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Home»Hindi Novel»Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel)

fatah kabul (islami tarikhi novel) part 11

fatah kabul pat 11
umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailJanuary 8, 2022Updated:July 5, 2026 Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel) No Comments8 Mins Read
fatah kabul historical novel,
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 मर्ज़बान की  अदावत,,,,,,,,

                                           

 

जासूसों का काफला जो  सौदागरों के भेस  में काबुल रवाना हुआ था। चार आदमीओ पर मुश्तमिल था। उनके नाम यह है  :सालेही ,अब्बास ,मसूद और इल्यास। इनमे सलेही  मेरा काफला थे। इस क़ाफ़ले में  सबसे कमसिन इल्यास थे। चुके पहाड़ी इलाक़े में  सफर करने का ख्याल था इसलिए  ऊँट साथ ले गए थे घोड़ो पर ही सामान तेजारत बार  किया गया और घोड़ो पर ही यह लोग सवार हुए। 

  • इन लोगो ने अपना मख़सूस अरबी लिबास पहना। वह  लिबास जो मुअज़्ज़ज़ अरब पहना करते थे। अवल शलवार उसमे ढीली आस्तीनों की अबा  जो  टखनों तक लम्बी थी। अबा पर चादर  सर पर  अमामा  अमामे  पर अरबी वज़ा का रुमाल और रुमाल  पर डोरिया बंधे हुए थे। पहलुओं में मियानो में तलवार लटक रही थी। हाथो में नेज़े थे। पेटी में खंजर थे। पुश्तों पर  ढाले पड़ी हुई थी। शानो पर कमाने थे। 
  • चारो तरफ एक धज थी। इल्यास चके नो उम्र व सब्ज़ा आगाज़ थे। खूबसूरत और वजीह थे। बुलंद क़ामत और मज़बूत जिस्म के थे। सीना चौड़ा था और और इसलिए वह उस लिबास में  बहुत ही अच्छे मालूम होते थे। उनकी तमन्ना यह थी के जिस तरह भी मुमकिन हो जल्द से जल्द काबुल में पहुंच जाये। उन्होंने अपनी इस ख्वाहिश का इज़हार अपने साथियो पर क्र दिया था। उनके साथिओ को उनके चाचा और उनके मंगेतर के हालात मालूम हो चुके थे उन्होंने उनकी आरज़ू के मुताबिक़ तेज़ी से सफर शुरू कर दिया। 
  • वह बसरा से रवाना हुए। ईरान में होकर काबुल पहुंच सकते थे। उन्होंने ईरान का रास्ता इख़्तियार किया। इराक और ईरान में चुके इस्लामी हुकूमत थी इसलिए  इन दोनों मुमालिक में उन्हें कोई अंदेशा नहीं था। वह बड़ी बेतकल्लुफी से सफर करके ईरान में दाखिल हो गए। 
  • ईरान का मुल्क मुसलमानो के क़ब्ज़े में नया नया आया था। २४ हिजरी ६४४  ईस्वी में फतह हुआ था। उस वक़्त तमाम ईरानी मुस्लमान नहु हुए थे। बहुत काम ईमान लाये थे। ज़्यदा तर लोग जज़ीए ऐडा करते थे। और अपने मज़हब पर क़ायम थे। वह जरतशी थे। आतिश परस्ती  उनका मसलक था। आग को मज़हर इलाही समझ कर उसकी पूजा करते थे। वह खुदा मानते थे  .एक याज़्दान दूसरा हरमन। याज़्दान को  खुदाये खैर समझते थे और अर्हमान को खुदाए शर  जानते थे। 
  •             ईरान के तमाम बड़े शहरो में  आतंकदे क़ायम थे। उन आतंकदो में हमेशा आग रोशन रहती थी। और ईरानी उस आग को सजदा करते रहते थे। 
