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Home»Hindi Novel»Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel)

fatah kabul (islami tarikhi novel) part 26

fatah kabul part 26
umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailFebruary 28, 2022Updated:January 20, 2026 Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel) No Comments8 Mins Read
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खून रेज़ जंग ……  

                                               

 

 

                        रात खैरियत से गुज़र गयी। जब सपिदा सेहर नमूदार हुआ तो इस्लामी लश्कर में सुबह की अज़ान हुई.अज़ान की आवाज़ सुनते ही मुजाहिदीन जल्दी जल्दी उठ कर  कैंप से बाहर ज़रुरियात से फरागत करने के लिए चले गए। वहा से वापस आकर उन्होंने वज़ू किये नमाज़ पढ़ी अब्दुर रहमान ने नमाज़ पढाई। 

                         नमाज़ खत्म करके मुस्लमान अभी दुआ ही मांग रहे थे की क़िला का दरवाज़ा खुला और मर्ज़बान का लश्कर दरवाज़ा में से निकल निकल क्र फैलने लगा अब्दुर रहमान ने जब देखा तो उन्होंने कहा मुज़्दा हो  मुजाहिदों दुश्मन मुक़ाबला में आगया है  पस  दौड़ो तुम भी उनकी तरफ रहमत करे अल्लाह तुम पर। लगा लो तुम हथियार और सफ़े मरतब करो उनके सामने जाकर। 

                          मुसलमान अपनी खेमो की तरफ दौड़े। उन्होंने जल्दी जल्दी हथियार लगाए घोड़ो पे जेन कसे और बड़ी शान से अकड़ते हुए गिरोह गिरोह मैदान में निकले हर दस्ता अपने सरदार के साथ  आ रहा था और हर सरदार के हाथ में अलम था। 

 इलियास : मेरे दिल में भी जिहाद की उमंग है। शाहदत की तमन्ना है। मैं मैदाने जंग में जाने की इजाज़त लेने आया हु। 

अब्दुर्रहमान :अज़ीज़ !तुम औरतो  की हिफाज़त पर मामूर हो। उनकी हिफाज़त करते रहो अगर लड़ाई तुम तक पहुंच जाये तो  तुम्हे इजाज़त है तुम भी शरीक हो जाओ। 

इलियास :हज़रात इसकी नौबत ही नहीं आने की। लड़ाई मुझसे दूर ही रहेगी सलेही अपने हमराहियों के साथ औरतो की हिफाज़त पर मामूर है। सिर्फ मै अपने लिए आप से इजाज़त चाहता हु। 

अब्दुर्रहमान :अच्छा तुम हमारे साथ  रहो। 

इलियास :बेहतर है आपका बहुत बहुत शुक्रिया। 

                  अब्दुर्रहमान और इलियास दोनों अपने अपने घोड़ो पर सवार हुए और मैदान में आये। अब्दुर्रहमान के पांच सौ सवार क़ल्ब में खड़े थे। वह  इलियास को लेकर उनसे आगे जाकर खड़े होगये। लश्कर की तरतीब हुई  मैमैना और  मैसरा क़ायम हुए। कुफ्फार भी सफबन्दी कर चुके थे। उन्होंने तबल जंग बजाया। नक़्क़ारो की पुर शोर  आवाज़ बुलंद हुई और आदाए इस्लाम के रिसाले तरतीब व निज़ाम के साथ आगे बढे। ऐसा मालूम होता था था जैसे  इंसानी समुन्द्र में तूफानी मौजे उठने लगी है। 

                    मुस्लमान उन्हें  बढ़ते हुए देख रहे थे। उन्हें जोश आरहा था उनका दिल चाहता था की वह झपट कर हमला कर दे  .लेकिन अभी उनके सालार ने हमला का इशारा नहीं किया था इसलिए वह अपनी जगह खड़े गज़ब नाक निगाहो से उन्हें घूर रहे थे। 

