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Home»Hindi Novel»Lagan ( hindi novel )

Lagan (Hindi Novel) Part 4

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailAugust 2, 2026Updated:August 2, 2026 Lagan ( hindi novel ) No Comments44 Mins Read
Lagan Hindi Novel Part 4 ,novelkistories Feature Image
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Part 4

 

मम्मी के यहाँ तो इस शख़्स ने शोर मचाया हुआ था कि डिनर पर जाता है, और यहाँ सब कुछ भूल गया था।

उस वक्त शायद आठ बजे रहे थे। फलक़ी ने फिर से अपनी घड़ी देखी, तो आफ़ाक़ उसकी तरफ़ देख कर बोला—

“फलक़, तुम तैयार हो जाओ, हमें आठ बजे एक डिनर पर जाना है। कोई बात नहीं, मैं इन लोगों को फोन कर देता हूँ कि हम साढ़े आठ बजे तक पहुँच जाएंगे और रिज़वान और भाई भी हमारे साथ ही जाएंगे।”

“नहीं यार, तुम लोग पहुँच जाओ, हम अब जाते हैं।”

“वो जगह खास नहीं है, लेकिन मेरा बड़ा प्यारा दोस्त है। वहाँ ज़रा गपशप रहेगी, और लोग भी तुमसे मिल लेंगे।”

रिज़वान ने ज्यादा इनकार करना उचित नहीं समझा।

आफ़ाक़ ने फलक़ी की तरफ़ देखा। वह वैसे ही बैठी हुई थी।

“जाओ फलक़, पंद्रह मिनट में तैयार होकर आओ, और अगर तैयार नहीं होना चाहती हो तो वैसे ही चली आओ। अब तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा, मैंने तो तुम्हें अपना लिया है।”

सभी हँसने लगे।

वैसे उसका दिल तैयार होने को नहीं कर रहा था, मगर उसका आख़िरी वाक्य सुनकर वह जल उठी और चुपचाप उठकर ड्रेसिंग रूम में गई, अपना सबसे भारी जोड़ा निकाला। खूब अच्छे से मेकअप किया, ज़ेवर पहने, पहले बालों को संवार कर खड़ी हो गई, जैसे कोई ख़तरनाक बारात से निकली हो। और बनने-संवरने में उसने पूरा एक घंटा लगा दिया।

आफ़ाक़ तेज़ी से अंदर आता हुआ बोला, “क्या सब लोग सो तो नहीं गए?”

जैसे ही वह अंदर आया, उसकी नज़र फ़लक पर पड़ी और वह हैरान रह गया। फिर बोला,
“जल्दी आओ, वे लोग मोड़ पर बैठे तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। काफ़ी देर हो गई है।”

फ़लक ने शाल और पर्स उठाया और उसके पीछे-पीछे चल पड़ी… रिज़वान और मिस्टर रिज़वान अपने बच्चों के साथ पहले ही कार में बैठ चुके थे।

आफ़ाक़ ने अपनी कार का दरवाज़ा खोला, फ़लक बैठ गई।

जैसे ही उसने स्टेयरिंग संभाला, आफ़ाक़ बोला,
“देखा, मैंने तुम्हें कैसे तैयार करवाया? क्योंकि हर कोई नई नवेली दुल्हन को दुल्हन के रूप में देखना चाहता है। खैर, मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि ज़िद में ही सही, तुमने इतना अच्छा बनाव-श्रृंगार किया और मेरी इज़्ज़त रख ली।”

फ़लक ने अपनी खूबसूरत आँखों से एक पल के लिए उसे घूरा, फिर अपना निचला होंठ काट लिया। अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था।

कार गेट से बाहर निकल चुकी थी।

उसने तो आफ़ाक़ को जलाने के लिए यह सब किया था, मगर यह सब उसकी ख़ुशी और गर्व का कारण बन गया था।

“आख़िर हर बार मैं इस शख़्स से हार क्यों जाती हूँ?”

वह दिल ही दिल में कुढ़ने लगी।

 

“आप भी बोलिए, कुछ तो कहिए। देखिए तो आफ़ाक़ कैसे बात कर रहा है।”आफ़ाक़ तेज़ी से अंदर आता हुआ बोला, “क्या सब लोग सो तो नहीं गए?”

जैसे ही वह अंदर आया, उसकी नज़र फ़लक पर पड़ी और वह हैरान रह गया। फिर बोला,
“जल्दी आओ, वे लोग मोड़ पर बैठे तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। काफ़ी देर हो गई है।”

फ़लक ने शाल और पर्स उठाया और उसके पीछे-पीछे चल पड़ी… रिज़वान और मिस्टर रिज़वान अपने बच्चों के साथ पहले ही कार में बैठ चुके थे।

आफ़ाक़ ने अपनी कार का दरवाज़ा खोला, फ़लक बैठ गई।

जैसे ही उसने स्टेयरिंग संभाला, आफ़ाक़ बोला,
“देखा, मैंने तुम्हें कैसे तैयार करवाया? क्योंकि हर कोई नई नवेली दुल्हन को दुल्हन के रूप में देखना चाहता है। खैर, मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि ज़िद में ही सही, तुमने इतना अच्छा बनाव-श्रृंगार किया और मेरी इज़्ज़त रख ली।”

फ़लक ने अपनी खूबसूरत आँखों से एक पल के लिए उसे घूरा, फिर अपना निचला होंठ काट लिया। अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था।

कार गेट से बाहर निकल चुकी थी।

उसने तो आफ़ाक़ को जलाने के लिए यह सब किया था, मगर यह सब उसकी ख़ुशी और गर्व का कारण बन गया था।

“आख़िर हर बार मैं इस शख़्स से हार क्यों जाती हूँ?”

वह दिल ही दिल में कुढ़ने लगी।

“आप भी बोलिए, कुछ तो कहिए। देखिए तो आफ़ाक़ कैसे बात कर रहा है।”

अगर तुमने ज़ुबान न खोली तो यह तुम्हें भी बोलने नहीं देगा। ये लोग बहुत बदज़ुबान हैं। जब बोलती हैं तो ऐसा लगता है जैसे करेला नीम पर चढ़कर बोल रहा हो।

ख़ामोशी बातचीत है, बदज़ुबानी ज़ुबान है उनकी।

लोग इन बातों को मज़ाक समझ रहे थे, मगर वह जानती थी कि आफ़ाक किसी न किसी अंदाज़ में उस पर तंज़ कर रहा है।

“और फिर ये महफ़िल में गोलाबारी नहीं करतीं, तन्हाई में करती हैं। मौक़ा देख कर एक वार छोड़ती हैं और फिर मरने और तड़पने का मज़ा देखती हैं।”

सारी महफ़िल ज़ाफ़रान ज़ार हो रही थी।

उसने बढ़कर फ़लक का बाज़ू थाम लिया।

“मेहफ़लक, ये सब हमें लड़ाना चाहते हैं, और हमने क़सम खाई है कि ज़िंदगी भर नहीं लड़ेंगे। एक मिनट के लिए मेरे साथ बाहर आओ, मैं तुम्हें एक चीज़ दिखाना चाहता हूँ।”

पूरी महफ़िल में किसी ने कुछ समझा, किसी ने कुछ और…

बाहर जाकर वह बोला,

“अपने चेहरे से नफ़रत की ये लकीरें तो मिटाओ, जो मेकअप के बावजूद छिप नहीं रही हैं। लोग मुझे तो कुछ नहीं कहेंगे, सारा इल्ज़ाम तुम पर आएगा।”

फिर उसने उसे खींचकर वापस अंदर लाया और बोला,

“और मैंने फ़लक को चाँद दिखाया है।”

 

“ख़ुदा की क़सम, उसके सामने वह बिल्कुल फीका लग रहा था, बल्कि रोता सा लग रहा था। है ना फ़लक…?”

वह ज़बरदस्ती मुस्कुरा दी।

“ऐसे मत मुस्कुराया करो, मेरे सारे दोस्त बदनीयत हैं।”

इस पर महफ़िल में इतना ज़बरदस्त क़हक़हा पड़ा कि दीवारें तक हिल गईं। सब आफ़ाक़ की बातों से लुत्फ़ उठा रहे थे, सिवाय फ़लक के। उसे तो ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी गहरे कुएँ में गिरती जा रही हो।

धीरे-धीरे सारे दोस्त रुख़्सत होने लगे। जब वक़्त देखा तो रात के बारह बज रहे थे।

आफ़ाक़ एक सोफ़े पर आधा लेटा हुआ था।

सिर्फ़ दो-तीन मेहमान बचे थे, जब उसने अपने दोस्त को बुलाकर कहा—

“ओ यार आगा, गरम-गरम कॉफ़ी पिलाओ भाई!”

“कॉफ़ी तो मंगवा देता हूँ, मगर पहले भाई से पूछ लो। वो बहुत थकी हुई लग रही हैं।”

“अगर वो थकी हुई हैं, तो उन्हें कॉफ़ी ज़रूर पिलाओ।”

“मेरा ख़याल है, अब आपको घर चले जाना चाहिए,” मिस्टर आगा बोले।

“वाह! ये अच्छी मेहमाननवाज़ी है! घर बुलाकर घर जाने की सलाह दी जा रही है!” मिस्टर आगा हँसकर बोले।

“अरे आफ़ाक़, हम जानते हैं कि नई-नई शादी में दूल्हा-दुल्हन तन्हाई ज़्यादा चाहते हैं?”

“बस रहने दो भाई,” आफ़ाक़ अंगड़ाई लेकर बोला। “हमारे लिए तन्हाई और महफ़िल दोनों बराबर हैं। बस हमारी परी-रू हमारे सामने होनी चाहिए। जब तक यह बैठी है, दुनिया कायम है, और अगर उठकर चली जाए तो क़यामत आ जाएगी!”

