आठवीं चोटी
शुक्रवार, 11 अगस्त 2005
उसने मेस टेंट की मेज़ पर रखे कई पावर बार्स और एनर्जी बार्स उठाकर अपने रक्सैक में रख लिए और जूतों के नीचे क्रैम्पॉन्स कसकर बाहर निकल आई। बाहर अर्सा, फ़रीद और अफ़क अपने भारी बैकपैक कंधों पर डाले, बूट्स, ग्लासेज़ और ऊनी टोपियाँ पहने तैयार खड़े थे।
योजना के मुताबिक उन्हें पोर्टर्स के साथ कैम्प फ़ोर तक जाना था, मगर सुबह सूरज निकलते वक्त शेर ख़ान ने बिना ग्लासेज़ लगाए राकापोशी की चमक देख ली थी और अब सन ब्लाइंड होकर अपने घर में पड़ा था। उनके पास इतना अतिरिक्त ईंधन और सामान नहीं था कि एक दिन भी रुक सकें। फ़रीद ख़ान साथ जाने को तैयार था। वह हंज़ा का रहने वाला था और हंज़ा के पोर्टर्स बलती पोर्टर्स से अलग मिज़ाज रखते थे। बलतोरो के बलती पोर्टर्स को विदेशी पर्वतारोहियों, खासकर यूरोपियनों से कहीं अधिक अनुभव हासिल था। अफ़क उन्हें अक्सर “कराकोरम का शेरपा वर्ज़न” कहा करता था।
पोर्टर्स को गिलहरी जैसी चढ़ाई में अपनी जान तक दाँव पर लगानी पड़ती थी, इसलिए वे मजबूरी में पर्वतारोहियों का साथ देते थे। कुछ लोग पहाड़ों पर रोज़ी कमाने आते हैं और कुछ लोग अपनी रूह की तसल्ली के लिए।
जब उन चारों ने बेस कैम्प को अलविदा कहा तो अफ़क ने अहमद को गले लगाया। फिर उसके कंधों पर हाथ रखकर अपनी भाषा में किसी ज़िम्मेदार इंसान की तरह लगातार कुछ समझाता रहा। अहमद पहले भी कई बार उनके साथ पर्वतों पर आ चुका था। अफ़क का अंदाज़ किसी अनुभवी नेता जैसा था और अहमद हर बात पर मासूमियत से सिर हिलाता जा रहा था।
फिर अहमद नीचे उतर गया। अफ़क बहुत देर तक उसे जाता हुआ देखता रहा, यहाँ तक कि वह निगाहों से ओझल नहीं हो गया। प्रीशे उसके साथ खड़ी थी। जब अहमद पूरी तरह ग़ायब हो गया तो अफ़क ने एक आख़िरी नज़र दूर दिखाई देते बेस कैम्प पर डाली।
“मेरी बस यही दुआ है कि हम सब इन टेंट्स को दोबारा देखने के लिए ज़िंदा रहें।” उसने धीमे स्वर में कहा।
प्रीशे ने डर से ऊपर “ब्रो” के ग्लेशियर की तरफ़ देखा और मन ही मन दुआ की कि काश ब्रो को यह एहसास न हो कि कुछ लोग उसकी बर्फ़ीली सल्तनत में दबे पाँव दाख़िल हो रहे हैं। काश वह सोता रहे… कभी न जागे… ताकि वे उसके तख़्त तक पहुँचकर सही-सलामत लौट सकें।
उसकी डरी हुई शक्ल देखकर अफ़क मुस्करा पड़ा।
“फिक्र मत करो। अगर हमने राकापोशी सर कर ली, तो पूरा गाँव हमारे सम्मान में दावत देगा।”
प्रीशे ने नीचे बर्फ़ में धँसे अपने नुकीले क्रैम्पॉन्स को देखा और हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया। उसका डर कुछ कम हुआ।
“हाँ, मैंने देखा था। दावत का नाम सुनते ही तुम्हारी आँखें कितनी चमक उठी थीं।”
“मेरी आँखों के बारे में कुछ मत कहो। तुर्की की लड़कियाँ इन आँखों पर मरती हैं।”
“तुम्हारा टेस्ट वाकई बहुत खराब है। मुझे उन लड़कियों पर तरस आता है।”
“अच्छा अभी लड़ना बंद करो, सफर बहुत लंबा है।”
अफ़क ने भारी दस्ताने वाला हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया। प्रीशे ने उसका हाथ थाम लिया। अचानक उसे अपने भीतर एक अजीब सा भरोसा महसूस हुआ। जैसे अगर वह फिसलेगी भी, तो कोई उसे संभालने वाला मौजूद है।
वहाँ की बर्फ़ गंदी और बेहद नरम थी। सूरज ज़रा देर तेज़ हो जाए तो बर्फ़ पिघलने लगती थी। राकापोशी पर चढ़ाई के लिए जुलाई सबसे सही महीना माना जाता था, लेकिन वे एक महीना देर से आए थे। अगस्त तक बर्फ़ की हालत बिगड़ चुकी थी।
इसी बर्फ़ीले मैदान के बीच कैम्प वन बना हुआ था, जहाँ तीन टेंट लगे थे। दोपहर तक वे वहीं पहुँच गए। पहली रात उन्होंने उसी कैम्प में बिताई।
अगले दिन अफ़क, फ़रीद और अर्सा कैम्प टू तक रस्सियाँ लगाने निकल गए। अफ़क का इरादा ऊपर लगभग बारह सौ मीटर तक रास्ता तय करने का था और साथ ही कैम्प टू के लिए कोई सुरक्षित जगह तलाशनी थी। वे सेमी-अल्पाइन स्टाइल में चढ़ाई कर रहे थे, यानी कुछ हिस्सों में रस्सियाँ लगानी थीं और कुछ जगह बिना रस्सियों के आगे बढ़ना था।
प्रीशे उस दिन टेंट में ही रुकी रही। उसकी ऐल्टीट्यूड सिकनेस अब कम हो रही थी और बहुत तेज़ी से ऊपर जाने पर तबीयत दोबारा बिगड़ सकती थी। इसलिए अपनी ऐक्लिमेटाइज़ेशन को बेहतर बनाने के लिए उसने वहीं रुककर सबके लिए खाना बनाने की ज़िम्मेदारी ले ली।
कुछ दूर तक वह उनके साथ गई। अर्सा के कंधे पर रस्सियों का भारी गुच्छा था और हाथों में आईस स्क्रूज़ और पिटॉन्स थे। अफ़क ने ज़मीन पर बैठकर एक पिटॉन बर्फ़ में ठोंका और फिर रस्सी उससे बाँध दी। यह सब देखना उसे खासा उबाऊ लगा, इसलिए वह वापस टेंट में लौट आई और खाना बनाने लगी।
प्रीशे को अपनी कुकिंग पर बेहद नाज़ था। उसके हाथों में स्वाद था, इसलिए उसने अपने साथ लाई हुई चीज़ों से प्यार से सिंधी बिरयानी तैयार की। शाम तक खाना बनकर तैयार हो चुका था। अगले कई दिनों तक उन्हें “Add Some Hot Water” वाले यूरोपियन पैकेट फूड पर गुज़ारा करना था, इसलिए उसने सोचा कि आज कम-से-कम अफ़क को घर जैसा स्वाद मिल जाए।
खाना तैयार करने के बाद वह टेंट से बाहर निकल आई। चारों तरफ़ जमी सख्त बर्फ़ पर पाउडर स्नो की परत बिछी हुई थी। कई दिनों से नई बर्फ़ नहीं गिरी थी, इसलिए सफेदी अब हल्की पीली पड़ने लगी थी।
वह टेंट से दूर एक बड़े ग्रेनाइट पत्थर पर जाकर बैठ गई और उस शानदार मौसम का आनंद लेने लगी। उस समय राकापोशी पर शाम उतर रही थी। चारों ओर मीठी ठंडी छाँव फैली हुई थी। वह पहाड़ की तरफ़ पीठ किए, घुटनों पर ठुड्डी टिकाए, चुपचाप ढलती शाम के जादू में खोती चली गई।
टेंट्स के बाहर उस सुनसान बर्फ़ीले मैदान में इतनी गहरी खामोशी थी कि अगर सुई भी गिरती तो उसकी आवाज़ गूंज उठती। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ चारों ओर फैले विशाल काले पहाड़ थे, जो बिना कुछ कहे उसे देख रहे थे।
उस पल ऐसा लगता था जैसे पूरी दमानि सिर्फ़ उसी की हो। जैसे पापा, फूफू, सैफ, निशा—सब किसी दूसरी दुनिया में रहते हों। एक ऐसी दुनिया जहाँ ऊँची इमारतें थीं, ट्रैफिक का शोर था और संगीत की तेज़ आवाज़ें थीं।
और यह दुनिया बिल्कुल अलग थी। यहाँ रातें और सुबहें भी दूसरी दुनिया से अलग वक़्त पर आती थीं। जब शहरों में लोग सो रहे होते, तब यहाँ अंधेरे में पर्वतारोही अपने आइस ऐक्स बर्फ़ में गाड़ते हुए आठ किलोमीटर लंबी चढ़ाई शुरू कर देते, सिर्फ़ इसलिए कि उनकी आत्माएँ उन ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए बेचैन होती थीं।
शहरों में लोग वही आठ किलोमीटर कार से आठ मिनट में तय कर लेते थे। मगर पहाड़ों में वही सफर महीनों मांगता था।
इंसान की फितरत ही ऐसी है—और शायद यही बेचैन जिज्ञासा उसे उन आठ किलोमीटर की दूरी तय करने पर मजबूर करती है, जिन्हें पार करने के लिए कभी-कभी पूरी ज़िंदगी लग जाती है।
वह उसी तरह पत्थर पर बैठी लंबे समय तक सोचती रही। क्या वह सचमुच सैफ जैसे इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ार सकती थी? उसे अब सैफ किसी इंसान से ज़्यादा एक चलते-फिरते स्टॉक एक्सचेंज जैसा लगने लगा था—जिसके सीने में दिल नहीं, एक कैलकुलेटर धड़कता हो।
बगावत उसकी फितरत में कभी शामिल नहीं रही थी, मगर अब उसने तय कर लिया था कि कम-से-कम एक बार वह पापा के सामने सैफ से जुड़ी अपनी सारी शंकाएँ ज़रूर रखेगी। वह चाहती थी कि पापा अफ़क से मिलें, उसकी बातों और व्यक्तित्व को समझें, ताकि रिश्तेदारियों की अंधी मोहब्बत उनकी आँखों पर बंधी पट्टी को कुछ तो हटा सके।
वह बदल रही थी।
पहाड़ उसे भीतर से बदल रहे थे।
वह मरना नहीं चाहती थी, इसलिए उसने मन ही मन सैफ से अपनी सगाई तोड़ने का निर्णय ले लिया था। उसकी ज़िंदगी में जितनी उलझी हुई गिरहें थीं, वह अब धीरे-धीरे उनके सिरे तलाशकर उन्हें सुलझाने लगी थी।
और अफ़क…
जिसके बारे में पहले उसके मन में अनगिनत शंकाएँ थीं, अब उन्हीं शंकाओं की जगह एक हल्का-सा भरोसा जन्म लेने लगा था। पूरी तरह नहीं, मगर इतना जरूर कि उसका दिल अब अफ़क की बातों पर यकीन करने लगा था।
पीटर एंसर खेलते हुए अफ़क ने हँसते-हँसते कबूल किया था—
“मोहब्बत? वह तो इश्क़ करता है।”
और फिर थोड़ी झुंझलाहट, थोड़ी शर्म और थोड़े अपनापे के साथ कहा था—
“हाँ, लगती हो ना!”
वह छोटा-सा वाक्य अब भी उसके दिल पर किसी हल्की बारिश की तरह गिर रहा था। उसमें कितना अपनापन था, कितना मान, कितनी मोहब्बत… और साथ ही एक बेचैन कर देने वाली कमी भी।
वह सीधे-सीधे अपने जज़्बात का इज़हार क्यों नहीं करता था?
वह उन तीन शब्दों को खुलकर क्यों नहीं कह सकता था?
शायद उसने कभी हनादे से कहे हों…
शायद उनकी शादी मोहब्बत की रही हो…
या शायद नहीं।
मगर यह सब वह अफ़क से पूछ भी तो नहीं सकती थी।
अचानक उसके मन में एक ख़याल कौंधा। उसने तुरंत अपनी जैकेट की जेब से ट्रांसीवर निकाला।
उसका सिस्टम बेहद आसान था—सिर्फ़ दो बटन। उसने ट्रांसमिट बटन दबाया। कुछ सेकंड बाद दूसरी तरफ़ से अहमद की आवाज़ सुनाई दी।
“गुड आफ्टरनून, बेस कैंप डॉक्टर! कैसी हो?”
उसकी आवाज़ में साफ़ खुशी थी।
“कैम्प वन के बाहर बर्फ़ पर बैठी हूँ। बाकी सब लोग रूट फिक्स करने गए हैं। मैंने चावल बनाए हैं। तुम बताओ, बेस कैंप कैसा है?”
“तुम्हें मिस कर रहा हूँ और बहुत बोर हो रहा हूँ। शफाली को छोड़कर सारे ट्रैकर्स और पोर्टर्स जा चुके हैं। अच्छा हुआ तुमने कॉल कर लिया। वैसे तुम्हारी ईमेल्स आई हुई हैं। तुमने अपना ईमेल और पासवर्ड मेरे पोर्टेबल पर सेव कर दिया था… लेकिन कसम से, मैंने कोई मेल नहीं खोली।”
परी हँस पड़ी।
“वाह! खोल लो और मेरी तरफ़ से जवाब भी दे दो।”
फिर वह उसे एक-एक करके ईमेल्स का जवाब लिखवाने लगी। कुछ देर बाद वह थोड़ा झिझकते हुए बोली—
“अहमद… एक बात पूछूँ?”
“हाँ पूछो डॉक्टर, क्या फिर से तबीयत खराब हो रही है?”
“उफ़! ज़रूरी तो नहीं कि मैं तुमसे सिर्फ मेडिकल की बातें करूँ।”
वह कुछ पल रुकी, फिर धीमे स्वर में बोली—
“तुम्हें हनादे याद है?”
दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
“कौन हनादे?”
परी चौंक गई।
उसे हैरत हुई कि अफ़क जिस लड़की को अपनी बीवी कह चुका था, उसका सबसे करीबी दोस्त ही उससे अनजान था।
“अफ़क की बीवी… हनादे?”
अहमद अचानक हँस पड़ा।
“ओह! मैं समझा तुम ‘हव्वा’ की बात कर रही हो। हज़रत हव्वा… जिन्हें इंग्लिश में ईव कहते हैं और तुर्की में हनादे।”
परी का मन किया अपना नहीं, अहमद का सिर पकड़ ले।
“हाँ वही… तुम्हें याद है? कैसी थी वो?”
अहमद ने बिना सोचे जवाब दिया—
“बहुत खूबसूरत थी।”
“और…?”
“तुम अचानक यह सब क्यों पूछ रही हो?”
