“चौदहवीं चोटी” भाग 1 और 23 अक्टूबर 2005
वह भूकंप प्रभावित लोगों को इंजेक्शन लगा रही थी।
“फराह, तुम इस्लामाबाद वापस जा रही हो, तुम चलोगी या यहीं और रुकना चाहोगी?”
“अगर तुम जा रही हो तो मैं भी चलती हूँ। तुम हवाई मार्ग से जा रही हो?”
“हाँ, अभी बशीर आकर बताएगा कि हेलीकॉप्टर खाली है या नहीं।”
इसी दौरान एक कैप्टन अंदर आया, “मैडम, हेलीकॉप्टर बस आने ही वाला है। कर्नल तारिक उसमें कुछ लोगों को लेकर आ रहे हैं।”
“वे बस आते ही होंगे।”
वह झुककर एक बच्चे को इंजेक्शन लगा रही थी, फिर चिंतित होकर उसकी माँ से उसके बारे में सवाल करने लगी क्योंकि उसे तेज़ बुखार था।
कैप्टन बशीर ने सोचा कि वह डॉक्टर साहिबा को बता दे कि जो लोग कर्नल फारूक के हेलीकॉप्टर से मुज़फ्फराबाद आ रहे थे, वे तुर्की से आए थे। डॉक्टर साहिबा ने तुर्की से आने वालों के बारे में पूछा था, लेकिन उन्होंने खुद ही कहा था कि तुर्की से कोई नहीं आ रहा। अगर उन्हें तुर्की से आने वालों में कोई दिलचस्पी होगी, तो वह ज़रूर तुर्क डॉक्टरों से होगी। इसलिए बशीर ने कुछ कहे बिना ही वहाँ से चले जाना बेहतर समझा, क्योंकि आने वाले डॉक्टर नहीं, बल्कि इंजीनियर थे।
आधे घंटे बाद, वही बशीर था जिसने दोनों को कर्नल फारूक के आने की सूचना दी।
“आप जल्दी से अपना सामान पैक करके आ जाइए, क्योंकि कर्नल साहिब को तुरंत वापस जाना है। प्लीज़ मैडम, देर मत कीजिएगा, उनका गुस्सा पूरी यूनिट में मशहूर है।”
“हाँ, मैं अभी जाकर अपना सामान ले आती हूँ।”
वह उस तंबू की ओर बढ़ी जहाँ वे रात भर रुकी थीं।
खुला मैदान था, एक ओर शरणार्थी शिविर था और दूसरी ओर खाली ज़मीन थी, जहाँ हेलीकॉप्टर उतर रहा था। वह अपने तंबू में गई, जल्दी से सामान समेटा, बालों को फिर से ऊपर कर क्लिप में बांधा। तभी कुछ टूटने की आवाज़ आई, मगर उसने ध्यान नहीं दिया।
शॉल लपेटकर, बैग कंधे पर डालकर बाहर आई। फराह उसका इंतजार कर रही थी।
“चलो।”
दोनों हेलीकॉप्टर की ओर बढ़ीं। वहाँ ज़्यादातर सैनिक थे, जो इधर-उधर घूम रहे थे। कुछ सैनिक मरीजों को हेलीकॉप्टर में चढ़ा रहे थे, जिन्हें आगे इलाज के लिए इस्लामाबाद ले जाना था।
बशीर ने एक सैनिक को रोका, “Toki की टीम को उस आखिरी तंबू में ले जाओ, वह अभी खाली है।”
दोनों हवा से बचते हुए हेलीकॉप्टर में दाखिल हुईं। मरीज पहुंच चुके थे, दरवाज़ा बंद हो गया।
उसके बालों की क्लिप का एक कीमती पत्थर गिर चुका था।
“अब इसे कहाँ ढूंढूं?”
“फराह, मेरा पत्थर गिर गया है, शायद वह आखिरी तंबू में गिरा होगा, मैं जाकर ले आऊं?”
“पागल हो गई हो? हेलीकॉप्टर उड़ने वाला है! क्या कर्नल फारूक के गुस्से के किस्से नहीं सुने? बेवजह उन्हें नाराज़ मत करो!”
“लेकिन फराह, वह बहुत कीमती पत्थर था और…”
“लोगों के घर-बार उजड़ गए, और तुम्हें अपने पत्थर की पड़ी है? क्या तुम कर्नल साहिब से हेलीकॉप्टर फिर से नीचे उतरवाओगी एक पत्थर के लिए?”
फराह पूरी तरह नशा की तरह झुंझला रही थी। वह चुपचाप पीछे हो गई, मगर उसका दिल चाहा कि वह कर्नल फारूक से बस एक मिनट के लिए हेलीकॉप्टर उतारने की गुजारिश करे, ताकि वह अपना पत्थर ले आए।
लेकिन बात सिर्फ पत्थर की नहीं थी, उसे मुज़फ्फराबाद के उस खामोश और ग़मगीन माहौल में “कुछ खास” महसूस हुआ। कुछ ऐसा जो इन पिछले दिनों में उसने कभी महसूस नहीं किया था।
वह मुज़फ्फराबाद छोड़ना नहीं चाहती थी, मगर सिर्फ लिहाज़ में चुपचाप बैठी रही।
प्रिशे और फराह को हेलीकॉप्टर में बिठाकर, कैप्टन बशीर तेज़ क़दमों से वापस आया। उसने उस जवान को देखा, जिसे उसने “Toki टीम” को तंबू में बिठाने के लिए कहा था।
तीन लोग उस तंबू के पास खड़े थे, उनकी पीठ बशीर की ओर थी।
“सलाम वालेकुम सर!”
तीनों एक साथ पलटे।
पहला तुर्क इंजीनियर लंबा-चौड़ा, गोरा-चिट्टा, यूरोपीय नक्श-ओ-कद का था।
बशीर ने हाथ बढ़ाया, “मैं कैप्टन बशीर हूं।”
“कैप्टन जेनक।”
तुर्क इंजीनियर ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया।
दूसरा व्यक्ति कुछ छोटा था, उसके घुंघराले सुनहरे बाल थे और उसने पीछे की ओर टोपी पहन रखी थी, जिस पर सफेद मार्कर से कुछ लिखा था।
“जेनक।”
उसने खुशी से बशीर से हाथ मिलाया।
अब तीसरे की बारी थी। वह अंधेरे में था। जब उसने सिर उठाया तो उसका चेहरा बेहद गंभीर था।
“उफ़ुक हुसैन अर्सलान।”
उसने अपना परिचय दिया।
उसमें कुछ ऐसा था जिससे कैप्टन बशीर प्रभावित हुआ—शायद वह बहुत हैंडसम था, या शायद उसकी शख्सियत में चुंबकीय आकर्षण था।
“मैं आपको इंजीनियरिंग कोर वालों से जल्दी मिलवाऊंगा, तब तक आप थोड़ा आराम करें।”
बशीर जल्दबाजी में कहकर वापस लौट गया।
वो तीनों तंबू में घुसे और ज़मीन पर बैठ गए। लेकिन उफ़ुक बैठते-बैठते रुक गया। उसकी नज़र ज़मीन पर पड़े एक छोटे से पत्थर पर पड़ी।
वह झुककर उसे उठाने लगा।
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उसने गौर से पत्थर देखा—यह उसके अंगूठे से दोगुने आकार का था और उस पर एक रेखा थी।
कुछ देर सोचने के बाद उसने पत्थर जेब में रख लिया और बाहर आ गया।
वह इधर-उधर देखने लगा, जैसे किसी को खोज रहा हो।
कैप्टन बशीर, जो किसी और से बात कर रहा था, उसे देखकर पास आया।
“कुछ चाहिए था, मिस्टर अर्सलान?”
“नहीं…”
फिर उसने आखिरी तंबू की ओर इशारा किया, “यह सेना का है? यहाँ कोई था?”
“मेरा ख्याल है, सर, यह राहत सामग्री में आया था।”
“अच्छा, ज़्यादा दिक्कत तो नहीं, लेकिन इसकी चादर ठंड से बचाने के लिए नाकाफी लग रही है।”
“नहीं सर, ये काफी गर्म हैं और इनमें पैराशूट की लाइनिंग है।”
“मुझे नाज़ुक मत समझना, कैप्टन। लेकिन जो यहाँ पहले थे, उन्हें कोई शिकायत तो नहीं हुई?”
“नहीं, सर, जिन्हें ठहराया गया था, उन्होंने कोई ज़िक्र नहीं किया।”
“शायद वे किसी ऐसी जगह के थे, जहाँ उन्हें ठंड महसूस न हुई हो।”
“नहीं सर, वे दोनों इस्लामाबाद की डॉक्टर थीं।”
बशीर ने दिमाग पर ज़ोर देकर याद किया और इंकार में सिर हिलाया।
“पम्प्स हॉस्पिटल?”
वह बुदबुदाया और फिर अपनी जेब से पत्थर निकाला।
“यह किसका है? मुझे यह तंबू के फर्श पर मिला।”
“यह डॉक्टर साहिबा के क्लिप में था। मैंने गौर नहीं किया था, लेकिन यह ढीला था। मैंने उन्हें कहा भी था कि गिरने वाला है, यह कीमती है, संभालकर रखें। लेकिन गिर ही गया।”
“वे डॉक्टर अब कहाँ हैं?”
“वे तो अभी-अभी इस्लामाबाद चली गईं।”
तुर्क इंजीनियर के चेहरे पर छाई मायूसी देखकर बशीर को हैरानी हुई।
सर, यह मुझे दे दीजिए, मैं जब इस्लामाबाद जाऊँगा तो उन्हें लौटा दूँगा।
“तुम कब जाओगे?”
“आज 23 तारीख है, मैं दो दिन बाद, 26 को जाऊँगा।”
“मुझे भी साथ ले चलना, मैं उन्हें खुद लौटा दूँगा। यह कीमती पत्थर मेरे पास अमानत रहेगा।” उसने पत्थर को अपनी जेब में डाल लिया, उसके चेहरे पर गंभीरता थी।
“अजीब आदमी है! अभी इस्लामाबाद से आया और अभी जाने की बात कर रहा है!” कैप्टन बशीर ने मन ही मन सोचा।
“सुना था कि तुर्की से सबसे खास इंजीनियर आया है, मगर यह तो… पर हमें क्या?”
सब लोग अपना काम खत्म करके सो चुके थे, मगर अफ़क बिना सोए ही काम में लगा रहा। बशीर को यह बहुत अजीब लगा।
एक मर्द होने के बावजूद, कैप्टन बशीर ने अफ़क जैसी खूबसूरत आँखें नहीं देखी थीं।
कोरक की हर लड़की उसे देखने की ख्वाहिश रखती थी, मगर वह आदमी जाने किस मिट्टी का बना था!
औरत से बात करना तो दूर, सिर उठाकर देखता तक नहीं था।
वह ख़ामोश-सा था, जबकि उसके दो दोस्त बहुत बातूनी थे। फिर भी, उनकी दोस्ती कैसे हो गई?
दो दिनों में अफ़क ने बशीर से सिर्फ़ दो बार बात की थी—
एक बार जब वह खाना देने आया था, और दूसरी बार जब उसने तंबू के बारे में पूछा था।
तुर्की में हर लड़की को पैदा होते ही कीमती सोने की चीज़ दी जाती है, जो उसकी सबसे अनमोल धरोहर होती है।
तुर्क लड़की मर सकती है, मगर वह ज़ेवर किसी को नहीं देती, चाहे कितनी भी गरीब क्यों न हो।
वह कुछ क्षणों के अंतराल से कह रहा था—
“28 अक्टूबर को पाकिस्तान के भूकंप पीड़ित बच्चों के लिए स्कूल फंड इकट्ठा किया गया।”
“एक छोटी बच्ची का बाप बहुत गरीब था, उसने अपने बचपन की वे चूड़ियाँ फंड में दान कर दीं, जो उसे जन्म के समय मिली थीं।”
“हमने वह चूड़ियाँ संबंधित अधिकारियों तक पहुंचा दीं।”
“हमें पाकिस्तानियों के जज़्बे पर गर्व है।”
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2005
वह अपने मामू के एक दोस्त से मिलने सीएमएच (CMH) आई थी। सुबह का वक्त था, आसमान साफ था, और बादल इस्लामाबाद से दूर थे।
वह तेज़ी से चल रही थी। सड़क के दोनों तरफ़ नज़र दौड़ाई, तो एक पेड़ के पास मैनेजर नुमान को खड़ा देखा।
उन्होंने कैंप में कई दिन साथ गुज़ारे थे, अब सीएमएच में मिलना कोई इत्तेफाक़ नहीं था।
“कैसे मिज़ाज हैं, डॉक्टर साहिबा?”
“ख़ैरियत? सीएमएच?”
“ख़ैरियत से अस्पताल कौन आता है, मैनेजर साहब?” वह हल्की मुस्कराहट के साथ बोली।
“ब्रिगेडियर बाजवा की मिसेज़ की अयादत (देखभाल) के लिए आई हूँ। आप कब आए मुज़फ़्फ़राबाद से?”
“आज ही सुबह-सुबह पहुँचा और आपके सामने हूँ।”
“कैसी गुज़र रही है मुज़फ़्फ़राबाद में?”
“बस, मेम, काम हो रहा है। हर कोई कोशिश कर रहा है कि अल्लाह बेहतरीन कर दे।”
“आप ठीक हैं?”
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ। कैप्टन बशीर वगैरह सब ठीक हैं?”