 

“आओ डार्लिंग, मेरे पास आकर बैठो!”

उसने उठकर फ़लक का बाज़ू पकड़ा और उसे अपने साथ सोफ़े पर बिठा लिया, फिर अपना हाथ उसकी कमर में डाल दिया।

फ़लक को उसका साथ बैठाना और इस तरह करीब करना बेहद अजीब लगा। उसका मज़बूत हाथ उसकी पसलियों पर महसूस हो रहा था, और फ़लक के अंदर जैसे कोई तूफ़ान आ गया।

मिस्टर आगा उठकर कॉफ़ी बनाने चले गए।

“तुम्हारा दिल इतनी ज़ोर से क्यों धड़क रहा है, जैसे अभी पसलियाँ तोड़कर बाहर निकल आएगा?” आफ़ाक़ ने उसके कान में सरगोशी की।

फ़लक का दिल और ज़ोर से धड़कने लगा।

“इस दिल में सिर्फ़ ग़ुस्सा ही है या प्यार भी?” वह फिर बोला। “वैसे भी, घमंडी लोगों के दिल में प्यार नहीं होता। मैं सोचता हूँ, जिस दिल में ना मोहब्बत हो, ना इंसानियत, वह धड़कता ही क्यों है? कहीं ऐसा न हो कि यह संक्रामक बीमारी मेरे दिल को भी लग जाए! बेहतर है, ज़रा दूर ही रहूँ?”

आफ़ाक़ ने जल्दी से अपना हाथ हटा लिया।

“अरे भई! क्या राज़-ओ-नियाज़ चल रहे हैं?” मिस्टर आगा कॉफ़ी की प्याली उठाते हुए बोले। “थोड़ा महफ़िल का भी ख़याल करो!”

“लो जी, कर लिया महफ़िल का ख़याल!” आफ़ाक़ ज़रा पीछे हटकर बैठ गया और फिर फ़लक से मुख़ातिब होकर बोला,

“जान-ए-मन, बुरा मत मानना! इस दुनिया में दो दिलों को मिलने ही नहीं दिया जाता!”

“हाँ, हाँ, ये सब हनीमून के चोंचले हैं!” आगा ने हँसते हुए कहा।

 

“अरे छोड़ो यार! हमें तो यूँ लगता है जैसे हम हमेशा से शादीशुदा हैं!”

“ये तो बड़ी ख़ुशक़िस्मती है कि मिसेज़ आगा भी आ गईं! कमाल की अंडरस्टैंडिंग है, चंद दिनों में ही! वाह-वाह!”

“अच्छा भई, अब इजाज़त दो!”

आफ़ाक़ अचानक खड़ा हो गया और कॉफ़ी की ख़ाली प्याली टेबल पर रख दी।

“एक बज गया है, और बाकी की रात ये ख़ातून मुझे जगाएगी!”

इस पर सब हँसने लगे, लेकिन फ़लक को हँसी नहीं आई। उसने ख़ाली प्याली एक तरफ़ रख दी, खुद भी खड़ी हो गई, अपनी शॉल उठाकर कंधों पर डाली, पर्स हाथ में लिया और सबको ख़ुदा हाफ़िज़ कहकर आफ़ाक़ के साथ बाहर निकल आई।

बाहर कड़ाके की ठंड थी। ख़ासकर जब वह इतने गरम कमरे से बाहर आई तो एकदम ठिठुर गई।

जल्दी से दरवाज़ा खोलकर कार में बैठ गई। आफ़ाक़ ने भी बैठते ही हीटर ऑन कर दिया। कार गरम होने लगी, लेकिन आफ़ाक़ की मौजूदगी से उसे घिन आने लगी थी।

इस कड़ाके की सर्दी से भी ज़्यादा उसका बेजान और ठंडा रवैया फ़लक के दिल को जमा देने वाला था। अब घर जाना होगा। उसके साथ ये रात गुज़ारनी होगी। उसी घर में रहना होगा और उसकी हर तकलीफ़देह बात को सहना होगा।

काश! वह इस चलती हुई गाड़ी से कूद जाए…

और इस सर्द, वीरान अंधेरे में कहीं खो जाए।

 

ऐसे कि सुबह तक उसका कोई निशान भी न मिले…

काश ऐसा हो…

मगर ऐसा नहीं हो सकता था। आफ़ाक़ एक कड़वी सच्चाई बनकर उसके साथ बैठा हुआ था।

और वह सोच रही थी— क्या पति ऐसे होते हैं? इतने ठंडे, कठोर और बेरहम?

क्या ये रातें तानों से बर्बाद करने के लिए होती हैं?

क्या हर दुल्हन यह नहीं चाहती कि वह अपने दूल्हे की महकती बाहों में रातभर सपने देखे?

इतना पत्थर-दिल इंसान कोई हो ही नहीं सकता…

आफ़ाक़ एक अजीब क़िस्म का आदमी था। उसका मन कर रहा था कि वह उसका मुँह नोच ले, मगर उसके मुँह लगना भी उसे सही नहीं लग रहा था।

“बेहूदा इंसान! जाने क्या कह दे!”

गोयम मुश्किल, न गोयम मुश्किल! (कहूँ तो मुश्किल, न कहूँ तो मुश्किल!)

एक अजीब उलझन में फँस चुकी थी वह।

घर आ गया। दोनों उतरकर अंदर चले गए।

इस बेडरूम से फ़लक को वहशत हो रही थी।

वह चाहती थी कि किसी और कमरे में जाकर सो जाए। घर और कमरों में जाते हुए भी उसे डर लग रहा था।

मगर उसने फ़ौरन एक फ़ैसला कर लिया।

तेज़ी से कदम उठाकर अपने कमरे की तरफ़ दौड़ी।

अंदर जाकर झट से कुंडी लगा ली।

बस यही एक बात उसके दिमाग़ में आई थी—

वह आफ़ाक़ को बताना चाहती थी कि वह उसे क्या समझती है।

उसे उसकी परवाह नहीं है।

 

वह उसके बिना भी जी सकती है!

या फिर वह उसकी फ़िज़ूल बकवास नहीं सुनना चाहती थी।

कोई तो वजह थी कि उसने ऐसा किया।

काफ़ी देर तक जब बाहर कोई आहट नहीं आई, न किसी ने दरवाज़ा खटखटाया, न ही किसी ने उसे बुलाया, तो वह अपने इस कदम पर पछताने लगी।

“क्या पता, आज रात आफ़ाक़ उसके कमरे में सोना चाहता हो?

क्या पता, वह ख़ुद सुलह का कोई बहाना ढूँढ रहा हो?

और अब मेरे इस बर्ताव से चिढ़ गया हो!”

मगर वह क्या सुलह की कोई सूरत निकालेगा?

उसे इसकी क्या परवाह!

वह तो हर बात पर मेरी तौहीन करता है!

वह उठकर ड्रेसिंग रूम में चली गई। कपड़े बदले, ज़ेवर उतारे और अपनी नाइटी पहनकर बेडरूम में लौट आई।

बिस्तर लगाया और उस पर लेट गई।

घर का सन्नाटा गहरा होता जा रहा था…

और धीरे-धीरे उसे इस ख़ामोशी से डर लगने लगा था।

“ख़्वाह-मख़्वाह बेवक़ूफ़ी कर दी!

चलो, एक झगड़ा और हो जाता, कोई تلखी और बढ़ जाती— इससे क्या फ़र्क़ पड़ता?

कम से कम वह अंदर तो आ जाता!

अब उसे इस तन्हा घर और तन्हाई से डर लग रहा था।

हो सकता है, बाहर और लोग भी हों, मगर जब उसने सोच लिया कि वह अकेली है, तो उसके ज़ेहन में हर चीज़ डराने लगी।

कभी ऐसा महसूस होता कि बाहर कोई दबे पाँव चल रहा है…

 

वह कान लगाकर सुनने लगी…

वह चौंकने लगी…

कभी ऐसा लगता जैसे कोई ग़ैर-महसूस तरीक़े से कमरे में घुस आया है।

कभी महसूस होता कोई भूत उसे घूर रहा है।

घर बिलकुल नया था।

मकान के बारे में वह कुछ नहीं जानती थी।

पता नहीं आफ़ाक़ कहाँ था—

घर पर ही था या ग़ुस्सा खाकर बाहर निकल गया था?

उसके आने के बाद से कोई आवाज़ नहीं आई थी।

तब उसे अपनी जल्दबाज़ी पर ग़ुस्सा आने लगा।

“आख़िर मैंने ये बेवक़ूफ़ी क्यों की?”

शायद उसके अवचेतन में कहीं यह ख़्वाहिश थी कि आफ़ाक़ आए…

उसका दरवाज़ा खटखटाए…

मिन्नत भरी आवाज़ में पुकारे…

और वह दरवाज़ा खोल दे…

मगर वह ऐसा नहीं था।

वह उन मर्दों में से नहीं था।

उसे अब यह अच्छी तरह समझ में आ चुका था।

फिर भी उसने ऐसी बेवक़ूफ़ी क्यों की?

आख़िर वह क्यों आने लगा?

और किस भरोसे पर?

क्या उनके बीच ऐसे ताल्लुक़ात थे कि उसके दरवाज़ा बंद करने पर आफ़ाक़ बेचैन हो उठता?

ओह…! बहुत बड़ी ग़लती हो गई!

यह भी तो हो सकता था कि वह ख़ुद डर का बहाना बनाकर उसे अंदर बुला लेती!

