Lagan Part 10 ,
आफ़ाक जब बाथरूम से बाहर निकला तो फ़लकी ने उसके कपड़े निकाल लिए थे। कई दिनों से फ़लकी ने उसके वे सारे काम भी अपने ज़िम्मे ले लिए थे, जो पहले नहीं करती थी।
पहले उसने कभी उसके कमरे में जाकर उसके लिए कपड़े नहीं निकाले थे। मगर अब वह उठकर पहले रसोई में जाती, अब्दुल करीम को ज़रूरी बातें समझाकर आफ़ाक के कमरे में आ जाती।
उसकी शेव के लिए पानी बाथरूम में रख देती। जब वह बाथरूम में चला जाता तो उसकी वार्डरोब खोलकर उसके लिए कपड़ों का चुनाव करती।
आफ़ाक की पसंद बहुत अच्छी थी। उसके पास हर तरह के मर्दाना रंगों के कपड़े मौजूद थे और हर कपड़े में वह बहुत अच्छा लगता था।
सिवाय सफ़ेद सूट के… पता नहीं सफ़ेद सूट में वह फ़लकी को क्यों अच्छा नहीं लगता था। शायद कुछ ज़्यादा सोबर या ख़रख़्त मालूम होने लगता था।
अलबत्ता सफ़ेद स्पोर्ट्स शर्ट और सफ़ेद टेनिस में वह बिल्कुल खिलंदड़े-सा लगा करता था।
पहले दिन जब उसने हल्के ज़र्द रंग का धारीदार सूट निकालकर उसके साथ कासनी रंग की क़मीज़ और जामुनी टाई पलंग पर जमा दी और उसकी जुराबों वाली दराज़ खोलकर उसमें से कोई जामुनी और पीली प्रिंटेड जुराब ढूँढ़ रही थी, तो वह सर को तौलिए से पोंछता हुआ बाहर निकल आया। फ़लकी चौंककर उठी तो अलमारी का दरवाज़ा उसकी पेशानी पर लग गया।
“ओह… तो आपने मेरे कपड़े निकाल दिए…” आफ़ाक ने कपड़ों की तरफ़ देखकर कहा। “आप तकलीफ़ क्यों कर रही हैं?”
“बस, मेरा दिल चाहता है। आपका हर काम अपने हाथ से करूँ।”
“मैं तो यही समझता रहा हूँ कि आप मेरा काम अपने हाथ से ही करती हैं।” उसने हाथ पर ज़ोर दिया। “क्या आप अब तक पाँव से कर रही थीं सारे काम?”
फ़लकी हँस पड़ी। “मेरा ख़याल है, मुझे आपके सब काम करने चाहिए।”
“तो इसका मतलब है, मैं अपनी मर्ज़ी से कपड़े भी नहीं पहन सकता। घर पर तो आपने क़ब्ज़ा कर रखा है। अब मेरे कपड़ों पर भी क़ब्ज़ा करना चाहती हैं।”
काश, तुम्हारे दिल पर भी मेरा क़ब्ज़ा हो जाए… फ़लकी ने दिल में डूबकर दुआ की।
“घर का काम करने से घर पर क़ब्ज़ा नहीं हो जाता और कपड़े निकालकर देने से कोई कपड़ों का मालिक नहीं बन जाता।”
“मर्ज़ी का मालिक तो बन जाता है।” आफ़ाक ने बरजस्ता कहा।
फ़लकी का दिल धड़क उठा। ऐ काश! ऐसा हो जाए।
“ये काम तो कोई नौकरानी भी कर सकती है?”
“अब तक मैंने किसी नौकरानी को इसकी इजाज़त नहीं दी।”
“हाँ, मैं तो हूँ।” फ़लकी ने दाँतों तले दुपट्टा दबाकर कहा, “मैं तो आपकी शरई नौकर हूँ, इसलिए मुझे ये हक़ ख़्वाह-मख़्वाह मिलता है।”
“वाह!” आफ़ाक ने क़मीज़ उठाकर उसके बटन खोलते हुए कहा, “ये बातें तो आप ख़ूब करने लगी हैं।”
“सोहबत का असर हो ही जाता है।” फ़लकी ने उसके काले जूतों को कपड़े से चमकाते हुए कहा।
आफ़ाक हँसने लगा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह ड्रेसिंग रूम से कपड़े बदलकर बाहर निकल आया और आईने के आगे खड़े होकर टाई बाँधने लगा। टाई बाँधते हुए भी वह मुस्कुरा रहा था।
“वैसे ये आपको किसने बता दिया था कि आज मैं ये कपड़े पहनने वाला हूँ?”
“आप ही ने बताया होगा?” फ़लकी ने मुँह मोड़े बिना कहा।
“शुक्र है, आपने ख़ालिस औरतों वाला जवाब नहीं दिया।”
“वो क्या होता है?”