परी एक पल को झेंप गई। अहमद उतना भोला भी नहीं था, जितना वह समझती थी।
“बस ऐसे ही… अफ़क उसे याद करके उदास हो जाता है ना?”
अहमद की आवाज़ में हैरानी उतर आई।
“तुमसे यह किसने कहा?”
“अफ़क ने।”
अहमद हल्का-सा हँसा।
“वो मज़ाक कर रहा होगा। उसने तो उससे शादी भी नहीं करनी चाही थी।”
परी का दिल जैसे एक पल को थम गया।
“क्यों?” उसने तुरंत पूछा।
“क्योंकि उसे किसी और से मोहब्बत थी।”
उसका दिल डूबा… फिर अचानक जैसे दोबारा धड़क उठा।
“किससे?”
अहमद कुछ सेकंड चुप रहा, फिर हँसते हुए बोला—
“क्या सच में कराकोरम और हिमालय के पहाड़ों पर परियाँ उतरती हैं?”
परी ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“अफ़क को कई सालों से उन परियों की तलाश थी। वह हर साल पाकिस्तान आकर नंगा पर्वत के रोपल फेस का ट्रैक जरूर करता था। उसने सुन रखा था कि वहाँ रातों में परियाँ उतरती हैं, जो सियाहों के पास बैठकर गीत गाती हैं।”
परी ने मुश्किल से खुद को “स्टुपिड” कहने से रोका।
“के2 नहीं… नंगा पर्वत का रोपल फेस।”
“हाँ वही,” अहमद तुरंत बोला,
“मैंने उसे बहुत समझाया था कि ये सब कहानियाँ होती हैं, मगर अफ़क और जिनेक दोनों पागल हैं। हर गर्मी में सिर्फ़ उन ‘परियों’ को ढूँढने पहाड़ों में निकल पड़ते थे। और अफ़क जिनेक के बिना कहीं जाए, यह हो ही नहीं सकता।”
“फिर इस बार जिनेक क्यों नहीं आया?”
“उसे उसके मास्टर ने काम में फँसा रखा है। बड़ा ख़बीस आदमी है। कह रहा था—‘अहमद, दुआ करो कहीं ज़लज़ला, तूफ़ान या सैलाब आ जाए ताकि मैं रिलीफ़ एक्टिविटी के बहाने पाकिस्तान भाग सकूँ।’”
अहमद खुद ही ज़ोर से हँस पड़ा।
मगर परी का ध्यान अब भी उसी बात पर अटका हुआ था।
“और हनादे… अगर अफ़क उससे शादी नहीं करना चाहता था, तो अब उसके बारे में इतना सेंसिटिव क्यों हो जाता है?”
“क्योंकि वो उसकी बीवी थी।” अहमद का लहजा अचानक गंभीर हो गया।
“जैसी भी थी… मरने वालों के बारे में बुरा नहीं कहते। वैसे वह बड़ी अजीब साइको केस थी। इतना मेकअप करती थी कि सलमा कहा करती थी—‘लगता है अफ़क ने किसी लड़की से नहीं, पेस्ट्री से शादी की है।’”
“अच्छा…”
परी कुछ देर चुप रही। उसकी निगाह ट्रांसीवर पर टिक गई। फिर उसने अहमद से अलविदा कहा और बातचीत खत्म कर दी।
अब वह फिर उन्हीं बातों में उलझ गई थी।
उसके सामने आसमान में लाल और भूरे बादलों के बीच से ढलते सूरज की आख़िरी नारंगी किरणें झाँक रही थीं। दूर नंगा पर्वत बादलों में छिप चुका था और वे बादल धीरे-धीरे कराकोरम की तरफ़ बढ़ते दिखाई दे रहे थे।
उसने घबराकर ऊपर पहाड़ की तरफ़ देखा।
“ख़ुदा करे ये बादल हमें बायपास करके निकल जाएँ… मौसम खराब न हो।”
वह दुआ करती हुई बार-बार ऊपर नज़रें दौड़ाती रही और उन तीनों का इंतज़ार करने लगी।
शाम ढलने के साथ तापमान तेजी से गिरने लगा। सर्द हवा और तेज़ हो गई। फिर जब पूरी तरह अँधेरा फैल गया, तो उसे दूर से थके कदमों की आहट और बातचीत की हल्की आवाज़ें सुनाई दीं।
वे तीनों लौट रहे थे।
अफ़क के कंधे पर रस्सियों का आख़िरी गुच्छा था और हाथ में स्नो स्टिक।
“कहाँ रह गए थे तुम लोग? मैं कब से इंतज़ार कर रही हूँ।”
उसकी शिकायत पर अफ़क के थके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी।
“इतनी फ़िक्र करते हुए तुम और भी अच्छी लगती हो… बस अगर जल्दी खाना खिला दो तो।”
वह उसके पास से गुजरता हुआ सीधे टेंट के अंदर चला गया। अर्सा ने भी बिल्कुल उसी की नकल उतारी। दोनों बेहद थके हुए लग रहे थे।
परी तुरंत उनके पीछे अंदर आई।
“मैंने बिरयानी बनाई है।”
उसने दबे-दबे उत्साह से बताया।
“चलो, मैं मदद कर देती हूँ।” अर्सा उसके साथ खाना निकालने लगी।
परी ने गर्व से बिरयानी वाला बर्तन खोला। अफ़क झुककर चावलों को देखने लगा। कुछ सेकंड तक चुप रहा।
फिर बोला—
“खैर… उम्मीद है स्वाद अच्छा होगा।”
मतलब साफ था—शक्ल उतनी अच्छी नहीं थी।
परी ने तुरंत सफाई दी—
“मेरी कुकिंग पूरी फैमिली में मशहूर है। निशा से पूछ लेना।”
अफ़क ने प्लेट में बिरयानी निकाली और पहला कौर मुँह में डालकर धीरे-धीरे चबाया। फिर उसने चिकन की बोटी तोड़ने की कोशिश की, जो शायद ठीक से गली नहीं थी। ऊपर से ठंड के कारण और सख्त हो चुकी थी।
उसने किसी तरह एक टुकड़ा तोड़कर मुँह में डाला और काफी देर तक च्युइंग गम की तरह चबाता रहा। अर्सा की हालत भी कुछ अलग नहीं थी।
परी दोनों के चेहरे गौर से देख रही थी।
तभी अफ़क ने बड़ी गंभीरता से कहा—
“तुम्हें पता है, परी… तुर्की यूरोप में है?”
आठवीं चोटी
वह उसी पत्थर पर चुपचाप बैठी सोचों में डूबी रही। क्या वह सचमुच सैफ जैसे इंसान के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़ार सकती थी? उसे अक्सर लगता, जैसे सैफ कोई इंसान नहीं बल्कि चलता-फिरता स्टॉक एक्सचेंज हो — जिसकी धड़कनों की जगह कैलकुलेटर चलता हो।
विद्रोह करना उसकी फितरत में नहीं था, मगर अब उसने तय कर लिया था कि एक बार वह पापा से खुलकर बात ज़रूर करेगी। सैफ को लेकर उसके मन में जितने भी सवाल और शंकाएँ थीं, वह सब उनके सामने रखेगी। वह चाहती थी कि पापा अफ़क से मिलें, ताकि रिश्तेदारियों की अंधी मोहब्बत की पट्टी उनकी आँखों से उतर सके।
वह बदल रही थी।
इन पहाड़ों की खामोशी, इनकी ऊँचाइयाँ और यह कठोर सफर उसे भीतर से बदल रहा था। वह अब खुद को खत्म करने जैसा कोई कमज़ोर फैसला नहीं लेना चाहती थी। उसने मन ही मन सैफ से मंगनी तोड़ने का निश्चय कर लिया था। उलझनों के सिरों को पकड़कर वह धीरे-धीरे उन्हें सुलझाना सीख रही थी।
और अफ़क…
जिसके बारे में उसके दिल में पहले अनगिनत संदेह थे, अब उन संदेहों की जगह भरोसे ने लेनी शुरू कर दी थी। पूरी तरह नहीं, मगर इतना कि वह उसकी बातों पर यकीन कर सके।
पीटर आंसर वाला खेल खेलते हुए उसने कहा था—
“मोहब्बत? वह तो इश्क़ करता है!”
और फिर उसी झुंझलाहट भरे अंदाज़ में—
“हाँ, लगती हो ना!”
यह छोटा सा वाक्य अब भी उसके दिल पर हल्की बारिश की तरह उतर रहा था। उसमें अपनापन था, मान था, चाहत थी… और कहीं न कहीं एक बेचैन सी कसक भी थी। वह समझ नहीं पाती थी कि अफ़क सीधे शब्दों में अपने जज़्बात क्यों नहीं कह देता। आखिर वह उन तीन शब्दों को बोलने से बचता क्यों था?
कभी-कभी उसे ख्याल आता कि शायद उसने ये शब्द हिनादे से कहे होंगे। शायद उनकी शादी मोहब्बत की रही हो… शायद नहीं भी। मगर यह सवाल वह अफ़क से कभी नहीं पूछ सकती थी।
अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा।
उसने तुरंत जैकेट की जेब से ट्रांसीवर निकाला।
उसमें केवल दो बटन थे। उसने ट्रांसमिट बटन दबाया। कुछ क्षण बाद दूसरी ओर से अहमद की आवाज़ सुनाई दी।
“गुड आफ्टरनून बेस कैंप डॉक्टर! कैसी हो?”
उसकी आवाज़ सुनते ही अहमद खुश हो गया था।
“कैम्प वन के बाहर बर्फ़ पर बैठी हूँ। बाकी सब लोग रूट फिक्स करने गए हैं। मैंने चावल बनाए हैं। तुम बताओ, बेस कैंप कैसा है?”
“तुम्हें याद कर रहा हूँ और बुरी तरह बोर हो रहा हूँ। शफाली को छोड़कर बाकी सारे ट्रैकर्स और पोर्टर्स जा चुके हैं। अच्छा हुआ तुमने कॉल कर लिया। और हाँ, तुम्हारी ईमेल्स आई हैं। तुम अपना ईमेल और पासवर्ड मेरे पोर्टेबल पर सेव करके गई थीं। लेकिन कसम से, मैंने कोई मेल नहीं पढ़ी!”
“वाह! फिर तुम खुद ही जवाब भी दे दो मेरी तरफ से।”
वह हँसते हुए उसे मेल्स के जवाब लिखवाने लगी।
कुछ देर बाद हल्की झिझक के साथ बोली—
“अहमद… एक बात पूछूँ?”
“पूछो डॉक्टर, क्या फिर तबीयत खराब है?”
“ज़रूरी नहीं कि मैं तुमसे सिर्फ मेडिकल बातें ही पूछूँ।”
वह थोड़ा रुकी, फिर बोली—
“तुम्हें हिनादे याद है?”
“कौन हिनादे?”
परी चौंक गई।
जिस लड़की को अफ़क अपनी बीवी कह चुका था, उसके इतने करीबी दोस्त को उसी का नाम याद नहीं?
“अफ़क की पत्नी… हिनादे?”
“ओह!” अहमद हँस पड़ा।
“मैं समझा तुम ‘हवा’ की बात कर रही हो। हज़रत हवा… जिन्हें इंग्लिश में ईव कहते हैं और तुर्की में हनादे!”
परी का मन हुआ सिर पीट ले — अपना नहीं, अहमद का।
“हाँ वही… कैसी थी वो?”
“बहुत खूबसूरत थी।”
“और?”
अहमद कुछ पल चुप रहा।
“तुम अचानक उसके बारे में क्यों पूछ रही हो?”
परी थोड़ा घबरा गई।
वह उतना भोला नहीं था जितना दिखाई देता था।
“बस… अफ़क उसे याद करके उदास हो जाता है ना?”
“ये तुमसे किसने कहा?”
अहमद की आवाज़ में साफ हैरानी थी।
“अफ़क ने।”
“तो वह मज़ाक कर रहा होगा। उसने तो उससे शादी भी नहीं करनी चाही थी।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसे किसी और से मोहब्बत थी।”
परी का दिल जैसे डूबा और फिर अचानक ऊपर आ गया।
“किससे?”
अहमद कुछ पल हँसा, फिर बोला—
“क्या सच में कराकोरम और हिमालय की चोटियों पर परियाँ उतरती हैं?”
वह बिना रुके बोलता गया—
अफ़क को बरसों से उन काल्पनिक परियों की तलाश थी। वह हर साल पाकिस्तान आता और नंगा पर्वत के रोपल फेस का ट्रैक ज़रूर करता। उसने सुन रखा था कि रातों को परियाँ उतरती हैं और पर्वतारोहियों को गीत सुनाती हैं।
अहमद ने उसे कई बार समझाया था कि ये सब किस्से-कहानियाँ हैं, मगर अफ़क और जिनेक दोनों ही आधे पागल थे। हर गर्मी में पहाड़ों में निकल पड़ते — सिर्फ उन परियों की तलाश में।
“और जिनेक इस बार क्यों नहीं आया?”
परी ने पूछा।
“काम में फँसा हुआ है। कह रहा था, ‘अहमद, दुआ करो कहीं भूकंप, तूफान या बाढ़ आ जाए ताकि राहत अभियान के बहाने निकल सकूँ।'”
अहमद खुद ही अपनी बात पर हँस पड़ा।
मगर परी का ध्यान अब भी उसी जगह अटका था।
“अगर अफ़क हिनादे से शादी नहीं करना चाहता था, तो अब उसके नाम पर इतना सेंसिटिव क्यों हो जाता है?”
“क्योंकि वह उसकी पत्नी थी। जैसी भी थी, मर चुके लोगों के बारे में बुरा नहीं कहते।”
फिर हँसकर बोला—
“वैसे बड़ी अजीब लड़की थी। इतना मेकअप करती थी कि सलमा कहती थी, अफ़क ने किसी पेस्ट्री से शादी कर ली है!”
परी धीमे से मुस्कराई, फिर ट्रांसीवर बंद कर दिया।
अब वह अकेली बैठी उन बातों के बारे में सोच रही थी।
उसके सामने आसमान लाल और भूरे बादलों से भर चुका था। ढलते सूरज की आख़िरी नारंगी किरणें बादलों के बीच से झाँक रही थीं। दूर नंगा पर्वत बादलों में खो गया था और वे बादल अब धीरे-धीरे कराकोरम की ओर बढ़ रहे थे।
उसने आसमान की ओर देखते हुए दुआ की—
“ख़ुदा करे मौसम खराब न हो… ये बादल हमें छूए बिना आगे निकल जाएँ।”
वह बार-बार पहाड़ की तरफ देखती और उन तीनों का इंतज़ार करती रही।
जैसे-जैसे शाम उतरती गई, ठंड बढ़ने लगी। फिर अंधेरा पूरी तरह फैल गया। उसी दौरान उसे बर्फ़ पर कदमों की आवाज़ें सुनाई दीं।
तीनों लौट रहे थे।
अफ़क के कंधे पर रस्सियों का आख़िरी गुच्छा था और हाथ में स्नो स्टिक।
“इतनी देर कहाँ लगा दी? मैं कब से इंतज़ार कर रही थी!”