और जब वह अंदर आ जाता, तो कुछ भी मुमकिन था…

मगर अफ़सोस, उसने ख़ुद ही यह मौक़ा खो दिया!

और अब अकेले सोने से उसे कितना डर लग रहा था…

उसका दिल चाहा कि कुंडी खोल दे और आफ़ाक़ को आवाज़ देकर बुलाए।

मगर यह तो बड़ी कमज़ोरी होगी!

वह उसका मज़ाक़ उड़ाएगा—

“किस भरोसे पर पहले दरवाज़ा बंद किया था, और अब क्यों बुला रही हो?”

क्या पता वह आए ही न…

उसकी आवाज़ ही न सुने…

शायद वह सो चुका हो…

और अगर दरवाज़ा खोल दिया, तो कोई और मुसीबत अंदर न आ जाए…!

कोई और आफ़त न खड़ी हो जाए…!

“ना बाबा ना!”

उसे झुरझुरी आ गई।

घबराकर वह उठ बैठी।

रात के तीन बज चुके थे…

 

और नींद का दूर-दूर तक नामो-निशान नहीं था…

वह उठकर कोई किताब तलाश करने लगी…

सामने शेल्फ़ में अनगिनत अंग्रेज़ी और उर्दू की किताबें पड़ी थीं।

ऐसा लग रहा था आफ़ाक़ रात में पढ़ने का आदी है।

उसने एक किताब उठाई और लेटकर पढ़ने लगी।

मगर हर थोड़ी देर में ध्यान बाहर चला जाता…

ऐसा महसूस होता जैसे कोई बाहर चल रहा है।

डर के मारे उसका सारा ख़ून चेहरे पर आ जाता।

सोना चाहती, मगर नींद न आती।

तीन रातें हो गई थीं—

बेचैनी और तकलीफ़ से भरी हुई तीन लंबी रातें।

सर्दियों की रातें वैसे भी जम जाती हैं।

धीरे-धीरे सरकती हैं।

हर दर्द को महसूस करवाकर…

हर बेचैनी को बढ़ाकर…

ना जाने कब उसकी आँख लग गई।

और जब सोई, तो फिर इत्मिनान से सोती रही।

सुबह जब आँख खुली, तो घड़ी में ग्यारह बज रहे थे!

वह घबराकर उठ बैठी।

“आख़िर रोज़ ऐसा क्यों हो रहा है?”

शायद रात के चार बजे सोई थी, फिर उसे होश ही नहीं रहा।

मगर इस बात की उसे ख़ुशी थी कि सोज़-ओ-कर्ब के बाद, नींद ने उसे पूरी तरह घेर लिया था।

अब वह फ्रेश महसूस कर रही थी।

वह उठकर बाथरूम में गई।

मुँह-हाथ धोया।

और ख़ुद ही दरवाज़े की कुंडी खोल दी।

इधर-उधर देखने लगी…

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

उसने बड़े सलीके से कहा—

“कम इन…”

बेरा हाथ बाँधे हाज़िर हुआ।

“बीगम साहिबा, नाश्ता लाऊँ?”

“हाँ, ले आओ।”

बड़े रौबदार अंदाज़ में कहकर, उसने एक मैगज़ीन उठा ली।

उसका दिल चाहा कि आफ़ाक़ के बारे में पूछे…

“वह कहाँ है?”

“उसने नाश्ता कर लिया या नहीं?”

मगर उसने कुछ नहीं पूछा।

 

इतने में बेरा नाश्ते की ट्रे लिए अंदर आ गया…

वह चाय बनाने लगा…

“साहब जी नाश्ता करके दफ्तर चले गए हैं। कह गए थे कि बारह बजे खाने पर पहुँच जाएँगे।”

“अच्छा, तो अब दफ्तर जाने का सिलसिला शुरू हो गया?”

उसने दिल में सोचा।

नाश्ता करने के बाद, उसने फिर से कमरे की कुंडी लगा ली।

अब क्या करना चाहिए?

वह लेटकर अपनी आने वाली ज़िंदगी का प्लान बनाने लगी।

“एक तो मुसीबत है कि किसी से कुछ भी नहीं कहा जा सकता!”

कुछ कहना चाहती है, तो रोना आ जाता है।

वह मन ही मन सोचने लगी…

“मम्मी को फोन करके बुला लिया जाए?”

“या पिंकी से सलाह ली जाए?”

“या फिर सीधे-सीधे बॉबी को फोन कर दूँ?”

मगर बॉबी को फोन करके कहेगी क्या?

“सब कुछ कहने में तो शर्म आएगी!”

वह भी क्या कहेगा?

“बड़ी अकड़ती थी… मेरी मोहब्बत को ठुकराती थी… अब मज़ा मिला?”

“नहीं, बात इस तरह की जाए कि मेरी इज़्ज़त भी बनी रहे और उस पर एहसान भी हो जाए।”

मगर वह कमबख़्त होगा कहाँ?

“अपने घर भी नहीं जाता, और वलीमे पर भी नहीं आया था!”

पिंकी कह रही थी कि “दिन-रात बार में बैठा रहता है।”

“और यही उसकी सबसे बुरी आदत थी!”

वह तो कसमें खाता था कि शादी के बाद पीना छोड़ देगा,

मगर उसकी किसी बात का यक़ीन नहीं करती थी।

“और अब… उसकी बर्बाद मोहब्बत की हर एक बात याद आ रही है!”

“आह, किस हाल में होगा वो?”

“ग़रीब! फ़लकी के इश्क़ ने उसे तबाह कर दिया होगा!”

“माँ-बाप का इकलौता बेटा हाथों से निकल गया होगा…”

 

“उनका तो पूरा खानदान ही बर्बाद हो गया होगा!”

फलक़ी के दिल में बोनी के लिए एक अनोखी, निराली मोहब्बत का तूफ़ान उठा। उसका दिल चाहा कि दौड़कर जाए और रूठे हुए बोबी को सीने से लगा ले। शिद्दत-ए-जज़्बात से उठकर बैठ गई। उसने सोचा, बोबी के घर फोन करके पता कर ले कि वो कहाँ है, मगर डर गई। बोबी की मम्मी पहले ही फलक़ी से ख़फ़ा रहती थीं। कहती थीं कि उसने मेरा बच्चा तबाह कर दिया। अब अगर वो पीछे पड़ गईं तो…? अच्छा, पिंकी को फोन करके पता लगाना चाहिए, मगर…

आज शादी को चौथा दिन था और पिंकी पूछेगी, “आख़िर बोबी की ज़रूरत क्यों पड़ी?”
वो बोबी, जिसे उसने हमेशा ठुकराया और जिसकी मोहब्बत का मज़ाक उड़ाया। और फिर, पिंकी तो ये समझ रही है कि उसने एक आइडियल आदमी से शादी की है, जो उसे दिल की गहराइयों से चाहता है।

अह!
कभी-कभी इंसान गधे को घोड़ा समझ लेता है।
अब क्या किया जाए?

नहीं, पहले थी को फोन करके बुलाया जाए और पूरा सच बता दिया जाए। वो उठकर फोन तक गई। साढ़े ग्यारह बज रहे थे और आफ़ाक़ बारह बजे आने का कहकर गया था। खैर, जो कुछ फोन पर कहा जा सकता है, कह लेगी। उसने मम्मी का नंबर मिलाया तो नौकर बोला,

“ख़ादिम हुसैन, मम्मी कहाँ हैं?”
“जी, छोटी बीबी बोल रही हैं? हाँ… अस्सलामु अलैकुम जी…” वो खुश…

वो बोला,
“मेमसाहिब कहाँ हैं, ख़ादिम हुसैन?”

“वो तो जी, बाहर गई हैं।”

“कहाँ…?”

“जी… हाँ जी… वो तो आपके यहाँ गई हैं।”

“मेरे यहाँ? यहाँ तो नहीं आईं!”

“नहीं जी… नहीं आईं…”

“तो फिर कहाँ गईं?”

“वो तो जी, आपके साहब के साथ गई थीं।”

“कौन से साहब?”

“जी, दूल्हा साहब… वो आपके दूल्हा साहब।”

“आफ़ाक़ के साथ?”

“हाँ जी, हाँ!”

“कब गईं?”

“करीब दस बजे।”

“आफ़ाक़ खुद आए थे?”

“जी हाँ… अपनी गाड़ी में आए थे।”

“कब वापस आएँगी?”

“बता कर नहीं गईं।”

“और तुमने पूछा भी नहीं?”

 

“जी, पूछा था… मगर वो इतनी ज़्यादा हँस रही थीं कि मेरी बात का जवाब ही नहीं दिया।”

फलक़ी ने रिसीवर ज़ोर से पटक दिया।

“तो ये चाल चल रहा है वो ख़बीस! और मम्मी को देखो, कितनी बड़ी बेवक़ूफ़ हैं! वैसे तो बड़ी होशियार बनती हैं, लेकिन पता नहीं उन्हें कहाँ ले गया और क्यों ले गया! लोग सही कहते हैं, औरत जल्दी बेवक़ूफ़ बन जाती है। अब मुझ पर तो उसका ज़ोर चला नहीं, तो मम्मी पर डोरे डालने शुरू कर दिए!”

“मम्मी को कौन समझाए?”
“कौन समझाए मम्मी को?”

ग़ुस्से में जलती-कुढ़ती वो अपने बेडरूम में चली गई और धप्प से बिस्तर पर गिर पड़ी। हर रोज़ नई और अजीब-ओ-ग़रीब बातें हो रही थीं। अगर आफ़ाक़ वाक़ई मम्मी को लेने गया था, तो अभी तक घर क्यों नहीं लाया? और मम्मी अब तक वापस क्यों नहीं आईं?

