Close Menu
  • Home
  • Privacy Policy
  • About us
  • Contact us
  • Terms & Conditions
  • Hindi Novel
  • Urdu Novel
  • English Novel
Facebook X (Twitter) Instagram
Trending
  • Lagan (Hindi Novel) Part 12
  • Lagan ( Hindi Novel ) Part 11
  • Lagan (Hindi Novel) Part 10
  • Lagan (Hindi novel) Part 9
  • Lagan (Hindi Novel) Part 8
  • Lagan (Hindi Novel) Part 7
  • Lagan ( Hindi Novel ) Part 6
  • Lagan (Hindi Novel) Part 5
  • Home
  • Privacy Policy
  • About us
  • Contact us
  • Terms & Conditions
  • Hindi Novel
  • Urdu Novel
  • English Novel
Facebook X (Twitter) Instagram
novelkistories786.comnovelkistories786.com
Subscribe
Monday, November 2
  • Home
  • Privacy Policy
  • About us
  • Contact us
  • Terms & Conditions
  • Hindi Novel
  • Urdu Novel
  • English Novel
novelkistories786.comnovelkistories786.com
Home»Hindi Novel

Lagan ( Hindi Novel ) Part 11

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailAugust 24, 2026Updated:November 2, 2026 Hindi Novel No Comments32 Mins Read
Lagan Hindi Novel Part 11,
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email

Lagan Part 11,

 

फलकी की आँख खुली तो उसने चारों तरफ़ देखा और बड़बड़ाते हुए उठ बैठी।

दोपहर का समय था। धूप घर के आँगन को पार कर चुकी थी। दिन भी हमेशा की तरह व्यस्त दिखाई दे रहा था… मगर वह अब तक सो रही थी। बल्कि अभी-अभी उठी थी।

वह जल्दी से उठकर बैठ गई। वह अपने कमरे की बजाय टीवी लॉन्ज में सो रही थी। वह लॉन्ज में कैसे पहुँच गई? क्या रात फिर कोई झगड़ा हुआ था?

वह इधर-उधर देखने लगी तो उसकी नज़र सिरहाने रखी जानमाज़ पर टिक गई, जिसे उसने खुद ही तह करके सिरहाने रख दिया था।

तब… उसे सब कुछ याद आ गया।

अली-सुबह उसने यहीं नमाज़ पढ़ी थी। शायद उसने ज़िंदगी में पहली बार नमाज़ पढ़ी थी।

या यूँ कहें कि पहली बार इस तरह पढ़ी थी—पूरे ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू के साथ, सिर से पाँव तक एक इल्तिज़ा बनकर, ख़ताकार बनकर, माफ़ी की तलबगार बनकर।

और उसे नमाज़ पढ़ने में एक अजीब-सा आनंद भी आया था। उसे ऐसा महसूस हुआ… जैसे वह चीज़ जो…बंदे जो नहीं दे सकते, वह अल्लाह के यहाँ मिल जाता है। उसके दिल को सुकून मिला था। उसकी रूह हल्की-फुल्की हो गई थी।

होस्टल में लड़कियों की देखा-देखी वह कभी-कभी नमाज़ पढ़ लिया करती थी। नमाज़ उसने क्लब के साथ वाली मस्जिद के मौलवी साहब से सीखी थी। मौलवी साहब आम तौर पर क्लब में आने वाली औरतों के बच्चों को वहीं क्लब के एक कमरे में नमाज़ सिखाने आया करते थे।

बच्चे उन्हें बहुत सताते थे, मगर मौलवी साहब ने जैसे अपने अंदर से गुस्से का हिस्सा ही निकाल दिया था। वह कभी किसी बदतमीज़ी या गुस्ताख़ी का बुरा नहीं मानते थे।

वह बच्चों को क़ुरआन भी पढ़ाते थे, मगर ज़्यादातर बच्चे पहले सिपारे से आगे नहीं बढ़ पाते थे। जैसे-जैसे उनकी दूसरी दिलचस्पियाँ बढ़तीं, वे मौलवी साहब को छोड़कर चले जाते। चूँकि मौलवी साहब को बेगमात की तरफ़ से नियमित मेहनताना मिलता था, इसलिए वह उनकी खुशनूदी का भी ख़याल रखते थे।

फलकी ने भी पहला सिपारा पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। उसे सिपारा पढ़ने से ज़्यादा राइडिंग (घुड़सवारी) पसंद थी।

कहाँ घोड़े की लगाम पकड़कर हवा से बातें करना… और कहाँ झूम-झूमकर सिपारा पढ़ना।

इसलिए साईस के आते ही वह उठकर भाग जाती थी।

फिर जब उसकी एक सहेली ने मम्मी से शिकायत की कि फलकी मौलवी साहब को देखते ही भाग जाती है, तो मम्मी इतराकर बोली थीं—

“कोई बात नहीं। अभी इसकी उम्र ही क्या है। क़ुरआन शरीफ़ पढ़ने के लिए बहुत वक्त पड़ा है। मेरी बेटी को अपना बचपन (Childhood) एंजॉय करने दो।”

उसके बाद तो फलकी ने कभी सिपारे को हाथ तक नहीं लगाया।

हाँ, लड़कियों की देखा-देखी हाथ उठाने, झुकने और उठ खड़े होने से उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ था कि नमाज़ क्या है और उसका मकसद क्या है। वह तो यही सोचती थी, “यह तो अच्छी-खासी एक एक्सरसाइज़ है।”

वह मन ही मन कहती, “इससे बेहतर है पी.टी. कर ली जाए… या किसी सी-सॉ (SEA-SAW) पर झूले ले लिए जाएँ।”

लेकिन आज जब उसने एक नए जज़्बे के साथ नमाज़ पढ़ी, तो वह जानमाज़ पर खड़ी थर-थर काँप रही थी। उसे महसूस हो रहा था जैसे अल्लाह मियाँ उसे देख रहे हैं। अल्लाह का ख़याल आते ही उसकी आँखें भर आईं।

वह सोचने लगी—आख़िर वह हमेशा मम्मी की गलतियों का बदला अल्लाह से क्यों लेती रही? अल्लाह तो मेहरबान है। वह हर किसी के लिए हर वक्त मौजूद है। फरियाद सुनता है, तसल्ली देता है। वह मम्मी जैसा नहीं है।

फिर उसने ख़ुदा से इतनी दूरी क्यों बना ली थी?

आफ़ाक का भला हो… आखिर उसी ने उसे फिर से ख़ुदा से मिला दिया।

नमाज़ पढ़कर वह बहुत रोई थी। उसने अल्लाह के सामने अपना दिल पूरी तरह खोलकर रख दिया था। उससे रोशनी माँगी थी… आख़िरी सहारा माँगा था… और कहा था—

“मुझे समझ नहीं आती… मुझे अपनी अक़्ल पर भरोसा नहीं रहा। अब तक मैंने गलतियाँ ही की हैं। अब मुझे सही रास्ता दिखा।”

और उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे अल्लाह ने उसे तसल्ली दे दी हो… उसके दिल को सुकून बख्श दिया हो… उसकी उलझनों का हल उसके सामने रख दिया हो।

यह आख़िरी सहारा था, जिसे उसने पूरी मजबूती से थाम लिया था।

उस वक़्त जब वह फूट-फूटकर रो रही थी और हाथ फैलाए बैठी थी, तो उसकी हथेलियों पर गिरते आँसू तस्बीह के दानों जैसे लग रहे थे।

उसी दौरान आफ़ाक के कमरे से क़ुरआन की तिलावत की दर्दभरी आवाज़ आ रही थी।

 

(“फिर तुम अपने रब की कौन-कौन-सी नेमतों को झुठलाओगे?”)

