काबुल पर लश्कर कशी हमारा नॉवेल उस ज़माने से शुरू होता है जबकि सय्य्दना हज़रात उस्मान गनी रज़ी अल्लाह सरीर आरए खिलाफत थे। दुनियाए इस्लाम में अमन व सुकून था। मुमालिक मिस्र व शाम,इराक ,ईरान उन सब पर परचम लहराने लगा था। उन मुल्को से कुफ्र व आल्हाद की घोर घटाए दूर हो गयी थी। और नेज़ इस्लाम जिया पॉश हो गया था। उस ज़माने में इराक के गौरनेर अब्दुल्ला बिन आमिर थे। निहायत नेक और बड़े खुद्दार थे। बहादुर और नज़ीर भी थे.। उनके तहत में ईरान भी था।ईरान की सरहद अफगानिस्तान से मिलती थी। चुके इस्लामी फतूहात…