कभी उसे इस बात पर हैरानी होती, कभी शक होता, और कभी उसे दिल से ग़ुस्सा आता। आफ़ाक़ के लिए दिल में जलन सी महसूस होने लगी।

“जलन क्यों?”

“आख़िर वो एक मर्द ही तो है!”

फिर वो खुद ही अपनी सोच पर चिढ़ गई। “जलन क्यों भला? आफ़ाक़ उसका क्या लगता है! फ़िज़ूल की और ओछी हरकतें करके मुझे इम्प्रेस करने की कोशिश कर रहा है। इम्प्रेस नहीं, बल्कि मुझे नीचा दिखाने की! मगर मैं इतनी आसानी से नीचा दिखने वालों में से नहीं हूँ। बड़ी चालाक चीज़ हूँ, ठीक कर लूँगी सबको!”

 

जैसे ही उसने अपने पाँव रज़ाई के अंदर किए, उसका जिस्म ढीला पड़ गया।
ज़रा सा आराम मिला तो दिल का तनाव भी कम हो गया।

तनाव कम होते ही उसके सारे नस-नस ढीले पड़ गए। उसे हल्की-सी उनींदगी महसूस हुई, फिर जैसे नींद आने लगी।

घड़ी देखी—बिलकुल बारह बज रहे थे। जाने आफ़ाक़ कब आएगा?
उसे उसका इंतज़ार क्यों था?
क्या ये वही रिश्ते थे, जिनकी बुनियाद उसने खुद रखी थी?
फिर वो किसका इंतज़ार कर रही थी?

“ओह, नहीं…”

उसने करवट बदल ली। “मम्मी आएँगी तो उनकी ख़ूब ख़बर लूँगी। अपनी ज़िंदगी गुज़ारकर अब फ़िज़ूल में बेवक़ूफ़ बन रही हैं!”

“ओह… ओह…”

सोचते-सोचते वो सो गई।

जैसे ही उसकी आँख खुली, उसने रज़ाई उठाकर दूर फेंक दी। कलाई पर नज़र पड़ी—दिन के तीन बज रहे थे। तीन घंटे तक वो सोती रही! उठकर बैठी तो उसकी नज़र सोफ़े पर पड़ी।

आफ़ाक़ आँखें बंद किए, सोफ़े से टेक लगाए सो रहा था। पहले तो उसे देखते ही फलक़ी का दिल ज़ोर से धड़क उठा।

धड़क… धड़क… धड़क…

आफ़ाक़… आफ़ाक़… आफ़ाक़…

ख़ून… ख़ौफ़… ख़ौफ़…

 

उसकी धड़कनों ने क्या कहा? वो समझ नहीं सकी।
आख़िर आफ़ाक़ को देखकर हर बार उसका दिल नए अंदाज़ से क्यों धड़कता है?

“नहीं…”

“मुझे इसे देखकर ग़ुस्सा आ जाता है और मैं…”

उसने फिर नज़र उठाकर आफ़ाक़ की तरफ़ देखा।

“वो सच में सो रहा है या बस बनने की कोशिश कर रहा है?”

“हूं, ज़रूर बन रहा होगा। चलता-फिरता ड्रामा है! इससे किसी भी बात की उम्मीद की जा सकती है। जाने अब क्या करने का इरादा है? और ये भी कोई सोने की जगह है?”

इतने सारे कमरे थे। जहाँ रात को सोता है, वहीं सो सकता था। मगर… हाँ, जोकरबाज़ी तो इसकी आदत में शुमार है!

लेकिन फिर भी, वो आफ़ाक़ से नज़र नहीं हटा सकी। इस वक़्त वो सो रहा था, तो उसे जी भरकर देखने का मौक़ा मिल गया। वरना आम हालात में तो वो जान-बूझकर उसकी तरफ़ देखती भी नहीं थी, न कभी नज़र भरकर उसे देखती थी कि कहीं वो ख़ुद को कुछ समझने न लगे। बल्कि उसकी तरफ़ देखे बिना ही बात करती और उसे नज़रअंदाज़ करने की पूरी कोशिश करती।

आज उसने हल्का ब्राउन चेक वाला सूट पहना हुआ था। अंदर पतली लाइनों वाली कमीज़ थी, डार्क ब्राउन टाई लगी हुई थी, ब्राउन चेक वाली जुराबें थीं। कोट में पीला रेशमी रूमाल लगा था और गहरे ब्राउन रंग के जूते थे। वो बहुत अच्छा लग रहा था। कितने सलीक़े से कपड़े पहने थे!

चेहरा साफ़-शफ़्फ़ाफ़ था। रंग कोई ख़ास गोरा नहीं था, बल्कि आम मर्दों की तरह खुलता हुआ सा गेंहुआ रंग था। मगर फिर भी, उसका चेहरा रोशन-रोशन लग रहा था।

उसकी घनी और कुछ हद तक मगरूर आँखें बंद थीं, जिनकी चमक के आगे बाक़ी सब फ़ीका पड़ जाता था। हर वक़्त शोले उगलने वाले उसके भरे-भरे होंठ इस वक़्त किसी क़दर मासूमियत से सो रहे थे।

फलक़ी का दिल फिर तेज़ी से धड़कने लगा।

 

आफ़ाक़ ने एक बाज़ू अपने सिर के नीचे रखा हुआ था और दूसरा ढीले अंदाज़ में सोफ़े के बाज़ू पर पड़ा था…

फलक़ी की नज़र फिर आफ़ाक़ के हाथों पर गई।

“मजबूत, भरे-भरे, खुरदुरे… पूरे मर्दाना हाथ।”

उसे हमेशा से ऐसे ही हाथ पसंद थे—ऐसे हाथ जो किसी लड़की का हाथ पकड़ें तो वो उसके अंदर किसी नन्ही चिड़िया की तरह खो जाए।

“उफ़ अल्लाह! बौबी के हाथ मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थे।”

उसके हाथ तो बिल्कुल लड़कियों की तरह थे—सफ़ेद, नर्म, हर वक़्त चमकते हुए, जैसे रोज़ उन पर कोई महंगा हैंड लोशन लगाता हो। और फिर वो बढ़े हुए नाख़ून! उसने अपनी उंगलियों को भी इतना नाज़ुक और नुकीला बना लिया था कि जब कभी वो उसका हाथ पकड़ता, तो ऐसा लगता मानो कोई सहेली हाथ थाम रही हो। न कोई एहसास, न कोई सिहरन, न कोई हलचल!

दिल में कभी यह ख़्याल नहीं आया कि उसका सर बौबी के सीने से टकरा जाए, या उसकी बाहों में कोई तड़प जागे।

“मगर आफ़ाक़ के हाथ… बौबी से बिल्कुल अलग थे।”

“ये खालिस मर्दाना हाथ थे।”

चौड़ी-चौड़ी, मजबूत उंगलियाँ। भरे-भरे पोर। बड़े, चमकते हुए गहरे नाख़ून। साँवला-सलोना रंग। बिल्कुल साफ़-सुथरे, ताक़त से भरे हुए हाथ।

इन हाथों को देख कर फलक़ी का दिल फिर तेज़ी से धड़कने लगा।

“क्या मुझे हमेशा से ऐसे ही हाथ पसंद नहीं थे?”

ऐसे हाथ जो दिल में एक अजीब-सा एहसास जगा दें, एक मीठी हलचल।

अचानक उसका दिल चाहा कि उठे और इन हाथों को थाम ले।

उन भरे हुए होंठों पर अपनी उंगली रख दे।

उस चौड़े, मजबूत सीने पर, जिसकी हर धड़कन उसकी कमीज़ को हिला रही थी, अपना सिर रख दे।

और कहे—

“ज़ालिम! मेरी सब ख़ताएँ माफ़ कर दे…”

 

“अगर तुझे प्यार करने के अंदाज़ नहीं आते, तो आ, मैं तुझे सिखाऊँ…”

आ, मैं तुझे बताऊँ कि मोहब्बत किसे कहते हैं। प्यार क्या होता है। महबूब के जलवे कैसे होते हैं। ज़िंदगी की खुशियाँ कहाँ मिलती हैं। ज़ुल्फ़ की छाँव में कितना सुकून है। औरत में कितनी मिठास होती है। अगर तू झुकना नहीं चाहता… तो मैं झुक जाती हूँ। झुकना ही तो मोहब्बत है। और मैं मोहब्बत की प्यासी हूँ।

मुझे मोहब्बत से अपना ग़ुलाम बना ले। आ… सारी रंजिशें भूल जाएँ, सिर्फ प्यार करें।
क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ प्यार करने के लिए है।
यहाँ सिर्फ हम दोनों हैं।
हमारे दरमियान ज़माना कभी नहीं।

फिर तूने ये कैसी दीवारें हाइल कर दी हैं?
नफ़रत की ये खाई क्यों?
मोहब्बत की एक रात पर ज़िंदगी के सौ दिन क़ुर्बान हो सकते हैं।

 

न जाने वह सोचते-सोचते क्या करने बढ़ती कि अचानक आफ़ाक़ जाग उठा।
चौंककर उसे देखा और बोला,
“ले चुकीं मेरा जायज़ा और कर चुकीं मेरा तजज़िया… अब इजाज़त हो तो मैं सो जाऊँ?”