यह आवाज़ सुनकर वह ठिठक गई।

नूर के ज़र्द की क़ुरआन की तिलावत उसे इतनी असरअंगेज़ और खूबसूरत लगी कि पहली बार उसे एहसास हुआ कि दुनिया की किसी भी संगीत में ऐसा लचीलापन और ऐसा सोज़ नहीं है। वह आवाज़ नहीं थी… जैसे बादलों के नर्म-नर्म गाले हों, जो मोतियों और फूलों की शक्ल में दिल पर बरस रहे हों।

एकाएक उसके मन में ख़याल आया कि उसे भी क़ुरआन पढ़ना चाहिए। मगर वह पहले सिपारे से आगे बढ़ ही नहीं पाई थी… और शायद वह भी अब भूल चुकी होगी, क्योंकि उसने उसे कभी खोलकर देखा ही नहीं था।

अब उसे कौन पढ़ाएगा?

आफ़ाक से कहेगी…

नहीं… आफ़ाक से कहते हुए शर्म आएगी। वह कहेगा, “कैसी मुसलमान लड़की है, जिसे कलाम-ए-पाक पढ़ना भी नहीं आता।”

“वाक़ई शर्म की बात है…” उसने मन ही मन सोचा।

मगर अब आफ़ाक से कैसा पर्दा? जब वह अपनी ज़िंदगी का हर राज़ उसके सामने खोल चुकी थी, उसके सामने अपने गुनाहों का इक़रार कर चुकी थी…

तो फिर अपने नेक इरादे बताने में कैसी झिझक?

यही सोचते-सोचते वह शीशे के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने बाहर देखा…

भोर उसका इंतज़ार कर रही थी। सुबह फूट रही थी। शर्माते हुए अँधेरे का गिरेबान धीरे-धीरे चाक हो रहा था। देखते ही देखते सुबह पहले बैंगनी हुई, फिर किसी नवयौवना लड़की की तरह गुलाबी हो गई और आख़िर में दूधिया सफेद।

कुँवारी सुबह ने सूरज के आने से पहले उसी तरह रंग बदले थे, जैसे कोई अल्हड़ युवती पहली बार अपने महबूब का सामना करती है और हर अदा पर उसका चेहरा नए रंग में ढल जाता है।

 

फलकी को ज़िंदगी की यह सुबह भी बहुत खूबसूरत लगी।

बाहर का नज़ारा देखकर वह फिर सोफ़े पर आकर बैठ गई। आज उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसने नया जन्म लिया हो। वह पहले से कहीं ज़्यादा परिपक्व, हल्की और प्रसन्न लग रही थी। वह वहीं सोफ़े का सहारा लेकर लेट गई।

सारी रात वह सोई नहीं थी। बहुत रोने की वजह से उसकी आँखों में जलन हो रही थी। उसने अपनी जलती हुई आँखों पर ज़ोर से हथेलियाँ रख लीं और सोचने लगी।

“ख़ुदा का एहसास कितना खूबसूरत है… और वह माँ से भी ज़्यादा कोमल हो जाता है। ख़ुदा तो माँ से भी ज़्यादा खूबसूरत है।”

“इसलिए कि माँ और बच्चे के बीच कभी-कभी पर्दे आ जाते हैं, जबकि ख़ुदा और बंदे के बीच कोई पर्दा नहीं होता।”

माँ से अपने दिल का दर्द कहकर सुनाना पड़ता है।

ख़ुदा बिना कहे ही जान लेता है।

माँ कभी आँसुओं से बेपरवाह हो जाती है।

ख़ुदा आँसुओं की ज़बान समझता है।

माँ कभी बच्चे को मायूस कर देती है, जबकि ख़ुदा अपने बंदे को मायूस नहीं करता।

यही सब सोचते-सोचते न जाने कब उसे नींद आ गई, और अब उसकी आँख खुली थी।

उसने कलाई पर बँधी घड़ी देखी। दोपहर के बारह बज रहे थे।

“आफ़ाक तो दफ़्तर चला गया होगा… जाने किसने उसे नाश्ता कराया होगा।”

उसने अब्दुल करीम को आवाज़ दी। बाहर नौकरों के आने-जाने की आहटें सुनाई दे रही थीं।

अब्दुल करीम दौड़कर उसके पास आ गया।

“जी, सर…”

“साहब को नाश्ता करा दिया था?”

“जी, सर। मैं आपको जगाने आ रहा था। मैंने साहब से कहा था कि बेगम साहिबा का हुक्म है कि आपका नाश्ता उनके अलावा कोई और न बनाए। मगर उन्होंने हुक्म दिया कि बेगम साहिबा को मत जगाओ, उन्हें सोने दो। रात उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। जब तक वह खुद न जागें, कोई उन्हें न जगाए।”

फलकी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे आफ़ाक पर बेइंतहा प्यार आ गया। साथ ही उसकी आँखें भी नम हो गईं।

क्या यह नमी मोहब्बत की विरासत है?

क्या मोहब्बत का एहसास होते ही आँखें अपने-आप भीग जाती हैं?

“जी, सर… आपके लिए चाय लाऊँ?”

“हाँ, अब्दुल करीम… और मेरा नाश्ता भी बना लाओ।”

“बहुत अच्छा, सर।”

कंधे पर झाड़न रखे अब्दुल करीम रसोई की तरफ़ चला गया।

फलकी उठकर गुसलखाने में चली गई। उसने दाँत साफ़ किए, मुँह धोया और ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर अपने बाल सँवारने लगी। फिर वापस आकर लॉन्ज में बैठ गई।

कुछ देर बाद अब्दुल करीम ट्रॉली पर नाश्ता सजाकर ले आया।

फ्राई अंडों से गरम-गरम भाप उठ रही थी। मक्खन लगे टोस्ट की खुशबू उसकी भूख और बढ़ा रही थी।

उसने चम्मच उठाई और चायदानी से क़हवा अपनी प्याली में उड़ेलने लगी।

“अब तुम जाओ, अब्दुल करीम… और दोपहर का खाना तैयार करो।”

“दोपहर का खाना तो, सर जी! मैंने तैयार कर लिया है।”

“तैयार कर लिया है?”

फलकी ने हँसकर पूछा। फिर सामने दीवार पर लगी घड़ी की तरफ़ देखा। एक बजने को था।

“अच्छा, तुम जाओ अब।”

अब्दुल करीम चला गया।

और फलकी गर्मागर्म चाय के साथ मचलते हुए ख़यालों में खो गई। उसे रात की सारी बातें याद आने लगीं।

पता नहीं, जो कुछ रात को हुआ था… सच था या झूठ। लेकिन ख़्वाब तो नहीं था।

भला वह इतनी बहादुर कैसे हो गई कि उसने आफ़ाक को अपनी ज़िंदगी की एक-एक बात बता दी…

यानी नामुमकिन, मुमकिन हो गया था। अगर वह देर से न उठती तो उसे कभी यक़ीन न आता कि वह इतना हिम्मत भरा कदम उठा चुकी है।

लेकिन उसे पछतावा नहीं था… हाँ, आफ़ाक का रवैया जानने की बेचैनी ज़रूर थी।

क्या वह आफ़ाक से रहम की भीख माँगना चाहती थी?

