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Home»Hindi Novel»Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel)

Fatah kabul ( Islami Tareekhi Novel) part 44

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailJanuary 12, 2024Updated:July 7, 2026 Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel) No Comments7 Mins Read
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बसत पर ग़लबा ….  

                                                              

 

दादर के फतह हो जाने से इस नवाह का तमाम इलाक़ा काँप उठा। लोग बस्तिया छोड़ कर छोड़ कर बसत और जाबुल की तरफ भागने लगे। बसत वालो को भी उन भगोड़ो की ज़बानी दादर की फतह और मुसलमानो की पेश क़दमी का हामिल मालूम हो गया।

बसत में एक छोटा सा क़िला था। वहा का क़िला दार जाबुल का मा  तहत था। उसके पास कुल पांच हज़ार फ़ौज थी उसने जाबुल के राजा को लिखा की मुसलमान बढे चले आ रहे है। फ़ौरन ज़्यादा से ज़्यादा मदद भेजे।

उधर उसने यह अकलमंदी की की जो लोग दिहात से भाग भाग कर आ रहे थे। उनमे जो जवान और लड़ने के क़ाबिल  थे उन्हें फ़ौज में भर्ती कर लिया। उससे इसकी ग्रुप बढ़ गया।

लेकिन यह वह लोग  जो मुसलमानो से डर कर भाग आये थे। उन पर मुसलमानो का दबदबा छाया हुआ था। वह पनाह लेने आये थे। यह फ़ौज में जबरिया भर्ती कर लिया। मजबूर हो कर वह हथियार बांध कर लड़ाई के लिए तैयार हो गए।

मुसलमानो की पेश क़दमी की खबरे उस ज़ोर  शोर से आरही थी की तमाम बसत वालो पर बद हवासी सी छ गयी थी। शहरी लोग वहा से जाबुल भागने की तैयारी करने लगे। क़िला के हाकिम ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने  दरख्वास्त की कि उनके अहले व अयाल को जाने की इजाज़त दे दी जाये। हाकिम को ख्याल हुआ की उससे भी लोगो में बददिली पैदा   हो जाएगी। लिहाज़ा उसकी भी उसने इजाज़त न दी।

पनाह गज़ीनों की आमद  सिलसिला जारी था। लोग बड़ी ही बे सर व समाली के साथ बीवी बच्चो को लिए भागे चले आरहे थे। और हर गिरोह जो आता था वह मुसलमानो के बारे में नई रिवायत ब्यान करता था। उन रिवायतों को सुन सुन कर  बसत वाले खौफ ज़दा हो रहे थे। अगर वह हिम्मत से काम लेते तो मुसलमानो का मुक़ाबला अच्छी तरह कर सकते थे  लेकिन उन पर ऐसी दहशत तारी हुई जैसे मुस्लमान नहीं जिन थे।

एक रोज़ एक गिरोह सख्त बदहवासी  भागा हुआ आया। उसने ब्यान किया की मुसलमानो की तादाद बे शुमार है। हम लोगो  ने छिप कर उन्हें देखा है।  उनकी सही तादाद का पता न लगा सके। वह यलगार किये बढे चले आरहे है। बसत का क़िला उनके सैलाब को न रोक सका।

इससे और भी बसत वाले घबरा गए। इस आखरी काफला की आमद के तीसरे दिन इस्लामी लश्कर का हरावल नमूदार  हुआ। इल्यास इस दस्ता के अफसर थे। बसत वालो ने उसे देखते ही क़िला के फाटक बंद कर लिए। सिपाही और अफसर  फ़सील पर पहुंच गए और शहर के लोगो पर घबराहट तारी हो गयी। माह पीकर औरतो और नाज़नीन  लड़कियों के चेहरे पीले हो गए। माओ ने अपने बच्चो को सीना से लगा लिया।

इल्यास के दस्ता ने क़िला के  क़रीब आकर अल्लाहु अकबर का नारा लगाया। बच्चे औरते और लड़किया सब उछल पड़ी। इल्यास के एक तरफ हो गए उनके फ़ौरन बाद दूसरा दस्ता नमूदार हुआ उसने भी नारा तकबीर बुलंद  किया। इस नारे के शोर से कुल की बुनयादे तक हिल गयी। यह दस्ता भी अलग हो गया। इसी तरफ एक दस्ता  के बाद दूसरा दस्ता आता और नारा तकबीर लगा कर उतरता रहा। दिन छिपे तक लश्कर की आमद जार रही।

रात को मुसमानो ने अपने कैंप में कसरत से आग रोशन की। बसत वाले क़िला के ऊपर से उन्हें देखते रहे। और उनकी चुस्ती  को देख कर हैरान रह गए।

अगले रोज़ सुबह की नमाज़ पढ़ते ही अमीर अब्दुर्रहमान ने हमला का हुक्म दे दिया। मुसलमान जल्द से जल्द मुसलाह (हथियार लेकर ) हो हो कर मैदान में निकलने लगे। जब उन्होंने सफ़हे क़ायम की तो बसत वालो ने उन्हें हौसला देने  के लिए जय कारे लगाने शुरू किये। इन  जय कारो से मुसलमानो में जोश आ गया। उन्होंने तेज़ी से बढ़ना शुरू  किया।

जब वह क़िला के क़रीब पहुंचे तो बसत वालो ने बड़ी फुर्ती से उन पर तीरो की बारिश की। मुसलमानो ने इस तरह ढाले आगे बढ़ा दी जिनसे घोड़ो के सरो और खुद उनकी हिफाज़त होगी। तीर उनकी ढालो पर उड़ कर पड़ने लगी। कुछ  तीर घोड़ो  के और  कुछ सवारों के भी लगे। लेकिन न घोड़ो ने परवाह की न सवारों ने। उनकी रफ़्तार में  फ़र्क़  आया। वह बराबर बढ़ते रहे।