“अल्हम्दुलिल्लाह, सब ठीक हैं।”
“कुछ विदेशी भी आए हुए हैं, जो पहले भी थे, मगर जिनसे अभी मिला हूँ, उनके जज़्बे ने हैरान कर दिया।”
वह शायद बोलने का शौक़ीन था।
“मिसेज़ बाजवा को दूसरे डिपार्टमेंट में ले गए हैं। आपको इंतज़ार करना पड़ेगा। मैं देखता हूँ, जब वे आ जाएँ तो आपको बता दूँगा।”
“अरे, मैनेजर नुमान, मैं खुद देख लूँगी, आप ख़ामख़ा तकलीफ़ न करें।”
सिर्फ इसलिए कि वह उसके साथ कैंप में थी, वह उसका इतना ख्याल रख रहा था, जिससे वह थोड़ी शर्मिंदा हो रही थी।
“कोई बात नहीं, आप बैठिए, मैं देख कर आता हूँ।”
“नहीं, मैं यहीं हूँ।”
मौसम, यादें और वो ग़ज़ल…
आज मौसम बहुत अच्छा था।
उसने सिर उठाकर देखा— ठीक उसके ऊपर रूई की तरह एक बादल का टुकड़ा तैर रहा था।
वह उदासी में मुस्कराई—
“और मैं वैसे भी अच्छे मौसम की दीवानी हूँ।”
“अच्छा, फिर मैं देख कर आता हूँ।”
वह वहीं पेड़ से टिककर गुज़रे लम्हे याद करने लगी।
यादें जो कभी धुंधली नहीं होतीं…
जब वे दोनों साथ-साथ वादियों और झरनों में घूमते थे…
ऐसे ही एक पेड़ से टिककर बैठे थे, ऐसी ही हरी घास थी…
हम बेतुकी बातें करते थे…
अफ़क की पैंट पर एक लाल रंग का कीड़ा गिरा था…
उसने आँखें बंद कर लीं, और उसके लब धीमे-धीमे गुनगुनाने लगे—
वही गीत, जो कभी बारिश में भीगते हुए चौड़ी सड़क पर अफ़क सुनाया करता था।
“ना कुछ कहो हमें, इस राह के हम मुसाफ़िर हैं…”
“हम इश्क़ में पागल हैं, ना कहो कुछ हमें…”
“हम लैला हैं, हम मजनूं हैं…”
शायद लैला ने क़ैस से उतनी मोहब्बत नहीं की होगी, जितनी प्री ने अपने पर्वतारोही से की थी…
मगर आज भी वह तन्हा थी…
“अफ़क अर्सलान?”
पता नहीं कितनी देर वह तुर्की गीत गुनगुनाती रही, जब अचानक किसी आवाज़ से चौंकी।
मैनेजर सड़क पर खड़ा मुस्कुरा रहा था।
“आपने ग़लत प्रोफेशन चुना, डॉक्टर साहिबा! आप तो बहुत अच्छा गाती हैं!”
“फिर मेडिकल में क्यों आईं?”
“नहीं, यह तो बस ऐसे ही…” वह झट से उठ खड़ी हुई।
ज़र्द पत्तों का ढेर उसकी गोद से नीचे गिर पड़ा।
“ब्रिगेडियर बाजवा की वाइफ रूम में आ चुकी हैं, आप उनसे मिल सकती हैं।”
“आपने यह ग़ज़ल कहाँ सुनी?”
वह एक पल के लिए रुकी, फिर पूछने लगी—
“वैसे, मैनेजर साहब, यह गाना थोड़ा मुश्किल है, ना?”
“नहीं, पर… यही गाना कल मैंने अफ़क अर्सलान को गाते सुना था!”
वह सन्न खड़ी रह गई।
“किस को???”
उसने हैरानी से पूछा, जैसे उसकी सुनने की शक्ति धोखा दे रही हो।
“अफ़क अर्सलान को! आप नहीं जानतीं?”
“वह तुर्की का इंजीनियर है, उसी की बात कर रहा हूँ!”
वह इस दुनिया से बेख़बर हो चुकी थी…
“कौन-सा तुर्की इंजीनियर??”
उसने खुद से बुदबुदाया।
“अफ़क अर्सलान नाम है उसका!”
“वह तुम्हें कहाँ मिला?”
उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।
“वही मुज़फ़्फ़राबाद में, वह राहत कार्य के लिए तुर्की से आया है!”
“मगर… मैंने तो मुज़फ़्फ़राबाद में कोई तुर्क इंजीनियर नहीं देखा!”
“वह उसी हेलीकॉप्टर में आया था, जिसमें कर्नल तारिक थे।”
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा…
“उसका पूरा नाम क्या है?”
“अफ़क हुसैन अर्सलान।”
वह ग़ुमसुम खड़ी थी…
“और उसकी आँखें?”
मैनेजर नुमान ने गहरी सांस ली…
“हल्के भूरे रंग की…”
यहाँ पूरा अनुवाद हिंदी में प्रस्तुत है:
“सर, यह आप मुझे दे दें, मैं जब इस्लामाबाद जाऊँगा तो उन्हें लौटा दूँगा।”
“तुम कब जाओगे?”
“आज 23 तारीख़ है, मैं दो दिन बाद 26 को जाऊँगा।”
“मुझे भी साथ ले चलना, मैं उन्हें ख़ुद लौटा दूँगा। यह क़ीमती पत्थर मेरे पास अमानत रहेगा।”
उसने पत्थर को अपनी जेब में डाल लिया, उसके चेहरे पर संजीदगी थी।
“अजीब इंसान है! अभी-अभी इस्लामाबाद से आया है और अभी जाने की बात कर रहा है,” उसने मन ही मन सोचा।
सुना था कि तुर्की से सबसे बेहतरीन इंजीनियर आया है, मगर यह तो… ख़ैर, हमें क्या!
सब अपना काम ख़त्म करके सो चुके थे, मगर अफ़क़ बिना सोए काम में लगा रहा। यह बात बशीर को बहुत अजीब लगी।
मर्द होने के बावजूद कैप्टन बशीर ने उसकी जैसी ख़ूबसूरत आँखें नहीं देखी थीं।
कोरक की हर लड़की उसे देखने की ख़्वाहिश रखती थी, मगर वह आदमी जाने किस मिट्टी का बना था—किसी औरत से बात करना तो दूर, वह सिर उठाकर देखता तक नहीं था।
एक खामोश शख़्स और दूसरा इतना बातूनी—उनकी दोस्ती कैसे हो गई?
दो दिनों में उसने बशीर से सिर्फ़ दो बार बात की थी—पहली बार जब वह देने आया था और दूसरी बार जब तंबू (ख़ेमा) के बारे में पूछने आया था।
“तुर्की में हर लड़की को जन्म के समय एक क़ीमती सोने की चीज़ दी जाती है, जो उसकी सबसे क़ीमती अमानत होती है।”
“तुर्की की कोई भी लड़की मर सकती है, मगर अपना वह गहना किसी को नहीं देती, चाहे वह कितनी ही ग़रीब क्यों न हो, वह उसे बेचती नहीं।”
कुछ मिनटों के अंतराल से वह फिर कहने लगा, “28 अक्टूबर को पाकिस्तान में भूकंप आया था, जिसमें बच्चों के स्कूल के लिए चंदा (फंड) इकट्ठा किया गया। एक छोटी बच्ची के पिता ग़रीब थे, उसने अपनी वही सोने की चूड़ियाँ चंदे में दे दीं, जो उसे बचपन में मिली थीं। हमने वह चूड़ियाँ संबंधित लोगों तक पहुँचा दीं।”
“हमें एक पाकिस्तानी होने के नाते तुर्कों पर फ़ख़्र है।”
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2005
वह अपने मामू के एक दोस्त से मिलने सीएमएच (संयुक्त सैन्य अस्पताल) आई थी।
सुबह का वक़्त था, आसमान साफ़ था, बादल अभी इस्लामाबाद से दूर थे।
वह तेज़ी से चल रही थी। सड़क के दोनों ओर देखा तो एक पेड़ के पास मैनेजर नुमान खड़ा दिखाई दिया।
उन्होंने कई दिन कैंप में साथ बिताए थे, अब सीएमएच में मिलना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था।
“कैसे मिज़ाज हैं, डॉक्टर साहिबा? ख़ैरियत से सीएमएच?”
वह कुछ क़दमों की दूरी पर था, फिर वह क़रीब आ गया।
“ख़ैरियत से अस्पताल कौन आता है, मैनेजर साहब? ब्रिगेडियर बाजवा की मिसेज़ की अयादत (हालचाल लेने) के लिए आई हूँ। आप कब आए मुज़फ़्फ़राबाद से?”
“आज ही सुबह-सुबह पहुँचा हूँ और आपके सामने हूँ।”
“कैसी गुज़र रही है मुज़फ़्फ़राबाद में?”
“बस, मैम, काम चल रहा है। कोशिश तो सब कर रहे हैं, बाक़ी अल्लाह बेहतर करेगा। आप ठीक हैं?”
“अल्हम्दुलिल्लाह, सब ठीक हैं।”
“कुछ विदेशी लोग भी आए हुए हैं, कुछ वही हैं जो पहले भी थे। मगर मैं जिनसे मिलकर आ रहा हूँ, उनके जज़्बे ने मुझे हैरान कर दिया।”
वह बात करने का शौक़ीन था शायद।
“मिसेज़ बाजवा को दूसरे डिपार्टमेंट तक ले जाया गया है, आपको इंतज़ार करना पड़ेगा। मैं पता करता हूँ, जब वे कमरे में आ जाएँगी तो आपको बता दूँगा।”
“अरे, मैनेजर नुमान, मैं ख़ुद देख लूँगी, आप ख़ामख़्वाह तकलीफ़ न करें।”
सिर्फ़ इस वजह से कि वह उसके साथ कैंप में थी, वह उसका ख़्याल कर रहा था, जिससे वह थोड़ी शर्मिंदा हो गई।
“कोई बात नहीं, आप बैठें, मैं देखकर आता हूँ।”
“नहीं, मैं यहीं हूँ। आज मौसम बहुत अच्छा है।”
उसने सिर उठाकर देखा—बिलकुल उसके ऊपर रूई की तरह एक बादल का टुकड़ा तैर रहा था।
वह उदासी में मुस्कुरा दी और बोली, “वैसे भी मैं अच्छे मौसम की दीवानी हूँ।”
“अच्छा, फिर मैं आता हूँ, देख कर।”
वह वहीं पेड़ से टेक लगाए बीते लम्हों को याद करने लगी।
जब वे दोनों साथ-साथ वादियों और चश्मों में घूमते थे,
ऐसे ही एक पेड़ से टेक लगाकर बैठे थे,
और ऐसी ही घास थी।
हम यूँ ही बातें कर रहे थे,
अफ़क़ की पैंट पर एक लाल कीड़ा गिरा था।
उसने आँखें मूँद लीं,
उसके होंठ धीरे-धीरे गुनगुनाने लगे,
वह गीत,
जो कभी बारिश में भीगते हुए अफ़क़ उसे सुनाया करता था—
“न कुछ कहो हमें,
इस राह के हम मुसाफ़िर हैं,
हम इश्क़ में पागल हैं,
न कहो कुछ हमें…”
शायद लैला ने क़ैस से इतनी मोहब्बत नहीं की थी,
जितनी प्री ने अपने पर्वतारोही से की थी।
मगर आज भी वह तन्हा थी।
वह जाने कितनी देर तक तुर्की गीत गुनगुनाती रही,
जब तक किसी की आवाज़ से उसकी तंद्रा नहीं टूटी।
मैनेजर नुमान सड़क पर खड़ा मुस्कुरा रहा था।
“आपने ग़लत प्रोफ़ेशन चुना, डॉक्टर साहिबा। आप तो बहुत अच्छा गा लेती हैं। फिर मेडिकल में क्यों आईं?”
“नहीं, यह तो बस ऐसे ही…”
वह झट से उठ खड़ी हुई,
पीले पत्तों का ढेर उसकी गोद से नीचे गिर गया।
“ब्रिगेडियर साहब की वाइफ कमरे में आ चुकी हैं, आप उनसे मिल लें।”
वह एक लम्हे को ठिठकी,
फिर सोचते हुए पूछने लगी,
“वैसे, डॉक्टर साहिबा, यह गीत काफ़ी मुश्किल है, है न?”
“नहीं तो…”
उसने हँसकर सिर झटका,
कुछ पत्ते और टूटकर गिरे।
“आप यह पाकिस्तान में किसी के मुँह से नहीं सुनेंगी।”
“अरे, नहीं, मैडम। यही गीत कल मैंने अफ़क़ अर्सलान को गाते सुना था।”
वह साक़ित खड़ी मैनेजर नुमान को देख रही थी।
“किस को???”
उसने बेयक़ीनी से पूछा,
शायद उसकी सुनने की ताक़त ने उसे धोखा दिया था।
“अफ़क़ अर्सलान को। आप नहीं जानतीं? वह तुर्क इंजीनियर है न, उसी की बात कर रहा हूँ।”
वह दुनिया को भूल गई।
“कौन-सा तुर्क इंजीनियर?”
“अफ़क़ अर्सलान नाम है उसका।”
“वह आपको कहाँ मिला?”
मैनेजर नुमान सोचकर बोला,
“वह मुज़फ़्फ़राबाद में राहत कार्य के लिए तुर्की से आया है।”
“मगर… मगर मैंने तो मुज़फ़्फ़राबाद में कोई तुर्क इंजीनियर नहीं देखा।”
उसकी आवाज़ जैसे कहीं अटक गई थी…
हिंदी अनुवाद:
वह उसी दिन उसी हेलीकॉप्टर में कर्नल तारिक के साथ आया था, यही वजह थी कि अब मैनेजर नौमान को साफ़ तौर पर बेचैनी हो रही थी।
उसी हेलीकॉप्टर में वह खो गई थी, आने वाले लोगों को वह देख ही नहीं पाई थी।
“डॉ. जहानज़ैब, आप ठीक हैं?”
वह चौंकी नहीं, लेकिन वह उसका पूरा नाम क्यों ले रहा था?