“जी, मेरे दिल ने मुझे बताया था।” आफ़ाक ने बारीक आवाज़ बनाकर औरतों वाली अदा से कहा।
फ़लकी को हँसी तो आई, मगर उसने आवाज़ बुलंद नहीं की। बराबर बूट चमकाती रही।
“वैसे आपने इस रंग का आज चुनाव क्यों किया?”
“मौसम बदल रहा है ना?… ये अक्टूबर और नवंबर के महीने बड़े उदास और ख़ामोश होते हैं। इस मौसम में ज़र्द रंग अच्छा लगता है और कासनी रंग हल्की जाड़ों में बहार का समाँ पैदा कर देता है। एक तरफ़ ख़िज़ाँ, दूसरी तरफ़ बहार…”
“ये क्या फ़लसफ़ा है?”
आफ़ाक मुड़ा तो फ़लकी ने…
फ़लकी ने बढ़कर उसके जूते उसके आगे कर दिए।
“देखिए, आप मेरे जूतों को पॉलिश न कीजिए।”
“क्यों?”
“बस, मैं नहीं चाहता। घर में नौकर भी हैं। उनसे करवा लिया करें।”
“लेकिन मैं जो चाहती हूँ। मुझे ये सब काम करके ख़ुशी होती है।”
“बहरहाल, अगर आप जूतों को हाथ न ही लगाएँ तो अच्छा है।”
फ़लकी वहीं ज़मीन पर बैठी थी। जब आफ़ाक ने जूते पहन लिए तो उसने हाथ बढ़ाकर फीते पकड़ लिए।
“मैं बाँधूँगी।”
पहले ही उसके हाथ आफ़ाक के हाथों से टकरा गए थे और दोनों को यूँ महसूस हुआ जैसे ज़लज़ले का झटका लगा हो। इसलिए न चाहते हुए भी आफ़ाक ने अपने हाथ पीछे कर लिए।
फ़लकी ने बड़ी महारत और मोहब्बत से उसके बूट के फीते बाँधे। जूते पर ज़रा-सा दाग़ लग गया था। अपनी ओढ़नी पकड़कर उसने उसे भी साफ़ कर दिया।
“शुक्रिया, बहुत-बहुत।”
इस वक़्त आफ़ाक वाक़ई शुक्रगुज़ार और उलझा हुआ नज़र आ रहा था।
“आज तो वाक़ई बूट चमक रहे हैं। ये आप कैसे चमकाती हैं?”
“जब तक मेरा चेहरा इनमें से नज़र न आ जाए, मैं कपड़े से रगड़ती रहती हूँ।”
आफ़ाक एक सेकंड के लिए खड़ा हो गया और हैरत से फ़लकी की आँखों में देखता रहा। फ़लकी भी ज़मीन पर बैठे-बैठे मुस्कुराकर उसकी तरफ़ देखती रही।
न जाने आफ़ाक की आँखों में क्या था… क्या था… फ़लकी को यूँ लगा जैसे उस पर किसी ने जादू कर दिया हो।
उसी वक़्त आफ़ाक चौंककर बाहर निकल गया। फ़लकी भी रसोई में चली गई।
उस दिन के बाद से फ़लकी ने आफ़ाक के कपड़े निकालने शुरू कर दिए।
वह जो कपड़े निकालकर रख देती, आफ़ाक पहन लेता। उसने कभी एतराज़ नहीं किया था। अलबत्ता जूते पॉलिश करने और पहनाने से बार-बार उसे मना किया था और फ़लकी ने हर बार कहा था,
“जब आप भी काम नहीं करते थे तो सहने देते थे। अब काम करती हूँ तो डाँटते हैं।”
और हर बार आफ़ाक लाजवाब हो गया था।
फ़लकी को उसका काम करके, उसे जूते पहनाकर ख़ुशी होती… जब वह रूमाल देने के लिए… परफ़्यूम पकड़ाने के लिए ज़रा-सी उसके क़रीब होती तो उसे एक गर्म और ख़ूबसूरत-सी महक आफ़ाक में से आती। कभी परफ़्यूम की, कभी क्रीम की, तभी आफ़्टर-शेव की और कभी आफ़ाक की साँस की झलक।
उसके जुगनू के लिए इतनी-सी महक काफ़ी थी। उसमें वह सारा दिन डूबी रहती। कोई चीज़ पकड़ाते वक़्त कभी जो आफ़ाक की ज़रा-सी उँगली लग जाती तो सारा दिन उस एक जगह अंगारा-सा दहकता रहता। उसी आग को वह हासिल-ए-ज़िंदगी कहती थी।
उस रोज़ भी उसने आफ़ाक के लिए ब्राउन चेक का सूट निकाला। उसकी सारी चीज़ें तरतीब देकर रखीं। कोट की जेब में ज़र्द रूमाल लटकाया। उस पर जॉय परफ़्यूम लगाई और बाहर निकल गई ताकि छोटी-सी ज़र्द रंग की गुलाब की कली तोड़ लाए।
जब वह कली तोड़कर अंदर आई तो आफ़ाक जूते पहनकर फीते बाँध रहा था। फ़लकी दौड़कर अंदर आई। झुककर उसने फीते छीन लिए और ख़ुद बाँधने बैठ गई। इस कशमकश में कली नीचे गिर गई।
जब आफ़ाक झुककर कली उठाने लगा तो फ़लकी भी उधर को लपकी। दोनों के सिर टकरा गए थे।
“सॉरी,” आफ़ाक ने कहा।
फ़लकी ने कली बढ़ाई। वह पकड़ रहा था कि फ़लकी को ख़याल आया कि इसे तो उसके कोट में लगाना चाहिए था। उसने कली उससे छीन ली और आगे बढ़कर कोट के काज में…
लगा दी। इस कशमकश में कई बार उसके हाथ आफ़ाक के हाथ से टकराए। हालाँकि वह चाहती थी ऐसा न हो। इस ज़रा-से टकराव के बाद उसके अंदर तूफ़ान सिर उठा लेते थे। आँधियाँ चलती थीं। बवंडर उठते थे और वह सारा दिन अपने अंधे जज़्बात के आगे हाथ बाँधे फिरती थी।
किसी दिन मुझे रुसवा न कर दिया भरे बाज़ार में।
नाश्ते के बाद जब आफ़ाक जाने लगा तो फ़लकी ने ब्रीफ़केस पकड़ाते हुए कहा,
“उस रात आपने क्या कहा था—’ख़ाक हो जाने वाली औरत को मर्द पसंद करता है।'”
“जी।”
“वो… जाते-जाते?”