                काफिरो का सैलाब बढ़ा चला आरहा था और उस शान से आरहा था की देखने वालो को यह मालूम होता  था की वह मुसलमानो को खस व कषाक की तरह बहा ले जायेगा। 

                  अब्दुर्रहमान ने अल्लाह हु अकबर का नारा लगाया। मुस्लमान होशियार हो गए। उन्होंने दूसरा नारा लगाया मुसलमानो ने हथियार संभाल लिया उन्होंने तीसरा नारा लगाया  तमाम मुस्लमान ने इस मुबारक नारा की तकरार की हीबत नाक शोर  बुलंद हुआ। तबल जंग की आवाज़ इस शोर में गायब हो गयी  . 

           अब मुसलमानो ने घोड़ो को बढ़ाया इस्लामी दस्ते इस शान से बढे की नेज़े हाथो में लेकर दुश्मनो की तरफ बढ़ा  दे। 

          इस वक़्त आफताब बहुत कुछ ऊँचा हो गया था धुप तमाम मैदान में फैल गयी थी। हवा खामोश थी। फ़िज़ा डैम  साधे इस खून रेज़ मंज़र को देख रही थी. आफताब की शुआयें से हथियार जगमगा रहे थे। काफिरो की सरो पर लोहे के खुद थे जो चमक रहे थे मुस्लमान अमामे बांधे थे। उनकी क़ाबाओ के लम्बे  दामन लटक रहे थे। 

          काफिरो की दाड़िया मंडी हुई थी और मुसलमानो की दाड़िया उनके रोअब व जलाल को ज़ाहिर कर रही थी। 

          चुकि  फ़रीक़ैन एक दूसरे की तरफ बढ़ रहे थे इसलिए फैसला काम होता जाता था। शुरू में यह ख्याल हुआ था की शायद नेजो  से लड़ाई शुरू की जाये। लेकिन फ़रीक़ैन जोश व गज़ब में भरे हुए थे। जल्द से जल्द  भिड़ना चाहते थे  इसलिए तीरों की नौबत नहीं आयी। 

               काफिरो ने भी अपने नेज़े  निकाल लिए थे। जब फ़रीक़ैन की पहली  सफे  एक दूसरे केहुए।  मुक़ाबिल हुए तो दोनों  ने हमला   .मुसलमानो ने हमला करते वक़्त फिर अल्लाह हु अकबर  पर शोर नारा  लगाया। इस नारे की हियत से काफिरो के बहुत घोड़े अल्फ हो गए। सवार घोड़ो के संभालने में मसरूफ हुए। मुसलमानो ने उनके घोड़ो  ही को बांध डाला। 

               एक तो घोड़े ख़ौफ़ज़दा हो ही रहे थे और उनपर नेजो की अनिया पड़ी वह घबरा कर दूसरे सवारों पर जा पड़े। इससे काफिरो की पहली सफ में इन्तेशार पैदा हो गए। कई सवार  घोड़ो ने निचे गिर पड़े और रोंद दिए गए। कई घोड़े ज़ख्म खा कर पीछे की तरफ भागे इससे दूसरी  सफ में अब्तरि पैदा हो गयी। 

            मुसलमानो की लम्बी सफ ने निहायत जोश के साथ नेजो से हमला किया। बाज़ लोगो ने उनके हमले रोके। लेकिन ज़्यदा  तर कार गर  हुए। कुछ  लगे और कुछ  घोड़ो के कुछ सवार ज़ख़्मी हो कर गिरे   कुछ  को घोड़ो ने उल्ट  दिया। गरज़ काफिरो की पूरी सफ में अजब इन्तेशार और अब्तरि पैदा हो गयी। मुसलमानो को मौक़ा मिल गया। उन्होंने नेज़े का रकाब  दिवार के सहारे के सहारे से खड़े किये और तलवारे हाथो में लेकर।  दांत भींच कर हमले  शुरू किये। 

           कुफ्फार ने भी उनकी तक़लीद की  .  उन्होंने भी तलवारे सौंत ली और वह भी मुसलमानो पर हमला अवर हुए। लड़ाई  शुरू हुई। खून की बुँदे उछल उछल कर लड़ने वालो को रंगने लगी। साफ़ व शफ़्फ़ाफ़ तलवारे खून  पी पी कर सुर्ख हो गयी और दहाड़ के साथ साथ शोर व गुल भी बढ़ गया। तबल जंग ज़ोर ज़ोर से बजने लगा कुफ्फार  अजब अजब नारे लगाने लगे। मैदान जंग गूँज उठा. 