उसके गुस्से पर अफ़क के चेहरे पर थकी हुई मुस्कान आ गई।
“तुम फिक्र करते हुए और भी अच्छी लगती हो। अगर जल्दी खाना खिला दो तो शायद और भी लगो।”
वह उसके पास से गुजरकर टेंट में चला गया।
अर्सा ने भी उसकी नकल उतारी। दोनों बेहद थके हुए थे।
परी उनके पीछे अंदर आई और दबे उत्साह से बोली—
“मैंने बिरयानी बनाई है।”
“चलो, मदद करवाओ।”
अर्सा उसके साथ खाना निकालने लगी।
परी ने गर्व से बर्तन खोला। अफ़क झुककर बिरयानी को कुछ सेकंड तक देखता रहा।
फिर बोला—
“उम्मीद है स्वाद अच्छा होगा।”
मतलब साफ था — शक्ल अच्छी नहीं लग रही थी।
“मेरी कुकिंग पूरी फैमिली में मशहूर है!”
परी ने तुरंत सफाई दी।
अफ़क ने चम्मच भरा, मुँह में डाला, चबाया… और मुश्किल से निगला। फिर चिकन की एक बोती तोड़ने की कोशिश की, जो आधी कच्ची रह गई थी।
अर्सा भी वही हालत झेल रही थी।
परी दोनों के चेहरे पढ़ रही थी।
तभी अफ़क ने बेहद गंभीरता से पूछा—
“तुम्हें पता है, परी… तुर्की यूरोप में है?”
“और मैं भी यूरोप से आई हूँ।”
अर्सा ने तुरंत जवाब दिया।
परी ने दोनों को घूरा—
“मतलब?”
अफ़क ने मासूम चेहरा बनाया।
“मतलब हम यूरोप से हैं… अफ्रीका से नहीं। कच्चा मांस खाने की आदत अफ्रीका वालों को होती होगी।”
अर्सा हँसी रोकते हुए बोली—
“इनका मतलब है कि चिकन थोड़ा… अधपका है।”
बस, परी का सब्र टूट गया।
वह अपनी प्लेट उठाकर वहाँ से चली आई।
उसका दिल सच में भर आया था।
पूरा दिन उसने मेहनत से खाना बनाया था। थोड़ा मसाला ज्यादा था, चिकन पूरी तरह नहीं गला था… मगर क्या इतना भी बुरा था कि उसका मज़ाक उड़ाया जाए?
रात को वह फिर उसी पत्थर पर बैठी थी।
क्रेम्पन्स से बर्फ़ पर लकीरें खींचती हुई। ऊपर सातवें चाँद की रोशनी में राकापोशी का ग्लेशियर चमक रहा था।
कुछ देर बाद उसने अफ़क को टेंट से निकलते देखा।
उसने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
फिर किसी के पास आकर बैठने की आहट हुई।
“अहम… मुझे भूख लग रही है। बिरयानी बची है क्या?”
अफ़क ने गला खंखारते हुए मासूमियत से पूछा।
परी ने चेहरा और फेर लिया।
“सच कह रहा हूँ, बिरयानी बहुत शानदार बनी थी। इतनी स्वादिष्ट बिरयानी तो मैंने जिंदगी में नहीं खाई। मुंबई के शेफ भी फेल हैं तुम्हारे सामने।”
वह चुप रही।
“अच्छा प्लीज़, नाराज़ मत हो।”
परी ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।
“हाँ, क्योंकि तुम अफ्रीका से नहीं आए ना… और तुम कच्चा मांस नहीं खाते।”
अफ़क हँस पड़ा।
“अब कुछ चीज़ों को पक्का मांस कहने से तो मैं रहा।”
“तुम ऊपर चले गए थे! मैंने पूरा दिन मेहनत की और फिर घंटों तुम्हारा इंतज़ार किया!”
“काश, कराकोरम की परी! तुमने उतनी मेहनत चिकन गलाने में भी की होती।”
“अफ़क!”
उसकी आँखें भर आईं।
वह तुरंत नरम पड़ गया।
“अच्छा बाबा, रोओ मत। देखो, मैं तुम्हारे लिए गर्म खाना लाया हूँ। मुझे पता था तुमने खुद कुछ नहीं खाया होगा।”
उसने पैकेट उसकी ओर बढ़ाया।
परी हैरान रह गई।
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि वो बिरयानी खाने लायक नहीं थी।”
वह फिर हँस पड़ा।
इस बार परी ने सचमुच पैकेट उसके कंधे पर दे मारा।
अफ़क हँसते हुए बोला—
“वैसे निशा कह रही थी, तुम सैफ से मंगनी तोड़ नहीं सकतीं। लेकिन मेरा सुझाव है, वापस जाकर उसे यही बिरयानी खिला देना। वो खुद रिश्ता खत्म कर देगा।”
परी ने तुरंत घूरा—
“मेरी बिरयानी के बारे में एक शब्द और कहा ना, तो मैं तुम्हें यहीं से नीचे धक्का दे दूँगी। और जहाँ तक मंगनी की बात है… वो मैं वैसे ही खत्म कर दूँगी।”
अफ़क की हँसी अचानक थम गई।
वह हैरानी से उसे देखने लगा।
“क्यों?”
“क्योंकि टॉम क्रूज़ ने मुझे प्रपोज़ किया है।”
वह जलकर बोली।
अफ़क फिर हँस पड़ा।
“अच्छा आदमी है। कर लो शादी।”
“हाँ, पहले तुम्हें मारूँगी, फिर उसी से शादी करूँगी!”
वह गुस्से से बोलकर तेज़ी से अपने टेंट में चली गई।
“उफ़्फ़ अफ़क भाई! आप कितना बोलते हो। किसी को चैन से काम भी नहीं करने देते!”
अरसा झुंझलाकर अपने कागज़ समेटती हुई बड़बड़ाई और टेंट से बाहर निकल गई।
प्री ने किताब से नज़र उठाकर हैरानी से उसे जाते देखा।
अफ़क हल्का सा मुस्करा दिया।
“स्कॉट फिशर से माफ़ी के साथ…”
“ये एटीट्यूड नहीं, अल्टीट्यूड है।”
प्री ने बिना सिर उठाए जवाब दिया।
“इस ऊँचाई पर इंसान थोड़ा चिड़चिड़ा हो ही जाता है। मैं बुरा नहीं मानता।”
फिर वह उसी सहज अंदाज़ में बोला—
“हाँ तो मैं कह रहा था… अगले मार्च मैं एवरेस्ट एक्सपेडीशन लीड करने वाला हूँ। तुम सुन भी रही हो?”
“नहीं।”
वह पूरी तल्लीनता से किताब पढ़ती रही।
अफ़क ने नकली नाराज़गी से उसे देखा।
“तो फिर सुनो… वो बिरयानी दोबारा खिला दो ना?”
“ज़हर नहीं खिलाना?”
उसने किताब से नज़र हटाए बिना तंज़ किया।
अफ़क मुस्कराया।
“अगर तुम्हारे हाथ से मिले तो ज़हर भी खुशी से खा लूँ।”
“लगता है पाकिस्तानी फिल्में बहुत देखने लगे हो।”
“पेशावर में एक पश्तो फिल्म देखी थी। कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उसकी हीरोइन बहुत अच्छा किंगफू करती थी।”
प्री ने आखिरकार किताब नीचे की और उसे घूरा।
“किंगफू? जैसे तुम्हें पता ही नहीं कि वो डांस था। मासूम बनने की कोशिश मत करो।”
वह फिर पढ़ाई में लग गई।
अफ़क अब सचमुच खीझ गया था।
“ये किताब मुझसे ज्यादा अच्छी है क्या?”
प्री ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा—
“हाँ, बिल्कुल।”
अफ़क का चेहरा देखने लायक था।
प्री खुद को रोक नहीं सकी और हँस दी।
“क्या सच में नाराज़ हो गए?”
उसने आखिर किताब एक तरफ रख दी।
अफ़क का चेहरा अचानक बदल गया।
उसकी आँखों में एक गहरी उदासी उतर आई।
“प्री… मुझे आना बहुत याद आ रही है।”
“तुर्क लोग अपनी माँ को ‘आना’ कहते हैं।”
प्री कुछ पल चुप रही, फिर धीमे स्वर में बोली—
“मुझे भी पापा और निशा बहुत याद आ रहे हैं। पता नहीं पहाड़ों पर आकर पीछे छूटे लोग इतने क्यों याद आने लगते हैं।”
अफ़क उठकर बैठ गया और सामने दीवार से टेक लगा ली।
खिड़की के पार धूसर आसमान दिखाई दे रहा था, जिस पर लगातार बर्फ गिर रही थी।
कुछ क्षण वह चुपचाप बाहर देखता रहा, फिर बोला—
“कभी-कभी दिल करता है पर्वतारोहण छोड़ दूँ। आना को ये सब बिल्कुल पसंद नहीं।”
उसकी आवाज़ में अब कोई शरारत नहीं थी।
“मेरे तीन भाई पहाड़ों में मारे गए थे। उनके बाद मेरी माँ बहुत अकेली हो गई। वह अक्सर मुझसे कहती हैं—
‘अफ़क, पहाड़ों पर मत जाया करो… मेरे बेटे पहाड़ों से लौटकर नहीं आते।'”
उसने हल्की साँस ली।
“ऐसे समय में सोचता हूँ सब छोड़ दूँ। कोई अच्छी नौकरी करूँ, अच्छी सैलरी हो… अपनी माँ के साथ रहूँ। तब सच में लगता है कि ये सब खत्म कर दूँ।”
प्री उसे ध्यान से देख रही थी।
कुछ देर पहले तक जो इंसान मज़ाक कर रहा था, अब वही भीतर से बेहद थका हुआ लग रहा था।
“फिर छोड़ क्यों नहीं देते?”
उसने धीरे से पूछा।
अफ़क हल्का सा मुस्कराया।
“ये जुनून है प्री… एक लत। पर्वतारोहण इतनी आसानी से नहीं छूटता।”
उसकी आँखें कहीं बहुत दूर चली गईं।
“मुझे बचपन से हिमालय से मोहब्बत थी। मेरा सपना था ‘बिग फाइव’ सर करना—
एवरेस्ट… के2… कंचनजंगा… ल्होत्से… और मकालू।”
वह धीमे स्वर में बोलता रहा—
“मैं घंटों सोचता था कि वो पल कैसा होगा, जब मैं इन सब चोटियों पर खड़ा हो जाऊँगा। जब सारे सपने पूरे हो जाएँगे।”
कुछ पल बाद वह फीकी मुस्कान के साथ बोला—
“लेकिन जब दो साल पहले मैंने के2 की चोटी पर कदम रखा… तो पता है क्या हुआ?”
प्री चुप रही।
“मेरे सारे सपने अचानक खत्म हो गए।
जैसे भीतर कुछ खाली हो गया हो।”
टेंट में कुछ क्षण सिर्फ बाहर गिरती बर्फ़ की आवाज़ रही।
“हर सपना पूरा नहीं होना चाहिए। इंसान के भीतर थोड़ा अधूरापन भी ज़रूरी होता है।”
फिर उसने धीरे से कहा—
“अब मेरी बस एक आखिरी इच्छा है… दुनिया के सबसे खूबसूरत पहाड़ पर खड़े होकर कंकॉर्डिया और बलतूरो की चोटियों को देखूँ। उसके बाद शायद मैं कभी पहाड़ों में न जाऊँ।”
प्री का दिल अजीब तरह से भर आया।
“और अगर ये आखिरी इच्छा भी अधूरी रह गई तो?”
अफ़क ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में एक गहरा, शांत यकीन था।
“फिर भी कोई अफ़सोस नहीं होगा…”
वह मुस्कराया।
“क्योंकि जिस चीज़ को सच्चे दिल से खोजा जाए… वो आखिर मिल ही जाती है।”
प्री का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
अफ़क फिर मुस्कराया।
“मैंने सुना था कि हिमालय और कराकोरम की चोटियों पर परियाँ उतरती हैं। इसलिए मैं नांगा पर्वत के बेस कैंप ट्रैक पर बियाल कैंप से…”
प्री ने बिना उसकी ओर देखे उसका वाक्य पूरा कर दिया—
“बियाल कैंप से फेरी मेडोज़ तक का रास्ता… जहाँ शाम ढलते ही परियाँ गीत गाती हुई उड़ती हैं… और तुम उन्हें देखने जाना चाहते थे, है ना?”
अफ़क की शहद रंग आँखों में हैरानी उतर आई।
“तुम्हें कैसे पता?”
