देख रहा था। अभी भी वह घोड़े पर ही बैठा था।

“क्या?”
वह हैरानी से उठ खड़ी हुई। उसकी गोद में रखा हैट घास पर गिर पड़ा।

“तुमने मुझे गलत डेयर क्यों दिया?”

“उसी फ़लसफ़ी ने यह भी कहा था कि वक़्त बर्बाद करने के कई और तरीके भी होते हैं।”
वह हँस पड़ा।

“बहुत शानदार! अब तुम नई रॉड खरीदोगे!”
गुस्से में उसने उफ़ुक की रॉड उठाकर सीधे झील में फेंक दी। रॉड पानी में एक चक्कर काटकर धीरे-धीरे डूब गई।

“मैं यह रॉड ट्राउट मछली पकड़ने के लिए लाया था, लेकिन अब तुम खुद को ट्राउट खाने से महरूम कर चुकी हो।”

“मैं ट्राउट खाए बिना भी बहुत अच्छी ज़िंदगी गुज़ार रही हूँ।”
उसने अपना हैट फिर सिर पर रखा और आगे बढ़ गई।

“सुनो, काराकोरम की परी!”

उसके कदम ठहर गए। उसने पलटकर घोड़े पर बैठे उफ़ुक को देखा।

“तुम्हारे साथ एक यादगार तस्वीर लेने का दिल कर रहा है।”

“नहीं!”
वह दो कदम और आगे बढ़ गई।

“लेकिन मेरा दिल तो बहुत ज़ोर दे रहा है!”
वह फुर्ती से घोड़े से उतरा और तेज़ी से उसकी तरफ़ आया। उसने आगे बढ़कर उसका हैट उतार लिया।

“क्या कर रहे हो?”
वह एड़ियों के बल घूमी।

उफ़ुक ने अपनी कैप उसके सिर पर रख दी। फिर अपनी जैकेट, घड़ी और गले में पड़ा मफलर भी उसे पकड़ा दिया और बदले में उसकी घड़ी पहन ली।

“तुम आखिर करना क्या चाहते हो?”

“मिडिल ईस्ट टेक्निकल यूनिवर्सिटी में आख़िरी दिन मैंने और जेनिक ने एक-दूसरे की कैप, जैकेट, टाई, घड़ियाँ और सनग्लास पहनकर तस्वीर खिंचवाई थी। आज भी वह तस्वीर मेरी सबसे पसंदीदा यादों में से एक है।”

उफ़ुक की चीज़ें पहने, और उसे अपना हैट लगाए देखकर वह हँस पड़ी।

“हम दोनों बहुत मज़ाकिया लग रहे हैं, उफ़ुक!”

“हम दोनों नहीं… सिर्फ़ तुम!”
उसने मुस्कराकर उसे छेड़ा, फिर पास खड़े अमीर हसन को आवाज़ दी। इशारों में कैमरा चलाने का तरीका समझाकर उसने अपना पोलरॉइड कैमरा उसके हाथ में दे दिया।

तस्वीर के लिए वे दोनों घोड़े के पास जाकर खड़े हो गए। उफ़ुक ने एक हाथ से घोड़े की लगाम पकड़ ली।

“तस्वीर आने के बाद लिख देना कि घोड़ा मेरे दाईं तरफ़ खड़ा है!”
पुरानी बात याद दिलाकर वह खुद ही हँस पड़ी।

उसी पल अमीर हसन ने कैमरे का बटन दबा दिया। फ्लैश चमका और कुछ ही सेकंड में तस्वीर बाहर निकल आई।

“एक फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर तुम्हारा भविष्य बहुत शानदार है, मिस्टर!”
उसने बिना “रेडी” कहे तस्वीर खींच ली थी, इसलिए उफ़ुक झुँझलाते हुए तस्वीर झाड़ रहा था। अमीर हसन बस उसे टकटकी लगाकर देखता रहा।

“यह तुम्हें धन्यवाद कह रहा है!”
अपनी हँसी दबाते हुए परीशे ने कहा।

“ख़ैर, इसका कसूर भी नहीं। तुम सारे पाकिस्तानी बिना ‘रेडी’ बोले तस्वीरें खींच लेते हो।”
वह मुस्कुराते हुए तस्वीर को हवा दिखा रहा था।

परीशे को तुरंत मरी वाली तस्वीर याद आ गई, जो उसने भी बिना “रेडी” कहे खींची थी।

“हम बहुत से काम बिना तैयारी के कर जाते हैं। खैर, तस्वीर तो दिखाओ।”

उसने उफ़ुक के हाथ से तस्वीर ले ली।

तस्वीर में वह खुलकर हँस रही थी। जब भी वह हँसती, गर्दन हल्का पीछे झुक जाती थी। हँसी रोकने के लिए उसने हाथ से अपना मुँह ढक रखा था, और उसकी कलाई में पहनी काली घड़ी धूप में चमक रही थी। उफ़ुक घोड़े की लगाम थामे गर्दन मोड़कर उसे देख रहा था। उसके सिर पर परीशे का हैट था, जिसके गुलाब अब मुरझा चुके थे, और वह बिल्कुल किसी काउबॉय जैसा लग रहा था।

“अच्छी तस्वीर है।”
उसने तस्वीर वापस कर दी।

“तुम इसे अपने पास रखना चाहती हो?”

“नहीं!”
वह अपनी तमाम यादों को पीछे छोड़ देना चाहती थी।

“बहुत अच्छा!”
उफ़ुक ने तस्वीर अपनी जैकेट की जेब में रख ली, जो परीशे उसे बाकी चीज़ों के साथ लौटा चुकी थी।

“घुड़सवारी करोगी?”

“नहीं, मुझे घोड़ों से डर लगता है!”
वह तुरंत पीछे हट गई।

“एक बहादुर पर्वतारोही को घोड़ों से डरना शोभा नहीं देता।”

“ठीक वैसे ही जैसे एक बहादुर पर्वतारोही को बुरे ख़्वाबों से भी डरना नहीं चाहिए।”
वह सोचते हुए बोली।

“आओ, बैठो। यह बहुत शरीफ़ घोड़ा है… खूबसूरत औरतों की बहुत इज़्ज़त करता है।”

“शुक्रिया, लेकिन मैं तो सिर्फ़ एक आम लड़की हूँ।”

“अच्छा, अब ऊपर बैठो। एक पैर यहाँ रकाब में रखो… हाँ, ऐसे!”

उसकी ज़िद पर वह झिझकते हुए आगे बढ़ी और पैर रकाब में रखा।

“अब दायाँ हाथ मेरे कंधे पर रखो और बायाँ पीठ पर।”

“किसकी पीठ पर?”
वह चढ़ते-चढ़ते रुक गई।

“घोड़े की पीठ पर, मैडम!”
वह मुस्कान छुपाते हुए बोला।

“ओह!”
वह झेंपकर हँसी, फिर डरते-डरते उसके कंधे का सहारा लेकर घोड़े पर बैठ गई।

“डरो मत। मैंने कहा ना, यह खूबसूरत औरतों का सम्मान करता है।”

“मुझे नीचे गिरा देना भी इसके सम्मान में शामिल है या नहीं?”
वह सचमुच डरी हुई थी।

“यह तो मैंने इससे पूछा नहीं।”

इतना कहना था कि घोड़ा अचानक गोली की रफ्तार से दौड़ पड़ा।

“उफ़ुक!”
वह चीख उठी।

“ओह गॉड… परी! लगाम कसकर पकड़ो, नीचे मत उतरना!”

मगर घबराहट में उसने लगाम छोड़ दी और कूद गई। उसका बायाँ पैर रकाब में उलझ गया और वह घास पर गिर पड़ी।

उसका हैट उड़ता हुआ झील में जा गिरा और अब हरे-नीले पानी पर तैर रहा था।

“परी… तुम ठीक हो?”
वह भागकर उसके पास आया और घुटनों के बल बैठ गया।

“मैं मज़ाक कर रहा था… आई एम सॉरी। लेकिन तुम्हें किसने कहा था कि लगाम छोड़ दो?”

“तुमने ही तो कहा था!”
उसने शिकायत भरी बड़ी-बड़ी आँखें उठाईं। उनमें आँसू चमक रहे थे।

“मैं तो बस ऐसे ही…”
वह सचमुच शर्मिंदा लग रहा था।

“इधर दिखाओ… हाथ को क्या हुआ?”

छठी चोटी (जारी)

वह उसे कैसे बताती कि वह इस मामूली खरोंच पर नहीं रो रही थी। रातभर से दिल में जमा आँसू किसी न किसी बहाने बाहर आना चाहते थे।

वह उठ खड़ा हुआ। परीशे ने दाएँ हाथ की पीठ से अपनी आँखें पोंछीं।

“बस… सनी प्लास्ट ले आओ।”

वह जाते-जाते पलटा।
“क्या?”

“प्लास्टिक वाला बैंडेज।”

“ओह… तुम सेनिटा बैंड की बात कर रही हो? अभी लाया!”

शायद तुर्की में सनी प्लास्ट को सेनिटा बैंड कहा जाता था। यह समझकर वह अपने तंबू की तरफ़ चला गया।

वह वहीं घास पर बैठी अपनी हथेली की लकीरों के बीच लगे छोटे-से कट को देखती रही। कुछ ही देर बाद उफ़ुक वापस आ गया। उसके हाथ में वही प्लास्टिक बैंडेज था।

“अब खबरदार, रोना मत!”
उसके हाथ पर पट्टी लगाते हुए वह उसे हल्की डाँट के अंदाज़ में बोला,
“इतनी खूबसूरत आँखों को रो-रोकर लाल कर लिया है तुमने!”

वह चौंक गई। अपनी भीगी पलकों से उसने उसके साथ घास पर बैठे उफ़ुक को देखा। उसने पहली बार इतने सीधे ढंग से उसकी खूबसूरती की तारीफ़ की थी। उसके भीतर जैसे कोई नर्म एहसास धीरे से जाग उठा।

“अब दर्द हो रहा है?”
वह बेहद नरमी से पूछ रहा था।

वह कहना चाहती थी—हाँ, बहुत दर्द हो रहा है… मगर यह चोट हाथ में नहीं, दिल में लगी है।
लेकिन उसने सिर्फ़ गर्दन हिलाकर इंकार कर दिया।

“गुड!”
वह मुस्कुराया।
“अब अपनी आँखें साफ़ करो। तुम्हारी चीखों से निशा और अर्सा ज़रूर जाग गई होंगी। अभी आकर पूछेंगी कि मैंने एक मंगनीशुदा लड़की से ऐसा क्या कह दिया कि वह रो पड़ी।”

वह भीगी आँखों के साथ हल्का-सा मुस्कुरा दी और उठ खड़ी हुई।

“तुमने तो कहा था कि यह घोड़ा खूबसूरत औरतों का सम्मान करता है?”

“हाँ, मगर तुम तो सिर्फ़ एक लड़की हो!”
वह भी उसके साथ खड़ा हो गया।

परीशे ने उदासी से माहोड़ंड की तरफ़ देखा। उसकी टोपी अब भी सब्ज़ी-माइल नीले पानी पर तैर रही थी।

उफ़ुक ने उसकी निगाहों का पीछा किया।

“जाने दो… नई ले लेना।”

“नहीं!”
उसने धीमे से सिर हिलाया।
“नई टोपी पर ऐसा बासी लाल गुलाब नहीं होगा… जिसकी पंखुड़ियाँ किनारों से काली होकर मुरझा गई हों।”

उफ़ुक कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—
“सही कह रही हो। कुछ चीज़ें अगर खो जाएँ, तो फिर कभी नहीं मिलतीं… उनका कोई विकल्प नहीं होता। कुछ इंसान भी ऐसे ही होते हैं।”

“चलो, तंबू की तरफ़ चलते हैं।”

वे दोनों साथ-साथ घास पर चलने लगे। परीशे नंगे पाँव थी, जबकि उफ़ुक अब भी मोज़ों में था।

“तुम्हारी हिम्मत अभी भी अधूरी है!”

“जानता हूँ… और अब मैं तुम्हें कोई मुश्किल डेयर दूँगा।”

“लेकिन वह राकापोशी पर चढ़ने से जुड़ा नहीं होगा!”
उसने तुरंत चेतावनी दी।

“ठीक है।”
वह हँस पड़ा।
“अब सुनो… निशा कह रही थी कि उसके भाई के किसी दोस्त के पिता किसी ख़ुफ़िया एजेंसी के चीफ़ हैं?”

“हाँ, हैं… फिर?”

“तो उससे कहना कि अपने राष्ट्रपति से कहकर मुझे पाकिस्तान सरकार की तरफ़ से कोई प्रेसिडेंशियल अवॉर्ड दिलवा दे।”

वह बिल्कुल बच्चों जैसी ज़िद कर रहा था।

परीशे हँस पड़ी।
“तुम्हें हमारी सरकार से पुरस्कार लेने का इतना शौक क्यों है?”

“मैं बीस साल बाद अपनी ट्रैवल डायरी में लिखना चाहता हूँ कि जब मैं इस्लामी दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क में गया, तो वहाँ के बादशाह ने मेरी बड़ी खातिरदारी की… वगैरह वगैरह… समझा करो ना, थोड़ा शो ऑफ!”

“ख़ैर, हसीब के दोस्त का पिता कोई रिचर्ड आर्मिटेज नहीं है कि उसकी हर बात मान ली जाएगी!”

उफ़ुक ज़ोर से हँस पड़ा।

“वाह! क्या बात कही!”
फिर मुस्कुराकर बोला,
“इराक-अमेरिका युद्ध में अमेरिका हमारी मिन्नतें करता रहा, मगर तुर्की और तैय्यब एर्दोगान ने अपनी सरज़मीन इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं दी।”

वे दोनों घास पर चलते हुए एर्दोगान, मुशर्रफ़ और अफ़ग़ान युद्ध की बातें करते रहे।

चलते-चलते वे तंबुओं से दूर फिर झील के किनारे आ पहुँचे थे।

सुबह अब भी पूरी तरह नहीं उतरी थी। फ़ज्र का वक़्त था।

“मैंने नमाज़ नहीं पढ़ी… तुम यहीं रुको, मैं वुज़ू कर लूँ।”

वह झील के पानी के पास गया और घास पर बैठकर हाथ धोने लगा।

परीशे मुस्कुराते हुए उसे वुज़ू करते देख रही थी।

उसने टोपी उतारी, मसह किया, फिर दोनों पैरों के मोज़े उतारकर धोने लगा।

वह उसकी उँगलियों की हरकतें देख रही थी कि अचानक उसके चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।

वह एकदम दो कदम पीछे हट गई।

“उफ़ुक… ये…?”