मैनेजर नौमान ने गहरी सांस ली। “उफ़ुक हुसैन अरसलान।”
अब वह कुछ समझ रहा था। वह उसे जानती थी, अब सिर्फ़ पुष्टि करना चाह रही थी।
“यह हसन हुसैन अरसलान की मेहनत की कमाई है, जिसे हम इस तरह हिमालय में झोंक रहे हैं।”
बहुत पहले सुना हुआ उफ़ुक का एक वाक्य उसके दिमाग में गूंजा।
“उफ़ुक अरसलान।” उसने धीमे से दोहराया।
एक अजीब सी बेचैनी थी।
“मैनेजर नौमान, वह कैसा दिखता है?” वह खोए हुए लहजे में पूछने लगी।
“आ…,” वह सोचकर बताने लगा, “काफ़ी लंबा, मुझसे भी दो इंच लंबा, बाल भूरे हैं और आँखें…”
“और आँखें?” उसने सांस रोक ली, जवाब का इंतज़ार करने लगी।
“कोई हल्का रंग था।”
“हनी कलर?”
“शायद वैसा ही था, सॉरी, गौर नहीं किया। ये लड़कियों का काम होता है,” वह हंस दिया।
वह सोच में डूबी हुई थी।
“वह इंजीनियर है ना? तो सिर पर कैप तो पहनता होगा?”
मैनेजर ने सिर हिलाकर हामी भरी।
“उसकी कैप पर कुछ लिखा था?” वह पुष्टि करना चाहती थी। उसके दिल की गवाही थी कि वह उसका वही पर्वतारोही है।
“नहीं, कुछ नहीं लिखा था।”
“अच्छा…,” उसे निराशा हुई। उफ़ुक की कैप पर तो लिखा था, मगर हो सकता है कि यह वही कैप न हो…
“उसके साथ और कोई था? दो इंजीनियर?” वह बेताबी से पूछी।
“हाँ, दो इंजीनियर थे। उनमें से एक की कैप पर सफ़ेद रंग से तैय्यब एर्दोगान के समर्थन में नारा लिखा था।”
अब उसे यकीन आ गया था। अब किसी शक की गुंजाइश नहीं रही थी।
“तीसरा कौन था? डॉक्टर?”
“नहीं, वह भी इंजीनियर था।”
“उनके साथ कोई तुर्क डॉक्टर नहीं था?”
“मैंने नहीं देखा, शायद हो। आप उन्हें जानती हैं? कोई समस्या है?”
उसके धैर्य भरे सवाल के जवाब में वह खुद से बुदबुदाई, “मेरा कुछ खो गया था इन पहाड़ों में… वही खोज रही हूँ।”
“क्या गिरा था? वो जेम स्टोन जो तंबू में गिरा था?”
प्रिशे चौंककर उसे देखने लगी, फिर सिर हिलाकर हामी भरी।
“हाँ, वही।”
“वह कैप्टन बशीर के पास है, बल्कि शायद उन इंजीनियर के पास। वे शायद कल आएँगे।”
“पत्थर को?”
“नहीं, उस इंजीनियर उफ़ुक अरसलान को, जिसने आपका कीमती पत्थर अपने पास रख लिया है। मैं बताना भूल गया था, आपको मिल जाएगा, डोंट वरी। अब आप मिसेज़ बाजवा से मिल लें।”
वह क्या कह रहा था, वह कुछ सुन नहीं पाई।
जब वह वहाँ से आ रही थी, तो उसे महसूस हो रहा था कि कोई आया है—जो उसकी ज़िंदगी था। वह भी उसी जगह था, जहाँ वह इस वक़्त मुज़फ़्फ़राबाद में खड़ी थी।
“हे भगवान, मैं वहाँ से क्यों चली आई?”
नौमान क्या कह रहा था?
“वह कल बशीर के साथ आ रहा है।”
मगर “कल” में बहुत घंटे बाकी थे।
वह “कल” का इंतजार नहीं कर सकती थी। उसे उफ़ुक के पास जाना था… अभी, इसी वक्त।
उसने सिर उठाकर देखा, नौमान कब का जा चुका था। वह लगभग दौड़ते हुए अस्पताल में दाखिल हुई।
रिसेप्शन पर एक लड़का और लड़की बैठे थे। वह उनकी ओर लपकी।
“डॉक्टर नौमान कहाँ हैं?”
“राइट साइड जाएँ, लेफ्ट में…” लड़की कुछ कह ही रही थी कि प्रिशे पूरी बात सुने बिना ही भाग गई।
आगे जाकर देखा, वह किसी से बात कर रहे थे। वह भागकर उनके पास पहुँची।
“मैनेजर नौमान!” वह हांफते हुए बोली।
“रीलैक्स डॉक्टर साहिबा, मिसेज़ बाजवा नहीं मिलीं क्या?”
“भाड़ में जाएँ मिसेज़ बाजवा!” वह कहते-कहते रुकी, फिर सांस को नियंत्रित कर बोली,
“आज कोई हेलीकॉप्टर मुज़फ़्फ़राबाद जा रहा है?”
“वे तो रोज़ आते-जाते हैं। मलबा अभी नहीं हटाया गया। आपको क्या मुज़फ़्फ़राबाद जाना है?”
“जी, प्लीज़, मुझे अभी जाना है।”
“अभी तो…,” वह सोच में पड़ गया।
“शायद हमारे कर्नल मानसेहरा जा रहे हैं, तो हो सकता है कि वे आपको रास्ते में मुज़फ़्फ़राबाद छोड़ दें।”
“मगर मुज़फ़्फ़राबाद मानसेहरा के रास्ते में नहीं पड़ता। क्या कोई इमरजेंसी है?”
“हाँ, मेरा पत्थर!”
“तो कल वे लोग आ ही रहे हैं।”
“मगर कल बहुत देर हो जाएगी। मेरा पत्थर बहुत कीमती था, मुझे चाहिए।”
“आपको उनसे बात करनी है?”
“हाँ, अभी!”
“तो मैं बात करवा देता हूँ।”
“कैसे?”
“शायद कुछ साल पहले बेल नामी किसी व्यक्ति ने एक चीज़ बनाई थी, जिसे फोन कहते हैं।”
“हाँ, पता है, मगर वहाँ सिग्नल नहीं थे।”
“अब कुछ आने लगे हैं। नहीं भी हो तो, आर्मी का संपर्क तो है। आपकी बात करवा देता हूँ।”
वह चला गया।
प्रिशे वहीं घबराई हुई उंगलियाँ मरोड़ने लगी।
“काश मेरे पर होते, तो उड़कर इस वक़्त मुज़फ़्फ़राबाद पहुँच जाती!”
“मुझे इस हाल में उससे मिलना था… देखना था… मैं क्यों चली आई…”
बीस मिनट कब होंगे?
वह उफ़ुक की आवाज़ सुनेगी… उसकी आत्मा प्यास थी…
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“परीशे?”
उसी पल पूरी कायनात रुक गई थी।
वह आवाज़ लाखों में पहचान सकती थी।
वह उसका उफ़ुक ही था।
“अफ़ुक…”
“परी…”
“तुम… तुम कहाँ हो, उफ़ुक?”
“मैं हिमालय के आसमान के नीचे हूँ।”
एक बार फिर हिमालय का आसमान दोनों के बीच आ चुका था…
“परी, मैं आ जाऊँ?”
“क्या तुम्हें अब भी यह पूछने की जरूरत है?”
“मैं कल आ रहा हूँ, मुझे तुम्हारा पत्थर भी देना है।”
“मुझे पता है।”
“परी, तुम्हारे पापा?”
“वह नहीं रहे…”
“मैं जानता हूँ।”
“तुम कैसे जानते हो?”
“उन्होंने बहुत नाम कमाया था। तुम्हारा जिक्र किया था कभी। उनके निधन की खबर मैंने पढ़ी थी।”
“उफ़ुक…”
“बोलो।”
“तुम किधर आओगे?”
“इस्लामाबाद?”
“नहीं, वहाँ मत आना।”
“क्यों?”
“हम वहीं मिलेंगे, जहाँ पहली बार मिले थे…”
अध्याय: पुनर्मिलन
अगले दिन सुबह का सूरज पहाड़ों की चोटियों से झांक रहा था। बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर हल्की गुलाबी आभा बिखर रही थी। प्रीशे उसी पुराने पत्थर पर बैठी थी, जहां कभी उसकी اور अफक़ की پہلی ملاقات हुई थी। उसके दिल की धड़कनें तेज़ थीं, उसकी आंखें हर पल उस दिशा में उठ जातीं, जहां से अफक़ को आना था।
अचानक घोड़ों की टापों की आवाज़ हवा में गूंजने लगी। उसने अपनी सांस रोक ली। सफ़ेद बर्फ पर एक घुड़सवार तेजी से उसकी ओर बढ़ रहा था। वही ब्राउन बाल, वही कैप, वही हनी कलर आंखें… अफक़!
प्रीशे की आंखें भर आईं। उसकी आंखों में अनगिनत सवाल थे, पर अफक़ मुस्कुरा रहा था, जैसे सब कुछ समझ चुका हो।
“तस्वीर ले सकती हो?” अफक़ ने वही पुराना सवाल दोहराया।
प्रीशे ने हंसकर कैमरा उठाया, “नहीं, पहले मैं तुम्हारे कैमरे से तुम्हारी तस्वीर लूंगी!”
अफक़ ने घोड़े की लगाम खींचकर उसे पास रोका और घोड़े से उतरकर उसकी तरफ़ बढ़ा। प्रीशे की आंखें अब भी भीगी थीं।
“अब कोई वादा मत करना, जो फिर तोड़ दो।” उसने कांपती आवाज़ में कहा।
अफक़ ने हल्की हंसी के साथ उसका हाथ थाम लिया, “इस बार कोई वादा नहीं, बस… तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलना चाहता हूं, जहां तक ये रास्ता ले जाए।”
हवा तेज़ हो गई थी। बर्फ़ के छोटे-छोटे टुकड़े हवा में उड़ने लगे। पहाड़ों के बीच खड़ा वो जोड़ा अब अकेला नहीं था। तीन महीने की दूरी जैसे कभी थी ही नहीं…
चौदहवीं चोटी – भाग 2
“तुम कभी नहीं बदलोगी, परिशे जहांजेब। तुम हमेशा आम चीजों में भी खूबसूरती ढूंढती रहोगी।” वह उसकी सुंदर कल्पना पर हंस पड़ा।
“तुम भी तो यही करते हो। मैं दुआ करूंगी कि गिल भी मारगल्ला पर वैसे ही बादल उतारे, जैसे तीन महीने तीन दिन पहले उतरे थे।”
“मैं दुआ करूंगा कि मेरी परी मुझे उसी तरह सफेद और गुलाबी रंग में मिले। तुम कल वही कपड़े पहनना, जो उस दिन पहने थे।”
परिशे ने अपने जूतों को देखा। क्या वह यही पहनकर अफक से मिलने जाएगी? नहीं, वह नए खरीदेगी। अफक को कौन-सा उनके डिज़ाइन याद होगा? मर्दों को ऐसी बातें कहां याद रहती हैं भला!
“ठीक है, तो तुम भी वही जैकेट पहनना।”
फिर कुछ पलों तक दोनों खामोश रहे। दोनों ने कुछ सोचा और एक साथ बोल पड़े—
“और तुम वही वाला…”
लेकिन कुछ याद आने पर दोनों चुप हो गए। उन्होंने एक साथ बोला था, इसलिए एक-दूसरे की बात सुन नहीं पाए थे।
“कल तुम्हारे मामू के पास चलेंगे।” वह अभी पिछली बात में ही थी, बेध्यान होकर बोली।
“वो क्यों?”
“तुम्हें टॉम क्रूज़ ने प्रपोज़ किया था ना? बस, वही लेकर जाएंगे।”
फिर दोनों हंस दिए।
“अच्छा आदमी है, कर लूंगी मैं उसी से शादी।”
“हां, मगर मुझे मारकर करना।” वह जलकर बोला, फिर खुद ही हंस दिया।
“अच्छा, अब मैं फौज का और खर्चा नहीं करवाती। फोन बंद करो, तीन बजे मिलते हैं।”
“मैं राहत (रिलीफ) के लिए आया हूं, मगर कल के लिए समय निकाल लूंगा।”
“मेरे लिए सबसे अहम काम तुम हो। मुझे याद है, राका-पोशी में तुम्हारे आंसू गिरे थे। वे आंसू तुम्हें लौटाने जरूर आऊंगा।”
उसने “अल्लाह हाफ़िज़” कहकर फोन बंद कर दिया।
कितने समय बाद आज वह पूरी तरह संतुष्ट थी।
उसने आंखें बंद कर एक संतोष भरी सांस ली और फिर आंखें खोल दीं।
कमरा कितनी खूबसूरती से सजाया गया था। खिड़की के बाहर दिखने वाला पौधा कितना हरा-भरा था, और वातावरण कितना शांत था।
वह बाहर निकल आई।
कुछ देर बाद उसे मेजर नुमान मिल गया।
“बात हो गई? अब खुश हो?”
परिशे ने बच्चों की तरह सिर हिलाकर हां कहा।
“चलो, यह तो अच्छी बात है।”
वह समझ चुका था कि मामला सिर्फ पत्थर का नहीं था।
परिशे ने उसे धन्यवाद कहा और वहां से चली आई।
आज उसे बहुत सारे काम करने थे।
अफक पूरे घंटे मुज़फ़्फ़राबाद की टूटी हुई इमारतों के पास कुछ खोजता रहा, मगर उसकी चाही हुई चीज़ उसे नहीं मिल रही थी।
निराश होकर वह हाई-कोर लॉन्ज़ चला गया।
वहां एक जगह घास पर गरम कपड़ों, टोपी और मोज़ों का ढेर पड़ा था। कुछ लोग इधर-उधर घूम रहे थे, मगर कोई भी उस ढेर से कुछ उठा नहीं रहा था।
अफक ने वहां भी खोजा, मगर उसे अपनी चीज़ नहीं मिली।
वह मायूस होकर लौटने ही वाला था कि उसने एक पेड़ के तने के सहारे बैठी एक कम उम्र की लड़की को देखा। उसके सिर पर हाथ से बना हुआ एक हैट था।
अफक की मुराद पूरी हो गई थी।
वह वैसे ही जींस की जेबों में हाथ डाले हुए तेज़ क़दमों से उसके पास गया।
“सुनो!”