वह एकदम घबरा गई। कितनी तन्मयता से वह उसे देख रही थी और भूल गई थी कि वह सो रहा है। हुई ना वही बात! बहुत इतराता फिर रहा है दिल में… ऊंह! उसने मुँह फेर लिया। सारे जज़्बात इधर-उधर उड़ गए। नफ़रत के मारे उसका दिल जलने लगा।

“हुज़ूर, इजाज़त दें तो अब मैं भी ज़रा सो जाऊँ? आप तो इस घर में सिर्फ़ सोने के लिए आई हैं और इस पलंग पर अपनी बादशाहत समझती हैं। ख़ाकसार इस वक़्त से सोफ़े पर अकड़ा पड़ा है। अगर आप अपनी ‘तशरीफ़’ का टोकरा उठाएँ, तो मैं भी ज़रा आराम कर लूँ।”

उसे कुछ समझ नहीं आया कि आफ़ाक़ के इस कहने का क्या मतलब है। हाँ, वह यह ज़रूर पूछना चाहती थी कि “जनाब, रोज़ जहाँ सोते हैं, क्या आज वहाँ नहीं सो सकते थे?” लेकिन वह ऐसा कुछ पूछकर किसी मुसीबत में नहीं पड़ना चाहती थी। बस वैसे ही बैठी रही।

“मोहतरमा, मैं आपसे गुज़ारिश कर रहा हूँ कि मैं सोना चाहता हूँ।”
“तो सो जाइए, किसने मना किया है?” उसने तल्ख़ी से जवाब दिया।
“इजाज़त नहीं ले रहा, आपसे अर्ज़ कर रहा हूँ कि मैं आपकी ज़ुल्फ़ों की छाँव में नहीं, अपने ही पलंग पर सोना चाहता हूँ। चार रातें हो गईं मुझे यूँ ही बेआराम होते हुए। इधर-उधर धक्के खा रहा हूँ। मुझे अपने पलंग के सिवा कहीं नींद नहीं आती। और आप हैं कि चार दिन से दिन-रात उस पर आराम फरमा रही हैं। इजाज़त हो तो मैं अपने पलंग पर…”

 

फलक एक झटके से खड़ी हो गई। “मैं लानत भेजती हूँ इस पलंग पर!” उसने दिल में कहा।
“मैं आज ही कमरा बदल लूँगी!”

वह खड़ी हो गई तो उसने कोट उतारकर सोफ़े की पीठ पर डाला और बिस्तर पर लेट गया। उसके पैर फलक़ी की तरफ़ थे। ज़रा सा सिर ऊँचा करके बोला, “आपको ज़हमत तो होगी, ज़रा मेरे जूते उतार दीजिएगा।”

“ऊंह…”
फलक़ी ने नफ़रत से मुँह फेर लिया और बाहर जाने के लिए मुड़ गई।

“ख़ैर, कोई बात नहीं। मुझे तो जूतों समेत सोने की आदत है।”

यह कहकर उसने अपने पैर रज़ाई के अंदर कर लिए। फलक़ी को बहुत घिन आई। तो यह वही आदमी था जिसकी नफ़ासत (साफ़-सफ़ाई) की वह कुछ देर पहले तारीफ़ कर रही थी?

उसने सिर उठाकर फिर से फलक़ी को मुख़ातिब किया, “मैंने खाना खा लिया है। आप मुझसे कहकर खाना निकलवा लीजिए। मैं खाने के वक़्त घर आ गया था। मैंने आपसे अर्ज़ किया था ना कि मुझे भूख बर्दाश्त नहीं होती? उस वक़्त आप आराम फ़रमा रही थीं, इसलिए जगाना मुनासिब नहीं समझा। यह उम्र है ख़्वाब (सपने) देखने की, मैंने सोचा कहीं आपको डिस्टर्ब न कर दूँ। और…”

उसे जाते देख फिर बोला, “आपकी मम्मी मेरे साथ तशरीफ़ लाई थीं।”

वह जाते-जाते ठिठक गई और अनचाहे ही पीछे मुड़कर देखा।

 

“वो आपके कमरे में आई थीं। आपको सोता देखकर चली गईं, बल्कि मैंने उन्हें खाने पर बिठा लिया था। कहा था, आपकी बेटी तो मुझे यह इज़्ज़त बख्शती नहीं, आप ही बख़्श दें। ख़ूब गपशप रही। क़रीब दो घंटे बैठकर गई हैं।”

फलक़ी का दिल चाहा कि कुछ कहे… और नहीं तो गाली ही दे। मगर किसे? मम्मी को? या आफ़ाक़ को?

“सुबह भी उन्होंने एक बार फ़ोन किया था। उस वक़्त भी आप सो रही थीं।”

“वो पूछ रही थीं— हाँ, तुमने कैसा नशा पिलाया है मेरी बेटी को, जो सारा वक़्त सोई रहती है?”

ज़बरदस्ती खुद को रोकने के बावजूद फलक़ी की आँखों में आँसू आ गए। आफ़ाक़ ने कहा,

“मैडम… ये तो…” वह उनींदी आवाज़ में बोला, “ये तो नफ़रत का नशा है!”

इसके बाद वह अंदर नहीं मुड़ी, बाहर निकल आई।

कॉरिडोर में खड़े होकर उसने अपने आँसू साफ़ किए। अभी वह सोच ही रही थी कि क्या करे, तभी सरा सामने आ गई।

“मैडम, आपके लिए मेज़ पर खाना लगा दिया है।”

“हूँ… मैं आ रही हूँ।”

वह धीरे-धीरे चलती हुई खाने की मेज़ पर जाकर बैठ गई। भूख तो लगी थी, मगर खाने को दिल नहीं चाह रहा था।

“वह क्या करे?”
“मम्मी का क्या करे?”

जितना वह मम्मी के क़रीब होने की कोशिश कर रही थी, उतना ही उनसे दूर होती जा रही थी। बल्कि आफ़ाक़ तो उनके और मम्मी के बीच एक ख़ुशफ़हमी की दीवार खड़ी कर रहा था।

 

“वह क्या करे?”

इस वक्त उसे मम्मी पर इतना ग़ुस्सा आ रहा था कि उसका फ़ोन करने का दिल ही नहीं चाहा। भला ऐसी माँ से क्या कहे, जो उसकी दुखी शक्ल को नहीं पढ़ सकती? उसकी बेबसी को मदहोशी समझती है? क्या माँ भी बेटी के दिल से इतनी बेख़बर हो सकती है?

खाना खाते-खाते फलक़ी अपनी माँ से बिलकुल बेज़ार हो गई। उसने सोचा, “कोई फ़ायदा नहीं ऐसी माँ को फ़ोन करने का या कुछ कहने का।”
वह कोई और राह निकालेगी।

न जाने कैसे उसने खाना ज़बरदस्ती ख़त्म किया और उठकर अपने कमरे में चली आई।
कमरे में वह बस यूँ ही बेख़याली में आ गई थी।

अंदर आकर महसूस हुआ कि इस वक्त बिस्तर पर आफ़ाक़ सोया हुआ था। आफ़ाक़ वाक़ई गहरी नींद में था, बिल्कुल बेख़बर। उसके पैरों में अभी तक जूते थे। लिहाफ़ एक तरफ़ गिरा हुआ था। हमेशा की तरह वही मर्दाना और ‘अज़ली बेपरवाही’ से इधर-उधर बिखरकर सोया हुआ था। मगर उसके चेहरे पर कितनी मासूमियत थी!

फलक़ी सामने सोफ़े पर बैठ गई। मगर अब वह उसे मोहब्बत से नहीं, बस एक उड़ती-सी नज़र डालकर देख रही थी… और फिर नज़रें चुरा लेती थी।

लोग कहते हैं कि सोई हुई औरत क़यामत होती है, लेकिन कुछ मर्द सोते हुए कितने अच्छे लगते हैं…

जैसे कोई रूठा हुआ, बिगड़ा हुआ बच्चा इत्मिनान से सो रहा हो।

 

जो मर्द हर वक़्त चालाक और होशियार बने रहते हैं, उनका असली रूप बस इसी हालत में नज़र आता है।

जब कोई मर्द सोते हुए मासूम फ़रिश्ता लगे, तो औरत बढ़कर उसे कलेजे से लगा लेती है।

काश, आफ़ाक़ उतना ही मासूम होता, जितना कि दिखता है…

अब वह क्या करे? फलक़ी ने सोचा।

“बाहर निकल जाए और फ़ोन करे?”
“नहीं… आफ़ाक़ की मौजूदगी में वह किसी को फ़ोन नहीं कर सकती।”

कोई किताब पढ़ ले?

दिल तो चाह रहा था कि गाड़ी लेकर बाहर निकल जाए, सड़कों पर आवारा घूमे। डीडी ने उसकी माज़दा (Mazda) दूसरे दिन यहाँ भिजवा दी थी। उसका दिल कर रहा था कि अपनी गाड़ी निकाले, सड़कों पर उड़ती फिरे, खुद को आज़ाद महसूस करे और दिल की घुटन को हल्का करे।

“काश, ऐसा हो सकता!”

उसने एक अंग्रेज़ी मैगज़ीन उठा ली और पन्ने पलटने लगी। देखते-देखते सुबह के पाँच बज गए।

दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई।

“कम इन!” उसने धीमी आवाज़ में कहा।

बावर्दी (यूनिफ़ॉर्म पहने) बैरा अंदर आया।

“साहब के दोस्त आए हैं। उन्हें ड्राइंग रूम में बिठा दिया है। उठाने को कह रहे हैं।”

बैरे ने एक विज़िटिंग कार्ड भी फलक़ी को पकड़ा दिया।

फलक़ी ने एक नज़र कार्ड पर डाली और खड़ी हो गई।

 

पहले तो उसका दिल चाहा कि वह बैरे से कह दे, “ख़ुद ही जाकर उठा लो आफ़ाक़ को!”

फिर वह रुक गई।

“भला, जब बीवी मौजूद हो तो कोई और क्यों जगाए? वो क्या सोचेगा?”