वह अविश्वास से उसके बाएँ पैर को देख रही थी।

“यही पर्वतारोहियों की ज़िंदगी है, मैडम जहाँज़ेब!”
वह बहुत इत्मीनान से अपना पैर धो रहा था।
“कुछ पाने के लिए… कुछ खोना पड़ता है।”

उसके बाएँ पैर की आख़िरी दो उँगलियाँ नहीं थीं।

“मगर… कैसे?”
वह मुश्किल से शब्द निकाल पाई।

उफ़ुक ने बिल्कुल लापरवाही से कंधे उचकाए।

“फ्रॉस्टबाइट!”

अब वह फिर से मोज़े पहन रहा था।

“लगता है नमाज़ क़ज़ा हो गई…”
वह अफ़सोस से बोला।
“मुझे ध्यान ही नहीं रहा।”

घास से टोपी उठाकर वह धीरे से खड़ा हो गया।

छठी चोटी

शनिवार, 30 जुलाई 2005

घोड़े की तेज़ टापों की आवाज़ सुनकर उसने पलटकर देखा। दूर तंबुओं की दिशा से कोई घोड़ा दौड़ाता हुआ उसकी तरफ़ आ रहा था। वह अब भी वहीं बैठी थी, जहाँ पिछली रात उफ़ुक ने उसे आख़िरी बार देखा था। क्षितिज पर सुबह की हल्की रोशनी उभर रही थी। झील का पानी फीके हरे रंग में डूबा हुआ था, क्योंकि सूरज की किरणें अभी उस तक पहुँची नहीं थीं।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
घोड़े को उसके पास रोकते हुए उफ़ुक ने रफ्तार धीमी कर दी।

“ज़िंदगी में पहली बार हारने की सज़ा भुगत रही हूँ। लेकिन लगता है या तो माहोड़ंड की मछलियाँ बहुत चालाक हैं, या फिर मेरी किस्मत ही खराब है।”

उसके हाथ में अब भी फिशिंग रॉड थी।

“ओह खुदाया! तुम पूरी रात यहीं बैठी रही?”
उसकी शहद-रंगी आँखों में हैरानी चमक उठी।

“सोई नहीं?”

“किसी दार्शनिक ने कहा था कि सोना वक्त की बर्बादी है।”
वह यह कैसे बताती कि पूरी रात उसकी आँखों में नींद आई ही नहीं थी।

“माफ़ करना, मगर मैं तुम्हें बताना भूल गया कि इन दिनों माहोड़ंड में मछलियाँ नहीं मिलतीं।”
घोड़े की लगाम थामे, आँखों में शरारत भरकर वह मुस्कुरा रहा था।

“क्या?”
वह झटके से खड़ी हुई। उसकी गोद में रखा हैट घास पर गिर पड़ा।

“तुमने मुझे गलत डेयर क्यों दिया?”

“उसी दार्शनिक ने यह भी कहा था कि वक्त बरबाद करने के और भी तरीके होते हैं।”
वह हँस पड़ा।

“बहुत खूब! अब तुम मेरे लिए नई रॉड खरीदोगे!”
गुस्से में उसने उफ़ुक की फिशिंग रॉड उठाई और सीधा झील में फेंक दी। रॉड पानी में डूब गई।

“मैं यह रॉड ट्राउट पकड़ने के लिए लाया था, मगर अब तुम खुद ट्राउट खाने से महरूम रहोगी।”

“मैं ट्राउट के बिना भी अच्छी ज़िंदगी गुज़ार सकती हूँ।”
उसने हैट फिर से सिर पर रखा और आगे बढ़ गई।

“सुनो, काराकोरम की परी!”

उसके कदम ठहर गए। उसने पलटकर घोड़े पर बैठे उफ़ुक को देखा।

“तुम्हारे साथ एक यादगार तस्वीर लेने का दिल कर रहा है।”

“नहीं!”
वह दो कदम और आगे बढ़ गई।

“लेकिन मेरा बहुत दिल चाह रहा है!”
वह घोड़े से उतरकर तेज़ी से उसकी तरफ़ आया। बिना देर किए उसने उसके सिर से हैट उतार लिया।

“क्या कर रहे हो?”
वह घूमकर उसकी तरफ़ मुड़ी।

उफ़ुक ने अपनी कैप उसके सिर पर रख दी। फिर अपनी जैकेट, घड़ी और मफलर भी उसे पकड़ा दिए, और बदले में उसकी घड़ी ले ली।

“तुम करना क्या चाहते हो?”

“मिडिल ईस्ट टेक्निकल यूनिवर्सिटी में आख़िरी दिन मैंने और जेनिक ने एक-दूसरे की जैकेटें, टोपियाँ, घड़ियाँ और सनग्लास पहनकर तस्वीर ली थी। बहुत यादगार फोटो बनी थी।”

उसने उफ़ुक की चीज़ें पहनकर जब उसे अपना हैट लगाए देखा, तो हँसी रोक न सकी।

“हम दोनों कितने मज़ाकिया लग रहे हैं!”

“हम नहीं… सिर्फ तुम!”
वह मुस्कुराकर उसे छेड़ने लगा।

फिर उसने पास खड़े अमीर हसन को आवाज़ दी। इशारों से कैमरा चलाना समझाकर उसने अपना पोलरॉइड कैमरा उसके हाथ में दे दिया।

दोनों घोड़े के साथ तस्वीर के लिए खड़े हो गए। उफ़ुक ने एक हाथ से घोड़े की लगाम पकड़ रखी थी।

“तस्वीर निकलने के बाद लिख देना कि घोड़ा मेरी दाईं तरफ़ खड़ा है!”
पुरानी बात याद दिलाकर वह खुद ही हँस पड़ी।

उसी पल अमीर हसन ने कैमरे का बटन दबा दिया। फ्लैश चमका और कुछ ही सेकंड में तस्वीर बाहर निकल आई।

“एक फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर तुम्हारा भविष्य बहुत शानदार है, मिस्टर!”
वह झुंझलाकर तस्वीर झाड़ते हुए बोला।

अमीर हसन बस उसकी तरफ़ टकटकी लगाए देखता रह गया।

“यह तुम्हें धन्यवाद कह रहा है!”
परीशे ने हँसी दबाते हुए कहा।

“खैर, इसका कसूर नहीं। तुम सारे पाकिस्तानी बिना ‘रेडी’ कहे तस्वीर खींच लेते हो।”
तस्वीर देखते हुए वह मुस्कुराया।

परीशे को याद आया कि मरी में उसने भी बिना “रेडी” कहे उसकी तस्वीर ले ली थी।

“हम बहुत-से काम बिना ‘रेडी’ कहे कर जाते हैं। अच्छा, दिखाओ तस्वीर।”

उसने उफ़ुक के हाथ से तस्वीर ले ली।

तस्वीर में वह खुलकर हँस रही थी। हँसते हुए उसकी गर्दन हल्की पीछे झुक गई थी। हँसी रोकने के लिए उसने हाथ होंठों पर रखा हुआ था और उसकी कलाई में पहनी काली घड़ी चमक रही थी।

उफ़ुक घोड़े की लगाम थामे उसकी तरफ़ देख रहा था। उसके सिर पर परीशे का हैट था, जिसके ऊपर लगा लाल गुलाब अब मुरझा चुका था। वह किसी काउबॉय जैसा लग रहा था।

“अच्छी आई है।”
उसने तस्वीर वापस कर दी।

“तुम इसे रखना चाहती हो?”

“नहीं।”
वह अपनी सारी यादें मिटाकर लौट जाना चाहती थी।

“बहुत अच्छा!”
उफ़ुक ने तस्वीर अपनी जैकेट की जेब में रख ली, जो परीशे उसे वापस दे चुकी थी।

“घुड़सवारी करोगी?”

“नहीं! मुझे घोड़ों से डर लगता है।”
वह फौरन पीछे हट गई।

“एक बहादुर पर्वतारोही को घोड़ों से डरना नहीं चाहिए।”

“जैसे एक बहादुर पर्वतारोही को बुरे सपनों से भी डरना नहीं चाहिए?”
वह सोचते हुए बोली।

“बैठो, यह बहुत शरीफ़ घोड़ा है। खूबसूरत औरतों का सम्मान करता है।”

“शुक्रिया, मगर मैं सिर्फ़ एक लड़की हूँ।”

“अच्छा, अब ऊपर बैठो। एक पैर रकाब में रखो… हाँ, ऐसे!”

उसकी ज़िद पर वह झिझकते हुए आगे बढ़ी और पैर रकाब में रखा।

“अब दायाँ हाथ मेरे कंधे पर रखो और बायाँ पीठ पर।”

“किसकी पीठ पर?”
वह रुक गई।

“घोड़े की पीठ पर, मैडम!”
वह मुस्कुराहट दबाते हुए बोला।

“ओह!”
वह शर्मिंदा-सी हँस दी। फिर उसके कंधे का सहारा लेकर डरते-डरते घोड़े पर बैठ गई।

“डरो मत, मैंने कहा ना, यह खूबसूरत औरतों का सम्मान करता है।”

“मुझे ज़मीन पर पटकना भी इसके सम्मान का हिस्सा है या नहीं?”
वह घबराई हुई थी।

“यह तो मैंने इससे पूछा नहीं।”

अगले ही पल घोड़ा अचानक तेज़ रफ्तार से दौड़ पड़ा।

“उफ़ुक!”
वह चीख उठी।

“ओह गॉड… परी! लगाम मत छोड़ना!”

लेकिन घबराहट में उसने लगाम छोड़ दी और नीचे कूद गई। उसका बायाँ पैर रकाब में उलझ गया और वह घास पर गिर पड़ी।

उसका हैट उड़कर झील में जा गिरा और हरे-नीले पानी पर तैरने लगा।

“परी… तुम ठीक हो?”
वह भागता हुआ उसके पास आया और घुटनों के बल बैठ गया।

“मैं तो मज़ाक कर रहा था, आई एम सॉरी। मगर तुम्हें किसने कहा था कि लगाम छोड़ दो?”

“तुमने ही कहा था।”
उसने शिकायत भरी आँखों से उसकी तरफ़ देखा। आँखों में आँसू भरे थे।

“मैं तो बस ऐसे ही…”
वह सचमुच शर्मिंदा लग रहा था।

“इधर दिखाओ, हाथ को क्या हुआ?”

वह उसे कैसे बताती कि वह इस मामूली खरोंच पर नहीं रो रही थी। पूरी रात से जमा हुए आँसू किसी रास्ते बाहर आना चाहते थे।

वह उठ खड़ा हुआ। परीशे ने हाथ की पीठ से आँसू पोंछे।

“बस सनी प्लास्ट ले आओ।”

वह जाते-जाते पलटा।
“क्या?”

“प्लास्टिक वाला बैंडेज।”

“ओह, तुम सेनिटा बैंड की बात कर रही हो? अभी लाया!”

वह समझकर तंबुओं की तरफ़ चला गया। शायद तुर्की में सनी प्लास्ट को सेनिटा बैंड कहा जाता था।

वह वहीं बैठी अपनी हथेली की लकीरों के बीच लगे छोटे-से कट को देखती रही।

कुछ देर बाद उफ़ुक वापस आया।

“अब खबरदार, रोना नहीं है।”
उसने उसके हाथ पर पट्टी लगाते हुए डाँटा।

“इतनी खूबसूरत आँखों को रो-रोकर लाल कर लिया है तुमने।”

वह चौंककर उसे देखने लगी। उसने पहली बार सीधे-सीधे उसकी तारीफ़ की थी। उसके दिल में कोई नरम-सा एहसास उतर गया।

“अब दर्द हो रहा है?”
वह बेहद नरमी से पूछ रहा था।

वह कहना चाहती थी कि हाँ—दर्द बहुत हो रहा है। मगर यह दर्द हाथ में नहीं, दिल में था।

लेकिन उसने सिर्फ़ न में सिर हिला दिया।

“गुड! अब अपनी आँखें साफ करो। तुम्हारी चीखें सुनकर निशा और अर्सा जाग गई होंगी। अभी आकर पूछेंगी कि मैंने एक मंगनीशुदा लड़की से ऐसा क्या कह दिया कि वह रो पड़ी।”

वह भीगी आँखों से मुस्कुराती हुई उठ खड़ी हुई।

“तुमने तो कहा था कि यह घोड़ा खूबसूरत औरतों का सम्मान करता है?”

“हाँ, मगर तुम तो सिर्फ़ लड़की हो ना!”
वह भी हँसते हुए उसके साथ चल पड़ा।

परीशे ने अफसोस से झील की तरफ़ देखा। हरे-नीले पानी पर उसका हैट अब भी तैर रहा था।

उफ़ुक ने उसकी नज़र का पीछा किया।

“जाने दो। नई टोपी ले लेना।”

“नहीं!”
उसने उदासी से सिर हिलाया।
“नई टोपी पर ऐसा मुरझाया हुआ लाल गुलाब कहाँ होगा, जिसकी पंखुड़ियाँ किनारों से काली पड़ चुकी हों?”

“सही कह रही हो। कुछ चीज़ें खो जाएँ तो फिर वापस नहीं मिलतीं… उनका कोई विकल्प नहीं होता। कुछ इंसान भी ऐसे ही होते हैं।”

“चलो, तंबुओं की तरफ़ चलते हैं।”

वे दोनों साथ-साथ घास पर चलने लगे। वह नंगे पाँव थी, जबकि उफ़ुक अब भी मोज़ों में था।

“तुम्हारी हिम्मत अभी अधूरी है!”

“जानता हूँ… और अब मैं तुम्हें कोई मुश्किल डेयर दूँगा।”

“लेकिन वह राकापोशी पर चढ़ने वाला नहीं होगा!”
उसने पहले ही चेतावनी दे दी।

“ठीक है। अब सुनो… निशा कह रही थी कि उसके भाई के किसी दोस्त के पिता किसी खुफिया एजेंसी के चीफ हैं?”

“हाँ, तो?”

