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Home»Hindi Novel»Lagan ( hindi novel )

Lagan (Hindi Novel) Part 12

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailAugust 28, 2026Updated:November 2, 2026 Lagan ( hindi novel ) No Comments48 Mins Read
Lagan Hindi Novel Part 12 , novelkistories ,feature image
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Lagan Part 12…..

 

बिल्कुल पढ़ाएगा, बेगम साहब! यह तो आपका नौकर है।

“अच्छा… गुलचहरा! तुम कब खाली होती हो?”

“यह तो जी, सारा दिन खाली होती हूँ।”

“नहीं?” फ़लकी ने कहा, “मुझे मालूम है, बच्चों वाली माँ को बहुत काम होता है। अच्छा, ऐसा करो, दिन के ग्यारह बजे तुम आ सकती हो?”

“हाँ बेगम साहब! हम नाश्ता करके ड्यूटी पर चले जाते हैं, तो फिर यह आ जाएगा।”

“अच्छा, यूँ करते हैं। दस-ग्यारह बजे के बीच जब भी मैं खाली होऊँगी, तुम्हें बुला भेजूँगी… ठीक है?”

“बिल्कुल ठीक है, बेगम साहब!” गुलचहरा ने कहा।

फ़लकी उठकर घर आ गई।

रास्ते भर वह सोचती रही… आफ़ाक़ के पीछे वह कुरआन पढ़ लेगी… और फिर इसहाक़ भी रोज़ाना आठ बजे दफ़्तर चला जाता था। घर पर कोई नहीं होगा और वह अपनी एक पुरानी इच्छा पूरी कर सकेगी। अच्छा हुआ, घर में ही एक पढ़ाने वाली मिल गई।

इसहाक़ ने लात मारकर उसके बेडरूम का दरवाज़ा खोल दिया। नकी बैठी हुई थी। एकदम चौंककर उठ बैठी।

पल भर में इसहाक़ उसके सिरहाने पहुँच चुका था।

“यह क्या बोरियत है, भाई! तुम शाम होते ही दरवाज़ा बंद करके सो जाती हो। मुझे इस इतने बड़े घर से घबराहट होती है।”

“तो मैं क्या करूँ…” फ़लकी ने नाराज़गी से कहा।

“थोड़ा बाहर निकलकर बैठो, गपशप करें, संगीत सुनें, नाचें-कूदें…”

फ़लकी को उसका इस तरह सिर पर खड़े रहना ज़रा भी अच्छा नहीं लगा। वह उठकर खड़ी हो गई। जल्दी से दोपहर का दुपट्टा उठाया और बाहर की ओर चल दी। लाउंज में जाकर वह रुक गई।

अभी रात के नौ बजे थे। टीवी पर कार्यक्रम चल रहे थे। सर्दियों में रात जल्दी स्याह और सुनसान हो जाती है। नौकर खाना खिला कर जा चुके थे और नकी का दिल खामख्वाह डरने लगा था।

इसहाक़ जब से आया था, उससे बे-तकल्लुफ़ होने की कोशिश कर रहा था। गौ से रिश्ते का सम्मान मलहूज़ था। मगर नकी को उसकी हद से बढ़ी हुई बेमानी पहल पसंद न थी।

पता नहीं उसे क्या हो गया था।

वह बचपन से ऐसे लड़कों में रही थी। और शर्माने वाली लड़कियों को एहसास-ए-कमतरी की मारी हुई बीमार लड़कियाँ कहती थी। अब हया ही उसका ओढ़ना-बिछौना बन गया था।

इसहाक़ ने टीवी बंद कर दिया और कैसेट रिकॉर्डर पर एक अंग्रेज़ी धुन लगा दी।

फ़लकी अभी तक खड़ी हुई थी।

धुन ऐसी उत्तेजक थी कि इसहाक़ आप ही आप थिरकने लगा। फिर आगे बढ़कर उसने नकी की कमर में बाँह डाल दी।

“चलो भाई! नृत्य करते हैं।”

फ़लकी ने इस तरह अपने आपको छुड़ाया जैसे किसी अछूत का हाथ लग गया हो।

“नहीं, इसहाक़!” वह नाराज़गी से बोली।

“मुझे डांस नहीं आता है।”

“भी तो कहते थे कि तुम हर किस्म के नृत्य की माहिर हो।”

“वह बहुत पुरानी बात थी।”

“यह कितनी पुरानी?”

“बचपन की।”

“हाँ, तो एक साल में ही तुम्हारा बचपन बीत गया? बचपन का क्या है, वह तो एक दिन में भी बीत सकता है।”

“अच्छा, सच-सच बताओ भाई! तुम इतनी गंभीर क्यों रहती हो?”

“नहीं तो… मेरी सूरत ही ऐसी है।”

इसहाक़ क़हक़हा लगाकर हँस पड़ा।

“यह चाँद-सी सूरत बिना वजह इतनी गंभीर नहीं हो सकती… कहीं भैया तो सख्ती नहीं करते तुम पर?”

“नहीं, आफ़ाक़ तो आइडियल पति हैं।”

“हाँ… हाँ, जब लड़कियाँ दिल की बात छिपाना चाहती हैं तो हमेशा ‘आइडियल’ शब्द का सहारा लेती हैं। मैं जानता हूँ। दुनिया में कोई आइडियल नहीं होता।”

“होते हैं। मैं भी जानती हूँ कि आइडियल होते नहीं, बनाए जाते हैं। ढाले जाते हैं।”

“तो गोया तुमने भैया को ढाल लिया है?”

“नहीं, मैं ढल गई हूँ।”

“हाय, क़ुर्बान जाऊँ!” इसहाक़ ने एक सीटी बजाई।

“काश, हमें भी कोई ऐसी लड़की मिल जाए!”

“हर लड़की जो अपने पति से मोहब्बत करती है, ऐसी हो सकती है।”

“भाभी! आजकल की लड़कियाँ बड़ी ख़बीस होती हैं। शादी के बाद भी एक-आध बॉयफ्रेंड रख छोड़ती हैं, ताकि वक़्त पड़ने पर काम आए।”

“यह वक़्त पड़ने पर क्या होता है?” फ़लकी सिहर पड़ी।

“भाभी, एक से छुटकारा हासिल करके दूसरा…”

“तौबा… तौबा…” फ़लकी काँप गई। फिर बिल्कुल अचानक उसे बॉबी का ख़याल आ गया। उसने बॉबी को भी इसी तरह इस्तेमाल करना चाहा था।

लेकिन अब…

अब तो वह आफ़ाक़ पर एक सौ ज़िंदगियाँ भी क़ुर्बान कर सकती थी।

“दस बजने वाले हैं, इसहाक़! जाओ, सो जाओ… तुम्हें सुबह दफ़्तर भी जाना है।”

“मैं इतनी जल्दी सोने का आदी नहीं हूँ।”

“तो फिर तुम्हारा कोई इंतज़ाम किया जाए।”

“हाँ, हाँ, भाभी! घर में ज़रा रौनक लगाओ। हम मिलकर अपनी सहेलियों को, अपने दोस्तों को बुलाया करें… आख़िर तुम्हारा भी तो कोई हल्का-ए-अहबाब होगा।”

“पागल…” फ़लकी खड़ी हो गई।

“मैं तो तुम्हारी शादी की बात कर रही थी। शादी कर लो। सारी बोरियत दूर हो जाएगी।”

“क्या शादी से वाक़ई बोरियत दूर हो जाएगी?”

“हाँ भई! रात को जो यूँ बौखलाए-बौखलाए फिरते हो।”

“अच्छा जी! तो एक रात के लिए अपना सारा दिन तबाह कर लूँ?” फ़लकी हँसने लगी।

“अच्छा भाभी! तुम मेरी शादी करा ही दो… है कोई लड़की नज़र में?”

“वह तो मैं तुमसे पूछने वाली थी। दिल में कोई हो तो बता दो।”

“नहीं, न कोई दिल में है, न नज़र में।”

“अमेरिका में भी नहीं…?”

“अमेरिका में तो वैसे भी…” उसने एक आँख बंद करके कहा, “वह तो लम्हों का सौदा होता है। लेकिन मेरे दिल में तो छेद है। जो कोई दिल में रखता हूँ, गिर जाती है।”

फ़लकी हँसती हुई अपने कमरे की तरफ़ लपकी।

इसहाक़ उसके पीछे भागता हुआ आया।

फिर उसके मुँह के बिल्कुल क़रीब चेहरा करते हुए बोला,

“सूरत ऐसी हो जैसी तुम्हारी है… तो मैं हाज़िर हूँ।”

“बेहूदा!”

फ़लकी दौड़कर अपने कमरे में चली गई और अंदर से चिटकनी लगा ली। काफ़ी देर तक उसे इसहाक़ के क़हक़हे सुनाई देते रहे।

“भाभी ओ भाभी।”

इसहाक़ हँसता हुआ सीधा रसोई में आ गया और उसकी पतली-सी कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया। फ़लकी चौंककर यूँ मछली की तरह बिफर गई, जैसे बिच्छू ने डस लिया हो। चम्मच उसके हाथ से गिर गया।

“क्यों चिल्ला रहे हो?” उसने नाख़ुशी से कहा।

“तो गाना गाकर बुलाया करूँ?”

“अफ़सोस, तुम्हारी आवाज़ भी भोंडी है। अगर कोशिश करोगे तो मेरे साथ सिर्फ़ गधे ही तुम्हारा साथ देंगे।”

“गधे हैं?”

“अच्छा?” इसहाक़ ने बनावटी हैरत से कहा, “तो क्या इस मोहल्ले में गधे भी हैं?”

नकी बौखलाकर चुप हो गई। हाँडी चढ़ने लगी थी। जल्दी से उसके क़रीब जाकर उसे तहिया करने लगी।

“आज का क्या प्रोग्राम है, भाभी?” इसहाक़ ने मछरी उठा ली और आलू काटने लगा।

“कटे हुए आलू ख़राब मत करो।” फ़लकी ने उसके हाथ से चाकू ले लिया, “जो काम न आता हो, वह नहीं करना चाहिए।”

“मुझे दुनिया का हर काम आता है, भाभी।”

“हाँ, दुनिया में हर काम मर्दों के करने के नहीं होते। कुछ काम ख़ालिस तौर पर औरतों के होते हैं।”

“मसलन?”

