नवा-ए-वक्त, मंगलवार, 16 अगस्त 2005
“राकापोशी पर ग्लेशियर फटने से पर्वतारोही लड़की गिरकर हلاک”
हुनजा (AFP) – राकापोशी फतह करने वाली टीम की एक लड़की ग्लेशियर फटने से कई फीट गहरे दरार में गिरकर हلاک हो गई। विदेशी समाचार एजेंसी के अनुसार, बीती सुबह तीन से चार बजे के बीच पाक-तुर्क-ब्रिटिश अभियान की एक पर्वतारोही, चढ़ाई के दौरान बर्फ फटने से बनी दरार में गिर गई। अभियान दल ने लड़की की तत्काल मौत की पुष्टि कर दी। अधिक जानकारी नहीं मिल सकी।
बुधवार, 20 जुलाई 2005 – एक माह पहले
सफेद गेट पार कर उसने कुछ पल रुककर चारों ओर नजर दौड़ाई। गेट के आगे सफेद पत्थरों से बनी एक सुंदर और लंबी ड्राइववे थी, और दाईं ओर एक खुला-सा लॉन था। लॉन के किनारे बने आधुनिक शैली के बरामदे में चार कुर्सियाँ रखी थीं, जिनमें से एक पर निशा बैठी थी। उसके हाथ में सुबह का अखबार था, जिसे वह आदतन शाम को ही पढ़ा करती थी।
निशा को सामने देखकर वह तेज कदमों से ड्राइववे पार कर बरामदे तक आई। इससे पहले कि निशा उसके स्वागत के लिए उठती, उसने एक हाथ कमर पर रखा, भौंहें चढ़ाईं और नाक सिकोड़ते हुए पूछा,
“यह लड़का कौन था?”
“कौन-सा लड़का?” निशा ने अखबार मोड़कर मेज़ पर रख दिया, उसके लहजे में हैरानी थी।
“वही जो बाहर खड़ा था।”
“बाहर खड़ा था?” निशा हैरान-सी खड़ी हो गई। उसने एक नजर प्रिशे के बिगड़े हुए हाव-भाव और उसके थानेदार जैसे अंदाज को देखा।
“किसकी बात कर रही हो?”
“वही, जो हसीब के साथ बाहर खड़ा था।”
“ओह! वो? वह हसीब का दोस्त है, मिलने आया था और अब तो वापस जा रहा था। क्यों, खैरियत?”
“खैरियत? मुझे देखकर उस बदतमीज़ लड़के ने सीटी बजाई! आजकल के लड़कों को शर्म तो आती नहीं। आने दो हसीब को, अभी पूछती हूँ कि किस तरह के वाहियात लोगों से दोस्ती रखता है!”
“कम ऑन, प्री!” निशा ने हंसते हुए अपनी मुस्कान दबाई और उसे देखा।
सादे गुलाबी सलवार-कुर्ते में, अपने सीधे और बेहद काले बालों को ऊँची पोनीटेल में बाँधे, पैरों में सफेद और हल्के गुलाबी जूते पहने वह गुस्से से निशा को घूर रही थी।
“भई, सीटी बजा दी तो क्या हुआ, बच्चा है।”
“हाँ, छह फीट का बच्चा?”
“हसीब का क्लास फेलो है, यानी होगा सत्रह-अठारह साल का, मतलब उम्र में हमसे कम से कम आठ साल छोटा। तो बच्चा ही हुआ न?”
“और यह तेरे हाथ में क्या है?”
“लो, मरी क्यों जा रही हो? तुम्हारे लिए ही है। बीफ चिली बनाया था, सोचा कुछ तुम्हें भी दे आऊँ।” उसने डोंगा निशा को दिया, उसका मूड अभी भी खराब था।
“वाह! मम्मी को बीफ चिली बहुत पसंद है।”
“हाँ तो मामी के लिए ही लाई हूँ, कौन-सा तुम्हारे लिए बनाया है!”
“निशा आपी! दरअसल, प्री आपा हमें बीमार करके अपनी डॉक्टरी चमकाना चाहती हैं!”
अपने दोस्त को विदा करके हसीब भी वहाँ आ पहुँचा था।
“तुम्हारे लिए नहीं है, मुँह धो रखो।”
“शेरों के मुँह धुले होते हैं, आपा!”
“हाँ, याद आया। तुम्हें तो मामू और मामी चिड़ियाघर से लाए थे!”
“कम ऑन!” हसीब हँसने लगा। “वैसे किस लफंगे की बात हो रही थी?”
“वही, जिसके साथ बाहर गेट पर खड़े तुम ठहाके लगा रहे थे। वह बदतमीज़ लड़का मुझे देखकर सीटी बजा रहा था। कैसे लड़कों से दोस्ती है तुम्हारी?”
“अरे, वो मेरा दोस्त है। बड़े बाप का बेटा है और वह आपको देखकर सीटी नहीं बजा रहा था, वह तो बस उसकी आदत है। कभी ध्यान मत दो, थोड़ा स्पॉइल्ड चाइल्ड है!”
अपने दोस्त का बचाव करते हुए हसीब मेज़ पर रखे डोंगे से बीफ के मसालेदार टुकड़े उठाकर खाने लगा। “और संभलकर आपा, उसका बाप पाकिस्तान के राष्ट्रपति का दोस्त है।”
प्री ने कोई जवाब नहीं दिया, बस बड़बड़ाकर रह गई। फिर जाने के लिए खड़ी हो गई।
“कहाँ जा रही हो? मम्मी को सलाम तो कर लो!”
“पचास गज की दूरी पर मेरा घर है। फिर आ जाऊँगी, अभी मुझे जाना है।”
“भई, ब्रेकिंग न्यूज़ तो सुनती जाओ! हसीब और उसके चार दोस्त राकापोशी बेस कैंप का ट्रैक कर रहे हैं!”
“तो करते रहें!”
निशा ने जैसे कोई बड़ी खबर सुनाई थी, मगर प्री ने लापरवाही से कंधे उचकाए।
“प्री आपा! ये जताने की कोशिश कर रही हैं कि इन्हें जलन नहीं हो रही!” हसीब ने शरारत से मुस्कुराकर कहा।
“मुझे जलन हो भी नहीं रही!”
जब वह लिविंग रूम में पहुँची तो फुफ्फू और नदा आपा एक ही सोफे पर बैठी फुसफुसा रही थीं। उसे देखते ही सीधी हो गईं।
“तुम कहाँ गई थीं?”
“वो निशा की तरफ गई थी, उसके कुछ बर्तन रखे थे।”
“सुनो प्री! ज्यादा मेलजोल मत रखा करो उन लोगों से। बुरा मत मानना, मगर तुम्हारे मामू की लड़की बहुत चालाक है। माँ भी वैसी ही है। देखने में मासूम लगती हैं, मगर अंदर से बिल्कुल अलग।”
“और वह निशा तो जब भी बात करो, सीधे मुँह जवाब ही नहीं देती!”
प्री चुपचाप सुन रही थी। वह जानती थी कि फुफ्फू निशा और मामी के खिलाफ क्यों बोलती थीं। उन्हें डर था कि कहीं निशा प्री को उनके खिलाफ न भड़काए। उन्हें चिंता थी कि कहीं मामू और मामी प्री की मंगनी तुड़वाने के लिए जहानज़ेब साहब पर दबाव न डाल दें।
वह ट्रॉली देखते हुए सोच में डूबी थी।
“बाजी! यह ले जाएँ।”
वहीद (नौकर) की हल्की आवाज़ ने उसे विचारों से बाहर निकाला। उसने चौंककर उसे देखा और ट्रॉली थाम ली।
“अरे हे परी बेटा, ये क्या लड़कों की तरह जूते पहनकर घूम रही हो? कोई सैंडल या हील वाली जूती पहना करो।” चाय के साथ अन्य सामान रखते हुए फूफो ने हमेशा की तरह उसके जूतों पर आपत्ति जताई।
“और क्या, वो पर्पल वाली सैंडल ही पहन लेती जो तुम्हें सैफ भाई ने लाकर दी थी।” नदा आपा अपने बच्चों को केक खिलाते हुए बोलीं। अब वह उन्हें क्या बताती कि सैफ की पसंद उससे बिल्कुल अलग थी। वह चमकीले रंग और बाहरी दिखावे को देखता था, जबकि वह हल्के रंगों और गुणवत्ता को प्राथमिकता देती थी।
“जी बेहतर।” वह सिर झुकाते हुए उनके सामने बैठ गई। उसे मालूम था कि जब तक वे दोनों वहाँ बैठी हैं, उनकी आपत्तियाँ खत्म नहीं होंगी।
रात आठ बजे तक जहांज़ेब साहब भी आ गए। वे हमेशा की तरह इन लोगों को देखकर बहुत खुश हुए। रोशन और सनी को खूब प्यार किया, क्योंकि उनकी ज़िंदगी की सारी रौनक इन्हीं लोगों से थी। उनके सामने उनकी आवाज़ की टोन बदल जाती थी।
“परी, वहीद से कहकर अच्छा सा खाना बनवाना—कड़ाही, बिरयानी, और कुछ और भी जोड़ लेना।” उन्होंने धीमे से परीशे को हिदायत दी।
उसका दिल चाहा कह दे, “पापा, ये लोग रोज़ तो यहाँ खाना खाते हैं, फिर हर रोज़ इतना इंतज़ाम क्यों?”
मगर वह जानती थी कि पापा इन लोगों को कितना चाहते हैं, इसलिए वह उन्हें बातें करता छोड़कर खुद किचन में आ गई।
फूफो की फैमिली हर दूसरी शाम यही होती थी, और उसे कभी इतनी परेशानी नहीं होती थी जितनी आज हो रही थी। शायद इसलिए कि आज निशा ने उसे बरसों पुरानी एक भूली-बिसरी बात याद दिला दी थी।
पुरानी यादें, टूटे सपने, बिखरे अरमान हर इंसान को थका देते हैं। उसके ऊपर भी अजीब-सी थकान और बेचैनी सवार हो रही थी।
“मामा, मैं ये खा लूँ?” नौ साल के रोशन ने फ्रिज खोलकर उसमें से पीनट बटर का जार निकालते हुए दूर से माँ को आवाज़ दी।
“हाँ, बेटा, खा लो, तुम्हारे नाना का घर है।” नदा आपा ने लापरवाही से कहा। और वह, जिसने मलेशियन चिकन बनाने के लिए इतना बड़ा जार मंगवाया था, बेबसी से अपनी मुट्ठियाँ भींचकर रह गई।
सनी पूरे घर में दौड़ रहा था। उसे खीझ हो रही थी, मगर वह चुप रही।
फिर कुछ ही मिनटों बाद, जब वह चावल को दम दे रही थी, उसे बिल्ली की दर्दनाक चीखने की आवाज़ आई।
“या अल्लाह!” उसने घबराकर चम्मच मेज़ पर रखा और दौड़ती हुई किचन से बाहर निकली। बाहर ज़मीन पर उसकी पालतू बिल्ली को रोशन ने पकड़ा हुआ था और सनी उसकी पूंछ में माचिस की तीली से आग लगा रहा था।
बिल्ली दर्द से छटपटा रही थी और चीख रही थी।
“हटो तुम दोनों!” उसने जोर से सनी के माचिस वाले हाथ पर थप्पड़ मारा, बिल्ली को रोशन से खींचा और माचिस की डिब्बी अपने कब्जे में कर ली।
“ये क्या कर रहे थे तुम लोग?”