  •            यह काफला  जब ईरान  के बड़े  शहरो  में से  गुज़रा तो लोग उन्हें सौदागर समझ कर उनके पास आये और  उनका माल खरीदना चाहा। लेकिन उन्होंने कह दिया के वह काबुल जा रहे है। उस माल की तिजारत वही  करंगे।  ईरान में भी पर्दा नहीं था। उन्हें उनके माल को देखने के लिए मर्द और औरते सब ही आते थे। वह जानते थे के अरब उसके हुक्मरान है। वह उनकी इज़्ज़त और अज़मत करते थे। 
  • लेकिन इल्यास को देख कर उनसे मुहब्ब्बत करने पर मजबूर हो जाते थे  .देर तक उनके पास रहते थे  ख़ुसूसन औरते ज़्यदा तर  या तो  इल्यास से बाते करती थी। उनके मुताल्लिक़ उनके  खानदान के बारे में  माल तिजारत के मामले में तरह ररह के सवालात करती। इल्यास बड़ी नरमी से उनहे जवाब देते। 
  •        औरते और लड़किया  या तो सलेही वगेरा से उन्हें ज़्यदा उम्र का समझ कर शर्माती थी और इल्यास को कमसिन समझ कर उनसे बाते करती थी  या उनकी वजाहत व सूरत देख कर उनसे  मानूस हो जाती थी। 
  •       इल्यास चाहते  थे के न उन्हें देखे न उनसे  बाते करे मगर जब वह उन्हें घेर लेती थी तो मजबूरन उनसे बाते करते  थे। उनमे बाज़ महविशे बड़ी बेबाक और शोख होती थी। बड़ी बेतकल्लुफी  से बात करती थी। 
  •                           एक रोज़ वह हमदान में मुक़ीम थे। एक ज़माना में हमदान ईरान का दारुल सल्तनत रह चूका था। काफी बड़ा शहर था। बहुत सी औरते शाम के वक़्त इस काफला में आयी उनमे कई निहायत हसीं और काफिर अदा थी। उन्होंने इल्यास के गिर्द घेर  डाल लिया  .उस वक़्त सलेही। अब्बास और मसूद वहा नहीं थे। कही गए हुए थे। यहाँ मुसलमानो ने छाओनी क़ायम की हुई थी। कुछ फ़ौज मौजूद थे। लेकिन यह फ़ौज शहर से  बहार रहती थी। और यह काफला शहर के बिलकुल क़रीब मुक़ीम हुआ था। यह लोग ईरानियों से मिल जल कर यह मालूम करना चाहते थे के काबुल वाले की लड़ाई की तयारी कर रहे है या नहीं। यही मालूम करने के लिए सही वगेरा शहर में गश्त लगाने गए थे और इल्यास तनहा था। 
  •                          एक  माह पारा  इल्यास  तलवार जो  मियान में पड़ी हुई थी हाथ लगा कर कहा :”इस तलवार से तुम क्या काम लेते हो ?
  •                        इल्यास ने मुस्कुरा कर कहा  :”जो काम बड़ी तलवार करती है वही यह भी करती है। 
  •           उस हसीना ने  माना ख़ेज़ निगाहो से देख और कहा :”क्या तुम तलवार  चलाना जानते हो ?
  • इल्यास :हमारी क़ौम की औरते भी तलवार चलना  जानती है। 
  • हसीना :औरतो को तो रहने दो मैं  तो तुम्हारी बात कर रही हु। 
  • इल्यास :मैं भी जनता हु। 
  • हसीना : मुझे यक़ीन नहीं आता। 
  • इल्यास :क्यू ?
  • हसीना : न मालूम क्यू। 
  • इल्यास : यह तो अच्छा ही है के तुम्हे यक़ीन न आये। 
  • इस पर तमाम महविशे हसने  लगी। थोड़ी देर के बाद सलेही  वगेरा आगये और हसीनो का झमगट वहा से रुखसत हो गया। 
  •                यह काफला ईरान को तये करके शहर ज़रनज में पंहुचा। यह शहर ईरान के इलाक़े में वाक़े था। किसी ज़माने में यहाँ का मर्ज़बान बादशाह ईरान का बज्गुज़ार था। जब ईरानी हुकूमत का तख्ता उल्टा गया  और यज़ीद गर्द शाह ईरान जो आखरी फ़रमानवा था  दुनिया से रुखसत हो गया तो  शहर ज़रनज  का वाली आज़ाद व खुद मुख़्तार हो गया। 