“मसलन खाना पकाना, बच्चों को पालना।”

“जहाँ तक खाना पकाने का ताल्लुक़ है, तो मैं तुमसे अच्छा पका सकता हूँ। पूछ लो मेरी अम्मी से।”

“हाँ, मुझे मालूम है।” फ़लकी एकदम चौंकने लगी और फिर रुक गई। उसने देख लिया था कि आफ़ाक़ सब कुछ जानता था। मगर उसे बताना नहीं चाहती थी कि उसने कैसे जाना।

“हम दोनों भाई घरेलू काम-काज में माहिर हैं, भाभी।” उसने इस तरह कहा कि फ़लकी को हैरत हो गई। “असल में हमारे अब्बा जी बहुत सख़्त थे। बचपन में ही उन्होंने हमें घर से निकाल दिया था। अपने से दूर रखकर पढ़ाया और फिर अमेरिका में रहकर तो हर काम अपने हाथ से करना पड़ता था। तुम्हें भैया ने बताया नहीं?”

“बताया होगा।” फ़लकी ने बेपरवाही से कहा, “मुझे अब याद नहीं।”

“हाँ, जब तुम जैसी सेवाभावी और वफ़ादार बीवी मिल गई होगी तो भैया ने जान-बूझकर नहीं बताया है।”

फ़लकी ख़ामोश रही।

“और वह दूसरी बात जो आप कह रही थीं?”

“कौन-सी?”

“चले जाओ।”

“वह बच्चे पालना वगैरह… वह काम अभी तुमने करके तो नहीं दिखाया।”

“कैसे नहीं?” इसहाक़!

“मैं तुम्हारे मुँह पर गरम-गरम चिमटा दे मारूँगी। अब तुम इस वक़्त यहाँ से—”

“भी ये किसका ग़ुस्सा निकल रहा है?”

“बस, अब ख़ुदा के लिए यहाँ से चले जाओ।”

“चला जाता हूँ, मगर पहले आज का प्रोग्राम तो बता दो।”

“बस वही जो रोज़ होता है।”

“यानी खाना-पीना और सो जाना?”

“हाँ… हाँ…” फ़लकी बेज़ारी से बोली।

“वह इस क़ौम का क्या बनेगा, भाभी, जिसे सिर्फ़ खाने-पीने और सोने से ही फ़ुर्सत न हो?”

फिर वह भोंडी आवाज़ बनाकर गाने लगा—

“ख़ुदा ने आज तक उस क़ौम की हालत नहीं बदली,
न हो जिसको ख़याल आप अपनी हालत के बदलने का।”

“यह एकाएक क़ौम का दर्द क्यों जागने लगा है दिल में?”

“ख़ुदा की क़सम, भाभी! जब भी मैं यहाँ आता हूँ, मुझे ऐसा महसूस होता है, यहाँ ज़िंदगी ठहर गई है। वक़्त रेंग-रेंगकर गुज़र रहा है और लोग इतने सुस्त-रफ़्तार हैं कि अपनी ज़िंदगी बरबाद कर रहे हैं।”

“हर आदमी जो अमेरिका में रहकर आता है, उसे ऐसे ही लगता है।”

“लगता नहीं, ऐसा होता है। वहाँ तुम्हें मालूम है कि लोग घड़ी की सुइयों के पीछे भागते हैं। एक लम्हा भी कोई ज़ाया नहीं करता। काम… काम… और काम। यहाँ के लोग काम क्यों नहीं करते? दुकानों पर जाओ तो बैठे गप लगा रहे हैं। दफ़्तर जाते-जाते…”रास्ते में कोई मिल जाए तो किस्से शुरू कर देते हैं। सड़क पर कोई हादसा हो जाए तो चारों तरफ़ से लोग चींटियों की तरह जमा हो जाते हैं। हादसे को हादसा नहीं, एक बड़ी घटना बना देते हैं। पुलिस कार और घायल को अपनी हिरासत में लेकर चली भी जाती है, मगर लोग टिप्पणी करने के लिए वहाँ यूँ रह जाते हैं जैसे गुड़ के ढेर पर मक्खियाँ। उन्हें यह भी भूल जाता है कि वे अपनी बीमार पत्नी के लिए दवा लेने निकले थे, बच्चे को स्कूल से लेना था, मालिक का खाना पहुँचाना था और पत्नी इंतज़ार कर रही होगी, वगैरह-वगैरह।

“यहाँ के लोगों के पास ज़ाया करने के लिए बहुत समय है। इस तरह हम कब ज़माने की दौड़ में शामिल हो सकेंगे?”

“वहाँ सिर्फ़ पैसे के लिए काम करते हैं?” नकी बोली, “मुझे मालूम है, अमेरिकन एक-एक डॉलर के पीछे जान देते हैं। यह सारा डॉलर का चक्कर है, जो उन्हें भगाए जा रहा है। और फिर जो लोग हमारी तरह मुफ़लिस देशों से वहाँ जाते हैं, वे भी डॉलर की इस दौड़ में शामिल हो जाते हैं। यूँ यह बिल्ली-चूहे की दौड़ भी जारी रहती है। वहाँ तो पैसा कमाने की एक रेस लगी होती है। मैं अच्छी तरह जानती हूँ।”

“लेकिन वे लोग जिस मेहनत और ईमानदारी से कमाते हैं, उतनी ही फ़राख़दिली से ख़र्च भी करते हैं। ऐश भी करते हैं और ज़िंदगी अच्छी तरह गुज़ारते हैं। वहाँ जब मेहनत का पूरा-पूरा फल मिल रहा हो और हर महीने एक ख़ातिर-ख़्वाह रकम हाथ आ जाए तो हर आदमी को ज़िंदगी गुज़ारने का ढंग आ जाता है। इसीलिए तो हमारे यहाँ के लोग वहाँ जाकर वापस आने का नाम नहीं लेते।”

“क्या करें? यहाँ आकर न वैसा काम है, न उतना पैसा।”

“हाँ, मगर अपने देश में अपनी पहचान तो होती है ना?”

“डॉलर की दुनिया में वे अपनी पहचान खो बैठते हैं।”

“पहचान किस काम की, भाभी? ज़िंदगी तो आराम से गुज़र जाती है।”

“तो तुम्हें किसने कहा है कि इस रेंगते-सिसकते हुए देश में आ जाओ? वहाँ भी तो यहाँ सब अमन ही था।”

“ओह भाई! तुम तो भावुक हो जाती हो। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि तुम्हारी जैसी लड़की इतनी देशभक्त भी हो सकती है।”

“क्यों? मेरे जैसी लड़की से तुम्हारी क्या मुराद है?”

“सब मॉडर्न लड़कियाँ तो अमेरिका में रहने के ख़्वाब देखा करती हैं।”

“माफ़ करना, मैं मॉडर्न लड़की नहीं हूँ।”

अपने इन शब्दों पर नकी को ख़ुद ही ताज्जुब हुआ।

“तो क्या हो तुम? हमें भी बता दो।” इसहाक़ ने क़रीब आकर उसकी आँखों में झाँका।

“मैं एक मुसलमान लड़की हूँ और एक शरीफ़ आदमी की बीवी हूँ।”

इसहाक़ ने इत्मीनान से सिर हिलाया।

“मानना ही पड़ेगा, वाक़ई।”

“लेकिन वह भैया जी, जो अमेरिका गए हुए हैं, उनके बारे में क्या ख़याल है?”

“वह लौट आएँगे।”

“फ़र्ज़ करो, अगर वह लौटकर न आएँ तो…?”

“वह आए तो…” टमाटर काटते हुए चाकू फ़लकी के हाथ से नीचे गिर गया।

कभी-कभी उसके दिल में भी यह वहम आता था। यह सोचकर वह काँप जाती थी कि अगर आफ़ाक़ उसे हमेशा के लिए छोड़ गया तो? अगर वह अमेरिका से वापस न आया तो? फ़लकी का दिल एकदम डूबने लगा।

“फ़र्ज़ करो भाभी! वह वहीं अपनी दुनिया बसा लें…” इसहाक़ ने फिर एक चोट की, “तो क्या होगा? तुम उनके पीछे अमेरिका न जाओगी?”

“मैं फ़र्ज़ नहीं किया करती।” फ़लकी ने उलझे हुए लहजे में कहा।

“इसलिए कि तुम एक बुज़दिल लड़की हो। कबूतरी हो। आँखें बंद कर लेती हो या कर लेना चाहती हो…”

फ़लकी का दिल चाहा कि वह इसहाक़ का गिरेबान पकड़कर झकझोर दे और पूछे कि साफ़-साफ़ बताओ, तुम दोनों भाई मिलकर क्या साज़िश कर रहे हो। उसने अपनी आँखों में आए आँसू पीकर कहा,

“मैं ज़िंदगी की हक़ीक़तों का सामना करती हूँ।”

“भैया के ज़िक्र पर तुम्हारी आँखों में आँसू आ गए हैं। इतनी-सी बात पर नाज़ुक दिल को ठेस लग गई है और अब इन आँसुओं को छिपाने की कोशिश कर रही हो।”

“इसहाक़, अब दफ़ा हो जाओ यहाँ से। वरना मैं तुम्हें मार बैठूँगी।” फ़लकी ने कलछी उठा ली।

“पंजाबी ज़बान में इसे कहते हैं—गधे का ग़ुस्सा कुम्हार पर।”

वह डर के मारे दूर चला गया। फ़लकी अभी तक उसे ग़ुस्से से घूर रही थी। वह उठे क़दमों से दूर होता गया और हँसकर बोला,

“घबराओ नहीं। अगर भैया न आए तो… मैं जो हूँ यहाँ। तुम्हारी ख़ातिर पाकिस्तान में ही रह जाऊँगा।”

फ़लकी के चेहरे पर नाख़ुशी और ग़ुस्से की हालत देखकर वह बोला,

“कुछ ऐसा बुरा भी नहीं हूँ मैं, बल्कि भैया से ज़्यादा ज़िंदादिल हूँ।”

जब फ़लकी उसे मारने को दौड़ी तो वह दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया। जब मोटर स्टार्ट होने की आवाज़ आई तो फ़लकी की जान में जान आई। मगर कमबख़्त जाते-जाते उसे सोचों के दर्दनाक दोराहे पर छोड़ गया था।

बारह बजे फ़ारिग होकर फ़लकी सामने पोर्च के नीचे बड़े-बड़े सीमेंट के गमलों के पास आकर बैठ गई। धूप और छाँव का हसीन संगम था। वहाँ पौधों और फूलों से छन-छनकर आती गर्म-गर्म धूप उसके ठंडे-ठंडे पैरों को छू रही थी। धूप…उसका यूँ क़दमबोसी करना उसे बहुत अच्छा लग रहा था। अच्छा तो उसे सीढ़ियों पर बैठना भी लगा था। अपने घुटनों पर अपनी ठोड़ी रखे वह सोचों में डूब गई।

इस निज़ाम ने अर्श और फ़र्श की तमीज़ मिटा दी थी। उसकी हस्ती को ख़ाक कर दिया था। इसीलिए तो जहाँ मन में आता, वहीं बैठ जाती।

हवा चलती तो पेड़ हिलने लगते और उनका साया धूप में से छन-छनकर सामने की दीवार पर पड़ता। इन परछाइयों के सिवा नकी के पास था ही क्या। यही परछाइयाँ उसकी मुँह-बोली ग़मख़्वार थीं और यही परछाइयाँ राज़दार थीं। किसी से वह कुछ भी तो क्या कहे। आख़िर कहने को है क्या।

फिर वह धीरे-धीरे मुँह ही मुँह में कुछ गुनगुनाने लगी—

“ये उदासी, ये फैलते साये,
हम तुझे याद करके पछताए।”

उसी वक़्त घंटी बजी और डाकिया अपनी साइकिल पर सवार, गेट के अंदर नज़र आया। फ़लकी का दिल धड़ककर हलक़ तक आ गया। तब उसे याद आया कि वह यहाँ क्यों आकर बैठी थी। शायद उसे भी डाकिए का इंतज़ार था।

उसे मालूम था, रोज़ाना इसी वक़्त डाक आती है। रोज़ ही वह सारा काम करके इसी समय यहाँ सीढ़ियों पर आकर बैठ जाती थी। एक अनजाना-सा इंतज़ार रहता था। कभी घंटी सुनाई देती, कभी नहीं। कभी कोई ख़त आ जाता, कभी सिर्फ़ आहटें होतीं।

क्या उसे किसी ख़त का इंतज़ार था?