“आपको क्या दिक्कत है? जो भी कर रहे थे, हमारी मर्ज़ी! हमारे नाना का घर है! आप कौन होती हैं पूछने वाली?”
सनी को थप्पड़ पड़ा था, जिसका जवाब उसने बेहद बदतमीज़ी से दिया।
पूरे दिन की खीझ, बेचैनी, निशा की कही बात, फूफो और नदा आपा की तानेबाज़ी, इन दोनों की बदतमीज़ियाँ—सब कुछ उसने सह लिया था, मगर सनी की इस बदतमीज़ी पर उसकी सहनशक्ति जवाब दे गई। उसने एक ज़ोरदार थप्पड़ सनी को और दो थप्पड़ रोशन को लगाए।
“दफ़ा हो जाओ यहाँ से तुम दोनों!”
दर्द से चीखती बिल्ली को अपनी गोद में संभालते हुए उसने गुस्से से कहा और वापस किचन में चली गई।
दोनों ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए नदा आपा के पास चले गए। ठीक उसी समय सैफ भी आ गया। वह ऑफिस से सीधा यहीं आया था, उसका कोट उसके हाथ में था। घर इसलिए नहीं गया था क्योंकि उसे पता था कि वहाँ खाना नहीं बना होगा।
“क्या हुआ है? किसने मारा?”
नदा आपा ने दोनों को रोते देखकर हंगामा खड़ा कर दिया।
वह किचन में थी और उनका सारा ड्रामा साफ़-साफ़ सुन सकती थी। उसकी कोफ्त और बढ़ रही थी।
“परी आपा ने मारा है! बाल भी खींचे और गाल पर थप्पड़ भी मारा!”
रोशन चिल्लाते हुए बता रहा था।
वह तेज़ी से किचन से बाहर निकली। बिल्ली उसकी गोद से छलांग लगाकर कूद गई और डर के मारे भाग गई। अब वह इंसानों से डर गई थी।
“हाय अल्लाह! परी, तुमने मेरे मासूम बच्चों को क्यों पीट दिया?”
“मामू, मैंने तो इन्हें कभी ज़ोर से डाँटा भी नहीं!”
नदा आपा उसे देखते ही ऊँची आवाज़ में रोने लगीं।
“हाय, मेरे मासूम बच्चे!”
“ये दोनों उस बिल्ली को आग लगा रहे थे! मैंने रोका तो सनी ने मुझसे बदतमीज़ी की, इसलिए मैंने सिर्फ थप्पड़ मारा था। बाल नहीं खींचे थे!”
वह किसी अपराधी की तरह खड़ी सफाई दे रही थी।
“लो! इतने छोटे बच्चे बिल्ली को आग लगा सकते हैं? इन्हें तो माचिस जलाना भी नहीं आती!”
फूफो चौंककर बोलीं।
“मैं झूठ नहीं बोल रही, फूफो! ये दोनों उस बिल्ली को तकलीफ दे रहे थे!”
“तुम्हें अपने भांजों से ज़्यादा किसी जानवर से प्यार है?”
“ये बच्चे हैं, कुछ कर भी दिया तो प्यार से भी समझाया जा सकता था, परी!”
अबकी बार सैफ बोला था।
सैफ उसकी तरफदारी तो क्या करता, उसने ये भी यकीन नहीं किया कि उसने रोशन और सनी के बाल नहीं खींचे थे।
“अच्छा परी, अब माफ़ी माँग लो इन दोनों से।”
ये पापा थे।
उसने बेहताशा हैरान निगाहों से उन्हें देखा। उसकी बात पर किसी को यकीन नहीं था।
“पापा, मैं बड़ी हूँ, मैंने कुछ कह भी दिया तो? आप ऐसे क्यों रिएक्ट कर रहे हैं?”
“परी! तुम नदा आपा और बच्चों से माफ़ी माँगो। देखो, आपा अभी तक रो रही हैं।”
सैफ ने सख्त लहज़े में कहा।
उसका दिल चाहा कि ज़मीन पर बैठकर रोने लगे, मगर उसे खुद को मजबूत रखना था। खुद को कमजोर साबित नहीं करना था।
“मेरी कोई गलती नहीं थी, फिर भी… नदा आपा, माफ़ी!”
नदा आपा ने मुँह फेर लिया। ये इस बात का इशारा था कि वे अब भी नाराज़ थीं।
“मैं खाना लगवा देती हूँ।”
वह इतना कहकर वहाँ से चली गई। वहीद को खाने की तैयारी करने का कहा और खुद किचन में बैठ गई। जब तक वे लोग वहाँ से चले नहीं गए, वह बाहर नहीं निकली।
उसे अपनी बेइज़्ज़ती का शिकवा उन लोगों से नहीं, बल्कि पापा से था। पता नहीं फूफो ने पापा को क्या घोलकर पिला दिया था कि वे कभी भी उनके खिलाफ सोच भी नहीं सकते थे।
“क्या मैं अपनी पूरी ज़िंदगी इन लोगों के बीच बिता सकती हूँ?”
“उफ़! ये कितना कठिन होगा!”
ये तकलीफ़देह ख्याल उसके दिमाग़ में घूम रहा था।
“कहाँ गुम हो?”
निशा ने किचन के दरवाजे से झाँका, तो वह चौंकी।
फिर जबरदस्ती मुस्कुराई।
“मैं तो यहीं हूँ। तुम बताओ, मेरे कपड़े ले आई?”
यहाँ, तुम्हारे कमरे में रख दिए हैं। मेहमान चले गए तुम्हारे? उसने इधर-उधर देखा।
परीशे खड़ी हो गई।
“हाँ, चले गए। आओ, बाहर बैठते हैं।” निशा को देखकर उसका डिप्रेशन थोड़ा कम हुआ था।
वो दोनों उन कपड़ों के बारे में बातें करती हुई लॉन्ज में आईं तो जहांज़ैब साहब को वहीं बैठे पाया।
“अंकल! मम्मी कह रही थीं कि सैफ भाई की मम्मी शादी की तारीख फिक्स करने आने वाली हैं। कब तक आएंगी?”
निशा की उनसे बहुत बेतकल्लुफ़ी थी और वो बहुत बोल्ड भी थी। हर बात बिना झिझक पूछ लिया करती थी। उसे मालूम था कि आज फूफी इसी लिए आई थीं, फिर भी उसने पूछ लिया।
परीशे के होंठों पर मुस्कान बिखर गई।
“बेटा! तारीख तो लगभग फिक्स हो गई है। ईद नवंबर के पहले हफ्ते में आ रही है, तो हम यह सोच रहे थे कि ईद के तीसरे दिन मेहंदी रख लेंगे।” वे खुशी से बता रहे थे।
उसे अपनी गर्दन के चारों ओर फंदा कसता हुआ महसूस हुआ, एकदम कमरे में इतनी घुटन बढ़ गई कि उसका सांस लेना मुश्किल हो गया।
“निशा!” अचानक उसे कुछ याद आया। “हसीब और उसके दोस्त हुंजा जा रहे हैं ना? तुमने आज कुछ बताया था?”
“हाँ, वो राका पोशी बेस कैंप का ट्रैक कर रहे हैं।”
“कौन कहाँ जा रहा है?” उनकी सरगोशियाँ वे ठीक से सुन नहीं सके थे।
“पापा! वो… निशा के एक कज़िन की अपनी टूर कंपनी है मरी में। निशा ने उनसे नॉर्दर्न एरिया के टूर के बारे में पूछा था। वे कह रहे थे कि जल्द ही उनका कोई टूर नॉर्दर्न एरियाज़ जाएगा। तो पापा! मैं निशा के साथ चली जाऊँ? बस तीन-चार दिनों के लिए?”
“मगर निदा तो हफ़्ते भर के लिए मायके तुम्हारी वजह से आई है। उसकी ननद का कोई मसला था, तो उसकी सास और पति कुछ दिनों के लिए सियालकोट गए हैं। वो अगला पूरा हफ्ता यहीं रहकर तुम्हारे साथ शादी की शॉपिंग करना चाहती है।”
वो सोच रही थी कि कुछ दिनों के लिए किसी दूर, सुकून भरी जगह चली जाए, मगर जैसे ही पापा ने निदा आपा की एक हफ्ते की छुट्टी का बताया, उसने पक्का इरादा कर लिया कि वो जल्द ही इस्लामाबाद से पूरे हफ्ते के लिए ग़ायब हो जाएगी। वो किसी के भी साथ शॉपिंग कर सकती थी, मगर निदा आपा के साथ नहीं।
“अच्छा… मगर किस जगह जाना चाहती हो तुम?” वे आधे-अधूरे मन से तैयार हो गए थे।
वो जवाब में कहना चाहती थी कि हुंजा, गिलगित, स्कर्दू… मगर उसे मालूम था कि इन इलाकों का नाम सुनकर पापा सख्ती से मना कर देंगे।
“पेशावर, स्वात, कालाम… उसी तरफ़ जाएंगे।” उसने स्वात का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वहाँ ढाई हज़ार फ़ीट ऊँचे पहाड़ नहीं थे, और यही सबसे बड़ी वजह थी कि पापा ने अगले ही पल उसे इजाज़त दे दी।
उसने बग़ैर सोचे एक चोरी-छुपी नज़र अपने बाएँ कंधे पर डाली। सिर्फ़ इसी कंधे की वजह से वो स्कर्दू साइड पर हिमालय और काराकोरम के पहाड़ों पर नहीं जा सकती थी।
जहाँज़ैब साहब उठकर अंदर चले गए तो निशा तेज़ी से उसकी तरफ़ मुड़ी, “मैंने कब ज़वार भाई की टूर कंपनी से पता किया था?”
“नहीं किया तो अब कर लेना।” उसने लापरवाही से कंधे उचका दिए। निदा आपा की फैमिली के आने की वजह से कुछ देर पहले उसके सिर में जो दर्द हो रहा था, वो अब ग़ायब हो चुका था।
“तुम इस्लामाबाद की किसी टूर कंपनी का नाम नहीं ले सकती थीं?”
“अब बेवजह झूठ को सच साबित करने मरी जाना पड़ेगा और अगर तुम्हें इतनी ही घूमने की चाहत हो रही है, तो हसीब और उसके दोस्तों के साथ राका पोशी चले जाते हैं।”
“जिसकी इजाज़त पापा मुझे कभी नहीं देंगे! और हसीब के दोस्त?”
उसकी नज़रों के सामने शाम वाला वो लड़का आ गया जिसने उसे देखकर सीटी बजाई थी। उसने नफ़रत से सिर झटका।
“मैं हसीब के दोस्तों का सिर तो फोड़ सकती हूँ, मगर उनके साथ चार दिन पैदल राका पोशी का ट्रैक नहीं कर सकती!”