“हरगिज़ नहीं…” उसके दिल ने विरोध किया।

इश्क़ रहम की भीख नहीं माँगता। इश्क़ ख़ुद्दारी से ऊपर होता है… रहम और मोहब्बत में बहुत फ़र्क़ है। कोई औरत मोहब्बत के बदले तरस नहीं लेना चाहती। रहम के सहारे ज़िंदगी गुज़ारी तो जा सकती है, मगर जिया नहीं जा सकता।

ख़ुदा की क़सम, उसने रहम की खातिर यह कहानी आफ़ाक को नहीं सुनाई थी। वह तो चाहती थी कि सारे पर्दे, सारे हिजाब उठ जाएँ।

 

वह आफ़ाक को बता देना चाहती थी कि वास्तव में वह अच्छी लड़की नहीं है। उसका अतीत दाग़दार है। उसका दामन तार-तार है। और अगर आफ़ाक उससे और भी नफ़रत करे तो वह सह सकती है। अगर आफ़ाक की नफ़रत कुछ और दिल जलाने वाले अंदाज़ इख़्तियार कर ले, तो वह भी सह लेगी।

वह आफ़ाक को बता देना चाहती थी कि वह अब बिल्कुल नई लड़की बन गई है। नफ़रतों की फ़सील पर वह मोहब्बत की शमा बनकर जलेगी और जलती ही रहेगी। इश्क़ बेतलब होता है। इश्क़ बेख़ौफ़ होता है। इश्क़ का कोई तकाज़ा नहीं होता।

जलना और उफ़ न करना, यही उसका मज़हब होता है।

और फिर एक बड़ी हक़ीक़त उस पर आशकार हो गई थी। जिसे वह ज़िंदगी का हासिल समझती थी… वह जान गई थी…

कि मर्द के साथ रहने के लिए मर्द को जीतना पड़ता है।

मर्द चाहता है कि लगातार जद्दोजहद से औरत इस मैदान में उसे जीते। वह किसी भी औरत की झोली में माल-ए-ग़नीमत की तरह गिरने को तैयार नहीं होता। वह एक क़िला होता है।

औरत को कोह-पैमा बनना पड़ता है।

रास्ते की मुश्किलों और मौसमों का मुक़ाबला करना पड़ता है।

मर्द एक क़िला है और औरत को एक माहिर जनरल की तरह उस क़िले को फ़तह करना पड़ता है। क़िले सिर्फ़ घेराबंदी करने से फ़तह नहीं होते। जंग करने के लिए सब्र और तहम्मुल की ज़रूरत होती है।

और उसे मर्द की खातिर जज़्बात और अक़्ल की बेशुमार जंगें लड़नी पड़ती हैं।

कभी औरत क़ैद होती है।
कभी शहीद होती है।
कभी ग़ाज़ी बनती है।

तब कहीं जाकर वह उस क़िले की मालिक बनती है।

मर्द एक सल्तनत है, एक राजधानी है। बिना क़ुर्बानी दिए कोई औरत उस तख़्त-ओ-ताज की वारिस नहीं बन सकती। उस मर्द पर हुकूमत करने के लिए औरत को सियासत, मसलहत, फ़िरासत, ख़िदमत और मोहब्बत की फ़ौजें लेकर मैदान में उतरना पड़ता है। जहाँ कहीं ग़लत मंसूबाबंदी की, वहीं ज़िंदगी की शिकस्त मुक़द्दर बन जाती है।

मर्द चाहता है कि उसे बाक़ायदा फ़तह किया जाए, तस्ख़ीर किया जाए। उसके लिए आग के दरिया पार किए जाएँ। उसके लिए जिया जाए। उसके लिए मरा जाए।

सिर्फ़ निकाह के दो बोलों के बदले वह अपना आप किसी औरत के हवाले नहीं करता।

और अब फलकी आफ़ाक को तस्ख़ीर करना चाहती थी। कशमकश का दौर गुज़र गया था…

अना और पंदार के बुत टूट गए थे।

झूठी आन-बान और जवानी की अकड़ को रुख़्सत हो गई थी। बेअक्ली और बेहूदगी के दिन बहुत पीछे रह गए थे। फलकी के ज़ेहन के सारे गोशे रोशन हो चुके थे। वह एकदम सयानी हो गई थी।

उसे हुस्न की चौखट पर इश्क़ की लब्बैक नहीं चाहिए थी। वह आफ़ाक की ज़रूरत बन जाना चाहती थी।

ऐसी ज़रूरत, जिसके बिना ज़िंदगी गुज़र ही न सके।

कोई सिगरेट पीता है। कोई पान खाता है। किसी को शराब की लत लग जाती है। किसी के दिन की शुरुआत अख़बार के बिना नहीं होती।

कितनी बेकार-सी लतें हैं… जिन्हें इंसान ने अपनी कमज़ोरियाँ बना रखा है।

कहते हैं, आदत दूसरी फ़ितरत बन जाती है।

फलकी आफ़ाक की दूसरी फ़ितरत बन जाना चाहती थी और वह जानती थी कि—

“इसमें पड़ती है मेहनत ज़्यादा।”

मेहनत से वह घबराती नहीं थी, बल्कि उसने कमर-ए-हिम्मत बाँध ली थी… और ऐसा लग रहा था… जैसे आज ही उसने एक लंबे सफ़र का इरादा कर लिया हो।

आहिस्ता-आहिस्ता उसने सारा नाश्ता खत्म किया। फिर भी जैसे उसके दिल में खलबली मची हुई थी। मुमकिन है आफ़ाक दोपहर के खाने पर आ जाए।

और… और वह उसका रवैया देख सके।

नाश्ते के बाद फलकी ने सोचा, वह नहा-धोकर कपड़े बदले। ज़रा आज ढंग से अपना आप सँवारे।

 

लगातार बजती हुई फोन की घंटी ने फलकी को जगा दिया। दोपहर को जब नहा-धोकर वह तरोताज़ा हुई तो गीले बालों के साथ बिस्तर पर लेट गई थी। जाने कब नींद आ गई… अब जब नींद खुली तो दौड़कर लॉन्ज में गई। फोन की घंटी लगातार बज रही थी और कोई नौकर आसपास नहीं था।

“हैलो!”

उसने नींद में डूबी हुई आवाज़ में कहा तो आफ़ाक बोला, “फलकी, क्या बात है? क्या आपकी तबीयत खराब है?”

“नहीं तो…”

“फिर आपकी आवाज़ भारी क्यों है?”

“मैं सो रही थी।”

“क्या सुबह से अब तक?”

“जी नहीं।” यह कहकर फलकी हँस दी। “दोपहर के खाने पर आपका इंतज़ार करती रही। आप नहीं आए तो फिर सो गई।”

 

“मुझे अफ़सोस है। मैं आज दोपहर खाने पर नहीं आ सका। अब आपको इसकी खबर दे रहा हूँ।”

फलकी ने कलाई की घड़ी में समय देखा। शाम के पाँच बज रहे थे… दो बजे तक आफ़ाक नहीं आया तो उसे तरह-तरह के वसवसों ने सताया था।

“आज हमारा एक बिज़नेस लंच भी था। सुबह जब मैं आया तो आप सो रही थीं, इसलिए आपको जगा नहीं सका… और अब अपनी सेल से फ़ारिग होकर भी आया हूँ। सोचा, आपको बता दूँ।”

“कोई बात नहीं।” फलकी ने आहिस्ता से कहा। “मुझे मालूम नहीं था, इसलिए मैं देर तक आपका इंतज़ार करती रही।”

“आपने खाना खा लिया?”