ख़त का इंतज़ार क्या होता है? इस दर्द से तो वह आशना ही न थी। फिर कौन है जो भरी दुनिया में उसे ख़त लिखे?

हाँ, अब कभी-कभार मम्मी और डैडी का साझा ख़त आ जाता था। कभी-कभी उसी ख़त में डैडी चंद लाइनें लिख देते थे और यहीं…

डाकिए ने एक नीले रंग का हवाई लिफ़ाफ़ा थैले में से निकाला तो फ़लकी का सारा ख़ून चेहरे पर आ गया। वह दौड़कर गई और झपटकर ख़त डाकिए के हाथ से ले लिया। डाकिया भी उसकी…उसकी इस बेताबी पर हैरान डाकिया उसे देखता हुआ ठहर गया। बेगम साहब ने आज बिल्कुल बच्चों जैसी हरकत कर बैठी थी।

फ़लकी ने लिफ़ाफ़े को उलट-पलटकर देखा… फिर देखा… फिर देखा और मायूसी से बोली—

यह मम्मी का ख़त था।

लेकिन काश, यह मम्मी का ख़त न होता। यह वह ख़त होता, जिसका उसे इंतज़ार था। पल-पल, घड़ी-घड़ी।

अफ़सोस, जिस ख़त का इंतज़ार था, वह ख़त जाने कहाँ खो गया था। दिल में दर्द-सा होने लगा। आँखों में कड़वा-कड़वा पानी जमा होने लगा। फ़लकी के सारे वजूद पर मायूसी छा गई।

वह फिर धूप और छाँव में बैठ गई। एक ठंडी साँस खींची तो हवा के साथ साये लरज़ने लगे, जैसे कह रहे हों—

“ये उदासी, ये फैलते साये!
हम तुझे याद करके पछताए।
हम जो आए तो रहगुज़र न मिली,
वो जो आए तो मंज़िलें लाए।”

पता नहीं उसकी मंज़िल कहाँ थी?

सर-ए-राह बैठी थी। न आगे कोई निशान था, न पीछे कोई रास्ता। किसी रास्ते पर ख़ुद उसके क़दमों के निशान भी नहीं बनते थे।

अल्लाह करे लुटा-पिटा कोई ऐसा मुसाफ़िर भी न हो।

और आफ़ाक़ उसे क्यों ख़त लिखता? क्या उसने वादा किया है? क्या उसका रवैया ऐसा…आशिक़ाना था। उसने तो जाते वक़्त मशवरा भी नहीं किया। पता नहीं कहाँ होगा, क्या कर रहा होगा। ख़ुदा जाने अपनी किसी महबूबा से मिलने चला गया हो।

आख़िर मर्द जो है।

यह सोचकर फ़लकी के दिल से एक आह निकली।

और बिल्कुल अचानक उसे नूरी का ख़याल आ गया। पता नहीं कौन थी वह। मगर वह भी तो अमेरिका में रहती है। हो सकता है आफ़ाक़ उसके लिए अमेरिका गया हो।

यह सोचकर उसे ग़ुस्सा आ गया। वह ख़्वामख़्वाह एक आवारा-मिज़ाज मर्द के लिए हलकान हो रही थी।

जल्दी से मुट्ठी में पकड़े हुए ख़त को उसने आँखों के सामने कर लिया। बालों में से एक पिन निकाली और लिफ़ाफ़े को बड़े सलीके से खोलने लगी।

मम्मी का मोहब्बत भरा ख़त था। उन्होंने लिखा था कि यह उनका आख़िरी ख़त है और यह ख़त पहुँचने तक वे पाकिस्तान पहुँच जाएँगी।

पहले जब मम्मी के आने की इत्तिला मिलती थी तो वह फूली न समाती थी। कई दिन पहले से तैयारियाँ शुरू कर देती थी। जश्न मनाती थी। ज़्यादा ख़ुशी उसे इस बात की होती थी कि मम्मी उसके लिए मुल्क की ढेरों-ढेर चीज़ें लाएँगी, जिन्हें वह इतराकर अपनी सहेलियों और दोस्तों को दिखाएगी। मम्मी उसके ख़ास-ख़ास दोस्तों के लिए भी तोहफ़े लाया करती थीं। इसलिए उसके सारे दोस्त भी उनका बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे।

मगर अब वह सीढ़ियों पर बैठी सोच रही थी।

मम्मी इतनी जल्दी क्यों आ रही हैं भला? अगर कुछ दिन और रुक जातीं तो क्या था।

यहाँ अगर मुझे कुछ और दिन…

नहीं…?

मेरी यह तल्लीनता टूट जाएगी। मेरे इंतज़ार में ख़लल पड़ेगा। मैं जो जन्म-जन्म का जोग लिए बैठी हूँ, नंगे पाँव पाकिस्तान के जंगल में। इस विरह का जो सुख मुझे मिल रहा है, कहीं वे मुझसे इस आत्मिक सुख को छीन न लें। मेरी इस आबलापाई का मज़ाक न उड़ाएँ। मेरे इस जोग को बेवकूफ़ी न कहें। मेरी सुनसान, बेरंग सुबह-शाम में दख़लअंदाज़ी न करें।

काश, ये सुबहें और ये शामें यूँ ही बनी रहें।

मैं यूँ ही सुलगती रहूँ।

चुपचाप… ख़ामोश…

“नहीं?”

“भाभी ओ भाभी! फ़लकी नाज़!” इसहाक़ ने शोर मचा दिया, “कहाँ हो भई? तैयार हो या…?”

कोई आवाज़ नहीं आई तो वह फ़लकी के कमरे में चला गया। कालीन पर बिछी नमाज़ की चटाई पर नकी मग़रिब की नमाज़ पढ़ रही थी।

“या ख़ुदाया… या ख़ुदाया… मेरी आँखें यह सब देख रही हैं, मगर मुझे फिर भी यक़ीन नहीं आ रहा… आख़िर कैसे यक़ीन कर लूँ। यानी… यानी ये बे-तख़्ती बाक़ायदा नमाज़ पढ़ रही हैं?”

वह बड़बड़ाता हुआ कभी कमरे के अंदर जाता और कभी कमरे के बाहर। इतने में फ़लकी ने दुआ के लिए हाथ उठा लिए।

“आमीन… आमीन…”

वह शीशे के आगे खड़ा होकर अपना स्प्रे कपड़ों पर छिड़कने लगा।

फ़लकी ने नमाज़ पढ़ने के बाद जाए-नमाज़ को तह किया और स्टूल पर रख दिया।

“कितनी बार कहा है कि तुम बिना इजाज़त मेरे कमरे में न आया करो, इसहाक़?” नकी ने नाख़ुशी से कहा।

“वाह!” वह मुड़ गया। “ज़रा अपनी शक्ल तो देखो, कैसी ख़ौफ़नाक बना ली है। क्या मैं तुम्हारे कमरे में दस्तक देकर आया करूँ? मैं कोई बदनियत आदमी हूँ? तुम्हारा देवर हूँ। जब चाहूँगा, आऊँगा-जाऊँगा। भैया मुझे सब अधिकार देकर गए हैं।”

“मैं नहीं जानती।” फ़लकी अपने पलंग पर बैठ गई। “वक़्त-बेवक़्त मुझे डिस्टर्ब करते हो। अब मैं नमाज़ पढ़ रही थी और तुम लगातार बक रहे थे। यह क्या तरीक़ा है?”

“शायद तुम नई-नई मुसलमान हुई हो। वरना मैंने देखा है, ढोल बजते रहते हैं, रेडियो चीखते रहते हैं और लोग नमाज़ पढ़ते रहते हैं। एक वक़्त में दो काम करते हैं—गाना भी सुनते हैं और अल्लाह मियाँ को भी ख़ुश करते हैं।”

“करते होंगे।” फ़लकी ने नाख़ुशी से कहा। “मुझे सुकून के साथ नमाज़ पढ़ने में लुत्फ़ आता है।”

“तुमने ठीक से दुआ भी नहीं माँगने दी।”

“आख़िर तुम दुआ में क्या माँगना चाहती थीं?” इसहाक़ बिल्कुल उसके सामने सोफ़े पर आकर बैठ गया। “अब क्या रह गया है, जिसकी तुम्हें तमन्ना है?”

“ज़रूरी नहीं कि आदमी हमेशा दुनियावी चीज़ों की ख़्वाहिश करे।”

“मरहबा! सुब्हानअल्लाह!” इसहाक़ ने बनावटी अंदाज़ में झूमकर कहा। “तो गोया तुम दुनिया से मावरा हो चुकी हो। ये मंज़िलें कहाँ तय कीं? कब तय कीं?”

“जाओ इसहाक़, मुझे तंग न करो।”

“नींदें सीधी कर लो। तुम भैया के लिए बेकरार हो गई हो और अब उनकी वापसी की दुआएँ माँग रही हो।”

“मैं ऐसी दुआएँ नहीं माँगा करती।”

“तो क्या चाँद-सा मुँह निगलने के लिए दुआ कर रही थीं?”

“चाँद-सा…” फ़लकी को हँसी आ गई। उसके आगे चाँदी न इतनी थी तो चाँद कहाँ से आएगा?

