Lagan Hindi Novel Part 9,
ऐसे में फलकी का दिल चाहा कि वह कोई गीत सुने। दर्द भरा गीत। उसने उठकर देखा। सब लोग जा चुके थे। बाहर घुप्प अँधेरा था। अंदर भी सारी रोशनियाँ गुल हो चुकी थीं। अभी-अभी आफ़ाक सफेद कुर्ता-पायजामा पहने उसके पास से गुजर गया था। फ़लकी को उसकी विशेष खुशबू महसूस हुई थी। पता नहीं उसने फ़लकी को देखा नहीं था या वैसे ही नज़रअंदाज़ कर गया था।
फ़लकी को बेचैनी -सा महसूस होने लगा।
ऐसी बेचैनी जिसका कोई नाम नहीं होता।
ऐसी बेचैनी जिसे महसूस करने का अंदाज़ भी नहीं आता।
पता नहीं क्या हो गया था।
जैसे तलवे में काँटा चुभ जाता है और सारा बदन कसमसाने लगता है। फ़लकी की नींद उड़ गई थी। अंदर जाने को दिल नहीं चाह रहा था। आफ़ाक का सामना करने को दिल नहीं चाह रहा था। बोलने को दिल नहीं चाह रहा था।
हाँ, कहीं खो जाने की तमन्ना थी।
खुद अपने आप से डर लग रहा था। अँधेरा अच्छा लग रहा था।
उसने बढ़कर दराज़ खोली और एक कैसेट निकालकर टेप रिकॉर्डर में लगा दिया।
और फिर उस कमरे की बत्ती बंद कर दी।
चारों तरफ अँधेरा छा गया। शीशे में से चाँद की पीली रोशनी अंदर आ रही थी या दूर उसके कमरे की बत्ती जल रही थी और दरवाज़े में से रोशनी छन-छनकर अंदर आ रही थी।
गीत सुनती हुई वह एक तरफ जाकर बैठ गई। पुरसोज़ आवाज़ें उभरने लगीं।
आदमी जब बुज़दिल हो जाता है तो रोशनी से डरता है। अँधेरा कर लेता है। क्योंकि अपना आप नहीं देखना चाहता। अपनी नफ़ी करना चाहता है। क्या अँधेरा करने से नफ़ी हो जाती है?
अँधेरे में बैठने से अपना वजूद छिप जाता है?
नहीं, हरगिज़ नहीं… जब बाहर अँधेरा होता है तो मन के अंदर कई चिराग जल उठते हैं। छोटे-बड़े… जगमग-जगमग… ये कैसे चिराग हैं?
ये कैसे जज़्बात हैं?
यह तो सब कुछ नया-नया है… अनजाना है… अनदेखा है।
वह डर से काँप रही थी।
उसका दिल चाह रहा था, पल्लू मारकर सारे चिराग बुझा दे, लेकिन बे-चिराग समझाने की भी उसमें हिम्मत नहीं थी।
तभी एक-एक गीत बजना शुरू हुआ—
“तुम अगर हम को न चाहो तो कोई बात नहीं,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी।”
फ़लकी को ऐसे लगा जैसे उसका दिल बंद हो जाएगा। शायद वह यही सुनना चाहती थी। यही कहना चाहती थी। यही उसके मन में था।
उसने उठकर आवाज़ ऊँची कर दी। चारों कोनों में पड़े हुए स्पीकर चीख उठे। धीमी-धीमी पुरसोज़ आवाज़ सारे घर में फैल गई।
**”अब अगर मन नहीं है तो जुदाई भी नहीं,
बात तोड़ी भी नहीं और निभाई भी नहीं।
मैं…
यह सहारा भी बहुत है मेरे जीवन के लिए…”**
“तुम अगर मेरी नहीं हो तो पराई भी नहीं,
मेरे दिल को न सराहो तो कोई बात नहीं,
ग़ैर के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी!
ग़ैर के दिल को सराहो…
तुम अगर मुझको न चाहो…”
गीत खत्म हो गया तो फ़लकी ने उठकर दोबारा लगा दिया। फिर दोबारा लगा दिया… जाने उस दीवानी ने कितनी बार यह गीत सुना।
रात पहर-पहर करके गुजरने लगी। आफ़ाक अपने कमरे में था। कमरे की बत्ती जल रही थी। इसका मतलब था वह जाग रहा है।
…और सुन रहा है।
सुन रहा है तो सुने।
वह गीत बजाती रही, बजाती रही… तब उसकी आँखों में आँसू आ गए। जैसे नश्तर से फोड़ा फूट जाता है, उसी तरह गीत के बोलों ने उसके दिल का गुबार आँखों की राह से निकालना शुरू कर दिया।
वह गीत सुनती रही और रोती रही।
रात पहर-पहर ढलती रही।
फिर उसे यूँ महसूस हुआ जैसे घर के दर-ओ-दीवार में यह गीत रच-बस गया है।
एक-एक ईंट कह रही है—
**”तुम अगर हमको न चाहो तो कोई बात नहीं,
तुम किसी और को चाहोगे तो… तो मुश्किल होगी…
मुश्किल होगी…”**
रात का कौन-सा पहर था। उसने घबराकर टेप रिकॉर्डर बंद कर दिया। ख़ामोशी छा गई। मगर उसके कानों में फिर भी वही आवाज़ गूँजने लगी—
“तुम किसी और को चाहोगे तो…”
वह जिधर देखती, वही आवाज़ आती।
जिस तरह चाँदनी में हर जगह सराब की सफेद ढेरियाँ नज़र आती हैं, बिल्कुल उसी तरह अँधेरे में हर जगह अपने ख़यालों के साए नज़र आते हैं, आवाज़ें आती हैं, साँसें सताने लगती हैं। कोई दबे पाँव चलता हुआ करीब आता है। उसकी साँसें गर्दन पर महसूस होती हैं, मगर कोई नहीं होता… सिर्फ़ अपना वहम होता है।
जैसे सारा घर बार-बार दोहरा रहा था—
“तुम अगर हमको न चाहो तो कोई बात नहीं…
तुम किसी और को चाहोगे तो…”
फ़लकी एकदम घबरा उठी। ख़ामोशी से वहशी होने लगी। अपने कमरे की तरफ बढ़ी।
दिल में एक मुअय्यन-सा ख़याल था।
अंदर कदम रखा और आफ़ाक के पलंग की तरफ देखा। वह औंधे मुँह सोया पड़ा था। बेसुध, बेख़बर।
जल्दी से उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी।
तीन बज रहे थे।
काफ़ी वक्त हो गया था। फिर भी जाने उसे क्यों उम्मीद थी कि आफ़ाक उसके इंतज़ार में जाग रहा होगा… क्यों जागता भला वह…?
उसने भी बत्ती बुझाई और सो गई।
आदत भी क्या बुरी चीज़ है। तीन बजे सोई थी। ठीक छह बजे आँख खुल गई। सात बजे आफ़ाक ऑफिस जाता था। आफ़ाक उसके उठने से पहले ही उठकर जा चुका था। इसलिए वह उठ गई। फिर उसे यह भी ख़याल था कि आज इस घर में दो-तीन वर्कर भी हैं। अगर बेगम साहिबा देर से उठेंगी तो वे क्या सोचेंगे।
रसोई में गई तो बदरुल करीम वर्दी पहने हुए स्टूल पर बैठा था। उसे देखकर खड़ा हो गया। सलाम करने के बाद बोला—
“साहब के लिए क्या नाश्ता बनाऊँ?”