“जी नहीं।”

“क्यों?”

“जी… वह… एक बात तो यह है कि मैंने नाश्ता ही एक बजे किया था। फिर सोचा, जब आप आएँगे तो खाना खा लूँगी… और… फिर सो गई।”

“अब भी आपको मेरा इंतज़ार है या नहीं?”

“इंतज़ार तो आख़िरी साँस तक रहता है। आप जानते हैं।”

“और किसी के आ जाने से यह खूबसूरत कैफ़ियत खत्म हो जाती है… है ना?”

“नहीं।” फलकी हँस पड़ी।

“कभी-कभी कोई पास भी बैठा हो तो यूँ लगता है… उसका इंतज़ार है। कौन-सी कैफ़ियत अच्छी लगती है आपको?”

 

“वही, जिसमें हमेशा के लिए इंतज़ार हो।”

“यानी कोई पास भी हो और दूर भी हो?”

फलकी कुछ देर के लिए खामोश हो गई। उसका रोम-रोम जाग उठा। दिल बोलने लगा, मगर ज़बान गूँगी हो गई।

“कोई दूर ही कब होता है…”

यह कहकर फलकी ने जल्दी से फोन रख दिया।

जो कुछ उसने कह दिया था, उसका असर जानना नहीं चाहती थी। उसे अपने आप से ही डर लग रहा था।

रिसीवर रखकर वह गुमसुम खड़ी रही।

“यह मैंने क्या कह दिया? आफ़ाक सोचेगा कि मैंने भी मॉडर्न लड़कियों की तरह फ़िल्मी अंदाज़ अपना लिया है।”

उसी समय घंटी दोबारा बजी।

उसने आहिस्ता से रिसीवर उठा लिया।

“फलकी, मैंने आपको यह बताना था कि आज रात की फ़्लाइट से इसहाक आ रहा है।”

“इसहाक… यानी आपका भाई?”

“हाँ, हाँ।” आफ़ाक ने कहा। “आज ही उसकी फ़्लाइट है। क्या आप उसे लेने एयरपोर्ट जा सकेंगी?”

“मैं तो उसे पहचानती भी नहीं।”

“वह आपको पहचान लेगा।”

“मगर मैं कैसे जाऊँगी?”

“ड्राइवर के साथ।”

“कितने बजे जहाज़ आएगा?”

 

“रात साढ़े नौ बजे।”

“नहीं।” वह एकदम बोल पड़ी, “आप खुद ही ले आइए। मैं घर पर रहूँगी और खाने का बंदोबस्त करूँगी।”

“मैं आ जाऊँ आपको लेने?”

“जी नहीं। मेरा घर पर रहना ज़रूरी है। उसके लिए घर ठीक करना होगा। आप खुद ही जाकर ले आइए।”

“अच्छा…” आफ़ाक कुछ सोचते हुए बोला, “मैं तो सात बजे दफ़्तर से निकलूँगा, फिर एयरपोर्ट चला जाऊँगा। हमें ज़रा आने में देर हो जाएगी, लेकिन हम खाना घर पर ही खाएँगे।”

“जी, बहुत अच्छा। ख़ुदा हाफ़िज़।”

आफ़ाक ने फोन बंद कर दिया।

फलकी ने अब्दुल करीम को आवाज़ दी… लेकिन फिर खुद ही रसोई की तरफ़ चल पड़ी।

साढ़े दस बजे के करीब आफ़ाक की गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई। फलकी ने टीवी बंद कर दिया और खड़ी हो गई।

आज वह ख़ास तौर पर तैयार हुई थी। गुलाब के बेहद प्यारे फूलों वाला गुलाबी सूट उसने पहना था। उसके बाल काफ़ी लंबे हो गए थे। उसने उनकी एक ढीली-सी चोटी बना ली थी। एक चोटी में वह बहुत कमसिन और मासूम दिखाई देती थी। हल्का-सा मेकअप किया, प्यारी-सी खुशबू लगाई। आँखों में थोड़ा-सा काजल भी लगा लिया।

यह सारा इंतज़ाम उसने इसलिए किया था कि इसहाक उनके घरेलू हालात बिल्कुल..नहीं जाता था और वह नहीं चाहती थी कि उसकी सादगी से कोई गलत तरह का अंदाज़ा लगाए। एंट्रेंस का दरवाज़ा खोलकर वह पोर्च में आई तो दोनों कार से उतर चुके थे और चलते हुए उसी की तरफ़ आ रहे थे।

उन दोनों के कद बराबर थे, लेकिन शक्ल-सूरत में स्पष्ट फ़र्क था।

इसहाक इकहरे बदन का दुबला-पतला, लंबा-सा लड़का था। चेहरा भी आफ़ाक से ज़्यादा गोरा था। शायद अमेरिका में रहने का असर था। मगर सिर के बाल लंबे-लंबे, कानों तक लटकती हुई कलमें… बड़ी-बड़ी मूँछें। वही अमेरिका-पलट लड़कों वाला हुलिया था।

शोख रंगों की धारीदार शर्ट पर उसने गले में एक लॉकेट पहना हुआ था। नीले खद्दर की उभरती हुई सलवटों वाली पैंट थी, जिसके घुटनों और जेबों पर चमड़े के टुकड़े लगे हुए थे।

इस तरह के लड़के उसने पाकिस्तान में भी देखे थे… बल्कि उसके अपने दोस्तों के दायरे में भी थे। आफ़ाक के साथ उसे देखकर फलकी को आधुनिक और पुराने ज़माने का मतलब समझ में आ गया।

हालाँकि आफ़ाक और इसहाक में सिर्फ़ पाँच साल का फ़र्क था। यह उसे एक दिन आफ़ाक ने बताया था। लेकिन हुलिए से दोनों में पूरी एक पीढ़ी का अंतर लगता था।

आफ़ाक उसके सामने बहुत गंभीर और संतुलित लग रहा था। रंगत भी इसहाक के मुकाबले में कुछ साँवली थी। मगर वह फिर भी फलकी को अच्छा लग रहा था।

हालाँकि कुछ समय पहले तक वह इसहाक जैसे चटकीले हुलिए वाले लड़कों को पसंद करती थी।

मगर अब…

संजीदा, गंभीर, गरिमापूर्ण और आफ़ाक की तरह सादगी से रहने वाले लोग ही उसके आदर्श बन चुके थे।

 

शरारत से उसने एक ज़ोरदार सलाम ठोंक दिया। इसहाक उसे देखकर फ़ौरन आगे बढ़ा… और फिर दोनों एड़ियाँ जोड़कर बाकायदा सलामी दी। फलकी हँसने लगी।

“भई, सलाम का जवाब तो दें।”

इसहाक ने झुककर कहा, “मेरे सिर पर हाथ फेरें, कमर सहलाएँ, पोतों-नवासों की दुआ दें… कैसी भाभी हैं आप?”

फलकी ने सिर झुका लिया और हँसने लगी। वह हँसते-हँसते और शर्म से दोहरी हुई जाती थी।

आफ़ाक ने दरवाज़ा खोल दिया और सब अंदर चले गए। नौकर ने इसहाक का सामान उठाया और उसके कमरे में ले गया।

“आप पहले चाय पिएँगे या खाना?”