  •                इस काफला इस क़ाफ़ले ने शहर ज़रनज  में  क़याम किया। वहा के लोग बड़े सरकश मालूम हुए। उन्हें अरबो से अदावत व कदूरत पैदा हो गयी थी। इस अद्वैत की वजह यह थी के ईरानी हुकूमत  जो निहायत  पुरानी और ताक़तवर थी  अरबो ने ख़तम  कर डाली थी। इस शहर के तमाम लोग आतिश परस्त थे। ईरानी उनके हममजहब थे। उन्हें मलाल होना कुदरती बात थी। उन अरबो के साथ कुछ अच्छी तरह पेश नहीं आये। 
  •                  जब मर्ज़बान  को उनके आने की इत्तेला हुई  उसने उन्हें अपने सामने तलब किया। यह चारो अपने मख़सूस  लिबास में उनके सामने हाज़िर हुए। उसने देखा। वह इल्यास को देख कर चौंक पड़ा। उसने उन्हें अपने क़रीब बुलाया और कहा “मैंने शायद पहले कभी तुम्हे देखा होगा। 
  • इल्यास ने कहा  “मैं  बसरा में रहता हु। अगर आप वहा गए हों तो यक़ीन है देखा होगा। 
  • मर्ज़बान :मैं कभी बसरा नहीं गया  और बसरा क्या हमदान भी नहीं गया। कही और देखा है। तुम इस शहर में पहले कभी नहीं  आये। 
  • इल्यास :नहीं इस शहर में आने का पहला मौक़ा है। 
  •           मर्ज़बान कुछ सोचने लगे। उसने जल्दी से कहा “ओह याद  आगया मैंने तुम्हे ख्वाब में देखा था  चाँद रोज़ का अरसा हुआ जब मैंने एक खौफनाक ख्वाब देखा था।  इस ख्वाब का खुलासा है के मैंने देखा अरबो ने इस क़िले पर हमला कर दिया है मैं उनसे लड़ने के लिए  निकला। एक नौजवान ने मेरे रिसाला पर हमला किया। उसकी सूरत बिलकुल तुम्हारी तरह थी। 
  • इल्यास :ख्वाब का एतबार किया। अगर आप अरबो से छेड़खानी नहीं करंगे  तो अरब आपके मुल्क पर हरगिज़ हमलावर नहीं होंगे। 
  • मर्ज़बान :मुसलमानो ने ईरान पर हमला करके उसे तबाह कर दिया है। मेरे मुल्क पर हमला करते तो क्या खौफ हो सकता है। 
  • इल्यास : मुसलमानो ने किसी मुल्क पर बेवजह कभी हमला नहीं किया  ईरान पर हमला करने की वजह या थी के शाह ईरान के पास जब रसूल अल्लाह ने दावत इस्लामी भेजी तो उसने अजराह  तकब्बुर इस मुक़द्दस  दावत नामा को चाक कर डाला और अपने एक वाली को हुक्म दिया के वह रसूल अल्लाह को पकड़ लाये। यह वजह इस पर लश्कर कशी  की हुई। वह अपनी ज़ोर क़ूवत पर मगरूर था  खुदा ने उसके ज़ोर को तोड़ दिया। 
  • मर्ज़बान :कुछ भी हो मैं तुम लोगो से खुश नहीं हु। तुम्हारी क़ौम को बिलकुल पसंद नहीं करता। तुम्हे हुक्म देता हु इसी वक़्त यहाँ से चले जाओ वरना तुम्हे गिरफ्तार करके क़तल कर दिया जायेगा। 
  • इल्यास :इस वक़्त शाम हो रही है हम सुबह चले जायँगे। 
  • मर्ज़बान : सुबह नहीं। अभी।
  • इल्यास : हम छेड़ करना नहीं चाहते। सौदागर है अभी चले जायँगे। 
  •             यह लोग मर्ज़बान के पास से वापस आये और उसी वक़्त वहा से रवाना हो कर कई कोस के फैसला पर मैदान में जा ठहरे। 
 
                                                  अगला भाग (एक हमदर्द )
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fatah kabul hindi novel part 11 historical novel Islami Novel
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