“मैं बोली…”

“ये दुआ माँगनी है तो भैया को आने दो।”

नकी अपने ख़यालों में डूबी हुई थी। उसने उसकी बात नहीं सुनी।

“बे-ख़याली हो या इबादत, हर बंदे का ख़ुदा से ज़ाती मामला होता है। अल्लाह से कुछ माँगने की ज़रूरत नहीं होती। वह बिन माँगे ख़ुद देता है।”

“भाभी! तुम तो वाक़ई सूफ़ी होती जा रही हो। इस चाँद-सी पेशानी पर इबादत का बोझ… ज़ालिम! ख़याल तो करो, अभी अहद-ए-शबाब है। जवानी में ऐसी बातें कर रही हो तो भैया बेचारे क्या करेंगे?”

“अच्छा, तुम इस वक़्त जा क्यों नहीं रहे, इसहाक़?”

“क्यों जाऊँ? मैं तो पिक्चर के दो टिकट ले आया हूँ। जल्दी चलो, देर हो जाएगी।”

“मैं नहीं जाऊँगी।”

“तुम क्यों नहीं जाओगी? मैं ज़बरदस्ती ले जाऊँगा।”

“इसहाक़, मेरे साथ ज़बरदस्ती मत करना। मैं तबीयत की बहुत कड़ी हूँ।”

“मैं भी कोई अच्छा आदमी नहीं हूँ। भैया की शरीफ़ी से मेरा अंदाज़ा मत लगाना। ज़बरदस्ती उठाऊँगा और मोटर में डाल दूँगा।”

“भैया की शरीफ़ी…” फ़लकी ज़रा मुस्करा दी। गोया यह अपने भाई को बहुत शरीफ़ समझते हैं।

“देखो, इसहाक़…” फ़लकी बहुत नरमी से बोली, “मुझे पिक्चर वग़ैरह से कोई दिलचस्पी नहीं है।”

“माना कि तुम्हें दिलचस्पी नहीं है। मुझे तो है। कभी दूसरों की ख़ुशनूदी…”

“किसी की ख़ातिर कुछ करना चाहिए।”

“तुम ऐसा करो, अपने किसी दोस्त को ले जाओ।”

“इस वक़्त मैं कौन-से दोस्त को ले जाऊँ? जब पिक्चर शुरू होने में सिर्फ़ दस मिनट हैं।”

फ़लकी ख़ामोश हो गई।

“देखी है?”

“क्या?”

“वही बड़ी अच्छी फ़िल्म है। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ देख कर तो तुम भी ख़ुश हो जाओगी।”

“मुग़ल-ए-आज़म मैं पहले भी दो दफ़ा देख चुकी हूँ। अब नहीं देखूँगी।”

“वहाँ अगर पंजाबी में उसकी नकल ‘चोरनी’ के नाम से बनी होती तो तुम पाँच दफ़ा देखती।”

फ़लकी सोचने लगी।

“मैंने कभी पंजाबी फ़िल्म भी नहीं देखी।”

“कब से नहीं देखी?”

“जब से शादी हुई है।”

“तुम्हारी शादी को अभी तो साल भी नहीं हुआ और इतने कम अरसे में तुम बददिल हो गई हो। लड़की अपने घर में मग्न हो जाए तो फिर सब कुछ भूल जाती है।”

“तुम मग्न हो गई हो?”

“हाँ।”

“नहीं, अपना चेहरा देखो। हर वक़्त उदासी और मायूसी छाई रहती है।”

फ़लकी ख़ामोश हो गई। बल्कि उदास हो गई। यह कमबख़्त उसका भरम तोड़ने के पीछे पड़ा था। पता नहीं क्यों, वह उसके असाब पर सवार हो रहा था।

उसकी ख़ामोशी देखकर इसहाक़ ने सोचा कि वह आधी राज़ी ही हो गई है। वह एकदम से खड़ा हो गया और उसका हाथ पकड़कर उसे खींच लिया।

फ़लकी ने अपना हाथ यूँ छुड़ाया जैसे साँप ने काट लिया हो और ज़रा दूर सिमटकर खड़ी हो गई। फिर नाख़ुशी से बोली,

“इसहाक़, तुम दूर से बात किया करो। मैं इतनी बे-तकल्लुफ़ी पसंद नहीं करती।”

“वहाँ अगर बे-तकल्लुफ़ी अपनी माँ-बहनों से नहीं करोगी तो क्या बाहर की लड़कियाँ पसंद करेंगी? तुम चलती हो या मैं तुम्हें उठाकर ले जाऊँ?”

“अच्छा, दूर रहो।” फ़लकी ने डरते हुए कहा, “मैं ख़ुद चलती हूँ।”

“क्या इसी तरह जाओगी?”

“क्यों? मेरे कपड़ों को क्या हुआ है?”

“बिल्कुल भिखारिन लग रही हो। सिलवट पड़े कपड़े, पैरों में चप्पल, सिर पर दुपट्टा।”

“मैं तो इसी तरह चलूँगी।”

“किसी लड़के के साथ ख़ूबसूरत लड़की जा रही हो तो सब मुड़-मुड़कर देखते हैं। ख़्वाह वह ख़ूबसूरत लड़की उसकी बहन ही क्यों न हो।” इसहाक़ क़हक़हा लगाकर हँसा। “ख़्वाह वह ख़ूबसूरत लड़की उसकी बहन हो।”

“बेग़ैरत!” फ़लकी ने बे-साख़्ता कहा।

“अच्छा मोहतरमा ग़ैरत साहिबा, अब आ भी चुकीं?”

इसहाक़ कमरे से बाहर निकल गया। फ़लकी उसके पीछे-पीछे मरे-मरे क़दमों से चलती हुई निकली।

असल में वह इसहाक़ के साथ फ़िल्म देखने नहीं चाहती थी। शादी के बाद आफ़ाक़ के साथ एक ही फ़िल्म देखी थी और महबूब के साथ अँधेरे में बैठकर फ़िल्म देखना क्या होता है, उस पर वह अयाँ हो गया था। और अब वह किसी के साथ बैठकर भी फ़िल्म नहीं…देखना चाहती थी, चाहे वह उसका सगा भाई ही क्यों न हो। आफ़ाक़ और इसहाक़ में बहुत फ़र्क था।

वह चुटकियाँ लेता था और यह ज़ख़्म कुरेदता था।

सारा वक़्त हंगामा करेगा। जाने क्या-क्या कहेगा। और आफ़ाक़ सोचेगा कि मैं इतनी सस्ती लड़की हूँ कि मुझे हर कोई फ़िल्म दिखाने ले जा सकता है।

बाहर निकलकर उसने अपनी चप्पल देखी और बोली, “ज़रा ठहरो, अभी आती हूँ। क्या मैं कपड़े बदल आऊँ?”

जूते बदलने के बजाय वह बाथरूम में चली गई।

पूरे पंद्रह मिनट बर्बाद करके जब वह बाहर आई तो इसहाक़ ग़ुस्से से खौल रहा था। वह चुपचाप मोटर में बैठ गई।

“चलेंगी?”

“शुक्र है, सवेरा का बाद-ए-बहार ही आई तो!”

“देखो इसहाक़, मुझे मज़ा नहीं आता। अगर फ़िल्म शुरू हो चुकी हो तो नहीं।”

“यह अंग्रेज़ी फ़िल्म है, देर से शुरू होती है।”

“प्लीज़, एक बात मैं कह दूँ। अगर फ़िल्म शुरू हो चुकी हुई तो मैं अंदर हरगिज़ नहीं जाऊँगी।”

“आपने तो दो बार देखी हुई है।”

“ख़्वाह देखी हुई हो, शुरू से पिक्चर नहीं देखूँगी। ठीक है?”

और फ़लकी दिल में दुआ करने लगी कि पिक्चर शुरू हो चुकी हो।

सिनेमा हॉल पहुँचकर इसहाक़ जल्दी से उतरा और अंदर चला गया।

“अल्लाह करे, शुरू हो चुकी हो।” फ़लकी दिल ही दिल में दुआएँ करने लगी।

अभी वह मन ही मन दुआएँ कर रही थी कि उसने देखा, एक महिला हँसती-मुस्कुराती, इठलाती हुई अंदर से आ रही है। फ़लकी ने सरसरी नज़र से देखा तो वह चेहरा जाना-पहचाना लगा। फिर वह गौर से देखने लगी। क़रीब आई तो फ़लकी ने उसे पहचान लिया।

वह नूरी थी।

आफ़ाक़ की दोस्त नूरी।

आज भी नूरी ने ब्राउन रंग की साड़ी पहन रखी थी और इतनी कड़ाके की सर्दी में स्लीवलेस ब्लाउज़ पहना हुआ था। उसके गोरे-गोरे बाज़ू गहरे ब्राउन रंग में चमक रहे थे और ऐसा लग रहा था जैसे भरी बहार में चमन की सैर को निकली हो।

फ़लकी के दिल में एकदम दो तरह के जज़्बात जागे।

पहले तो उसे ग़ुस्सा आया और उसके दिल में हसद लहरें लेने लगा। नूरी का सामना करना उसे बहुत बुरा लगा।

दूसरे ही पल उसकी जिज्ञासा जाग उठी और उसका दिल चाहा कि वह नूरी को रोककर उससे बातें करे। हाँ, यह पूछे कि जब आफ़ाक़ उसकी ख़ातिर अमेरिका चला गया है तो वह यहाँ क्या कर रही है?

नूरी की नज़र उस पर नहीं पड़ रही थी। वह हँसती हुई, पर्स झुलाती हुई अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ती चली जा रही थी।

तभी फ़लकी ने एकदम अपनी कार का दरवाज़ा खोल दिया और दौड़कर नूरी के सामने खड़ी हो गई।

नूरी एकदम चौंकी। फिर पहचान की रोशनी उसके चेहरे पर चमकी।

उसने जल्दी से फ़लकी का ठंडा, बर्फ़-सा हाथ थाम लिया। फ़लकी ने साफ़ महसूस किया कि नूरी ने गर्म कपड़े नहीं पहने हुए थे, फिर भी उसके हाथ गर्म थे।

फ़लकी ने एकदम अपनी कार का दरवाज़ा खोल दिया और दौड़कर नूरी के सामने खड़ी हो गई।

“अरे!” नूरी एकदम चौंकी। फिर पहचान की रोशनी उसके चेहरे पर चमकी। उसने जल्दी से फ़लकी का ठंडा, बर्फ़-सा हाथ थाम लिया। फ़लकी ने साफ़ महसूस किया, बावजूद इसके कि नूरी ने गर्म कपड़े नहीं पहने हुए थे, उसके हाथ गर्म थे, जबकि फ़लकी ने गर्म शॉल लपेट रखी थी, फिर भी उसके हाथ ठंडे बर्फ़ थे।

ज़िंदगी और महरूमी में क्या फ़र्क है, उसे फ़ौरन पता चल गया।

“अरे… फ़लकी! फ़लकी…” वह चीखी। फिर प्यार से उसने फ़लकी को इस तरह गले लगा लिया कि फ़लकी का एक रुख़्सार नूरी के रुख़्सार से छू गया। नूरी के जिस्म से जानलेवा ख़ुशबू उठ रही थी। नूरी एक भड़कती हुई लौ लग रही थी और फ़लकी बुझी हुई आग।

फ़लकी के दिल में फिर हसद की लहरें उठने लगीं। उसका जी चाहा कि वह नूरी का मुँह नोच ले, उसे बदसूरत कर दे, उसका ख़ूबसूरत चेहरा बिगाड़ दे। उसे यूँ महसूस हुआ जैसे नूरी एक ऐसी आँधी हो, जिसने उसके आफ़ाक़ को मसलकर दीवार के साथ चिपका दिया हो।

“कैसी हो?” नूरी ने लगाव से पूछा। “आफ़ू कहाँ है? अच्छे हो? तुम मियाँ हुई अपने आप में मग्न रहती हो। उस दावत के बाद सूरत ही नहीं दिखाई। कुछ देख चुकी हो या देखने की तैयारी है?”