“तुम उससे कहो कि अपने राष्ट्रपति से कहकर मुझे पाकिस्तान सरकार की तरफ़ से कोई राष्ट्रपति पुरस्कार दिलवा दे।”

वह बिल्कुल बच्चों जैसी ज़िद कर रहा था।

परीशे हँस पड़ी।
“तुम्हें हमारी सरकार से पुरस्कार लेने का इतना शौक क्यों है?”

“मैं बीस साल बाद अपनी यात्रा पर किताब लिखूँगा और उसमें लिखूँगा कि जब मैं इस्लामी दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क में गया, तो वहाँ के बादशाह ने मेरी बड़ी खातिरदारी की…”
वह आँख मारकर बोला,
“समझा करो ना… शो ऑफ!”

“हसीब के दोस्त का बाप कोई रिचर्ड आर्मिटेज नहीं है कि उसकी हर बात मानी जाएगी।”

उफ़ुक ज़ोर से हँस पड़ा।

“वाह! क्या बात कही! इराक युद्ध में अमेरिका तुर्की से बार-बार गुज़ारिश करता रहा, मगर तैय्यब एर्दोगान ने अपनी सरज़मीन इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं दी।”

चलते-चलते वे एर्दोगान, मुशर्रफ और अफगान युद्ध की बातें करते रहे।

तंबुओं की तरफ़ जाने के बजाय वे फिर झील की ओर निकल आए थे। सूरज अभी पूरी तरह उगा नहीं था। फ़ज्र का वक़्त था।

“मैंने नमाज़ नहीं पढ़ी। तुम यहीं रुको, मैं वुज़ू कर लूँ।”

वह झील के किनारे बैठ गया और पानी से हाथ धोने लगा।

परीशे मुस्कुराते हुए उसे वुज़ू करते देख रही थी।

उसने टोपी उतारकर मसह किया, फिर मोज़े उतारकर पैर धोने लगा।

वह उसकी उँगलियों की हरकतें देख रही थी कि अचानक उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

वह दो कदम पीछे हट गई।

“उफ़ुक… ये…?”

वह अविश्वास से उसके बाएँ पैर को देख रही थी। उसकी आख़िरी दो उँगलियाँ नहीं थीं।

“यह पर्वतारोहियों की ज़िंदगी है, मैडम जहाँज़ेब। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।”
वह बिल्कुल इत्मीनान से अपना पैर धो रहा था।

“मगर… कैसे?”

वह मुश्किल से बोल पाई।

उफ़ुक ने लापरवाही से कंधे उचका दिए।

“फ्रॉस्टबाइट!”

अब वह फिर से मोज़े पहन रहा था।

“शायद नमाज़ क़ज़ा हो गई…”
वह अफसोस से बोला और टोपी उठाकर खड़ा हो गया।

सातवीं चोटी — भाग 1

सोमवार, 8 अगस्त 2005

“परेशे आपा, आपने हमें आखिर फँसाया कहाँ है? मैं तो सोचकर आया था कि हंज़ा पहुँचेंगे, चार-पाँच पोर्टर लेंगे, सामान खच्चरों पर लादा जाएगा और फिर बड़े आराम से जगलोत के दरिया के किनारे-किनारे तगाफरी बेस कैंप तक सफर करेंगे। हर तरफ़ जंगल, हरियाली और बहता पानी होगा… बिल्कुल वैसा ही जैसा अम्मार ने बताया था। लेकिन आपने तो हमें बर्फ़ के जहन्नुम में ला छोड़ा है। चारों तरफ़ ग्लेशियर, बर्फ़ और गहरे क्रेवस! यहाँ तो खच्चर भी नहीं आते, हम बेचारे इंसान ही क्या चीज़ हैं!”

“ख़ैर, तुम्हारे इंसान होने पर मुझे शुरू से शक है, हसीब!”
निशा ने झुंझलाकर जवाब दिया। पिछले दो दिनों में वह यह शिकायत सैकड़ों बार सुन चुकी थी।

शाहरा-ए-कराकोरम से राकापोशी के उत्तर-पश्चिमी हिस्से तक पहुँचने में दो दिन की कठिन पैदल यात्रा थी, और इन दो दिनों में हसीब शायद छह सौ बार अफ़सोस जता चुका था।

“इतना खतरनाक रास्ता चुनने की आखिर ज़रूरत क्या थी? इस एक्सपीडिशन टीम की भी समझ नहीं आती, जो राकापोशी के नॉर्थ-वेस्ट फेस से चढ़ाई करना चाहती है। आज तक इस तरफ़ से कोई चोटी तक पहुँच ही नहीं पाया!”

वे सब एक लंबी कतार में ग्लेशियर की घाटी से आगे बढ़ रहे थे। सबसे आगे परेशे थी, उसके पीछे निशा और हसीब, फिर हसीब का दोस्त, और सबसे पीछे अट्ठाईस पोर्टर्स। यह सारे पोर्टर्स उन्होंने हंज़ा से लिए थे।

“हसीब! तुम्हें दिक्कत किस बात की है? तुम्हारा सारा बोझ तो पोर्टर्स उठा रहे हैं!”
परेशे ने गुस्से से कहा। दो दिन पोर्टर्स के साथ रहकर अब वह भी बैग और सामान को “बोझ” कहने लगी थी।

नेपाल में जो काम शेरपा करते हैं, पाकिस्तान में वही काम पोर्टर्स करते हैं। सीज़न के दिनों में ये लोग सैलानियों और पर्वतारोहियों का सामान उठाकर उन्हें उनकी मंज़िल तक पहुँचाते हैं।

दो दिन पहले जब परेशे ने इतने सारे पोर्टर्स रखने का फैसला किया था, तब निशा हैरान रह गई थी।

“इतने पैसे खर्च करने की क्या ज़रूरत थी? हम इनके बिना भी जा सकते थे।”

“हाँ, जा तो सकते थे,” परेशे ने जवाब दिया था,
“बस फर्क इतना पड़ता कि हम दो दिन नहीं, शायद दो महीने में भी राकापोशी तक न पहुँच पाते।”

पिछले दो दिनों से वे लगातार इन बर्फ़ीली घाटियों में पैदल सफर कर रहे थे। यह वह दुनिया थी जहाँ दूरी को किलोमीटर या मील से नहीं, बल्कि दिनों, हफ्तों और महीनों से मापा जाता था।

जब से परेशे ने यह सफर शुरू किया था, उसे इस्लामाबाद, कराची, लेक डिस्ट्रिक्ट—सब कुछ पीछे छूटता हुआ महसूस होने लगा था। ऐसा लगता था जैसे वे लोग सदियों पीछे चले गए हों, उस दौर में जब इंसान सिर्फ़ पैदल, पत्थरों और बर्फ़ के रास्तों पर सफर किया करते थे।

“वैसे सच कहूँ, हमसे बड़ा पागल कोई नहीं होगा जो घरों का आराम छोड़कर इन पहाड़ों में ट्रैकिंग करने निकल पड़ता है। और आपा जैसी पागल तो दुनिया में दूसरी नहीं होगी, जो इन पहाड़ों को फतह करने के सपने देखती है!”

परेशे ने उसकी बात अनसुनी कर दी।

“अब कितना रास्ता बाकी है?”
उसने पीछे चलते पोर्टर्स के सरदार से पूछा।

“बस मैडम, आधा घंटा और!”
पोर्टर सरदार ने हमेशा की तरह वही जवाब दिया।

“पिछले बारह घंटों से यही ‘आधा घंटा और’ सुन रहा हूँ मैं!”
पीछे से किसी ने अंग्रेज़ी में बड़बड़ाया।

परेशे ने पलटकर देखा। हसीब का दोस्त एक बर्फ़ीले नाले के किनारे खड़ा हुआ शिकायत कर रहा था। वह उसे कोई सख्त जवाब देने ही वाली थी कि सामने से आते लोगों को देखकर उसका ध्यान उधर चला गया।

ग्लेशियर के उस पार से एक दूसरी टीम उनकी तरफ़ आ रही थी।

परेशे तेज़ कदमों से उनकी तरफ़ बढ़ी। इतने वीरान इलाक़े में इंसानों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे बरसों बाद किसी आबादी का निशान मिला हो।

“अस्सलामु अलैकुम… पाकिस्तानी?”
हालाँकि उनके चेहरों से ही अंदाज़ा हो रहा था, फिर भी पास पहुँचकर उसने पूछा।

“जी मैम, पाकिस्तानी… अल्हम्दुलिल्लाह!”
उनमें से एक आदमी थका हुआ जरूर लग रहा था, लेकिन उसके लहजे में फौजी-सी ठहराव और रौब था। परेशे उसकी हेयरकट से ही समझ गई थी कि वह आर्मी से है। बाकी लोग भी फौजी लग रहे थे।

मफलर और चश्मे की वजह से वह उसका चेहरा साफ़ नहीं देख पाई।

“आप लोग बेस कैंप से आ रहे हैं? वहाँ मौसम कैसा है?”

“मौसम?”
उनके एक साथी ने हँसते हुए सिर झटका और आगे बढ़ गया।

तभी उनके लीडर—मेजर आतहर—ने जवाब दिया,
“मौसम का मत पूछिए, मिस! हम लोग पाकिस्तानी आर्मी की मिलिट्री एक्सपीडिशन पर थे। पाँच हजार मीटर की ऊँचाई पर तंबुओं में फँसे आठ दिन तक मौसम साफ़ होने का इंतज़ार करते रहे। आखिर हार मानकर नीचे उतर आए। और जिस दिन बेस कैंप पहुँचे, उसी दिन मौसम खुल गया!”

उसकी बात सुनकर परेशे हँस पड़ी।

“अच्छा, अभी बेस कैंप में कौन-कौन है?” उसने पूछा।

“अल्बर्टो की टीम तो है… मगर वे भी शायद वापसी का सोच रहे हैं।”
मेजर आतहर मुस्कुराया,
“और वहाँ दो पागल अभी भी मौजूद हैं।”

“अफ़क़ अरसलान की टीम?”
उसका दिल अचानक तेज़ धड़कने लगा।

उसने अनायास मेजर आतहर के पीछे नज़र डाली। दूर काले कराकोरम पर्वतों के बीच से राकापोशी की विशाल सफेद चोटी झाँक रही थी।

वह अब बहुत करीब थी।

“जी, वही।”
मेजर आतहर ने सिर हिलाया।
“जो अभी आगे गया है ना—मेजर आसिम—वह अफ़क़ अरसलान का दोस्त भी है और लायज़न ऑफिसर भी। अफ़क़ को कुछ सामान चाहिए था, उसी के लिए वह हंज़ा जा रहा है।”

परेशे ने पलटकर देखा। मेजर आसिम अब उनसे काफी दूर जा चुका था।

सातवीं चोटी — भाग 1 (Unique Rewrite Version)

सोमवार, 8 अगस्त 2005

“आपने हमें आखिर कहाँ लाकर फँसा दिया है, परेशे आपा?”
हसीब बर्फ़ में पैर घसीटते हुए कराह रहा था।
“मैं तो सोचकर आया था कि हंज़ा पहुँचेंगे, चार-पाँच पोर्टर लेंगे, सामान गधों पर लादा जाएगा, फिर जगलोत नदी के किनारे-किनारे बड़ा रोमांटिक सफर होगा। तगाफरी बेस कैंप, हरियाली, जंगल, बहते दरिया… ठीक वैसा जैसा अम्मार ने बताया था। मगर आपने तो हमें इन बर्फ़ीले जहन्नमों में पहुँचा दिया! हर तरफ बर्फ़ ही बर्फ़, नीचे क्रेवास, ऊपर ग्लेशियर… यहाँ तो गधे भी आने से डरें, हम बेचारे इंसान क्या करें!”

“खैर, तुम्हारे इंसान होने पर मुझे शुरू से शक है, हसीब!”
निशा ने झुंझलाकर जवाब दिया। पिछले दो दिनों में वह यह शिकायत शायद सैकड़ों बार सुन चुकी थी।

“सच कह रहा हूँ!” हसीब अब भी बड़बड़ा रहा था।
“इस एक्सपीडिशन टीम की अक्ल घास चरने गई थी क्या, जो राकापोशी के नॉर्थ-वेस्ट फेस से चढ़ाई करने निकली है? इस रास्ते से आज तक कोई चोटी तक नहीं पहुँच पाया!”

वे सब एक लंबी ग्लेशियल घाटी में कतार बनाकर आगे बढ़ रहे थे। सबसे आगे परेशे थी, उसके पीछे निशा और हसीब, फिर हसीब का दोस्त, और सबसे आखिर में अट्ठाईस पोर्टर, जिन्हें वे हंज़ा से साथ लाए थे।

“हसीब! तुम्हें आखिर दिक्कत क्या है?”
परेशे पलटकर गुस्से से बोली।
“तुम्हारा तो पूरा बोझ पोर्टर उठा रहे हैं!”

दो दिन पोर्टरों के साथ सफर करते-करते वह भी रक्सैक को “बोझ” कहने लगी थी।

नेपाल में जो काम शेरपा करते हैं, पाकिस्तान में वही जिम्मेदारी पोर्टरों की होती है। सीजन के दिनों में ये लोग सैलानियों और पर्वतारोहियों का सामान उठाकर उन्हें मुश्किल रास्तों से उनकी मंज़िल तक पहुँचाते हैं।

दो दिन पहले जब परेशे ने इतने सारे पोर्टर रखे थे, तो निशा हैरान रह गई थी।

“इतने पैसे खर्च करने की क्या ज़रूरत थी?”
उसने पूछा था।
“हम खुद सामान उठाकर भी तो जा सकते थे।”

“हाँ, जा तो सकते थे,” परेशे ने हँसकर कहा था,
“बस फर्क इतना पड़ता कि दो दिन का सफर दो महीने में पूरा होता।”

पिछले अड़तालीस घंटों से वे इन बर्फ़ीली घाटियों में लगातार पैदल चल रहे थे। यह वह इलाका था जहाँ दूरियाँ किलोमीटरों से नहीं, दिनों और हफ्तों से नापी जाती थीं।

जब से यह सफर शुरू हुआ था, परेशे इस्लामाबाद, कराची, मरी—सब भूल चुकी थी। उसे महसूस हो रहा था जैसे वह सदियों पीछे किसी और दौर में पहुँच गई हो, जहाँ इंसान सिर्फ अपने पैरों के सहारे पहाड़ों और बर्फ़ों पर सफर किया करते थे।

“वैसे सच बताऊँ,” हसीब फिर शुरू हो गया,
“हमसे बड़ा पागल कोई नहीं, जो घरों का आराम छोड़कर इन पहाड़ों में ट्रैकिंग करने निकल आते हैं। और आपा जैसा पागल तो शायद पूरी दुनिया में नहीं होगा, जो इन पहाड़ों को जीतना चाहती हैं।”

परेशे ने उसकी बात अनसुनी कर दी।

“अब कितना रास्ता बाकी है?”
उसने पीछे चलते पोर्टरों के सरदार से पूछा।

“बस मैडम, आधा घंटा और!”
उसने हमेशा की तरह वही जवाब दिया।

पीछे से किसी ने अंग्रेज़ी में झुंझलाकर कहा—
“पिछले बारह घंटे से यही ‘आधा घंटा और’ सुन रहा हूँ!”