प्री हल्का सा मुस्कराई।
उसने कंधे उचकाए और फिर किताब उठा ली।
“जिसे खोजा जाता है…”
वह पन्ना पलटते हुए धीमे स्वर में बोली—
“उसे शुरू से ही पता होता है कि कोई उसकी तलाश में है।”
उसके होंठों पर अब एक बेहद खूबसूरत मुस्कान थी।
“भटकता तो हमेशा खोजने वाला है।
जिसे खोजा जाता है… वो तो बरसों से एक ही रास्ते पर ठहर कर इंतज़ार कर रहा होता है।”
वह किताब पर झुकी रही, मगर उसके शब्द सीधे अफ़क के दिल तक उतर चुके थे।
आठवीं चोटी
शुक्रवार, 11 अगस्त 2005
उसने मेस टेंट की मेज़ पर रखे कई पावर बार और एनर्जी बार उठाकर अपने रकसैक में जमा किए, फिर जूतों के नीचे क्रैम्पॉन कसकर बाहर निकल आई। बाहर अर्सा, फ़रीद और अफ़क पहले से तैयार खड़े थे। भारी बैकपैक कंधों पर थे, हाथों में ग्लव्स, आँखों पर ग्लासेज़ और चेहरों पर चढ़ाई की गंभीर तैयारी साफ झलक रही थी।
योजना यह थी कि वे पोर्टर्स के साथ कैम्प फ़ोर तक पहुँचेंगे, मगर सुबह एक अनहोनी हो गई थी। शेर ख़ान ने सूर्योदय के समय बिना ग्लास लगाए राकापोशी को देख लिया था और अब सन ब्लाइंडनेस का शिकार होकर नीचे अपने घर में पड़ा था। उनके पास इतना अतिरिक्त ईंधन और राशन नहीं था कि वे एक और दिन रुक पाते। इसलिए फ़रीद ख़ान ने साथ चलने का फैसला किया।
फ़रीद मूल रूप से हंज़ा का रहने वाला था। हंज़ा के पोर्टर्स, बलती पोर्टर्स से अलग माने जाते थे—शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। बलतोरो के बलती पोर्टर्स को विदेशी पर्वतारोहियों, खासकर यूरोपियनों, से कहीं अधिक अनुभव होता था। अफ़क अक्सर उन्हें “कराकोरम का शेरपा वर्ज़न” कहा करता था। पहाड़ों पर सामान पहुँचाने की मजबूरी उन्हें हर हाल में पर्वतारोहियों का साथ निभाने पर मजबूर कर देती थी। कुछ लोग पर्वतारोहण सिर्फ रोज़ी कमाने के लिए करते थे और कुछ लोग सिर्फ अपने शौक के लिए।
जब चारों ने बेस कैम्प छोड़ने की तैयारी की तो अफ़क अहमद से गले मिला। फिर उसके कंधों पर हाथ रखकर अपनी भाषा में उसे लंबे समय तक कुछ समझाता रहा। अहमद कई बार उनके साथ पर्वतों पर आ चुका था और हर बार अफ़क उसी गंभीरता से उसे निर्देश देता था, जैसे कोई सेनापति अपने साथी को जिम्मेदारियाँ सौंप रहा हो। अहमद मासूमियत से बस सिर हिलाता रहा।
जब वह नीचे उतरने लगा तो अफ़क देर तक उसे जाता हुआ देखता रहा, यहाँ तक कि वह नज़रों से ओझल नहीं हो गया। प्रीशे भी उसके साथ खड़ी थी। बेस कैम्प अब बहुत छोटा दिखाई दे रहा था। अफ़क ने आख़िरी बार पीछे मुड़कर टेंट्स की ओर देखा।
“काश हम सब ज़िंदा लौटकर इन टेंट्स को फिर देख सकें…” वह धीमे स्वर में बुदबुदाया।
उसने घबराई हुई निगाहों से ऊपर फैले “ब्रो” ग्लेशियर को देखा और मन ही मन दुआ की कि यह सोया हुआ दैत्य कभी जागे ही नहीं। काश वह चुपचाप उसकी दुनिया में दाखिल हों, उसकी चोटी छू लें और सुरक्षित वापस लौट आएँ।
उसकी घबराई शक्ल देखकर अफ़क मुस्कराया।
“डर मत। जब हम राकापोशी फतह कर लेंगे ना, पूरा गाँव हमारे सम्मान में दावत देगा।”
प्रीशे ने नीचे अपने क्रैम्पॉन की ओर देखा, जिनकी नुकीली पकड़ बर्फ़ में धँसी हुई थी। वह अब आसानी से फिसल नहीं सकती थी। उसने सिर झटका और हल्की मुस्कान उसके होंठों पर आ गई। डर थोड़ा कम हो चुका था।
“हाँ, मैंने देखा था। दावत का नाम सुनते ही तुम्हारी आँखें कितनी चमकने लगी थीं।”
“मेरी आँखों के बारे में कुछ मत कहना। तुर्की की लड़कियाँ इन आँखों पर जान देती हैं।”
“तो फिर उनका टेस्ट बहुत खराब होगा। मुझे उन पर तरस आता है।”
“अच्छा, अभी से मत लड़ो। आगे बहुत लंबा रास्ता साथ तय करना है।”
अफ़क ने अपना भारी दस्ताने वाला हाथ उसकी ओर बढ़ाया। प्रीशे ने उसका हाथ थाम लिया। उस एक स्पर्श ने उसके भीतर एक अजीब-सी सुरक्षा भर दी। जैसे अब अगर वह फिसलेगी भी, तो कोई उसे गिरने नहीं देगा।
बर्फ़ बेहद नरम और गंदी हो चुकी थी। धूप थोड़ी देर भी तेज़ होती तो सतह पिघलने लगती। राकापोशी पर चढ़ाई का सबसे सही समय जुलाई माना जाता था, लेकिन वे लगभग एक महीना देर से पहुँचे थे। अगस्त तक बर्फ़ की हालत खराब हो चुकी थी।
कुछ दूर आगे एक समतल बर्फ़ीला मैदान था जहाँ कैम्प वन लगाया गया था। वहाँ तीन टेंट लगे थे। पर्वतारोहण का अनुशासन यही होता है—हर पड़ाव पर धीरे-धीरे शरीर को ऊँचाई का आदी बनाना। दोपहर तक वे कैम्प वन पहुँच गए और पहली रात वहीं बिताई।
अगले दिन अफ़क, फ़रीद और अर्सा कैम्प टू तक रास्ता तय करने निकल गए। उन्हें ऊपर लगभग बारह सौ मीटर तक रस्सियाँ लगानी थीं और आगे टेंट लगाने के लिए सुरक्षित जगह ढूँढ़नी थी। वे सेमी-अल्पाइन स्टाइल में चढ़ाई कर रहे थे, यानी कुछ हिस्सों में रस्सियाँ लगानी थीं और कुछ जगहों पर बिना रस्सियों के बढ़ना था।
प्रीशे उस दिन टेंट में ही रुक गई। उसकी एल्टीट्यूड सिकनेस धीरे-धीरे कम हो रही थी और तेज़ी से ऊपर जाने पर वह दोबारा बढ़ सकती थी। इसलिए उसने वहीं रुककर सबके लिए खाना बनाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।
कुछ दूर तक वह उनके साथ गई। अर्सा के कंधे पर रस्सियों का भारी गुच्छा था और हाथ में आइस स्क्रूज़ और पीटोन थे। अफ़क ने बर्फ़ में एक पीटोन गाड़ा और रस्सी उससे बाँध दी। यह पूरी प्रक्रिया उसे बेहद उबाऊ लगी, इसलिए वह वापस टेंट में लौट आई और खाना बनाने में लग गई।
प्रीशे को अपनी कुकिंग पर बहुत नाज़ था। उसके हाथों में स्वाद था। इसलिए उसने अपने साथ लाई हुई सारी खास चीज़ों से बड़े प्यार और उत्साह के साथ सिंधी बिरयानी बनाई।
शाम तक खाना तैयार हो चुका था। आने वाले दिनों में उन्हें सिर्फ “Add Some Hot Water” वाली यूरोपीय चीज़ें खानी थीं। इसलिए उसने सोचा, आज बिरयानी खाकर अफ़क को बहुत अच्छा लगेगा।
खाना बनाकर वह बाहर निकल आई। चारों ओर कठोर बर्फ़ पर पाउडर स्नो की हल्की परत जमी हुई थी। नई बर्फ़ गिरे दो-तीन दिन बीत चुके थे, इसलिए सफेदी अब पीली पड़ने लगी थी।
वह टेंट्स से दूर एक बड़े ग्रेनाइट पत्थर पर जाकर बैठ गई। शाम उतर रही थी। ठंडी, मीठी छाया पूरे वातावरण पर फैल चुकी थी। वह पहाड़ की ओर पीठ किए, घुटनों पर ठोड़ी टिकाए, उन दृश्यों को अपनी आत्मा में उतार रही थी।
इतनी गहरी खामोशी थी कि अगर सुई भी गिरती, तो उसकी आवाज़ गूंज उठती। चारों तरफ़ फैले काले पहाड़ चुपचाप उसे देख रहे थे। उस पल ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया उसी की हो।
उसे लगा—पापा, फूफू, सैफ, निशा… सब किसी दूसरी दुनिया में रहते हैं। एक ऐसी दुनिया जहाँ ट्रैफिक का शोर था, ऊँची इमारतें थीं और भागती हुई ज़िंदगियाँ थीं। यह दुनिया उससे बिल्कुल अलग थी। यहाँ रात और सुबह का मतलब भी बदल जाता था। जब शहरों में लोग सो रहे होते, तब पर्वतारोही अँधेरे में बर्फ़ काटते हुए आठ-आठ किलोमीटर की चढ़ाई शुरू कर देते।
शहरों में वही दूरी कार से आठ मिनट में तय हो जाती थी, मगर पहाड़ों में वही सफर कई दिनों और महीनों में पूरा होता था।
और शायद इंसान की सबसे बड़ी फितरत यही है—जिज्ञासा। यही बेचैनी उसे उन आठ किलोमीटर की ऊँचाइयों तक खींच लाती है, जहाँ पहुँचने के लिए उसकी आत्मा बरसों से तड़प रही होती है।
अपने टेंट में लौटकर उसने अफ़क की जगह खुद नाश्ता तैयार करना शुरू कर दिया। गहरे अँधेरे में जलती छोटी-सी लौ के बीच उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो वह रमज़ान की किसी सहर के लिए खाना बना रही हो। बाहर पहाड़ों की खामोशी थी और अंदर धीमे-धीमे उबलते पानी की आवाज़।
दरवाज़े पर हल्की आहट हुई। प्री ने अनायास सिर उठाकर देखा। अफ़क जल्दी-जल्दी कदम रखते हुए अंदर आया। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर अधूरी नींद की थकान साफ दिखाई दे रही थी।
“मुझे उठाया क्यों नहीं?”
वह उसके बिल्कुल पास बैठ गया और उसके हाथ से माचिस लेकर खुद स्टोव जलाने लगा। प्री कुछ पल तक उसे ध्यान से देखती रही। अब वह उसे जाना-पहचाना लगता था, मगर फिर भी कभी-कभी इतना अजनबी हो जाता था कि उसे समझ पाना मुश्किल हो जाता।
उसके भीतर फिर वही सवाल जागा—
क्यों तुम उसे भूल नहीं पाते, अफ़क? क्यों वह हर वक्त हमारे बीच किसी दीवार की तरह खड़ी रहती है?
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसे यक़ीन था कि एक दिन अफ़क खुद सब बता देगा।
रविवार, 14 अगस्त 2005
प्री ने धीरे से टेंट का पर्दा हटाया और अंदर झाँका। अफ़क अपने स्लीपिंग बैग में गहरी नींद में सो रहा था। वह दबे पाँव अंदर आई। फर्श पर उसके कदमों की हल्की आहट हुई, मगर अफ़क नहीं जागा।
रात को अर्सा ने उसे बताया था कि अफ़क ने सुबह दो बजे जगाने को कहा है। प्री अलार्म लगाकर सोई थी, लेकिन पूरी रात अर्सा की खाँसी सुनते-सुनते उसकी नींद अधूरी ही रही।
वह तय समय से दस मिनट पहले उसे जगाने आई थी, मगर सोते हुए अफ़क इतना शांत और मासूम लग रहा था कि उसका दिल नहीं माना। वह कुछ देर तक उसके सिरहाने बैठी रही, फिर बिना उसे उठाए चुपचाप बाहर निकल आई।
बाहर आसमान अब भी काला था, लेकिन पूरी तरह साफ। बर्फ़बारी कई घंटे पहले रुक चुकी थी। टेंट की गॉर-टेक्स दीवारों पर कई इंच बर्फ़ जमी हुई थी। दूर आसमान में अनगिनत तारे चमक रहे थे, जैसे आने वाले साफ मौसम की भविष्यवाणी कर रहे हों। हिमालय का आसमान हर पल अपना रंग बदलता था।
अपने टेंट में लौटकर उसने अफ़क के लिए नाश्ता तैयार करना शुरू कर दिया। उस सन्नाटे भरी रात में उसे सचमुच ऐसा लग रहा था जैसे वह रमज़ान की सहरी बना रही हो।
तभी फिर आहट हुई। उसने पलटकर देखा। अफ़क जल्दी से अंदर आया था। आँखें अब भी लाल और भारी थीं।
“तुमने मुझे क्यों नहीं जगाया?”
वह उसके करीब बैठते हुए उसके हाथ से माचिस ले चुका था। प्री चुपचाप उसे देखती रही। अब वह पहले से कहीं ज़्यादा अपना लगने लगा था।
वह गैस खोलकर बेहद लापरवाही से तीली जलाकर स्टोव में डाल रहा था। आग तेज़ी से भभक उठी।
“इतनी बेपरवाही से स्टोव क्यों जला रहे हो?” प्री ने तुरंत टोका।
अफ़क ने कंधे उचकाए।
“स्टोव की चिंता छोड़ो। दुआ करो रस्सियाँ बर्फ़ में दबकर गुम न हो गई हों।”
खुशकिस्मती से रस्सियाँ सही हालत में थीं। उन पर बर्फ़ जरूर जमी थी, मगर रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ था।
रात के उस सन्नाटे में राकापोशी असामान्य रूप से शांत लग रहा था। वे धीरे-धीरे फिक्स्ड रोप की ओर बढ़ रहे थे। प्री हर कदम बहुत सावधानी से रख रही थी। जैसे ही उसका बूट बर्फ़ पर पड़ता, सतह एक इंच तक धँस जाती। उस एक पल के लिए उसकी साँस रुक जाती, मगर अगले ही क्षण उसे राहत मिलती कि नीचे ठोस ज़मीन है, कोई क्रेवास नहीं।
ग्लेशियरों और ऊँचे पहाड़ों में जगह-जगह गहरी दरारें होती हैं—क्रेवास। कुछ खुली दिखाई देती हैं और कुछ ताज़ी बर्फ़ की पतली परत से ढँक जाती हैं। ऊपर से सब सामान्य लगता है, मगर पैर पड़ते ही बर्फ़ टूट जाती है और इंसान सैकड़ों फीट नीचे गिर सकता है। इन दरारों में गिरे लोगों के शव तक निकालना कई बार संभव नहीं होता।
आज भी जब वह फिक्स्ड रोप पर जूमर की मदद से ऊपर चढ़ रही थी, तो धूसर बर्फ़ में फैली हल्की-हल्की दरारें साफ दिखाई दे रही थीं। उसका जूमर रस्सी पर ऊपर सरकता जाता और वह धीरे-धीरे चढ़ती जाती।
पूरे रास्ते वह गुनगुनाती रही—
“आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ पाकिस्तान की सैर,
जिसके लिए लाखों ने दी अपनी जान की खैर…”
अफ़क ने उसका मतलब पूछा तो उसने बस कंधे उचकाकर कहा—
“आज हमारा इंडिपेंडेंस डे है। मैं उसे सेलिब्रेट कर रही हूँ। इसलिए चुपचाप सुनो।”
अफ़क हँस पड़ा।
“ठीक है, मगर अब तो सुना है भारत और पाकिस्तान दोस्त बनने की कोशिश कर रहे हैं।”
प्री ने तुरंत जवाब दिया—
“साँपों से दोस्ती नहीं की जाती।”
उसकी देशभक्ति इन दिनों कुछ ज्यादा ही जाग चुकी थी। कैम्प टू तक पहुँचते-पहुँचते वह पाकिस्तान के बारे में जाने कितने जोशीले भाषण दे चुकी थी।
आज की चढ़ाई आसान नहीं थी। बर्फ़ बेहद मुलायम हो चुकी थी। हाथ लगाते ही पिघलने लगती और कई जगहों पर पैर धँस जाते।
कैम्प टू पहुँचकर बर्फ़ काटकर टेंट लगाने का सारा काम फ़रीद और अफ़क ने किया। टेंट खड़े होने के बाद प्री ने अपने बैग से छोटे-छोटे झंडे निकालकर अंदर लगा दिए, जिन्हें वह इस्लामाबाद से लाई थी।
वह बड़ा झंडा भी बाहर लगाना चाहती थी, मगर शाम ढलते-ढलते हवाएँ बेहद तेज़ हो चुकी थीं। गॉर-टेक्स टेंट के हीट लाइनर अंदर कुछ गर्माहट बनाए हुए थे, फिर भी बाहर की बर्फ़ीली हवा शरीर के भीतर तक जमाव पैदा कर रही थी।
ऊपर से ऑक्सीजन पहले ही बहुत कम थी। कैम्प लगभग 6200 मीटर की ऊँचाई पर था। ऐसे मौसम में बाहर निकलकर बड़ा झंडा लगाना खतरनाक साबित हो सकता था।
आख़िरकार वह सिर्फ गर्म चाय पीकर ही सो गई। इतनी ऊँचाई पर भूख भी धीरे-धीरे मरने लगती है।
नई चोटी
सोमवार, 15 अगस्त 2005
वे दोनों लॉन्ज में आमने-सामने बैठे थे। कुछ देर तक सैफ खामोश रहा। फिर जैसे बिना किसी भूमिका के उसने धीमे स्वर में कहा—
“परी, मुझे पता है यह सुनकर तुम्हें तकलीफ़ होगी… लेकिन मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता। मैं अपने एक दोस्त की बहन को पसंद करता हूँ। यह मंगनी मैंने सिर्फ अपनी माँ की ख़ुशी के लिए की थी। अब बहुत हो चुका। मैं यह रिश्ता खत्म करना चाहता हूँ… बताओ, तुम क्या चाहती हो?”