“न देख चुकी हूँ, न देखने जा रही हूँ। बस ज़बरदस्ती लाई गई हूँ। इसहाक़ को आप जानती हैं?”

“हाँ, हाँ।” वह अपनाइयत से बोली, “तुम किसका ज़िक्र कर रही हो? आफ़ू का छोटा भाई।”

“जी, वह मुझे ज़बरदस्ती ले आया था… और…”

“हाँ, काकू फ़िल्मों का बड़ा शौक़ीन है और उसका यह शौक़ बढ़ता ही जाएगा। आफ़ाक़ और काकू में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है।”

फ़लकी को यूँ महसूस हुआ, जब नूरी आफ़ाक़ का ज़िक्र करती है तो उसके लहजे में शहद घुल जाता है और कितनी बे-तकल्लुफ़ी से वह पूरे परिवार का ज़िक्र करती है, जैसे… जैसे…

फ़लकी के अंदर जलन-सी भड़कने लगी।

दूसरे ही पल उसकी जिज्ञासा जाग उठी और उसका दिल चाहा कि वह नूरी को रोककर उससे बातें करे। हाँ, यह पूछे कि जब आफ़ाक़ उसकी ख़ातिर अमेरिका चला गया है तो वह यहाँ क्या कर रही है? नूरी की नज़र उस पर नहीं पड़ रही थी। वह हँसती हुई, पर्स झुलाती हुई अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ती चली जा रही थी।

उसी समय एक लंबे-चौड़े क़द का, बड़ी-बड़ी आँखों वाला, घनी-घनी मूँछों और लंबे-लंबे बालों वाला एक आदमी बाँह पर सफ़ेद कोट लटकाए बाहर आया और उनके क़रीब आकर खड़ा हो गया।

“तुम दुनिया के किसी भी कोने में चली जाओ, तुम्हें कोई न कोई जान-पहचान वाला ज़रूर मिल जाता है।” उसने पाइप का कश लेकर कहा।

नूरी इस तरह झेंपी जैसे दो सूखे पत्ते एक-दूसरे से टकरा जाएँ।

“Don’t be jealous, darling,” उसने अदा से कहा।

फिर फ़लकी से बोली, “पहले मैं परिचय करा दूँ। यह सरमद है।”

“भई, कुछ आगे भी कहो।” सरमद ने उसे छेड़ा।

“मैं सोच रही थी… शब्द ढूँढ़ रही थी…”

“मैंने तुमसे कहा था न, फ़लकी! कि पाकिस्तान में मेरा दिल है… तो यह है वह दिल, जिसके लिए मैं यहाँ आ गई।”

सरमद क़हक़हा लगाकर हँसा।

फ़लकी को जैसे चक्कर आ गया।

“एक महीना हुआ मेरी और सरमद की शादी को। मगर तुम जानती हो न, मर्द बड़ा ख़ुद-पसंद होता है। वह चाहता है कि जिस औरत से उसने शादी की है, वह हर बार, सर-ए-महफ़िल, सर-ए-राह इस बात का ऐलान करे कि उसने इस आदमी के आगे घुटने टेके हैं। अपना हुस्न और जवानी उसे ख़ैरात में दी है… क्यों, सरमद?”

उसने सरमद की आँखों में झाँका।

“अरे… नो… नो। मैं तो यूँ ही मज़ाक कर रहा था।”

सरमद ने प्यार से नूरी का हाथ थाम लिया।

“मगर मुझे ऐतराज़ नहीं।”

नूरी उसके कंधे से लग गई।

“सारी ज़िंदगी, सारी दुनिया को यूँ ही सर-ए-राह, बार-बार कह सकती हूँ कि इस आदमी ने मेरी ज़िंदगी अज़ाब कर रखी थी। अपनी हर बात मनवाई है उसने और अब मुझे पाकिस्तान ले आया है… हमेशा-हमेशा के लिए।”

“You are lovable,” सरमद ने बड़े प्यार से कहा।

फ़लकी खड़ी-खड़ी थर-थर काँपने लगी।

मियाँ-बीवी का यह अंदाज़ भी हो सकता है!

उसे अपनी शादी का दिन याद आ गया।

कैसी क़यामतें गुज़री थीं उस पर।

“यही होता है प्यार की शादी।”

“नूरी, याद दिलाया।”

“कौन हैं?” सरमद ने पूछा।

“डार्लिंग! यह इज़हार-ए-मोहब्बत का प्लेटफ़ॉर्म नहीं, सिनेमा हॉल की राहदारी है।”

“सरमद, ख़ुद ही बातों में उलझा लेते हो। अभी तक मैंने तुम्हें बताया ही नहीं कि यह…”

“तुम्हारी कोई पुरानी दोस्त है?” सरमद ने लापरवाही से कहा।

“नहीं, मेरी दोस्त नहीं, बल्कि दोस्त से कुछ बढ़कर है।”

“यह क्या मतलब…?”

“यह मेरी भाभी हैं… और वह भाभी, जिसके बारे में कहा जाता है—

‘ग़ालिब, नदामत दोस्त से आती है, बू-ए-दोस्त।’”

“हैं… हैं… दोस्त… भाभी? यह क्या चक्कर है? मैं तुम्हारे सब भाइयों को जानता हूँ। क्या किसी भाई ने चोरी-छिपे…?” सरमद ने बाईं आँख बंद की।

“नहीं, नहीं…” नूरी ज़ोर से हँसी। “तुम्हें याद है… आख़िर… आफ़ाक़…?”

“हाँ, हाँ…” सरमद की आँखों में पहचान की चमक भर आई। “यह फ़लकी आफ़ू की बीवी हैं। जानते हो, दोनों की तो मैरिज हुई थी?”

“अच्छा… मुझे आफ़ू ने ख़ुद बताया था… और वाक़ई फ़लकी और आफ़ाक़ की जोड़ी है।”

“मुँह पर तारीफ़ झूठी होती है?”

“अच्छा, अब बको नहीं।”

“यह क्या ड्रामा हो रहा है भई?” इसहाक़ एकदम बीच में कूद पड़ा।

“अरे… काकू!”

“अरे… नूरी आपा!”

“क्या अजीब मुलाक़ात है।”

“और कितनी अजीब जगह पर!” इसहाक़ ने सिनेमा हॉल की तरफ़ इशारा किया।

सब हँसने लगे।

थोड़ी-सी अलीक-सलीक और ख़ैरियत पूछने के बाद इसहाक़ ने फ़लकी की तरफ़ मुँह करके कहा,

“दो-तीन सीन देखकर निकल आया हूँ।”

“तुम फ़िल्म देखने आए थे?” नूरी ने पूछा।

“हाँ, आया!”
“तो फिर देर क्यों की?”

“ये मोहतरमा नहीं आ रही थीं। इनका मूड नहीं था… शौहर साहब याद आ रहे थे।”

“अरे हाँ… आफ़ू कहाँ है?”

“चले गए अमेरिका। वह एक जगह टिककर तो नहीं रह सकते न?” इसहाक़ ने उसी लहजे में कहा।

“आप पिक्चर देखकर जा रही हैं?” फ़लकी ने बात बदलने के लिए पूछा।

“नहीं, इस सिनेमा का मालिक सरमद का दोस्त है। हम उसे एक पैग़ाम देने आए थे। उसने हमें चाय पर बैठा लिया। वरना हमें फ़िल्म देखने की फ़ुर्सत कहाँ! वहाँ, हनीमून के दिनों में तो अपने घर में फ़िल्म चलती है।” इसहाक़ ने लापरवाही से कहा।

“कमीने!” नूरी ने उसके मुँह पर हल्की-सी चपत लगाई। “कभी नहीं बदल सकता, न काकू?”

“वहाँ…” फ़लकी हँस पड़ी।

“भाभी, गप ही लगाना है तो किसी जगह चलकर बैठते हैं। मुझे भी काफ़ी बोरियत हो रही है।” इसहाक़ ने कहा।

“चलो, किसी रेस्तराँ में बैठते हैं।” सरमद बोला।

“नहीं। ऐसा करते हैं कि हमारे घर चलें। वहीं गपशप होगी।” फ़लकी ने ज़रा हिम्मत करके कहा।

नूरी ने इजाज़त माँगती नज़रों से सरमद की तरफ़ देखा।

सरमद ने मुँह से पाइप निकालकर कहा, “सिर्फ़ आधा घंटा।”

“ठीक है।”

वे लोग अपनी-अपनी मोटरों में बैठ गए।

इत्तफ़ाक़ से सरमद और नूरी की मोटर आगे थी। फ़लकी देख रही थी कि सरमद का एक हाथ नूरी के कंधे पर था और दूसरे हाथ से वह मोटर चला रहा था। अभी जब वह हॉल से बाहर आया था तो उसने अपनी बाँह पर नूरी का कैफ़रकोट डाल रखा था। अब वह कोट उसने पिछली सीट पर रख दिया था।

क्या सरमद मर्द नहीं था…?

क्या नूरी औरत नहीं थी…?

लेकिन एक क़दर मुश्तरक थी उनमें।

वह एक-दूसरे से इश्क़ करते थे, मोहब्बत करते थे।

…और लिबास…

रास्ता पाकर दोनों मोटरें आगे-पीछे घर में दाख़िल हुईं। नकी जल्दी से कॉफ़ी का कहकर ड्रॉइंग रूम में आ गई।

“फ़लकी! मैं तुमसे ख़फ़ा हूँ।” नूरी ने प्यार से कहा, “तुमसे भी और आफ़ाक़ से भी।”

“क्यों…?” फ़लकी ने मासूमियत से पूछा।

“तुम दोनों मेरी शादी पर क्यों नहीं आए?”

“आफ़ाक़ यहाँ नहीं थे।”

“लेकिन तुम तो आ सकती थीं?”