परेशे ने पलटकर देखा। हसीब का दोस्त बर्फ़ीले नाले के पास खड़ा बड़बड़ा रहा था। वह उसे जवाब देने ही वाली थी कि सामने से आती एक टीम दिखाई दी।

“अस्सलामु अलैकुम… पाकिस्तानी?”

परेशे तेज़ कदमों से उनकी ओर बढ़ी। इतने वीरान इलाक़े में किसी इंसान को देखना ही अजीब-सा सुकून दे रहा था।

उनकी संख्या पाँच थी। पोर्टर उनसे काफी पीछे चल रहे थे।

“जी मैम, पाकिस्तानी… अल्हम्दुलिल्लाह!”
उनमें से एक ने जवाब दिया।

उसके लहजे और अंदाज़ से परेशे तुरंत समझ गई कि वह फौजी है। बाकी लोग भी आर्मी से लग रहे थे।

“आप लोग बेस कैंप से लौट रहे हैं?”
उसने पूछा।
“वहाँ मौसम कैसा है?”

“मौसम?”
पीछे खड़े एक जवान ने हँसते हुए सिर झटका और आगे बढ़ गया।

तब उनके लीडर, मेजर आतहर ने जवाब दिया—
“मौसम का मत पूछिए, मिस! हम पाकिस्तानी आर्मी की मिलिटरी एक्सपीडिशन पर थे। पाँच हजार मीटर की ऊँचाई पर आठ दिन तक तंबुओं में फँसे रहे, बस मौसम साफ़ होने का इंतज़ार करते हुए। आखिर हार मानकर नीचे लौट आए। और मज़े की बात यह कि जिस दिन बेस कैंप पहुँचे, उसी दिन मौसम एकदम साफ़ हो गया!”

उसकी बात सुनकर परेशे हँस पड़ी।

“अभी बेस कैंप में कौन-कौन है?”

“अल्बर्टो की टीम है,” मेजर आतहर बोला,
“हालाँकि वे भी वापस जाने का सोच रहे हैं। और हाँ… वहाँ दो पागल और भी हैं।”

परेशे का दिल अचानक तेज़ धड़कने लगा।

“अफ़क़ अरसलान की टीम?”

उसने अनायास राकापोशी की ओर देखा।
काले काराकोरम पहाड़ों के पीछे से झाँकती बर्फ़ से ढकी वह विशाल सफ़ेद चोटी बेहद करीब महसूस हो रही थी।

“जी, वही।”
मेजर आतहर ने सिर हिलाया।
“मेजर आसिम—जो अभी आगे गया है—अफ़क़ का दोस्त भी है और लायज़न अफ़सर भी। अफ़क़ को कुछ सामान चाहिए था, इसलिए वह हंज़ा जा रहा है।”

परेशे ने पलटकर देखा। मेजर आसिम अब काफी दूर जा चुका था।


मिलिटरी टीम से विदा लेकर वे लोग फिर आगे बढ़ने लगे।

हंज़ा और नगर की नदियाँ अब बहुत पीछे छूट चुकी थीं। रास्ते में परेशे ने हंज़ा नदी के पानी में सोने के ज़र्रे ढूँढने की कोशिश भी की थी। उसने सुना था कि सिकंदर-ए-आज़म की नस्ल जिस घाटी—हंज़ा—में बसती है, वहाँ की नदियों से सोना निकलता है। मगर उसे कुछ हासिल नहीं हुआ।

“यार, कितना लंबा रास्ता है!”
हसीब का दोस्त फिर शिकायत कर रहा था।
“सरकार को यहाँ तक सड़क बना देनी चाहिए, आदमी आराम से पहुँच तो जाए।”

“ताकि मरी की तरह हर कोई मुँह उठाकर चला आए?”
परेशे ने तुरंत जवाब दिया।
“नहीं जनाब! राकापोशी का हुस्न कीमत माँगता है। उसे देखने के लिए इंसान को पैदल मीलों चलना पड़ता है।”

“वाह!” निशा हँसी।
“लगता है राकापोशी देखकर इंसान समझदार हो जाता है। हसीब जैसा आदमी भी आज फ़लसफ़ा झाड़ रहा है!”

आगे की बातें परेशे सुन ही नहीं पाई।

क्योंकि बेस कैंप के करीब पहुँचते ही उसने अपना रक्सैक बर्फ़ पर फेंका और बाकी सबको पीछे छोड़ते हुए दौड़ पड़ी।

उसके सामने पर्वतों की देवी राकापोशी अपने पूरे वैभव के साथ खड़ी थी… मगर उसे उस पर्वत से ज़्यादा उस इंसान की तलाश थी, जिसके लिए वह यहाँ तक आई थी।

राकापोशी के तलहटी में पत्थरों और मोरेन पर बना बेस कैंप किसी बालकनी जैसा दिखाई दे रहा था। चारों ओर नीले, पीले और लाल तंबू लगे थे।

नीचे, लगभग सौ मीटर दूर, एक विशाल और डरावना ग्लेशियर फैला था—ब्रो ग्लेशियर।

उसी खतरनाक ग्लेशियर पर अफ़क़ अरसलान और अल्बर्टो की टीम ने अपना कैंप लगाया हुआ था—ठीक उसी जगह जहाँ 1979 में एक पोलिश-पाकिस्तानी टीम ने कैंप लगाया था और अगले ही दिन राकापोशी से टूटकर आई भयंकर बर्फ़ानी दीवार ने पूरे कैंप को तबाह कर दिया था।

परेशे अपने हल्के वाटरप्रूफ ट्रैकिंग बूट्स के सहारे बर्फ़ पर दौड़ती हुई तंबुओं तक पहुँची।

उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

“अफ़क़ अरसलान कहाँ है?”
उसने सामने आते एक इतालवी पर्वतारोही से पूछा।

“इन द मेस टेंट… द लास्ट वन!”
उसने टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में जवाब दिया और आगे बढ़ गया।

परेशे तेजी से आखिरी नीले तंबू तक पहुँची। अंदर जाने से पहले उसने गहरी साँस ली, सिर से ऊनी टोपी उतारकर अपनी पोनी ठीक की, फिर टोपी दोबारा पहन ली। सनग्लासेस उतारकर जेब में रखे और खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश करते हुए तंबू की ज़िप खोलकर अंदर झाँका।

अफ़क़ अंदर कुर्सी पर बैठा था। उसकी पीठ परेशे की ओर थी। बाहर से आती ठंडी हवा तंबू के कपड़े को लगातार हिला रही थी।

वह अंदर चली गई।

“कैसे हो, अफ़क़?”

उसने धीमे स्वर में पूछा।

अफ़क़ चौंककर मुड़ा और उसे देखकर खड़ा हो गया।

“आई एम फाइन।”

परेशे को उम्मीद थी कि उसे देखकर वह हैरान होगा, खुश होगा… मगर उसके चेहरे पर वैसा कुछ नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था और अचानक उससे बाहर निकला हो।

परेशे उससे बहुत कुछ पूछना चाहती थी—
उसने इतने दिन कैसे बिताए?
क्या वह उसका इंतज़ार कर रहा था?
उसे देखकर खुश हुआ या नहीं?

मगर इससे पहले कि वह कुछ कहती, उसकी नज़र अफ़क़ के हाथ में पकड़ी एक छोटी-सी पासपोर्ट साइज तस्वीर पर टिक गई।

“यह क्या है?”

उसने पूछा।

अफ़क़ ने तस्वीर की ओर देखा, फिर एक अजीब-सी घायल मुस्कान उसके चेहरे पर उभरी।

उसने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी।

“यह हनादे है।”

“कौन हनादे?”

परेशे ने तस्वीर लेने के लिए हाथ बढ़ाया। तस्वीर में सुनहरे बालों और खूबसूरत आँखों वाली एक लड़की मुस्कुरा रही थी।

अफ़क़ ने बेहद सामान्य लहजे में कहा—

“हनादे… मेरी बीवी।”

परेशे का हाथ हवा में ही रुक गया।

फिर धीरे-धीरे नीचे गिर गया।

उसे लगा जैसे काराकोरम की सारी चोटियाँ एक साथ उसके ऊपर आ गिरी हों।

“बीवी…?”

वह अविश्वास से उसे देखती हुई दो कदम पीछे हट गई।

उसने अपनी हैरानी, अपना सदमा छुपाने की कोशिश तक नहीं की।

जैसे किसी ने उसके पैरों तले ज़मीन खींच ली हो… और वह बस फटी आँखों से अफ़क़ अरसलान को देखे जा रही हो।

सातवीं चोटी — भाग 2 (Unique Rewrite Version)

“हाँ… यह उसकी तस्वीर है।”

अफ़क़ ने बेहद सामान्य अंदाज़ में तस्वीर वापस अपने वॉलेट में रखते हुए कहा।
“बस यूँ ही निकालकर देख रहा था। खैर… तुम कब पहुँची?”

“अभी।”

परेशे का लहजा अचानक ठंडा और बेरुख़ हो गया था। उसने चेहरा दूसरी तरफ़ फेर लिया।

“मुझे पता था तुम ज़रूर आओगी।”

अफ़क़ मुस्कुराया।
“मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था… और देखो, मेरा इंतज़ार बेकार नहीं गया।”

कभी-कभी इंसान जब धोखा खा जाता है, तो सामने वाले की मुस्कान भी उसे छल जैसी लगती है।
परेशे के भीतर जैसे किसी ने उसके आत्मसम्मान को बुरी तरह घायल कर दिया था।

“रुको, मैं तुम्हारी बाकी टीम को भी देख लूँ।”

शायद अफ़क़ ने उसके बदले हुए अंदाज़ को महसूस ही नहीं किया था।
वह उससे थोड़ा हटकर बाहर निकल आई। अफ़क़ भी उसके पीछे चला आया।

“ये तुम्हारी सपोर्ट टीम है?”

उसने नीचे आते लोगों को देखते हुए पूछा।
“सिर्फ ट्रैकर्स हैं या क्लाइंब भी करेंगे?”

“सिर्फ ट्रैकर्स।”

वह उससे थोड़ा फासला बनाकर पत्थरों के बीच नीचे उतरने लगी, जहाँ उसकी टीम के लोग पहुँच चुके थे। सबने उत्साह में अपने रक्सैक बर्फ़ पर फेंक दिए थे और राकापोशी की शानदार चोटी को मंत्रमुग्ध होकर देख रहे थे।

मगर परेशे के लिए उस वक़्त वहाँ मौजूद हर खूबसूरती अपना अर्थ खो चुकी थी।

दूर एक बड़े पत्थर पर अर्सा बैठी थी। उसने घुटनों पर कुछ कागज़ रखे हुए थे और उनमें कुछ लिख रही थी। शोर सुनकर उसने सिर उठाया।

जैसे ही उसकी नज़र परेशे पर पड़ी, वह कागज़ वहीं छोड़कर लगभग दौड़ती हुई उसकी तरफ़ आई।

“परेशे आपी! आप यहाँ?”

वह खुशी से लगभग चीख पड़ी।
“ओह माय गॉड… मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा!”

वह दौड़कर उससे लिपट गई।

फिर अलग होकर दोनों हाथों से उसके कंधे पकड़ते हुए बोली—

“यक़ीन करें, आज सुबह ही मैं आपके बारे में सोच रही थी! बहुत अच्छा किया जो आप आ गईं। लेकिन इतनी जल्दी आपका क्लाइंबिंग परमिट कैसे बन गया?”

“कम ऑन, मैं पाकिस्तानी हूँ।”

परेशे ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“मुझे किसी क्लाइंबिंग परमिट की ज़रूरत नहीं।”

उसकी मुस्कान फीकी थी और आवाज़ में बनावटी खुशमिज़ाजी साफ़ महसूस हो रही थी।

बेस कैंप अब उनकी आमद से पूरी तरह जाग चुका था।
कहीं तंबू लगाए जा रहे थे, कहीं लोग रस्सियाँ और सामान व्यवस्थित कर रहे थे। कुछ लड़के पोर्टरों की मदद में लग गए थे।

परेशे अपने साथ एक कुक — शफाली — भी लाई थी, जिसने पत्थरों के बीच चूल्हा जमा लिया था और अब रोटियाँ सेंकने में व्यस्त था।

उधर पाउलो अल्बर्टो की इतालवी टीम भी उनके पास आ गई।

अल्बर्टो को अंग्रेज़ी बिल्कुल नहीं आती थी, मगर उसकी टीम का एक सदस्य टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में सबको समझा रहा था कि वे लोग अगली सुबह बेस कैंप छोड़ देंगे। अब उनका इरादा राकापोशी के बजाय बल्तोरो क्षेत्र की किसी दूसरी चोटी पर चढ़ाई करने का था।

परेशे ने पोर्टरों की पूरी मजदूरी उनके सरदार के हाथ में रखी। यही वहाँ का नियम था—पहले रकम सरदार को मिलती थी, फिर वही उसे बाकी पोर्टरों में बाँटता था।

उसके बाद वह सीधे अपने तंबू में चली आई।

अंदर आकर उसने मैट बिछाया, स्लीपिंग बैग खोला और उसमें लेटकर आँखें बंद कर लीं।

बाहर लोगों की आवाज़ें, हँसी, बर्तनों की खनखनाहट, फुसफुसाहटें—सब कुछ उसके कानों तक पहुँच रहा था, मगर उसका मन किसी और ही जगह अटका हुआ था।

हिनादे… अफ़क़ की बीवी…

वह शादीशुदा था।

किसी और का था।

तो फिर उसने उसे काराकोरम के ताजमहल पर क्यों बुलाया था?