“नाश्ता मैं खुद बनाऊँगी।”
यह कहकर फ़लकी कमरे से बाहर निकल गई। झाँककर देखा। वाकई आफ़ाक तैयार हो रहा था।
उसने आकर नाश्ता बनाया। जब मेज़ पर लेकर गई तो आफ़ाक कुर्सी के पास बैठा हुआ था। शायद अपनी टाई की नॉट ठीक कर रहा था।
फ़लकी ट्रे उठाए उसके पास गई तो वह गुनगुना रहा था—
“तुम अगर हमको न चाहो तो कोई बात नहीं,
तुम किसी और को चाहोगी तो…”
गाना गाते-गाते घूमकर मुड़ा तो पीछे ही फ़लकी खड़ी थी। नरम होती हुई फ़लकी की निगाह उससे टकराई तो वह लड़खड़ा गई। ज़रा-सा आफ़ाक का कंधा लगा था। उसके हाथ से ट्रे छूटकर गिर गई और सब कुछ बिखर गया। टूट-फूट गया।
वह एकटक आफ़ाक की आँखों में देख रही थी। चौंककर जल्दी से बैठ गई और गिरा हुआ नाश्ता और टूटे हुए बर्तन उठाने लगी।
आफ़ाक भी उसके साथ ही बैठ गया और उसका हाथ बँटाने लगा।
फ़लकी के हाथ काँप रहे थे और आँखों में मोटे-मोटे आँसू थे।
आफ़ाक अभी तक सीटी पर वही धुन बजा रहा था और फ़लकी का दिल कटा जा रहा था। “कोई बात नहीं…” यह कहते हुए उसने फ़लकी का काँपता हुआ हाथ पकड़ लिया।
फ़लकी ने नज़र भरकर उसकी तरफ देखा… और दो बचे हुए आँसू उसकी पलकों की बाँध तोड़कर गालों पर आ गए। आफ़ाक बड़े प्यार से हँसा।
दोनों एक साथ खड़े हो गए।
“अब्दुल करीम, नाश्ता लाया गया है?” उसने धीरे से कहा।
“नहीं, मैं खुद बनाती हूँ।”
यह कहकर वह बाहर दौड़ गई। उसके दिल की जो हालत थी, उसमें वह वहाँ रुक नहीं सकती थी।
रसोई में जाकर उसने अब्दुल करीम को भेजा। वह झाड़न हाथ में लिए मुड़ता हुआ आ गया। उसने बचे हुए टुकड़े उठाए और गीले कपड़े से कालीन को साफ़ किया। इतने में फ़लकी दोबारा नाश्ता उठाकर मेज़ पर आ गई।
आफ़ाक अब भी धीमी-धीमी आवाज़ में गुनगुना रहा था—
“तुम अगर हमको न चाहो तो कोई बात नहीं…”
फ़लकी चुपचाप आकर मेज़ पर बैठ गई।
“क्या बात है? आपकी तबीयत ठीक है?” आफ़ाक ने बड़ी आहिस्तगी से पूछा।
“जी, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
“आप बिल्कुल पीली पड़ रही हैं। मेरा ख़याल है, बहुत थक गई होंगी। कल आपने काम भी तो बहुत किया था।”
“नहीं… थकावट की तो कोई बात नहीं है।”
“हाँ…” वह एकदम याद करते हुए बोला, “कल मैं आपको दावत देना तो भूल ही गया था। वाकई शानदार दावत थी और मेरी उम्मीद के ख़िलाफ़ सब कुछ इतना अच्छा था कि मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह तारीफ़ करूँ?”
फ़लकी ख़ामोश बैठी रही।
“रात देर तक आपका इंतज़ार करता रहा। फिर जाने आप किस वक्त अंदर आईं, मैं सो चुका था।”
फ़लकी अब भी चुप बैठी रही। उसे आफ़ाक की तारीफ़ से ज़रा भी खुशी नहीं हो रही थी। काश! उसने यह सब रात को कहा होता।
“मेरा ख़याल है, रात भी आपकी तबीयत ठीक नहीं थी?”
“नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं थी।”
“शायद आपको नज़र लग गई?”
“जी।”
फ़लकी ने चौंककर उसकी तरफ़ अविश्वास से देखा।
“आप लाल कपड़े न पहना करें।”
“आप ही ने कहा था।” फ़लकी ने खीजकर कहा।
“हाँ, मुझे अच्छे लगते हैं।”
फिर उसने प्याली की तरफ़ इशारा किया। फ़लकी हर रोज़ चाय बनाकर रखा करती थी। आज बेख़याली में भूल गई थी। फ़लकी जल्दी से चाय बनाने लगी।
“शुक्रिया!” उसने चाय की प्याली लेते हुए कहा।
चाय पीने के बाद बोला, “आज आप आराम करें। बहुत थकी लग रही हैं।”
“मैं आराम करूँगी तो काम कौन करेगा?”
“अब्दुल करीम जो है।”
“हाँ। अब अब्दुल करीम इस घर में रहेगा। यह मेरा पुराना ख़ानसामा है।”
फ़लकी का दिल चाहा कि पूछे, “यह अब तक कहाँ था?” मगर वह सिर्फ़ सौगवारी से मुस्कुराकर रह गई।
अब उसे आफ़ाक की अदाओं की समझ आ रही थी।
आफ़ाक खड़ा हो गया। फ़लकी भी खड़ी हो गई। दौड़कर उसका ब्रीफ़केस उठा लाई। वह फिर गुनगुना रहा था—
“तुम अगर हमको न चाहो तो…”
तो उसने रात को सब कुछ सुना था।
फ़लकी गरदन झुकाए खड़ी थी।
“अच्छा जी… वह मुड़ा, ख़ुदा हाफ़िज़!”
कोशिश के बावजूद फ़लकी के मुँह से कोई शब्द न निकल सका। जैसे उसका रोम-रोम एक ही ताल पर गुनगुना रहा था—
“तुम अगर हमको न चाहो… तुम अगर…”
यह क्या हुआ कि रिहाई के दिन क़रीब आए, ऊँची हो गई दीवार क़ैदख़ाने की!
फ़लकी ने घबराकर किताब हाथ से छोड़ दी और खड़ी हो गई।
“ऊँची हो गई दीवार क़ैदख़ाने की…”
क़ैदख़ाना…
भला कौन-सा क़ैदख़ाना…?
अब तो कोई क़ैद न थी। अब तो सारी दीवारें गिर गई थीं। पर्दे उठ गए थे। इस ज़िंदान में वह आज़ाद थी।
आज़ाद छोड़ दी गई थी।
फिर यह कैसी दीवार थी जो ला-शऊर में खड़ी हो रही थी। दिल के आस-पास तामीर हो रही थी।
यह दीवार कौन तामीर कर रहा है?
रिहाई के दिन तो नज़दीक आते जा रहे थे। इम्तिहान तो ख़त्म होने वाला था। आज़माइश में तो वह पूरी उतरी थी।
यह मीठा-मीठा दर्द कहाँ से दिल में उतर आया था।
और एकाएक यह हवा में, दुनिया की हर चीज़ में क्यों नज़र आने लगा था।
दर्द भरे गीत सुनती थी।
पहले दर्द भरे गीतों से उसे नफ़रत थी। उसे तेज़-तर्रार, लहू को गर्म कर देने वाला म्यूज़िक पसंद था, जिसकी लय पर सारा शरीर ख़ुद-ब-ख़ुद थिरकने लगे। चाचा-चा, बॉसा नोवा, जैज़… पॉप म्यूज़िक… शोर, उत्तेजना… तरंग… हंगामा, चीख-पुकार…
मगर अब जाने क्या हुआ था। दर्द भरे गीत लगाकर वह उन्हें सुनने बैठ जाती और आँखें मूँदकर सुना करती।
“अनजाने में, मैं बावरी,
लिख बैठी तेरे नाम उमरिया…”
यह भी कोई गीत हैं! किसी ज़माने में वह कहा करती थी, “ये जो लोग स्लो मोशन में गाते हैं, ये तो जज़्बात को सुला देते हैं।”
और अब यही धीमी रफ़्तार के गाने उसके जज़्बात को जगा रहे थे। मोहब्बत के मफ़हूम से आशना कर रहे थे।
उसे शेर-ओ-शायरी से ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी। न उर्दू की शायरी अच्छी लगती थी, न अंग्रेज़ी की। मेले हिट्स, पैटर्न… सब ही उसके लिए ख़ास थे। मोहब्बत को दूर रखते थे और दर्द को खुशी कहते थे।
दर्द भला खुशी किस तरह हो सकता है?
और इधर मिर्ज़ा ग़ालिब, इक़बाल, मीर, ज़ौक़… जाने क्यों लोग उन पर मर-मिट रहे थे। मोहब्बत ही का राग था, जो उन्होंने अपनी-अपनी डफली पर सजाया था।
“दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस मर्ज़ की दवा क्या है?”