“भई, पहले खाना लगवा दो। दोपहर में भी मैं ठीक से खाना नहीं खा सका था।” आफ़ाक ने कहा। “अब होटलों की दावतें खाई नहीं जातीं। तुमने घर पर खाने की आदत डाल दी है। खाने के बाद कॉफ़ी पिएँगे।”

फलकी का दिल धड़क उठा। वह रसोई की तरफ़ चल दी।

आज उसने फिर खाने पर खूब इंतज़ाम किया था। इसहाक उसका देवर था और पहली बार उसके घर आया था… फिर यहाँ के सारे हालात वह अपनी माँ को जाकर बताएगा। फलकी नहीं चाहती थी कि किसी बात में कोई कमी रह जाए।

जब सब खाने की मेज़ पर बैठ गए, तो इसहाक ने कटलेट की प्लेट उठाकर काँटे से एक कटलेट अपनी प्लेट में डाला और कहा—

.“भैया! तुम हर रोज़ इसी तरह के इंतज़ाम से खाना खाते हो?”

“क्यों?” आफ़ाक ने निवाला मुँह में रखते हुए कहा।

“भई, भाई! तुम्हें भाभी ऐसे उम्दा-उम्दा खाने हर रोज़ खिलाती हैं?”

आफ़ाक कुछ नहीं बोला।

“तभी मैं कहूँ… आप घर में क्यों लगन हो गए हैं। हर तीसरे महीने अमेरिका का चक्कर लगाया करते थे और इतनी-इतनी फ़रमाइशें करके चीज़ें पकवाते थे।”

आफ़ाक मुस्कुराता रहा। कुछ नहीं बोला।

फलकी भी होंठों ही होंठों में मुस्कुराती रही।

“भैया, यह तो बिल्कुल भाभी नहीं लगतीं।” उसने फलकी की तरफ़ देखते हुए कहा। “बिल्कुल छोटी-मोटी-सी कली हैं। इतनी शर्मीली लड़की को मैं भाभी नहीं कह सकता। मैं तो ‘फल्क’ ही कहूँगा।”

फलकी एकदम अंदर से काँप गई।

‘फल्क’ तो उसे आफ़ाक कहता था…

अब तक सारी दुनिया ने उसे फलकी कहा था, लेकिन आफ़ाक ने उसे ‘फल्क’ कहकर एक नया अंदाज़ अपना रखा था। उसमें थोड़ी बेगानगी और रूखाई थी… मगर यह उसके आफ़ाक का अंदाज़ था।

जब वह ‘फल्क’ कहकर बुलाता तो फलकी का रोम-रोम झंकृत हो जाता। कितनी अलग… कितनी अनोखी थी यह आवाज़! इस नाम से उसे कोई और क्यों बुलाए?

वह जल्दी से बोली—

“नहीं, नहीं इसहाक! तुम मुझे भाभी कहकर बुलाओगे, क्योंकि मुझे शौक है कि कोई मुझे भाभी कहे।”

उसने जान-बूझकर ‘तुम’ कहा, ताकि रिश्ते की बड़ाई ज़ाहिर कर सके।

“अच्छा जी! भैया के सब दोस्त आपको भाभी ही कहते होंगे?”

“तुममें और उनमें फ़र्क है। तुम मेरे असली देवर हो। और फिर मेरा तो कोई…”“भाई ही नहीं है।”

“अच्छा, अभी फ़ैसला कर लें। मुझे भाई बनाना है या देवर?”

“देवर।” फलकी ने बेझिझक कहा।

“ज़रा रोशनी डालें। मेरा ख़याल है भाई का रिश्ता ज़्यादा क़ीमती होता है।”

“यह भाई बनकर तुम इस घर में सिर झुकाकर चलोगे… और देवर बनकर अपनी हर बात मनवाओगे।”

“वाह-वाह… वाह-वाह! भाभी, कमाल की बात कह दी। भैया, ज़रा दाद तो देना… लोग कहते हैं औरतें ख़ुदगर्ज़ होती हैं। हमेशा अपनी ज़ात के बारे में सोचती हैं।”

आफ़ाक ख़ामोशी से खाना खाता रहा।

थोड़ी देर ख़ामोशी रही।

फिर इसहाक बोला—

“मैं तो समझा था कि यह बेज़बान हैं। इनकी ज़बान ही नहीं है या फिर बोलना नहीं जानतीं।”

“ज़बान तो इनकी बहुत लंबी थी। मैंने ही दाग़ दी।”

आफ़ाक पहली बार बोला।

फलकी को उसका यह जुमला बुरा नहीं लगा। बल्कि उसने मुस्कुराकर आफ़ाक की तरफ़ देखा… फिर पानी का घूँट भरा और बोली—

“आपके साथ रहने से मेरी ज़बान ज़्यादा शाइस्ता हो गई है।”

“अच्छा… तो आप लोग आपस में डायलॉग भी बोलते हैं…” इसहाक ने मुस्कुराकर कहा। “यह मिठाई किसने बनाई है?”

 

फलकी मुस्कुराई।

“शायद मैंने…”

“मेरे हाथ के इतने लज़ीज़ शाही टुकड़े हैं… और फिर ज़ाफ़रान की खुशबू… किसे दाद दूँ?”

“मेरे उस्ताद को…”

फलकी ने हँसकर आफ़ाक की तरफ़ देखा।

“भाभी, आपका उस्ताद कौन हो सकता है… आप तो उस्तादों की उस्ताद मालूम होती हैं।”

फलकी खड़ी हो गई।

“मैं ज़रा कॉफ़ी के लिए कह आऊँ।”

फिर ड्रॉइंग रूम में बैठकर उन लोगों ने कॉफ़ी पी। थोड़ी देर तक गपशप होती रही। फिर वे ख़ालिस कारोबारी बातचीत करने लगे।

बारह बजे तक फलकी वहाँ बैठी जम्हाइयाँ लेती रही। फिर माफ़ी माँगकर उठकर आ गई।

जाने वे कितनी देर तक बैठे बातें करते रहे थे, क्योंकि एक बार जब फलकी की आँख खुली तो आफ़ाक अपने बिस्तर पर नहीं था और उनके कमरे से बातों की आवाज़ लगातार आ रही थी।

अगला एक हफ़्ता कुछ ऐसी ही व्यस्तताओं में गुज़रा। इसहाक के आ जाने से आफ़ाक बहुत व्यस्त हो गया था। सुबह को इसहाक उसके साथ ही दफ़्तर चला जाता। दोपहर का खाना वे लोग दफ़्तर में मँगवा लेते।

रात का खाना घर पर खाते… और खाने के बाद वही बातें, वही फ़ाइलें, वही चर्चाएँ और बहस-मुबाहिसे…न वह फलकी को इन बातों में शामिल करते, न उसे अपनी अहमियत का एहसास कराते। वह एक बोझिल दिल लिए अपने कमरे में चली जाती।

न जाने रात के कौन-से पहर आफ़ाक सोता और फिर सुबह-सुबह उठकर चला जाता।

फलकी एक अजीब-सी बेचैनी में मुब्तिला हो गई थी।

उस रात के बाद, जब उसने आफ़ाक पर अपनी ज़िंदगी के सारे राज़ खोल दिए थे, आफ़ाक का रवैया कुछ अस्पष्ट-सा हो गया था। शायद इसहाक के आ जाने की वजह से ऐसा हुआ था।

काश, इसहाक एक हफ़्ते बाद आता। वह अपने दिल में सोचती—भला यह क्यों आ गया!