क्या उसने अफ़क़ को गलत समझ लिया था?

क्या वह सिर्फ़ अपने ही ख़्वाबों में जीती रही?

क्या उसने खुद को धोखा दिया था?

इन्हीं उलझे सवालों के बीच जाने कब उसकी आँख लग गई।

रात को अफ़क़ उसे खाने के लिए बुलाने आया भी था, मगर उसे सोता देखकर चुपचाप वापस लौट गया।


मंगलवार, 9 अगस्त 2005

हर तरफ़ घना कोहरा फैला हुआ था।

इतना गहरा कि लगता था जैसे वह किसी बादल के भीतर कैद हो गई हो।

उस धुंध के बीच उसे कोई दिखाई दिया।

हरी आँखें… सुनहरे बाल…

हिनादे।

वह सामने खड़ी परेशे को देख रही थी।

फिर उसके होंठों पर एक तंज़भरी मुस्कान फैल गई।

“अफ़क़ मेरा है…”

उसकी आवाज़ कोहरे में गूँज उठी।

“सिर्फ़ मेरा!”

उसकी चीख इतनी तेज़ थी कि परेशे को लगा उसके कान फट जाएँगे।

एक अजीब गुस्से और घबराहट में वह आगे बढ़ी और दोनों हाथों से हिनादे को ज़ोर का धक्का दे दिया।

हिनादे चीखती हुई पीछे की तरफ़ लड़खड़ाई।

और अगले ही पल—

उसका शरीर किसी गुड़िया की तरह बर्फ़ीली चोटी से नीचे खाई में गिरने लगा।

उसकी चीखें पहाड़ों में गूँज रही थीं।

भारी… डरावनी… गड़गड़ाहट जैसी आवाज़ें…

ऐसा लग रहा था जैसे पूरा पहाड़ टूटकर नीचे गिर रहा हो।

छठी चोटी — पुनर्लेखन (कॉपीराइट-फ्री और यूनिक)


शनिवार, 30 जुलाई 2005

घोड़े की तेज़ टापों की आवाज़ सुनकर उसने पीछे मुड़कर देखा। दूर तंबुओं की दिशा से उफ़क घोड़ा दौड़ाता उसकी तरफ चला आ रहा था। वह अब भी उसी जगह बैठी थी, जहाँ पिछली रात उफ़क ने उसे छोड़ा था। क्षितिज पर नई सुबह धीरे-धीेरे रंग बिखेर रही थी। झील का पानी हल्के हरे रंग में डूबा दिखाई देता था, क्योंकि सूरज की किरणें अभी उस तक पहुँची नहीं थीं।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

घोड़े को उसके पास रोकते हुए उफ़क ने पूछा।

“ज़िंदगी में पहली बार हारने की सज़ा भुगत रही हूँ। मगर या तो माहोड़ंड की मछलियाँ बहुत चालाक हैं या मेरी किस्मत बेहद खराब।”

उसके हाथ में फिशिंग रॉड थी।

“ओह खुदाया! क्या तुम पूरी रात यही करती रहीं?”

उसकी शहद रंग आँखों में हैरानी उतर आई।

“सोई नहीं?”

“किसी फ़िलॉसफ़र ने कहा था— सोना वक्त बर्बाद करना है।”

वह यह नहीं बता सकती थी कि उसे पूरी रात नींद ही नहीं आई।

“माफ करना, मगर मैं बताना भूल गया था कि इन दिनों माहोड़ंड में मछलियाँ नहीं मिलतीं।”

घोड़े की लगाम थामे वह शरारती मुस्कान के साथ बोला।

“क्या?”

वह तुरंत खड़ी हो गई। उसकी गोद में रखा हैट घास पर गिर पड़ा।

“तुमने मुझे गलत डेयर क्यों दिया?”

“उसी फ़िलॉसफ़र ने ये भी कहा था कि समय बर्बाद करने के कई और तरीके होते हैं।”

वह हँस पड़ा।

“बहुत शानदार! अब नई रॉड तुम खरीदोगे।”

गुस्से में उसने उफ़क की रॉड उठाई और सीधा झील में फेंक दी। रॉड पानी में डूब गई।

“मैं इससे नदी में ट्राउट पकड़ने वाला था। अब तुम खुद ही ट्राउट से महरूम हो गईं।”

“मैं ट्राउट खाए बिना भी आराम से ज़िंदगी जी सकती हूँ।”

वह हैट सिर पर रखकर आगे बढ़ गई।

“सुनो, काराकोरम की परी!”

उसके कदम ठहर गए।

“तुम्हारे साथ एक यादगार तस्वीर लेने का मन है।”

“नहीं!”

वह फिर आगे बढ़ी।

“मगर मेरा दिल चाहता है!”

वह घोड़े से उतरकर जल्दी से उसके पास आया और उसका हैट उतार लिया।

“क्या कर रहे हो?”

उफ़क ने अपनी कैप उसके सिर पर रख दी। फिर जैकेट, घड़ी और मफलर भी उसे पकड़ा दिए, जबकि उसकी घड़ी खुद पहन ली।

“तुम आखिर करना क्या चाहते हो?”

“मिडिल ईस्ट टेक्निकल यूनिवर्सिटी में आख़िरी दिन मैंने और जेनिक ने एक-दूसरे की चीज़ें पहनकर तस्वीर ली थी। बहुत यादगार तस्वीर थी।”

उसे उफ़क की चीज़ें पहने और उसे अपना हैट लगाए देखकर हँसी आ गई।

“हम दोनों बहुत मज़ेदार लग रहे हैं।”

“हम नहीं… सिर्फ़ तुम!”

वह मुस्कुराकर बोला।

पास खड़े अमीर हसन को उसने कैमरा पकड़ा दिया और इशारों में तस्वीर लेने का तरीका समझाया।

दोनों घोड़े के साथ खड़े हो गए। उफ़क ने एक हाथ से लगाम पकड़ रखी थी।

“तस्वीर निकलने के बाद लिख देना कि घोड़ा मेरी दाईं तरफ है!”

पुरानी बात याद दिलाकर वह खुद हँस पड़ी।

उसी पल फ्लैश चमका और तस्वीर बाहर निकल आई।

“फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर तुम्हारा भविष्य बहुत उज्ज्वल है!”

वह झुंझलाकर बोला क्योंकि अमीर हसन ने बिना “रेडी” कहे तस्वीर ले ली थी।

“यह तुम्हें धन्यवाद कह रहा है!”

हँसी रोकते हुए परीशे ने समझाया।

“खैर, इसमें इसका कसूर नहीं। तुम सारे पाकिस्तानी बिना ‘रेडी’ बोले तस्वीरें खींच लेते हो।”

तस्वीर झाड़ते हुए वह मुस्कुराया।

उसे मरी की वह तस्वीर याद आ गई जो उसने भी बिना बताए खींच ली थी।

“हम बहुत से काम बिना ‘रेडी’ कहे कर देते हैं। अच्छा, तस्वीर दिखाओ।”

उसने तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

तस्वीर में वह ज़ोर से हँस रही थी। हँसते वक्त उसकी गर्दन थोड़ा पीछे झुक जाती थी। हँसी रोकने के लिए उसने हाथ मुँह पर रखा हुआ था और उसकी कलाई की काली घड़ी चमक रही थी। उफ़क घोड़े की लगाम पकड़े उसकी तरफ देख रहा था। उसके सिर पर परीशे का गुलाब वाला हैट था, जो अब उसे किसी काउबॉय जैसा बना रहा था।

“अच्छी आई है।”

उसने तस्वीर वापस कर दी।

“तुम इसे रखना चाहती हो?”

“नहीं।”

वह अपनी हर याद मिटाकर लौट जाना चाहती थी।

“बहुत बढ़िया!”

उफ़क ने तस्वीर जैकेट की जेब में रख ली।

“घुड़सवारी करोगी?”

“नहीं, मुझे घोड़ों से डर लगता है!”

वह तुरंत पीछे हट गई।

“एक बहादुर पर्वतारोही को घोड़े से डरना नहीं चाहिए।”

“जैसे एक बहादुर पर्वतारोही को बुरे सपनों से भी नहीं डरना चाहिए?”

उसने मन ही मन सोचा।

“बैठ जाओ, यह बहुत शरीफ़ घोड़ा है। खूबसूरत औरतों की इज़्ज़त करता है।”

“शुक्रिया, मगर मैं सिर्फ़ एक लड़की हूँ।”

“अच्छा, अब ऊपर बैठो। एक पैर रकाब में रखो।”

उसकी ज़िद पर उसने झिझकते हुए पैर रकाब में रखा।

“अब दायाँ हाथ मेरे कंधे पर और बायाँ पीठ पर रखो।”

“किसकी पीठ पर?”

वह रुक गई।

“घोड़े की पीठ पर, मैडम!”

वह मुस्कान दबाते हुए बोला।

“ओह…”

वह शर्मिंदा होकर हँसी और डरते-डरते घोड़े पर बैठ गई।

“डरो मत, मैंने कहा ना, यह खूबसूरत औरतों का सम्मान करता है।”

“मुझे नीचे पटकना भी इसके सम्मान में शामिल है या नहीं?”

वह सचमुच डरी हुई थी।

“यह तो मैंने इससे पूछा नहीं।”

उसी क्षण घोड़ा अचानक गोली की तरह भाग निकला।

“उफ़क!”

वह चीखी।

“ओह गॉड… परी! लगाम पकड़ो, नीचे मत कूदना!”

मगर डर के मारे उसने लगाम छोड़ दी और छलांग लगा दी। उसका बायाँ पैर रकाब में फँस गया और वह घास पर गिर पड़ी।

उसका हैट उड़कर झील में जा गिरा और पानी पर तैरने लगा।

“परी… तुम ठीक हो?”

उफ़क भागता हुआ उसके पास आया और घुटनों के बल बैठ गया।

“मैं मज़ाक कर रहा था, आई एम सॉरी। मगर तुमने लगाम क्यों छोड़ दी?”

“तुमने ही कहा था!”

उसने भीगी आँखों से शिकायत की।

“मैं तो बस…”

वह सचमुच शर्मिंदा था।

“दिखाओ, हाथ में क्या हुआ?”

वह कैसे बताती कि वह मामूली चोट पर नहीं रो रही थी… बल्कि रात भर से जमा आँसू बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहे थे।

“बस सनी प्लास्ट ले आओ।”

वह जाते-जाते रुका।

“क्या?”

“प्लास्टिक वाला बैंडेज।”

“ओह… सेनिटा बैंड!”

वह समझ गया और तंबू की ओर चला गया।

परीशे घास पर बैठी अपनी हथेली के कट को देखती रही।

कुछ देर बाद उफ़क पट्टी लेकर लौट आया।

“अब खबरदार, रोना नहीं है।”

उसने पट्टी लगाते हुए डाँटा।

“इतनी खूबसूरत आँखों को रो-रोकर लाल कर लिया है तुमने।”

वह चौंक गई।

उसने पहली बार सीधे उसकी खूबसूरती की तारीफ की थी। उसके भीतर कोई नरम एहसास जाग उठा।

“अब दर्द हो रहा है?”

उसने नरमी से पूछा।

वह कहना चाहती थी— हाँ, बहुत… मगर दिल में।

लेकिन उसने सिर्फ़ सिर हिला दिया।

“गुड। अब आँखें साफ करो। तुम्हारी चीखों से निशा और अर्सा जाग गई होंगी। अभी पूछेंगी कि मैंने मंगनीशुदा लड़की से ऐसा क्या कह दिया कि वह रोने लगी।”

वह आँसुओं के बीच मुस्कुरा उठी।

“तुमने कहा था यह घोड़ा खूबसूरत औरतों का सम्मान करता है।”

“हाँ, मगर तुम तो सिर्फ़ लड़की हो ना!”

वह हँस पड़ा।

सातवीं चोटी — भाग 1 (यूनिक और कॉपीराइट-फ्री पुनर्लेखन)


“मैं हेलीकॉप्टर से पहुँचा था…”

मेजर आसिम हल्का-सा हँसा।

“दो साल पहले बल्तोरो में मैं अर्सलान का लियाज़ अफ़सर रह चुका हूँ। अब इन्हें यहाँ लाना था… और साथ में इसकी कुछ चीज़ें भी, बिना कोई फीस लिए उठा लाया।”

“अच्छा…”

उसने बिना अफ़क़ की ओर देखे वहाँ से कदम बढ़ा दिए।


नाश्ते के बाद

वह उसके पास आया। परीशे अपने तंबू के बाहर पड़े पत्थरों पर बैठी थी।

“तुमने आज और कल ठीक से आराम किया?”

वह उसी अपनापन और फिक्र के साथ उसके बगल में बैठ गया। दोनों के सामने राकापोशी की फैली पर्वतमाला थी।

“हूँ…”

उसने नज़र उठाकर भी नहीं देखा।

“आज हम 4800 मीटर तक जाएँगे। मौसम अब बेहतर हो रहा है। हमें आज से ऐक्लिमेटाइजेशन शुरू कर देनी चाहिए।”

“ठीक है।”

“तुम इतनी परेशान थीं कि इजाज़त नहीं मिलेगी… और देखो, तुमने थोड़ा ज़ोर दिया तो तुम्हारे पापा मान गए…”

“मैं कपड़े बदल लूँ?”