“वाह! यह भी कोई शेर है?” वह यह ग़ज़ल सुनकर कहा करती थी। “अगर दिल नादान ही है तो उससे यह पूछना क्या मायने रखता है कि तुझे क्या हुआ है? और दर्द की क्या दवा है? यह बात तो डॉक्टर से पूछनी चाहिए।”
और अब ग़ालिब की यह ग़ज़ल वह बार-बार सुन चुकी थी।
“या इलाही, यह माजरा क्या है?
हम में मुश्ताक और वो बेज़ार।
या इलाही, यह माजरा क्या है?”
वह दिल में सोचा करती कि हर शेर और हर शब्द का मतलब उसे क्यों समझ में आने लगा है।
आफ़ाक की लाइब्रेरी में शेर-ओ-शायरी की बेशुमार किताबें रखी थीं। वह हर रोज़ वहाँ से एक किताब उठा लाती और पन्ना-पन्ना पढ़ती। जो शेर अच्छा लगता, उस पर निशान लगा देती। बार-बार पढ़ती और फिर उसे शायरों की इल्हामी क़ुव्वत पर ईमान लाना पड़ता।
जो दर्द आम तौर पर एक इंसान के दिल पर गुज़रता है, उन्हें भला एक शायर कैसे समझ लेता है? समझ लेता है तो फिर हर शख़्स के एहसासात के मुताबिक बयान कैसे कर सकता है?
शायर न हुआ, वली हो गया। इसी वास्ते लोग कहते हैं, शायरों को इल्हाम होता है। उन पर शेर नाज़िल होते हैं।
वह तो यूँ ही शायरी को बक-बक समझती थी।
“जिन्हें मैं ढूँढ़ता था आसमानों में, ज़मीनों में,
वो निकले मेरे ज़ुल्मत-ख़ाना-ए-दिल के कमीनों में।”
जाने कैसे इतने मुश्किल से शेर उसके दिल में आकर बैठ गया।
वह तो नगर-नगर जाने क्या तलाश करती फिरती थी। अपने दिल में झाँककर देखा ही न था।
“मोहब्बत में नहीं कुछ फ़र्क़ मरने और जीने में,
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।”
वाह! क्या बात कही है…
जो अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद मैं ख़ुद न कर सकी।
“होता है राज़-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत इन्हीं से फ़ाश,
आँखें ज़बाँ नहीं, मगर बेज़बान नहीं।”
अब तो वह आँखों की ज़बान समझने लग गई थी। क्योंकि उसकी अपनी आँखें बोलने लगी थीं।
जब से उसकी ज़बान बंद हुई थी और आँखें बोलने लगी थीं, उसे अपनी आँखों से डर आने लगा था। वह आफ़ाक की तरफ़ देखते हुए डरती थी और उससे नज़र मिलाकर बात नहीं करती थी।
यही बेबाक निगाहें, जिनसे हमेशा उसने बड़े-से-बड़ा काम लिया था। आफ़ाक को भी शुरू में बेझिझक देखा करती थी। शर्माती नहीं थी, झिझकती नहीं थी। अब वही निगाह उठती नहीं थी।
उस निगाह से उसे डर लगता था। वह निगाह चुग़लख़ोर हो गई थी। और चुग़लख़ोर का भेद कभी-न-कभी खुल जाता है, इसलिए वह डरती रहती थी, सहमी रहती थी।
और फिर इन्हीं शेरों ने उसके अंदर बदलती हुई सारी कैफ़ियत उस पर अयाँ कर दी।
मोहब्बत क्या है?
दिल का बेबस और मजबूर हो जाना!
सुकून-ओ-ज़ब्त की मंज़िल से कोसों दूर हो जाना।
हाँ, तो वह जो यूँ हिरनी की तरह चौकन्नी-सी, बौखलाई हुई फिर रही थी, तो इसकी यही वजह थी…
जाने दिल क्यों हर वक़्त उड़ा-उड़ा सा रहता था। जाने क्यों नब्ज़ धीमी चलती थी, मगर दिल तेज़ धड़कता था। जाने क्यों बैठे-बैठे वह चौंक जाती थी। जाने क्यों हर आहट पर डर जाती थी।
रात को नींद नहीं आती थी। दिन को चैन नहीं आता था। सारे घर में पाँव जली-सी, बोली-बोली फिरती थी।
कुछ तो घर का काम भी कम हो गया था। अब्दुल करीम खाना पकाने पर मामूर हो गया था। ऊपर का काम करने के लिए एक बार फिर तुफ़ैल आ गया था। जमादारनी की बेटी सलीमा बड़ी अच्छी लड़की थी और सफ़ाई का सारा काम उसने सँभाल लिया था। पौधों की देखभाल के लिए फिर सलामत अली आने लगा था और अचानक सारे काम करते-करते फ़लकी को यूँ महसूस होने लगा जैसे किसी ने उसके हाथ-पाँव तोड़कर उसे एक तरफ़ डाल दिया हो।
पूरे दो महीने उसने इस घर में मेहनत की थी और अब उसे काम करने की आदत पड़ गई थी। एक-दो दिन तो वह बिस्तर पर पड़ी रही और आराम करती रही। फिर उसे महसूस हुआ कि उसे किसी का किया हुआ काम पसंद नहीं आता।
गो अब्दुल करीम खाना अच्छा पकाता था, मगर मसाला ज़रूरत से ज़्यादा भून देता था, जिससे सालन का रंग काला हो जाता था। और काले रंग का सालन कितना भी लज़ीज़ क्यों न हो, कोई भी खाना पसंद नहीं करता।
तुफ़ैल झाड़-पोंछ करते वक़्त छोटी-छोटी चीज़ें अपनी जगह से नहीं हटाता था। सामान के नीचे गर्द रह जाती थी।
सलीमा ग़ुसलख़ानों को शीशे की तरह नहीं चमकाती थी। दीवारों पर और टाइलों पर पानी के क़तरे वैसे ही रह जाते थे। बिस्तर की चादरें भी ठीक से नहीं बिछती थीं।
आफ़ाक के जूते साफ़ होते थे, मगर उनकी पॉलिश में वह चमक नहीं होती थी।
वैसे तो हर काम होने लगा था, मगर किसी काम में उसे सलीक़ा नज़र नहीं आता था। अब शायद उसे नज़र मिल गई थी।
तब फ़लकी के ख़याल में आया कि कभी घर को अकेले नहीं बना सकते। जितने ज़्यादा नौकर घर में होते हैं, उतनी ही गंदगी ज़्यादा होती है। काम ज़्यादा बिगड़ता है, क्योंकि हर कोई ज़िम्मेदारी दूसरे पर डाल देता है।
कभी-कभी उसका दिल चाहता कि वह सारे नौकर निकाल दे। लेकिन उसको यह हक़ किसने दिया था?
और इस घर पर उसका अधिकार था ही क्या?
उसने कभी समझा ही नहीं और आफ़ाक को हमेशा यही एहसास कराया कि वह यहाँ ख़ुश नहीं है और न इस घर को अपना घर समझती है।
तो फिर क्या किया जाए…
सारे कामों का एक स्तर उसने बना लिया था और अब बनावटी बेगमों की तरह वह महज़ हुक्म चलाने पर ज़िंदगी नहीं गुज़ार सकती थी, जबकि उसका कोई और मशग़ला भी नहीं था।
तब उसने सोचा कि वह इन सबके साथ मिलकर काम कर लिया करेगी। नौकरों के साथ मिलकर काम करने में कोई हर्ज़ नहीं। शरीर भी चुस्त रहता है और वक़्त भी कट जाता है। और फिर नौकर कभी ठीक तरह से काम करते हैं?