फ़लकी की समझ में नहीं आया कि वह क्या जवाब दे। उसे तो पता भी नहीं था…

कि उनकी शादी कब हुई। आफ़ाक़ ने उसे कार्ड भी नहीं लाकर दिया था। फ़लकी थोड़ी देर चुप रहकर बोली,

“मैं आपको समझाऊँगी।”

“आफ़ू ने तुम्हें बिल्कुल अपने जैसा कर दिया है।”

“लिबास… लिबास…” इसहाक़ खड़ा हो गया। “यह तो पूरी तरह आफ़ाक़ बन चुकी हैं। बेहद बोर किस्म की ख़ातून हैं। इनका बस चले तो भैया के आने तक व्रत रख लें। फ़िल्म देखना इन्हें बुरा लगता है। हँसने-बोलने से ये परहेज़ करती हैं। संसार से इन्हें चिढ़ हो गई है। मुझ पर तो काट खाने को दौड़ती हैं।”

“इसहाक़, झूठ न बोलो।” फ़लकी सिहरकर खड़ी हो गई।

अब्दुल करीम कॉफ़ी ले आया था। वह उठकर कॉफ़ी बनाने लगी।

“आज यह ज़बरदस्ती मुझे फ़िल्म दिखाने ले जाना चाहता था और मेरा मूड नहीं था।” फ़लकी ने नूरी की तरफ़ देखकर कहा।

“इसका मतलब है, आपको अपने शौहर से बहुत मोहब्बत है!” सरमद ने उठकर कॉफ़ी की प्याली ख़ुद ही उठा ली। फिर सूखे मेवों की मुट्ठी भरी और अपने सोफ़े पर आकर बैठते हुए कहा,

“आफ़ू बहुत ख़ुशक़िस्मत है।”

“यह तो मैंने उसे उस दिन भी कहा था।” नूरी ने कहा।

नूरी ने भी अपनी प्याली ले ली।

“तुम्हें एक मज़ेदार बात बताऊँ, फ़लकी!”

फ़लकी ने सवालिया अंदाज़ में पलकें उठाईं।

“हम तीनों का बचपन साथ गुज़रा है। मैं, आफ़ू और सरमद एक ही फ़्लैट में रहा करते थे। तीनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे और अक्सर मिलकर खेला करते थे। दिल से तो मुझे सरमद पसंद था, लेकिन…”मैं उसे जलाने के लिए आम तौर पर आफ़ाक़ का सहारा लिया करती थी। जब किसी बात से सरमद इनकार करता तो मैं आफ़ाक़ के पास चली जाती। इस तरह सरमद बहुत जलता था। और जलाने का यह सिलसिला उसने अब तक जारी रखा था।

सरमद हँस पड़ा।

“अब नहीं, सरमद। अब तुम्हें पता चल गया है।”

“यह बताओ, कितने अरसे तक सरमद और आफ़ू की लड़ाई रही?”

“यानी वही फ़िल्मी कहानी।” इसहाक़ ने मुँह में मूँगफली डालकर कहा, “ज़ुल्मी… शैतानी चलती ही गई।”

“नहीं, सरमद की सरासर ज़्यादती थी।” नूरी बोली।

“अच्छा, यह बात थी?” सरमद ने धमकी भरे अंदाज़ में उसे घूरा। “और मैं तुम्हें किस तरह अपनी तरफ़ मुतवज्जेह करता? असल में पता नहीं चल रहा था कि तुम्हारे दिल में क्या है… तो हमने यह चक्कर चलाया।”

“वैसे मैं भैया की जगह होता तो तुम्हें… مار डालता।” इसहाक़ ने कहा।

सब हँसने लगे।

“आफ़ाक़ ऐसा नहीं है। उस पर भरोसा किया जा सकता है।” नूरी बोली। “वैसे एक बात और भी है। आफ़ाक़ अच्छा दोस्त हो सकता है, मगर अच्छा शौहर…”

फिर वह एकदम रुक गई और फ़लकी की तरफ़ देखकर बोली, “हूँ…”

“कोई बात नहीं।” फ़लकी हँस पड़ी। “मैं उनके बारे में ज़्यादा जानती हूँ।”

“दरअसल आफ़ू बचपन ही से बहुत गंभीर था। जवान होकर भी कुछ मामलों को बड़ी गंभीरता से लेता था। कहता था, औरत का मक़ाम घर है। औरतें बे-महार क्यों फिरती…”“हैं। ओछापन उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। वह ज़िंदगी को उसी पुराने नज़रिए से देखता था। इसी वजह से कोई लड़की ज़्यादा दिनों तक उसकी दोस्त नहीं रहती थी… मैं तो उससे कहा करती थी कि तुम अपनी बीवी पर बहुत सख़्ती करोगे। पता नहीं कोई लड़की तुम्हारे साथ ख़ुश रह सकेगी या नहीं…

क्या तुम ख़ुश हो?”

नूरी ने एकदम उसकी आँखों में आँखें डाल दीं।

“जी, मैं तो बहुत ख़ुश हूँ।” फ़लकी ने ख़ुशदिली से कहा। “शुरू-शुरू में ज़रा मुश्किल पेश आई थी। बस, ये ज़रा दूसरे मर्दों से अलग हैं। मैं इनका मिज़ाज समझ गई थी। ऐसे लोग दिल के बहुत अच्छे होते हैं।”

“हाँ…” नूरी एकदम बोली, “आफ़ू का दिल बहुत अच्छा है। यह मुझे भी मालूम है। बहुत हमदर्द और ग़मगुसार है। हर मुश्किल में मदद करता है, मगर अपने उसूल नहीं तोड़ता। ज़िंदगी में कोई भी उसूली इंसान पसंद नहीं करता और…”

वह रुककर बोली, “मैं ठहरी अज़ल से बे-उसूल और लापरवाह… तो ख़ुदा न ख़्वास्ता मेरी शादी आफ़ू से हो जाती तो दूसरे ही दिन मामला टाँय-टाँय फ़िश हो जाता।”

“तुम बड़ी बहादुर हो, फ़लकी।” नूरी ने सुनते हुए कहा।

“हाँ, इनकी बहादुरी की तो मैं भी दाद देता हूँ।” इसहाक़ बोला। “इतने बड़े घर में अकेली रहती हैं और इन्हें डर नहीं लगता।”

“अच्छी औरत वही होती है जो अपने शौहर की रज़ा में ढल जाए।” सरमद, जो लगातार चिलगोज़े खा रहा था, बोल उठा।

“अच्छा, अब तुम मुझ पर ताना मार रहे हो?” नूरी बोली।

“मैं तुम पर क्यों ताना मारूँगा?”

“तुमने घर से निकलते वक़्त कहा था कि कोट पहन लो… और मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी, क्योंकि मुझे सर्दी में इस तरह घूमना अच्छा लगता है।”

“और फिर ये तो ख़ल्क़ की भलाई के लिए ऐसा करती हैं। अब देखिए न, इस सख़्त सर्दी में जिसने भी ये ख़ूबसूरत, सुडौल बाज़ू और ये चेहरा देखा होगा, ग़ायब तो हो ही गया होगा।” इसहाक़ बोला।

नूरी ने उसे घूरा।

“यह काकू बाज़ नहीं आएगा। तो इस तरह हमें बचपन में भी जलाया करता था।”

“जी हाँ। आप भी कोई माचिस की तीली हैं।”

“तुम्हें पता है न, नूरी… एक बार इसने हमारे स्कूल में जाकर मशहूर कर दिया था कि आफ़ाक़ और नूरी की सगाई हो गई है। उस पर कुछ मत पूछो, कितना शोर मचा था। घर पर मुबारकबाद के फ़ोन आने लगे… और मामा और पापा से हमें मार भी ख़ूब पड़ी थी।”

“लेकिन यह भी तो मानिए, सरमद भाई से आपकी सुलह हो गई थी।” वह बोला।

“हाँ, सरमद के दिमाग़ का भूत ज़रूर उतर गया था।”

फिर वे सब अपने बचपन की बातें याद करने लगे।

थोड़ी देर बाद सरमद घड़ी देखते हुए बोला,

“मेरी आँखों का नूर… अरे, आज आप डिनर पर भी जाना है?”

नूरी एकदम खड़ी हो गई।

“ओह, और मुझे तो याद ही नहीं रहा था। ओह, अच्छा फ़लकी! अब इजाज़त दो।”

फ़लकी भी खड़ी हो गई।

“आप और सरमद भाई कल हमारे यहाँ खाना खाएँ।”

“हाँ, हाँ!” इसहाक़ आगे आ गया। “प्लीज़ मान जाइए। हम कुछ लोगों को बुलाएँ, गपशप करें। मैं तो इस घर की एकरसता से थक गया हूँ।”

“नहीं, फ़लकी, आफ़ाक़ के बिना अच्छा नहीं लगेगा। आफ़ू को आने दो।” नूरी बोली।

“उनके आने पर फिर बुला लेंगे।” फ़लकी ने कहा। “अभी मुझे फ़ुर्सत भी नहीं। यह सारा महीना उपवास है… और मैं आफ़ाक़ को ख़त भी लिखना चाहती हूँ कि मैं उनसे ख़फ़ा हूँ।”

नूरी बाहर आ गई। उसके पीछे सब निकल आए।

गर्म कमरे से बाहर आते ही नूरी को एक छींक आई। सरमद ने आगे बढ़कर कोट उसकी तरफ़ बढ़ाया और बोला,

“क्या तुम्हारे नाज़ुक कंधे इस कोट का बोझ उठा पाएँगे?”

नूरी ने एक प्यारा-सा क़हक़हा लगाया।

“ये नाज़ुक कंधे सिर्फ़ मोहब्बत का बोझ उठा सकते हैं।”

“अगर इस वक़्त कोट ज़्यादा ज़रूरी है…” सरमद ने उसके कंधों पर कोट डाल दिया।

“अच्छा फ़लकी, डियर…” नूरी ने उससे हाथ मिलाया। “आफ़ू के आते ही मुझे इत्तिला देना।”

थोड़ी दूर जाकर वह फिर वापस मुड़ आई और फ़लकी के कान के पास मुँह ले जाकर बोली,

“जो औरत आफ़ाक़ का दिल जीत लेगी, वह इस दुनिया की सबसे ख़ुशक़िस्मत और महान औरत होगी।”

“यह क्या सियासी नुक्ते समझा रही हो इन्हें?” इसहाक़ ने बेवजह अपना मुँह भी फ़लकी के कान के क़रीब कर लिया।

“तुम नहीं समझ सकोगे।” नूरी ने उसे चपत मारी। “भाई, तुम वापस कब जा रहे हो काकू?”