लड़की ने गर्दन उठाई।
उसके भूरे बाल थे और गाल सेब की तरह लाल थे।
“तुम्हें अंग्रेजी समझ में आती है?”
“हां, मैं यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट हूं।”
धूप से लाल पड़े चेहरे पर उदासी बिखर गई।
“अब कहां की यूनिवर्सिटी और कहां की अंग्रेज़ी! सब राख हो गया।”
“खैर, तुम बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?”
“मुझे तुम्हारा हैट चाहिए।”
लड़की ने हैरानी से आंखें संकरी कर लीं।
“मेरे इस पुराने, बदरंग हैट का क्या करोगे?”
“मुझे किसी को गिफ्ट देना है।”
“मगर मुज़फ़्फ़राबाद में मुझे तुम्हारे हैट के अलावा कोई और दिखा ही नहीं।”
लड़की ने अपना हैट उतारकर ध्यान से देखा।
“ओह, मतलब तुम हैट बना सकती हो?”
“हां, मगर मेरी फूफी ने मुझे सिखाया था।”
“खैर, तुम्हें हैट चाहिए?”
“हां, मगर सादा हो, और ऊपर एक खुला हुआ गुलाब हो, जिसकी पंखुड़ियां काली होकर मुरझा गई हों।”
लड़की हैरानी से बोली—
“मुरझाए गुलाब का क्या फायदा?”
“मैं तुम्हें यह बात नहीं समझा सकता। जिसे दूंगा, उसे मुरझाया हुआ गुलाब पसंद आएगा।”
लड़की ने दिलचस्पी से पूछा—
“तुमने यह हैट कब देना है?”
“कल दोपहर।”
“तो फिर सुबह ताजा गुलाब लगा दूंगी। दोपहर तक तो वह मुरझाएगा। मैं सुबह उजाला होते ही गुलाब तोड़ूंगी, ताकि वह ज्यादा देर तक ताजा रहे।”
अफक मुस्कराया।
“वाह, तुम तो बहुत समझदार लड़की हो!”
“खैर, मैं सुबह वह हैट नीलम स्टेडियम में ला दूंगी। वहां जो आर्मी का आखिरी कोने वाला हरा टेंट है, वहां आ जाना। वैसे कितने पैसे दोगे हैट के?”
लड़की ने उदासी से हंसते हुए कहा—
“तुम कहां से आए हो?”
“तुर्की से।”
“क्या तुम डॉक्टर हो?”
“नहीं, इंजीनियर हूं।”
“फिर भी तुम पहाड़ों में रहने वाले लोगों की मदद कर रहे हो। वह मेरी तरफ़ से तुर्की से आए इंजीनियर के लिए तोहफा होगा। मैं शाम को ही दे दूंगी।”
“नहीं, हम अभी कुछ लोगों के साथ दूर पहाड़ी इलाकों में मदद पहुंचाने जा रहे हैं। शाम तक शायद लौटें। तुम सुबह आ जाना। और तोहफे के लिए शुक्रिया।”
लड़की ने जिज्ञासा से पूछा—
“सुनो, तुम यह हैट किसे दोगे?”
अफक एक पल के लिए रुका, फिर मुस्कुराकर बोला—
“तुम्हें क्यों बताऊं?”
कई महीनों बाद वह आज खुलकर मुस्कुराया था।
परिशे सीएमएच से सीधी अपने मामू के ऑफिस गई।
“आपके बॉस अंदर हैं?”
सचिव ने कहा, “जी, मगर वह दुबई के लिए निकलने वाले हैं।”
परिशे ने सुने बिना ही दरवाज़ा खोल दिया।
मामू ने सिर उठाया, उसे देखा और मुस्कुराए।
“आओ बेटी! ऑफिस में? खैरियत?”
“जी, बस एक बात करनी थी।”
“अच्छा, वैसे सही समय पर आई हो। मैं फ्लाइट के लिए निकल ही रहा था।”
परिशे ने धीरे से उंगली से अंगूठी उतारी और मेज़ पर रख दी।
“आप यह फूफी को वापस कर दें।”
मामू कुछ देर तक चुप रहे, फिर मुस्कराकर उसे देखने लगे।
“तुम मुझसे नाराज़ तो नहीं हो कि मैंने पापा की इच्छा पूरी नहीं की?”
“इच्छाएँ ज़िंदगी तक होती हैं। जो चले जाते हैं, उनके सपनों के पूरा होने या न होने से फर्क नहीं पड़ता। आमतौर पर हम लोग अपनों को उनकी ज़िंदगी में दुख देते हैं और उनकी मौत के बाद उनके लिए प्रार्थनाएँ करते हैं। प्री, तुमने अपने पापा की ज़िंदगी में कभी उनकी अवज्ञा नहीं की, उनकी हर बात मानी, उनके हर आदेश का पालन किया। तुम्हारे पापा तुमसे ख़ुश होकर गए हैं। तुम्हारी शादी जिससे भी हो, अब उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उन्हें बस इस बात से फर्क पड़ेगा कि तुम खुश हो या नहीं?”
“आप लोग भी इस रिश्ते से नाखुश थे ना?” मामू की बातों से उसका आत्मविश्वास लौटने लगा।
“हम बिल्कुल खुश नहीं थे, लेकिन इसमें जहानज़ेब की कोई गलती नहीं थी। भांजे-भतीजे सबको प्यारे होते हैं। निशा की सगाई भी तो मैंने तुम्हारी मामी के भतीजे से करवाई थी। अपने रिश्तों के कारण इंसान बहुत कुछ जानबूझकर नज़रअंदाज़ कर देता है।”
“तो फिर आपने पापा के गुजर जाने के बाद इस रिश्ते को तोड़ने के बारे में नहीं सोचा?”
“मैं कई दिनों से तुम्हारे मुंह से यह सब सुनने का इंतजार कर रहा था। आज मेरा इंतजार खत्म हो गया।” मामू ने प्यार से मुस्कराते हुए कहा।
“आप फूफो से किस आधार पर बात करेंगे?” उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
“वह मेरा मसला है।”
“लेकिन फिर भी, वह बहुत हंगामा करेंगी।” वह थोड़ी चिंतित हो गई।
“बेटा, मेरी भी तो कोई बात है ना? अगर तुमने हिम्मत करके मुझ पर भरोसा करके यह सब कहा है, तो जब मैं कह रहा हूँ कि मैं सब संभाल लूंगा, तो तुम्हें इस बारे में सोचकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है।”
उसने चिंता के साथ हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
“थैंक यू मामू! मैं चलती हूँ।” फिर वह घड़ी देखते हुए खड़ी हो गई और जाते-जाते रुकी, “आप फूफो से कब बात करेंगे?”
“दुबई से वापस आने के बाद।”
“अच्छा।” वह जाने के लिए मुड़ी।
“प्री बेटा!”
वह दरवाजे के करीब थी जब उन्होंने उसे पुकारा। वह दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखे मुड़ी।
“जी मामू!”
“बेटा, अपने पापा के बारे में कभी गलत मत सोचना। हर बेटी के पिता को अपने भांजों से बहुत उम्मीदें होती हैं। अगर तुम्हें लगता है कि राकापोशी जाने की इजाज़त न देने पर तुम्हारे दुखी होने की वजह से तुम्हारे लिए लाखों रुपये खर्च कर देने वाला पिता, ज़िंदगी के सबसे अहम फैसले पर कठोर हो गया था, तो तुम गलत हो। उसे अंदाज़ा था कि तुम नाखुश हो, लेकिन उसे उसका भांजा इतना प्यारा था कि उसके विचार में सैफ से शादी कराकर वह तुम्हें ज़िंदगी की सारी खुशियाँ दे रहा था। तुम्हारे पापा की सोच हर पारंपरिक पिता की तरह यही थी कि वह अपनी बेटी के लिए सबसे अच्छा फैसला कर सकता है। वह एक बेहतरीन पिता थे। उन्होंने हर हाल में तुम्हारे लिए सबसे अच्छा ही सोचा था।”
वह उदास होकर मुस्कराई।
“मुझे पता है मामू! मैं पापा से कभी नाराज़ नहीं हो सकती। शायद मैं सैफ से शादी कर भी लेती, लेकिन… बस, दिल नहीं मानता।” वह आगे कुछ और कहना चाहती थी, लेकिन रुक गई। यह बात उसे मामू की वापसी पर करनी थी।
“ख़ुदा हाफ़िज़ मामू!”
वह वहाँ से निकल आई। अब उसका रुख बाज़ार की ओर था।
जिन्ना सुपर मार्केट में एक ऐसी दुकान थी, जहाँ से वह अक्सर विदेशी सामान खरीदा करती थी।
“मुझे तुर्की का झंडा चाहिए।”
इस दुकान में आकर उसने सेल्समैन से कहा।
अफ़क को फोन पर वही मफलर पहनकर आने की हिदायत देने लगी थी, लेकिन तभी उसे याद आया कि वह मफलर तो राकापोशी की बर्फ में सदियों के लिए दफन हो चुका था।
अब उसे वैसा ही एक मफलर अफ़क अर्सलान को गिफ्ट करना था।
“तुर्की का झंडा तो नहीं है।” सेल्समैन ने कुछ मिनटों बाद बताया।
“अच्छा।” उसे निराशा हुई। “लेकिन आप मंगवा सकते हैं ना? मुझे कल सुबह तक चाहिए।”
“कल तक?” सेल्समैन सोच में पड़ गया।
“मैं दस गुना ज़्यादा कीमत देने को तैयार हूँ, लेकिन मुझे हर हाल में तुर्की का झंडा कल तक चाहिए।” उसका लहजा साफ़ और दृढ़ था।
“जी जी… बिल्कुल! कल सुबह आप ले जाइएगा।”
वहाँ से वह जूते की दुकान पर गई और अपने पुराने जूतों से मिलते-जुलते गुलाबी और सफेद रंग के स्नीकर्स खरीदे। अब उसे अस्पताल जाकर इस्तीफ़ा देना था।
कल से वह एक नई ज़िंदगी शुरू करने जा रही थी—नई ज़िंदगी, जिसमें उसे गुज़रे हुए तीन महीने और पहाड़ों की यादों को पीछे छोड़ना था।
सामान कार में रखकर उसने ऊपर आकाश की ओर देखा। अब नीले आसमान में सफेदी की हल्की परतें उभर रही थीं। काले बादलों का झुंड इस्लामाबाद से काफी दूर था।
काश, ये बादल कल ठीक उसी जगह और उसी वक्त मारगल्ला की पहाड़ियों पर बरसें, जब वह अफ़क से मिलने जाएगी।
ठंडी हवा उसके खिलाफ़ दिशा में बह रही थी, जिससे उसके बाल बार-बार चेहरे पर बिखर रहे थे।
कार में बैठने से पहले, कुछ पलों के लिए उसने आँखें बंद कर हवा की खुशबू को महसूस किया, पेड़ों पर उड़ती हवाओं की सरगोशियाँ सुनीं, और पैरों के नीचे सरसराते पत्थरों की बातें सुनीं। फिर आने वाले दिन की खुशियों की कल्पना करते हुए उसने आँखें खोलीं और कार में बैठने ही वाली थी कि अचानक दूर से उड़ते हुए दो कौवे आए और उसकी गर्दन के पीछे अपनी चोंच मार दी।
उसके होठों से हल्की चीख निकली, और उसी पल वे कौवे आसमान में उड़ते चले गए।
वह गर्दन सहलाते हुए डरी हुई निगाहों से उन कौवों को उड़ते हुए देखती रही।
क्या फिर कोई बुरी खबर उसकी राह देख रही थी, या वह ज़रूरत से ज़्यादा वहम करने लगी थी?
उसने सिर झटक कर कार में बैठ तो गई, लेकिन उन दोनों कौवों के ख्याल को दिमाग से निकालना उसके लिए बहुत मुश्किल था।
“मुझे समझ नहीं आ रहा कि यह सब इतना अचानक कैसे हो गया?”
तंबू में रखी चौथी कुर्सी खींचते हुए जेनेक ने आश्चर्य से पूछा।
बाकी तीन कुर्सियों पर अफ़क, कनिन और अहमद बैठे थे।
“मैंने उसे संपर्क किया और कल मैं उससे मिलने जा रहा हूँ, बस इतना ही।” अफ़क ने लापरवाही से कहा, लेकिन उसके होठों पर बिखरी मुस्कान छुप नहीं सकी।
“तुम बहुत किस्मत वाले हो। एक मुझे देखो, मेरी सगाई से दो दिन पहले कॉल आ गई कि मुझे कश्मीर जाना है।” जेनेक ने मज़ाकिया अंदाज़ में सिर झटका।
उसकी सगाई टल गई थी, और उसने खुद ही ऐसा किया था।
यह सब उन्हें वहाँ लाया था—
फिर तुम हमारे साथ इन रिमोट एरिया में न ही जाओ तो बेहतर है, अहमद ने कुछ देर सोचने के बाद संजीदगी से कहा, “देखो, हमें वहाँ मलबे से दबे लोगों को निकालना है—सारी इमारतें आधी खड़ी होंगी और अगर रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान किसी आफ्टर शॉक से पूरी की पूरी इमारत तुम्हारे ऊपर गिर गई तो हम डॉक्टर प्रीशे को क्या जवाब देंगे?”