निशा के जाने के बाद वो अपने कमरे में चली गई। उसके कमरे की सजावट ऐसी थी कि दरवाज़ा खुलते ही सामने पलंग नज़र आता था, जिसके सिरहाने दीवार पर “थॉमस ह्यूमर” का बड़ा सा पोस्टर चिपका था।
बाकी की तीन दीवारों में से दो पर “मीम्स” और कुछ जापानी पर्वतारोहियों की तस्वीरें लगी थीं। इन तस्वीरों को देखते ही उसके होंठों पर एक उदास मुस्कान बिखर गई।
परीशे जहाँज़ैब
जिसके नाम का आखिरी हिस्सा हटा कर सब उसे “परी” कहा करते थे। बचपन से ही एक आदर्शवादी थी। वो उन लोगों में से थी, जिनके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं होता। जिन्हें चुनौतियों का सामना करने में मज़ा आता था।
सैफ से सगाई से पहले तक वो सच में बहुत जोशीली थी, मगर इन चार सालों में बहुत कुछ बदल चुका था।
उसे बचपन से पहाड़ों पर चढ़ने का बहुत शौक़ था। वो अपने पापा और मम्मा की इकलौती औलाद थी, इस वजह से बहुत लाडली थी। मगर उनके लाड़-प्यार ने उसे बिगाड़ा नहीं, बल्कि और मज़बूत, निडर और आत्मनिर्भर बना दिया था।
उसकी मम्मा को उसका पर्वतारोहण का शौक़ बहुत पसंद था और यही सबसे बड़ी वजह थी कि 1995 में वो उसे अपने साथ इंग्लैंड ले गई थीं।
पापा ने भी अपना कारोबार वहीं शिफ़्ट कर दिया था, मगर वो लंदन में रहते थे और मम्मा व परीशे लेक डिस्ट्रिक्ट में।
चार सालों तक वो लेक डिस्ट्रिक्ट में रही, जहाँ उसने बहुत कुछ सीखा।
इस दौरान वो सिर्फ़ एक बार पाकिस्तान आई थी, वो भी सर्दियों की छुट्टियों में।
गर्मियों की छुट्टियाँ वो कहाँ बिताती थी, यह एक राज़ था! एक ऐसा राज़, जो अगर पापा को पता चलता, तो वो बहुत नाराज़ होते! (हालांकि मम्मा जानती थीं।)
छह साल पहले उसकी ज़िंदगी अचानक बदल गई, जब उसकी मम्मा की मौत हो गई। फूफी के ज़ोर देने पर पापा उसे इस्लामाबाद ले आए।
तब पहली बार उसे एहसास हुआ कि मम्मा उसकी कितनी बड़ी ढाल थीं, जिनके न होने से पापा पर और लोगों का असर बढ़ गया था।
वो बिज़नेस पढ़ना चाहती थी, मगर फूफी ने पापा को मजबूर कर दिया कि वे परीशे को डॉक्टर बनाएँ।
यूँ उसका एक साल ज़ाया हो गया, मगर वो मेडिकल कॉलेज तक पहुँच ही गई।
फिर 2001 के जुलाई में कुछ ऐसा हुआ कि उसका पर्वतारोहण का करियर खत्म हो गया।
स्पांटिक के उस दर्दनाक हादसे के बाद पापा ने उसकी पर्वतारोहण पर सख्त पाबंदी लगा दी, और उसने चुपचाप उनका फैसला मान लिया।
अगले साल पापा ने उसे बताया कि उन्होंने उसका रिश्ता सैफ से तय कर दिया है।
“तुम्हें कोई एतराज तो नहीं?”
उसने तब भी चुपचाप सिर झुका लिया।
दूसरी चोटी
शनिवार, 23 जुलाई 2005
“चौदह हजार प्रति व्यक्ति का पैकेज है। आठ दिन का टूर, सभी व्यवस्थाएँ कमेटी के ज़िम्मे… वाह यार, ज़बरदस्त!”
ज़ोआर भाई के ऑफिस से निकलते हुए निशा बहुत खुश थी।
“लगता है बारिश होने वाली है।”
सड़क किनारे बहुत धीरे-धीरे चलते हुए प्रीशे ने सिर उठाकर आसमान को देखा।
दोपहर के तीन बजे का वक्त था, मगर काले बादलों से ढका आसमान जुलाई की इस दोपहर को ठंडी शाम में बदल चुका था। वह एक वर्किंग डे था, शायद इसीलिए सड़क पर भीड़ न के बराबर थी। वरना, मरी जैसे घनी आबादी वाले इलाके में सड़क पर इक्का-दुक्का लोगों का इधर-उधर चलना काफ़ी असामान्य बात थी।
प्रीशे और निशा बातें करते हुए धीरे-धीरे ऊँचाई की ओर जाती सड़क पर चल रही थीं। वे जिस जगह पर थीं, वहाँ से सड़क नीचे थी और उनके सामने ऊपर की ओर उठती जा रही थी, यहाँ तक कि दूसरी दिशा से आने वाले व्यक्ति का पहले सिर और फिर धीरे-धीरे धड़ नज़र आता था। यह दरअसल किसी पहाड़ी की चोटी थी, जिसे काटकर सड़क बनाई गई थी।
सड़क के दाईं ओर गहरी खाई थी, जिससे बचने के लिए पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़ों की एक बाड़ बनी हुई थी। दोनों उस सफेद पत्थर के ब्लॉकों के साथ-साथ चल रही थीं।
“थक गई हो?”
निशा ने उसे सफेद चूने से ढके पत्थर के एक ब्लॉक पर खाई की ओर पीठ करके बैठते देखा, तो पूछ लिया।
“नहीं… बस यूँ ही।”
वह घुटनों पर कोहनियाँ टिकाकर, ठोड़ी को हथेली पर जमाए, ऊपर की ओर जाती सड़क को गर्दन ऊँची करके बहुत उदासी से देखने लगी। बारिश से कुछ पलों पहले का मौसम उसे हमेशा उदास कर दिया करता था।
“कहीं और बैठ जाओ, प्री! यहाँ से ज़रा भी पीछे हुई तो गिर जाओगी।”
निशा ने बहुत फ़िक्रमंदी से उसे इतनी खतरनाक जगह पर बैठे देखकर कहा। उसका हल्का गुलाबी और सफेद रंग का सूती सूट सफेद पत्थर के ब्लॉक का ही हिस्सा लग रहा था।
“नहीं गिरती।”
वह लापरवाही से गर्दन मोड़कर पीछे दिखने वाली हरी-भरी पहाड़ियों को देखने लगी। उस दिन मारगला की पहाड़ियों पर बादल छाए हुए थे। पानी से लदे भारी, स्लेटी बादलों ने फिर अचानक अपना भार बारिश की बूंदों के रूप में नीचे गिराना शुरू कर दिया।
प्रीशे ने अनायास अपनी दोनों बाँहें फैला दीं। बारिश की नन्ही-नन्ही बूंदें उसकी हथेलियों को भिगोने लगीं।
उसी क्षण, उसकी सुनने की शक्ति में कहीं दूर से किसी घोड़े के टापों की आवाज़ गूँजी।
उसने अपनी हथेलियाँ नीचे गिरा दीं और किसी स्वप्न जैसी अवस्था में सिर उठाकर ऊँचाई की ओर जाती सड़क को देखने लगी। उस ऊँचाई से पीछे का दृश्य उसकी नज़रों से ओझल था। टापों की आवाज़ वहीं से आ रही थी।
वह बिना पलक झपकाए उस ऊँचाई की ओर जाती सड़क को देखती रही। पहाड़ी के दूसरी ओर से कोई घोड़ा दौड़ाता हुआ इस ओर आ रहा था। हर गुज़रते पल के साथ घोड़े के टापों की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी। उसे लगा कि वह सड़क के उस ऊँचे हिस्से से नज़रे हटा नहीं सकेगी। समय जैसे वहीं ठहर गया था। पल जैसे थम गए थे। बारिश की बूंदें हवा में रुक गई थीं। हर ओर ख़ामोशी थी।
आने वाले का सिर पहले नज़र आया। वह घोड़े की लगाम थामे उसे बहुत कुशलता से सड़क पर दौड़ाते हुए नीचे की ओर आ रहा था। उसका घोड़ा सफेद था—चूने के पत्थर के ब्लॉकों से भी ज़्यादा सफेद और चमकदार।
वह उसी ओर आ रहा था। उसकी नज़रें अपने घोड़े पर थीं।
प्रीशे बिना पलक झपकाए उसे देखे जा रही थी। इतनी दूर से भी वह देख सकती थी कि घुड़सवार की आँखों का रंग हल्का था—हल्का और बहुत चमकीला। उसकी रंगत सुनहरी-सफेदी लिए हुए थी। उसकी नाक खड़ी और यूनानी शैली की थी—घमंडी, बेहद घमंडी नाक।
उसने आधी बाँहों वाली नीली शर्ट के ऊपर बिना आस्तीन की सफेद लेदर जैकेट पहनी थी, जिसमें कई सारी जेबें थीं। गले में खूबसूरत लाल रंग का मफलर बंधा था। जैकेट और मफलर हल्के कपड़े के थे, जिनका मकसद सर्दी से बचाव नहीं बल्कि सिर्फ़ फैशन और स्टाइल था।
बरसती बारिश में उसके भूरे बाल माथे से चिपके हुए थे, मगर वह जैसे हर चीज़ से बेपरवाह अपने सफेद घोड़े पर ही ध्यान लगाए हुए था।
उसने अपना घोड़ा उन दोनों के पास, सफेद पत्थर के ब्लॉकों के करीब रोक दिया और गर्दन तिरछी करके पीछे की ओर मौजूद पहाड़ियों को देखने लगा। वह पीछे के दृश्य से शायद असंतुष्ट था। उसे शायद घोड़ा खड़ा करने की सही जगह नहीं मिल रही थी।
बारिश रुक चुकी थी। हवा फिर से चलने लगी थी।
प्रीशे के गीले बाल उसके चेहरे से टकरा रहे थे, मगर वह तो उस व्यक्ति से अपनी नज़रें हटा ही नहीं पा रही थी।
वह अब एक जगह घोड़ा खड़ा करके संतुष्ट हो चुका था। तभी, गले में लटके कैमरे के कवर से उसने कैमरा बाहर निकाला और चेहरे का रुख उन दोनों की ओर किया।
सुनो बात! उसने सीधे परीशे को संबोधित किया था। उस पल जैसे कोई जादू टूट गया। सभी सपने, खयाल खत्म हो गए। वह जैसे अब होश में आई और चौंककर खड़ी हो गई।
“जी,” उसने अपने स्वाभाविक आत्मविश्वास के साथ गंभीरता से जवाब दिया। उसे खुद पर हैरानी हुई कि वह इतनी बेखुद और मंत्रमुग्ध क्यों हो गई थी?