“जाओ, उनसे कह दो कि अभी आते हैं।”

फिर जल्दी से पूछा, “क्या उनकी बीवी भी साथ हैं?”

“नहीं जी, बस दो साहब लोग हैं।”

“अच्छा, जाओ… मैं भेजती हूँ।”

कहने को तो उसने बैरे से कह दिया, “जाओ, मैं भेजती हूँ,” मगर ख़ुद उलझन में पड़ गई।

“इस ज़ालिम को जगाना भी एक मुसीबत है!

जगाने का तो एक ही तरीका है— उसे छूकर उठाया जाए।

अगर मोहब्बत का मामला होता, तो बीवी बस हल्के से उसके बालों में उंगलियाँ फेर देती, या कंधे पर हाथ रख देती…

फलक़ी सोचने लगी, “अगर मुझे इजाज़त होती, तो मैं उसके मासूम चेहरे पर अपनी उंगलियाँ वैसे ही फिराती, जैसे कोई गुलाब का फूल फेरता है… कितना मज़ा आता!”

मगर यह उलटे दिमाग़ का आदमी है! सोचने लगेगा कि “मैंने हार मान ली, या मेरा दिल इस पर आ रहा है!”

“दफ़ा करो! अपने आपको ज़लील करने का क्या फ़ायदा?”

तो फिर कैसे जगाऊँ?

पैर से हल्के से हिला दूँ या नाम लेकर बुला लूँ?

“कहीं बुरा न मान जाए… और पता नहीं, इसकी नींद हल्की है या बहुत गहरी!”

“क्यों न रेडियो चला दूँ?”

 

लेकिन ऐसा न हो कि गाने की आवाज़ सुनकर उसकी नींद और भी गहरी हो जाए… और वह समझे कि कोई उसे लोरी सुना रहा है!

“बाहर मेहमान बैठे इंतज़ार कर रहे हैं, और मुझे कोई तरीका नहीं सूझ रहा!

अब क्या करूँ?

“कोई किताब उठाकर ज़ोर से फर्श पर गिरा दूँ?”
“नहीं… इससे कोई साफ़ आवाज़ नहीं होगी!”

“कोई कपड़ा मुँह पर फेंक दूँ?”
“कहीं ऐसा न हो कि ग़लती से उलटे हाथ का थप्पड़ पड़ जाए!”

“जाकर दरवाज़ा खटखटाऊँ?”
“ना बाबा! कहीं दरवाज़ा खटखटाने से बैरा अंदर न आ जाए!”

“फिर क्या करूँ?”

उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।

“इसे उठाना भी एक मुसीबत बन गया है!”

“लिहाफ़ का कोना खींच दूँ?”
“हाँ, ये ठीक रहेगा!”

उसने धीरे-धीरे अपने पाँव से जूता उतारा और चुपके से उसके पास गई।

फिर धीरे से पीछे से लिहाफ़ का कोना खींचा।

थोड़ी हरकत तो हुई, मगर आफ़ाक़ ने लिहाफ़ और कसकर पकड़ लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली।

अब तो और भी मुश्किल हो गई!

पहले वह सीधा लेटा हुआ था, तो जगाने के कई तरीके थे…

अब उसने मुँह दीवार की तरफ़ कर लिया था।

फलक़ी नंगे पाँव वहीं खड़ी रही… पूरा पंद्रह मिनट बीत चुका था!

 

उसने सोचा, “अब दूसरी तरफ़ जाऊँ?”

“अब दूसरी तरफ़ जाकर लिहाफ़ का कोना खींचूँ?

हाँ… इस बार तो ज़रूर जाग जाएगा, क्योंकि पूरा लिहाफ़ उसके नीचे आ चुका है!”

ये सोचकर वो धीरे-धीरे दूसरी तरफ़ गई, संभलकर, पाँव के बल झुकी और लिहाफ़ का कोना पकड़ लिया।

लेकिन…

अपने ही हाथ के साये से डरकर अचानक उछल गई!

संभलने से पहले ही वो सीधा आफ़ाक़ पर गिर पड़ी!

तौबा, गिरने का ये क्या अजीब अंदाज़ था!
कोई मान ही नहीं सकता था कि ये हादसा अचानक हुआ है!

आफ़ाक़ के चेहरे से उसका चेहरा बस ज़रा सा ही दूर था।

बेइख़्तियार, उसने आफ़ाक़ का बाज़ू पकड़ लिया।
…और फिर झट से होश में आई!

आफ़ाक़ जाग चुका था!

वो हल्का-सा मुस्कुराया और उसकी तरफ़ देखा।
पता नहीं… उसकी आँखों में मज़ाक था या कुछ और।

फलक़ी शर्मिंदगी से उठने लगी।

“मैं… मैं आपको जगाना चाहती थी…”

“आपने तो मुझे जगा ही दिया।”

आफ़ाक़ ने उसी मुस्कान के साथ उसकी आँखों में गहरी नज़र डाल दी।

“क्या सच में मैं जाग गया हूँ?”

फलक़ी झटके से सीधी खड़ी हो गई।

…अभी भी आफ़ाक़ के सीने पर उसका दुपट्टा पड़ा था।

वो देख तो रही थी, मगर उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी…

“बाहर आपके दोस्त आए हैं?”

“अच्छा…” आफ़ाक़ उठकर बैठ गया।

“मैं तो कुछ और ही समझ बैठा था।”

वो मुस्कुराकर उसके हाथ से अपना दुपट्टा हल्के से थपथपाने लगा।

“मैंने तो सोचा कि मेरी शख़्सियत और वज़ाहत ने आख़िरकार आपके दिल को झुकना सिखा ही दिया…!”

“ऊँह!” फलक़ी ने झुंझलाकर मुँह फेर लिया।
“क्या समझता है ये अपने आप को!”

“वा, क्या बात है!” आफ़ाक़ हँसते हुए बोला।
“उठाने का ये अंदाज़ तो मुझे भी पसंद आया…!
ख़्वाब में ऐसा लगा जैसे कोई महकती हुई, फूल जैसी परी मेरे सीने से आ लगी हो…”

“ऐसा जगने को नहीं, और सोने को दिल चाह रहा था!”

फिर वो अंगड़ाई लेते हुए उठ खड़ा हुआ।

“कभी-कभी ऐसे ही बहाने से जगाया कीजिए…”
“शायद इसी तरह बात बन जाए!”

वो कोट पहनता हुआ बाहर निकल गया।

फलक़ी ने हाथ में पकड़ा हुआ उसके दोस्त का विज़िटिंग कार्ड देखा।
…और उसका मन किया सीधा उसके मुँह पर दे मारे!

“ऊल्लू का पट्ठा!”

उसने दिल में गाली दी। “कितना ख़ुद-पसंद आदमी है!”

शुक्र था कि उसे ड्रॉइंग रूम तक नहीं जाना पड़ा।
अगर कोई बीवी साथ आई होती तो ज़रूर जाना पड़ता।
…पर वो किसी भी हाल में उसके सामने नहीं जाती!

इतने में बेरा चाय लेकर आ गया।
शायद आफ़ाक़ ने कह दिया होगा।

वो चाय पीने लगी।
अब क्या करे?
ज़िंदगी ज़हर बन चुकी थी।

उसने रेडियो ऑन किया और पुराने गाने बजने लगे।

 

कभी-कभी पुराने गीत इतने अच्छे लगते हैं…
जैसे घर के पिछवाड़े से अचानक ठंडी हवाओं के झोंके आने लगें…
जैसे कोई भूली-बिसरी यादें फिर से ताज़ा हो जाएँ…

“چہرے دل میں سوئے درد جگانے کو تصویر में चले आएँ…”

पुराने गानों में इतना सोज़ क्यों होता है?
गुज़रे हुए दिन खूबसूरत क्यों लगते हैं?
जो छिन जाता है, वो अज़ीज़ क्यों लगने लगता है?

जो रास्ते हम छोड़ आते हैं,
ज़िंदगी पलटकर उनकी तरफ़ क्यों जाना चाहती है?

फलक़ी की आँखों में फिर आँसू आ गए।

“इसमें ख़ुशियाँ हैं कम,
बे-शुमार हैं ग़म…”
“एक हँसी और आँसू हज़ार…
कह दो, कोई न करे यहाँ प्यार!”

गीत के बोल माहौल को और उदास बना रहे थे।
उसने रेडियो बंद कर दिया।

थोड़ी देर बाद दरवाज़े पर हल्की आहट हुई।
बेरा अंदर आने की इजाज़त मांग रहा था।

“क्या बात है?”

“साहब कहते हैं कि आठ बजे एक डिनर पर जाना है।
आप तैयार हो जाएँ?”

“साहब से कह दो, मेरी तबीयत ठीक नहीं है।
मैं आज डिनर पर नहीं जाऊँगी!”

उसे बहुत ख़ुशी हुई कि उसने बेहद सलीके से जवाब दिया था।
कल वाली ज़िल्लत उसे अब तक याद थी।
क्या ज़रूरत थी ख़ुद-ब-ख़ुद ज़लील होने की?

पंद्रह मिनट गुज़र गए।
बेरा लौटकर नहीं आया।

तो उसे सुकून हो गया…

 

अभी आठ बजे तक…

उसने बिस्तर में ही लेटे रहने का फैसला किया। फिर उसने सोचा कि जब आफ़ाक़ चला जाएगा, तो वह नमी को फोन करके बुलाएगी और उसकी अच्छी तरह से खबर लेगी। साथ ही, आफ़ाक़ की सच्चाई भी सबके सामने ला देगी।

“ठीक है।”

लेकिन आफ़ाक़ के जाने के बाद उसे डर लगा… “कोई बात नहीं,” उसने खुद को दिलासा दिया। वह किसी नौकर को बुलाकर यहीं बिठा देगी।

काफी देर तक वह बिस्तर में ही दुबकी रही। बिस्तर से आफ़ाक़ की खुशबू आ रही थी। “कितनी अच्छी खुशबू इस्तेमाल करता है,” उसने सोचा।

“काश, खुशबू की तरह वह खुद भी अच्छा होता!”