परी कुछ भी नहीं कह पाई। उसके भीतर जैसे सारी आवाज़ें अचानक खो गई थीं।
“बताओ परी… क्या मैं मामा से बात करूँ?”
वह उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था। प्री की आँखें भर आईं।
वह कहना चाहती थी—
“सैफ… प्लीज़ यह मंगनी तोड़ दो। यह मेरे ऊपर तुम्हारा सबसे बड़ा एहसान होगा…”
मगर उसका गला सूख चुका था। आवाज़ होंठों तक आकर भी बाहर नहीं निकल रही थी।
“उठ जाइए परी आंटी! आखिर कब तक सोती रहेंगी?”
किसी ने उसे झिंझोड़ दिया।
वह घबराकर उठ बैठी और चारों ओर देखने लगी।
न लॉन्ज था, न सैफ। सब कुछ धुंध की तरह गायब हो चुका था। वह उनसे हजारों मील दूर राकापोशी के बर्फ़ीले मैदान में लगे एक छोटे से टेंट के अंदर थी।
उसने कनपटी दबाई।
“हे भगवान…”
अब इच्छाएँ सपनों का रूप लेकर उसका पीछा करने लगी थीं।
वह चुपचाप तैयार होने लगी। नाश्ता किया, क्रैम्पॉन पहने, ग्लेशियर गॉगल्स लगाए और अपना सामान समेटने लगी।
अर्सा पास बैठी अपने कागज़ों का पुलिंदा बैग में भरने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
“मेरे बैग में रस्सियाँ भरी हैं, इसलिए ये कागज़ नहीं आ रहे। आप इन्हें अपने बैग में रख लीजिए।”
परी ने उससे कागज़ लेकर अपने बैग में रख लिए।
जब वह सामान उठाकर खड़ी हुई तो उसकी गोद से वायरलेस की दो बैटरियाँ नीचे गिर पड़ीं। उसने उन्हें उठाकर मुट्ठी में दबा लिया और टेंट से बाहर निकल आई।
बाहर अब भी रात बाकी थी। आसमान पूरी तरह काला था, लेकिन तारे दूर-दूर तक चमक रहे थे। पिछली शाम लंबी नींद लेने के कारण वह खुद को काफी तरोताज़ा महसूस कर रही थी। मौसम साफ था और ऐसा लग रहा था कि आज भी दिन खुला रहेगा।
टेंट के बाहर बर्फ़ पर अफ़क और फ़रीद तैयार खड़े थे। अफ़क झुककर अपने जूतों के तस्मे बाँध रहा था।
परी धीरे से उसके पीछे गई और उसकी पीठ पर बंधे रकसैक की एक जेब खोलकर वायरलेस की दोनों बैटरियाँ उसमें रख दीं। फिर ज़िप बंद कर दी।
फ़रीद ने सिर पर टोपी ठीक करते हुए अफ़क से कहा—
“साब… एक बात कहूँ? मेरी मानो तो आज आगे मत बढ़ो। इस उत्तर-पश्चिमी रिज को आज तक कोई सर नहीं कर पाया।”
अफ़क ने बिना उसकी तरफ देखे कंधे उचका दिए।
“अफ़क अर्सलान कर लेगा। तुम फिक्र मत करो।”
फ़रीद ने हैरानी से उसे देखा। अफ़क के भीतर का आत्मविश्वास कई बार ज़िद की हद तक पहुँच जाता था।
“साब… मौसम खराब हो जाएगा।”
“आसमान तो बिल्कुल साफ है।”
फ़रीद ने उत्तर दिशा की ओर इशारा किया।
“वहाँ सितारों का जो झुंड दिख रहा है ना… मैंने इस मौसम में उन्हें कभी नहीं देखा। यह अच्छा संकेत नहीं है।”
अफ़क सीधा खड़ा हो गया और अपने दस्तानों पर जमी बर्फ़ झाड़ते हुए बोला—
“हमारे पास इतना ईंधन और गियर नहीं है कि बैठकर मौसम बदलने का इंतज़ार करें।”
फ़रीद चुप हो गया।
परी उसी तरह सिर झुकाए खड़ी रही। तभी अचानक उसके सिर के पीछे किसी नुकीली चीज़ ने ज़ोर से चोट मारी।
वह घबराकर पलटी।
तीन पहाड़ी कौवे उसके ऊपर झपटे थे। उसने जल्दी से सिर पर हाथ रखा। कौवे फड़फड़ाते हुए ऊपर उड़ गए।
वह हैरानी से उन्हें अँधेरे आसमान में उड़ते देखती रही और सिर के पीछे उस जगह को सहलाने लगी जहाँ उनकी चोंच लगी थी।
अफ़क तुरंत उसके पास आया।
“क्या हुआ? तुम ठीक हो?”
लेकिन वह अब भी उन उड़ते हुए काले सायों को देख रही थी।
अफ़क ने दोबारा पूछा—
“परी… क्या हुआ?”
नई चोटी
सोमवार, 15 अगस्त 2005
वे दोनों लाउंज में आमने-सामने बैठे थे। कुछ देर तक सैफ़ चुप रहा, फिर बेहद सपाट लहज़े में बोला,
“परी, मुझे मालूम है यह बात तुम्हें तकलीफ़ देगी… लेकिन मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता। मैं अपने दोस्त की बहन को पसंद करता हूँ। यह मंगनी मैंने सिर्फ़ अम्मी की खुशी के लिए की थी। अब मैं इसे और आगे नहीं बढ़ाना चाहता। बताओ, तुम क्या चाहती हो?”
परी के पास कोई जवाब नहीं था। शब्द जैसे उसके गले में अटक गए थे।
“बताओ परी… क्या मैं मामा से बात करूँ?” सैफ़ अब भी उसी जवाब का इंतज़ार कर रहा था।
उसकी आँखें भीग गईं।
वह कहना चाहती थी—
“सैफ़… प्लीज़ यह रिश्ता खत्म कर दो। तुम मुझ पर बहुत बड़ा एहसान करोगे…”
लेकिन उसके सूखे होंठों से आवाज़ ही नहीं निकली।
“उठ भी जाइए परी आंटी! आखिर कब तक सोती रहेंगी?”
किसी ने उसे हल्का सा झिंझोड़ा। वह घबराकर उठ बैठी और चारों तरफ देखने लगी।
ना लाउंज था…
ना सैफ़…
सब कुछ धुएँ की तरह गायब हो चुका था।
वह हज़ारों मील दूर राका पोशी के बर्फीले मैदान में बने एक छोटे से टेंट के भीतर थी।
“हे खुदा…” उसने कनपटी दबाते हुए बुदबुदाया।
अब उसकी इच्छाएँ सपनों की शक्ल में उसका पीछा करने लगी थीं।
वह चुपचाप उठी, खुद को तैयार किया, नाश्ता किया और फिर अपने जूतों पर क्रैम्पॉन्स चढ़ाकर ग्लेशियर गॉगल्स पहन लिए।
पास ही अर्सा अपने बैग में कागज़ों का मोटा पुलिंदा ठूँसने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
“मेरे बैग में रस्सियाँ हैं, इसलिए ये नहीं आ रहे… आप इन्हें अपने बैग में रख लीजिए।”
परी ने उससे कागज़ ले लिए।
सामान समेटते हुए जब वह खड़ी हुई, तो उसकी गोद से वायरलेस की दो बैटरियाँ नीचे गिर पड़ीं। उसने उन्हें जल्दी से उठाकर मुट्ठी में दबा लिया और बाहर निकल आई।
आसमान अब भी रात की तरह काला था। सुबह पूरी तरह नहीं उतरी थी। पिछली शाम भरपूर नींद लेने के बावजूद वह खुद को बेहद तरोताज़ा महसूस कर रही थी। दूर-दूर तक टिमटिमाते सितारे साफ मौसम की गवाही दे रहे थे।
टेंट के बाहर बर्फ पर अफ़क और फ़रीद तैयार खड़े थे। अफ़क झुककर अपने जूतों के फीते बाँध रहा था। परी चुपचाप उसके पीछे गई और उसके रकसैक की जेब में बैटरियाँ डालकर चैन बंद कर दी।
“साब… एक बात कहूँ?”
फ़रीद ने सिर पर टोपी ठीक करते हुए धीमे स्वर में कहा,
“अगर मेरी मानो तो आगे मत बढ़ो। इस नॉर्थ-वेस्ट रिज को आज तक कोई सर नहीं कर पाया।”
अफ़क ने बेपरवाही से कंधे उचकाए।
“अफ़क अर्सलान कर लेगा। फिक्र मत करो।”
फ़रीद ने हैरानी से उसे देखा।
उसकी ज़िद और आत्मविश्वास दोनों खतरनाक हद तक मज़बूत थे।
“साब, मौसम बिगड़ जाएगा…”
“आसमान तो साफ है।”
“साब… उधर उत्तर दिशा में सितारों का वो झुंड देख रहे हो? मैंने अगस्त के महीने में ऐसा आसमान पहले कभी नहीं देखा। ये अच्छी निशानी नहीं है।”
“हमारे पास इतना ईंधन और गियर नहीं कि बैठे-बैठे मौसम सुधरने का इंतज़ार करते रहें।”
अफ़क ने अपने दस्ताने से बर्फ झाड़ी और सीधा खड़ा हो गया।
फ़रीद भी चुप हो गया।
परी अब तक खामोशी से सिर झुकाए खड़ी थी कि अचानक किसी नुकीली चीज़ ने उसके सिर के पीछे जोर से चोट मारी।
वह घबराकर पलटी।
तीन पहाड़ी कौवे उस पर झपटे थे।
उसने जल्दी से सिर पर हाथ मारा। कौवे फड़फड़ाते हुए दूर आसमान में उड़ गए।
वह सहमी हुई उँगलियों से अपने सिर का पिछला हिस्सा सहलाती रही, जहाँ उनकी चोंच लगी थी।
“क्या हुआ? तुम ठीक हो?”
अफ़क तुरंत उसके पास आ गया।
लेकिन वह अब भी उन काले कौवों को अजीब नज़रों से आसमान में उड़ते देख रही थी।
“परी… क्या हुआ?” उसने दोबारा पूछा।
वह जैसे किसी गहरे ख्याल से बाहर आई।
सिर झटककर बोली,
“कुछ नहीं… बस यूँ ही एक बात याद आ गई।”
लेकिन वह बात इतनी मामूली नहीं थी।
ठीक छह साल पहले…
जिस सुबह उसकी माँ की मौत हुई थी…
उस दिन भी जॉगिंग करते वक्त ऐसे ही पहाड़ी कौवों ने उस पर हमला किया था।
वही बेचैनी…
वही डर…
वही अनजाना अशुभ एहसास…
उसका दिल अचानक घबराने लगा।
तभी अर्सा कान पर सैटेलाइट फोन लगाए टेंट से बाहर निकली।
“हाँ… बिल्कुल। कैंप थ्री पहुँचकर बाबा से बात कर लूँगी।
ओके… टेक केयर।
लव यू। बाय।”
फोन बंद करके उसने मुस्कुराते हुए परी को देखा और हेलमेट पहनने लगी।
उसी पल परी का दिल चाहा कि वह भी पापा से बात कर ले…
लेकिन उसके पास उनका कोई नंबर नहीं था।
उसने चुपचाप फोन वापस बैग में रख दिया।
“हमें जल्दी से जल्दी कैंप थ्री पहुँचना होगा। आज रस्सियाँ एक-दूसरे से नहीं बाँधेंगे, वरना स्पीड कम हो जाएगी। चलो परी… क्या सोच रही हो?”
अफ़क चलते-चलते मुड़ा।
परी ने उलझी हुई निगाहों से उसे देखा।
“अफ़क… फ़रीद सही कह रहा है। आसमान में वो सितारों का झुंड… फिर ये कौवों का हमला… ये सब अच्छा नहीं लग रहा।”
वह हल्का सा मुस्कराया।
“क्या बात है? हैरी पॉटर बहुत पढ़ने लगी हो?”
“अफ़क, मैं मज़ाक नहीं कर रही। यह रास्ता अनक्लाइम्बेबल है। मौसम को देखो… कुछ ही घंटों में बर्फबारी शुरू हो सकती है।”
“मैं अंकारा से हंज़ा सिर्फ़ इसलिए नहीं आया कि बर्फ देखकर बेस कैंप में दुबक जाऊँ।”
“मुझे सच में डर लग रहा है। पता नहीं क्यों… लेकिन दिल कह रहा है हमें आगे नहीं बढ़ना चाहिए। आज दिन की शुरुआत ही अशुभ हुई है।”
उसने कुछ पल तक गंभीर नज़रों से उसका चेहरा देखा, फिर शांत स्वर में बोला—
“बौद्ध भिक्षु कहा करते थे कि सुबह इंसान को वहीं जाना चाहिए जहाँ उसका दिल खिंचता हो… क्योंकि वही जगह उसकी नियति होती है।
शेरपा लोग एवरेस्ट को ‘चोमोलुंग्मा’ कहते थे—
यानी ‘दुनिया की माँ देवी’।
कभी वे उसकी चोटी पर कदम रखना पाप समझते थे।
लेकिन तेनजिंग और एडमंड हिलेरी के बाद सब बदल गया।
तुम भी अब उन्हीं पुरानी मान्यताओं जैसी बातें कर रही हो।”
उसका अंदाज़ इतना दृढ़ और तर्कपूर्ण था कि परी कुछ कह न सकी।
हालाँकि उसके भीतर एक आवाज़ लगातार कह रही थी—
“मैं आगे नहीं जाना चाहती…”
“परी आंटी!”
अर्सा उत्साह से बोली,
“अगर हम यह रूट क्लाइम्ब कर गए, तो हमारा नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में आ जाएगा!”
अब पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई थी।
अगर वह रुकती…
तो शायद वे उसे डरपोक समझते।
हालाँकि वह किसी रिकॉर्ड के लिए यहाँ नहीं आई थी।
वह तो खुद को जीतने आई थी।
लेकिन रुकना…
उसकी फितरत के खिलाफ था।
अब अफ़क सबसे आगे चल रहा था।
परी उसके पैरों के निशानों पर अपने कदम रखती, चुपचाप उसके पीछे बढ़ रही थी।
उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं।
पैरों के नीचे नरम बर्फ़ के खिसकने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।
उसकी लगातार चुप्पी महसूस करते हुए अफ़क ने माहौल हल्का करने की कोशिश की।
“अर्सा! तुम्हारे नॉवल का नाम क्या होगा?