घुड़सवार ने अपना कैमरा उसकी ओर बढ़ाया।
“क्या तुम मेरी एक तस्वीर खींच सकती हो?” वह शुद्ध अंग्रेज़ी में उससे मुखातिब था। उसका सिर खुद-ब-खुद हां में हिल गया। उसने कैमरा थाम लिया।
“सुनो, तस्वीर ऐसे खींचना कि यह घोड़ा और पीछे वाले पहाड़ अच्छे से आएं,” वह, जो इतने देर से शायद इसी तस्वीर के लिए घोड़े को सही जगह पर खड़ा कर रहा था, अब बहुत सभ्य अंदाज में हिदायत दे रहा था।
उसने कैमरे को देखा, बिल्कुल वैसा ही ओलंपिक्स का डिजिटल कैमरा वह भी इस्तेमाल करती थी। उसने कैमरा चेहरे के सामने लाकर उसकी एलईडी स्क्रीन देखी और बिना “रेडी” कहे ही तस्वीर खींच ली।
“तुम्हारा शुक्रिया… लेकिन क्या इसमें पहाड़ आए?” बिना बताए तस्वीर लेने पर उस अजनबी घुड़सवार को हल्की बेचैनी हुई थी। उसने एक नजर उसकी शहद-रंगी आंखों में देखा और फिर सिर हिला दिया।
“हां, बहुत खूबसूरत तस्वीर आई है,” निशा ने परीशे के हाथ में कैमरे की स्क्रीन पर मौजूद तस्वीर देखकर कहा, तो उसे याद आया कि निशा भी वहां मौजूद थी।
“वैसे, ये तुम्हारा घोड़ा है?” निशा ने अगला सवाल किया।
“नहीं, इसे मैंने एक आदमी से किराए पर लिया है। असल में, उसे घोड़े की लगाम थामे मेरे साथ-साथ चलना चाहिए था, लेकिन मैं इसे भगाकर यहां ले आया,” वह शक्ल से बहुत घमंडी लग रहा था, मगर इस वक्त बहुत बेफिक्र होकर अंग्रेज़ी में बात कर रहा था।
अंग्रेज़ी? परीशे ने गौर से उसे देखा। वह अंग्रेज़ी में क्यों बात कर रहा था? उसे ध्यान से देखने पर एहसास हुआ कि घोड़े पर सवार वह भूरे बालों और गोरी रंगत वाला खूबसूरत आदमी पाकिस्तानी नहीं, बल्कि कोई विदेशी था। वह उसकी पहचान का सही अंदाजा नहीं लगा सकी थी।
“तुम दोनों एक मिनट रुको, मैं इस आदमी को उसका घोड़ा वापस कर आऊं,” उसने फिर घोड़े को बड़ी कुशलता से मोड़ा और उसे तेजी से ऊपर जाती सड़क की ओर भगा ले गया।
“कितना गुड लुकिंग था यार!” निशा उसके जाते ही बेहद प्रशंसा भरे अंदाज में बोली।
“पता नहीं,” परीशे ने सिर झटक कर दाईं ओर खड़े ऊंचे पहाड़ों की ओर देखा। बादल अब छंट रहे थे…
“ओह निशा! वह अपना कैमरा मुझे देकर चला गया!” एकदम से उसे हाथ में पकड़े कैमरे का ख्याल आया, तो वह परेशान हो गई।
“वापस आए तो दे देना,” निशा ने लापरवाही से कहा।
हालांकि वह उसके लौटने से पहले ही वहां से निकल जाना चाहती थी, मगर हाथ में पकड़ा कैमरा उसे इंतजार करने पर मजबूर कर रहा था।
कुछ ही मिनटों बाद वह घुमावदार सड़क से नीचे उतरता उनकी ओर आता दिखाई दिया। घोड़े पर सवार होने की वजह से उसकी लंबाई का सही अंदाजा नहीं हुआ था, मगर जैसे ही वह करीब आया, परीशे को एहसास हुआ कि वह उससे काफी लंबा था।
“वह समझ रहा था कि मैं उसका घोड़ा लेकर भाग गया हूं!” उनके पास आकर वह हंसते हुए बता रहा था।
हंसते हुए उसकी शहद-रंगी आंखें छोटी हो जाती थीं। परीशे यह तय नहीं कर पाई कि वह हंसते हुए ज्यादा आकर्षक लगता है या जब उसके होंठ भिंचे होते हैं।
“तुम इतनी खतरनाक राइडिंग क्यों कर रहे थे?” निशा को बड़ों जैसा व्यवहार करने का शौक था, इसलिए उसने उसकी लापरवाही पर उसे डांटना अपना फर्ज समझा।
“मैडम! मैं पांच साल की उम्र से घुड़सवारी कर रहा हूं, और घोड़ों को बहुत अच्छी तरह जानता हूं,” उसने मुस्कुराते हुए सिर झटका।
वह और निशा सड़क के किनारे धीरे-धीरे टहलने लगे, जबकि परीशे वहीं खड़ी रही। अचानक उसे कैमरे का ख्याल आया।
“सुनो!” दोनों ने मुड़कर पीछे देखा।
“तुम्हारा कैमरा!” उसने थोड़ा जोर से कहते हुए कैमरा उसकी ओर बढ़ाया। वह मुस्कुरा दिया।
“शुक्रिया!”
“सुनो, तुम्हें अपना इतना कीमती कैमरा देकर नहीं जाना चाहिए था। अगर मैं इसे लेकर भाग जाती तो?”
वह फिर मुस्कुराया। “मुझे पता था, तुम ऐसा नहीं करोगी,” उसने सीने पर हाथ बांधते हुए जवाब दिया।
“अगर मेरी जगह कोई और होता तो?”
“अगर तुम्हारी जगह कोई और होता, तो मैं कैमरा कभी देता ही नहीं,” उसने हल्की मुस्कान दबाते हुए गंभीरता से कहा।
“हूं!” परीशे ने सिर झटक कर दूसरी ओर नजर घुमा ली। सड़क के उस पार दुकानों की कतारें दिख रही थीं, और वहां भीड़ बढ़ती जा रही थी।
निशा ने इस “बदतमीज़ी” पर उसे घूरा, मगर वह उसे देख ही नहीं रही थी।
घुड़सवार ने गर्दन झुका कर कैमरे की स्क्रीन पर नजर डाली और हल्का-सा मुस्कराया।
“अच्छी तस्वीर खींचने के लिए शुक्रिया,” तस्वीर देखकर उसने कहा और कैमरा कवर में रख दिया।
परीशे ने कोई जवाब नहीं दिया, बस दुकानों की ओर देखने लगी, जैसे उसे कोई दिलचस्पी ही न हो।
“तुम इस तस्वीर का क्या करोगे?” निशा ने बातचीत को जारी रखने के लिए पूछा।
“मैं बीस साल बाद एक यात्रा वृतांत (ट्रैवलॉग) लिखूंगा, और इसके कवर पर यह तस्वीर लगाऊंगा,” उसने गर्व से कहा।
“और इसका कैप्शन क्या होगा?” निशा ने उत्सुकता से पूछा।
“मैं इसके नीचे लिखूंगा – ‘इस पर्वतारोही की तस्वीर, जो राका-पोशी फतह करने जा रहा था।'”
परीशे ने तेजी से उसकी ओर देखा। उसे हल्का झटका लगा।
“तुम… तुम राका-पोशी चढ़ने जा रहे हो?” यह सवाल पूछने के बाद उसे याद आया कि उसे खुद को इस बातचीत से अलग रखना चाहिए था। उसे पछतावा हुआ।
“हां!” परीशे की बेबाकी पर उसने अपनी मुस्कान दबाने की पूरी कोशिश की।
“खैर, राका-पोशी फतह करना कोई बड़ी बात नहीं, एवरेस्ट या के-2 चढ़ना असली उपलब्धि है,” कहकर उसने फिर से दुकानों की ओर देखना शुरू कर दिया।
“वैसे, हम कल एक टूर कंपनी के साथ कालाम जा रहे हैं,” निशा ने बताया।
घुड़सवार ने आंखें सिकोड़कर “सनशाइन ट्रैवल्स” की ओर देखा और हल्का-सा सोचा, फिर बोला, “मैं भी कल वहीं जा रहा हूं, सनशाइन ट्रैवल्स के साथ। तुम किसके साथ जा रही हो?”
“क्या सच में? तो तुम हमारे साथ ही जा रहे हो!” निशा इस “संयोग” से बहुत खुश हुई, जबकि परीशे को शक हुआ।
“ये तो बहुत अच्छी बात है! वैसे, तुम्हारे दोस्त भी जा रहे हैं?” परीशे ने मुस्कान दबाए, मासूमियत से पूछा।
“हां, लेकिन तुम्हें कैसे पता कि निशा मेरी दोस्त है?”
“बहुत आसान… वह खूबसूरत है।”
निशा हंस पड़ी, जबकि परीशे के माथे पर नापसंदगी की लकीरें उभर आईं।
“मैं निशा हूँ, निशा सईद, और यह मेरी कज़िन कम दोस्त है, डॉक्टर परीशे जहानज़ैब।”
“पारी शै?” उसने अपने यूरोपीय लहजे में उसका नाम दोहराया।
“पारी शै नहीं, परी…शे।”
“तुम मेरे नाम के पीछे क्यों पड़ी हो, निशा?” खुद को यूँ बातचीत का विषय बनता देख, वह तंग आकर उर्दू में बोल उठी।
“यह शिष्टाचार के खिलाफ़ है। तुम्हें मेरी मौजूदगी में अपनी भाषा में बात नहीं करनी चाहिए।”
वह लगातार परीशे को देख रहा था। एक तो कमबख्त बला का हैंडसम था, ऊपर से इतनी खूबसूरत आँखों से उसे टकटकी लगाए देख रहा था कि वह बेवजह घबरा गई।
“तुम्हारी कज़िन के नाम का मतलब क्या है?”
“परी जैसी लड़की। यह ईरान की एक राजकुमारी का नाम था, इसलिए तो मैं इसे ‘परी’ कहती हूँ।”
“तुम्हारी कज़िन पर यह नाम सूट भी करता है। परी मतलब फ़ेयरी? हमारी भाषा में भी फ़ेयरी को ‘परी’ ही कहते हैं।”
“तुमने अपना परिचय नहीं दिया?”
“ओह, सॉरी! मैं अफ़क अर्सलान हूँ, तुर्की से आया हूँ। वैसे तो पेशे से इंजीनियर हूँ, लेकिन साथ में एक अनुभवी पर्वतारोही भी हूँ। तुम्हारे पाकिस्तान में दुनिया के सबसे खूबसूरत पहाड़, राकापोशी के लिए आया हूँ।”
उसने झुककर अपना परिचय दिया। “और तुम लोग क्या करती हो?”
“निशा! हमें देर हो रही है। मैं गाड़ी की तरफ जा रही हूँ, चलना है तो चलो!”