एक और तब्दीली भी उसमें आ गई थी। वह नहीं चाहती थी कि आफ़ाक का काम कोई और करे। आफ़ाक का हर काम वह ख़ुद अपने हाथों से करना चाहती थी और यह बात उसने नौकरों से कह दी थी।
शायद ला-शऊरी तौर पर वह चाहती थी कि आफ़ाक को कभी भी नौकरों की आदत न पड़े।
सुबह उठकर वह ख़ुद रसोई से आफ़ाक के लिए चाय बनाकर लाती। फिर उसका नाश्ता भी ख़ुद बनाती। पास बैठकर उसे खिलाती। जाते वक़्त उसका ब्रीफ़केस उसे पकड़ााती। और जब वह ख़ुदा हाफ़िज़ कहकर चला जाता तो दोबारा मेज़ पर आकर बैठ जाती।
सुबह का अख़बार देखकर वह यूँ ही मेज़ पर फैला जाया करता था। वह अख़बार में गुम हो जाती। फिर अब्दुल करीम उसके लिए नाश्ता बनाकर लाता। वह आहिस्ता-आहिस्ता नाश्ता करती।
नाश्ता करने के बाद रसोई में जाती। अब्दुल करीम को सौद-सलफ़ के बारे में समझाती। उस दिन का मेन्यू बताती। आफ़ाक के लिए एक सालन ख़ुद बनाती। फिर सारा काम समझाकर ड्रॉइंग रूम में आ जाती।
वहाँ बहुत से काम वह तुफ़ैल को समझाती, बल्कि अपने सामने सारी झाड़-पोंछ करवाती।
ग्यारह बजे के क़रीब सलीमा आ जाती। सलीमा चौदह-पंद्रह साल की जवान…लड़की थी, मगर बड़ी साफ़-सुथरी थी और इतनी ही बातूनी भी थी।
सलीमा के अलावा वह किसी को अपने कमरे में नहीं आने देती थी। फिर वह सलीमा के साथ मिलकर बिस्तर की चादरें बदलती, नए फूल लगाती। कमरे और ग़ुसलख़ाने चमकाती।
बारह-एक बजे तक वह काम से बिल्कुल फ़ारिग़ हो जाती। हाथ-मुँह धोकर साफ़ कपड़े बदल लेती।
एक बजे आफ़ाक ऑफिस से घर आ जाता था। अब उसने दोपहर का खाना घर पर खाना शुरू कर दिया था।
खाने की मेज़ पर हर रोज़ फूल सजाकर, बर्तन लगाकर फ़लकी आफ़ाक का इंतज़ार किया करती। धीमे-धीमे सुरों में रेडियो भी लगा लेती।
घर को साफ़-सुथरा करने के बाद उसे यूँ महसूस होता जैसे घर में एक ज़िंदगी आ गई है… सुकून आ गया है। घर मुस्कुरा रहा है… बोल रहा है… और ऐसा हँसता-मुस्कुराता घर उसे बहुत अच्छा लगता था।
रेडियो से नग़मे बुलंद होना शुरू होते तो वह कोई किताब लेकर रेडियो के पास बैठ जाती। कभी उसकी निगाह सफ़हे पर होती, कभी कान रेडियो की तरफ़ होते।
एक लम्हे के लिए अगर वह इस शेर पर रुक जाती—
“आहट पर कान, दर पर नज़र, दिल में इश्तियाक़,
कुछ ऐसी बेख़ुदी है हमें इंतज़ार की!”
तो दूसरे ही लम्हे में गायिका की आवाज़ उसकी तवज्जो खींच लेती—
“तुम मेरे पास रहो,
मेरे क़ातिल, मेरे दिलबरा, तुम मेरे पास रहो।”
लेकिन उसका दिल…!
उसका दिल मचलता… बेकरार रहता… दिल गेट के आस-पास मंडलाता रहता।
दिल दौड़-दौड़कर थक जाता।
जाने इस शोर में उसे कार के हॉर्न की आवाज़ कैसे सुनाई दे जाती। ज्यों ही गेट में…अंदर आते ही आफ़ाक एक ख़ास अंदाज़ में हॉर्न बजाता। उसका दिल उछलकर हलक़ में आ जाता। चेहरा लाल हो जाता। वह घबराकर खड़ी हो जाती।
किस क़दर बेचैनी से वह रोज़ आफ़ाक का इंतज़ार किया करती थी, मगर उसके आ जाने से घबराहट तारी हो जाती थी। हाथों में पसीना आ जाता, दिल धड़कने लगता। कुछ समझ में न आता।
वह दौड़ी-दौड़ी रसोई में खाना निकालने चली जाती। वापस आती तो आफ़ाक खाने की मेज़ के सिरे पर बैठा कोई अंग्रेज़ी रिसाला देख रहा होता।
वह खाते वक़्त न तो बातें करता और न इधर-उधर देखता था। बस रिसाला पढ़ता रहता था।
शुरू से ही फ़लकी को उसकी यह आदत बुरी लगती थी। भला यह भी कोई तहज़ीब है कि दो शख़्स खाना खा रहे हों, उनमें से एक लगातार पढ़ता रहे और दूसरा उसका चेहरा देखता रहे।
फ़लकी को आफ़ाक की यह आदत अख़लाक़ से गिरी हुई लगती थी। वह समझती थी कि आफ़ाक उससे रुख़ मोड़ने की ख़ातिर पढ़ता रहता है।
मगर अब रफ़्ता-रफ़्ता उसे पता चल गया था कि यूँ पढ़ना आफ़ाक की आदत है और आजकल तो वह शुक्र करती कि आफ़ाक की यह आदत है।
क्योंकि वह उसका चेहरा देखती रहती…
उसकी झुकी-झुकी पलकें…
उसकी वे आँखें, जो कभी मेहरबान न हुई थीं।
आफ़ाक की प्लेट में सालन ख़त्म हो जाता तो वह सालन डाल देती। चावल ख़त्म हो जाते तो प्लेट में दूसरे चावल रख देती।
आफ़ाक बस मशीन की तरह खाता रहता।
और फ़लकी मशीन की तरह हर चीज़ बढ़ाती रहती।
क्या वे दोनों मशीनी इंसान थे?
खाना खाने के बाद आफ़ाक उठकर हाथ धोता। अगर शाम का कोई ख़ास प्रोग्राम होता या किसी ने आना होता तो फ़लकी को बता देता, वरना “ख़ुदा हाफ़िज़” कहकर चला जाता।
जब तक उसकी कार गेट से बाहर न निकल जाती, फ़लकी यूँ ही गुमसुम बैठी रहती।
आफ़ाक चला जाता और उसकी ख़ुशबू, उसके सिगरेट की ख़ुशबू कमरे में रह जाती।
फ़लकी बमुश्किल-सा खाना प्लेट में डालकर…उसका रिसाला उठा लेती। रिसाले के ऊपर जगह-जगह सालन वाली उँगलियों के निशान होते। कितनी लापरवाही से आफ़ाक रिसाला पढ़ता था और साफ़ पता चल जाता था कि उसने कहाँ-कहाँ से रिसाला पढ़ा है।
फ़लकी उसके छोड़े हुए सफ़हे पढ़ती जाती और सोचती रहती कि आफ़ाक उसके साथ भी ग़ालिबन रिसाले वाला ही सुलूक कर रहा है।
पढ़ा और फेंक दिया…
लेकिन…
रिसाले पर तो वह अपने निशान छोड़ जाता था, जबकि फ़लकी पर उसकी ज़िंदगी का कोई निशान न था।
फ़लकी उसकी ज़रूरत न थी।
ख़्वाहिश न थी।
उसका हासिल न थी।
फ़लकी ज़बरदस्ती उसकी ज़िंदगी में घुस आई थी… और अब वह बड़ी शराफ़त से उसे गवारा कर रहा था।
फ़लकी को अपनी पिछली ज़िंदगी पर बहुत अफ़सोस होता। अपनी नादानी पर रंज होता था। वह कितनी बेवकूफ़ थी। भला यूँ भी मर्द को जीता जा सकता है?
उसने कितना ग़लत क़दम उठाया। अपनी ज़िंदगी बर्बाद की और आफ़ाक का भी सुकून लूट लिया।
उसे आफ़ाक से हमदर्दी महसूस होने लगी थी।
हमदर्दी…?
उसका दिल उससे पूछा करता।
क्या यह सिर्फ़ हमदर्दी है?
इसके पीछे कोई और जज़्बा नहीं?
क्यों उसकी आहट सारे घर में भर जाती है? उसकी मोटर का हॉर्न मेरे अंदर हैजान पैदा कर देता है। उसकी आहट से तेरा दिल धड़क उठता है। जब भी फ़ोन की घंटी बजती है, ऐसा लगता है जैसे कोई तेरे दिल को खींच रहा हो।
तो…सारा दिन उसी के बारे में सोचती है। जब वह सामने बैठा हो तो तेरी ज़बान गूँगी हो जाती है। जब वह ओझल हो तो उससे हज़ारों शिकवे और गिले करती है। बेचैनी से रात का इंतज़ार करती है। रात आती है तो करवटें बदल-बदलकर सुबह की दुआएँ करती है।
“मुझे आख़िर क्या हुआ है?”
