Author: umeemasumaiyyafuzail

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 बाक़िया दास्तान      इलियास वहा से सीधे अपनी माँ के पास पहुंचे उन्होंने उनसे वह तमाम हालात बयान कर दिए जो औरत से सुने थे। उनकी माँ ने कहा “वह कम्बख्त भी मुसीबतें ही झेलती रही है। मैंने उसके लिए बद्दुआ नहीं की खुदा ने खुद उसे सजा दी है। लेकिन खैर यह तो मालूम हो गया की मेरी राबिआ सुगमित्रा बानी हुई है। आराम व राहत से है। शहज़ादी है। मगर यह अफ़सोस है की वह काफिर है। ” इलियास : उसका अफ़सोस मुझे भी है। लेकिन वह ऐसे काफिर बनाई  गयी जब उसे कुछ पता नहीं था।…

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 आप बीती दूसरे रोज़ अब्दुल्लाह ने इल्यास के पास आकर कहा “चलिए वह औरत आपका इंतज़ार कर रही है ” इल्यास  उनके साथ चले। वह एक बाग़ में झोपड़ी के अंदर रहती थी उनकी आहट पा कर बाहर निकल आयी। इल्यास ने उसे देखा। पहले जैसे वह जवान न रही। मगर हुस्न रफ्ता के  दिलकश आसार अब भी  चेहरा से ज़ाहिर थे। उसकी सेहत अच्छी थी। अच्छी सेहत ने चेहरे की दिलकशी को और बढ़ा दिया था। आँखों में अब भी तेज़ चमक थी। उसने इल्यास को देखा बगैर इरादा के इल्यास ने सलाम किया। उसने उन्हें दुआ दी और आगे…

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दीन अल्लाह में दाखिला … …  जिस अरसे में लश्कर कोच के लिए तैयार हुआ। उस अरसा में अब्दुर्रहमान ने अब्दुलरब और उनके साथियो की इस्तेकबाल की। उनके सामने खुजुरे पेश की। और सत्तू घोल कर रखा। अब्दुलरब उनका सदा खाना देख कर भी ताज्जुब हुआ। उन्होंने कहा ‘तुम्हारी ग़ज़ा यही है। ” अब्दुर्रहमान : ऐसे तो हम खाने को सब कुछ खाते है परिंदो का गोश्त ,ऊँट का गोश्त ,बकरो का गोश्त ,रोटी लेकिन हमें रग़बत खुजूरो से है। सत्तू भी बड़े शौक़ से  खाते है। इन्हे ही मुसलमानो के सामने पेश  करते है। अब्दुलरब ने खुजूरो और सत्तू…

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ईमान की पुख़्तगी……..       दूसरे  रोज़ हुक्मरां और अब्दुल्लाह के साथ पचास सवारों के रवाना हुए अब्दुल्लाह ने एक क़ासिद अपनी और हुक्मरां की आमद की खबर करने के लिए आगे रवाना कर दिया। क़ासिद को समझा दिया कि वह यह भी खबर देदे की हुक्मरां मुस्लमान हो गए है। क़ासिद ने अब्दुर्रहमान की खिदमत में पहुंच कर तमाम हालात बयान कर दिए। अब्दुर्रहमान को बड़ी ख़ुशी हुई। उन्होंने से सलेही से सुन लिया कि इलियास की गुफ्तुगू से मुतास्सिर होकर अब्दुल्लाह मुस्लमान हुए है। उन्होंने सलेही और इलियास के हमराह पांच सौ मुस्लमान को उनके इस्तेकबाल के लिए…

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 वादी अरजनज आगोश इस्लाम में…..          शहर अरजनज  के फतह होने का कश तक इलाक़ा पर असर पड़ा। वहा के आतिश परस्त  भी घबरा गए। कुछ तो उनमे से भाग निकले। कुछ अपनी अपनी बस्तियों में आबाद रहे उन्होंने तय कर लिया की जब मुसलमान उनके पास आवेंगे तो उनकी इतायत  करंगे।            चुनांचा जब मुस्लमान कश के इलाक़ा में  दाखिल हुए तो वहा के बस्ती वालो ने उनकी  एतायत  कर ली और उनसे तिजारत शुरू कर दी।              मुस्लमान हर चीज़ की अच्छी  क़ीमत देते थे। उनसे…