थोड़ा गुस्से में कहकर वह तेज़ कदमों से गाड़ी की ओर बढ़ गई। जल्दी में अफ़क अर्सलान को ख़ुदा हाफ़िज़ कहकर निशा भी दौड़ते हुए उसके पीछे पहुँची।
“तुम्हारी दिक्कत क्या है, निशी? ना जान, ना पहचान, बेवजह किसी अजनबी, वो भी गोरे के साथ यूँ सड़क पर खड़े होकर बातें करने का क्या मक़सद?” ड्राइविंग सीट का दरवाज़ा खोलते हुए वह निशा पर बरस पड़ी। कुछ ही दूरी पर वह तुर्की सैलानी सफेद चौकोर ब्लॉक्स के पास अभी भी खड़ा था। अचानक उसने परी को देखकर हाथ हिलाया, जिसे परी ने नज़रअंदाज कर दिया।
“भाई, मेरा मुसलमान भाई है, एक इस्लामिक देश से आया है, हमारा मेहमान है। मेरा धार्मिक फ़र्ज़ बनता है कि मैं उसकी मेहमाननवाज़ी करूँ।”
“अच्छी तरह जानती हूँ मैं तुम्हें, मुसलमान लड़की!” गाड़ी इस्लामाबाद की तरफ मोड़ते हुए उसने दाँत पीसे।
“क्या हम किसी और टूर कंपनी के साथ ना चले जाएँ?”
“इस बात का तो ज़िक्र ही मत करना! अगर हम इसी टूर कंपनी के साथ नहीं जाएँगे, तो फिर कहीं नहीं जाएँगे!” निशा ने ठंडे लहजे में फैसला सुना दिया।
वह चुपचाप ड्राइविंग करती रही। आठ दिन निदा आपा के साथ या आठ दिन उस तुर्क सैलानी के साथ? उसके पास सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा था, क्योंकि निदा आपा के साथ आठ दिन बिताने की वह सोच भी नहीं सकती थी।
जब वह निशा को छोड़कर घर पहुँची तो फोन बज रहा था। उसने रिसीवर उठाया—
“हेलो?”
“तुम अपनी कज़िन के साथ कहाँ जा रही हो?” सैफ का कठोर पूछताछ वाला लहजा था।
“कालाम, और भी लोग जा रहे हैं।”
“मामू ने मुझसे पूछे बिना तुम्हें अकेले जाने की इजाज़त कैसे दे दी? क्या अब हमारे परिवार की लड़कियाँ दूर-दराज़ इलाकों में बिना बाप-भाई के घूमती फिरेंगी?”
वह उससे साफ़ तौर पर नाराज़ था।
“पापा ने मुझे इजाज़त दे दी है, सैफ!” उसे डर था कि कहीं एक नया मसला ना खड़ा हो जाए।
“लेकिन मैं कह रहा हूँ कि तुम ऐसे नहीं जाओगी। अपनी कज़िन को मना कर दो!”
हुक्म देने वाला अंदाज़! वह बेबसी से होंठ काटकर रह गई।
“हम स्कूल में भी तो टूर पर जाया करते थे, एक भरोसेमंद ट्रैवल एजेंसी के साथ—”
“यह यूके नहीं है, परीशे!” उसका लहजा सख़्त था।
“बस, तुम अपनी कज़िन को मना कर दो।”
“अच्छा!” परीशे ने फोन रख दिया।
कुछ पलों तक वह मायूस होकर फोन को देखती रही, फिर निशा का नंबर डायल किया।
“मेरी आवाज़ सुने बिना चैन नहीं आ रहा, जो घर पहुँचते ही फोन कर रही हो?”
“निशा! अगर मैं कालाम न जाऊँ तो?”
एक पल के लिए निशा चुप हो गई।
“परी!”
थोड़ी देर बाद वह बोली—
“वो एक अच्छा इंसान है। तुम उसके साथ अनकंफर्टेबल महसूस नहीं करोगी।
“मुझ पर भरोसा करो, परी!”
“नहीं निशा, सैफ ने मना किया है।”
“व्हाट द हेल?” उसका गुस्सा भड़क उठा।
“वो होता कौन है तुम्हें मना करने वाला? मैं तो अब तक तुम्हारी सगाई को ही नहीं मान पाई। तुम दोनों एक-दूसरे के लिए बने ही नहीं हो! लेकिन शायद तुमने शादी से पहले ही उसकी गुलामी क़बूल कर ली है। ठीक है, फाइन! मैं बेवजह तुम्हारे लिए परेशान होती हूँ। जहन्नुम में जाओ तुम, जहन्नुम में जाए सैफ, जहन्नुम में जाए अफ़क अर्सलान!”
एक फीकी मुस्कान परीशे के होंठों पर बिखर गई।
“मैंने उसकी गुलामी नहीं कबूली। और सुनो, मैंने प्रोग्राम भी कैंसल नहीं किया। लेकिन अगर तुमने मेरे नाम के साथ अफ़क का नाम फिर लिया, तो मैं वाकई प्रोग्राम कैंसल कर दूँगी!”
बिना कुछ और कहे उसने फोन रख दिया।
उसे सैफ के गुस्से की परवाह नहीं थी। कालाम से वापस आने के बाद उसकी शादी हो ही जानी थी, दिल तब मर ही जाना था। और शायद सैफ जैसे इंसान के साथ ज़िंदगी शुरू करने के बाद उसे किसी चीज़ की परवाह न रहे—
न दुख की, न खुशी की।
शायद तब वह बिल्कुल बेसुध हो जाए।
लेकिन इस बेसुधी के दौर से पहले, सिर्फ आठ दिन,
वह ज़िंदगी के साथ जीना चाहती थी।
तीसरी चोटी
रविवार, 24 जुलाई 2005
पापा की ढेर सारी दुआएँ लेकर वह घर के गेट से बाहर टूर कंपनी की बस में आ गई।
उनका गाइड कम ड्राइवर, ज़फर, उसका सामान लोड करके ड्राइविंग सीट पर आ गया।
बस में उसे चार अनजान चेहरे दिखाई दिए।
वह एक अपेक्षाकृत पिछली सीट पर खिड़की की तरफ बैठ गई। निशा या वह तुर्क पर्यटक अभी तक नहीं आए थे।
खुले शीशे से आती ठंडी हवा उसकी आँखों को बंद कर रही थी।
उसने शीशा बंद कर दिया और लेज़र में कटे काले बालों को ऊँची पोनीटेल में बाँधा।
अचानक उसे दूसरे यात्रियों का ख़याल आया।
उसने एक सरसरी नज़र उन पर डाली।
उसके बाईं ओर सीटों की कतार में उसके बराबर एक कम उम्र की लड़की बैठी थी। उम्र मुश्किल से बीस-इक्कीस साल की होगी।
कंधों तक आते खुले बाल, जो माथे पर बैंग्स की तरह कटे थे और गोरी रंगत।
वह ध्यान से सड़क के किनारे भागते पेड़ों को देख रही थी। उसने सफ़ेद ट्राउज़र और घुटनों तक कुर्ता पहन रखा था और पैरों में सैंडल थे।
दूसरे यात्रियों में पचास-पचपन साल के एक अंकल थे। शायद कोई रिटायर्ड अफ़सर या कोई अमीर बिजनेसमैन। वे काफ़ी रौबदार लग रहे थे और सबसे आगे की सीट पर विराजमान थे।
इसके अलावा एक जोड़ा था। पत्नी काफ़ी करख्त और नकचढ़ी लग रही थी, जबकि पति ‘सीधा-सादा’ सा था।
परीशे को क़याफ़ा-शनासी (चेहरा पढ़ने की कला) में गहरी दिलचस्पी थी।
“सुबह छह बजे कोई वक्त है जाने का? मुझे सोने भी नहीं दिया।”
निशा उसके सामने आकर बैठी तो बस, जो निशा को पिक करने के लिए रुकी थी, फिर से चल पड़ी।
“सो जाओ, लंबा सफ़र है।” उसने निशा की उनींदी आँखें देखकर कहा।
ज़फर ने अपना आखिरी यात्री एक ऊँचे दर्जे के होटल से उठाया था। वह बस में दाखिल हुआ और परीशे की उम्मीदों के विपरीत उनकी ओर आने के बजाय ‘रिटायर्ड’ अंकल के साथ वाली खाली सीट पर बैठ गया।
उसने तो गर्दन घुमाकर उनकी ओर देखा तक नहीं था।
क्योंकि वह उनसे काफ़ी आगे बैठा था और वह भी बाईं कतार में, तो परीशे उसके सिर्फ़ दायां कंधा, बाजू और सिर ही पीछे से देख सकती थी।
हल्की भूरी शर्ट, सफ़ेद पैंट, वही कल वाली स्लीवलेस हल्की-सी टूरिस्ट जैकेट, गले में लटकता मफलर, पैरों में जॉगर्स, वह बहुत अच्छा लग रहा था।
हाँ, आज उसके सिर पर पी कैप भी थी।
वह कुछ देर उसे देखती रही, फिर निशा की तरह सो गई।
कोई दो घंटे बाद उसकी आँख खुली। वे लोग अभी भी सफ़र में थे।
निशा जाग चुकी थी।
उसने चोरी-छुपे अफ़क़ को देखा, वह अपने सेल फोन के बटनों से खेल रहा था।
“सुनो परी! तुम्हें यह शख़्स अच्छा नहीं लगा?”
“नहीं और मैं इसका ज़िक्र नहीं करना चाहती।” वह खिड़की के बाहर देखने लगी।
“मगर मैं करना चाहती हूँ।” निशा ज़िद पर अड़ी थी।
“ठीक है, फिर जाकर उसी के पास बैठ जाओ।”
बाक़ी सारा रास्ता खामोशी में कटा।
दिन चढ़ते ही बस पेशावर की हदों में दाखिल हुई।
सड़कों पर काफ़ी भीड़ थी।
अपने उफ़ान पर चमकता सूरज शहर को झुलसा रहा था।
“कितनी गर्मी है यहाँ! जबकि पेशावर पहाड़ों पर स्थित है… यार, इससे ठंडा तो इस्लामाबाद था।” निशा को अपना शहर याद आया।
टूर कंपनी ने पहले से एक मध्यम दर्जे के होटल में उनकी बुकिंग करवा रखी थी।
होटल के बाहर तंग सी सड़क पर बहुत ज्यादा भीड़ थी।
सड़क के अच्छे-खासे हिस्से पर ठेलों (रेहड़ी वालों) का कब्ज़ा था।
गाड़ी एक ढलान पर चढ़कर होटल के पार्किंग क्षेत्र में आई।
वहाँ गाड़ियों की लंबी कतार थी।
“नॉट बैड।” बस से निकलकर निशा ने टिप्पणी की।
परी होटल की ऊँची इमारत को देखने लगी।
तुर्क पर्यटक उनसे कुछ दूरी पर खड़ा, सफ़ेद जीन्स की जेबों में हाथ डाले, आँखें सिकोड़कर चारों तरफ़ का जायजा ले रहा था।
वह अपनी ओर ध्यान आकर्षित पाकर मुस्कुराया, लेकिन परीशे ने निगाहें फेर लीं।
“हेलो गर्ल्स, कैसी हो तुम दोनों?” वह उनके करीब आ गया।
“ओह, तो आप हमें पहचानते हैं?”
