Lagan Part 11,
फलकी की आँख खुली तो उसने चारों तरफ़ देखा और बड़बड़ाते हुए उठ बैठी।
दोपहर का समय था। धूप घर के आँगन को पार कर चुकी थी। दिन भी हमेशा की तरह व्यस्त दिखाई दे रहा था… मगर वह अब तक सो रही थी। बल्कि अभी-अभी उठी थी।
वह जल्दी से उठकर बैठ गई। वह अपने कमरे की बजाय टीवी लॉन्ज में सो रही थी। वह लॉन्ज में कैसे पहुँच गई? क्या रात फिर कोई झगड़ा हुआ था?
वह इधर-उधर देखने लगी तो उसकी नज़र सिरहाने रखी जानमाज़ पर टिक गई, जिसे उसने खुद ही तह करके सिरहाने रख दिया था।
तब… उसे सब कुछ याद आ गया।
अली-सुबह उसने यहीं नमाज़ पढ़ी थी। शायद उसने ज़िंदगी में पहली बार नमाज़ पढ़ी थी।
या यूँ कहें कि पहली बार इस तरह पढ़ी थी—पूरे ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू के साथ, सिर से पाँव तक एक इल्तिज़ा बनकर, ख़ताकार बनकर, माफ़ी की तलबगार बनकर।
और उसे नमाज़ पढ़ने में एक अजीब-सा आनंद भी आया था। उसे ऐसा महसूस हुआ… जैसे वह चीज़ जो…बंदे जो नहीं दे सकते, वह अल्लाह के यहाँ मिल जाता है। उसके दिल को सुकून मिला था। उसकी रूह हल्की-फुल्की हो गई थी।
होस्टल में लड़कियों की देखा-देखी वह कभी-कभी नमाज़ पढ़ लिया करती थी। नमाज़ उसने क्लब के साथ वाली मस्जिद के मौलवी साहब से सीखी थी। मौलवी साहब आम तौर पर क्लब में आने वाली औरतों के बच्चों को वहीं क्लब के एक कमरे में नमाज़ सिखाने आया करते थे।
बच्चे उन्हें बहुत सताते थे, मगर मौलवी साहब ने जैसे अपने अंदर से गुस्से का हिस्सा ही निकाल दिया था। वह कभी किसी बदतमीज़ी या गुस्ताख़ी का बुरा नहीं मानते थे।
वह बच्चों को क़ुरआन भी पढ़ाते थे, मगर ज़्यादातर बच्चे पहले सिपारे से आगे नहीं बढ़ पाते थे। जैसे-जैसे उनकी दूसरी दिलचस्पियाँ बढ़तीं, वे मौलवी साहब को छोड़कर चले जाते। चूँकि मौलवी साहब को बेगमात की तरफ़ से नियमित मेहनताना मिलता था, इसलिए वह उनकी खुशनूदी का भी ख़याल रखते थे।
फलकी ने भी पहला सिपारा पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। उसे सिपारा पढ़ने से ज़्यादा राइडिंग (घुड़सवारी) पसंद थी।
कहाँ घोड़े की लगाम पकड़कर हवा से बातें करना… और कहाँ झूम-झूमकर सिपारा पढ़ना।
इसलिए साईस के आते ही वह उठकर भाग जाती थी।
फिर जब उसकी एक सहेली ने मम्मी से शिकायत की कि फलकी मौलवी साहब को देखते ही भाग जाती है, तो मम्मी इतराकर बोली थीं—
“कोई बात नहीं। अभी इसकी उम्र ही क्या है। क़ुरआन शरीफ़ पढ़ने के लिए बहुत वक्त पड़ा है। मेरी बेटी को अपना बचपन (Childhood) एंजॉय करने दो।”
उसके बाद तो फलकी ने कभी सिपारे को हाथ तक नहीं लगाया।
हाँ, लड़कियों की देखा-देखी हाथ उठाने, झुकने और उठ खड़े होने से उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ था कि नमाज़ क्या है और उसका मकसद क्या है। वह तो यही सोचती थी, “यह तो अच्छी-खासी एक एक्सरसाइज़ है।”
वह मन ही मन कहती, “इससे बेहतर है पी.टी. कर ली जाए… या किसी सी-सॉ (SEA-SAW) पर झूले ले लिए जाएँ।”
लेकिन आज जब उसने एक नए जज़्बे के साथ नमाज़ पढ़ी, तो वह जानमाज़ पर खड़ी थर-थर काँप रही थी। उसे महसूस हो रहा था जैसे अल्लाह मियाँ उसे देख रहे हैं। अल्लाह का ख़याल आते ही उसकी आँखें भर आईं।
वह सोचने लगी—आख़िर वह हमेशा मम्मी की गलतियों का बदला अल्लाह से क्यों लेती रही? अल्लाह तो मेहरबान है। वह हर किसी के लिए हर वक्त मौजूद है। फरियाद सुनता है, तसल्ली देता है। वह मम्मी जैसा नहीं है।
फिर उसने ख़ुदा से इतनी दूरी क्यों बना ली थी?