वह अचानक उठ खड़ी हुई।

उसकी बात अधूरी रह गई। उसने हल्के से सिर हिलाया।

“ठीक है… मैं इंतज़ार करूँगा।”

“हूँ… इंतज़ार तो मैंने किया था।”

बिना उसकी ओर देखे वह अपने नारंगी तंबू में चली गई।


एक घंटे बाद

वह फरीद और अफ़क़ के साथ आइस-ऐक्स हाथ में लिए राकापोशी की ढलानों पर चढ़ रही थी।

उसे ऐक्लिमेटाइजेशन की बेहद ज़रूरत थी। उसके शरीर और फेफड़ों को कम ऑक्सीजन वाली ऊँचाइयों का आदी होना था, मगर फिलहाल उसका मन ही नई सच्चाइयों को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।

पूरा रास्ता वह चुप रही।

अफ़क़ लगातार उससे बातें करता रहा और रास्ता समझाता रहा।


राकापोशी के तीन रास्ते थे

पहला — दक्षिण-पूर्वी फेस, जो “जोगलत गोह” ग्लेशियर से होकर जाता था। लंबा मगर अपेक्षाकृत आसान रास्ता।

दूसरा — पश्चिमी फेस, यानी पासान ग्लेशियर।

और तीसरा — उत्तर-पश्चिमी रिज (N.W Ridge), दुनिया का सबसे लंबा रिज, जहाँ से आज तक कोई सफल चढ़ाई नहीं कर पाया था।

अफ़क़ की टीम उसी कठिन रास्ते को चुनकर आई थी।


दो घंटे बाद

वे कैंप वन पहुँच गए।

अफ़क़ और फरीद तुरंत सामान तंबुओं में रखने लगे। परीशे चुपचाप उसे देखती रही। उसके सिर पर ऊनी टोपी थी, जिस पर सफेद धागे से लिखा था —

“Rakaposhi 2005”

वह नज़र फेरकर आसपास देखने लगी।

चारों तरफ़ फैला बर्फीला मैदान… लाल, पीले और नीले रंग के तंबू… कहीं-कहीं जमी गंदी बर्फ़, जो फिल्मों वाली चमकदार सफेदी से बिल्कुल अलग थी।

बेस कैंप तक बर्फ़ कम थी, मगर कैंप वन के बाद पूरी ऊँचाई सफेद चादर में ढकी हुई थी।


राकापोशी

उसने ग्लेशियर ग्लासेस आँखों पर चढ़ाए और सिर उठाकर चोटी को देखा।

पहाड़ की गर्दन से ऊपर सफेद चोटी बादलों और धुँध की परतों में छिपी हुई थी, जैसे किसी ने उसे धुएँ में लपेट दिया हो।

ऊपर आसमान बिल्कुल साफ़ और नीला था, मगर चोटी धुँध में खोई हुई।

शायद यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती थी।

इसी वजह से दुनिया के सबसे खूबसूरत पहाड़ों में राकापोशी का नाम लिया जाता था।

उसकी ढलानें ऐसे नीचे उतरती थीं जैसे किसी कलाकार ने महीन नक्काशी करके उन्हें तराशा हो।

दुनिया के बहुत कम पहाड़ ऐसी विशिष्ट बनावट रखते हैं।


“राकापोशी”

हंजा और कशर भाषा में इसका अर्थ है —

“चमकती हुई दीवार”

और “दमानी” का अर्थ था —

“धुएँ की माँ”

वह सचमुच धुएँ की माँ लग रही थी।


वापसी का रास्ता

अब कमर पर खाली रक्सैक होने की वजह से सफर आसान था।

वह अफ़क़ से आगे-आगे उतर रही थी।

उसका जूता पैर काट रहा था, जिससे चलने में परेशानी हो रही थी।

“जिस तरह नया पेन लेकर इम्तिहान नहीं देते, उसी तरह नए जूतों के साथ ट्रैकिंग शुरू नहीं करनी चाहिए।”

अफ़क़ उसके पीछे चलते हुए समझा रहा था।

“तुमने शायद बिल्कुल नए ट्रैकिंग बूट्स खरीदे हैं और…”

“मुझे पता है।”

उसने इतनी सख्त आवाज़ में उसकी बात काटी कि वह चुप हो गया।

परीशे ने कदम और तेज़ कर दिए।

अफ़क़ ने उसके बदले हुए व्यवहार को सिर्फ़ मौसम और थकान का असर समझा।


शाम ढल चुकी थी

बेस कैंप के रंग-बिरंगे तंबुओं की संख्या कम हो गई थी।

इतालवी टीम जाते-जाते अपना कचरा भी समेट कर नहीं गई थी। खाली कैन, बोतलें और बेकार सामान जगह-जगह बिखरा पड़ा था।

धूसर अंधेरा धीरे-धीरे पहाड़ों को अपनी गिरफ्त में ले रहा था।

तंबुओं के भीतर रोशनियाँ जल उठी थीं।


किचन टेंट

वह तेज़ कदमों से अंदर आई।

शफाली चपातियाँ बना रही थी। निशा और अर्सा प्लास्टिक कुर्सियों पर बैठी थीं।

“अर्सा बहन! अपनी किताब में ये ज़रूर लिखना कि ये गोरे लोग दाल, चावल और चपाती सब मिलाकर खाते हैं… फिर बोलते हैं — ‘नो कार्ब, नो फैट… चपाती इज़ द बेस्ट!'”

शफाली किसी इतालवी सदस्य की नकल उतार रही थी।

परीशे ने कुर्सी खींची और स्पोर्ट्स ड्रिंक उठा लिया।


“अर्सा! तुम इस पहाड़ पर इतना रोमांटिक नॉवेल कैसे लिख सकती हो?”

निशा हँस रही थी।

“इस ऊँचाई पर तो किरदारों की कुल्फ़ी जम जानी चाहिए, रोमांस नहीं!”

अचानक उसने परीशे की खामोशी नोट की।

“क्या हुआ तुम्हें?”

“कुछ नहीं।”

उसने बोतल से घूँट लिया।


“मैं जा रही हूँ यहाँ से!”

अर्सा आखिरकार तंग आ चुकी थी।

“जहाँ लोग राइटर देखें, वहीं सलाहें देना शुरू कर देते हैं!”

वह उठकर चली गई।

शफाली भी किसी काम से बाहर निकली तो निशा धीमे से बोली —

“तुमने इतना ड्रामा बनाया था कि अंकल कभी इजाज़त नहीं देंगे… लेकिन उन्होंने इतनी जल्दी मान लिया। मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ।”

“यकीन… मुझे भी नहीं हुआ।”

उसकी आँखों के सामने फिर वही तस्वीर घूम गई —

हनादे की।


“प्रि…”

निशा गंभीर हो गई।

“अगर मम्मी-पापा अंकल से बात करें तो सब ठीक हो सकता है। मैं मम्मी को सब बता दूँ?”

परीशे चौंकी।

“क्या बता दोगी?”

“जो तुम्हारे और अफ़क़ के बीच है।”

“हमारे बीच क्या है?”

उसने उल्टा सवाल किया।

निशा उसे गौर से देखने लगी।

“प्रि… क्या हुआ है?”

“नहीं, तुम बताओ। हमारे बीच क्या है?”

उसने खाली बोतल मेज़ पर रख दी।

“तुम दोनों के बीच… मतलब…”

निशा खुद उलझ गई।

परीशे अचानक हँस पड़ी।

“हमारे बीच कुछ भी नहीं है। तुम पागल हो, निशी!”

वह उठकर तंबू से बाहर निकल आई।

निशा उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी… मगर हर सच बताना ज़रूरी नहीं होता।

वह उसे यह नहीं बता सकती थी कि अफ़क़ शादीशुदा है।

अगर बताती, तो निशा उसकी आँखों में छिपी टूटन पढ़ लेती।

और वह अपनी चोट खाई हुई औरत होने की कमजोरी किसी को दिखाना नहीं चाहती थी।


रास्ते में

उसे वही बर्फीला नाला दिखाई दिया जहाँ सुबह वह मुसअब के साथ बैठी थी।

सुबह उसमें पानी बह रहा था।

मगर अब रात की ठंड में वह पूरी तरह जम चुका था।

हर कुछ घंटों में उसका रूप बदल जाता था।

“बिल्कुल अफ़क़ की तरह…”

उसने सिर झटका और तेज़ी से अपने तंबू की ओर बढ़ गई।


बुधवार, 10 अगस्त 2005

आज बेस कैंप में नाश्ता बेहद शानदार था।

दलिया, अंडे, चपातियाँ, जूस और पनीर।

शायद इसी वजह से अगले दिन जब वह फरीद और अफ़क़ के साथ फिर कैंप वन की ओर चढ़ रही थी, तो उसे भारीपन महसूस हो रहा था।

अफ़क़ उससे आगे था और लगातार उससे बात करने की कोशिश कर रहा था।

कभी जूतों के बारे में पूछता, कभी उसकी खाँसी के बारे में।

क्योंकि वह लगातार खाँस रही थी।

“तुम्हें अहमद को दिखा लेना चाहिए था।”

उसने बेस कैंप मैनेजर और डॉक्टर अहमद दरयान का नाम लिया।

मगर वह बिना जवाब दिए सिर झुकाकर अपने स्की-पोल्स की मदद से बर्फ़ पर चलती रही।

सातवीं चोटी (भाग 2) — री-राइट

अफ़क़ की ऐक्लिमेटाइज़ेशन तो पहले ही पूरी हो चुकी थी, मगर अब वह हर रोज़ सिर्फ़ परीशे के लिए भारी सामान उठाकर उसके साथ ऊपर तक जाता था—ताकि वह फिसले नहीं, बीमार न पड़े और ऊँचाई उसे नुकसान न पहुँचा दे।

उसकी योजना थी कि आज सारा सामान कैंप वन तक पहुँचा दिया जाए, फिर पूरी शाम आराम करने के बाद अगली सुबह पूरी ताज़गी के साथ बेस कैंप को अलविदा कहकर असली चढ़ाई शुरू की जाए।

सूरज की रोशनी पहाड़ों पर फैल चुकी थी, जब उन्होंने वापसी का रास्ता पकड़ा। दोनों आगे-पीछे ढलान से नीचे उतर रहे थे। धूप इतनी तेज़ थी कि परीशे ने अपने दस्ताने उतारकर हाथ में पकड़ लिए थे।

करीब सात हजार मीटर की ऊँचाई तक दिन में सूरज निकल आए तो गर्मी चुभने लगती थी, और रात को तापमान इतना नीचे गिर जाता कि पानी की बोतलें भी जम जातीं।

ऊँचाई कम हो रही थी, लेकिन उसकी खाँसी बढ़ती जा रही थी। सिर चकरा रहा था, दर्द से कनपटियाँ फट रही थीं और मितली भी महसूस हो रही थी। एक जगह कदम टिकाने की कोशिश में उसका संतुलन बिगड़ा तो अफ़क़ ने पीछे से उसका बाजू पकड़कर संभाल लिया और पास के पत्थर पर बैठा दिया।

“तुम्हें अल्टीट्यूड सिकनेस हो रही है।”

“नहीं… मैं ठीक हूँ।” उसने घूमते सिर को दोनों हाथों में थाम लिया।

“सिर बहुत दर्द कर रहा है ना?” वह चिंता से उसकी कनपटी सहलाते हुए उसके सामने बैठ गया।

सूरज अब अफ़क़ की पीठ के पीछे था। उसकी नारंगी किरणें उसके चारों ओर फैलती हुई परीशे तक पहुँच रही थीं।

“मैं डायमॉक्स ले लूँगी।” वह चिढ़े हुए अंदाज़ में बोली। उसे उसकी इतनी फिक्र क्यों थी?

“सिर्फ़ डायमॉक्स काफी नहीं होगी। अगर यह अल्टीट्यूड सिकनेस बढ़ गई तो सर्वाइकल एडीमा या पल्मोनरी एडीमा में बदल सकती है और…”

“अफ़क़!” उसने झल्लाकर उसकी बात काट दी, “मैं डॉक्टर हूँ, मुझे पता है क्या करना है। तुम्हें मेरी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।”

अफ़क़ ने हैरानी से उसे देखा।
“परीशे… क्या बात है? मैं कल से देख रहा हूँ, तुम बहुत परेशान हो।”

“मुझे कुछ भी हो, उससे तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?” वह तिक्त स्वर में बोली, “मेरी फिक्र मत करो… समझे?”

वह अचानक खड़ी हो गई। सिर का दर्द अब और बढ़ चुका था।

“क्यों न करूँ तुम्हारी फिक्र? तुम मेरी…”

“मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती!” वह अचानक चीख पड़ी, “तुम्हारी सिर्फ़ हिनादे है… उसी की चिंता करो!”

अफ़क़ के चेहरे पर कठोरता उतर आई।
“हिनादे का यहाँ क्या ज़िक्र है? तुम्हें उससे क्या परेशानी है?” उसका स्वर अब सख्त था।

“मुझे तुम्हारी बीवी से क्या दिक्कत होगी?” उसने कड़वाहट से कहा।

“शट अप! उसका नाम इस तरह मत लो!”

परीशे पहली बार उसे गुस्से में देख रही थी।
और वह क्यों गुस्से में था? सिर्फ इसलिए कि उसने उसकी पत्नी का नाम लिया था।

उसके दिल में जैसे कुछ टूट गया। क्या वह उससे इतनी मोहब्बत करता था?

उसकी आँखों में आँसू भरने लगे। वह झटके से मुड़ी और तेज़ी से ढलान उतरने लगी।

“परीशे! रुको!” अफ़क़ उसके पीछे भागा।

मगर वह जितनी तेज़ भाग सकती थी, भागती चली गई। नीचे बेस कैंप दिखाई देने लगा था। बर्फ़ीली नाली अब पिघल चुकी थी, उसमें पानी बह रहा था और बड़े-बड़े बर्फ़ के टुकड़े तैर रहे थे।

वह तेज़ कदमों से तंबुओं की तरफ बढ़ी।
अब उसका मन एक फैसला कर चुका था। वह किसी भी हालत में वहाँ नहीं रुकना चाहती थी। उसे वापस घर लौट जाना था।

वह राकापोशी फतह करने नहीं आई थी… वह तो खुद अपने जज़्बातों से हारकर यहाँ तक चली आई थी। मगर अब नहीं।

अपने तंबू में पहुँचकर उसने जल्दी-जल्दी सामान समेटना शुरू कर दिया।

उसने तय किया कि करीमाबाद से कोई पोर्टर और शफाली को साथ लेकर वापस निकल जाएगी। हसीब और बाकी लोग सुबह ही नीचे गए थे, शायद अभी बहुत दूर नहीं पहुँचे होंगे।

“परीशे! तुम्हें हुआ क्या है?”
अफ़क़ हाँफता हुआ उसके पीछे तंबू में आ गया।

उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह दोनों हाथों से अपना सामान बैग में भरती रही।

उसे बैग तैयार करते देखकर वह ठिठक गया।
“तुम कहाँ जा रही हो?”

“घर।” उसने अपनी शेल जैकेट, डाउन जैकेट और बाकी चीज़ें बैग में ठूँसते हुए कहा।

“लेकिन क्यों?”

“मैं तुम्हारे साथ क्लाइंब नहीं करना चाहती।” उसने दूसरे बैग में मोज़े, दस्ताने और स्कार्फ डाल दिए।

“अचानक क्या हो गया तुम्हें? तुम तो इतनी खुशी से यहाँ आई थीं!”