इसहाक के आ जाने से आफ़ाक बहुत व्यस्त हो गया था। चौबीसों घंटे दोनों भाई साथ रहते।

फलकी आफ़ाक से बात करने को तरस गई थी।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आफ़ाक की बेरुख़ी सिर्फ़ कारोबारी व्यस्तता है या… वह मानसिक रूप से उससे कुछ और ही दूर हो गया है।

यही सोचते-सोचते वह घर में इधर-उधर घूमती रहती। दिल चाहता, फ़ौरन फोन करके आफ़ाक का हाल मालूम करे… उससे खुलकर बातें करे…

क्या करे…?

यूँ ही उधेड़बुन में बैठी थी कि आफ़ाक की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया। वह उछल पड़ी।

“आफ़ाक और इस वक्त?”

उसने कलाई पर नज़र डाली। उस समय दिन के ग्यारह बज रहे थे। आफ़ाक तो खाने के वक्त आया करता था। आज इतनी जल्दी कैसे आ गया?

दिल में अजीब-ओ-ग़रीब ख़याल सिर उठाने लगे।

अभी वह सोच ही रही थी कि वह अंदर आ गया।

 

उसके हाथ में कपड़ों का बंडल था।

फलकी उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में चली आई।

“फल्क! यह मैं ड्राई क्लीनर्स से ले आया हूँ। अगर तकलीफ़ न हो तो मेरा सामान पैक कर दें।”

“जी…” फलकी हैरान खड़ी उसका मुँह देखती रह गई।

वह आगे बढ़कर ड्रेसिंग रूम में गया। वहाँ से अपना एक हवाई बैग उठा लाया। उसे मेज़ पर रखकर खोला… फिर मुड़कर हैरान फलकी की तरफ़ देखा और बोला—

“मैंने कहा था… आप ज़रा मेरा सामान पैक कर दें। क्या यह इतनी अचरज की बात है?”

फलकी चौंक गई।

आगे बढ़कर बैग के पास आई और बोली—

“आप मुझे बता दें… क्या-क्या पैक करना है?”

आफ़ाक ने वार्डरोब से अपने कपड़े और दूसरी चीज़ें निकाल-निकालकर पलंग पर रखना शुरू कर दिया।

“मगर… आप… कहाँ जा रहे हैं?”

“मैं ज़रा अमेरिका जा रहा हूँ।”

“ज़रा…”

फलकी गिरते-गिरते बची।

आफ़ाक ने उसकी तरफ़ नहीं देखा, बोलता गया—

“मैंने इसहाक को इसी लिए बुलाया था। मुझे एक ज़रूरी काम से अमेरिका जाना है। वहाँ के दफ़्तर को भी देखना है। मेरी गैर-मौजूदगी में इसहाक यहाँ दफ़्तर का काम सँभालेगा। मैंने उसे सब समझा दिया है।”

फलकी का दिल जैसे बुझने लगा…

आफ़ाक ने उसे इस क़ाबिल भी नहीं समझा कि पहले से…“…अपना प्रोग्राम बताता।”

“आप कितने अरसे के लिए जा रहे हैं?”

“यही कोई पाँच-छह महीने के लिए।”

पाँच-छह महीने… फलकी का दिल जैसे रोने लगा। पाँच-छह महीने में तो कोई जान से गुज़र जाए।

“कब जा रहे हैं?”

“आज रात… नौ बजे जहाज़ रवाना होता है। मैं घर से आठ बजे चला जाऊँगा। आठ बजे आप खाना खिला देंगी?”

“ज़रूर…” फलकी ने बुझी हुई आवाज़ में कहा।

“अच्छा… अब मैं चलता हूँ। अभी दफ़्तर में कुछ ज़रूरी काम निपटाने हैं।”

आफ़ाक उसकी ज़र्द पड़ती रंगत की परवाह किए बिना बाहर चला गया।

तक़दीर की गर्दिश क्या कम थी। फलकी ने सारा सामान पैक कर लिया। उसकी ज़रूरत की एक-एक चीज़ रख दी… और फिर सोफ़े पर जाकर बैठ गई।

शायद रेडियो पर पुराने गीत बज रहे थे—

“तक़दीर की गर्दिश क्या कम थी,
इस पर ये क़यामत कर बैठे।
बेताबी-ए-दिल जब हद से बढ़ी,
घबराकर मोहब्बत कर बैठे।”

मोहब्बत करने को किसने कहा था?

क्या मोहब्बत के बिना ज़िंदगी नहीं गुज़र सकती थी?

फलकी की आँखों में आँसू आते-जाते रहे। वह इस हमदम के बिना इस घर में कैसे रहेगी? और फिर जाने कब आएगा…?

“आएगा भी या नहीं…?”

उसे फलकी की क्या परवाह है… और वह किसी के लिए जल्दी आएगा?

काश, वह फलकी को भी साथ ले जाता… काश…!

रात का खाना उन्होंने जल्दी खा लिया। फलकी की आँखों में आँसू आते-जाते रहे। वह अपने कमरे में चली गई। आफ़ाक ने अपना सामान कार में रखवा दिया और उसके कमरे में चला आया।

फलकी ने जल्दी से पूछा—

“आप किसी काम से जा रहे हैं?”

“ओह…” वह हँसकर बोला, “मैंने आपसे कहा था ना… शायद मुझे आपका ख़त पढ़ने के लिए अमेरिका जाना पड़े।”

फलकी ने अपनी नम आँखों से उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ सिल गए… उसने चाहा कि वह कुछ कहे… मगर उसके दिल ने साथ नहीं दिया।

काश, वह कह सकती कि बनावट की भी एक हद होती है।

“आप मुझे छोड़ने एयरपोर्ट जाएँगी? क्या मुझे ख़ुदा हाफ़िज़ नहीं कहेंगी? क्या आप मेरे जाने का मंज़र नहीं देख सकेंगी?”

“अगर आप चाहते हैं तो चली जाऊँगी।” उसने बुझी हुई आवाज़ में कहा।

“वैसे आपका दिल नहीं चाहता…”

“मेरा दिल क्या चाहता है… काश, आपने पूछा होता।”

उसके होंठ हिले ही थे कि आफ़ाक बोला—

“अच्छा, जल्दी चलो। देर न हो जाए।”

यह कहकर आफ़ाक बाहर चला गया।

अपने आँसू पोंछती हुई फलकी बाहर आई। इसहाक ड्राइविंग सीट पर बैठ चुका था।

 

इसलिए फलकी को पीछे बैठना पड़ा। उसने देखा, दूसरी तरफ़ से दरवाज़ा खोलकर आफ़ाक भी पिछली सीट पर ही बैठ गया है।

बिल्कुल उसके करीब आफ़ाक की ख़ुशबू ने उसके दिल में एक नई कहानी शुरू कर दी।

उसका दिल चाहा… वह उस ख़ुशबू से लिपट-लिपटकर रोए। आफ़ाक के घुटने पर अपना सिर रख दे और कहे—

“आफ़ाक, अभी न जाओ… न जाओ… इतनी दूर न जाओ। अभी तो मैंने कुछ कहा ही नहीं… अभी तो इन क़दमों को छुआ भी नहीं। मोहब्बत का पहला सज्दा भी नहीं किया और तुम जा रहे हो… जाने कब आओगे?