अहमद, बंदे की शक्ल अच्छी न हो तो बात तो अच्छी कर लेनी चाहिए, अफ़क ने खफ़गी से उसे देखा।
“मेरी शक्ल बहुत अच्छी है, आने कहती हैं मुझसे ज़्यादा खूबसूरत बच्चा उसने तुर्की में नहीं देखा था,”
“हर माँ यही कहती है, मेरी माँ भी यही कहती थी, असल हकीकत तो यूनिवर्सिटी की लड़कियों ने बताई थी,” कैनन हंसकर बोला।
“चलिए हम जा रहे हैं, तुमने चलना है?” जीनिक सामान बैकपैक में पैक कर रहा था।
“ऑफ कोर्स, तुम्हें क्या भूल गया है कि मैं और तुम हमेशा हर जगह एक साथ जाते हैं?” वह भी उठकर खड़ा हो गया।
“हाँ, लेकिन तुम्हें कल इस्लामाबाद जाना है, वह इलाका दूर है, शायद तुम्हारी कल सुबह तक वापसी न हो सके,”
“कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर देर हो गई तो… तो मैं कल के बजाय परसों चला जाऊँगा, लेकिन हमें साथ ही जाना है—याद है हमारा मोटिव था कि अफ़क और जीनिक जन्नत में भी एक साथ ही जाएंगे,” वह हंसते हुए कहते हुए अपना सामान समेटने लगा।
बात सिर्फ जीनिक के साथ जाने की नहीं थी, उसका दिल अंदर ही अंदर उन लोगों का सोचकर तड़प रहा था जो इतने दिन गुजरने के बाद भी मलबे तले दबे हुए थे। आज उन्होंने मुज़फ्फराबाद से कुछ लोगों को ज़िंदा निकाला था, तो उसे उम्मीद थी कि वहाँ कुछ जानें होंगी जिन्हें वह इन पत्थरों से निकाल सकेंगे।
उनके ग्रुप में कराची यूनिवर्सिटी के कुछ स्टूडेंट्स, कुछ जवान और वे चारों तुर्क थे। हेलीकॉप्टर ने उन्हें दो पहाड़ दूर एक जगह उतारा था, जहाँ से छह घंटे पैदल चलकर वे उस बस्ती में पहुँचे थे जहाँ 8 अक्टूबर के बाद कोई नहीं आया था।
वह एक छोटा सा गाँव जैसा कस्बा था, जहाँ तक पहुँचने के ज़मीन रास्ते लैंड स्लाइडिंग के कारण बंद हो चुके थे। हर तरफ इमारतों का मलबा बिखरा हुआ था। क्या घर और क्या स्कूल, सब तबाह हो चुका था।
वह एक बड़ी इमारत थी जो आधी ढह चुकी थी और बाकी आधी सलामत खड़ी थी। 8 अक्टूबर के बाद शायद कोई भी व्यक्ति इसके पास नहीं आया था, इसका कारण उसका आधा खड़ा हिस्सा था जो इतना कमजोर था कि बस एक आफ्टर शॉक ही इसे जमींदोज़ करने के लिए काफी था।
“यह इतनी बड़ी इमारत है, शायद सरकार का कोई दफ्तर होगा। ज़रूर अंदर बहुत से लोग होंगे और हो सकता है कुछ ज़िंदा भी हों,” अफ़क के पीछे जब कोई भी इस इमारत में नहीं घुसा तो वह बाहर निकलकर उन सभी लोगों से कहने लगा,
“इतने दिन बाद तो शायद ही कोई ज़िंदा हो,” एक लंबे लड़के ने मायूसी से कहा।
“लेकिन आज उन्होंने मुज़फ्फराबाद से कुछ लोग निकाले हैं। इसलिए मैं अंदर जा रहा हूँ, जो आना चाहता है, आ सकता है और जो आफ्टर शॉक के डर से बाहर रुकना चाहता है, वो रुक सकता है। मुझे कोई ऐतराज नहीं,” वह सीधे अंदाज़ में कहकर अपने उपकरण लेकर अंदर चला गया। फौजियों और तुर्कों ने उसकी नकल की।
वहाँ हर तरफ मलबा बिखरा हुआ था। शायद कोई स्कूल था, जिसके आधे से ज्यादा कमरे ढह चुके थे, कुछ की छतें भी आधी गिर चुकी थीं।
जिस कमरे में वह घुसा, उसकी छत आधी से ज्यादा जमींदोज़ हो चुकी थी। वह और एक जवान जमीन पर पड़े पत्थर उठाने लगे। थोड़ी देर बाद उसे बड़े-बड़े पत्थरों और सरिए के टुकड़ों के बीच कुछ कागज़ दिखाई दिए। उसने झुककर उन कागज़ों को उठाया और उन्हें अपनी आँखों के पास लाया। उन पर अंकों में कुछ लिखा था।
“यह देखो, क्या लिखा है?” अफ़क ने सामने खड़े जवान की तरफ वह कागज़ बढ़ाया, जिसने टॉर्च से उस पर रोशनी डालते हुए पढ़ना शुरू किया।
“मुझे डर लग रहा है। यहाँ बहुत अंधेरा है। क्लास के सारे बच्चे बहुत चिल्ला रहे हैं। मुझे भी रोना आ रहा है मगर मैं नहीं रोऊँगी। मुझे पता है अभी कोई मुझे बचा लेगा। अभी अबू आजाएंगे। वह यह डेस्क हटा देंगे जो मेरे ऊपर गिरा पड़ा है।”
कुछ सिटोर छोड़कर लिखा था—
“मेरी टांग में बहुत दर्द हो रहा है। कुछ नजर भी नहीं आ रहा, यहाँ बहुत डरावना सा अंधेरा है, शायद रात हो रही है। अबू अभी तक नहीं आए। प्लीज अल्लाह मियाँ अबू को भेज दो। मुझे बहुत डर लग रहा है। सारे बच्चे रो रहे हैं। किसी के अबू नहीं आ रहे। प्लीज कोई मुझे यहाँ से निकाले। मुझे भूख लगी है, मुझे खाना खाना है।”
“अब बच्चे नहीं चिल्ला रहे। मैंने मरीम को आवाज़ दी है मगर वह बोलती नहीं है। कश्माला कह रही है मरीम मर गई है और अब वह कभी नहीं बोलेगी। कश्माला जोर-जोर से रो रही है। मुझे भी रोना आ रहा है। लिखा भी नहीं जा रहा। अल्लाह मियाँ प्लीज हमें यहाँ अकेला मत छोड़ो। हमें निकाल लो। यहाँ बहुत अंधेरा है।” पढ़ते-पढ़ते उस जवान का गला रुँध गया।
“अहमद… अहमद…!” अफ़क बाकी लोगों को आवाज़ें देने लगा, अहमद और जीनिक दौड़ते हुए वहाँ आए।
“आओ जल्दी करो, यह मलबा हटाओ। शायद मरीम और उसकी बहन ज़िंदा हों,” वह जाने किस उम्मीद पर पत्थर हटाने लगा। शायद वह लड़की ज़िंदा हो, शायद वह नहीं मरी हो। उसने कागज़ शायद पत्थरों के बीच सुराखों से ऊपर फेंका होगा और वह पत्थरों में फंस गया होगा।
वह तेजी से मलबा साफ कर रहे थे। अफ़क के कपड़े मिट्टी और धूल से सने थे। कड़ी सर्दी के बावजूद पसीने आ रहे थे। लाशों की बदबू हर जगह फैल रही थी। थोड़ा नीचे मलबा हटाने पर एक गोरी-चिट्टी, खूबसूरत बच्ची की लाश मलबे में फंसी हुई दिखाई दी। उसके हाथ में एक पेंसिल जकड़ी हुई थी।
अफ़क का दिल खराब होने लगा। मुश्किल से खुद को काबू करते हुए वह जीनिक और अहमद के साथ उस बच्ची की लाश निकालने लगा। उसकी कुचली हुई टांग पर एक भारी पत्थर था। वह तीनों झुककर उस भारी पत्थर को उठाने की कोशिश कर रहे थे कि तभी ज़मीन ने जोरदार झटका खाया।
इससे पहले कि उनमें से कोई सीधा होता, कमरे की आधी खड़ी छत जोर से उन पर गिर पड़ी।
चौदहवीं चोटी – भाग 3
“सर, मैंने सोच-समझकर फैसला किया है। मुझे इस पर कोई पछतावा नहीं होगा।”
डॉ. वासती के संकोच और एहतियात को सुनकर वह इत्मीनान से मुस्कराई।
“इसके बावजूद, अगर आप कभी वापस आना चाहें तो हमारे अस्पताल के दरवाज़े आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे।”
“शायद, लेकिन पता नहीं अब मैं कब लौटूंगी, हो सकता है कि मैं विदेश चली जाऊं। खैर, धन्यवाद सर।”
वह अपना इस्तीफा देकर बाहर निकल गई। आज उसका आखिरी दिन था, इसके बाद उसे यहाँ नहीं आना था। लेकिन अपने आखिरी कुछ घंटों में भी वह मरीजों पर पूरी तवज्जो दे रही थी।
रात में वह डॉ. कामरान के साथ एक घायल व्यक्ति की मरहम-पट्टी कर रही थी। नर्स ने उसे खून चढ़ाने की जरूरत बताई थी।
“ब्लड चढ़ा दिया?”
परीशे ने पास आती नर्स से सवाल किया।
“जी, ओ-पॉजिटिव लगा दिया है।”
“ओ-नेगेटिव नहीं था?” वह जाते-जाते रुकी और पलटी।
“नहीं, ओ-नेगेटिव और ओ-पॉजिटिव दोनों ब्लड बैंक में खत्म हो चुके हैं।”
डॉ. कामरान ने दवाई लिखकर नर्स को दी, “यह इंजेक्शन ले आओ।”
नर्स जा चुकी थी, परीशे ने पर्ची ली।
“सर, दें, मैं ले आती हूँ।”
हालाँकि उसकी ड्यूटी खत्म हो चुकी थी, फिर भी वह फार्मेसी से दवा लेने चली गई और रिसेप्शन की तरफ बढ़ी।
“इस नंबर पर कॉल करनी है।”
उसी वक्त किसी ने दरवाज़ा धक्का दिया। नर्स से बात करते हुए उसने पलटकर देखा—वर्दी पहने सैनिक बड़ी तेजी से स्ट्रेचर अंदर ला रहे थे।
“सुनिए, क्या हुआ? ये कौन लोग हैं?” वह खड़े-खड़े पूछने लगी।
“ये फौजी हैं। रेस्क्यू ऑपरेशन कर रहे थे, लेकिन छत उनके ऊपर गिर गई। एक जवान शहीद हो गया, दो रास्ते में दम तोड़ चुके, और ये बुरी तरह घायल है।”
जो फौजी स्ट्रेचर धकेल रहा था, वह घबराया हुआ लग रहा था।
वह वापस मुड़ी और नर्स को निर्देश देने लगी। फिर दवा का पैकेट लेकर वह वॉर्ड की ओर भागी, जहाँ डॉ. कामरान ने इंजेक्शन मंगवाए थे।
रास्ते में उसकी नजर स्ट्रेचर पर पड़ी, जिस पर एक मृत शरीर रखा था। चेहरा सफेद चादर से ढका था।
लेकिन उसे जैसे ही एहसास हुआ, उसने स्ट्रेचर रोका और चादर हटा दी।
मृत व्यक्ति का चेहरा खून से सना हुआ था। उसके सीने पर एक पी-कैप (फौजी टोपी) रखी थी। परीशे ने वह कैप उठाई। पहले नीली दिखने वाली वह टोपी अब पूरी तरह लाल हो चुकी थी—खून से।
“हेल टू तैय्यब एर्दोगान!”
उसकी नजर टोपी के अंदर लिखे शब्दों पर गई।
ज़मीन-आसमान उसकी आँखों के सामने घूमने लगे। उसका शरीर काँप उठा। कैप उसके हाथ से गिर गई।
“हेल टू तैय्यब एर्दोगान…”
उसने अविश्वास से दोहराया। फिर तेजी से मृत व्यक्ति का चेहरा अपनी ओर घुमाया।
“यह अफक नहीं है!”
लेकिन यह कैप अफक पहनता था। यह उसके दोस्त जैनिक की टोपी थी।
“जैनिक, अफक के बिना कहीं नहीं जाता।”
अहमद की कही हुई बात उसके दिमाग में गूँज उठी।
“तो मरने वाला जैनिक था… और जैनिक अफक के बिना कहीं नहीं जाता… तो अफक कहाँ है?”
उसने तुरंत नर्स को देखा, जो दूसरी लाश को स्ट्रेचर पर ले जा रही थी। परीशे तेजी से उसकी ओर दौड़ी और चादर हटाने लगी, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे।
नर्स ने कुछ समझते हुए खुद चादर हटा दी।
उसका दिल बैठ गया।
“यह अफक नहीं है… यह अहमद दुरान है… जो हमेशा हँसता था।”
“अहमद… ओ खुदा!”
“नहीं, अहमद नहीं!”
उसने अपने मुँह पर हाथ रखा और चीख रोकने की कोशिश की। दो कदम पीछे हटी।
फौजी तीसरा स्ट्रेचर ला रहे थे।
उसे जानने की जरूरत नहीं थी कि तीसरे स्ट्रेचर पर कौन था।
वह बेसुध-सी उनकी ओर दौड़ी।
उसके हाथ से दवा का बैग छूट गया। दवाइयाँ एक-एक कर के ज़मीन पर गिरने लगीं।
“रुको… रुको!”
उसकी आवाज़ सुनकर सैनिक रुका।
वह लपककर स्ट्रेचर तक पहुँची। घायल का चेहरा अपनी ओर घुमाया।
“यह अफक अर्सलान था।”
“अफक बहुत बुरी तरह ज़ख्मी था!”
“इसे जल्दी अंदर लाओ!”
वह काँपते हाथों से स्ट्रेचर धकेलते हुए इमरजेंसी वार्ड में ले आई।
“डॉ. वासती, जल्दी देखिए, वरना यह मर जाएगा!”
डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया।
“इसका बहुत खून बह चुका है। इसका ब्लड ग्रुप चेक करके खून का इंतजाम करो!”
परीशे एकदम चौंकी।
“मुझे पता है इसका ब्लड ग्रुप! ओ-नेगेटिव!”