‘द राका पोशी क्लाइम्ब’?
या ‘राका पोशी: द अनक्लाइम्ब्ड’?
या फिर ‘इन टू द एयर ऑफ राका पोशी’?”
वह जानबूझकर मशहूर किताबों के नाम बिगाड़ रहा था।
अर्सा हँस पड़ी।
“नहीं… मेरे नॉवल का नाम थोड़ा अलग है।”
“तो क्या है?”
“जब छप जाएगा तब पढ़ लेना।”
अपने लेखन को लेकर वह हमेशा शर्मीली हो जाती थी।
परी अब भी सिर झुकाए आईस-एक्स बर्फ में गाड़ते हुए चढ़ती जा रही थी।
अफ़क ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी खाँसी अब कैसी है? कल रात नींद में भी खाँस रही थी।”
“अब ठीक हूँ।”
उसने छोटा सा जवाब दिया और फिर चुप हो गई।
“मौसम साफ हो तो राका पोशी की चोटी से मीलों दूर तक फैली पर्वत-श्रृंखलाएँ दिखाई देती हैं…”
वह अपने अंदाज़ में उसे समिट तक पहुँचने की हिम्मत दे रहा था।
राकापोशी की खामोशी
“अच्छा…”
“मैं तो यहाँ इसकी चोटी पर खड़े होकर कंकॉर्डिया और बलतूरो की चोटियों को देखना चाहता था।”
वह क्या बताती कि जिस पर्वत की खूबसूरती पर वह दीवानी थी, आज पहली बार उसी पहाड़ से उसे डर महसूस हो रहा था।
(हे भगवान… ब्रो सोता रहे। उसे कभी पता न चले कि कोई चुपके से उसकी सल्तनत में दाखिल हो रहा है।)
वह नीचे जमी बर्फ़ को ध्यान से देखती हुई बहुत सावधानी से कदम बढ़ा रही थी। अचानक उसका पैर बर्फ़ के एक टुकड़े पर पड़ा और अगले ही पल उसने तेजी से छलांग लगाकर कुछ फीट आगे कदम जमा लिए।
फिर पलटकर उसने उस जगह को गौर से देखा।
उसे शक हुआ—उस बर्फ़ के नीचे शायद कोई गहरी दरार… कोई छिपी हुई क्रेवास थी।
“क्या हुआ?”
अफ़क उससे कुछ कदम आगे था। उसे रुकते देख वह भी ठहर गया।
“कुछ नहीं… तुम एक बात बताओ।”
उसने सिर झटकते हुए दोबारा चलना शुरू कर दिया।
हवा अब तेज़ होने लगी थी और हल्की बर्फ़ भी गिरने लगी थी। उसने अपना हेडलैम्प ऑन कर लिया।
“राकापोशी की चोटी से कौन-कौन से पहाड़ दिखाई देते हैं?”
अफ़क ने कंधे उचकाए।
“बहुत सारे…”
“मसलन?”
“मसलन तिरिच मीर, शैगोरी… बलती ज़ुबान में शैगोरी का मतलब होता है—पहाड़ों का बादशाह।”
“और?”
“कराकोरम की दूसरी चोटियाँ…”
“और?”
“राकापोशी रेंज के बाकी पहाड़… हरामोश… डिरान…”
“और?”
“और नंगा पर्वत…”
“और?”
अब उसके लगातार “और?” से चिढ़कर वह बोला—
“फिक्र मत करो, तुम्हारा घर वहाँ से दिखाई नहीं देता।”
वह तुरंत मुँह फुलाकर बोली,
“हमेशा सड़े रहो।”
“अच्छा बाबा…”
वह मुस्कराते हुए पलटा।
फिर उसने दस्ताने वाला हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया।
परी ने भी आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।
अफ़क ने उसका हाथ पकड़कर उसे थोड़ा अपनी तरफ खींच लिया, सिर्फ़ इसलिए कि उसका संतुलन न बिगड़े।
परी हँस पड़ी।
हँसते हुए उसने सिर पीछे घुमाया। लगभग तीस मीटर पीछे अर्सा चली आ रही थी। उसका हेडलैम्प बंद था।
परी ने फिर गर्दन सामने कर ली।
अब वह और अफ़क हाथों में हाथ डाले राकापोशी की तरफ़ बढ़ रहे थे।
और तभी—
एक भयानक धमाका हुआ।
दोनों बुरी तरह चौंककर पलटे।
पीछे दूर तक बर्फ़ धँसी हुई थी… और बीच में एक बड़ा, काला गड्ढा बन चुका था।
पहले कुछ सेकंड तक उन्हें समझ ही नहीं आया।
और जब समझ आया तो—
“ओह खुदा…!”
अफ़क की आवाज़ काँप गई।
“अर्सा… किसी क्रेवास में गिर गई!”
परी घबराकर पीछे की ओर भागी।
“अर्सा…! अर्सा…!”
वह भागते हुए गड्ढे के किनारे पहुँची।
नीचे सिर्फ़ गहरा अंधेरा था।
“अर्सा! तुम ठीक हो?”
वह घुटनों के बल बैठकर नीचे झाँकने लगी।
लेकिन वहाँ सिर्फ़ मौत जैसा सन्नाटा था।
उसका दिल जैसे सीने में रुक गया।
अफ़क दौड़ता हुआ उसके पास आया।
फ़रीद कुछ कदम पीछे खड़ा था।
“अफ़क… कुछ करो… प्लीज़…!”
वह उसका बाजू पकड़कर बुरी तरह झिंझोड़ने लगी।
“वो गिर गई है… उसे बाहर निकालो… प्लीज़!”
उसके होंठों से टूटी-बिखरी बातें निकल रही थीं।
“मैं देखता हूँ…”
अफ़क ने तुरंत अपने हेलमेट पर लगे सर्च लाइट को गड्ढे में डाला।
फ़रीद ने भी टॉर्च नीचे की ओर कर दी।
अब दोनों लगातार उसे आवाज़ें दे रहे थे।
“अर्सा…!”
“क्या तुम हमें सुन सकती हो?”
“अर्सा जवाब दो!”
वे बार-बार पुकारते रहे।
हेडलैम्प की रोशनी बार-बार उस गहरी दरार में डालते रहे।
लेकिन कुछ मीटर नीचे जमी बर्फ़ के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
परी को महसूस हुआ जैसे उसके शरीर से जान निकल रही हो।
वह जवाब क्यों नहीं दे रही?
वह बोल क्यों नहीं रही?
शायद चोट लगी हो…
शायद बोल न पा रही हो…
शायद अभी ज़िंदा हो…
अफ़क उसे बाहर निकाल लेगा…
ज़रूर निकाल लेगा…
वह खुद को बार-बार यही दिलासा देती रही।
लेकिन उसका दिल बुरी तरह काँप रहा था।
“अर्सा… प्लीज़ जवाब दो… तुम ठीक हो ना?”
अफ़क लगातार चीख रहा था।
इतनी देर तक पुकारते-पुकारते उसका गला बैठ गया था। आवाज़ फटने लगी थी।
लेकिन पहाड़ की वह गहरी, अँधेरी दरार पूरी तरह खामोश थी।
न कोई कराह…
न कोई हलचल…
न ज़िंदगी की कोई आहट…
कुछ भी नहीं।
अब बर्फ़ तेज़ी से गिरने लगी थी।
हवा और सख्त हो चुकी थी।
अफ़क और फ़रीद झुक-झुककर नीचे देखते, उसे पुकारते रहे।
उनके हेलमेट, चेहरे और जैकेट पर बर्फ़ की सफेद परत जमने लगी थी—
लेकिन उस क्रेवास से अब भी कोई जवाब नहीं आया।
और परी को महसूस हुआ—
उसका दिल धीरे-धीरे डूबता जा रहा है…
बर्फ़ के नीचे दफ़्न चीख़
“अफ़क… प्लीज़ कुछ करो…”
उसका दम जैसे घुट रहा था।
अर्सा कब से उस गहरी दरार में… टनों बर्फ़ के नीचे दबी होगी…
उसका साँस भी ऐसे ही रुक रहा होगा…
सिर्फ़ इस कल्पना ने ही उसकी रूह तक जमा दी।
अफ़क और फ़रीद आखिरकार थककर गड्ढे के किनारे बैठ गए।
उनकी खामोश शक्लें परी को और डरा रही थीं।
“तुम दोनों ऐसे क्यों बैठे हो? उसे बाहर क्यों नहीं निकालते?”
वह चीख पड़ी।
“अफ़क, जवाब दो! मैं तुमसे कुछ पूछ रही हूँ!”
उसने उसका कंधा जोर से झिंझोड़ दिया।
अफ़क ने धीरे से सिर उठाया।
वह अपने ग्लेशियर गॉगल्स उतार चुका था।
उसके बालों, पलकों, नाक और हल्की बढ़ी दाढ़ी में बर्फ़ के छोटे-छोटे कण अटके हुए थे।
उसने बेहद धीमे स्वर में इंकार में सिर हिलाया।
“मुझे नहीं लगता… अब कोई उम्मीद बची है…”
उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
“शायद… वह अब तक…”
वह वाक्य पूरा भी न कर सका।
लेकिन परी समझ गई।
उसने झटके से उसका कंधा छोड़ दिया।
“नहीं… नहीं… तुम गलत कह रहे हो…”
वह लगातार सिर हिलाती जा रही थी।
“ऐसा कैसे हो सकता है? तुम… तुम ठीक से देखो अफ़क! वो अंदर ही होगी… उसका साँस रुक रहा होगा… वो मदद के लिए पुकार रही होगी… हवाओं की आवाज़ में उसकी आवाज़ हम तक नहीं पहुँच रही होगी… तुम… तुम दोबारा देखो…”
वह किसी बुझती हुई उम्मीद को पकड़ने की कोशिश कर रही थी।
अफ़क ने बेहद थके हुए अंदाज़ में हाथ गिरा दिए।
“वो नहीं है, परी…”
उसकी आवाज़ किसी हारे हुए सिपाही जैसी लग रही थी।
“अगर वो ज़िंदा होती… तो जवाब देती…”
फिर उसने दोनों हाथों में सिर छुपा लिया।
“ओह खुदा…”
वह खुद भी यकीन नहीं कर पा रहा था।
परी ने दहशत में सिर झटका।
“नहीं अफ़क… तुम…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अफ़क क्या कह रहा है।
उसका दिमाग़ जैसे सुन्न पड़ चुका था।
अर्सा कैसे मर सकती थी?
अभी…
अभी तो वह उनके पीछे चल रही थी…
अभी कुछ मिनट पहले ही उसने उसे बर्फ़ पर कदम रखते देखा था…
वह बिल्कुल ठीक थी…
“तुम… तुम उसे क्यों…? वो… नहीं…”
उसका सिर घूमने लगा।
चाँदनी में डूबी हरामोश और डिरान की चोटियाँ उसे गोल-गोल घूमती हुई महसूस होने लगीं।
आवाज़ें दूर चली गईं।
सब कुछ किसी डरावने सपने जैसा लग रहा था।
फिर उसने देखा—
अफ़क उठ खड़ा हुआ था।
फ़रीद उसे रोक रहा था, लेकिन वह नहीं रुका।
उसने अपनी हार्नेस के साथ रस्सी बाँधी और धीरे-धीरे उस गहरे क्रेवास में उतरने लगा।
रस्सी का दूसरा सिरा फ़रीद के हाथ में था।
वह बहुत सावधानी से उसे नीचे छोड़ रहा था।
कुछ देर बाद अफ़क पूरी तरह अंधेरे में गायब हो गया।
फिर नीचे से उसकी आवाज़ आई—
“पाँच मीटर तक खोदा है… वो यहाँ नहीं है…”
उसकी आवाज़ परी को अजनबी लगी।
उसका दिमाग़ अब भी सुन्न था।
अर्सा कैसे मर सकती थी?
एक पल पहले तक वह उनके पीछे चल रही थी…
फिर अचानक उसका पैर बर्फ़ की उस परत पर पड़ा जिसके नीचे गहरी दरार छिपी थी…
ग्लेशियर टूट गया…
अर्सा नीचे गिर गई…
हज़ारों मन बर्फ़ उसके ऊपर गिरती चली गई…
उसका साँस रुक गया…
और वह बर्फ़ के नीचे दबकर मर गई…
बस…
इतना ही वक़्त लगा था।
उसके सीने में कहीं गहरे बहुत तीखा दर्द उठा।
“ब्रो” जाग चुका था
दर्द बढ़ा तो उसने सिर उठाकर आसमान की ओर देखा।
आकाश लगातार महीन बर्फ़ बरसा रहा था।
यहाँ से चोटी दिखाई नहीं देती थी…
लेकिन उसे यकीन था कि वह बादलों के घेरे में खामोश चमक रही होगी।
रात के इस पहर…
“ब्रो” जाग चुका था।
और उसे पता चल गया था कि कोई दबे कदमों उसकी सल्तनत में घुस आया है।
“तुम… तुम…”
परी लड़खड़ाते हुए उठी और अफ़क की जैकेट का कॉलर पकड़कर जोर से अपनी ओर खींच लिया।
“मैंने तुमसे कहा था ना कि वापस चलते हैं! लेकिन तुम नहीं माने…”
उसकी आवाज़ दर्द और गुस्से से काँप रही थी।
“तुम्हें हर हाल में ऊपर जाना था… और वो… वो मर गई अफ़क!”
उसकी आँखों से आँसू लगातार गिर रहे थे।
“क्या अब तुम्हारा वर्ल्ड रिकॉर्ड बन गया? बोलो…!”
कुछ देर पहले ही अर्सा ने अपनी माँ से बात की थी…
अपने पिता से वह कैंप थ्री पहुँचकर बात करने वाली थी…
उसका पिता इस वक़्त उसकी कॉल का इंतज़ार कर रहा होगा…
“उसे बाहर निकालो अफ़क… खुदा के लिए उसे बाहर निकालो…”
वह उसे बुरी तरह झिंझोड़ रही थी।
“उसके बाबा उसकी आवाज़ का इंतज़ार कर रहे होंगे…”
और फिर अचानक—
वह उसके कंधे से लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
अफ़क चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा।
वह इतना भी न कह सका कि अर्सा खुद भी ऊपर आना चाहती थी।
“वो… वो मेरी छोटी बहन जैसी थी अफ़क…”
वह बच्चों की तरह बिलख रही थी।
“इतनी टैलेंटेड… इतनी समझदार… और इस बेरहम पहाड़ ने उसे हमसे छीन लिया…”
अफ़क ने धीरे से उसके कंधों के चारों ओर हाथ रखा और बहुत हल्के से उसका सिर थपथपाया।
“रिलैक्स, परीशे… रिलैक्स…”
लेकिन वह कैसे शांत होती?