जब घड़ी में आठ बज गए तो उसे बड़ी खुशी हुई। वह उठकर बाथरूम चली गई। उसने सोचा कि अब वह पूरे घर का चक्कर लगाकर तसल्ली कर लेगी कि आफ़ाक़ जा चुका है, फिर जो चाहेगी, करेगी।

ख्याली पुलाव पकाते हुए वह बाथरूम से बाहर निकल ही रही थी कि अचानक…

आफ़ाक़ अंदर आ गया।

उसे देखकर वह जैसे जड़ हो गई।

आफ़ाक़ ने काले रंग का डिनर सूट पहना हुआ था। कोट के अंदर काली धारियों वाली कमीज़ थी। वह हमेशा से ज्यादा अच्छा लग रहा था। बल्कि, काले सूट में तो बहुत ही पुरकशिश लग रहा था।

“तो आप अभी तक तैयार नहीं हुईं?” उसने अपने हुक्म देने वाले लहज़े में पूछा।

“मैंने नौकर से कहला दिया था कि मैं नहीं जाऊंगी।”

“मैं यही पूछने आया था कि आप क्यों नहीं जाएंगी?”

 

“मेरी तबीयत ठीक नहीं है।”

“आपकी तबीयत को क्या हुआ है?”
“कुछ नहीं, बस ठीक नहीं…”
“अगर बहाना करना हो तो पेट दर्द या सिर दर्द का कीजिएगा, क्योंकि ये दोनों दर्द औरतों को अक्सर होते हैं और चूंकि ये दिखाई नहीं देते, इसलिए इनका बहाना आसानी से चल जाता है।”
“जी नहीं, न मुझे सिर में दर्द है, न पेट में, बस मेरा मन अच्छा नहीं है। मैं नहीं जाना चाहती।”
“लेकिन मैं अपने दोस्त से वादा कर चुका हूँ।”
“तो आप अपना वादा निभाइए, आपको किसने रोका है?”
“मुझे रोकने वाला अभी तक कोई पैदा नहीं हुआ। मगर आपको मेरे साथ जाना होगा।”
“मैं भी अपनी तबीयत की खुद मालिक हूँ। मैं आपके साथ नहीं जाऊँगी।”
“इस घर में सिर्फ एक आदमी की मर्ज़ी चलेगी।”
“तो इस घर में रहना कौन चाहता है?”
“जब तक आप यहाँ हैं, आपको मेरी मर्ज़ी से चलना होगा।”
“मैं किसी की मर्ज़ी की गुलाम नहीं हूँ।”
“मैं तुम्हारा पति हूँ।”
“मैं खुद को तुम्हारी पत्नी नहीं समझती।”
“तुम्हारे समझने या न समझने से क्या होता है?”
“तुम पति कहलाने के लायक नहीं हो। न मैं अब तक तुम्हारी पत्नी थी और न कभी बन सकती हूँ। तुम भी यह अच्छी तरह जानते हो और मैं भी।”

“पहले तुम खुद को इस काबिल बनाओ!”
“शट अप!” आफ़ाक ने गुस्से से चीखकर कहा।
“तुम बेहद नीच और घटिया इंसान हो। तुम हीन भावना से ग्रस्त हो। तुम्हारे साथ कोई औरत नहीं रह सकती।”
“चुप रहो!” आफ़ाक ने आगे बढ़कर दरवाज़ा बंद कर दिया। “चिल्ला-चिल्लाकर नौकरों को मत बुलाओ। हमारे घर में औरत का ऊँची आवाज़ में बोलना बुरा समझा जाता है।”
“हाँ, और तुम्हारे परिवार में तो औरतों के साथ अच्छा बर्ताव करना भी गुनाह समझा जाता है। मुझे अब इसका पूरा अंदाजा हो गया है।”
“औरत-औरत में फर्क होता है।”
“मर्द-मर्द में भी फर्क होता है!”
“मैं तुम्हारा लिहाज कर रहा हूँ, वरना बदज़ुबान औरतों का इलाज करना मुझे बखूबी आता है।”
“लिहाज?” फ़लक ने तंज़ कसते हुए कहा, “जो कसर रह गई है, वो भी पूरी कर लो। मैं तुमसे नहीं डरती और न ही तुम्हारे साथ रहूँगी। मैं यहाँ से चली जाऊँगी, मुझे किसी की परवाह नहीं!”
“मेरी जूती को भी तुम्हारी परवाह नहीं!” वह चिल्लाकर कहने लगी।
“मैं कह रहा हूँ, धीरे बोलो! तुम्हारी आवाज़ इस दरवाज़े से बाहर नहीं जानी चाहिए!”
“तुम इस दरवाज़े की बात कर रहे हो? मैं सारी दुनिया को चीख-चीखकर बताऊँगी!”
“क्या बताओगी?” आफ़ाक उसके और करीब आ गया।
“यह कि तुम कितने घटिया इंसान हो! नीच हो! तुम एक नकली आदमी हो और गिरे हुए माहौल की उपज हो। तुम्हारी परवरिश में खोट है। तुम्हारे… तुम्हारे खून में…”

धड़ाक…
धड़ाक…
तड़ाक…
धड़ाक…

आफ़ाक़ ने पहला थप्पड़ फ़लक के सीधे गाल पर मारा, दूसरा उल्टे गाल पर, तीसरा फिर सीधे पर, चौथा उल्टे पर… पाँचवाँ… छठा… और फिर फ़लक खुद ही पलंग पर गिर गई।

उसे उम्मीद नहीं थी कि आफ़ाक़ उस पर हाथ उठा सकता है। खुद आफ़ाक़ को भी यकीन नहीं था कि वह ऐसा करेगा। मगर अब जब ये हो ही गया था, तो वह पछता नहीं रहा था।

उसने आगे बढ़कर दरवाज़ा खोल दिया और ठंडे लहजे में कहा, “जब औरत की ज़ुबान चलने लगे, तो मर्द को हाथ उठाना पड़ता है। पति और नौकर में बहुत फर्क होता है। अगर तुम्हारे घरवालों ने तुम्हें ये बात नहीं सिखाई, तो मैं सिखाऊँगा कि एक पति से कैसे बात की जाती है। और याद रखना, कोई भी आदमी, चाहे कितना भी नीच क्यों न हो, अपनी पत्नी के मुँह से अपने माँ-बाप के लिए बुरे अल्फ़ाज़ बर्दाश्त नहीं कर सकता। तुम्हारी इज़्ज़त तुम्हारे अपने हाथ में है!”

ये कहकर वह बाहर चला गया।

 

और जाने से पहले, उसने बाहर से दरवाज़े पर ताला लगा दिया।

इस बार फ़लक़ी सचमुच बेहोश हो गई थी। उसके कोमल गाल इतने थप्पड़ों की मार सहने के काबिल नहीं थे। मगर सबसे बड़ा आघात उसके दिमाग़ को पहुँचा था। उसे तो कभी किसी ने फूल की टहनी तक से नहीं मारा था। डैडी तो कभी उसे ऊँची आवाज़ में पुकारते तक नहीं थे और मम्मी की तो “डियर डियर” और “डार्लिंग डार्लिंग” कहते ज़ुबान सूख जाती थी।

फूल-फूल उसका जिस्म था।
और पत्ती-पत्ती उसका चेहरा।

ज़ालिम ने सारी पंखुड़ियाँ बिखेर दीं। सारे फूल नोच लिए। उसकी साँसें थम गईं। दिल ठहर गया। ज़ुबान बंद हो गई। फिर वह मुड़ी और गिर पड़ी, बेहोश हो गई।

 

आफ़ाक़ दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया और जाते-जाते बाहर से कुंडी भी लगा गया। जाने वह कब तक बेहोश पड़ी रही…

रात के किसी पहर उसे खुद ही होश आ गया।
थोड़ी देर बाद उठकर बैठने की ताकत भी आ गई। वह बैठ गई। हाथों से छूकर अपने गाल टटोले—फोड़े की तरह दुख रहे थे। फिर वह फूट-फूटकर रो पड़ी।

हाय, रोना ही उसका मुकद्दर बन गया था।

“म… म… डैडी… डैडी…”

चिल्ला-चिल्लाकर वह रोई, चीख-चीखकर मम्मी-डैडी को पुकारा। बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में ज़मीन पर एड़ियाँ रगड़-रगड़कर रोया करती थी। मगर सख्त दीवारों में से किसी ने उसकी आह तक नहीं सुनी।

आसमान गूँगा था।
और ज़मीन खामोश।
दर-ओ-दीवार ठिठक गए थे।

कौन था जिसे वह अपनी फ़रियाद सुनाती?