जाने मैं इतना लंबा इंतज़ार कर भी सकूँगी या नहीं। तुम्हारे सितम के बिना… क्या वह भी सह सकूँगी या नहीं।

इस तन्हा घर में मुझे तुम्हारी जफ़ाएँ याद आएँगी… तुम्हारी बेरुख़ी आठ-आठ आँसू रुलाएगी… तुम्हारी सरज़निशें कचोटेंगी।

न जाओ… यूँ छोड़कर न जाओ।”

जाने कब आँसू का एक क़तरा उसके रुख़सार पर ढलक आया। अँधेरे का फ़ायदा उठाकर फलकी ने जल्दी से वह आँसू अपनी हथेली में छिपा लिया।

वे दोनों ख़ालिस कारोबारी बातचीत कर रहे थे—

“यह करना… वह न करना।”

“फलाँ फ़र्म को ख़त लिखवा दिया।”

“फलाँ ऑर्डर को रुकवा दिया।”

“वहाँ से बिल वसूल कर लिया।”

 

इस तरह पेमेंट करवाना वगैरह-वगैरह। अचानक इसहाक बोला—

“भाभी, यह तो बड़ी उदास लग रही हैं।”

“क्यों, फल्क?” आफ़ाक ने झुककर उसका चेहरा देखा।

“मुझे तो ऐसे लग रहा है जैसे अभी रो पड़ेंगी… क्यों भाभी?”

इसहाक ने शीशे में नज़र उस पर जमा दी। फलकी थर-थर काँपने लगी।

“अरे, इस मौके के लिए बहुत से गीत गाए गए हैं। अगर ज़बान से कुछ कहना मुश्किल है तो गाकर भैया के सामने अपने जज़्बात का इज़हार कर दें… वह क्या गाना है भैया?”

इसहाक गुनगुनाता हुआ बोला—

“तू जहाँ कहीं भी जाए, मेरा प्यार याद रखना…”

फलकी को हँसी आ गई। आफ़ाक भी हँस पड़ा।

“फल्क बहुत बहादुर लड़की है।” आफ़ाक ने जाने किस लहजे में कहा। फलकी को समझ नहीं आई।

“आपकी मम्मी कब आ रही हैं, फल्क?” आफ़ाक ने पूछा।

“दो महीने के बाद।”

“मैं भी उनसे मिलूँगा वहाँ।” आफ़ाक ने फिर कहा।

“कोई पैग़ाम देना हो तो बताएँ?”

“आप जो मुनासिब समझें, कह दें।”

“यानी कह दूँ कि आपकी बेटी के पास आपके लिए कोई पैग़ाम नहीं था?”

“अगर यह आपको मुनासिब लगता है तो यही कह दें।”

 

“तो वह मुझे बुरा-भला कहेंगी।”

“क्यों?”

“वह कहेंगी कि तुमने हमसे हमारी बेटी छीन ली है…” फिर वह कुछ कहते-कहते रुक गया।

फलकी का दिल चाहा, उसे कहे—और भी कहो, जो कहना चाहते हो कहो… मगर फिर ख़ामोशी छा गई।

“मैं आपके लिए वहाँ से क्या लाऊँ?”

“क्या कहूँ…?” फलकी सोच में पड़ गई। उसकी चाहत बेशकीमत थी… मगर फिर भी सबसे बेहतर थी।

“मम्मी ने बताया था, आपको चॉकलेट बहुत पसंद है।”

फलकी सोगवार-सी मुस्कुरा दी।

मम्मी तो अभी तक उसे बच्ची समझती ही थीं। मगर उसके इरादों का मालिक भी उसे कमसिन समझ रहा था।

एयरपोर्ट आ गया।

चारों तरफ़ रोशनियाँ ही रोशनियाँ बिखरी हुई थीं। मुसाफ़िर, सामान… अज़ीज़-ओ-अक़ारिब…

एयरपोर्ट भी उसे हश्र का मैदान लगा।

जैसे हर कोई अपने आमालनामा लिए खड़ा, अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा हो।

जाता है… चलता है…

वक़्त हुआ जाता है।

“जल्दी कर… जल्दी कर…”

यही ज़िंदगी है, उसने सोचा।

किसी को लाने की जल्दी… किसी को जाने की जल्दी…

 

“जल्दी…”

किसी के आने की खुशी… किसी के जाने का मलाल। कोई फूल पहन रहा है, कोई आँसू बहा रहा है। दुनिया एक गेंदनुमा-सी ही तो है, जिसे आने वाले लगातार पामाल किए जा रहे हैं।

आफ़ाक अपना सामान चेक-इन कराकर आ गया था। मुसाफ़िर अंदर जाना शुरू हो गए थे।

“आओ!”

उसने एकदम अपना टिकटों वाला हाथ खाली करके फलकी की तरफ़ बढ़ाया।

उस ख़ूबसूरत, सेहतमंद हाथ को फलकी इस तरह देखने लगी… जैसे उसने चाँद को बहुत करीब से देख लिया हो।

“यह हाथ मेरी अमानत है।”

“यह हाथ नहीं, मेरी है।”

“है…”

“इस गोश्त-पोस्त में मेरा दिल धड़कता है।”

उसने आहिस्ता से अपना ज़र्द और ठंडा हाथ आगे कर दिया।

आफ़ाक की पकड़ उसके हाथ पर मज़बूत हो गई… जैसे बचपन के खेलते-खेलते किसी ने गोली ढूँढ़ ली हो और उसके गिर जाने के डर से उसे मुट्ठी में छिपा लिया हो।

आफ़ाक का हाथ उसके हाथ पर जम चुका था। लम्हे जावेदाँ हो गए थे।

सारा एयरपोर्ट बक़ा-ए-नूर बन गया था।

और फिर… फलकी और आफ़ाक वहीं खड़े रह गए।

 

“मैं जल्दी आ जाऊँगा। घबराइएगा नहीं। इसहाक आपको अच्छी कंपनी देगा।”

आफ़ाक ने इसहाक की तरफ़ देखा।

“इसमें क्या शक है?” इसहाक ने शरारत से सिगरेट का धुआँ छोड़ा।

आफ़ाक ने हाथ छुड़ा लिया। फलकी का हाथ हवा में ही ठहरा रह गया।

थोड़ी देर पहले उसका हाथ कितना वज़नी था… और अब कितना हल्का और बेमोल लग रहा था।

“ख़ुदा हाफ़िज़!”

आफ़ाक मुड़ने लगा।

“भैया!”

इसहाक उसकी तरफ़ लपका।

“मेरे साथ आप इतनी बेईमानी कर गए हैं… हाथ क्यों नहीं मिलाया?”

आफ़ाक हँसा। “अब यह हाथ नहीं।”

उसने सीधे हाथ में टिकट पकड़ लिए और उल्टा हाथ इसहाक की तरफ़ बढ़ाया।

दोनों हाथ मिलाने लगे।

“यह बात है!” इसहाक एक आँख बंद करके हँसा। फिर आफ़ाक का हाथ थाम लिया।

आफ़ाक ने जाते-जाते फिर एक नज़र फलकी पर डाली।

वह नज़र इतनी गहरी थी कि फलकी बुत बन गई। जैसे उस पर सम्मोहन कर दिया गया हो।

“अच्छा… ख़ुदा हाफ़िज़!”