“क्या हुआ है मुझे?”
वह अपने दिल से पूछती… और फिर घबराकर बाहर निकल जाती। गेट तक चली जाती। फिर गेट से बाहर निकल जाती।
स्टूल पर बैठा हुआ चौकीदार एकदम खड़ा हो जाता और फिर उसे सलाम करता। वह सिर के इशारे से उसे जवाब देकर आगे निकल जाती।
सड़क पर खड़ी होकर दूर-दूर तक देखती। बाहर कितनी बड़ी दुनिया थी… एक और ही दुनिया थी।
गो यह इतनी बड़ी दुनिया थी, मगर हर घर की दुनिया अलग थी।
अब फ़लकी आज़ाद थी। गेट से बाहर आ सकती थी। अब कोई रोक-टोक न थी। हर दरवाज़ा खुला रहता था। कोई पहरा न था।
फिर न जाने उसे अपने पैरों में एक भारी ज़ंजीर का एहसास क्यों होता था। उसे ऐसा लगता जैसे उसके पैरों में बेड़ियाँ हैं।
अब उसे हर जगह आने-जाने की आज़ादी थी, मगर घर से कहीं जाने को दिल न चाहता।
अब उसका दिल चाहता था कि इसी घर के किसी कोने में मुँह छुपाकर सो जाए… फिर कभी न उठने के लिए…
वह सड़क पर ज़्यादा देर खड़ी न होती। इसलिए कि जब तक वह सड़क के किनारे खड़ी रहती, चौकीदार अपनी जगह पर खड़ा रहता। एक आदमी को वह इतनी तकलीफ़ नहीं देना चाहती थी।
वह अंदर आ जाती, ताकि चौकीदार अपनी सीट पर बैठ जाए।
फिर लॉन में चली जाती और पेड़ों के नीचे नंगे पाँव यूँ घूमती जैसे कोई…नाआसूदः रूह हो और अपना जिस्म तलाश करती फिर रही हो।
वह ऐसा परिंदा बन गई थी, जिसके पर काटकर खुली फ़ज़ाओं में छोड़ दिया गया हो।
किसने काटे थे उसके पर?
उसने तो किसी के हाथ में कैंची नहीं देखी थी। उसके अपने एहसास ने उसके पर काट दिए थे।
एक अजीब-सा दर्द उसके अंदर समाया था। वह किसी से हाल-ए-दिल कहना चाहती थी। मगर कौन था सुनने वाला…?
तसव्वुर ही तसव्वुर में आफ़ाक से बेशुमार बातें कर लेती, मगर जब वह सामने होता तो फ़लकी की ज़बान को ताले लग जाते।
क्या वह उससे डरती थी…?
नहीं। डरने का मौसम तो बीत गया था।
क्या वह उससे नफ़रत करती थी?
नफ़रतें तो अपने लिबास फाड़ चुकी थीं।
तो फिर क्या था?
क्या था…?
जो उसकी समझ में नहीं आ रहा था।
कभी-कभी ऐसा होता कि आफ़ाक के पास बैठे हुए वह अपने ख़यालों की दुनिया में इस तरह खो जाती कि उसे एहसास ही न रहता कि कहाँ है, क्या कर रही है, किसके पास है।
आफ़ाक उसे बुलाता रह जाता और फिर हैरत से उसका चेहरा देखने लगता।
एक रोज़ उसे यूँ ही अपने ख़यालों में गुम और परेशान देखकर आफ़ाक ने पूछ ही डाला था—
“क्या बात है, फ़लकी… आजकल आप बहुत खोई-खोई सी रहती हैं?”
वह यूँ चौंकी जैसे उसके पैरों पर लोहा आ गिरा हो।
“जी?”
“मैंने पूछा था, क्या बात है? आप बहुत चुप-चुप रहती हैं?”
“जी, कुछ भी तो नहीं… कुछ भी तो नहीं…” फ़लकी ने सरासिमगी के साथ कहा।
“कोई बात तो ज़रूर है।”
“जी, आप यक़ीन करें, कोई बात नहीं…”
“मैं इतनी देर से आपसे कह रहा हूँ, एक गिलास पानी पिला दीजिए। मगर आप न जाने किस जहाँ में गुम हैं।”
“अच्छा जी…!”
फ़लकी एकदम खड़ी हो गई।
“यह… आपने पानी माँगा था? मैं अभी लाती हूँ।”
वह उठकर बे-तहाशा दौड़ी…
आफ़ाक को हँसी आ गई।
जब वह प्लेट में पानी का गिलास रखकर अंदर आई तो आफ़ाक अभी तक हँस रहा था। फ़लकी ने हाथ आगे बढ़ाया तो उसने साफ़ महसूस किया कि फ़लकी का हाथ काँप रहा था और गिलास में पानी छलक रहा था।
आफ़ाक ने आहिस्ता से गिलास समेत प्लेट पकड़ ली… और दूसरे हाथ से फ़लकी का हाथ पकड़ लिया।
फ़लकी एकदम उछल पड़ी।
“आपकी तबीयत तो ठीक है? आपका हाथ क्यों काँप रहा है? और यह इतना ठंडा क्यों हो रहा है?”
“जी… कुछ भी तो नहीं हुआ… मैं… मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ।”
फ़लकी ने अपना हाथ इस तरह छुड़ा लिया जैसे उसकी चोरी पकड़ी जाने वाली हो।
“आपकी तबीयत नासाज़ हो तो आप डॉक्टर को दिखाएँ।”
“आपको वहम हो गया है। मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ।”
फ़लकी थोड़ा दूर जाकर बैठ गई।
आफ़ाक ने उसका हाथ पकड़ लिया था। उसका शरीर अभी तक लरज़ रहा था।
“आप अपनी इतनी-सी बात के लिए उदास तो नहीं हो गईं?”
“जी नहीं…”
फ़लकी ने नज़रें झुकाकर कहा, “उनका ख़त आया था?”
“जी!”
“आपने जवाब दे दिया था?”
“जी, मैंने जवाब दे दिया था।”
“आजकल कहाँ हैं वो?”
“वो अमेरिका से कनाडा अपनी एक सहेली के पास चली गई हैं।”
“कब तक आएँगी?”
“उन्होंने लिखा था, दो-तीन महीनों के बाद आ जाएँगी, यानी सर्दी के शुरू होते ही।”
“और डैडी कहाँ हैं आजकल?”
“वो तो नाइजीरिया में हैं। मम्मी ने लिखा था, उनका काम और छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया है, इसलिए वह भी वहीं रुक गई हैं। अब दोनों इकट्ठे आएँगे।”
“आपकी… मेरा मतलब है, आपकी अम्मी का ख़त भी आया था।”
“फिर आपने मुझे क्यों नहीं दिया? बदला उतारने के लिए?”
“नहीं… वो तो मेरे नाम था।”
“आपके नाम? नहीं था?”
“अच्छा!” आफ़ाक ने ताज्जुब से कहा। “यह क्या लिखा था उन्होंने?”
“मैं आपको ला देती हूँ। आप पढ़ लें।”
फ़लकी उठकर ख़त ले आई। आफ़ाक ने पढ़ लिया।
“अम्मी ने तो लिखा है कि उम्मीद है तुम दोनों ख़ुश-बाश होगे।”
“जी…”
“फिर उसके जवाब में क्या लिखा जाएगा?”
“जवाब तो मैं लिख भी दिया है।”
“लिख दिया है…?” आफ़ाक ने हैरत से कहा, “कब?”
“जिस दिन ख़त आया था।”
“वाह… क्या लिखा है?”
“बस, जो लिखना था लिख दिया।”
“तो गोया आपका ख़त पढ़ने के लिए मुझे अमेरिका जाना पड़ेगा।”
“इतना महत्वपूर्ण नहीं है मेरा ख़त…”
“आपको क्या मालूम कि कितना महत्वपूर्ण है?”