निशा को यह बहुत अखरा कि उसने पूरे रास्ते उन्हें लिफ्ट नहीं दी।
बिना शिकायत किए रह नहीं सकी।
वह जवाब में हंस पड़ा।
“मैंने सोचा कि सुबह-सुबह नींद से बेहाल लोगों को न जगाऊँ, ज़रा कहीं पहुँच जाएँ तो आराम से गपशप कर लेंगे।”
वह मुस्कान दबाए संजीदगी से बोला।
परीशे उन दोनों को छोड़कर उस किशोर लड़की के पीछे चलते हुए सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
246 नंबर कमरे में पहुँचकर ज़फर ने चाबी उसके हवाले की।
वह ट्रिपल बेडरूम उसे, निशा और उस लड़की के साथ साझा करना था।
“ओके, शाम को मुलाकात होगी।”
अफ़क़ यह कहकर उनके साथ वाले कमरे में चला गया।
वह पति-पत्नी सामने वाले कमरे में चले गए।
“मैं डॉक्टर परीशे जहांज़ेब हूँ।”
कमरे में आकर अपने होठों पर मुस्कान सजा कर उसने उस लड़की की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
“मैं अरसा बुखारी हूँ। वैसे आपका नाम बहुत प्यारा है, परीशे!”
वह रुकी और फिर सुधार कर बोली, “परीशे आपी!”
“आपी?”
उन दोनों ने बिस्तर पर बैठते हुए उसे हैरानी से देखा।
“दरअसल, मैं पाकिस्तानी कज़िन्स को अगर बिना ‘आपी’ या ‘बाजी’ कहे बुलाऊँ, तो दादो ‘अंग्रेज़’ कहकर टोकती हैं।
सो मैंने यह नतीजा निकाला है कि किसी भी पाकिस्तानी लड़की को ‘आपी’ या ‘बाजी’ कहे बिना नहीं बुलाना।”
वे दोनों हँस पड़ीं।
खाना उन्होंने साथ ही खाया।
तब तक परिचय का सिलसिला पूरा हो चुका था।
अरसा का ताल्लुक लाहौर से था, मगर वह पली-बढ़ी इंग्लैंड में थी।
वह उर्दू लिख और पढ़ सकती थी, मगर बोलने में बहुत मुश्किल होती थी।
उसके पास इतनी कम उम्र में भी एक अच्छा अल्पाइन रिकॉर्ड था।
वह ज़्यादातर यूरोपियन ऐल्प्स (Alps) फतह कर चुकी थी।
इसके अलावा तिब्बत में उसने Shishapangma और Cho Oyu को फतह किया था।
“तो तुम अफ़क़ के साथ राका पोशी जा रही हो?”
निशा को वह मासूम और होशियार लड़की बहुत अच्छी लगी थी।
“हाँ!” उसने सिर हिला दिया।
“राका पोशी मेरे नॉवेल की सेटिंग है। ओह, मैं बताना भूल गई, मैं राइटर भी हूँ। दो नॉवेल लिख चुकी हूँ, यह मेरा तीसरा नॉवेल है।”
“इतनी कम उम्र में दो नॉवेल?”
परीशे को सुखद आश्चर्य हुआ।
अरसा हँस पड़ी।
“मुहम्मद बिन क़ासिम ने सत्रह साल की उम्र में सिंध फतह किया था, मैंने तो इस उम्र में सिर्फ़ पहला नॉवेल लिखा था। यह कोई बड़ी बात नहीं है।”
“अच्छा, तो तुम्हारे नॉवेल की कहानी क्या है?”
उसे दिलचस्पी हुई।
“एक पर्वतारोही हीरोइन की राका पोशी फतह करने की रोमांटिक दास्तान।” वह मज़े से बोली।
“एंड हैप्पी करोगी या ट्रैजिक?”
“ट्रैजिक! क्योंकि ट्रैजिक एंड यादगार होता है। वैसे आप नहीं आएँगी राका पोशी? आप बता रही थीं कि आप भी क्लाइंबर हैं?”
“हाँ, मैंने कंब्रिया के टु स्कूल, लेक डिस्ट्रिक्ट से सात हफ़्ते के कोर्स किए थे, मगर मैं राकापोशी नहीं आऊँगी क्योंकि मुझे अपने फादर की परमिशन नहीं है।
“कंब्रिया के टु से? वाह, मैं इम्प्रेस्ड हूँ!”
“और स्विस आल्प्स के अलावा, मैंने स्पांटिक (spantik) को भी सर कर रखा है।”
वह मुस्कुराते हुए बताने लगी।
“ओह वैसे आप आतीं तो मजा आता। अफ़क भाई बहुत अच्छे हैं। मेरी उनसे मुलाकात फ्लाइट के दौरान हुई थी, वह मिस्र से आ रहे थे और मैं इंग्लैंड से।”
“अब सोते हैं,” इससे पहले कि वह “अफ़क नाम” शुरू करती, परेशे ने उसकी बात काट दी। अरसा ताबेदार के बिस्तर पर लेट गई।
जल्दी ही उसे नींद ने घेरा। फिर वह शाम तक सोती रही। अरसा और निशा सुबह तड़के ही उठ गई थीं और बग़ार ज़ोर से गपें हांकते हुए उन्होंने उसे भी जगा डाला था। मगर वह आँखों पर हाथ रखे सोती बनी रही।
अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, परेशे का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने आँखों पर से बाजू नहीं हटाया, मगर वह जानती थी कि बाहर कौन था। वह दस्तक नहीं, अफ़क अरसलान की खुशबू पहचानती थी।
“अंदर आ सकता हूँ अच्छी लड़कियों?” उसका शरारत से कहता लहजा परेशे की सुनवाई से टकराया। अगर उसकी आँखों पर बाजू न होता तो वह शायद उसकी पलकें देख पाती।
“लगता है अच्छी लड़कियों के बिना दिल नहीं लग रहा। आओ बैठो।” वह इतना महज़ब, शिष्ट हंसमुख था कि निशा और अरसा तुरंत उसके लिए उठ खड़ी हुईं और उसे कुर्सी पेश की।
“यूं ही समझ लो,” वह परेशे के बिस्तर के सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया। कुर्सी और बिस्तर के पाँपती के बीच फासला खासा कम था। जगह तंग थी, वह बैठ तो गया मगर उसके जॉगर्स बिस्तर के सिरा को छू रहे थे।
“मैं इस सफर को यादगार बनाना चाहता हूँ और एक अच्छे सैलानी के तौर पर, मैं कोई पल भी खाली नहीं बैठना चाहता। तो फिर तुम लोग बताओ शाम का क्या प्रोग्राम है?”
उसे महसूस हो रहा था कि बोलते हुए भी नजरें भटककर अफ़क की नजरें उसी के चेहरे पर पड़ रही थीं, जो उसने अपने सफेद बाजू के ओट में आँखों को छिपा रखा था। कम्बल गर्दन तक ले रखा था, सिर्फ चेहरे का निचला हिस्सा खुला था।
“परी उठ जाए तो कोई प्रोग्राम बनाते हैं।”
“तुम्हारी दोस्त बहुत ज्यादा सोती है क्या?” उसके अंदाज़ से परेशे को लगा, वह जान गया है कि वह सो नहीं रही थी।
“नहीं आज बस ज़रा थक गई। तुम अपना प्रोग्राम बताओ।”
“मैं आज तुम्हारे पेशावर के बाजार, यही कैंट और सदर वगैरह खंगालने का सोच रहा हूँ। बाकी एवरेस्ट अट्रैक्शन कल देखूंगा।”
“तो फिर हम तीनों भी आपके साथ चलते हैं अफ़क भाई! अहमद साहब और इफ्तिकार फैमिली की मर्जी हो तो जहां भी जाएं या फिर उनसे पूछ लें?” अरसा असमंजस में थी।
“वह कपल बहुत रिज़र्व है, वह यकीनन हमसे घुलना मिलना पसंद नहीं करेंगे। अहमद साहब तो आधा घंटा हुआ कहीं चले भी गए हैं फिर हम चारों साथ चलते हैं मगर…”
वह एक पल को रुका, परेशे के कान खड़े हो गए।
“मगर क्या?”
“मगर हो सकता है तुम्हारी दोस्त को कोई आपत्ति हो।”
“अरे नहीं। वह बहुत नाइस और स्वीट है। उसे कोई आपत्ति नहीं होगी,”
“वैसे निशा! मुझे बहुत खुशी हुई थी जब तुमने मुझे बताया था कि तुम्हारी दोस्त मेरी बहुत तारीफ कर रही थी,”
परेशे ने एक झटके से कम्बल उठाया और तेज़ी से सीधी हुई।
“मैंने ऐसा कब कहा था?”
अफ़क का हंसी बेइच्छा ऊँची हुई, उसे अपनी हिम्मत पर शर्मिंदगी हुई। निशा और अरसा कुछ हैरान थी।
“इनको अभी ‘लतीफ़ा’ समझ में नहीं आया था।”
“तुम उठ गईं? मैं समझी सो रही हो।”
“मेरे सर पर जो तुम लोग गोल मेज़ कॉन्फ़्रेंस कर रहे हो, मैं भला कैसे आराम से सो सकती थी?”