         मुस्लमान ख़ामोशी मगर जोश से लड़ रहे थे। उनकी खूंखार  तलवारे बड़ी फुर्ती से उठ उठ कर इंसानी समुन्द्र  में डूब रही थी और जब वह खून उगलती हुई उठतीथी तो खून आलूदा तलवारे का खेत सा ऊगा हुआ मालूम होता  था। 

            हाथ पैर  और सर कट कट कर उछल रहे थे। धड़  दरख्तों की तरह गुज़र रहे थे। खून पानी की तरह बहने लगा था  . मुसलमानो ने काफिरो की पहली  और दूसरी सफ का बिलकुल सफाया कर दिया था और अब वह तीसरी सफ पर हमला  आवर हुए थे। 

              मुसलमान बड़ी बहादुरी  और निहायत जिदारी से लड़ रहे थे। उन्होंने बहुत मुजाहिदों को शहीद कर डाला था  . जब कोई मुस्लमान शहीद हो जाता था तो उसके पास के मुस्लमान को बड़ा जोश आजाता था और वह ग़ैज़ गज़ब में भर कर इस ज़ोर से हमला करते थे  की हर मुस्लमान कम से कम दो काफिरो को मार डालता था। 

               कुफ्फार भी जोश में आकर हमला करते तेह। मगर जोश में आये हुए मुस्लमान  उनके  हमलो को शुरू करने से  पहले ही रोक देते थे और उनके हमलो को रोक कर खुद निहायत ज़ोर और बड़े जोश से हमला करते थे। उनका हमला बे पनाह  होता था  उनकी तलवारे काफिरो को काट कर बिछा देती थी। 

           जबकि घमसान की जंग हो रही थी। सर और धड़ कट कर गिर रहे थे खून का दरिया  बाह रहे थे इस वक़्त  अब्दुर्रहमान और इलियास  फैसला पर खड़े जंग का नज़ारा देख रहे थे। अब्दुर्रहमान चारो तरफ इसी ख्याल से देख रहे थे  की किसी तरफ मदद की तो ज़रूरत नहीं। लेकिन इलियास का खून ख़ूंरेज़ी को देख देख कर जोश खा रहा था  . वह जंग में शरीक होना चाहते थे। चुनांचा उन्होंने अब्दुर्रहमान से कहा “या अमीर !हमला करने की इजाज़त  दीजिये। “

            अब्दुर्रहमान  ने उनकी तरफ देखा।  उनका चेहरा जोश व गुस्सा से सुर्ख हो रहा था। उन्होंने कहा “पुर जोश नौजवान  !ज़रा और तौक़फ़ करो.”

      इलियास : देखिये तो सही किस क़द्र ख़ूंरेज़ हो रही है। 

अब्दुर्रहमान : देख रहे है। अभी वक़्त।  कुछ देर और ज़ब्त करो। 

इलियास : ज़ब्त का पैमाना लबरेज़   होता जाता है। 

अब्दुर्रहमान : फिर भी सब्र करो। देखो मुसलमानो ने तीसरी सफ को भी उल्ट दिया है। 

               वाक़ई मुसलमानो ने पुर ज़ोर हमला करके तीसरी सफ को भी उल्ट दिया था। इस वक़्त लड़ाई का ज़ोर बढ़ गया था  . 

 

                                                             अगला भाग   ( शिकस्त) 

 

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