जब फ़लकी ने हैरान होकर नज़र उठाई तो आफ़ाक ने जल्दी से किताब उठा ली थी और पढ़ने लगा था।
फलकी सोने की बजाय अपने बिस्तर पर बैठी हैरानी से आफ़ाक को देख रही थी। क्यों देखे जा रही थी, उसे खुद भी मालूम नहीं था।
उसे मालूम था कि इस तरह पलकें बाँधकर देखना बेहद गैर-शरीफ़ाना हरकत है। मगर न जाने उसे क्या हुआ था। उसका दिल चाहता था कि वह आफ़ाक की तरफ़ देखती रहे, देखती रहे, यहाँ तक कि उसके नैन-नक्श में खो जाए।
मर्द के लिए दुनिया ने खूबसूरती के कोई खास मापदंड तय नहीं किए। मर्द का मर्द होना… बहादुर होना… जाँबाज़ होना ही उसका सबसे बड़ा हुस्न होता है। गोरा हो या काला, लंबा हो या छोटा… कोई खास अहमियत नहीं रखता। हाँ, अगर वह बड़े-बड़े काम कर रहा हो तो वह तमाम मर्दों से क़द-आवर और खूबसूरत नज़र आता है। गोया खूबसूरत मर्द वह है जो खूबसूरत और अज़ीम काम करे। अपनी ख़ुद्दारी कायम रखते हुए रोज़ी कमाए और अपनी आन-बान को घटिया मशगलों में ज़ाया न करे।
आफ़ाक का दफ़्तर देख चुकी थी और उसे अच्छी तरह अंदाज़ा हो गया था कि आफ़ाक बड़ा उसूल-पसंद आदमी है। लड़कियाँ तो क्या… वह दफ़्तर में मर्दों से भी ज़रूरत से…ज़्यादा बात नहीं करता था। खुद समय का पाबंद था। मेहनती था… और दूसरों से भी समय की पाबंदी और मेहनत की उम्मीद रखता था। फ़िज़ूल बातें नहीं करता था और न ही इस किस्म की डींगें हाँकता था कि मैंने दुनिया को अपने कंधों पर उठा रखा है। मैं फलाँ इब्ने फलाँ हूँ। हालाँकि इस मुल्क में उसने अपने कारोबार की धाक जमा रखी थी और पिता के मरने के बाद दिन-ब-दिन कारोबार को फैलाता जा रहा था।
घर में भी उसकी आदतें बड़ी अच्छी थीं।
उन कशमकशों के अलावा जो शुरुआत में दोनों के बीच हुई थीं, फ़लकी ने आफ़ाक में कोई क़ाबिले-एतराज़ बात नहीं देखी थी।
वह मर्द था। कोई काठ का पुतला नहीं था… और मर्द भी ऐसा जिसने एक दुनिया से संपर्क कायम कर रखा था। भला वह एक मामूली-सी लड़की से शिकस्त क्यों खा जाता। हाँ, फ़लकी ने इस तरह उसे मात देने की कोशिश की थी। अगर वह उसे मोहब्बत से मुसख़्ख़र करने की तमन्ना करती तो हालात बिल्कुल अलग होते।
ऐसे आदमी असाबी तौर पर मज़बूत होते हैं और अपनी निजी ख़्वाहिशों के आगे अपने दिल और जिस्म को झुकाते नहीं। और यही बात… फ़लकी उसके चेहरे पर ढूँढ़ रही थी।
ज्यों-ज्यों वह उसे ग़ौर से देखती… त्यों-त्यों वह फ़लकी को अच्छा लगता, प्यारा लगता। वह बेनियाज़-सा बनकर उसके सामने बैठा था। हमेशा की तरह आगे एक अंग्रेज़ी मैगज़ीन खुली हुई थी।
उसने रात के कपड़े पहन रखे थे। नीले रंग की बुशर्ट के अधखुले गले में से उसकी छाती के बाल साफ़ नज़र आ रहे थे और जब वह साँस लेता तो वे बाल इस तरह हिलते जैसे किसी ने उन पर हल्की-सी फूँक मारी हो।
बैठे-बैठे फ़लकी का दिल चाहा, वह यह हरकत करे। वह आफ़ाक के क़रीब जाए… बहुत क़रीब… और आफ़ाक के सीने पर फूँक मार दे।
नहीं…!
फ़लकी का दिल बैठने लगा और… उसने खुद ही इसकी तस्दीक कर दी। आफ़ाक उसे कभी नहीं अपना सकेगा। वह आफ़ाक के क़रीब कभी न जा सकेगी… कभी नहीं।
आफ़ाक उसके अतीत के बारे में सब जानता है। उसने तो उसे महज़ सबक सिखाने के लिए यहाँ रख छोड़ा है। वह भी तो अपनी क़ैद की मुद्दत काट रही थी।
फिर यह सब कैसे हुआ? रिहाई के दिन क़रीब आए तो बुलंद हो गई क़ैदख़ाने की दीवार।
कब…? किसी वक़्त, कैसे…? यह सब कैसे हुआ आख़िर…!
न तो तुमने कोशिश की… और न मैंने चाहा।
पर तुम आराम से मेरे मन में चले आए। एक देवता की तरह अंदर आकर बैठ गए। यूँ मेरी रग-रग में समा गए कि तुम्हें अपने आप से अलग करना मेरे लिए मुश्किल हो गया।
कितनी कठिन मंज़िलों से गुज़रकर मुझे पता चला कि इश्क़ क्या चीज़ है। मोहब्बत क्या होती है?
वफ़ा की मंज़िल कहाँ है?
फ़ना का तरीक़ा कौन-सा है?
मैं फ़िज़ूल जज़्बों को मोहब्बत कहती रही। इश्क़ से मुझे नफ़रत थी, क्योंकि इश्क़ ने मुझे फ़ना के घाट उतार दिया है।
लेकिन अब मुझे मालूम हुआ… इश्क़ और मोहब्बत के बीच जिस्म कोई पड़ाव नहीं, कोई मंज़िल नहीं।
इश्क़ जिस्मानी क़ुर्बत से मावरा होता है। विसाल मोहब्बत को फ़ना कर देता है। इश्क़ तो मर जाने का, मिट जाने का, घुल जाने का नाम है…
इश्क़ तो एक आँच है जो दूर-दूर से तन-मन को फूँकती रहती है।
तुमने कितना अच्छा किया, आफ़ाक!
मुझे अपने से दूर रखा… एक फ़ासला रखा… उस फ़ासले ने मुझे नए जज़्बों से आशना किया। मैंने मोहब्बत और जिस्म को अलग देख लिया, समझ लिया और जान लिया और मुझे पता चला… मोहब्बत… इश्क़… फ़ना…
ये सब जिस्मों के खेल से मावरा हैं। बहुत ऊँचे… बहुत अज़ीम जज़्बे हैं। जिस्म तो एक भूख है। भूख एक ज़रूरत है और ज़रूरत को पूरा कर लेना कभी मक़सद की मेराज नहीं होती। और ज़रूरतें कभी-कभी इंसान को बहुत घटिया मख़लूक बना देती हैं। ज़रूरतों के ग़ुलाम नफ़्स के ग़ुलाम हो जाते हैं… ज़रूरतों को शिकस्त देने वाले वक़्त की लगाम अपने हाथ में ले लेते हैं।
इश्क़ ऐसी सब ज़रूरतों से मावरा होता है और तुमने ये कैसे पाकीज़ा जज़्बे मेरे दिल में जगा दिए, आफ़ाक! तुम्हारा किस मुँह से शुक्रिया अदा करूँ। तुम कभी ज़रूरत बनकर मेरे पास नहीं आए। हालाँकि तुम भी एक मर्द हो…
तुमने कभी सफ़ली जज़्बात की ख़ातिर झोली नहीं फैलाई…
हालाँकि तुम फ़रिश्ता नहीं हो… तुम जिस लड़की से नफ़रत करते थे, तुमने उस लड़की को पामाल नहीं किया। हालाँकि तुम चाहते तो ऐसा कर सकते थे। तुम्हें क़ानून और शरीअत ने ये हक़ दिया था…
और… और…
मैंने भी तुम्हें ये हक़ दिया था…
मैंने भी ऐसा चाहा था…
तुम्हारा होने के लिए मुझे सब गवारा था…
गर तुम देखो, आज तुम्हारे नाम से मेरे इर्द-गिर्द कितने चराग़ रोशन हो जाते हैं। ये सोचकर कि तुम उन सब मर्दों से कितने मुख़्तलिफ़ हो… कितने अज़ीम हो… और यादों में दिल लग गया, नाज़िम भी हो…
तुम्हारे जैसे मर्द को ज़ालिम भी होना चाहिए…
जो शख़्स अपने आप पर ज़ुल्म कर सकता हो, अपने नफ़्स पर ज़बर कर सकता हो, उसे दूसरों पर ज़ुल्म करने का हक़ हासिल है… और ये दूसरों के हक़ में ज़ुल्म नहीं होगा, मेहरबानी होगी, जिस तरह मुझ पर ये मेहरबानी हुई…
मैं क्या से क्या हो गई…
कल तक मैं जिस्म ही जिस्म थी और आज मैं रूह हूँ… और इश्क़ भी रूहों का मिलाप है। रूह किसी से कोई तवक़्क़ो नहीं रखती, वह तवक़्क़ोओं से बाला होती है… मैं भी रूह बनकर तुम्हारे बदन में तहलील हो जाना चाहती हूँ…
ये सब सोचते-सोचते फ़लकी की आँखों में आँसू आ गए। किसी जज़्बे ने उसे रुला दिया। उसने हाथ बढ़ाकर अपने बहते हुए आँसू खुद ही साफ़ कर लिए। मबादा आफ़ाक देख ले। आँखें साफ़ करने के बाद भी वह लगातार आफ़ाक की तरफ़ ही देख रही थी।
आफ़ाक कई बार फ़लकी की तरफ़ देख चुका था। पढ़ते-पढ़ते वह चौंक जाता और एकदम फ़लकी की जानिब देखने लगता, जैसे पूछ रहा हो—यूँ टकटकी बाँधकर मुझे क्यों देख रही हो?