बसत वालो ने देखा और हैरान रह गए। जब मुसलमान ज़्यादा क़रीब पहुँच गए तो उन्होंने पत्थर। जब यह भरी पत्थर  ढालो पर आकर पड़े तो खतरनाक आवाज़े पैदा करती। उनसे कुछ सवारों और घोड़ो के इस क़द्र चोटे आयी  की घोड़े और सवार दोनों गिर पड़े जो सवार गिर गए उन्हें घोड़ो ने कुचल डाला।

मगर अब भी शीरन इस्लाम की रफ्तार में फ़र्क़ नहीं आया।  और लगातार तेज़ी से बढ़ते रहे। यहाँ तक की फ़सील के निचे  जा पहुंचे उनमे से बहुत से सवारों ने कमंदि फेंकी जो कंगोरो में अटक गयी और जान बाज़ सवार उनके ज़रिये  से ऊपर चढ़ने लगे।

मुसलमानो के दस्ते एक के पीछे आरहे थे। फ़सील के काफिरो ने पत्थर बरसाने बंद कर दिए और ऊपर चढ़  कर झांकना  शुरू किया। जो दस्ते फ़सील से फासले  पर थे उन्होंने बड़ी फुर्ती से कमाने और जो काफिर झांक रहे थे उनके  सर व सीनो में तराज़ू हो गए। जिन लोगो के तीर लगे वह होलनाक चीखे मार कर फ़सील से निचे गिरे। उनमे से कुछ  तो उन मुसलमानो पर आ पड़े जो कमंदो के ज़रिये से ऊपर चढ़ रहे थे कई मुस्लमान उनके झटके से निचे गिर पड़े। कुछ ज़ख़्मी काफिर निचे मुसलमानो के घोड़े पर जा गिरे। घोड़े भड़क उठे। समझे कोई बला ऊपर से  गिरी।  मगर जब इंसानो को देखा तो उन्हें पैरो से कुचलने लगे।

तीरो की दो ही बाड़े चली थी की बसत वाले पीछे हट गए। इस अरसा में बहुत से मुस्लमान कंगोरो को पकड़ कर फ़सील  पर जा कूदे और वहा पहुंचते ही उन्होंने तलवारे सौंत कर निहायत जोश से हमला कर दिया। काफिरो ने उनके  हमले ढालो पर रोके लेकिन मुसलमानो की तलवारे ढालो को फाड़ डाला और ढालो वालो के भंडारे खोल  दिए।

दुश्मन यह कैफियत देख कर इस क़द्र ख़ौफ़ज़दा हुए की पीछे हट लार भागने और सीढ़ियों के ज़रिये से निचे उतरने लगे  .मुस्लमान उनके पीछे झपटे और उन्हें तलवारो की धार पर रख कर क़त्ल करने लगे।

चुकी फ़सील पर ज़हमत करने वाला कोई बाक़ी न रहा इसलिए मुस्लमान तेज़ी से कमंदो के ज़रिये से फ़सील  पर पहुंचे और वहा से ज़ीनो के रास्तो से क़िला के सेहन में उतरने लगे।

जो मुस्लमान क़िला में पहुंच जाते थे निहायत जोश से हमले करके दुश्मनो को क़त्ल करने लगते थे। काफिरो पर मुसलमानो का दबदबा छाया हुआ था ही वह मुक़ाबला  न करते मुस्लमान उन्हें खीरे ककड़ी की तरह काट डालते। थोड़ी ही देर में लाशो के ढेर लग गए। मुसलमानो का एक पड़ा दरवाज़ा की तरफ झपटा और जो काफिर उनके सामने  आते उन्हें मारता काटता फाटक तक पहुंच गया। फाटक के मुहाफिज़ीन उन्हें देखते ही भाग गए। दो मुसलमानो ने  बढ़ दरवाज़ा खोल दिए।

अमीर अब्दुर्रहमान और तमाम लश्कर के घोड़े दौड़ा कर क़िला में दाखिल हो गए। मुसलमानो ने दुश्मनो को घास फूंस  की तरह काटना शुरू कर दिया। बसत वाले सिपाही भाग रहे थे। और मुस्लमान उनके पीछे दौड़ कर उन्हें क़तल कर रहे थे। इस दार व गीर में क़िला का हाकिम आ गया एक मुजाहिद ने  उस ज़ोर से उसके तलवार मारी की उसका सर   उड़ गया।

यह देख कर काफिरो के हौसले कमज़ोर हो गए उन्होंने हथियार डाल दिए मुसलमानो के एक दस्ता ने उन्हें गिरफ्तार  करना शुरू कर दिया। एक दस्ता शहर के अज़ीम लोगो और उनकी बीवियों ,बेटियों और बेटो को गिरफ्तार  करने लगे। एक दस्ता माल गनीमत जमा करने लगा।

इस मुरका में सिर्फ पांच मुस्लमान शहीद हुए और काफिर ढाई हज़ार मारे गए। इस क़िला में से भी बहुत सी दौलत मुसलमानो  के हाथ आयी मर्द औरते और बच्चे क़ैदी भी बहुत मिले।

असर के वक़्त तक क़िला पर मुसलमानो का मुकम्मल क़ब्ज़ा हो गया। इस क़िला पर अब्दुर्रहमन ने सौ मुजाहिदो को छोड़ा और दूसरे  रोज़ जाबुल की तरफ कोच कर दिया।

 

 

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