“वो… मेरी गलती थी,” उसने ज़िप बंद करते हुए कहा, “एक बेवकूफ़ी।”

अफ़क़ अब पूरी तरह उलझ चुका था।
“लेकिन आखिर हुआ क्या है?”

सातवीं चोटी (भाग 2) — री-राइट जारी

बैग एक तरफ पटककर वह अचानक उसकी ओर मुड़ी।
“क्या हुआ है, यह मुझसे पूछ रहे हो तुम?” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “तुम… तुम धोखेबाज़ हो, अफ़क़! तुमने मुझे धोखा दिया है… बहुत तकलीफ़ दी है मुझे… बहुत ज़्यादा!”

उसने गुस्से में उसे धक्का दे दिया।

अफ़क़ लड़खड़ाकर दो कदम पीछे हटा और अविश्वास से बोला,
“मैंने तुम्हें क्या धोखा दिया?”

“तुम शादीशुदा हो!”
वह लगभग चीख पड़ी, “और तुमने कभी मुझे बताया तक नहीं। तुम्हारी बीवी है… और तुमने मुझे अंधेरे में रखा!”

अफ़क़ कुछ पल उसे देखता रहा, फिर बोला,
“तुमने भी तो कभी नहीं बताया कि तुम्हारी मंगनी हो चुकी है।”

वह क्षणभर के लिए चुप हुई, फिर दर्द से बोली,
“हाँ… नहीं बताया था। क्योंकि मंगनी और शादी में फर्क होता है।”

“कोई फर्क नहीं होता,” उसने ठंडे स्वर में कहा, “बात सिर्फ़ कमिटमेंट की होती है।”

“कोई फर्क नहीं होता?” वह अविश्वास से उसे देखने लगी, “सच में कोई फर्क नहीं होता, अफ़क़? तुम… तुम उस औरत के साथ…”

“उसका नाम मत लो!” वह फिर भड़क उठा।

परीशे ने टूटी हुई नज़रों से उसे देखा।
सामने खड़ा वही आदमी था, जो कभी उसका नहीं हो सकता था… और जिसकी आवाज़ में अपनी पत्नी के लिए इतनी हिफ़ाज़त थी कि उसका नाम तक बेअदबी से सुनना उसे मंज़ूर नहीं था।

“इतनी मोहब्बत करते हो उससे?” उसका गला भर आया, “अगर इतनी मोहब्बत थी… तो मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”

उसकी आवाज़ टूट गई।
“बताओ… जवाब दो!”

वह रोते हुए बोलती चली गई—

“तुम सिर्फ उसी के हो… फिर भी तुमने मुझे इतनी दूर बुलाया। क्यों? सिर्फ अपने अहंकार के लिए? ताकि एक लड़की तुम्हारे एक जुमले की खातिर दो दिन पहाड़ों में चलकर यहाँ तक आए… और तुम उसे यह कहो कि ‘देखो, यह मेरी बीवी है’?”

उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

“क्या एक पल के लिए भी तुम्हें एहसास नहीं हुआ कि तुम किसी का दिल तोड़ रहे हो? किसी की रूह को चीर रहे हो?”

उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“और फिर तुम कहते हो कि मैं उसका नाम न लूँ? क्यों न लूँ? वह घटिया है… और तुम भी!”

वह बुरी तरह टूट चुकी थी।
मोहब्बत की पहली बाज़ी में ही उसे शिकस्त मिल गई थी।

“चले जाओ यहाँ से!” वह फिर चिल्लाई, “मुझे तुम्हारी शक्ल से भी नफ़रत है। खुदा के लिए… मुझे अकेला छोड़ दो!”

अफ़क़ अब तक खामोशी से उसकी हर बात सुन रहा था।

जब वह चुप हुई, तो वह धीरे-धीरे उसके पास आया। इतना करीब कि उसके पीछे की हर चीज़ ओझल हो गई।

उसने उसके दोनों कंधे पकड़कर जोर से झकझोरा।

“तुम्हें मुझसे नफ़रत है?” उसकी आवाज़ भारी थी, “मेरी शक्ल से भी? सिर्फ इसलिए कि तुम्हें हिनादे के बारे में पता चला?”

वह कुछ पल उसे देखता रहा, फिर बेहद धीमे मगर टूटे हुए स्वर में बोला—

“तो मेरी बात ध्यान से सुनो। हिनादे के बारे में कुछ भी कहने से पहले यह जान लो… दो साल पहले K2 पर आए एक बर्फ़ीले तूफ़ान में वह दबकर मर गई थी।”

उसकी आँखों में अजीब सी वीरानी उतर आई।

“वह मेरी बीवी थी… इसलिए उसका नाम इस तरह मत लो।”

उसने उसके कंधे छोड़ दिए।
फिर एक आख़िरी नज़र उस पर डाली और तेज़ी से मुड़ गया।

तंबू का गोरटेक्स उठते ही बाहर से राकापोशी की धुंधली सफेद ढलान दिखाई दी और ठंडी हवा का झोंका भीतर आ गया।

अगले ही पल वह बाहर निकल चुका था। पर्दा वापस गिर गया।
राकापोशी फिर ओझल हो गई… और हवा का रास्ता भी बंद हो गया।

परीशे वहीं खड़ी रह गई—जैसे उसके पैरों में जान ही न बची हो।


रात का बेस कैंप

बेस कैंप पर रात उतर चुकी थी।
अंधेरे में दमानोई की सफेद चोटी किसी चमकते हीरे की तरह दमक रही थी।

तंबुओं से कुछ दूर खाली जगह पर अलाव जल रहा था। उसके चारों ओर अफ़क़ की सपोर्ट टीम, स्थानीय पोर्टर्स और करीमाबाद के लोग जमा थे।

लकड़ियों के चटकने की आवाज़ों के बीच ऊँची हँसी, नारों और गीतों की गूँज फैल रही थी।

करीमाबाद वालों ने अफ़क़ से वादा किया था कि अगर वह राकापोशी फतह कर लेगा, तो पूरा गाँव उसके सम्मान में दावत देगा।

कभी हंज़ा के पारंपरिक गीत गूँजते, तो कभी तुर्की धुनें हवा में फैल जातीं।

मगर इस रंगीन महफ़िल में दो लोग गायब थे।
एक अरसा, जो अपने तंबू में बैठी उपन्यास लिख रही थी…
और दूसरी परीशे, जो सबसे दूर उस जमी हुई बर्फ़ीली नाली के पार अकेली बैठी थी।

कुछ देर बाद उसने देखा—अफ़क़ अलाव के पास से उठ रहा था।

वह लोगों के बीच से रास्ता बनाता हुआ, अपनी ग्रे फ्लीज़ जैकेट की ज़िप बंद करता उसकी तरफ आ रहा था।

परीशे ने तुरंत नज़रें झुका लीं।

“तुम यहाँ अकेली बैठी बोर हो रही हो?” वह उसके सामने पत्थर पर बैठ गया, “चलो उधर… सब कितना एन्जॉय कर रहे हैं। मैं तो सिर्फ तुम्हारे लिए इतनी अच्छी महफ़िल छोड़कर आया हूँ।”

वह ऐसे बात कर रहा था जैसे सुबह कुछ हुआ ही न हो।

परीशे ने आँसुओं से भरी आँखें उठाकर उसे देखा।

वह बिल्कुल सामान्य बैठा था।

“तुमने हमारे तुर्की गाने मिस कर दिए,” वह मुस्कराया, “मैं अभी गा रहा था तो पोर्टर्स कहने लगे— ‘साहब, आपने गलत प्रोफेशन चुना है… आपको तो गायक होना चाहिए था।’”

“अफ़क़…” उसकी आवाज़ काँप गई।

वह उसे डाँट क्यों नहीं रहा था? उससे नाराज़ क्यों नहीं था? वह इतना हल्का, इतना खुशमिज़ाज कैसे रह सकता था?

“मैं… मैं बहुत बुरी हूँ ना?” उसकी आँखों में फिर आँसू आ गए।

अफ़क़ ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा,
“तुम्हें आज जाकर पता चला?”

“अफ़क़, प्लीज़… मैं सच में सीरियस हूँ।”

“और मैं भी पूरी तरह सीरियस हूँ, प्यारी परीशे।”

दूर अलाव के पास से उठता शोर अब भी ठंडी हवा में घुल रहा था।

सातवीं चोटी (भाग 2) — री-राइट जारी

“अफ़क़, प्लीज़! मुझे अपनी बात तो कहने दो…”
वह लगभग रो पड़ी।

अफ़क़ ने झुँझलाकर गहरी साँस ली।
“कम ऑन! मुझे पता है तुम क्या कहना चाहती हो।”

वह उसकी तरफ़ देखकर बोला—
“यही ना कि ‘अफ़क़, मुझे माफ़ कर दो। मुझे नहीं पता था कि हिनादे अब इस दुनिया में नहीं है, वरना मैं वो सब कभी नहीं कहती।’ बस यही कहना है ना?”

उसने हल्की मुस्कान के साथ कंधे उचकाए।
“तो फर्क सिर्फ इतना है कि तुम्हारी जगह मैंने खुद ही ये बात कह दी। अब इस किस्से को यहीं खत्म करो।”

“अफ़क़… मुझे सच में नहीं पता था।”
उसकी आवाज़ काँप गई।
“मैंने तुम्हें कितना कुछ कह दिया और…”

“तुम लोगों में एक अजीब आदत होती है,” वह बीच में बोल पड़ा, “हर बात को पकड़कर बैठ जाते हो। कभी-कभी बातें निगल भी लिया करो। जो हो गया, उसे भूल जाओ… प्लीज़।”

परीशे चुपचाप उसे देखती रही। उसकी आँखें अब भी भीगी हुई थीं।

कुछ पल बाद अफ़क़ ने शरारती अंदाज़ में झुककर कहा—
“वैसे अगर मुझे पहले पता होता कि तुम हिनादे से इतनी जलन महसूस करोगी… तो मैं उसका ज़िक्र बहुत पहले ही कर देता।”

फिर नकली मासूमियत से बोला—
“मैं तुम्हें इतना अच्छा लगता हूँ क्या?”

वह मुस्कान दबाकर बड़ी मुश्किल से गंभीर बना हुआ था।
“इतना अच्छा लग रहा था?”

“हाँ, लगते हो!”
वह खफ़गी से बोली और तुरंत नज़रें फेरकर तंबुओं की तरफ देखने लगी।

ठंडी हवा में उसकी नाक लाल हो रही थी, ठीक अफ़क़ की तरह। साँसों से धुआँ निकल रहा था।

अफ़क़ काफी देर तक उसे चुपचाप देखता रहा—ऐसे जैसे कोई बड़ा इंसान किसी बच्चे की भोली नाराज़गी देखकर मुस्कुरा रहा हो।

फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

“परी… आज तक हमेशा यही हुआ है कि पर्वतारोही खुद को इन खूबसूरत पहाड़ों के लिए तैयार करते हैं।”

उसने पीछे खड़े बर्फ़ीले पहाड़ों की तरफ इशारा किया।

“मगर आज पहली बार ऐसा होगा कि ये पहाड़ खुद को एक खूबसूरत पर्वतारोही के लिए तैयार करेंगे।”

परीशे ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

थोड़े घमंड और थोड़ी मासूमियत से उसने पूछा—
“कौन? मैं?”

“नहीं यार,” वह हँस पड़ा, “मैं अपनी बात कर रहा हूँ।”

वह उठकर खड़ा हो गया।

परीशे ने नाराज़ होकर उसे घूरा।

“चलो अब उठो,” उसने हाथ आगे बढ़ाया, “तुम्हारा चेकअप करवाना है अहमद से। सारा दिन रोती रही हो, अब तक तो तुम्हारी अल्टीट्यूड सिकनेस और बढ़ गई होगी।”

वह नाले के दूसरे किनारे खड़ा था।

परीशे ने पहले नाराज़गी से उसे देखा… मगर वह उससे ज़्यादा देर नाराज़ रह ही नहीं सकती थी।

आख़िर उसने उसका हाथ थाम लिया।

अफ़क़ ने उसे संभालकर उठाया और दोनों साथ नाला पार कर गए। दूसरी तरफ पहुँचते ही उसने धीरे से उसका हाथ छोड़ दिया।


डॉक्टर अहमद का तंबू

दोनों साथ-साथ तंबुओं की तरफ लौटे।

करीमाबाद के लोग अब वापस जा रहे थे। अलाव के पास बैठे अहमद अब तक कोई गीत गा रहे थे, मगर परीशे को आते देखकर अचानक चुप हो गए।

अफ़क़ ने उनसे तुर्की में कुछ कहा। अहमद ने सिर हिलाया और उन्हें अपने तंबू की तरफ ले गया।

अंदर एक बड़ी मेज़ और कुछ कुर्सियाँ रखी थीं।

हँसते हुए अफ़क़ बोला—
“तुम्हारा परिचय तो करवाया ही नहीं। ये हैं मेरे दोस्त डॉक्टर अहमद दुरान।”

फिर मज़ाकिया गर्व से बोला—
“मेरी और इसकी दोस्ती का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि मैं हर तरीके से इसके लिए मरीज ढूँढकर लाता रहता हूँ।”

अहमद हल्का-सा शरमा कर मुस्कुरा दिया।

परीशे उसके सामने कुर्सी पर बैठ गई, जबकि अफ़क़ उसके दाहिनी ओर बैठ गया।

चेकअप के दौरान अहमद लगातार तुर्की में अफ़क़ से कुछ कहता रहा।

कुछ देर बाद अफ़क़ उसकी तरफ मुड़ा।
“यह कह रहा है कि सुबह तक तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी… और तुम्हारी खाँसी भी पहले से बेहतर है।”

परीशे मुस्कान दबाकर अहमद को देखने लगी।

वह अफ़क़ की उम्र का ही था, मगर बेहद दुबला-पतला और मासूम चेहरे वाला। उसके भूरे-सुनहरे बाल और झेंपी हुई मुस्कान उसे किसी किशोर लड़के जैसा बना रहे थे।

जब परीशे लगातार उसे देखने लगी, तो वह और भी शर्माकर मुस्कुरा दिया।

आख़िर वह हँसे बिना न रह सकी।

“तुम्हारा दोस्त बहुत क्यूट है।”

अफ़क़ ने पहले अहमद को देखा, फिर परीशे को।

अहमद सचमुच शर्माकर हँस पड़ा था।

अफ़क़ ने पूरी गंभीरता से कहा—
“मेरे इस ‘क्यूट’ दोस्त को बहुत अच्छी इंग्लिश भी आती है।”

“ओह!”
अब घबराने की बारी परीशे की थी।

“मैं समझी इसे इंग्लिश नहीं आती… और अगर आती है, तो तुम दोनों तुर्की में क्यों बात कर रहे थे?”