फ़लकी चोर बनकर जल्दी से नज़रें चुरा लेती और ख़्वाह-मख़्वाह इधर-उधर देखने लगती। वह दोबारा किताब पढ़ने लग जाता।
फ़लकी दिल में सोचती—वह अब इस तरह आफ़ाक की तरफ़ नहीं देखेगी। मगर फिर सोचते-सोचते उसकी नज़र उसी तरफ़ जा टिकती… उसकी भटकती निगाह और ख़्वाबनाक ख़याल उसके चेहरे पर आकर रुक जाते…
पता नहीं ये रोशन चेहरा उसकी कुल कायनात क्यों बन रहा था। वह हर बार पक्का तय करती कि अब आफ़ाक की तरफ़ नहीं देखेगी…
उम्र भर उसकी भटकती-भटकती निगाह वहीं जाकर रुक जाती, जैसे उसका आख़िरी केंद्र आफ़ाक का चेहरा हो…
आफ़ाक का रंग साँवला था, मगर चेहरे पर एक चमक और एक सुर्ख़ी थी। चमक शायद उसके अच्छे किरदार की थी और सुर्ख़ी उसकी सेहतमंदी की निशानी थी। जब उसमें कोई बुरी आदतें नहीं थीं तो उसकी सेहत को घुन क्यों लगता…
फ़लकी ने उसे कभी शराब पीते हुए नहीं देखा था। हालाँकि उसका तजुर्बा यही कहता था कि हर वह आदमी जिसके पास खाने-पीने को ज़रा-सा भी फ़ालतू है, वह शराबनोशी और अय्याशी को अपनी हानी बना लेता है…
उसके बहुत से बॉयफ्रेंड पीते थे। और तो और… उसके हल्क़े में कुछ ऐसी लड़कियाँ थीं जो पक्के मज़हबी घरानों से ताल्लुक रखती थीं, मगर खाने से पहले शग़लन बीयर ज़रूर पीती थीं।
जिस माहौल में फ़लकी रहती थी, वहाँ किसी ने इन बातों का बुरा नहीं माना था। इस वजह से फ़लकी को तअज्जुब होता था कि आफ़ाक की आदतें कितनी अलग-थलग थीं।
सिगरेट भी ज़्यादा नहीं पीता था। जब कोई परेशानी होती, तभी थोड़ी देर सिगरेट पीता रहता… और सिगरेट पूरी ख़त्म होने से पहले ही फेंक दिया करता…
वह घर से सुबह की नमाज़ पढ़कर ज़रूर जाया करता था। गोया वह अपने दिन की शुरुआत तो अल्लाह के नाम से ही करता था…
लिबास बहुत अच्छा पहनता था। खाना बहुत नफ़ीस खाता था… घर की हर चीज़ और हर बात में नफ़ासत पसंद करता था…
और ये सारी नफ़ासत फ़लकी ने उससे सीखी थी।
उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों में बला की जाज़िबियत थी। इतनी सेहतमंद और चमकदार आँखें फ़लकी ने बहुत कम देखी थीं। अब उसे एहसास होता था कि आँखों..मैं डूब जाना क्या होता है… उसके खुरदरे होंठ जो मुस्कुराना नहीं जानते थे, वे फ़लकी के दिल में धँस गए थे। ऐसे होंठों पर वह सौ बार कुर्बान होने के लिए तैयार थी।
आफ़ाक का सीधा-सादा चेहरा… उसके लिए भूलभुलैया बन गया था… वह जब भी उसकी तरफ़ देखती, उसमें खो जाती… कभी उसका जी चाहता, वह उसके चेहरे को अपने आँसुओं से तर कर दे… अपने आँसुओं से धो डाले… और कभी उसका जी चाहता… एक बच्चे की मानिंद उसका चेहरा दोनों हाथों से पकड़कर अपने सीने में छिपा ले… वह सीना जिसमें औरत के प्यार की तमामतर वुसअतें थीं…
लेकिन नहीं… वह लरज़ जाती… वह तो आफ़ाक के अहल नहीं है। उसके क़ाबिल नहीं है। न जाने उसने मीनार की तरह इतने बुलंद शख़्स से इतनी बड़ी मक्कारी क्यों की?
मगर वह ये बेईमानी कर बैठी थी…
और उसकी तलाफ़ी भी किसी तरह मुमकिन नहीं थी। उसका यहाँ से चले जाना ही ठीक था…
“क्या बात है फ़लकी…?”
अचानक आफ़ाक ने नज़र उठाई और उसे अपनी तरफ़ देखते पाकर पूछ लिया।
“कुछ नहीं… कुछ भी तो नहीं।”
फ़लकी बौखला गई और नज़रें चुराना चाहीं।
“आप मुझसे कुछ कहना चाहती हैं?”
“नहीं तो,” वह जल्दी से बोली।
“फिर आप इस तरह क्यों बैठी हैं…?”
फ़लकी ने अपनी तरफ़ देखा।
उसने अपना बिस्तर नहीं लगाया था। बेड के एक किनारे पर पैर लटकाए बैठी थी। पैरों में अभी तक जूते थे… दुपट्टा गोद में पड़ा हुआ था… पैर हिलाए जा रही थी और आफ़ाक की तरफ़ देखती जाती थी…
“आज सोने का इरादा नहीं है?”
“जी… सोने जा रही हूँ।”
वह जल्दी से खड़ी हो गई और बेड-कवर उठाकर बिस्तर ठीक करने लगी। आफ़ाक फिर पढ़ने लगा।
बिस्तर लगाकर फ़लकी बिस्तर पर बैठ गई और बाज़ाहिर उसने एक किताब उठा ली… वर्क़ गर्दानी करने के लिए… मगर वह वर्क़ गर्दानी भी बराए-नाम कर रही थी। आज उसका दिल दौड़-दौड़कर आफ़ाक के क़दमों से लिपट रहा था और वह डर रही थी कहीं उससे कोई अनहोनी न हो जाए।
और सोचते-सोचते फिर उसकी निगाह जाकर आफ़ाक पर टिक गई…
आफ़ाक उसे इस तरह क्यों अच्छा लगने लगा था?