उसने पहली बार अपनी आँखों के सामने किसी दोस्त को बर्फ़ में दफ़्न होते देखा था।
वह लगातार रोती रही।
बर्फ़ उन दोनों पर गिरती रही।
फ़रीद थोड़ी दूरी पर चुपचाप सिर झुकाए बैठा था।
“अफ़क… उसे बाहर निकालो…”
वह रोते हुए कह रही थी।
“मुझे उसे आखिरी बार देखना है… खुदा के लिए… हम अर्सा के साथ आए थे…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“हमें उसके साथ ही वापस जाना है…”
रिलैक्स परी… अब कुछ नहीं हो सकता…
“रिलैक्स परी… अब कुछ नहीं हो सकता… मैं उसकी बॉडी लाने गया था, मगर वो कहीं भी नहीं है… बहुत नीचे चली गई है…”
अफ़ाक उसे शांत कराने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह खुद भी भीतर से टूटा हुआ था। उसके चेहरे पर बर्फ जम चुकी थी, आवाज़ थकी हुई थी, फिर भी जाने कैसे वह खुद को संभाले खड़ा था।
उसने कंधे के पीछे हाथ ले जाकर ट्रांसीवर निकाला और बटन दबाया।
“कम ऑन बेस कैंप…”
कुछ सेकंड तक सिर्फ खरखराहट सुनाई देती रही, फिर तुर्की में किसी की घबराई हुई आवाज़ उभरी।
“मेरी बात ध्यान से सुनो अहमद… अर्सा बुख़ारी अब नहीं रही… मैं दोबारा कह रहा हूँ, अर्सा एक क्रेवास में गिर गई है… उसकी मौत की पुष्टि हो चुकी है… लेकिन उसकी बॉडी निकालना लगभग नामुमकिन है… हमें तुरंत कैंप थ्री तक पहुँचना होगा… यहाँ मौसम बिगड़ रहा है… हम रुक नहीं सकते… डू यू कॉपी?”
कुछ पल सन्नाटा रहा, फिर टूटी हुई आवाज़ आई—
“ओह गॉड… यस… आई कॉपी…”
अफ़ाक ने ट्रांसीवर बंद कर बैग में रख दिया।
परीशे अब भी उसी तरह रो रही थी। उसने अफ़ाक का बाजू कसकर पकड़ रखा था, जैसे कोई बच्चा भीड़ में खो जाने के डर से किसी अपने का हाथ थाम लेता है। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। अफ़ाक ने बहुत हल्के से उसके सिर पर हाथ फेरा।
“श्श्श… अब रोना बंद करो… खुद को संभालो… हमें कैंप थ्री पहुँचना है…”
“नहीं अफ़ाक… उसकी बॉडी…”
इतना कहना भी उसके लिए मुश्किल था।
“उसे अभी निकालना बहुत कठिन है… हमारे पास ज्यादा रस्सी भी नहीं बची… सारी रस्सियाँ अर्सा के पास थीं… वापसी में कोशिश करेंगे… मैं वादा करता हूँ…”
उसने अपने भारी दस्तानों से उसके चेहरे पर जमी बर्फ और आँसू साफ किए।
“तुम… तुम बाद में उसे निकालोगे ना?” उसकी भीगी आँखों में बुझती हुई उम्मीद की हल्की सी चमक उभरी।
“हाँ… वापसी पर… ठीक है? अब चलो…”
“मुझमें हिम्मत नहीं बची…” उसकी टाँगें जवाब दे रही थीं।
“हिम्मत करो परी… अपने लिए नहीं… तो मेरे लिए…”
अफ़ाक ने दोनों कंधों से उसे थाम लिया। परीशे ने भी उसका बाजू मजबूती से पकड़ लिया और लगभग अपना पूरा भार उसी पर डाल दिया। फिर वह बहुत धीरे-धीरे उसके साथ आगे बढ़ने लगी।
उसकी आँखों से आँसू लगातार गिरकर गर्दन तक बह रहे थे।
उसने कभी सोचा भी नहीं था कि जिंदगी में ऐसा दिन आएगा, जब उसे अपनी सबसे करीबी दोस्त को बर्फ के नीचे छोड़कर आगे बढ़ना पड़ेगा। उस गहरे शगाफ़ के किनारे से पलटना, और फिर गिरती बर्फ़ में कैंप थ्री की तरफ कदम बढ़ाना… उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था।
उसके कदम बार-बार लड़खड़ा रहे थे। अगर अफ़ाक उसे सहारा न देता, तो शायद वह वहीं रास्ता भटक कर गिर पड़ती… या किसी और दरार में समा जाती।
कैंप थ्री की रात
उस रात कैंप थ्री में दोनों घंटों तक खामोश बैठे रहे।
बाहर हवा लगातार टेंट की दीवारों से टकरा रही थी। बर्फ़ के कण गॉर-टेक्स पर गिरकर अजीब सी आवाज़ें पैदा कर रहे थे। लेकिन उस टेंट के अंदर जो सन्नाटा था, वह इन आवाज़ों से कहीं ज्यादा भारी था।
जब चुप्पी असहनीय होने लगी, तो उन्होंने बातें करनी शुरू कीं।
तैय्यब एर्दोगान…
इराक युद्ध…
तुर्की की सेना…
नाटो…
एससीओ ब्लॉक…
वे दुनिया की हर बात कर रहे थे… सिर्फ उस एक बात को छोड़कर।
वे दोनों जानते थे कि अगर अर्सा का नाम ज़ुबान पर आ गया, तो शायद वे टूट जाएँगे।
अहमद की पत्नी सलमा इंग्लैंड में अर्सा के माता-पिता को खबर दे चुकी थी। परीशे पूरी रात यही सोचती रही कि उस खबर को सुनकर उन पर क्या गुज़री होगी… उन्होंने अपनी बेटी की मौत की बात कैसे सुनी होगी…
रात गहरी होती गई।
उसके स्लीपिंग बैग के पास अब बहुत खाली जगह थी।
अफ़ाक अपने टेंट में जा चुका था।
परीशे करवट बदलती रही। हर थोड़ी देर बाद उसे अर्सा की आवाज़ याद आती… उसकी हँसी… उसके सवाल… उसके नोट्स… और फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगते।
उसे लग रहा था जैसे वह दुनिया में बिल्कुल अकेली रह गई हो।
और फिर अचानक उसके मन में यह ख्याल आया कि शायद अर्सा उससे भी ज्यादा अकेली होगी… उस अंधेरी, बर्फ से भरी दरार के भीतर… जहाँ अब सिर्फ सन्नाटा था।
वह उस एहसास को सह नहीं पा रही थी।
कुछ देर बाद उसने अपना बैग खोला और अर्सा के कागज़ बाहर निकाले।
वे पन्ने अंग्रेज़ी में काली स्याही से लिखे गए थे। लिखावट तेज़ और खुरदरी थी। कई जगह शब्द काटे गए थे, कई लाइनें अधूरी थीं… मगर वह उन्हें आसानी से पढ़ सकती थी।
पहले पन्ने पर मोटे मार्कर से लिखा था—
“Karakoram’s Taj Mahal”
हंज़ा के लोग राकापोशी को “हंज़ाकुश का ताजमहल” या “काराकोरम का ताजमहल” कहा करते थे। उनका मानना था कि बर्फ से ढकी उसकी चमकती हुई दीवार, आगरा के ताजमहल की तरह सफेद और खूबसूरत दिखाई देती है।
लेकिन परीशे इससे सहमत नहीं थी।
उसे हमेशा लगता था कि राकापोशी की चमकती दीवार… ताजमहल से कहीं ज्यादा सफेद… ज्यादा खूबसूरत… और कहीं ज्यादा रहस्यमयी है।
उसने गहरी साँस ली…
और फिर उस अधूरे उपन्यास को पढ़ना शुरू कर दिया।
मंगलवार, 16 अगस्त 2005
“साहब… ऊपर पूरा स्नोफॉल जमा है।”
वे दोनों तंबू के बाहर खामोशी से बैठे थे, तभी फरीद उनके पास आकर रुक गया। आज भी वे आगे नहीं बढ़े थे। कल की घटना ने सबके भीतर ऐसा खालीपन छोड़ दिया था, जिसे भरने के लिए कम-से-कम एक दिन की मोहलत चाहिए थी। फरीद सुबह कुछ दूरी तक जाकर रस्सियाँ फिक्स कर आया था।
“फिर?”
अफ़ाक ने उसे सवालिया नज़रों से देखा।
“तुम मानो या मत मानो… ऊपर बहुत ताज़ी बर्फ गिरी है। पूरा ग्लेशियर अस्थिर हो चुका है। वह किसी भी वक्त टूट सकता है। अगर स्नोफॉल आया… तो तुम भी मरोगे और हम भी। इसलिए हम पहले ही बता रहे हैं—सुबह होते ही हम वापस उतर जाएंगे।”
“लेकिन फरीद… तुमने तो कैंप फोर तक साथ चलने का कहा था।”
“साहब, तुम चाहो तो कल खुद चले जाना… मगर हम नहीं जाएंगे।”
वह उसी जिद्दी अंदाज़ में बोला, “हम सिर्फ तुम्हें आगाह कर रहे हैं।”
“फरीद, देखो…”
परीशे ने उसे समझाने की कोशिश की, “हम भी तो ऊपर जा रहे हैं… हम सब साथ जा रहे हैं।”
फरीद ने गहरी साँस ली और सिर हिलाया।
“बाजी… तुम लोग पागल हो चुके हो। मगर हम अभी इतने पागल नहीं हुए। तुम्हारे पास पैसा है। अगर तुम मर भी गए तो तुम्हारे घर वाले भूखे नहीं मरेंगे… लेकिन हमारे पास क्या है? हमारे बच्चों के लिए कोई ज़मीन, कोई सहारा नहीं छोड़ा गया। खुदा के लिए हमारे हाल पर रहम करो। बाजी, मेरी मानो… ऊपर जाकर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। तुम लोग भी वापस चलो।”
परीशे और अफ़ाक ने एक-दूसरे की तरफ देखा, फिर दोनों ने चुपचाप कंधे उचका दिए।
“तुम्हारी मर्ज़ी…”
फरीद ने नाखुशी से दूसरी तरफ देखा। उसके माथे पर गहरी शिकनें उभर आई थीं।
अफ़ाक अचानक बड़बड़ाया—
“मैंने नंगा पर्वत का सोलो क्लाइम्ब किया था… तब तो नहीं मरा था मैं। पोर्टर के बिना भी चढ़ा था… सिर्फ कुछ लोगों को गलत साबित करने के लिए। ठीक ही कहती थी वह औरत… तुम पोर्टर्स के बारे में…”
“साहब, वह औरत झूठ बोलती थी।”
फरीद ने तुरंत जवाब दिया। फिर परीशे की उलझी हुई शक्ल देखकर समझाने लगा—
“बाजी, कुछ साल पहले एक विदेशी औरत गाशरब्रूम टू चढ़ने आई थी। हमारे मामू का लड़का उसके साथ पोर्टर था। वही उसे ऊपर तक लेकर गया था। मगर नीचे उतरकर उसने अखबार वालों से कहा कि उसने पूरा क्लाइम्ब अकेले किया… उसका पोर्टर बीच में ही उसे छोड़ गया था।”
फरीद की आवाज़ में कड़वाहट उतर आई।
“हमारा मामू का लड़का गरीब आदमी था… चुपचाप सुनता रहा। कुछ नहीं बोला। मगर साहब… वह औरत झूठ बोलती थी। पहाड़ सब देखता है। पहाड़ों की भी अपनी अदालत होती है।”
वह कुछ पल रुका, फिर धीमे मगर भारी स्वर में बोला—
“अगले साल वह फिर गाशरब्रूम टू चढ़ने आई… मगर इस बार पहाड़ ने उसे वापस नहीं जाने दिया। उसकी लाश तक नहीं मिली।”
कुछ देर सन्नाटा छाया रहा।
“हाँ… ठीक है… जाओ फिर।”
अफ़ाक अपने पुराने, रूखे लहजे में बोला।
“साहब, हमें सिर्फ कैंप तक आने के पैसे मिले थे। वह सब खर्च हो चुके हैं। अब आगे तुम जानो… तुम्हारा काम जाने।”
फरीद इतना कहकर चुप हो गया।
अफ़ाक भी अब खामोश था।
गुस्सा सिर्फ इस बात का नहीं था कि फरीद उन्हें छोड़कर जाना चाहता था… असली वजह कुछ और थी।
शायद लगातार बढ़ता दबाव…
शायद अर्सा की मौत…
या शायद वह डर, जिसे वह खुद भी मानने को तैयार नहीं था।
बुधवार, 17 अगस्त 2005
सुबह से ही मौसम बेहद खराब था… और मौसम से कहीं ज़्यादा खराब अफ़ाक का मूड।
वह तंबू के भीतर मैट पर सीधा लेटा हुआ था। एक हाथ माथे पर रखे, बिना पलक झपकाए तंबू की छत को देख रहा था।
शेड्यूल के मुताबिक उन्हें अब तक कैंप फोर पहुँच जाना चाहिए था… मगर क़राकोरम और हिमालय इंसानों के बनाए हुए शेड्यूल नहीं मानते।
तंबू के बाहर तूफ़ानी हवाएँ चल रही थीं। बर्फीले झोंकों से तंबू बुरी तरह फड़फड़ा रहा था। कई जगहों से ठंडी हवा भीतर घुस रही थी, जो उनके शरीरों में सिहरन उतार रही थी। ऊपर जमा होती बर्फ़ के दबाव से तंबू की दीवारें अंदर की ओर झुकती जा रही थीं।
कुछ देर की खामोशी के बाद अफ़ाक ने यूँ ही कहा—
“फ़रीद सुबह अँधेरे में ही चला गया… बिना कुछ बोले।”
परीशे ने उसकी ओर देखा।
“तुम रोक भी लेते… तो शायद रुक जाता।”
अफ़ाक उसी तरह छत घूरता रहा।
“नहीं… अगर जाना था, तो जाना ही था।”
कुछ पल सन्नाटा रहा। बाहर हवा और तेज़ हो गई थी।
परीशे ने धीमे स्वर में कहा—
“शायद फ़रीद ठीक कहता था अफ़ाक… हम दोनों पागल हैं। सारे पर्वतारोही पागल होते हैं। लोग घरों की शांति छोड़कर इन बर्फीली मौतों में चले आते हैं… और आख़िर में मर जाते हैं।”
अफ़ाक हल्का सा मुस्कुराया, मगर आँखों में थकान थी।
“लोग वैसे भी मर जाते हैं… कोई लिफ्ट में फँसकर दम घुटने से, कोई सड़क हादसे में, कोई बम धमाके में। मौत को अगर आना हो, तो वह कहीं भी आ जाती है।”
फिर उसने गर्दन मोड़कर उसे देखा।
“तुम मुसलमान नहीं हो क्या? ईमान नहीं कि इंसान जहाँ भी हो… मौत उसे ढूँढ ही लेती है?”
परीशे ने थककर तंबू की दीवार से सिर टिका दिया। दूसरी तरफ बर्फ और पानी जमा हो रहे थे। नमी धीरे-धीरे अंदर तक पहुँच रही थी और उनका सामान भीग चुका था।
कुछ देर बाद उसने पूछा—
“फिर भी… आखिर मिलता क्या है पहाड़ों से?”