“मैं तो जाने के लिए पर तौले बैठा हूँ। अब वो हज़रत राजहंस साहब…”“अपने हीर सियाल के पास तशरीफ़ ले आएँ तो मेरी ख़लासी हो। ऐसा लगता है जैसे शेर पिंजरे में बंद हो गया है।”

“वाह रे मेरे लकड़ी के शेर…” सरमद ने उसकी कलाई पकड़कर कहा।

“यह भी कोई ज़िंदगी है मियाँ… कोई मनमोहिनी सूरत ही नज़र नहीं आती। इसका कुछ कर दिखाओ।” सरमद ने कहा।

“भाई, मैंने तो उसे कहा है कि अपनी गर्लफ्रेंड्स को बुला लिया करे। इसके अलावा मैं और क्या कर सकती हूँ?”

“हाँ, हाँ…” नूरी ने हँसकर कहा, “तुम्हारी तक़दीर में मायूसियाँ ही लिखी हैं।”

वे लोग हँसते हुए मोटर में बैठ गए।

इसहाक़ उस पर फिर न जाने क्या-क्या कहेगा। फ़लकी जल्दी से अपने कमरे में आ गई। उसे मालूम था कि अब फ़िल्म का सारा क़िस्सा रात को सोते वक़्त…

फ़लकी का दिल बहुत मुतमइन था।

वह ख़्वामख़्वाह नूरी पर शक करती रही। नूरी तो बहुत अच्छी लड़की थी। बड़ी साफ़गो और साफ़-सुथरी। यह तो उसे पता चल गया था कि नूरी आफ़ाक़ की कमज़ोरी नहीं है। मगर आफ़ाक़ की कमज़ोरी क्या है? इस बात का उसे पता नहीं चल रहा था।

आफ़ाक़ का दिल जीतना बहुत बड़ी…

काश! वह आफ़ाक़ का दिल जीत सके…

एक दिन अली-सुबह जब वह नमाज़ पढ़कर अपना कल का सबक़ दोहरा रही थी, कि घंटी बजी। फ़लकी का दिल धड़क उठा। इतनी सुबह कौन फ़ोन कर सकता है…?

हाँ… बेवक़्त कॉलें दूर-देस से ही आया करती हैं… शायद… शायद उस बेदर्द को मेरा ख़याल आ गया हो।

मैं जो रात भर बेचैन रही हूँ। शायद दिल की पुकार उसने सुन ली हो…

घंटी लगातार बजती जा रही थी। घर की कॉल लग रही थी। एक पल फ़लकी खड़ी रही, फिर नंगे पाँव दौड़ती हुई फ़ोन के पास आई और धड़कते दिल के साथ रिसीवर उठा लिया।

“हैलो।”

“जी, आप लाहौर से बोल रही हैं?”

“जी हाँ…”

“कराची बात करें।”

“कराची… कराची…” वह दुश्मन-ए-जाँ कराची के रास्ते ही तो गया था।

अभी वह किसी नतीजे पर न पहुँची थी कि एक जानी-पहचानी आवाज़ ने उसे ख़्वाबों के द्वीप से बाहर निकाल लिया।

“हैलो… हैलो… फ़लकी… फ़लकी डार्लिंग…”

यह वही जानी-पहचानी आवाज़ थी, जिसे वह बचपन से सुनती आ रही थी। मगर अब वह आवाज़ कितनी अजनबी बनकर खड़ी थी। जैसे वह उसे पहचानने से इनकार करना चाहती हो। जैसे अपने ख़ुद-फ़रेबी के पर्दे को चाक़ नहीं करना चाहती हो।

“जी… आप हैं?”

आख़िर उसने गले से आवाज़ निकालकर कहा, “हाँ, डार्लिंग।”

कितनी मायूसी हुई! काश, मम्मी ने यूँ फ़ोन न किया होता। उनके आने की ख़ुशी तो बर्बाद न होती।

“फ़लकी, कैसी हो जान?”

“अच्छी हूँ, मम्मी… आप कब आईं?”

“मैं अभी-अभी आई हूँ। कराची एयरपोर्ट से तुम्हें फ़ोन कर रही हूँ। तुम्हारे लिए दिल बेताब था।”

“डैडी कहाँ हैं?”

“वो भी आए हैं। सलमान के बखेड़े निपटा रहे हैं। मैं यहाँ इंतज़ार में खड़ी थी। सोचा, इतने में अपनी फ़लकी से बात कर लूँ।”

“आप लोग लाहौर कब आ रहे हैं?”

फ़लकी ने अपने काँपते हुए वजूद पर क़ाबू पाकर पूछा।

“नौ बजे वाले जहाज़ में हमारी बुकिंग हो गई है। अब यहाँ एक पल भी ठहरने को जी नहीं चाहता। तुम एयरपोर्ट पर आओगी?”

“आ जाऊँगी, मम्मी।”

“ज़रूर आना। तुम्हारी सूरत देखने को तरस रही हूँ।”

मम्मी को हमेशा पाँच-छह महीने बाद उसकी सूरत देखने का ख़याल आता था।

“ख़ुदा हाफ़िज़, डियर। अगर बातें करूँगी तो…”

“ख़ुदा हाफ़िज़, मम्मी।”

आवाज़ें बंद हो गईं। फ़लकी ने फ़ोन वापस रख दिया।

नाश्ते के बाद एयरपोर्ट इन्क्वायरी पर फ़ोन करके पता किया तो मालूम हुआ कि फ़्लाइट दस बजकर पचास मिनट पर आएगी।

फ़लकी ने जल्दी-जल्दी दोपहर और रात के खाने के बारे में अब्दुल करीम को समझाया। इसहाक़ को भी दफ़्तर जाने से पहले बता दिया कि आज वह मम्मी के यहाँ चली जाएगी।

“मैं तुम्हें लेने आ जाऊँ, भाभी?”

“नहीं इसहाक़… पता नहीं मैं कब फ़ुर्सत होगी। आज तुम अपने दोस्तों के साथ कोई बाहर का प्रोग्राम बनाओ।”

“ज़ाहिर है, जब दुश्मन साथ छोड़ जाएँ तो दोस्त ढूँढ़ने पड़ते हैं।” इसहाक़ ने संजीदगी से कहा।

फ़लकी को हँसी आ गई। उसका दिल एकदम हल्का हो गया था।

“मैं रात को वापस आ जाऊँगी।”

“हाँ, ये…” वह मोटर में बैठते हुए बोला, “रात को वापस ज़रूर आ जाना। मैं घर में अकेला नहीं रहूँगा।”

“नाटक करता है जैसे नन्हा बच्चा हो।”

“नन्हा बच्चा ही तो हूँ। मुझे भी भाभी की याद आती है, मगर तुम थपकी-थपकी कर नहीं…”

“अच्छा, अब बकवास बंद करो और जाओ।”

“आज तुम्हारी मम्मी आ रही हैं, भाभी! आज तो तुम्हारा रंग-ढंग ही बदला हुआ नज़र आ रहा है।”

फ़लकी सोगवार अंदाज़ में हँस पड़ी।

इसहाक़ क्या जान सकता है कि फ़लकी के दिल पर क्या गुज़र गई है। आहटें सुनते-सुनते वह दीवानी हो गई है… और आहटों के फ़रेब खा-खा कर थक गई है…

एयरपोर्ट जाने से पहले फ़लकी बड़े एहतिमाम से तैयार हुई। उसने मोतियों के काम वाली फ़िरोज़ी रंग की साड़ी पहनी। ख़ूब अच्छा मेकअप किया और बड़े प्यार से बाल बनाए। एक हल्का-सा फ़िरोज़े का सेट पहना, ताकि मम्मी पर उसकी उदासी और सोगवारी ज़ाहिर न हो।

उसे वैसे भी बनी-सँवरी औरतें अच्छी लगती थीं और फिर फ़लकी उसे अपनी गुज़श्ता ज़िंदगी का कोई तास्सुर नहीं देना चाहती थी। यह वही फ़लकी थी जो छह महीने पहले मम्मी को एक-एक बात बता देना चाहती थी और अब एक-एक बात छिपाने का तहय्या किए हुए थी।

कार पार्किंग से बाहर आते ही मम्मी उसे ख़ूब-ख़ूब गले लगाकर मिलीं। बार-बार उसका मुँह चूमती रहीं और हाथ पकड़-पकड़कर उसकी ख़ैरियत पूछती रहीं।

“तुम ज़रा कमज़ोर लग रही हो… या यह मेरा वहम है? रंग भी वैसा चमकदार नहीं रहा।”

“ठीक तो हो?”

“ठीक तो हो?”

मम्मी के ऐसे जुमलों पर फ़लकी को रोना आ रहा था। उसकी मर्माहत-सी हालत हो रही थी। कोई उसका हाल पूछता तो आँसू निकल आते।

डैडी के सीने से लगते वक़्त तो उसकी आँखों से भीग-भीगकर आँसू निकल आए, जिन्हें उसने बड़ी नफ़ासत से साफ़ कर लिया।

डैडी हमेशा की तरह थे—संजीदा और मुतमइन। उसी तरह धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए। अलबत्ता माँग के कुछ और बाल सफ़ेद हो गए थे।

जिससे डैडी और भी गरिमापूर्ण लग रहे थे।

लेकिन मम्मी पहले से ज़्यादा स्मार्ट और तरोताज़ा लग रही थीं। चेहरे की झुर्रियाँ भी हैरतअंगेज़ तौर पर कम हो गई थीं। मम्मी हमेशा की तरह फ़ेशियल ट्रीटमेंट लेकर आई थीं या फ़ेस-लिफ़्टिंग करवाकर आई थीं। बहरहाल, काले रंग के कोट में वह ज़्यादा अच्छी लग रही थीं। फ़लकी अपने तमाम मेकअप के बावजूद उनके सामने मुरझाई हुई-सी लग रही थी।

“तुम्हारी सेहत तो ठीक है, डार्लिंग?”