वह ब्लड बैंक की ओर भागी, लेकिन उसे याद आया कि ओ-नेगेटिव पहले ही खत्म हो चुका है।
“अब मैं खून कहाँ से लाऊँ?”
उसने अपने दिमाग पर ज़ोर डाला। क्या अफक के किसी रिश्तेदार का यही ब्लड ग्रुप था?
“सैफ!”
हाँ, सैफ का ब्लड ग्रुप ओ-नेगेटिव था!
वह भागकर रिसेप्शन पर आई। नर्स किसी से बात कर रही थी। उसने नर्स से फोन छीनकर सैफ को कॉल मिलाई।
“सैफ, प्लीज़, बहुत इमरजेंसी है! खून चाहिए!”
“क्या हुआ परी? अम्मी तो ठीक हैं?”
“एक ज़ख्मी को ओ-नेगेटिव खून चाहिए, बहुत जरूरी है!”
“तो अस्पताल से ले लो, भूकंप में तो काफी खून जमा हुआ था।”
“जो था, वह लग चुका है! अगर होता तो मैं तुमसे क्यों माँगती? तुम बस फौरन आ जाओ!”
“परीशे, मैं बहुत बिजी हूँ, नहीं आ सकता।”
“सैफ, खुदा के लिए, वह मर जाएगा!”
“यार, क्या दिक्कत है? मैं मीटिंग में हूँ। अच्छा, एक घंटे में आता हूँ!”
“एक घंटे तक नहीं, सैफ! उसके पास समय नहीं है!”
“तो मैंने कौन सा उसे ज़ख्मी किया है? मैं बिज़नेस में दो करोड़ का मुनाफा कमाने वाला हूँ, यह खोना नहीं चाहता! अब मुझे परेशान मत करो, बाय!”
सैफ ने फोन काट दिया।
परीशे सुन्न हो गई।
“दो करोड़ के लिए… सैफ अफक की जान नहीं बचा सकता?”
“दो करोड़… और अफक की ज़िंदगी?”
वह ऑपरेशन थियेटर की ओर दौड़ी, लेकिन उसे रास्ते में किसी ने रोक लिया।
“डॉ. परीशे, आपको ओ-नेगेटिव खून चाहिए था? मेरा ब्लड ग्रुप ओ-नेगेटिव है।”
वह एक 17-18 साल का लड़का था।
किसी ने जैसे परीशे के मृत शरीर में फिर से जान फूँक दी।
“मेरे साथ आओ!”
चौदहवीं चोटी – भाग 5
“मिल गया ब्लड, सर!”
परीशे लड़के को खींचकर ऑपरेशन थिएटर में ले आई। उसने लड़के को दूसरे बेड पर लिटाया और खून चढ़ाने की नलियाँ जोड़ दीं। एक-एक बूँद अफक के शरीर में दाखिल हो रही थी। वह बिना पलक झपकाए मशीन को देख रही थी, मानो डर रही हो कि कहीं खून की बोतल खत्म न हो जाए, कहीं यह दृश्य बदल न जाए।
“परीशे, रिलैक्स करें! आप कई घंटों से ड्यूटी पर हैं।”
डॉक्टर ने हरे मास्क के पीछे से कहा।
वह उन्हें कैसे बताती कि यह आदमी उसकी पूरी दुनिया था? एक वक्त था जब उसकी सिर्फ टांग घायल थी, और वह तब भी चार रातें चैन से नहीं सोई थी। अब भला कैसे जा सकती थी?
खून की हर बूँद अफक के शरीर में समा रही थी। ईसीजी मशीन पर दिल की धड़कनें तरछी रेखाओं में उभर रही थीं। परीशे का दिल डूब रहा था।
“नहीं देखा जा रहा मुझसे…”
वह ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकल आई। अब वहाँ फौजी भी नहीं थे, जाने कहाँ चले गए थे। उसने फर्श पर गिरा अपना दुपट्टा उठाया और काँपते हुए कंधे पर डाल लिया।
“अगर अफक को कुछ हो गया तो…? मैं क्या करूंगी? कहाँ जाऊँगी?”
उसने अपने हाथ उठाए, प्रार्थना करने लगी।
“खुदा, उसे बचा लो!”
लेकिन उसकी दुआ दम तोड़ गई। आँसू टप-टप गिरने लगे।
अभी कुछ देर पहले तक वह कितनी खुश थी, घर जाने वाली थी। कल तो उसे अफक से मंगला की पहाड़ियों में मिलना था। उसने मना किया था कि अस्पताल मत आना, फिर क्यों आ गया?
उसे पता भी नहीं चला कि कब वह फर्श पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी।
“ज़िन्दगी हमेशा मेरे साथ ऐसा ही क्यों करती है? मुझे खुशियाँ क्यों रास नहीं आतीं?”
तीन साल बाद जो खुशी उसे मिली थी, कल अफक उसका होने वाला था… फिर खुदा ने इतनी जल्दी वह खुशी क्यों छीन ली?
“इतना करीब आकर क्यों फिर से दूर जा रहा है?”
“मैं जरूर आऊँगा… याद है तुम्हारे आँसू राका पोशी में गिरे थे? मुझे वे लौटाने हैं…”
अफक ने यही कहा था, और वह सच में लौट आया था—सुबह से पहले।
“अब रोना मत, परी। आँखें साफ करो।”
उसकी कही हुई बात परीशे के कानों में गूँजी। उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे और उठ खड़ी हुई।
लड़का खून दे चुका था। उसने अपनी बाजू नीचे की और परीशे की ओर देखा। फिर वह कुछ कदम चलकर उसके पास आया।
परीशे ने उसे पहचान लिया।
“रो मत… वह ठीक हो जाएगा।”
वह बहुत हल्की आवाज़ में बोला, जैसे सिर्फ परीशे ही उसे सुन सके।
“क्या सच में वह ठीक हो जाएगा?”
“हाँ। और अब क्या मैं तुम्हें आपी (दीदी) कह सकता हूँ?”
वह मुस्कुराया। परीशे भी हल्की-सी मुस्कुराई और सिर हिला दिया।
“कभी-कभी हम किसी को कितना गलत समझते हैं…”
वह उसके पास से गुजरकर बाहर चला गया।
“सुनो!” परीशे ने उसे पुकारा।
वह मुड़ा, “जी?”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
वह फिर से भूल गई थी।
“मुअज़्ज़िब उमर।”
कहकर वह रुका नहीं, चला गया।
अफक के पास
परीशे फिर से अफक के पास आ गई। आसपास कितने ही लोग थे, लेकिन उसे कोई नज़र नहीं आ रहा था।
उसकी निगाहें बस अफक के चेहरे और बंद आँखों पर टिकी थीं।
वह उसके सिरहाने खड़ी थी।
उसका बायाँ हाथ अब भी सुरक्षित था। उसने उसे थाम लिया।
अफक के हाथ में वही घड़ी थी—लेकिन अब चकनाचूर।
“यह आँखें खोलता क्यों नहीं? कुछ कहता क्यों नहीं?”
“अफक, उठो! सोना नहीं है!”
“अगर सो गए तो फिर कभी नहीं उठ सकोगे!”
“मैंने मना किया था ना, फिर क्यों सो रहे हो?”
“कम से कम अपनी परी के लिए आँखें खोलो… देखो, मैं तुम्हारे कितने करीब हूँ…”
“तुमने कहा था कि अगर हम फिर कभी वाइट पैलेस गए तो नीली टाइलों वाले उस फव्वारे के पीछे छुपाया गया आधा बगोगोशा (फूल) खोजेंगे। अफक, उस हरे बगोगोशे को तो अब तक परिंदों ने नहीं खाया… वह सब हमारा इंतज़ार कर रहे हैं।”
“उठो ना, अफक! अपनी परी के लिए!”
“मुझे फिर से तीसरी मंज़िल की बालकनी पर अफक अर्सलान का गीत सुनना है…”
“वही गीत, जिसमें जामुनी पहाड़ों और अनातोलिया की गलियों का ज़िक्र है… जिसमें बिछड़ने और वादों की बात है…”
“मुझे वह गीत सुनना है, अफक! उठो!”
“अब मैं तुमसे कोई वादा, कोई कसम नहीं लूँगी…”
“अब मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने दूँगी…”
“तुम्हें उस प्यार का वास्ता, जिसका इज़हार तुमने कभी नहीं किया…”
“उठ जाओ, अफक!”
उसकी पलकों से आँसू टपककर अफक के हाथ पर गिर रहे थे।
अफक ऑक्सीजन मास्क में साँस ले रहा था, लेकिन आवाज़ नहीं थी।
ईसीजी मशीन पर दिल की धड़कनों की लकीरें अब भी ऊपर-नीचे हो रही थीं।
वह उन लकीरों को देख रही थी—वे उसे उन बेरहम पहाड़ों जैसी लग रही थीं, जो किसी माँ के बेटे को वापस नहीं लौटाते।
बहुत ज़ालिम और बहुत खूबसूरत थे कोह-हिमालय के पहाड़…
“तुमने किसी का क्या बिगाड़ा था? ये पहाड़ इतने निर्दयी क्यों हैं?”
बाहर बर्फ गिर रही थी।
वह दूर तक फैले पहाड़ों को देखती रही।
“अफक, उठो… खुदा के लिए, सो मत जाना! अगर सो गए, तो फिर कभी नहीं जाग पाओगे!”
“बस थोड़ी देर और, वो आते ही होंगे!”
“हमें एक और सफ़ेद रात नहीं गुज़ारनी पड़ेगी!”
अतीत और वर्तमान आपस में गडमड हो रहे थे।
ऊँचे पहाड़ों की तरह ये भी उस पर हंस रहे थे।
“अफक, उठो! यह उठता क्यों नहीं? यह बोलता क्यों नहीं?”
“कोई इसे उठाए! खुदा के लिए, कोई इसे उठाए!”
“मैंने इसके लिए कितनी रातें जागकर दुआ की थी!”
वह अफक के कंधे पकड़कर उसे झकझोरने लगी।
पीछे से किसी ने उसे रोकने की कोशिश की।
“ऐसे मत करो, परीशे!”
“डॉ. वासती, इसे उठाइए! यह क्यों नहीं उठ रहा?”
“अगर यह नहीं उठा, तो मेरा दिल फट जाएगा!”
वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
“यह नहीं मर सकता… यह कैसे मर सकता है?”
“मैंने इसके लिए अपने हिस्से का गर्म पानी दिया था… बर्फ में इसके लिए पैदल चली थी…”
“खुदा इतना ज़ालिम नहीं हो सकता!”
वह फर्श पर बैठकर घुटनों के बल रो रही थी, अफक का हाथ थामे हुए।
और अचानक…
ईसीजी मशीन पर हलचल हुई।
“ऐसा मत करो, परेशे! ऐसा मत करो, वह मर जाएगा!”
कोई उसे रोकने की कोशिश कर रहा था।
“यह नहीं मर सकता! यह कैसे मर सकता है? मैंने इसे अपने हिस्से का गर्म पानी दिया था, इसके लिए बर्फ में पैदल सफर किया था।”
“मैंने खुद ठंडी रातें काटी थीं, इसे गर्म कर के सुलाया था। तूफान में, बर्फ़बारी में, इसे अपने कंधे पर उठाकर लाया था, फिर भी आप कहते हैं कि यह मर जाएगा? अल्लाह इतना ज़ालिम नहीं हो सकता! इसने किसी का क्या बिगाड़ा था? यह नहीं मर सकता! मैंने इसे अपना खून दे दिया था, फिर भी क्यों मरेगा?”
वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गई और अफक का हाथ पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगी।
अस्पताल के कमरे में…
पहले जब वह अस्पताल में जागी थी, तो अकेली थी।
आज फिर ज़िंदगी उसे उसी मोड़ पर ले आई थी।
वह फिर से अस्पताल के कमरे में थी।
वह फिर से अकेली होने जा रही थी।
वह उसे छोड़कर जा रहा था।
बिस्तर पर लेटा शख्स मर रहा था और वह उसके लिए कुछ नहीं कर सकती थी।
रोते-रोते उसने सिर उठाकर देखा। बहुत से लोग अफक के इर्द-गिर्द खड़े थे। कोई उसे कमरे से बाहर जाने के लिए कह रहा था, लेकिन वह उसे छोड़कर नहीं जा सकती थी।
“अफक…! तुम्हें कुछ नहीं होगा… प्लीज़! आँखें खोलो… मुझे छोड़कर मत जाओ… मैं मर जाऊँगी!”
वह फिर से उसके सिरहाने खड़ी हो गई। अफक अभी भी आँखें बंद किए हुए था।
“डॉक्टर वस्ती… सर! यह बच जाएगा, न? इसे कुछ नहीं होगा, न?”
उसके आँसू उसके चेहरे को भिगो रहे थे। वह बिखरी-बिखरी सी रोते हुए डॉक्टर वस्ती से पूछ रही थी।
“शायद…”
किसी डॉक्टर ने कहा। वे निश्चिंत नहीं थे। वे आश्वस्त भी नहीं थे।
“अफक!”
वह उसके चेहरे के पास झुकी।
“अफक! आँखें खोलो, प्लीज़ अफक!”
वह उसे पुकार रही थी, लेकिन अफक की आँखें नहीं खुल रही थीं।
ईसीजी मशीन पर अभी भी सीधी लकीर नहीं आई थी।
“अफक…! तुम्हें तुम्हारे इश्क़ का वास्ता है, आँखें खोल दो…”
वह बहुत धीरे से बोली, शायद अपने दिल में ही। लेकिन उसे लगा, अफक ने सुन लिया।
बहुत धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें एक पल के लिए खोलीं।
वह आधे होश में था।
उसकी आँखों में कोई भाव, कोई अभिव्यक्ति नहीं थी।
फिर उसने आँखें बंद कर लीं।
“यह फिर से बेहोश क्यों हो गया?”