इसहाक उसका हवाई बैग पकड़े दरवाज़े तक गया।

“ख़ुदा हाफ़िज़…” फलकी ने धीमे से कहा, जिसे उसके अपने कानों ने भी नहीं सुना।

और फलकी खड़ी सोचती रही…

तेरे आने की तस्वीर, तेरे जाने का ख़याल…
एक तस्वीर मुस्तग़रक़, एक तस्वीर कमाल!

 

कई रातें और दिन बिस्तर के हो गए।

उसके दिन-रात हर तरह से बेकरारी में गुज़रते थे… शादी के बाद से यही कुछ हो रहा था। पहले उन दोनों में दूरियाँ थीं। फिर आफ़ाक पास रहते हुए भी दूर था… और अब…

अब वह ज़ालिम हज़ारों मील दूर बैठा हुआ भी क़रीब था… रग-ए-जाँ से भी क़रीब।

उसकी महक फलकी ने साँसों में बसा ली थी। उसकी तस्वीर अपने कमरे में रख ली थी। आँखें बंद करके तसव्वुर में उससे बेशुमार बातें करती थी।

गिले-शिकवे करती थी।

मगर उसे प्यार करने की हिम्मत तसव्वुर में भी न होती थी।

आफ़ाक को गए हुए आठ दिन हो गए थे। दफ़्तर में उसके ख़त आ गए थे… और इसहाक ने फलकी को उसकी ख़ैरियत से आगाह कर दिया था।

भला वह ख़त लिखने में वक़्त क्यों ज़ाया करता। फलकी को उसके ख़त का इंतज़ार था, मगर जब दफ़्तर में इत्तिला का अच्छा इंतज़ाम था तो…

 

दिन गुज़रने में न आते थे। रात कटे न कटती थी।

एक दिन फलकी अलसुबह टहलती हुई क्वार्टरों की तरफ़ निकल गई। एक औरत के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी।

बाहर चौकीदार बैठा मिस्वाक कर रहा था। फलकी को देखकर खड़ा हो गया।

“सलाम, साहिबा!” उसने सलाम किया।

“यह बच्चा क्यों रो रहा है, चौकीदार?” फलकी ने पूछा।

“बेगम साहिबा जी! यह हमारा बच्चा है।”

“मगर रोता क्यों है?”

“हर रोज़ रोता है।” चौकीदार ने हँसकर कहा।

“मगर क्यों? इसकी माँ क्यों चिल्ला रही है?”

“बेगम साहिबा जी! हमारा बीबी रोज़ सुबह इसको क़ुरआन पाक पढ़ाता है। मगर जब यह क़ायदा पढ़ता है तो मार भी खाता है… पर बेगम साहिबा! इसका ज़िद तो नहीं देखना। आगे जाकर अल्लाह को जवाब भी तो देना है?”

फलकी आगे बढ़ गई।

“तुम्हारी भी क़ुरआन शरीफ़ पढ़ी हुई है?”

“अल्लाह के फ़ज़्ल से…” पठान चौकीदार ने सीने पर हाथ रखकर कहा।

उसकी बीवी ने फलकी को देखा तो एकदम खड़ी हो गई और सलाम किया।

“बैठो, बैठो।” फलकी ने उसे पकड़कर बैठा दिया।

“जब कलाम-ए-पाक सामने रखा हो तो किसी के लिए नहीं खड़े होते, यह तो…”“दोनों जहानों का बादशाह है?”

यह कहकर फलकी खुद उसकी चारपाई पर बैठ गई।

एक चार-पाँच साल का साफ़-सुथरा बच्चा ज़ार-ज़ार रो रहा था और रुक-रुककर पढ़ रहा था—

“वَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ…”

फलकी ने सिर को दुपट्टे से ढक लिया और सुनती रही। बच्चे का रोना उसे बहुत प्यारा लग रहा था।

फिर उसकी माँ से बोली—

“तुम्हारा नाम क्या है?”

“जी, मेरा नाम गुलचेहरा है।”

“बड़ा अच्छा नाम है… गुलचेहरा! क्या तुम मुझे भी क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा दोगी?”

“जी, आपको…?” उसने इस तरह चौंककर पूछा जैसे कोई अनहोनी बात सुन ली हो।

“हाँ-हाँ, मुझे।”

“बेगम साहिबा! मज़ाक करती हैं। क्या हर मुसलमान का बच्चा कलाम-ए-पाक पढ़ा होता है?”

“नहीं गुलचेहरा! मैंने नहीं पढ़ा। अगर मेरी आया तुम्हारी तरह मुझे भी बचपन में मार-मारकर पढ़ाती तो मैं ज़रूर पढ़ लेती… लेकिन ख़ैर, अब भी वक़्त है। जब ख़याल आए, पढ़ लेना चाहिए। ठीक है ना?”

गुलचेहरा ने सिर झुका लिया।

“तो तुम मुझे पढ़ाओगी या नहीं?”

गुलचेहरा ने बेयक़ीनी से अपने शौहर की तरफ़ देखा।

<< Previous Part   Next Part  >>

falaknaaz lagan hindi lagan hindi novel part 11
umeemasumaiyyafuzail
  • Website

At NovelKiStories786.com, we believe that every story has a soul and every reader deserves a journey. We are a dedicated platform committed to bringing you the finest collection of novels, short stories, and literary gems from diverse genres.

Keep Reading

Lagan (Hindi Novel) Part 12

Lagan (Hindi Novel) Part 10

Lagan (Hindi novel) Part 9

Lagan (Hindi Novel) Part 8

Lagan (Hindi Novel) Part 7

Lagan ( Hindi Novel ) Part 6

Add A Comment
Leave A Reply Cancel Reply

Follow us
  • Facebook
  • Twitter
  • Instagram
  • YouTube
  • Telegram
  • WhatsApp
Recent Posts
  • Lagan (Hindi Novel) Part 12 August 28, 2026
  • Lagan ( Hindi Novel ) Part 11 August 24, 2026
  • Lagan (Hindi Novel) Part 10 August 20, 2026
  • Lagan (Hindi novel) Part 9 August 18, 2026
  • Lagan (Hindi Novel) Part 8 August 6, 2026
Archives
  • August 2026
  • June 2026
  • May 2026
  • April 2026
  • March 2026
  • February 2026
  • January 2026
  • February 2024
  • January 2024
  • November 2023
  • October 2023
  • September 2023
  • March 2022
  • February 2022
  • January 2022
  • December 2021
Recent Comments
  • ExoWatts on LAGAN NOVEL IN HINDI (PART 1)
  • Novelkistories...... on fatah kabul (islami tarikhi novel)part 3 gam ke badal
  • Novelkistories...... on fatah kabul (islami tarikhi novel)part 29
  • Novelkistories...... on fatah kabul (islami tarikhi novel)part 29
Recent Posts
  • Lagan (Hindi Novel) Part 12
  • Lagan ( Hindi Novel ) Part 11
  • Lagan (Hindi Novel) Part 10
  • Lagan (Hindi novel) Part 9
  • Lagan (Hindi Novel) Part 8
Recent Comments
  • ExoWatts on LAGAN NOVEL IN HINDI (PART 1)
  • Novelkistories...... on fatah kabul (islami tarikhi novel)part 3 gam ke badal
  • Novelkistories...... on fatah kabul (islami tarikhi novel)part 29
  • Novelkistories...... on fatah kabul (islami tarikhi novel)part 29

Subscribe to Updates

Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest
© 2026 Novelkistories786. Designed by Skill Forever.

Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.