कार में बैठते ही मम्मी ने सवालों की झड़ी लगा दी, जिससे फ़लकी घबरा रही थी।

“मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ, मम्मी।” फिर बात का रुख़ बदलने के लिए बोली, “और आप माशाअल्लाह पहले से भी ख़ूबसूरत लग रही हैं। इसका मतलब है, इस बार आपका ट्रिप बहुत अच्छा रहा है।”

“ओह, स्वीट…” मम्मी ने बेइख़्तियार उसका मुँह चूम लिया।

“दरअसल, इस बार तुम्हारे डैडी ने मेरा साथ देने से इनकार कर दिया था। मैं अपनी मर्ज़ी से इधर-उधर घूमती रही हूँ। बहुत एंजॉय किया है मैंने… तुम्हारी तरफ़ से बेफ़िक्री थी, इसलिए।”

“जहाँ मेरी तरफ़ से तो आप हमेशा बेफ़िक्र ही रहीं।”

“वहाँ… आफ़ू मुझे मिला था।” मम्मी अचानक बोलीं। “मैं उन दिनों कनाडा में थी। जब उसने मुझे न्यूयॉर्क से फ़ोन किया तो मैं दो दिन के लिए न्यूयॉर्क आ गई थी। उसकी नानी के पास ठहरी थी। बहुत लुत्फ़ आया। आफ़ू ने हमें न्यूयॉर्क के वे इलाक़े दिखाए, जो हमने इससे पहले नहीं देखे थे। और तुम जानती हो… आफ़ाक़ को हम उसकी कंपनी में कोई और नहीं हो सकता। बहुत ख़ूबसूरत तरक़्क़ी की है उसने…”

फ़लकी हर बार सिर्फ़ मुस्कुराती रही और सोचती रही। आफ़ाक़ ने मम्मी को कैसे-कैसे शीशे में उतारा होगा।

“तुम्हारे लिए उसने चॉकलेट का एक डिब्बा लेकर दिया था। वह मेरे बैग में है।”

मम्मी ज़रा झुककर पैरों में पड़े शॉपिंग बैग को टटोलने लगीं। फ़लकी चुप बैठी रही। उसने बिल्कुल नहीं कहा, “घर चलकर ले लूँगी, मम्मी। रहने दें, प्लीज़…”

मम्मी ने कुछ ढूँढ़-ढाँढकर एक ख़ूबसूरत-सा शंघाई सिल्क का रिबन लगा हुआ डिब्बा निकाल ही लिया और फिर फ़लकी की गोद में रख दिया।

फ़लकी ने जल्दी से उसे पकड़ लिया।

वह इतना ख़ूबसूरत था कि हद नहीं। जिस काग़ज़ में वह लिपटा हुआ था, उस पर जगह-जगह “F… F” लिखा हुआ था और “F” के साथ कहीं-कहीं लाल रंग के दिल के निशान बने हुए थे। ऊपर सुनहरी रंग का रिबन लिपटा हुआ था।

फ़लकी का दिल चाहा कि वह उस डिब्बे को सीने से लगा ले। उसके महबूब ने पहली बार उसे कुछ भेजा था। मगर उसने वह डिब्बा अपनी गोद में रख लिया। भला इतना ख़ूबसूरत पैकेट खोलकर यूँ ही बर्बाद किया जा सकता था?

“बस…” फ़लकी ने बेइख़्तियार मम्मी से पूछ ही डाला, “नहीं…?”

“नहीं…” मम्मी ने हँसकर जवाब दिया। “वह कह रहा था, असल तोहफ़ा मैं ख़ुद लाऊँगा। और यह भी कह रहा था, फ़लकी को मेरा प्यार दे दीजिए।”

“लो, डार्लिंग! अपने आफ़ाक़ का प्यार तो लो।”

उन्होंने आगे बढ़कर फ़लकी के रुख़्सार को फिर चूम लिया।

इतनी-सी बात से फ़लकी को नशा-सा चढ़ गया।

वह सितमकश, तीर चलाना ख़ूब जानता है। उसे मालूम है कि कहाँ-कहाँ सही निशाना लगाना है।

आफ़ाक़ की अदाओं में भी एक अदा थी और अब फ़लकी अदा-शनास हो गई थी।

फ़लकी रात तक मम्मी के यहाँ रही…

मम्मी के यहाँ वही आलम था—दोस्त, अहबाब, मुबारकबादियाँ… चाय, फल, दावतें…

फ़लक-बोस घर में फिर से क़हक़हे उमड़ रहे थे।

मम्मी अपने सफ़र की दास्तान ख़ूब चटखारे लेकर सुना रही थीं। डैडी हमेशा की तरह दूर बैठे पाइप पी रहे थे और बात-बेबात मुस्कुरा रहे थे।

(डैडी! अब मुझे मालूम हो गया कि आप पाइप क्यों पीते हैं। आप पाइप नहीं पीते, ग़ुस्सा पीते हैं। आप सब्र के घूँट भरते हैं। ग़ज़ब है कि मम्मी तमाम उम्र पूरी तरह शौहर बनी रहीं… और आप… आप… और आपकी फ़लकी को यह सब भुगतना पड़ा।)

मम्मी उसके लिए बेशुमार चीज़ें लाई थीं। पूरे दो बक्से भरे हुए थे, जो सिर्फ़ फ़लकी के लिए थे। जिस-जिस मुल्क से जो-जो चीज़ें ख़रीदी थीं, मम्मी उसकी पूरी तफ़सील बताती रहीं।

पहले फ़लकी ऐसी चीज़ें पाकर बेहद ख़ुश हो जाया करती थी। जब से पैदा हुई थी, उसे ऐसी सौग़ातें मिलती रही थीं। यही अनमोल चीज़ें उसकी ज़िंदगी थीं।

मम्मी के आते ही वह अपनी चीज़ें उठाकर अपने दोस्तों के पास ले जाया करती थी। फिर वह बाक़ायदा अपने मलबूसात दिखाने के लिए पार्टियाँ करती और दोस्तों से ख़ूब-ख़ूब दाद लिया करती थी।

घर आकर आज उसने उन चीज़ों को ज़्यादा दिलचस्पी से नहीं देखा। उसके अंदर जैसे कोई कह रहा था—दुनिया में और भी बहुत कुछ है, जो इन चीज़ों से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है… ज़िंदगी सिर्फ़ कपड़ों और गहनों के सहारे नहीं गुज़र सकती… नश्वर चीज़ें अमर भावनाओं की कीमत नहीं हो सकतीं।

फिर उसने बड़े करीने से सारी चीज़ें बक्सों में बंद कर दीं और बड़े ख़ुलूस से मम्मी का शुक्रिया अदा किया।

फिर मम्मी से बोली—

“मम्मी! अभी आप इन चीज़ों को अपने पास ही रखिए। जब आफ़ाक आएँगे, मैं तब ये चीज़ें लेकर जाऊँगी…”

उसका ख़याल था कि अगर आफ़ाक को ये चीज़ें पसंद आएँगी तो फ्लकी इन्हें मम्मी से ले लेगी, वरना नहीं।

और मम्मी इस ख़याल से चुप हो गईं कि शायद यह अपने पति पर रौब जमाना चाहती है।

रात का खाना खाने के बाद फ्लकी ने मम्मी से इजाज़त माँगी।

“क्यों डार्लिंग! इतनी जल्दी क्यों जा रही हो? मैं इतने दिनों बाद आई हूँ। अब मेरे पास रहो…”

“अब आप आराम करें, मम्मी… पीछे घर भी अकेला होगा।”

“क्या तुम्हारे घर में कोई नहीं है?”

“हैं तो… मगर नौकरों पर घर तो नहीं छोड़ा जा सकता।”

“मैंने तो नौकरों पर घर छोड़कर सारी दुनिया घूम आई हूँ।”

“मम्मी, आपकी और बात है…”
(आपके घर में और मेरे घर में बहुत फ़र्क है। आपके घर को कोई घर तो नहीं कह सकता ना?…)

“वह इसहाक भी तो आजकल नहीं है और मैं नौकरों से कहकर कभी नहीं आई हूँ। यूँ करो, सबको बता दो कि आज आ जाओ।”

“मम्मी, रात को मैं यहाँ नहीं रहूँगी। अब आफ़ाक भी यहाँ नहीं हैं। वहाँ जाने की क्या मजबूरी है?”

“व्हाट अ चेंज!” मम्मी ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें खोलकर कहा।

“जान जी! कहाँ हो?” उन्होंने सदरुद्दीन को आवाज़ दी, “ज़रा अपनी लाडली की शानदार बात सुनिएगा…”

डीडी पल भर में बोतल के जिन्न की तरह नमूदार हो गए।

“तुम्हारी लाडली साल के अंदर-अंदर बदल गई है। जिस घर में हमेशा रही, अब उसे वही घर अच्छा नहीं लगता। कहती है, अब मैं एक रात भी अपने घर से बाहर नहीं रह सकती।”

“यह तो बहुत अच्छी बात है।” डीडी ने मुँह से पाइप निकालकर कहा, “एकदम ठीक-ठाक…”

फिर वह पाइप का धुआँ छोड़ते हुए ऐसे चले गए, जैसे फ्लकी से उन्हें यही उम्मीद थी।

फ्लकी को अपने किए पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी। उसने जो महसूस किया था, साफ़-साफ़ कह दिया था।

“इसको जाने दो। नाज़ली, कल फिर आ जाएगी।” जाते-जाते डीडी इतना ही कह गए।

“थैंक यू, डीडी।”

वह दौड़ती हुई गई और डीडी के कंधे पर सिर रख दिया। डीडी तो बिना कहे ही दिल की बात जान लेते थे।

मगर मम्मी को उसका यह लगाव पसंद नहीं आया… बस चुप हो गईं।

फ्लकी ने अपना पर्स उठाया और बाहर निकल गई।

मम्मी को क्या मालूम…?

इंतज़ार क्या होता है…?

मुहब्बत किसे कहते हैं…?

मम्मी तो वह ख़ूबसूरत मोमबत्ती हैं, जो कमरे की ख़ूबसूरती बढ़ाने के लिए ड्रॉइंग रूम के बीचों-बीच रख दी जाती है। वह मोमबत्ती सजावट के लिए होती है, जिसे कभी जलाया नहीं जाता, जो कभी कमरे को रोशनी नहीं दे सकती… हाँ, देखने वालों को वह बहुत अच्छी लगती है… लेकिन जलने वाले ही जानते हैं कि पिघलती हुई मोमबत्ती कितनी ख़ूबसूरत होती है।

जल-जलकर वह निखरती जाती है और एक दिलकश रूप धारण करती जाती है। दिल में उतर जाती है… किसी के काम आ जाती है… अपना आप जला देती है।

मोम का वह ढेर भी, जो आख़िर में मेज़ पर पड़ा रह जाता है, किसी कलाकार की बनाई हुई मूर्ति से कम नहीं होता… उसे हाथ में उठाकर देखने को जी चाहता है।

मम्मी क्या जानें…?

क्या जानें मम्मी…?

सिर्फ़ मुहब्बत पाना ही ज़िंदगी नहीं है!

मुहब्बत करना और ख़ुद को निसार कर देना ही शाश्वत जीवन है।

मुहब्बत माँगती नहीं। मुहब्बत देना चाहती है।

मुहब्बत सौदा नहीं करती। मुहब्बत बेमोल होती है।

मुहब्बत खरीदी नहीं जाती, बल्कि वह नस-नस में ख़ून की तरह उतर जाती है। साँस की तरह बस जाती है… जज़्बात आँसुओं की तरह ख़ुद-ब-ख़ुद उभर आते हैं…

मम्मी क्या जानें…

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