काफ़ी देर रोने के बाद जब वह थक गई, उसका सिर, उसकी आँखें, उसके जबड़े दर्द से दुखने लगे… तो वह हिचकियाँ लेती-लेती ख़ामोश हो गई। खुद अपनी हालत पर उसे तरस आने लगा।

सख्त प्यास लगी थी।
शायद भूख भी महसूस हो रही थी।

 

वह उठकर आईने के सामने गई और अपना चेहरा देखा—कितना भयानक लग रहा था! आँखें सूजकर अंगारा बनी हुई थीं। दोनों गालों पर उंगलियों के गहरे निशान पड़े हुए थे…

दरमियान में सुर्ख-सुर्ख लकीरें साफ़ नज़र आ रही थीं। होंठों से झाग निकल रही थी। बाल बिखरे हुए थे।

उसकी शक्ल कैसी भयानक लग रही थी! खुद अपना चेहरा देखकर वह डर गई। हालात चेहरे पर भी असर डालते हैं। हसीन चेहरा हमेशा हसीन नहीं रहता।
खुशी और ग़म चेहरे को अलग-अलग रूप दे देते हैं—आज ही उसे यह एहसास हुआ था।

वह बाथरूम में चली गई।
हल्के गर्म पानी से मुँह-हाथ धोया। दाँत साफ़ किए। बाहर आकर चेहरे पर थोड़ी-सी क्रीम लगाई। गालों को हाथ लगाने से दर्द हो रहा था, मगर फिर भी हल्के-हल्के, नर्म उंगलियों से उसने पूरे चेहरे को चुपड़ लिया।
फिर कंघी से अपने बाल सँवारे।

घड़ी देखी—रात के दो बज रहे थे।
सर्दियों की लंबी रात, और अभी सिर्फ़ दो बजे थे।

उसने उठकर दरवाज़ा खोलना चाहा, ताकि बाहर जाकर कुछ खाने के लिए ले आए, मगर जैसे ही दरवाज़े को हाथ लगाया, उसे महसूस हुआ—ज़ुल्म का एक और तीर चल चुका था।
वह ज़ालिम बाहर से दरवाज़ा बंद कर गया था।

क्यों आख़िर…?
किस लिए…?

 

क्या उसे डर था कि मैं भाग जाऊँगी?
फरार हो जाऊँगी?
तो ठीक…है! वह क्या…?

दुनिया की कोई ताकत मुझे भागने से नहीं रोक सकती।
आज मैं उसके क़ब्ज़े में हूँ—जितनी सख़्ती करनी है, कर ले…
एक दिन उसे सबक़ सिखाकर रहूँगी।

एक-एक बात का इंतक़ाम लूँगी।
तब उसे पता चलेगा कि किसी लड़की को बस एक जिस्म समझकर उसके साथ ऐसी चालें चलने का क्या अंजाम होता है!

उसने जी भरकर आफ़ाक़ को गालियाँ दीं। उसे कोसा। उसके बड़ों तक को बुरा-भला कहा।
बड़ा ख़ून था तो बड़ा कर दिखाया—एक औरत पर हाथ उठाया!

अगर उसके बड़ों ने अच्छी परवरिश की होती, तो आज वह उसके साथ ऐसा घटिया बर्ताव न करता।

“और नखरे दिखा रहा है…”

“मुझे गाली मत दो!”
“मेरे बाप को गाली मत दो!”

दूँगी… और भरें बाज़ार में दूँगी!
देखूँ, मेरा क्या कर लेगा!”

वह पूरे कमरे में पागलों की तरह घूम रही थी।
ग़ुस्से से उबल रही थी।

फिर अंग्रेज़ी फ़िल्मों के सीन उसके ज़हन में घूमने लगे।
काश, उसके पास कोई ऐसा औज़ार होता जिससे वह छत में छेद कर बाहर निकल सकती!
खिड़कियाँ तोड़ सकती, दीवार में सुराख़ कर सकती!

काश, वह “बायोनिक वुमन” होती!
एक छलांग लगाती और बाहर निकल जाती!
काश, वह इस क़ैद से बच निकलती…

मगर वह क्या करे?
उसके पास कोई हथियार नहीं था।
उसमें लोहे जैसी ताक़त नहीं थी, वरना नामुमकिन को मुमकिन बना देती।

इस इतने बड़े घर में वह क़ैद थी…
और उसके मम्मी-डैडी को कुछ पता भी नहीं था!

काश, कहीं से फ़ोन मिल सकता!

उसने जाकर दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया…
बेवजह… बेकार… लाहासिल…

इस वक़्त रात के पहर कौन उसकी दस्तक सुन सकता था?
अगर घर में वही कमबख़्त था, तो वह दरवाज़ा खोलने से रहा!

सख़्त सर्दी के बावजूद उसके हलक़ में काँटे पड़ रहे थे।
आख़िर मजबूर होकर उसे बाथरूम जाना पड़ा और वहीं से अपनी प्यास बुझानी पड़ी।

आख़िर और क्या करती?
प्यास से तड़प-तड़पकर मरना उसे भी क़ुबूल नहीं था।

पानी पीकर थोड़ी जान में जान आई।
फिर सर्दी महसूस होने लगी।
वह बिस्तर में दुबक गई।

मगर बिस्तर में जाते ही महसूस हुआ—भूख बहुत तेज़ लग रही थी।
भूख का क्या इलाज हो…?

जब से इस घर में आई थी, पेट भरकर खाना नहीं खाया था।
हाँ, बस उस दिन मम्मी के घर ठीक से खाना खाया था।
यहाँ तो हर वक़्त इतना ग़ुस्सा और बेचैनी बनी रहती कि खा ही न पाती।

और अब भूख जान निकाल रही थी।

आख़िर डरते-डरते, अपने आपको बहलाते हुए, कभी रोते-कभी कोसते हुए, फ़लक़ी सो गई।
उस वक़्त सुबह के चार बज रहे थे।

उसे लगा था कि अब वह कम से कम ग्यारह बजे तक सोती रहेगी…
मगर ऐसा नहीं हुआ।

जब पेट ख़ाली हो और दिमाग़ दर्द कर रहा हो, तो इंसान सो नहीं सकता।
सुबह होते ही उसकी आँख खुल गई।

उसे बड़ी हैरत हुई—अभी सिर्फ़ सात बजे थे!
बहुत कोशिश की दोबारा सोने की, मगर नींद नहीं आई।

अब गरम-गरम चाय की तलब ने बेचैन कर दिया।

 

वह उठी, वॉशरूम गई, हाथ-मुँह धोया।
गाल पहले से ज़्यादा सूज गए थे।
और पुराने निशान अब नीले पड़ चुके थे…

फिर इस वक़्त तो उसके पेट में उथल-पुथल मची हुई थी।
ना चाहते हुए भी उसने दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया।

कोई आहट नहीं हुई।
कोई नहीं आया।

ख़ुदा जाने घर में कोई था भी या नहीं…
या फिर उसकी आवाज़ को कोई अहमियत ही नहीं दी जा रही थी?

दूसरी बात ज़्यादा सही लग रही थी।

कितनी ही बार उसने रुक-रुककर दरवाज़ा पीटा…
मगर दरवाज़ा नहीं खुला।

तब उसकी हिम्मत जवाब दे गई।
और वह बेइख़्तियार रोने लगी।

“भूख से मर जाना भी कहाँ की शराफ़त है?”

ऐसा लग रहा था कि अगर अब भी कुछ खाने को न मिला, तो वह सच में मर जाएगी।

वह रोती रही…
बस रोती रही…

नमकीन-नमकीन आँसू उसके गालों को भिगोते रहे…
फिर कोई आँसू होंठों के रास्ते उसके मुँह में चला जाता।

अचानक उसे अहसास हुआ—आँसुओं का यह नमकीन स्वाद उसे अच्छा लग रहा था!

आज पहली बार उसे पता चला कि आँसू सिर्फ़ नमकीन नहीं होते…
बल्कि मज़ेदार भी होते हैं!

मगर भला आँसू पीकर भी कभी गुज़ारा होता है?
और जो आँसू भी ख़त्म हो गए, तो क्या होगा?

धीरे-धीरे उसे कमज़ोरी महसूस होने लगी।

 

सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक उसे वक़्त के गुज़रने का एहसास दिला रही थी।
वरना अंदर बैठे हुए तो उसे बिल्कुल भी पता नहीं चल रहा था कि वक़्त कहाँ जा रहा था…

अजीब खिड़कियाँ थीं इस घर की। अंदर पूरा शीशा और बाहर ग्रिल लगी हुई थी, धूप तो आ ही नहीं सकती थी। भला कोई इस रास्ते से कैसे फरार हो सकता है? पुराने ज़माने के घर कितने अच्छे होते थे! उसने फिल्मों में देखा था कि खिड़की के रास्ते हीरो रस्सी डालकर हीरोइन को बचा लेता था, या हीरोइन खुद ही निकल जाती थी। कितने खुले-खुले और उपयुक्त घर होते थे! लेकिन ये नीची-नीची छतों वाले बेहूदा घर…
ना कोई रोशनदान, ना कोई खिड़की।

जब उसने हर चीज़ पर टिप्पणी कर ली, तो थक गई।
दिन के ग्यारह बज रहे थे। भूख ने उसका कलेजा मरोड़ कर रख दिया था। उसकी जान निकली जा रही थी। काश! कोई उसे एक प्याली गर्म-गर्म चाय दे देता और बदले में…
लेकिन चाय कैसी होती है? और उसका स्वाद क्या होता है?

उसने सूखे होंठों पर ज़बान फेरी। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि यह मामूली-सी चाय, जिसे वह दिन में कितनी ही बार पीती थी और कप भर-भर कर दूसरों को देती थी, कभी इतनी महत्वपूर्ण हो जाएगी। चाय! वह बस एक आवाज़ देती, और भरी हुई केतली उसके सामने आ जाती। एक प्याली पीकर वह उठ जाती और बाकी चाय बर्बाद हो जाती या नौकर पी लेते।
आज अगर कोई उसे नौकरों की बची हुई चाय भी दे देता, तो वह पी लेती।

बैठे-बैठे उसे भूख और फाक़े के रहस्य समझ आने लगे। वह सोचकर हैरान थी कि लोग भूख हड़ताल कैसे कर लेते हैं? यह तो…

 

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