उसने घबराकर उसका चेहरा थपथपाया, लेकिन अफक में कोई हलचल नहीं हुई।
“यह… यह आँखें क्यों नहीं खोल रहा?”
“रिलैक्स, परेशे… अब वह खतरे से बाहर है।”
किसी ने कहा था।
वह बस उसकी बंद आँखों को डर भरी नज़रों से देखती रही।
“उसे उठाइए… उसे कहिए कि वह आँखें खोले!”
“परेशे! अब वह ठीक है। वह सो रहा है।”
डॉक्टर वस्ती ने उसके कंधे पकड़कर उसे अफक के पास से हटाने की कोशिश की।
“वह सो रहा है?”
उसने अविश्वास से दोहराया।
“वह… वह बच जाएगा, न?”
“हाँ, वह बच जाएगा। तुम बाहर जाकर बैठो।”
लेकिन वह फिर भी उसके सिरहाने खड़ी रही।
उसने अभी भी अफक का हाथ पकड़ा हुआ था।
वह उसे छोड़कर नहीं जा सकती थी।
बस, उसकी घबराई हुई नज़रें ईसीजी मशीन पर बनी लहरों को देखती रहीं। वे अब सही से चल रही थीं।
अब वे सीधी लकीर नहीं बनने वाली थीं।
एक सुकून सा उसकी रगों में उतरने लगा।
उसका अफक जिंदा था।
वह उसे छोड़कर कहीं नहीं गया था।
वह उसके क़रीब ही था।
वह उसका हाथ पकड़े वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल गिर गई।
पता नहीं वह कितनी देर तक अफक के सिरहाने रोती रही।
उसे वक़्त के गुज़रने का एहसास भी नहीं हुआ।
और तब उसने डॉक्टरों को देखा…
वे अफक का बायाँ पैर काट रहे थे।
“यह… क्या…?”
उसका सांस लेना मुश्किल हो गया।
अफक का बायाँ पैर बुरी तरह कुचल गया था।
और वे सब बड़े आराम से उसे काट रहे थे।
वह उनके हाथ रोकना चाहती थी।
उनसे भीख माँगना चाहती थी कि “ख़ुदा के लिए अफक का पैर मत काटो!”
अगर उसका पैर कट गया, तो वह घुड़सवारी कैसे करेगा?
पहाड़ों पर कैसे चढ़ेगा?
कोह-पहाड़ों को जीतने वालों को अपने क़दमों पर नाज़ होता है
और वे निर्दयी डॉक्टर अफक अर्सलान से उसके कदम छीन रहे थे।
“नहीं! ख़ुदा के लिए ऐसा मत करो!”
“वह अपना अधूरा वजूद देखकर मर जाएगा!”
वह उन्हें रोकना चाहती थी, मगर रोक नहीं सकी।
सूरज उगने लगा था…
चिड़ियों ने मधुर गाना शुरू कर दिया था।
वह लंबी, अंधेरी, भयानक रात अब ख़त्म हो चुकी थी।
एक लंबी यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर आ गई थी।
डॉक्टर काफ़ी देर पहले वहाँ से जा चुके थे।
अफक अब ठीक था।
अभी भी उसे ऑक्सीजन लगी थी, लेकिन अब कोई ख़तरा नहीं था।
वह उठकर उसके बिस्तर पर बैठ गई।
वह शांत था।
बिल्कुल बेखबर…
कि उसका पैर अब कट चुका है।
परेशे ने हल्की मुस्कान के साथ उसका चेहरा देखा।
फिर उसने बेख़याली में उसके माथे और हाथों को छुआ।
वह उसकी मौजूदगी का यकीन करना चाहती थी।
अब उसे यकीन हो गया था।
“मैं अब तुम्हें कभी हुमालया और काराकोरम के पहाड़ों में जाने नहीं दूँगी।
“मैं तुम्हारा इलाज दुनिया के सबसे बेहतरीन अस्पतालों में करवाऊँगी।
“एक दिन तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे। फिर हम तुर्की चले जाएँगे और एक नई ज़िंदगी शुरू करेंगे।”
“अब हम कभी इन निर्दयी पहाड़ों की तरफ़ नहीं आएँगे।”
“इन पहाड़ों ने हमसे अहमद, अरसा और खनिक को छीन लिया है।”
“अब हम यहाँ कभी नहीं आएँगे।”
“मुझे हुमालया की महान चोटियों की क़सम है, मैं तुम्हें दोबारा यहाँ लौटने नहीं दूँगी!”
उसने अफक की जैकेट की जेब से वह नीला और हरा दो-रंगा पत्थर निकाला, जिसके बीच एक लकीर थी।
उसने उदास होकर मुस्कराया।
उसे बहुत कुछ याद आ गया।
अब अफक कभी घुड़सवारी नहीं कर पाएगा।
अब वह कभी पहाड़ों की यात्रा नहीं कर पाएगा।
लेकिन फिर भी, वह खुश थी।
वह सुकून में थी।
उसकी ज़िंदगी का अंधेरा अध्याय अब खत्म हो चुका था।
अब उसे एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करनी थी।
उसने नरमी से अफक के माथे पर गिरे बाल हटाए।
काराकोरम की परी को आखिरकार उसका पर्वतारोही मिल ही गया था।
शुक्रवार, 30 जून 2006
सुंदरता से सजा हुआ कमरा मेहमानों से भरा था। यह हॉलनुमा कमरा राष्ट्रपति भवन में इसी प्रकार के आयोजनों के लिए इस्तेमाल होता था। इस समय भी वहाँ 8 अक्टूबर के भूकंप में उत्कृष्ट सेवाएँ देने वालों के लिए पुरस्कार वितरण की एक राष्ट्रपति समारोह आयोजित की गई थी।
सभी कुर्सियाँ अर्धवृत्ताकार रूप में लगाई गई थीं। सामने एक मंचनुमा स्थान था, जहाँ राष्ट्रपति खड़े थे। एक ओर डाइस रखा था, जिसके पीछे खड़ा प्रस्तोता बारी-बारी से माइक पर पुरस्कार प्राप्त करने वालों के नाम पुकार रहा था।
अर्धवृत्त में लगी कुर्सियों के दो स्टैंड थे। दाईं ओर का स्टैंड स्थानीय नागरिक और सैन्य अधिकारियों तथा आम लोगों से भरा था, जबकि बाईं ओर की कुर्सियों पर सभी विदेशी थे। इनमें संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, चीन, यूरोप और इस्लामी देशों से आए वे स्वयंसेवक शामिल थे, जिन्होंने कश्मीर के भूकंप प्रभावितों के लिए दिन-रात काम किया था।
बाईं ओर की कुर्सियों की दूसरी पंक्ति में बैठे सभी लोग, एक को छोड़कर, सुंदर नैन-नक्श वाले तुर्क थे, जो आज विशेष रूप से पाकिस्तान सरकार के निमंत्रण पर इस्लामाबाद आए थे।
इन्हीं में एक थी अरवा यलीम, सात साल की एक बेहद प्यारी बच्ची, जिसके गुलाबी गाल और शहद जैसे रंग के बाल थे। वह अपने माता-पिता और छोटी बहन के बीच उत्साहित और संतुष्ट बैठी थी। उसके और उसकी छोटी बहन के हाथ में एक-एक झंडी थी, जिसके एक ओर पाकिस्तान का हरा और दूसरी ओर तुर्की का लाल झंडा बना था। सिर पर स्कार्फ ओढ़े अरवा की माँ के हाथ में तीन सौ डॉलर का चेक था, जो कुछ देर पहले ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने उसे “जीवे पाकिस्तान” गाने के बाद व्यक्तिगत रूप से दिया था।
दूसरी पंक्ति में बैठे व्यक्तियों में ओरहन यकीन और उनकी पत्नी मिसेज़ यकीन थीं। मिसेज़ यकीन की गोद में एक सुंदर केस रखा था, जिसमें पाकिस्तान सरकार द्वारा जेनेक यकीन के लिए दिया गया सितारा-ए-इसार था। वह बार-बार अपनी आँखों में छलक आने वाले आँसू पोंछ रही थीं।
मिसेज़ यकीन के बाईं ओर सलमा दुरान बैठी थीं—सुनहरे रंग की, लंबी कद-काठी वाली, काले बालों को फ्रेंच नॉट में बांधे एक महिला। वह लगातार अपने होंठ चबा रही थीं और सामने राष्ट्रपति को देख रही थीं। उनकी बड़ी-बड़ी काली आँखों में नमी थी, जिसे वह बार-बार अपने भीतर समेट लेती थीं।
सलमा के पास उफुक अरसालान बैठा था—काले डिनर जैकेट, सफेद शर्ट और काली पैंट में, बिना किसी भाव के सामने देखते हुए। उसके बगल में परीशे थी, जो इस पंक्ति में अकेली गैर-तुर्क थी।
अफ्टरशॉक की उस दुर्घटना में उफुक का बायाँ पैर बुरी तरह कुचल गया था, जिसे डॉक्टरों को मजबूरन काटना पड़ा था। वह दो महीने इस्लामाबाद के अस्पताल में भर्ती रहा, फिर परीशे उसे इलाज के लिए अमेरिका ले गई। समस्या केवल कृत्रिम पैर लगाने की नहीं थी, बल्कि असली समस्या उसकी मानसिक स्थिति की थी, जो अहमद और जेनेक को खोने के बाद बुरी तरह बिगड़ गई थी। जब अस्पताल में उसे होश आया और परीशे ने उसे अहमद और जेनेक की मृत्यु की खबर दी, तब पहली बार परीशे ने इस लंबे आदमी को फूट-फूटकर रोते देखा था।
उसकी मानसिक स्थिति को सामान्य करने के लिए परीशे को बहुत मेहनत करनी पड़ी। वह दिन-रात उसके साथ रहकर उसे ज़िंदगी की ओर वापस लाई थी। फिर उन्होंने उसे आधुनिक तकनीक वाला कृत्रिम पैर लगवा दिया। शुरू में उसे चलने में बहुत दिक्कत होती थी, मगर बीते छह महीनों में वह इसका काफी अभ्यस्त हो गया था। उसकी चाल में हल्की सी लंगड़ाहट अब भी थी, लेकिन समय के साथ वह भी कम होती जा रही थी। आज नहीं तो सालभर बाद ही सही, परीशे को यकीन था कि वह पहले की तरह सामान्य रूप से चलने लगेगा। हाँ, उसे यह एहसास था कि वे दोनों अब कभी काराकोरम नहीं जाएँगे।
पाँच महीने पहले, जब वह परीशे से शादी कर उसे अपने साथ तुर्की ले गया था, तब उन्होंने एक वादा किया था—और यह वादा खुद उफुक ने लिया था।
“परी! हम आज एक नई जिंदगी शुरू करने जा रहे हैं। आज के बाद हम कभी काराकोरम वापस नहीं जाएँगे। मुझे अब उन पहाड़ों को कभी नहीं देखना, जिन्होंने मुझसे मेरे सबसे अच्छे दोस्त छीन लिए।”
और फिर, परीशे ने उफुक अरसालान के साथ तुर्की में एक नई ज़िंदगी की नींव रखी थी। अब वह सिर्फ एक भूवैज्ञानिक इंजीनियर था, जो दुनिया के अन्य सामान्य लोगों की तरह नौ से पाँच की नौकरी करता था। पहाड़ों से वे दोनों इतने भयभीत थे कि उन्होंने माउंट अरारात तक देखने की भी हिम्मत नहीं की।
यह शायद पहली बार था जब उफुक ने घूमने और पर्वतारोहण को छोड़कर लगातार पाँच महीने कार्यालय में काम किया था, और अपनी ज़िंदगी को केवल अंकारा की गलियों तक सीमित कर दिया था। अब वे पर्वतारोही नहीं, बल्कि एक डॉक्टर और एक इंजीनियर बनकर इस सीमित जीवन में भी खुश थे। उन्हें अब किसी और चीज़ की तमन्ना नहीं थी। उफुक की गहरी मोहब्बत परीशे के लिए काफी थी।
हाँ, बस पिछले पाँच महीनों में, एक बेचैनी, एक अधूरापन उसके वजूद में झलकता था। कहीं कोई प्यास बाकी थी। वह बहुत सोचती थी, लेकिन ऊपर से सब कुछ ठीक था।
सैफ और उसकी फुप्पो ने शुरुआत में बहुत हंगामा किया था, लेकिन परीशे ने सैफ द्वारा खून न देने वाली बात को मुद्दा बनाकर सगाई तोड़ दी थी। लोगों ने बहुत बातें बनाईं, लेकिन उसे कोई परवाह नहीं थी। वह पापा की सारी संपत्ति की देखरेख का जिम्मा मामू को सौंपकर तुर्की चली आई थी।
अब तो सब कुछ ठीक ही था। निशा की शादी हो चुकी थी, हसीब और उसका दोस्त उच्च शिक्षा के लिए लंदन जा चुके थे। हाँ, सब कुछ ठीक ही था… फिर भी उसे लगता था कि कहीं कुछ अधूरा है।
अपनी सोचों को झटककर, उसने पास बैठे उफुक के बाएँ जूते पर नज़र डाली। असली सच्चाई से अनजान कोई भी व्यक्ति उसका जूता देखकर सोच भी नहीं सकता था कि अंदर का पैर नकली है।
परीशे ने जूते से अपनी नज़र हटाई और उफुक के शांत चेहरे को देखा…
वह अभी भी सामने देख रहा था। वह उसकी शहद रंग आँखों में झिलमिलाती पुरानी यादों को देख सकती थी। वे सुनहरे पुराने दिन, जब वे तीनों अंकारा की गलियों में बारिश में भीगते थे। जब तीनों कक्षा की परीक्षा में नकल करते पकड़े जाते और टीचर अहमद की मासूम सूरत और भोलापन देखकर उसे छोड़ देतीं, लेकिन अफक और जेनिक को सज़ा मिलती। बाद में वे उससे खूब लड़ते… और वह दिन जब अफक और जेनिक ने अपनी पोल खोलने पर अहमद को बर्फीले पानी से भरे तालाब में धकेल दिया था। वह ठंडे पानी में हाथ-पैर मारते हुए चीख रहा था, उन्हें गालियाँ दे रहा था और वे दोनों खड़े होकर हँस रहे थे। और फिर हँसते-हँसते अफक ने जेनिक को भी अंदर धक्का दे दिया था। अब वे दोनों तालाब के अंदर थे और वह बाहर अकेला खड़ा हँस रहा था।
आज फिर वह अकेला था।
अहमद नहीं था।
जेनिक नहीं था।
ज़िंदगी के हर सफर में वे दोनों हमेशा साथ थे। यह पहली बार था जब जेनिक उसे छोड़कर चला गया था।
रोस्ट्रम पर खड़ा कमेंटेटर अहमद दुरान की विधवा को बुला रहा था।
सलमा बहुत धीमे से उठी और छोटे-छोटे कदमों से चलती हुई दो फीट ऊँचे मंच पर खड़े राष्ट्रपति तक पहुँची और अहमद का “सितारा-ए-इसार बाद-ए-शहादत” स्वीकार किया। फिर आँखें रगड़ती हुई, मुश्किल से खुद को संभालती हुई वापस आई।
फिर अफक हुसैन अर्सलान का नाम पुकारा गया।
वह अपनी सीट से उठा और धीरे-धीरे चलते हुए स्टेज तक आया। काले सूट में वह बहुत अच्छा लग रहा था। उसने राष्ट्रपति से हाथ मिलाया। राष्ट्रपति ने उसकी प्रशंसा करते हुए उसके पैर की ओर इशारा किया। अफक ने सिर झुकाकर अपने बाएँ पैर को देखा। हॉल में मौजूद सभी लोगों की निगाहें उसके कदमों पर टिक गईं।
अफक ने अपना बायाँ पैर हल्का-सा ऊपर उठाया, फिर उसे वापस ज़मीन पर रखते हुए कंधे उचकाए, जैसे कह रहा हो, “मैं क्या कर सकता हूँ?” उसके चेहरे पर बेहद उदास मुस्कान थी।
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। राष्ट्रपति अफक के कोट पर “सितारा-ए-इसार” लगा रहे थे और सभी दर्शक अपनी सीटों से खड़े होकर एक बहादुर तुर्क के लिए तालियाँ बजा रहे थे। तालियाँ बजाने वालों में परीशे जहांज़ैब भी थी, जो आँखों में नमी लिए बहुत गर्व से अफक को देख रही थी।
“हम मुज़फ़्फराबाद जा रहे हैं।”
दोपहर के समय, जब वे मरी की उस घुमावदार सड़क पर आगे-पीछे चलते हुए अपने गेस्ट हाउस की ओर जा रहे थे, जहाँ वे सरकारी मेहमान के रूप में ठहरे थे, अर्वा ने अपनी भाषा में सलमा को बताया और आगे दौड़ गई।
गेस्ट हाउस पहाड़ की चोटी पर था। वहाँ तक जाती सड़क धीरे-धीरे ऊँचाई पर बढ़ती जाती, यहाँ तक कि गेस्ट हाउस की खूबसूरत इमारत तक पहुँच जाती। परीशे को सलमा के साथ इस ऊबड़-खाबड़ सड़क पर चलते हुए अनायास ही मरी की वह सड़क याद आ गई, जो इससे बहुत मिलती-जुलती थी।
“मैं आ रही हूँ।”
सलमा ने दौड़ती हुई अर्वा को ऊँची आवाज़ में कहा। अर्वा अब दौड़ते हुए अफक से भी आगे निकल चुकी थी, जो उनसे काफी ऊपर चढ़ाई पर सिर झुकाए, जेबों में हाथ डाले चढ़ रहा था।
“तुम मुज़फ़्फराबाद जा रही हो?”