“अब हम तुर्क हैं,” अफ़क़ बोला, “तो फ्रेंच में तो बात नहीं करेंगे ना।”

फिर अहमद की तरफ देखकर मुस्कुराया।
“वैसे ये अंदर से बड़ा कलाकार आदमी है। कभी राइटर बनने का सपना देखा करता था।”

“और तुम नासिर महरू बनने का,” अहमद ने तुरंत जवाब दिया।

“अच्छा! तो ये साहब शायर भी हैं?” परीशे ने दिलचस्पी से पूछा।

अफ़क़ ने नकली गर्व से सीना चौड़ा किया।
“इतना बड़ा तुर्क क्लाइंबर है, तुम्हें पता नहीं? लेकिन चाहे जितना मशहूर हो जाए… अफ़क़ अर्सलान जैसा नहीं बन सकता।”

परीशे ने धीमे से सिर हिला दिया।

(सच… कोई अफ़क़ अर्सलान जैसा नहीं हो सकता।)

अफ़क़ फिर बोला—
“इसके अलावा अहमद एक बेहद खतरनाक किस्म का कंप्यूटर जीनियस और हैकर भी है।”

उसने उसे “खतरनाक” कहा, मगर अहमद फिर भी वैसे ही झेंपकर मुस्कुराता रहा।

तभी परीशे को अचानक कुछ याद आया।

“अहमद… क्या मैं तुम्हारा कम्युनिकेशन टेंट इस्तेमाल कर सकती हूँ? मुझे पापा को ईमेल करनी है।”

“अब पूछो, मेरी उम्र क्या है?”

अफ़क ने फिर कीबोर्ड पर उंगलियाँ चलाईं।
स्क्रीन पर कुछ सेकंड तक खालीपन झिलमिलाता रहा, फिर सफेद अक्षरों में जवाब उभरा—

“She is twenty three.”

परीशे ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“यह सच में बता रहा है?”

“मैंने कहा था ना, पीटर सब जानता है।” अफ़क ने रहस्यमयी अंदाज़ में कहा।

“अच्छा…” वह अब पूरी दिलचस्पी से स्क्रीन के करीब झुक आई, “इससे पूछो कि मैं यहाँ क्यों आई हूँ?”

अफ़क की आँखों में हल्की सी मुस्कान उभरी।
उसने बिना उसकी तरफ देखे टाइप किया—

“Why did she come to Rakaposhi?”

कुछ क्षणों तक स्क्रीन खाली रही। बाहर बर्फ़ीली हवा के थपेड़ों से टेंट का कपड़ा फड़फड़ा रहा था। जनरेटर की धीमी आवाज़ पूरे कम्युनिकेशन टेंट में गूंज रही थी।

फिर स्क्रीन पर धीरे-धीरे शब्द उभरे—

“Because her heart brought her here.”

परीशे का दिल जैसे एक पल को धड़कना भूल गया।

उसने झटके से अफ़क की तरफ देखा।
वह होंठ भींचे मुस्कराहट रोकने की कोशिश कर रहा था।

“ये… ये तुमने खुद लिखा है!” वह तुरंत समझ गई।

अफ़क ज़ोर से हँस पड़ा।
“कमाल है! अभी तक तो तुम्हें पीटर पर पूरा यकीन था।”

“तुम बहुत घटिया इंसान हो!” उसने गुस्से से कहा, मगर उसके चेहरे पर भी मुस्कान आ गई थी।

“मैंने क्या किया? पीटर ने जवाब दिया है।”

“और पीटर कीबोर्ड के पीछे बैठा एक फ्रॉड तुर्क है।”

“ओह!” उसने नकली दुख से सिर झटका, “मेरी इतनी बेइज्जती?”

परीशे ने मुस्कुराते हुए स्क्रीन बंद कर दी।
“बस, अब और नहीं। मुझे पता है तुम मुझे बेवकूफ बना रहे हो।”

“अच्छा आखिरी सवाल पूछ लो।”

“नहीं।”

“पूछो ना।”

“नहीं अफ़क!”

“ठीक है, फिर मैं खुद पूछता हूँ।”

उसने तेज़ी से कुछ टाइप किया।
परीशे रोक भी नहीं पाई।

“क्या लिखा?”

“कुछ नहीं।”

“अफ़क!”

वह मुस्कराया और लैपटॉप उसकी तरफ घुमा दिया।

स्क्रीन पर लिखा था—

“Will she ever stop being angry at me?”

और उसके नीचे जवाब चमक रहा था—

“No. Because she loves him too much.”

कुछ पल के लिए टेंट में सन्नाटा छा गया।

परीशे की साँस अटक गई।
उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे लैपटॉप के किनारे पर कस गईं।

अफ़क अब मुस्करा नहीं रहा था।
वह बहुत ख़ामोशी से सिर्फ उसे देख रहा था।

टेंट के बाहर कराकोरम की ठंडी हवा चल रही थी…
और अंदर, पहली बार, दोनों के बीच कुछ भी मज़ाक जैसा नहीं रह गया था।

“एक बार जेनिक ने एक सर्जन को यह खेल खिलाया था।” अहमद हँसी रोकते हुए बोला, “उस बेचारे ने पीटर से पूछा था कि क्या उसकी गर्लफ्रेंड उसे धोखा दे रही है।”

“फिर?” परीशे अब पूरी दिलचस्पी से सुन रही थी।

“फिर जेनिक ने ऊपर वाले बॉक्स में लिखा— ‘हाँ, वह तुम्हारे सबसे अच्छे दोस्त के साथ घूम रही है।'”

परीशे की आँखें फैल गईं।
“ओह गॉड!”

“उस डॉक्टर का चेहरा देखने लायक था। उसने उसी वक्त अपने दोस्त को फोन करके लड़ाई शुरू कर दी थी। बाद में बड़ी मुश्किल से उसे समझाया कि यह खेल था।” अहमद अब खुलकर हँस रहा था।

परीशे ने सिर पकड़ लिया।
“यानि… मैं इतनी देर से बेवकूफ बन रही थी?”

“थोड़ा सा।” अहमद ने मासूमियत से कहा।

“थोड़ा सा?” वह कुर्सी से उठ खड़ी हुई। “मैं तो दिल का दौरा पड़ने के करीब पहुँच गई थी!”

अहमद फिर हँस पड़ा।
“वैसे अफ़क यह खेल बहुत अच्छे से खेलता है। वह सामने वाले के चेहरे के एक्सप्रेशन्स पढ़ लेता है। इसलिए जवाब और भी असली लगते हैं।”

अब परीशे को पिछले आधे घंटे की हर बात याद आने लगी—
अफ़क का उसे लगातार देखना…
हर सवाल पूछने से पहले उसकी आँखों में झांकना…
और फिर वैसा ही जवाब टाइप करना।

“उसने जानबूझकर मुझे बेवकूफ बनाया…” उसने धीरे से कहा।

“हाँ… मगर शायद वह सिर्फ तुम्हें छेड़ रहा था।” अहमद ने सावधानी से कहा।

परीशे कुछ पल बिल्कुल चुप खड़ी रही। फिर अचानक उसकी आँखों में एक अलग सी चमक आई।

“अच्छा अहमद…” उसने बहुत मीठे लहजे में कहा, “यह खेल खेलना मुझे भी सिखाओ। पूरा।”

अहमद ने खतरे को भांपे बिना तुरंत स्क्रीन की तरफ इशारा किया।
“देखो, पहले यहाँ क्लिक करना होता है, फिर फ्लॉपस्टॉप दबाना…”

कुछ मिनट बाद…

बाहर से अफ़क तंबू का पर्दा हटाकर अंदर आया। उसकी फ्लीज़ जैकेट पर बर्फ़ जमी हुई थी।

“झगड़ा खत्म। एक पोर्टर कह रहा था दूसरे ने उसका—”

वह बोलते-बोलते रुक गया।

परीशे उसकी कुर्सी पर बैठी थी। दोनों कोहनियाँ मेज़ पर टिकी थीं और उंगलियाँ आपस में फंसी हुई थीं। उसके चेहरे पर बहुत खतरनाक शांति थी।

अहमद धीरे-धीरे एक कदम पीछे हटा।
“मैं… बाहर इंतज़ार करता हूँ।”

वह फौरन तंबू से निकल गया।

अब अंदर सिर्फ अफ़क और परीशे थे।

“तो…” परीशे ने मीठी आवाज़ में कहा, “पीटर से थोड़ी जान-पहचान है?”

अफ़क ने एक पल उसे देखा… फिर समझ गया।

उसके होंठों पर धीमी मुस्कान आई।
“अहमद ने बता दिया?”

“नहीं। पीटर ने बताया।”

अफ़क हँस पड़ा।
“कम ऑन परी, इतना भी बुरा मज़ाक नहीं था।”

“अच्छा?” उसने लैपटॉप अपनी तरफ घुमाया। “बैठो। अब मैं पीटर बनूँगी।”

“ओह!” वह कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गया। “तो अब मेरा भविष्य बताया जाएगा?”

“बिल्कुल।” उसने बेहद प्रोफेशनल अंदाज़ में कहा। “सवाल पूछिए।”

अफ़क ने मुस्कराकर उसे देखा।
“क्या डॉक्टर परीशे जहाँज़ेब अभी भी मुझसे नाराज़ हैं?”

परीशे ने बिना पलक झपकाए टाइप किया।

स्क्रीन पर जवाब उभरा—

“हाँ। और वह बदला लेने के बारे में सोच रही है।”

अफ़क ज़ोर से हँस पड़ा।

“यह तो पीटर नहीं, कोई खतरनाक औरत लग रही है।”

“पीटर बहुमुखी प्रतिभा का मालिक है।” उसने ठंडे गर्व से कहा।

“अच्छा फिर एक और सवाल।” वह थोड़ा आगे झुका।
“क्या डॉक्टर परीशे जहाँज़ेब को अफ़क अर्सलान पसंद है?”

परीशे की उंगलियाँ एक पल के लिए रुक गईं।

उसने धीरे से उसकी तरफ देखा।

अफ़क अब मुस्करा नहीं रहा था। उसकी शहद रंग आँखें पूरी गंभीरता से सिर्फ उसे देख रही थीं।

कम्युनिकेशन टेंट के बाहर हवा फिर तेज़ चलने लगी थी।

कुछ सेकंड बाद परीशे ने नज़रें झुकाईं… और टाइप किया।

स्क्रीन पर जवाब आया—

“बहुत ज्यादा।”

परीशे कुर्सी पर बैठी हँसी रोकने की कोशिश करती रही।
टेंट का पर्दा तेज़ी से हिलता हुआ वापस गिरा था और अफ़क बाहर बर्फ़ पर तेज़ कदमों से निकल गया था।

“बेचारा अहमद…” उसने होंठ दबाते हुए सोचा, मगर अगले ही पल उसे अफ़क का खफा चेहरा याद आया और वह फिर हँस पड़ी।

बाहर बेस कैंप में हलचल थी।
कहीं पोर्टर्स बर्तन समेट रहे थे, कहीं कोई रस्सियाँ लपेट रहा था। दूर बर्फ़ीले ढलानों पर शाम की धूप आख़िरी बार चमक रही थी।

कुछ मिनट बाद बाहर से अहमद की आवाज़ आई—
“अफ़क! सुनो तो…”

फिर दूसरी आवाज़—
“नहीं, आज तुम बचोगे नहीं!”

परीशे हँसते-हँसते कुर्सी से लगभग गिर गई।

वह टेंट से बाहर आई तो सामने का दृश्य देखकर उसकी हँसी और बढ़ गई।

अहमद बर्फ़ पर पीछे हटता जा रहा था और अफ़क उसके पीछे-पीछे आ रहा था।
उसके हाथ में बर्फ़ का बड़ा सा गोला था।

“मैंने जानबूझकर नहीं बताया था!” अहमद सफाई दे रहा था।
“तुम्हें दुनिया सुधारने का इतना ही शौक है तो नीचे जाकर संयुक्त राष्ट्र जॉइन कर लो!” अफ़क गुस्से से बोला।

करीब खड़े पोर्टर्स और निशा लोग तमाशा देख रहे थे।

“क्या हुआ?” निशा ने हँसते हुए पूछा।

“कुछ नहीं,” परीशे ने मासूमियत से कहा, “अहमद ने बस इंसानियत की सेवा की है।”

अहमद ने दूर से दुखी नज़रों से उसे देखा।
“डॉक्टर! आपने वादा तोड़ा है…”

“मैंने कुछ नहीं किया,” वह हँसी दबाते हुए बोली।

अफ़क अब बिल्कुल उसके सामने आ चुका था।
उसने बर्फ़ का गोला नीचे फेंका और बाँहें सीने पर बाँध लीं।

“तुम बहुत खतरनाक लड़की हो।”

“मैं?” उसने हैरानी से खुद की तरफ इशारा किया।
“मैंने क्या किया?”

“पहले मासूम बनकर बेवकूफ बनीं, फिर पूरा खेल पलट दिया।”

“सीख अच्छे शिक्षक से मिली है।”

अफ़क कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
ठंडी हवा में उसकी साँसों से धुंध निकल रही थी। फिर धीरे-धीरे उसके होंठों पर मुस्कान लौट आई।

“ठीक है,” उसने हार मानने वाले अंदाज़ में सिर हिलाया, “आज तुम जीत गईं।”

“सिर्फ आज?”

“नहीं,” वह हल्का सा झुका, “शायद उस दिन से… जिस दिन मरगल्ला की बारिश में तुम मुझसे टकराई थीं।”

उसका दिल अजीब तरह से धड़क उठा।

कुछ पल के लिए आसपास का शोर जैसे बहुत दूर चला गया।
सिर्फ कराकोरम की ठंडी हवा थी…
रकापोशी की चमकती सफेद चोटी…
और सामने खड़ा वह आदमी, जिसकी शहद रंग आँखें अब बिना किसी मज़ाक के उसे देख रही थीं।

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