Lagan Part 12…..
बिल्कुल पढ़ाएगा, बेगम साहब! यह तो आपका नौकर है।
“अच्छा… गुलचहरा! तुम कब खाली होती हो?”
“यह तो जी, सारा दिन खाली होती हूँ।”
“नहीं?” फ़लकी ने कहा, “मुझे मालूम है, बच्चों वाली माँ को बहुत काम होता है। अच्छा, ऐसा करो, दिन के ग्यारह बजे तुम आ सकती हो?”
“हाँ बेगम साहब! हम नाश्ता करके ड्यूटी पर चले जाते हैं, तो फिर यह आ जाएगा।”
“अच्छा, यूँ करते हैं। दस-ग्यारह बजे के बीच जब भी मैं खाली होऊँगी, तुम्हें बुला भेजूँगी… ठीक है?”
“बिल्कुल ठीक है, बेगम साहब!” गुलचहरा ने कहा।
फ़लकी उठकर घर आ गई।
रास्ते भर वह सोचती रही… आफ़ाक़ के पीछे वह कुरआन पढ़ लेगी… और फिर इसहाक़ भी रोज़ाना आठ बजे दफ़्तर चला जाता था। घर पर कोई नहीं होगा और वह अपनी एक पुरानी इच्छा पूरी कर सकेगी। अच्छा हुआ, घर में ही एक पढ़ाने वाली मिल गई।
इसहाक़ ने लात मारकर उसके बेडरूम का दरवाज़ा खोल दिया। नकी बैठी हुई थी। एकदम चौंककर उठ बैठी।
पल भर में इसहाक़ उसके सिरहाने पहुँच चुका था।
“यह क्या बोरियत है, भाई! तुम शाम होते ही दरवाज़ा बंद करके सो जाती हो। मुझे इस इतने बड़े घर से घबराहट होती है।”
“तो मैं क्या करूँ…” फ़लकी ने नाराज़गी से कहा।
“थोड़ा बाहर निकलकर बैठो, गपशप करें, संगीत सुनें, नाचें-कूदें…”