आफ़ाक का भला हो… आखिर उसी ने उसे फिर से ख़ुदा से मिला दिया।
नमाज़ पढ़कर वह बहुत रोई थी। उसने अल्लाह के सामने अपना दिल पूरी तरह खोलकर रख दिया था। उससे रोशनी माँगी थी… आख़िरी सहारा माँगा था… और कहा था—
“मुझे समझ नहीं आती… मुझे अपनी अक़्ल पर भरोसा नहीं रहा। अब तक मैंने गलतियाँ ही की हैं। अब मुझे सही रास्ता दिखा।”
और उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे अल्लाह ने उसे तसल्ली दे दी हो… उसके दिल को सुकून बख्श दिया हो… उसकी उलझनों का हल उसके सामने रख दिया हो।
यह आख़िरी सहारा था, जिसे उसने पूरी मजबूती से थाम लिया था।
उस वक़्त जब वह फूट-फूटकर रो रही थी और हाथ फैलाए बैठी थी, तो उसकी हथेलियों पर गिरते आँसू तस्बीह के दानों जैसे लग रहे थे।
उसी दौरान आफ़ाक के कमरे से क़ुरआन की तिलावत की दर्दभरी आवाज़ आ रही थी।
(“फिर तुम अपने रब की कौन-कौन-सी नेमतों को झुठलाओगे?”)
यह आवाज़ सुनकर वह ठिठक गई।
नूर के ज़र्द की क़ुरआन की तिलावत उसे इतनी असरअंगेज़ और खूबसूरत लगी कि पहली बार उसे एहसास हुआ कि दुनिया की किसी भी संगीत में ऐसा लचीलापन और ऐसा सोज़ नहीं है। वह आवाज़ नहीं थी… जैसे बादलों के नर्म-नर्म गाले हों, जो मोतियों और फूलों की शक्ल में दिल पर बरस रहे हों।
एकाएक उसके मन में ख़याल आया कि उसे भी क़ुरआन पढ़ना चाहिए। मगर वह पहले सिपारे से आगे बढ़ ही नहीं पाई थी… और शायद वह भी अब भूल चुकी होगी, क्योंकि उसने उसे कभी खोलकर देखा ही नहीं था।
अब उसे कौन पढ़ाएगा?
आफ़ाक से कहेगी…
नहीं… आफ़ाक से कहते हुए शर्म आएगी। वह कहेगा, “कैसी मुसलमान लड़की है, जिसे कलाम-ए-पाक पढ़ना भी नहीं आता।”
“वाक़ई शर्म की बात है…” उसने मन ही मन सोचा।
मगर अब आफ़ाक से कैसा पर्दा? जब वह अपनी ज़िंदगी का हर राज़ उसके सामने खोल चुकी थी, उसके सामने अपने गुनाहों का इक़रार कर चुकी थी…
तो फिर अपने नेक इरादे बताने में कैसी झिझक?