शर्मिंदगी छिपाने को उसने ग़ुस्से का सहारा लिया और बिस्तर से नीचे उतर गई। ड्रेसिंग रूम जाने के रास्ते में अफ़क की लंबी टाँगें आड़ी हो गई थीं। उसे पास आते देख कर उसने पैर सिकोड़े। वह पैर पटकते हुए उस तंग जगह से गुज़री।
“सॉरी परी! मैं मजाक कर रहा था।”
वह बड़ी मुश्किल से हंसी को कंट्रोल करते हुए माफी मांगने लगा लेकिन वह चिढ़ती हुई जोर जोर से अलमारी के पट खोल बंद करती रही।
“अच्छी लड़कियों! तैयार होकर लॉबी में आओ। तुम्हारे पास सिर्फ पंद्रह मिनट हैं।” वह जाने के लिए उठ खड़ा हुआ तो परेशे ने कनखियों से उसे देखा, उसने कपड़े बदल लिए थे। शर्ट की आस्तीनें आधी, मगर रंग काले थे। और ऊपर सफेद टूरिस्ट जैकेट, गर्दन के आसपास बिल्कुल लाल मफलर।
“राइट बॉस!” अरसा ने ताबेदार दिखाया। वह मुस्कुराते हुए एक नज़र परेशे पर डाली और बाहर निकल गया। वह “अफ़” कहते हुए क्लिकस कर रही थी।
इन पंद्रह मिनट में परेशे ने कोई दो सौ बार इन दोनों से “जरूर प्रोग्राम बनाना था तुमने उसके साथ?” सुना था। निशा ढीठ बनी सुनती रही, अरसा को हालांकि हैरानी हुई थी।
“यह परेशे आपी की कोई लड़ाई हुई है अफ़क भाई से? वह तो इतने केयरिंग और स्वीट हैं।”
“यह एक सदियों की कहानी है, तुम्हें एक शाम में समझ नहीं सकती।” निशा ने आह भरकर कहा।
हेयर ब्रश करते परेशे के हाथ एक पल को थमे थे। वह अंदर से काँप कर रह गई थी। पलट कर शॉक की नज़र निशा पर डाली और दूसरी अपनी अंगूठी में मौजूद अंगूठी पर। निशा ने लापरवाही से कंधा उचका दिया। अरसा के सिर के ऊपर से सब कुछ गुजर गया था।
वह पैर पटक कर बाथरूम में चली गई। निशा की बात वह आमतौर पर नहीं मानती थी, मगर अब उसके पास कोई दूसरा रास्ता न था। निशा और अरसा चली जाती तो उसने भला क्या कसूर किया था। जो वह अकेले छोटे से कमरे में बैठी रहती? युँ भी अफ़क के साथ मार्केट जाना उसे बुरा नहीं लग रहा था। हालांकि युँ जाहिर करना वह अपना फर्ज़ समझती थी।
पार्किंग एरिया में खड़ी टूर कंपनी की बस के साथ टेक लगाए खड़ा अफ़क उनका इंतजार कर रहा था। उन्हें देखकर वह सीधा हो गया। एक स्वागत मुस्कान ने उसके होंठों का ख्याल रखा था। पी कैप अभी भी उसके सिर पर थी।
“कैंट चलते हैं, यहाँ से बहुत करीब है।” उनका मार्गदर्शन करते हुए वह होटल से पार्किंग एरिया से नीचे सड़क तक जाती ढलान से उतर रहा था।
“तुम तुर्की से आए हो या صوب़े सरहद से?” निशा को इसका पेशावर और आस-पास की जानकारी हैरान करती थी।
वह बेइच्छा हंस पड़ा। “बस पिछली बार इधर आया था तो काफी दिन यहाँ बिताए थे, इसलिए आइडिया हो गया है।”
पन्ना नंबर 43
“पिछली बार कब आए थे?”
“दो साल पहले,” वे लोग ढलान उतर कर नीचे सड़क पर आ चुके थे। सड़क काफी खुली थी, मगर फलों की रीढ़ियों और खानचों की आपसी सहयोग से अब बहुत तंग हो चुकी थी। यहाँ होटेल थे या पीसीओ।
“दो साल पहले क्या सैर-ओ-सीरत के लिए आए थे?”
रीढ़ियों से दोनों ओर गहरी सड़क पर रास्ता बना कर चलना बहुत मुश्किल था, फिर भी वह बहुत ध्यान से उनकी बातचीत सुन रही थी।
“हाँ, सैर-ओ-सीरत के लिए और…,” बोलते बोलते वह एकदम चुप हो गया।
“और…बस कुछ कम था,” वह साफ़ टाल गया था। निशा नैतिकता से उतने तो अवगत थी कि अगर वह टाल रहा था तो वह उस काम की डिटेल न पूछती।
अफ़क ने टैक्सी रोकी। टैक्सी वाला अंग्रेजी से अनजान था। सो कर्रया का मामला निशा ने ही तय किया।
कैंट की खूबसूरत दुकानों के बाहर आहिस्ता से चलते हुए वे चारों काफी देर तक शॉपिंग करते रहे। फिर अरसा उन्हें छोड़कर सईद बुक बैंक की तरफ चली गई। वे तीनों एक ज्वेलरी शॉप में दाखिल हो गए।
यह संयोग ही था कि जब निशा विभिन्न एरिंग्स देख रही थी, तो अपनी ढीली पोनी को कसते हुए परेशे के बालों का जकड़ा रबर बैंड टूट गया। उसके बाल किसी झरने की तरह कमर पर गिर गए।
“निशा, तुम्हारे पास कोई हेयर क्लिप है?” अपने लंबे, लेयर्ड कट बालों को संभालते हुए, उसने परेशानी से निशा से पूछा।
“खुद खरीदने से तुम्हें मौत पड़ती है?” निशा बहुत व्यस्त थी, इसलिए झट से बोली।
“दूर हो जाओ!” वह बड़बड़ाते हुए सामने शेल्फ पर रखी टोकरी में क्लिप्स और हेयर टाई देखने लगी।
“यह कैसी है?”
उसने चौंककर सिर उठाया। अफ़क़ हाथ में एक हेयर क्लिप लिए उसे दिखा रहा था। उसने नजरें झुकाकर क्लिप को देखा। वह सिल्वर कलर की थी, जिसमें एक तरफ बड़ा, गोल फ़िरोज़ी रंग का पत्थर जड़ा था और दूसरी तरफ हरा व नीला, दो रंगों का पत्थर लगा था।
“अच्छी है,” उसने सुंदर क्लिप लेने के लिए हाथ बढ़ाया। अफ़क़ ने उसे उसके हाथ पर रखना चाहा, लेकिन पकड़ते-पकड़ते वह नीचे गिर गई। वह घबराकर झुकी और क्लिप उठा ली। उसके दो रंगों वाले फूल के बीच हल्की सी सीधी दरार पड़ गई थी।
“टूटी तो नहीं?” वह पूछ रहा था। उसने सिर हिलाकर मना कर दिया और नजरअंदाज करते हुए सेल्समैन से कीमत पूछी।
“दो सौ पचास रुपये।”
अफ़क़ ने पैसे दुकानदार की ओर बढ़ाए।
“सॉरी, यह मैं खुद खरीदूंगी,” उसने धीमी आवाज़ में उसे टोका।
“मैं इस लालच में तुम्हें यह गिफ्ट कर रहा हूँ कि कल तुम भी मुझे कुछ गिफ्ट करोगी।”
“मैं गिफ्ट्स न लेती हूँ, न देती हूँ,” उसने पर्स से पैसे निकाले।
“लेकिन मैं देता भी हूँ और लेना भी पसंद करता हूँ,” वह ज़िद पर था। उसे नजरअंदाज करते हुए, उसने पैसे सेल्समैन को थमा दिए।
खाकी लिफ़ाफे में पैक की गई क्लिप निकालकर उसने अपने बालों में लगाई और निशा की ओर बढ़ गई।
अर्सा के आने और निशा की शॉपिंग पूरी होने के बाद, वे लोग बाहर निकल आए।
बाहर अंधेरा फैल रहा था। दुकानों के अंदर और बाहर लाइटें जगमगा रही थीं। स्ट्रीट लाइट्स और साइनबोर्ड्स रोशन थे।
“रात के खाने के लिए तुम्हें पिशावर के सबसे बेहतरीन रेस्टोरेंट ले चलूं?” वह उनके दाईं ओर, जेब में हाथ डाले, सामने देखते हुए चल रहा था। वह उसकी ओर देखने से बच रही थी।
“पीसी?” अर्सा ने झट से पूछा।
“नहीं, मैं बेस्वाद, बासी और फीके खाने का आनंद नहीं लेता। मैं तुम्हें एक बेहतरीन रेस्टोरेंट ले जा रहा हूँ।”
शहर की तंग गलियों से टैक्सी में गुजरते हुए, वह उन्हें एक और संकरी गली में ले आया, जहाँ कई तीसरे दर्जे के रेस्टोरेंट थे। हवा में हर तरफ स्वादिष्ट खाने की खुशबू फैली थी।
वह उन्हें नमक मंडी ले आया था। प्रीशे को हैरानी हुई—वह उसके देश को उससे ज्यादा जानता था।
नमक मंडी में नमक वाली कड़ाही खाने के बाद, जब वे वहाँ से निकले, तो निशा ने बेख्याली में पूछ लिया,
“अगर तुम इन जगहों पर इतनी बार घूम चुके हो, तो अब फिर क्यों आए हो?”
“यही तो मैं कह रही थी। अच्छा-खासा हम जुलाई में ही राकापोशी क्लाइंब शुरू कर देते। बेवजह यहाँ आने की क्या जरूरत थी? पता नहीं अफ़क़ भाई को अचानक इन इलाकों का दौरा करने का ख्याल क्यों आ गया और मुझे भी घसीट लाए,” अर्सा ने बेखयाली में कहा।
अफ़क़ ने कोई जवाब नहीं दिया।
अपने होटल के कमरे में वापस आकर, निशा फिर से अफ़क़ की तारीफ करने लगी।
“मैंने इतना सॉफ्ट, विनम्र और अच्छा इंसान पहली बार देखा है।”
“और नहीं तो क्या! जितनी जानकारी उन्हें इन इलाकों के बारे में है, मेरा ख्याल है कि वह एक बहुत सफल यात्रा-वृत्तांत लेखक बन सकते हैं,” अर्सा ने कहा।
“रहने दो, अर्सा,” वह जो टीवी ट्रॉली के पास खड़ी बोतल से पानी पी रही थी, झुंझलाकर बोली,
“ये पश्चिमी दुनिया के लोग हमारे देश में आकर जानकारी इसीलिए इकट्ठा नहीं करते कि हमारी अच्छी छवि दिखाएँ। बल्कि अगर तुम इन विदेशियों के यात्रा-वृत्तांत पढ़ो, तो तुम्हें पता चलेगा कि ये लोग हमारे बारे में कितना ज़हर उगलते हैं। हमें अज्ञानी, पिछड़ा और अविकसित कहते हैं। तुम्हारे ये अफ़क़ अर्सलान भी तुर्की जाकर यही करेंगे—यात्रा-वृत्तांत लिखकर दुनिया को बताएंगे कि हमारा देश कितना पुरातनपंथी, गरीब और सुविधाओं से वंचित है, यहाँ कितनी गंदगी और अव्यवस्था है। ये सब एक जैसे होते हैं—प्रचार करने वाले!”
बोतल रखकर वह मुड़ी, तो सन्न रह गई। अफ़क़ दरवाजे के बीच खड़ा था, होंठ भींचे हुए। वह शायद टैक्सी का किराया चुका कर उन्हें शुभरात्रि कहने आया था। और चूँकि वह अर्सा के लिए अंग्रेजी में बोल रही थी, तो उसके सुन लेने का सवाल ही नहीं उठता था।
वह अचानक तेज कदमों से चलता हुआ गलियारे से बाहर निकल गया।
निशा और अर्सा ने बेबस होकर एक-दूसरे की ओर देखा। वे उसकी नाराज़गी महसूस कर चुकी थीं।
उसे भी एहसास था। अंदर से वह बहुत पछताई और घबराई हुई थी, मगर चुपचाप लेट गई।
“तुम्हारे पैसे!” निशा ने उसकी साइड टेबल पर 250 रुपये रखे, तो उसने तकिया हटाया।
“कौन से पैसे?”