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मसालेहत ……….    मुसलमानो ने  वापस आते हुए सबसे पहले शहीदों को एक जगह जमा किया। जनाज़ा की नमाज़  पढ़ी और गढ़े  खोद कर दफन कर दिया। उसके बाद वह तमाम मैदान में फैल गए और कुछ आदमी मक़तूलाइन के घोड़ो को पकड़ने और मरने वालो के हथियार जमा करने लगे। जो काफिर चांदी का कोई ज़ेवर पहने हुए थे वह भी उतर लिए शुमार करने पर मालूम हुआ की सवा दो सौ मुस्लमान शहीद हुए  और साढ़े सात हज़ार काफिर  मारे गए  .उनके ज़ख़्मियो की तादाद तो मालूम न हो सकी अलबत्ता मुस्लमान दो सौ के क़रीब ज़ख़्मी हुए …

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 शिकस्त ….                                                          अभी तक  मर्जबान भी एक हज़ार सवारों को अपने जुलु में लिए क़ल्ब में खड़ा लड़ाई का तमाशा देख रहा था। वह भी बहादुर और जंगजू था। मुसलमानो की हमलो की शान देख देख कर उसे भी गुस्सा और जोश आरहा था। लेकिन वह अभी तक अपनी जगह जमा खड़ा था और बड़े गौर से मैदान जंग की तरफ देख रहा था। अचानक उसने रकाबो पर खड़े होकर जंग की दूसरी…

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खून रेज़ जंग ……                                                                               रात खैरियत से गुज़र गयी। जब सपिदा सेहर नमूदार हुआ तो इस्लामी लश्कर में सुबह की अज़ान हुई.अज़ान की आवाज़ सुनते ही मुजाहिदीन जल्दी जल्दी उठ कर  कैंप से बाहर ज़रुरियात से फरागत करने के लिए चले गए। वहा से वापस आकर उन्होंने वज़ू किये नमाज़ पढ़ी अब्दुर रहमान ने नमाज़ पढाई।             …

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सुलह से इंकार  ……           इस्लामी  लश्कर कोच व  क़याम करता  ईरान को तय करके सीतान  की तरफ बढ़ा। अगरचे सिर्फ आठ हज़ार मुस्लमान थे और एक ऐसे मुल्क की तरफ बढ़ रहे थे जो ऐसे  बर्रे आज़म से मिला हुआ था जिसकी आबादी करोड़ो की तादाद में थी। पहले तो खुद काबुल ही बे शुमार फौजे उनके मुक़ाबला में ला सकता था। फिर हिंदुस्तान  और उसके राजा महाराजा तो टिड्डी विल लश्कर भेज सकते थे।         लेकिन मुस्लमान डरा नहीं करता और  फिर  मुजाहिद उसके पेश नज़्ज़ार तो सिर्फ जिहाद रहता है वह इस…

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लश्कर  इस्लाम का कोच     अब्दुल्ला  बिन आमिर ने सलेही को अमीर उल मूमिनीन की खिदमत में  रवाना  किया। इलियास और उनकी अम्मी दोनों दुआएं मांगते थे की खलीफा मुस्लिमीन  लश्कर कशी की इजाज़त दे दे। सबसे  ज़्यदा बेचैनी के साथ  वही दोनों उनकी वापसी का इंतज़ार कर रहे थे।  आखिर सलेही वापस आगये। अमीर उल मूमिनीन हज़रत उस्मान गनी खलीफा सोएम ने अब्दुल्लाह बिन आमिर को लिखा :           “तुम काबुल से नज़दीक हो और मै दूर हु। तुमने जासूसों के ज़रिये  के हालात मालूम कराये है। तुम मुझसे ज़्यदा सूरत हासिल से…

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