वह सोच रही थी।
हालाँकि उसने और भी बहुत से मर्द देखे थे, मगर आफ़ाक उन सबसे जुदा था।
कितना अच्छा होता अगर वह आफ़ाक का मन जीत लेती। उसने दिल में सोचा…
लेकिन आफ़ाक को जीत लेना गोया एक दुनिया को जीत लेना था। और यह काम उसे कठिनतम और मुश्किलतम लग रहा था…
इसी वास्ते सारी दुनिया से उसकी दिलचस्पी ख़त्म हो गई थी। किसी काम में जी नहीं लगता था।
टूटे हुए जज़्बात के साथ यूँ ही इधर-उधर डोलती फिरा करती।
जब सामने गहरा समंदर हो, इंसान तैरना न जानता हो… किनारा भी दूर हो, तो फिर क्या कर सकता है?
सब्र तो कर सकता है?
बे-ख़तर समंदर में कूद पड़े और ख़ुद को मौजों के हवाले कर दे। जो क़िस्मत में होगा, मिल जाएगा। किनारा या खोया…
किनारा या खोया…
उसका दिल बेचैन होने लगा। कर्ब के साये उसके चेहरे पर लहराए।
उसी वक़्त आफ़ाक ने किताब रख दी और बोला,
“क्या बात है फ़लकी? आज आप कुछ उदास-सी लग रही हैं?”
“कुछ नहीं जी।” उसने अपनी नज़रें झुकाते हुए कहा।
“आपकी तबीयत तो ठीक रहती है ना?”
“जी हाँ… मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ।”
“शायद यहाँ रहते-रहते आप उदास हो गई हैं।”
फ़लकी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह क्या कहती?
“माँ का कोई ख़त आया था?”
“जी, आया था।”
“उन्होंने अपने प्रोग्राम के बारे में क्या लिखा है?”
“सही प्रोग्राम तो अगले ख़त में लिखेंगी।”
“आप अपनी माँ के लिए उदास हो गई हैं? है ना? इतना अरसा तो आप उनसे कभी दूर नहीं रहीं ना?”
फ़लकी की आँखों में आँसू आ गए। जैसे कि वह रोने का बहाना ढूँढ़ रही हो।
हालाँकि वह माँ के लिए हरगिज़ उदास नहीं थी। रोना उसे इस बात पर आया कि आफ़ाक कभी नहीं जान सकेगा कि वह क्यों उदास है…?
उसे रोता देखकर आफ़ाक ने कहा,
“मेरा ख़याल है, वह जल्दी आ जाएँगी।”
फ़लकी ने कोई जवाब नहीं दिया…
फ़लकी को अचानक कुछ शेर याद आ गए। उसका दिल चाहा कि वह ये शेर अपनी माँ को लिखे और फिर ख़त आफ़ाक के हवाले कर दे—
“एक दिन जो उन्हें ख़याल आया,
पूछ बैठे कि क्यों उदास हो तुम।
कुछ नहीं, मुस्कुराकर मैंने कहा,
देखते-देखते सर-ए-मिज़गाँ,
एक आँसू मगर ढलक आया।
दर्द बे-वक़्त हो गया रुसवा,
एक आँसू पिया लिया होता…
हाँ, एक आँसू था, पी लिया होता…!”
मगर उस एक आँसू को पीना किस क़दर मुश्किल लग रहा था… एक आँसू फाँस बन गया था। क़हर बन गया था… गले में अटक गया था।
“ऐसे लगता है जैसे आप कुछ कहना चाहती हैं।” यह आफ़ाक ने अपना तकिया दुरुस्त करते हुए कहा। “क्या कुछ कहना है आपको…?”
फ़लकी ने उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों में देखा और फिर सोचा… कहा तो बहुत कुछ है। जाने कह सकूँगी या नहीं…
थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद आफ़ाक ने करवट लेकर अपना सिर रख दिया। उस वक़्त फ़लकी…फ़लकी चौंक उठी…
वह सो जाएगा। आज रात भी गुज़र जाएगी… रोज़ एक रात गुज़र जाती है। रोज़ एक दिया जलाकर वह सिरहाने रख देती है। सुबह को दिया बुझ जाता है…
“हाँ, मुझे आपसे कुछ पूछना है…”
अचानक फ़लकी की आवाज़ उभरी, जिसे ख़ुद फ़लकी ने भी नहीं पहचाना।
“पूछिए…” आफ़ाक लेट चुका था… वह उठ गया। उसने अपना सिर उठाकर ठोड़ी के नीचे तकिया रख लिया और उसकी तरफ़ देखने लगा।
“आप इस तरह लेटेंगे तो मैं कहाँ पूछ सकूँगी?” फ़लकी ने दिल में सोचा। लेकिन फिर हिम्मत करके बोली,
“पूछिए।”
“मुझे पूछना था कि मर्द… मर्द किस क़िस्म की औरत को पसंद करता है?”
अरे! आफ़ाक उठकर बैठ गया। “मैं समझता था कि आप कोई माक़ूल-सी बात…”
फ़लकी सोगवारी से हँसी।
“मैं तुम्हारे सब अंदाज़ जान गई हूँ, मिस्टर आफ़ाक…” जवाब न पाकर वह फिर बोली, “चलिए, ना-माक़ूल बात समझकर ही जवाब दे दीजिए।”
“इस बात का जवाब जितना तवील है, उतना ही मुख़्तसर भी है। क्योंकि आम तौर पर तो जवानी, हुस्न, दौलत… सभी को लुभाते हैं। जवानी में एक ख़ास कशिश होती है।”
“अब पता नहीं आप औरत किसको कहते हैं?”
“जवानी, हुस्न और दौलत को या…”
“मैं तो यक़ीन चिनी की मूर्ति को औरत नहीं कहता।”
“आपके मापदंड के मुताबिक़ औरत कैसी होनी चाहिए?”
“फ़लकी बेगम, मर्द ख़ाक हो जाने वाली औरत को पसंद करता है… ऐसी औरत जिसके ख़मीर में ईसार और वफ़ा हो… और ईसार क्या होता है, आप और आप जैसी दूसरी लड़कियाँ बिल्कुल नहीं जानतीं…”
फ़लकी ख़ामोश हो गई।
क्या ख़ाक हो जाने की कुछ और मंज़िलें भी हैं… अभी इश्क़ के इम्तिहान और भी हैं। फ़लकी बेगम, उसके दिल ने कहा। अब तक तूने जो कुछ भी कहा, अपने लिए किया। अपनी ज़ात के लिए किया। किसी और के लिए कुछ नहीं किया। हर बात और हर काम को तुम या तो मजबूरी समझकर करती रहीं। न कोई मौज तुम्हारे मन से उठी… और न किसी जुनून ने तुम्हें ये सब करने पर मजबूर किया…
फ़लकी का दिल चाहा वह आफ़ाक से पूछे कि फ़ना की मंज़िलें कैसी होती हैं और ख़ाक कैसे होते हैं…?
जब उसने नज़र उठाकर देखा तो आफ़ाक सो चुका था… कितनी जल्दी आफ़ाक सो जाता था। अभी बात कर रहा था, इधर आँखें बंद कीं, उधर खर्राटों की आवाज़ें आने लगीं।
फ़लकी ने उठकर लाइट बुझा दी। कमरे में ज़ीरो की हरी रोशनी फैल गई। फ़लकी अपने बिस्तर पर लेट गई…
“ख़ाक हो जाना चाहिए,” फ़लकी ने अपने दिल से कहा। “अना, पिंदार, ख़ुद्दारी… जो कुछ भी बाक़ी बचा है, उस पर से वारिद है… ‘तू मुझमें समा गया, मैं तुझमें समा गई’ जैसा कोई झगड़ा ही बाक़ी न रहे…”
इश्क़ की मंज़िल और कभी उसे
रखते सूखी देख न खेल पुदरीं
सौ कोहाँ दे पैंडे हन कित्थे पा पैदल जाबल पुदें…
इश्क़ की मंज़िल बड़ी कठिन मंज़िल है। तो इसे सहज समझकर इस वादी में क़दम न रखना। यहाँ तो कोसों के कोस पैदल चलकर तय करने पड़ते हैं और तू पैदल मीलों चली खड़ी हुई है।
बाबा बुल्ले शाह के ये मिसरे फ़लकी के कानों में गूँजने लगे।
इश्क़ की मंज़िल मुश्किल सही, नामुमकिन तो नहीं है ना?…
एक बार उस संगदिल के ज़ुल्म ने मुझे मजबूर किया था… एक बार मैं अपने दिल के हाथों ख़ुद मजबूर हो जाऊँगी।
Next Part >>