यही सोचते-सोचते वह शीशे के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने बाहर देखा…
भोर उसका इंतज़ार कर रही थी। सुबह फूट रही थी। शर्माते हुए अँधेरे का गिरेबान धीरे-धीरे चाक हो रहा था। देखते ही देखते सुबह पहले बैंगनी हुई, फिर किसी नवयौवना लड़की की तरह गुलाबी हो गई और आख़िर में दूधिया सफेद।
कुँवारी सुबह ने सूरज के आने से पहले उसी तरह रंग बदले थे, जैसे कोई अल्हड़ युवती पहली बार अपने महबूब का सामना करती है और हर अदा पर उसका चेहरा नए रंग में ढल जाता है।
फलकी को ज़िंदगी की यह सुबह भी बहुत खूबसूरत लगी।
बाहर का नज़ारा देखकर वह फिर सोफ़े पर आकर बैठ गई। आज उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसने नया जन्म लिया हो। वह पहले से कहीं ज़्यादा परिपक्व, हल्की और प्रसन्न लग रही थी। वह वहीं सोफ़े का सहारा लेकर लेट गई।
सारी रात वह सोई नहीं थी। बहुत रोने की वजह से उसकी आँखों में जलन हो रही थी। उसने अपनी जलती हुई आँखों पर ज़ोर से हथेलियाँ रख लीं और सोचने लगी।
“ख़ुदा का एहसास कितना खूबसूरत है… और वह माँ से भी ज़्यादा कोमल हो जाता है। ख़ुदा तो माँ से भी ज़्यादा खूबसूरत है।”
“इसलिए कि माँ और बच्चे के बीच कभी-कभी पर्दे आ जाते हैं, जबकि ख़ुदा और बंदे के बीच कोई पर्दा नहीं होता।”
माँ से अपने दिल का दर्द कहकर सुनाना पड़ता है।
ख़ुदा बिना कहे ही जान लेता है।
माँ कभी आँसुओं से बेपरवाह हो जाती है।
ख़ुदा आँसुओं की ज़बान समझता है।
माँ कभी बच्चे को मायूस कर देती है, जबकि ख़ुदा अपने बंदे को मायूस नहीं करता।
यही सब सोचते-सोचते न जाने कब उसे नींद आ गई, और अब उसकी आँख खुली थी।
उसने कलाई पर बँधी घड़ी देखी। दोपहर के बारह बज रहे थे।
“आफ़ाक तो दफ़्तर चला गया होगा… जाने किसने उसे नाश्ता कराया होगा।”
उसने अब्दुल करीम को आवाज़ दी। बाहर नौकरों के आने-जाने की आहटें सुनाई दे रही थीं।
अब्दुल करीम दौड़कर उसके पास आ गया।
“जी, सर…”
“साहब को नाश्ता करा दिया था?”
“जी, सर। मैं आपको जगाने आ रहा था। मैंने साहब से कहा था कि बेगम साहिबा का हुक्म है कि आपका नाश्ता उनके अलावा कोई और न बनाए। मगर उन्होंने हुक्म दिया कि बेगम साहिबा को मत जगाओ, उन्हें सोने दो। रात उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। जब तक वह खुद न जागें, कोई उन्हें न जगाए।”
फलकी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे आफ़ाक पर बेइंतहा प्यार आ गया। साथ ही उसकी आँखें भी नम हो गईं।
क्या यह नमी मोहब्बत की विरासत है?
क्या मोहब्बत का एहसास होते ही आँखें अपने-आप भीग जाती हैं?
“जी, सर… आपके लिए चाय लाऊँ?”
“हाँ, अब्दुल करीम… और मेरा नाश्ता भी बना लाओ।”
“बहुत अच्छा, सर।”
कंधे पर झाड़न रखे अब्दुल करीम रसोई की तरफ़ चला गया।
फलकी उठकर गुसलखाने में चली गई। उसने दाँत साफ़ किए, मुँह धोया और ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर अपने बाल सँवारने लगी। फिर वापस आकर लॉन्ज में बैठ गई।
कुछ देर बाद अब्दुल करीम ट्रॉली पर नाश्ता सजाकर ले आया।
फ्राई अंडों से गरम-गरम भाप उठ रही थी। मक्खन लगे टोस्ट की खुशबू उसकी भूख और बढ़ा रही थी।
उसने चम्मच उठाई और चायदानी से क़हवा अपनी प्याली में उड़ेलने लगी।