दोनों चुपचाप छोटे-छोटे कदमों से ऊपर चढ़ रही थीं, जब परीशे ने उदासी से पूछा। यह बारिश से ठीक पहले का मौसम था, जो उसे हमेशा उदास कर देता था।
सलमा ने गहरी साँस लेते हुए सिर हिलाया।
“मिस्टर और मिसेज़ ओरहन यकीन और अर्वा का परिवार, एक तुर्क अनुवादक और तुर्क राजदूत के साथ मुज़फ़्फराबाद जा रहे हैं। तुम्हारे सरकारी टीवी की टीम भी उनके साथ होगी, वे ‘सितारा-ए-इसार’ पाने वाले तुर्क नागरिकों पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं, जो शायद आज तुम्हारे सरकारी चैनल पर प्रसारित होगी।”
वे दोनों सड़क के किनारे सफेद पत्थरों की बाड़ के साथ चल रही थीं। अफक उनसे काफी आगे, सड़क के सबसे ऊँचे स्थान पर खड़ा हो गया था। जेबों में हाथ डाले, उसने सिर उठाकर ऊपर काले बादलों से ढके आकाश को देखा।
“लगता है बारिश होने वाली है।”
उसके शब्द होंठों पर ही थे कि बादल बरसने लगे।
सलमा ने हाथ में पकड़ी गुलाबी छतरी खोल ली। परीशे भीगने से बचने के लिए छतरी के नीचे आ गई।
“क्या तुम मुज़फ़्फराबाद आओगी?”
दोनों तेज़ होती बौछारों में भी ऊपर चढ़ रही थीं।
“नहीं।”
“क्यों?”
सलमा अचानक बीच सड़क पर रुककर उसे देखने लगी। छतरी उसने पकड़ रखी थी। परीशे बारिश के कारण उसके और करीब खिसक आई।
“मैं पहाड़ों में वापस नहीं जाना चाहती।”
“और… अफक?”
सलमा ने कहते हुए गर्दन घुमाकर सड़क की ऊँचाई पर देखा, जहाँ वह अब भी खड़ा बारिश में भीग रहा था।
“वह भी वापस नहीं जाना चाहता।”
सलमा ने समझने वाले अंदाज़ में सिर हिलाया।
“तुम सही कह रही हो। हम अपनी ज़िंदगियों में बहुत बड़े नुकसान से गुज़र चुके हैं।”
फिर उसने अधीरता से अपने होंठ दबाए।
“जानती हो परी! यह सब मुज़फ़्फराबाद क्यों जा रहे हैं? वे नीलम स्टेडियम में आर्मी कैंप का आखिरी तंबू देखना चाहते हैं, जहाँ अहमद और जेनिक ने अपनी आखिरी रात गुजारी थी। मगर मैं… मैं मुज़फ़्फराबाद की हवाओं और नीलम के पानी से पूछना चाहती हूँ कि हमसे बिछड़ने से पहले वे कैसे दिखते थे? मैं उस बच्ची की कब्र देखना चाहती हूँ, जिसकी लाश निकालते हुए अहमद खुद लाश बन गया। मैं उस तंबू की मिट्टी पर घुटनों के बल बैठकर रोना चाहती हूँ, मुझे उस लाल मिट्टी और नीलम के पानी में अपने आँसू बहाने हैं।”
क्या पर्वतारोहण छोड़ा जा सकता है?
बारिश लगातार बरस रही थी।
छतरी अभी भी उनके सिरों पर तनी हुई थी, लेकिन सलमा का चेहरा पूरी तरह भीग चुका था। आँसुओं और बारिश की बूंदों में फर्क करना मुश्किल हो गया था।
उसने भर्राई आवाज़ में कहा—
“अफ़ाक, जेनिक और अहमद को जानने वाला हर इंसान यही कहता था कि अहमद सिर्फ़ दिखने में मासूम था, असल में बहुत शरारती था। लेकिन मैंने उसके साथ आठ साल बिताए हैं… मैं जानती हूँ, वह भीतर से भी बिल्कुल बच्चे जैसा था।”
इतना कहते ही उसकी आवाज़ टूट गई।
वह दोनों हाथों में चेहरा छिपाकर रो पड़ी।
परीशे ने आगे बढ़कर उसके हाथ से फिसलती छतरी संभाल ली।
कुछ देर बाद सलमा ने अपने आँसू पोंछे और धीमे स्वर में बोली—
“अब मुझे जाना चाहिए।”
फिर उसने दूर फैले बादलों की ओर देखा।
“आज मैं आख़िरी बार हिमालय के आसमान के नीचे रोना चाहती हूँ… उन सब लोगों के लिए जो पहाड़ों से लौटकर कभी वापस नहीं आए।”
उसकी आँखें फिर भर आईं।
“अहमद दुर्रानी के लिए…
अर्सा बुख़ारी के लिए…
जेनिक याकिन के लिए…”
वह कुछ क्षण चुप रही, फिर फीकी मुस्कान के साथ बोली—
“आज आख़िरी बार रो लेते हैं… फिर अपने अतीत को यहीं छोड़ देंगे।”
“मैं कोशिश करूँगी…” उसने धीमे से कहा।
फिर उसकी नज़र दूर खड़े अफ़ाक पर चली गई, जो बारिश में भीगता हुआ चुपचाप पहाड़ियों की ओर देख रहा था।
बारिश के बीच
“अफ़ाक!” सलमा ने पुकारा।
अफ़ाक ने मुड़कर देखा और धीरे-धीरे ढलान से नीचे उतर आया।
उसका कोट पूरी तरह भीग चुका था और बाल माथे से चिपक गए थे।
सलमा ने हल्की नाराज़गी से कहा—
“बारिश में क्यों खड़े हो? आओ, छतरी के नीचे।”
अफ़ाक बस मुस्कुरा दिया।
कुछ देर बाद सलमा विदा लेकर ऊपर सड़क की ओर बढ़ गई।
परीशे और अफ़ाक वहीं खड़े उसे जाते देखते रहे।
जब वह आँखों से ओझल हो गई, तो कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।
फिर परीशे मुस्कुराई।
“अब तुम अपने यात्रा-वृत्तांत में लिख सकते हो कि जब तुम इस्लामी दुनिया के एक प्रभावशाली देश पहुँचे थे, तब वहाँ के ‘बादशाह’ ने तुम्हारी खूब खातिरदारी की थी।”
अफ़ाक हँस पड़ा।
फिर उसकी नज़र दूर फैली पहाड़ियों पर टिक गई।
पहाड़ कभी बूढ़े नहीं होते
उन पहाड़ियों के पार कहीं बहुत दूर हिमालय, हिंदूकुश और काराकोरम की चोटियाँ थीं।
वे यहाँ से दिखाई नहीं देती थीं, लेकिन दोनों उन्हें महसूस कर सकते थे।
वहीं कहीं घास के मैदान होंगे, जहाँ कभी उनके कदम पड़े थे।
वहीं कहीं बर्फ़ से ढकी चोटियाँ होंगी, जिन्होंने उनकी हँसी, आँसू, हार और जीत सब कुछ देखा था।
और उन्हीं पहाड़ों के बीच एक नाम आज भी वैसा ही खड़ा था—
राकापोशी।
लोग उसे कई नामों से जानते थे—
- चमकती दीवार
- धुंध की माँ
- पहाड़ों की रानी
- काराकोरम का ताज
वह आज भी उसी शान से खड़ा था, जैसे सदियों से खड़ा था।
एक अधूरा सपना
परीशे ने अफ़ाक की तरफ देखा।
वह गहरी सोच में डूबा हुआ था।
“क्या सोच रहे हो?” उसने पूछा।
अफ़ाक हल्का-सा मुस्कुराया।
“काफी समय से मुझे लगता था कि मेरी ज़िंदगी में कुछ अधूरा है।”
“और आज पता चल गया?”
“हाँ।”
“क्या?”
अफ़ाक ने गहरी साँस ली।
बारिश अब भी उनके कंधों पर गिर रही थी।
“तुम अभी सलमा से कह रही थीं कि अब हम कभी पहाड़ों पर नहीं जाएँगे…”
वह कुछ पल रुका।
परीशे को पहले ही अंदाज़ा हो गया था कि आगे क्या आने वाला है।
अफ़ाक की आँखों में वही पुरानी चमक लौट आई थी।
“याद है मैंने तुम्हें उन सुनहरी परियों की कहानी सुनाई थी जो ऊँची चोटियों पर उतरती हैं?”
परीशे मुस्कुरा दी।
“हाँ, याद है।”
“शायद तुमने कभी उस कहानी पर विश्वास नहीं किया… लेकिन मैंने उन्हें देखा है।”
वह क्षितिज की ओर देखने लगा।
“और मैं चाहता हूँ कि एक दिन तुम भी उन्हें देखो।”
परीशे चुप रही।
अफ़ाक ने धीरे से कहा—
“मैं फिर से एवरेस्ट जाना चाहता हूँ।”
बारिश और तेज़ हो गई।
“मुझे नहीं पता इस बार लौट पाऊँगा या नहीं… लेकिन दिल फिर वहीं जाने को कह रहा है।”
अंत नहीं, शुरुआत
हवा का तेज़ झोंका आया और छतरी उनके हाथों से उड़ गई।
लेकिन दोनों ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
वे भीगते हुए वहीं खड़े रहे।
परीशे ने उसकी आँखों में झाँका।
“लेकिन हमने वादा किया था कि अब पहाड़ों से दूर रहेंगे। सामान्य लोगों की तरह जीवन बिताएँगे।”
अफ़ाक हँसा।
उसने भीगे बाल पीछे किए और उसके दोनों कंधों पर हाथ रख दिए।
फिर बहुत धीरे से बोला—
“प्री… पर्वतारोहण कोई आदत नहीं है जिसे छोड़ा जा सके।”
वह कुछ पल रुका।
बारिश की बूंदें उनके बीच गिरती रहीं।
फिर उसने मुस्कुराकर कहा—
“यह तो दिल में बस जाने वाला जुनून है। और कुछ जुनून इंसान नहीं छोड़ता… वे उम्र भर उसका साथ नहीं छोड़ते।”