अफ़ाक की आँखों में अचानक चिड़चिड़ापन उतर आया।
“यह सवाल हमेशा वही लोग पूछते हैं… जो सुबह एक घंटा पार्क में चल भी नहीं सकते। ‘पहाड़ों में क्या रखा है?’—यह उन्हीं लोगों की बात है जिनके अंगूर हमेशा खट्टे होते हैं।”
परीशे ने हल्का सा तंज़ किया—
“फिर भी ज़िंदगी सामान्य तरीके से भी तो जी जा सकती है।”
अफ़ाक हल्का सा उठकर बैठ गया।
“नॉर्मल लाइफ?”
वह कड़वाहट से हँसा।
“क्या होती है नॉर्मल लाइफ? घंटों फोन पर रिश्तेदारों की बुराई करना? हर हफ्ते नया फैशन अपनाना? फिल्मों के नकली हीरो को भगवान बना लेना? रात-रात भर सस्ते प्रेम उपन्यास पढ़ना? ऑफिस में बॉस के सामने सहकर्मियों की चुगली करना?”
वह कुछ पल रुका, फिर धीमे मगर भारी स्वर में बोला—
“अगर यही नॉर्मल ज़िंदगी है… तो पर्वतारोहियों की पागल ज़िंदगी उससे कहीं बेहतर है।”
तंबू के भीतर फिर कुछ देर खामोशी रही।
बाहर बर्फ़ अब और तेज़ गिर रही थी।
अफ़ाक ने दीवार पर पड़ती बर्फ़ की थपकियों को सुनते हुए कहा—
“जानती हो परी… मुझे नहीं पता लोग पहाड़ क्यों चढ़ते हैं। मगर मुझे पहाड़ों में सुकून मिलता है। यहाँ एक अजीब सी शांति है… जो दुनिया में कहीं नहीं।”
परीशे उसे सुनती रही।
“लोग पूछते हैं कि किताबें क्यों पढ़ते हो…? ज्ञान के लिए। ठीक उसी तरह पहाड़ इंसान को प्रकृति का वह ज्ञान देते हैं, जो किसी स्कूल या यूनिवर्सिटी में नहीं मिलता।”
उसकी आवाज़ अब धीमी और गंभीर हो गई थी।
“तुम पहाड़ को सिर्फ देखते नहीं… महसूस करते हो। और जो लोग पर्वतारोहण नहीं करते, उन्हें यह बात अजीब लगती है कि हम पहाड़ों की इज़्ज़त करते हैं… उनसे मोहब्बत करते हैं… उन्हें किसी ज़िंदा चीज़ की तरह मानते हैं।”
परीशे ने दीवार से रिसती पानी की बूंदों को देखते हुए तंज़ किया—
“और वे बेहद क्रूर भी होते हैं…”
अफ़ाक ने बिना इंकार किए सिर हिलाया।
“हाँ… बेहद क्रूर।”
फिर बहुत धीमे स्वर में बोला—
“लेकिन मैं हिमालय से जुड़ा हुआ हूँ, परी… जैसे अपने घर से… अपनी माँ से… वैसे ही इन पहाड़ों से भी।”
परीशे ने उसकी तरफ देखा।
“क्या तुम्हें सच में लगता है… कि हम यहाँ से ज़िंदा लौट पाएँगे?”
अफ़ाक कुछ पल चुप रहा।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—
“पर्वतारोहण में चोटी तक पहुँचना असली जीत नहीं होती… असली जीत तो ज़िंदा वापस लौटना है। समिट तो बस बोनस है।”
“फिर भी…”
उसने धीमे से पूछा—
“क्या तुम वापस लौटना चाहोगे?”
अफ़ाक ने बिना झिझक जवाब दिया—
“अगर तुम्हें वापस जाना है… तो चली जाओ। लेकिन मैं चोटी पर कदम रखे बिना वापस नहीं लौटूँगा।”
तंबू की दीवार के उस पार बर्फ़ लगातार जमती जा रही थी…
और भीतर बैठा वह आदमी भी शायद किसी ज़िद में जम चुका था।
अफ़ाक की ज़िद
“अफ़ाक… प्लीज़… वापस चलो। इस चोटी को अजेय ही रहने दो।”
अफ़ाक ने उसकी बात अनसुनी करते हुए छोटा-सा बेलचा उठाया और तंबू से बाहर निकल गया।
परीशे जानती थी — वह तब तक लौटने वाला नहीं था, जब तक कोंकोर्डिया और बलतूरो की चोटियों को उस ऊँचाई से अपनी आँखों से न देख ले।
न वह उसे अकेले छोड़कर नीचे उतर सकती थी… और न ही अब उसके साथ आगे बढ़ने का साहस जुटा पा रही थी।
दुनिया में कोई भी इंसान मुकम्मल नहीं होता। अफ़ाक अरसलान में भी एक कमी थी — ज़िद, हठ और अपने फैसलों पर हद से ज्यादा भरोसा।
शायद हर पर्वतारोही में यह दीवानगी होती है।
वे मौसम की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, क्योंकि मंज़िल उनसे कुछ ही दूर होती है।
इतनी लंबी यात्रा के बाद लौट जाना उन्हें हार जैसा महसूस होता है।
सुबह ही अफ़ाक ने कहा था—
“इतनी दूर आकर लौटना ऐसा है जैसे कोई सौ मीटर की दौड़ में नब्बे मीटर तक भागकर रुक जाए।”
परीशे को उसी पल महसूस हुआ था कि अफ़ाक ने पर्वतारोहण और दौड़ के बीच का फर्क मिटा दिया है।
दौड़ में हार सिर्फ हार होती है…
लेकिन पहाड़ों में एक गलत फैसला जान भी ले सकता है।
गुरुवार, 18 अगस्त 2005
कैंप फोर — मौत की सरहद
कैंप फोर समुद्र तल से लगभग साढ़े सात हजार मीटर की ऊँचाई पर था।
मौसम पहले से बेहतर था, मगर बर्फ़बारी अब भी जारी थी।
पिछली रात आए तूफ़ान ने रस्सियों को बुरी तरह उलझा दिया था।
उन्हें ठीक करने में काफी समय निकल गया।
रस्सियों का शुरुआती हिस्सा कैंप फोर से थोड़ा नीचे था।
दोनों बिना कुछ बोले धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे।
जब परीशे ने जूमर ऊपर सरकाया, रस्सी अचानक अटक गई।
वह नीचे उतरी, दस्ताने हटाकर गाँठ खोली और फिर चढ़ाई शुरू की।
उसकी एक छोटी-सी गलती ने बीस मिनट बर्बाद कर दिए, मगर अफ़ाक ने कुछ नहीं कहा।
वह बस चुपचाप उसे देखता रहा।
अब वे “डेथ ज़ोन” में थे।
एक ऐसी ऊँचाई, जहाँ हवा में ऑक्सीजन इतनी कम होती है कि इंसान का शरीर धीरे-धीरे जवाब देने लगता है।
हर साँस फेफड़ों पर बोझ बन चुकी थी।
परीशे पूरा मुँह खोलकर साँस ले रही थी।
उनसे कुछ सौ मीटर ऊपर चोटी दिखाई दे रही थी—
इतनी करीब कि लगता था हाथ बढ़ाकर छू लेंगे…
लेकिन वह दूरी धोखा थी।
वह धीरे-धीरे आइस-एक्स गाड़ती आगे बढ़ रही थी।
शरीर जवाब दे रहा था।
कुछ देर बाद वह एक विशाल बर्फीले तूदे के पीछे रुक गई और भारी साँसों को संभालने लगी।
अफ़ाक उससे लगभग सौ मीटर दूर दाईं ओर था।
तभी—
क्र्र्राआक…!
बर्फ़ टूटने की लंबी, भयावह आवाज़ पहाड़ों में गूँज उठी।
परीशे ने घबराकर ऊपर देखा।
उसके सिर से कई मीटर ऊपर बर्फ़ में एक लंबा चीरा बन चुका था।
ऐसा लग रहा था मानो किसी ने सफ़ेद चादर को तेज़ कैंची से काट दिया हो।
अगले ही पल बर्फ़ की भारी परतें टूटकर नीचे गिरने लगीं।
सफ़ेद धूल का विशाल बादल हवा में फैल गया।
परीशे का दिल रुक गया।
वह जिस जगह खड़ी थी, वहाँ बड़ा तूदे उसे कुछ हद तक बचा रहा था…
लेकिन अफ़ाक?
“अफ़ाक…!”
वह पूरी ताकत से चीखी—
“बर्फ़शार आ रहा है… खुद को बचाओ!”
अफ़ाक ने घबराकर ऊपर देखा।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
सफ़ेद धूल का विशाल गुबार उसकी तरफ़ टूट पड़ा…
और अगले ही पल वह पूरी तरह ओझल हो गया।
परीशे ने काँपते हाथों से आइस-एक्स को और कसकर पकड़ लिया।
उसका पूरा शरीर डर से काँप रहा था।
कुछ देर बाद बर्फ़ की धूल धीरे-धीरे बैठने लगी।
उसने काँपती पलकों से आसपास देखा।
सब कुछ वैसा ही था।
राका पोशी पहले की तरह शांत और सुंदर खड़ा था।
दूर तक फैली सफ़ेद बर्फ़ अब भी उतनी ही चमक रही थी।
बस…
एक फर्क था।
दाईं तरफ़ अब अफ़ाक दिखाई नहीं दे रहा था।
“अफ़ाक…!”
उसकी आवाज़ पहाड़ों से टकराकर दूर आसमान में खो गई।
कोई जवाब नहीं आया।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
दूर दमानी की चोटियाँ खामोशी से खड़ी थीं।
बहुत दूर शाहकोरी बर्फ़ में दबा दिखाई दे रहा था।
और क्षितिज पर नंगा पर्वत की खूंखार चोटी सफ़ेद धुंध में डूबी हुई थी।
उसे लगा जैसे सारे पहाड़ उसे देख रहे हों…
उसकी बेबसी पर हँस रहे हों।
मानो कह रहे हों—
“तुम इंसान हमेशा भूल जाते हो…
पहाड़ जीतने की चीज़ नहीं होते।”
सफ़ेद ख़ामोशी
वह सचमुच अकेली रह गई थी।
चारों तरफ़ सिर्फ़ पहाड़ थे—
विशाल, खामोश और डरावने।
इतने ऊँचे कि लगता था आसमान खुद झुककर उनकी पेशानी चूम रहा हो।
“अफ़ाक… तुम कहाँ हो?”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“कुछ तो बोलो… खुदा के लिए जवाब दो… वरना मेरा दिल फट जाएगा…”
और सचमुच उसका दिल टूटने की हद तक पहुँच चुका था।
कुछ ही पलों पहले यहाँ सब सामान्य था।
फिर हजारों टन बर्फ़ पहाड़ से टूटी और सब कुछ निगल गई।
क्या अफ़ाक उस बर्फ़ में कहीं दब चुका था?
या किसी चट्टान से चिपका अभी भी ज़िंदा था?
उसने उस जगह को देखा जहाँ थोड़ी देर पहले अफ़ाक खड़ा था।
अब वहाँ सिर्फ़ सफ़ेद बर्फ़ थी।
रस्सी का एक टूटा सिरा दिखाई दे रहा था।
उसका दिल डूब गया।
इसका मतलब था—
अफ़ाक अब उस रस्सी पर नहीं था।
“नहीं…”
उसने खुद से कहा,
“वो यहीं कहीं होगा… मैं उसे ढूँढ़ लूँगी… हर हाल में…”
मौत की ढलान
वह रस्सी के सहारे नीचे उतरने लगी।
ऊँचाई इतनी खतरनाक थी कि ऐसा लगता था जैसे किसी ऊँची इमारत की दीवार से बाहर लटककर नीचे उतरा जा रहा हो।
हर कदम संभालकर रखना पड़ रहा था।
उसके हाथ सुन्न हो चुके थे।
साँसें टूट रही थीं।
लेकिन उसके अंदर अब सिर्फ़ एक ही ज़िद बची थी—
अफ़ाक को ढूँढ़ना।
अगर पूरी राका पोशी की बर्फ़ खोदनी पड़ी…
तो भी वह खोदेगी।
मुश्किल से बीस मीटर नीचे उतरने के बाद उसकी साँसें बेकाबू हो गईं।
तभी उसे पास बर्फ़ में स्लेटी रंग की हल्की-सी झलक दिखाई दी।
उसका दिल उछल पड़ा।
वह रस्सी से खुद को अलग करके उस तरफ़ भागी।
घुटनों तक धँसती बर्फ़ में गिरती-पड़ती आगे बढ़ी।
दस्तानों से तेज़ी से बर्फ़ हटाने लगी।
लेकिन—
वह सिर्फ़ एक पत्थर था।
उसकी उम्मीद उसी पल टूट गई।
उसने गर्दन उठाकर पूरी ताकत से फिर पुकारा—
“अफ़ाक… तुम कहाँ हो?”
लेकिन हवा उसके खिलाफ़ थी।
आवाज़ ऊपर से नीचे जा रही थी।
अगर अफ़ाक नीचे कहीं दबा भी था…
तो शायद उसकी आवाज़ वहाँ तक पहुँच रही होगी…
मगर उसका जवाब वापस नहीं आ सकता था।
यह एहसास उसे भीतर तक तोड़ गया।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“नहीं… वो यहीं है… मैं उसे ढूँढ़ लूँगी…”
वह फिर रस्सी से जुड़ी और नीचे उतरती गई।
पहाड़ों का उपहास
हिमालय की चोटियाँ उसकी बड़बड़ाहट सुन रही थीं।
और उसे महसूस हुआ—
मानो वे उस पर हँस रही हों।
“मैं उसे बर्फ़ में दफ़्न नहीं होने दूँगी…”
वह रोते हुए चिल्लाई।
“मैं उसे इन ज़ालिम पहाड़ों से दूर ले जाऊँगी… सुन रहे हो तुम?”
लेकिन पहाड़ खामोश रहे।
उनकी सफ़ेद ख़ामोशी और भी डरावनी थी।
वह लगातार नीचे उतरती रही।
करीब चालीस मीटर नीचे पहुँचकर उसने रस्सी छोड़ी।
अब उसे अंदाज़े से उस दिशा में जाना था जहाँ अफ़ाक आख़िरी बार दिखाई दिया था।
वह घुटनों तक धँसती बर्फ़ में खुद को घसीटती आगे बढ़ती रही।
उसकी टाँगें सुन्न हो चुकी थीं।
शरीर जवाब दे चुका था।
फिर अचानक—
वह वहीं बर्फ़ में घुटनों के बल गिर पड़ी।
अब उसमें उठने की ताकत नहीं बची थी।
वह बुरी तरह हाँफ रही थी।
उसने दोबारा उठने की कोशिश की…
लेकिन शरीर ने साथ देने से इंकार कर दिया।
उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।
और फिर उसने आख़िरी बार पूरी ताकत से पुकारा—
“अफ़ाक…! तुम कहाँ हो…?”