“वही, जो उस ज्वेलरी वाले ने वापस किए थे। कह रहा था कि तुमने उसे दिए हैं। तुम उस वक्त अर्सा से बात कर रही थीं, तो मैं देना भूल गई।”
उसके लहज़े में हल्की सी नाराजगी थी।
वह कुछ देर तक कुछ कह नहीं सकी। वह क्लिप, जिसे उसने बहुत गर्व से लगाया था, उसकी कीमत उस इंसान ने चुकाई थी, जिसकी वह कुछ मिनट पहले ही बेइज्जती कर चुकी थी।
उसका दिल चाहा कि वह ढाई सौ रुपये उसी वक्त उसके मुँह पर दे मारे, मगर उसने अहमर साहब के साथ कमरा साझा किया था। और फिर जो कुछ वह कर चुकी थी, अब उसमें कोई सुधार नहीं था।
वह चुपचाप सोने के लिए लेट गई। पैसे उसने पर्स में रख लिए।
जितना वह उससे दूर भागने की कोशिश करती, वह उतना ही उसके रास्ते में आ जाता था।
चौथी चोटी (भाग 2)
“परी… मैं…”
उसने उफ़ुक की बात सुने बिना तेजी से उसकी कलाई थाम ली।
“तुम्हें बुखार है, बहुत तेज़ बुखार! देखो तुम्हारा हाथ कितना गर्म हो रहा है, और नब्ज़ कितनी तेज़ चल रही है। और तुम आराम करने के बजाय ट्रेकिंग करने निकले हो, हाँ?”
उसे इस लापरवाह इंसान पर बहुत गुस्सा आ रहा था।
“तुमसे इतना भी नहीं हुआ कि मुझे बता देते? मैं डॉक्टर हूँ, तुम्हें दवा तो दे ही सकती थी। लेकिन तुम्हें खुद को तकलीफ़ देकर बहादुर कहलाने का शौक़ है। तुम एक बेकार इंसान हो! फ़ौरन वापस चलो मेरे साथ।”
वह जो पहले घबरा गया था, अब होंठों की मुस्कान दबाए, सिर झुकाए उसकी डाँट सुन रहा था।
“माफ करना, डॉक्टर! लेकिन मेरा नहीं ख़याल कि मैं इतना बीमार हूँ कि बिस्तर पर पड़ा रहूँ।”
“ये फैसला करने वाले तुम नहीं, मैं हूँ। समझे?”
वह वापस जाने के लिए मुड़ी तो वह भी सिर झुकाए, उसकी चिंता भरी नाराज़गी को महसूस करता हुआ, उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। वह बड़बड़ाते हुए पहाड़ से नीचे उतर रही थी।
“डॉक्टर, मैं सच में इतना बीमार…”
वह झटके से पीछे मुड़ी। वह उसके बिल्कुल करीब था—बस एक क़दम के फ़ासले पर। अगर वह तुरंत पीछे न हटता तो उससे टकरा जाता।
“सुनो! तुम्हें आख़िरी बार कह रही हूँ, मेरे सामने अपना मुँह बंद रखो। मुझे बड़बड़ाते हुए मरीज़ ज़हर लगते हैं।”
उफ़ुक ने आज्ञाकारी अंदाज़ में अपने होंठों पर उंगली रख ली।
“सॉरी डॉक्टर, अब नहीं बोलूँगा।”
उसके लहजे और शहद-रंगी आँखों में शरारत थी।
“हाँ, अब ठीक है। चलो!”
वह उसके आगे चलने लगी।
“वैसे, कितनी देर तक नहीं बोलना?”
“जब तक मैं ना कहूँ। और अब चुप रहो।”
वह उसे ऊपर कमरे तक ले आई। उसे पैरासिटामोल की दो गोलियाँ देकर सख़्ती से सो जाने को कहा।
“लेकिन मैं सोना नहीं चाहता!”
बिस्तर पर बैठे उफ़ुक ने विरोध किया।
“चुप! बिल्कुल चुप रहो। डॉक्टर के सामने अपनी ज़बान बंद रखा करो!”
उसे सख़्ती से डाँटकर वह उसके कमरे से बाहर आ गई।
ऊपर की मंज़िल पर कमरों की एक क़तार थी। सामने एक लॉन था, जो आयताकार आकार का था। लॉन के किनारे, जहाँ खाई थी, कुछ झाड़ियाँ और कुछ पेड़ों की एक मामूली-सी बाड़ बनी हुई थी।
वह अपने बैग से डायरी और पेन निकाल लाई और लॉन के बीच में रखी कुर्सियों में से एक पर बैठकर अपने सफ़र के बारे में लिखने लगी। जब उसे यक़ीन हो गया कि आसपास उसके सिवा कोई नहीं है, तो उसने अपने जूते उतार दिए, पाँव मेज़ पर रख लिए, और डायरी घुटनों पर रखकर लिखने लगी। बीच-बीच में वह उफ़ुक के कमरे की ओर नज़र डाल लेती थी। एक बार जाकर देख भी आई—वह आँखों पर बाज़ू रखे सो रहा था।
जब वह संतुष्ट होकर वापस आई तो देखा कि एक छोटा सा बंदर मेज़ पर बैठकर उसकी डायरी से छेड़छाड़ कर रहा था। एक और बंदर नीचे घास पर लेटा अंगड़ाई ले रहा था।
उसके करीब आते ही एक बंदर तो झटपट भाग गया, लेकिन जो घास पर लेटा था, वह सम्मानपूर्वक सीधा बैठ गया।
उसने मुस्कुराते हुए अपना पेन बंदर की ओर बढ़ाया, जिसे उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से पकड़ लिया। कुछ देर वह उससे खेलता रहा और वह मुस्कुराते हुए उसे देखती रही।
फिर अचानक, बंदर ने उसका पेन ज़ोर से उछाल दिया। वह लॉन के किनारे से होता हुआ नीचे खाई में गिर गया। परीशे के चेहरे से मुस्कान ग़ायब हो गई।
“दफ़ा हो जाओ तुम!”
उसने ग़ुस्से से पाँव ज़मीन पर पटका। बंदर उछलता हुआ भाग गया।
परी ने अफ़सोस से खाई की ओर देखा। उसका पेन अब वापस नहीं आ सकता था।
फिर वह उफ़ुक के बारे में सोचने लगी। उसे सैफ के बारे में सोचना अच्छा नहीं लगता था, लेकिन उफ़ुक की बातें, उसकी शरारत भरी शहद-रंगी आँखें और उसके होंठों पर छिपी मुस्कान को याद करना उसे अच्छा लग रहा था।
वह शख़्स, जिसे चार दिन पहले तक वह जानती भी नहीं थी, अब बहुत अपना-सा लग रहा था। नहीं… शायद वह उस पर्वतारोही को सदियों से जानती थी—रूह के वजूद में आने से पहले, पहली साँस से भी पहले से।
तभी उसे महसूस हुआ कि उफ़ुक किसी को पुकार रहा है। वह कमरे का दरवाज़ा खुला छोड़ आई थी, शायद वही आवाज़ आ रही थी।
“वह इतनी जल्दी जाग गया?”
नहीं, वह जगा नहीं था। शायद वह सोया ही नहीं था।
उसका बाज़ू अब उसकी आँखों पर नहीं था। उसका माथा और पूरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था।
“उफ़ुक!”
परीशे ने उसके पास जाकर उसे ग़ौर से देखा। उसके होंठ हल्के-हल्के काँप रहे थे। वह शायद कुछ कह रहा था।
“मेरा ऑक्सीजन कैन कहाँ है? मेरा ऑक्सीजन कैन कहाँ है?”
बंद आँखों और नकारात्मक रूप से हिलते सिर के साथ, वह धीमी आवाज़ में जैसे किसी को पुकार रहा था।
“उफ़ुक, उठो!”
उसने उसका कंधा धीरे से हिलाया। उसकी शर्ट पसीने से भीगी हुई थी।
“मेरा ऑक्सीजन कैन… हना दे… मेरा ऑक्सीजन…”
उसने बीच में तुर्की भाषा का कोई शब्द बोला, जिसे वह समझ नहीं पाई।
उसने ज़ोर से उसका कंधा हिलाया। उफ़ुक ने तुरंत आँखें खोल दीं और झटके से उठ बैठा। उसकी आँखों में अविश्वास और डर था।
“म…मेरा ऑक्सीजन कंटेनर कहाँ है?”
“उफ़ुक! तुम्हारे पास कोई ऑक्सीजन कैन नहीं है। क्या तुम्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है?”
वह कुछ भी समझ नहीं पा रही थी।
उफ़ुक चौंककर परीशे को देखने लगा।
“मैं कहाँ हूँ?”
फिर उसने तुर्की भाषा में कुछ कहा।
“तुम व्हाइट प्लस, मरगुजार, स्वात में हो। तुमने शायद कोई बुरा सपना देखा है।”
“सपना?”
वह झटके से कंबल हटाकर बिस्तर से नीचे उतर आया।
“तुम ठीक तो हो?”
परी ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा।
उसने उसका हाथ झटक दिया और कुछ क़दम आगे बढ़ गया। वह इधर-उधर देखकर हालात समझने की कोशिश कर रहा था।
“तुम… तुम यहाँ से जाओ।”
वह दीवार की ओर देख रहा था, उससे नज़रें नहीं मिला रहा था। उसके चेहरे पर अजीब-सा डर और बेचैनी थी।
“मुझे बताओ, तुम्हें क्या हुआ है?”
“तुम जाओ यहाँ से।”
उसने अपना चेहरा घुमा लिया और बालों में उंगलियाँ फँसाकर कुछ याद करने की कोशिश कर रहा था।
“तुम ठीक नहीं हो…”
“जाओ! ख़ुदा के लिए जाओ यहाँ से! जस्ट गेट आउट ऑफ़ हियर!”
वह अचानक चिल्लाया।
परी सहमकर पीछे हटी और फिर कमरे से बाहर निकल गई।
उसे हैरानी हुई थी, वह बहुत बहादुर पर्वतारोही था, वह तो शारीरिक तकलीफों की परवाह नहीं करता था, फिर एक सपने से इस तरह क्यों डर गया था? उसके चेहरे पर इतना अजनबी डर क्यों था? वह समझ नहीं पा रही थी।
फिर पूरी शाम वह अपने कमरे से नहीं निकला। प्रीशे ने रात के खाने के लिए उसका इंतजार किया। तीनों वाइट प्लस की पहली मंज़िल की सफेद इमारत के बरामदे में रखे खूबसूरत सोफों पर बैठी खाने का इंतजार कर रही थीं, जब वह उनसे आकर मिला।
“मैं ज़रा देर से आ गया, माफ करना। मैं उस बंदर के साथ खेलने लग गया था।”
“घोड़ों के अलावा बंदरों से भी आपकी अच्छी-खासी समझदारी लगती है।” निशा ने बेखयाली में कहा।
“समझा करें न… डार्विन कहता था कि इंसान पहले बंदर था। क्यों, अफ़क भाई?”
“इंसान पहले बंदर था या नहीं, लेकिन डार्विन के पूर्वज जरूर बंदर थे।”
वह अचानक फिर से वही पुराना, हंसता-मुस्कुराता अफ़क लग रहा था। शाम वाले वाकये का उसके चेहरे पर कोई असर नहीं दिख रहा था। प्रीशे ने सिर झटककर चुपचाप खाना खाने लगी।