“औरत को किस तरह ख़ाक हो जाना चाहिए… मेरा मतलब है, किस तरह… कैसे वह अपने आपको ख़ाक करे?”
“जिस तरह आप कर रही हैं।”
यह कहकर आफ़ाक तो चला गया, मगर फ़लकी के मन में एक और आग रोशन कर गया।
एक दिन दोपहर को आफ़ाक ने दफ़्तर से फ़ोन किया और बोला,
“आज आप कुछ देखने जाएँगी?”
“जी?” फ़लकी हैरान हो गई।
“मैंने ये पूछा है, आप कुछ देखने जाएँगी?”
“मगर कैसे… किसके साथ…?”
“मेरे साथ और किसके साथ…”
“जी… जी। पता नहीं।”
“ये ‘पता नहीं’ क्या होता है भई? मैंने तो दो टिकट मँगवा भी लिए हैं।”
“अच्छा, तो चली चलूँगी।”
“छह बजे चलेंगे। आप तैयार रहें।”
फ़ोन रखकर फ़लकी का दिल डूबने लगा। वह आफ़ाक से किसी मेहरबानी की उम्मीद नहीं रखती थी। जब वह ख़ुद-ब-ख़ुद किसी मेहरबानी पर आमादा नज़र आता तो उसका दिल डूबने लगता था। पता नहीं क्यों?…
पहले वह आफ़ाक के ज़ुल्म-ओ-सितम से डरा करती थी और अब उसकी…
मेहरबानियों से डर आने लगा था। उसे समझ नहीं आती थी कि आख़िर वह क्या चाहती है। क्या वह आफ़ाक को मेहरबान देखना चाहती है या नामेहरबान…?
बहरहाल, वह तैयार हो गई।
किसी ज़माने में फ़िल्म देखना उसकी ज़िंदगी का महबूब मशग़ला होता था। शहर में उर्दू या अंग्रेज़ी की कोई भी फ़िल्म लगी हो, वह ज़रूर देखा करती थी। और अब… ये बात नहीं कि उसने दस महीने से कोई फ़िल्म नहीं देखी थी, इसलिए उसे आदत नहीं रही थी, बल्कि उसे ऐसा लगता था जैसे उसने कोई रोग पाल लिया है।
उसे हुजूम से घबराहट होने लगी थी। भीड़ वाली जगहों पर वह जाना नहीं चाहती थी। लोगों में बैठते हुए कतराती थी। तन्हाई अच्छी लगती थी… सोचना, आह भर लेना, कभी रो देना उसे अच्छा लगता था।
सारी दुनिया में उसे सिर्फ़ एक ही चेहरा नज़र आता था। एक ही एहसास उसके आस-पास धड़कता था। और ये आफ़ाक था।
वह आफ़ाक से दूर हो या नज़दीक… वह कुछ भी कर रही होती, हमेशा आफ़ाक के बारे में सोचती रहती।
आफ़ाक जब छह बजे घर आया तो वह तैयार ही थी।
“तैयारी कैसी…?”
वह जिस तरह बैठी थी, उसी तरह चल दी।
रास्ता भर आफ़ाक ख़ामोश रहा और एक ही रिकॉर्ड बजाता रहा—
“तुम आए हो न, शब-ए-इंतज़ार गुज़री है,
तलाश में है सहर, बार-बार गुज़री है।”
वह भी गुमसुम बैठी रही।
जब सिनेमा के गेट के अंदर मोटर दाख़िल हुई तो उसे पता चला कि वे लोग तो अंग्रेज़ी फ़िल्म देखने आए थे। उसने तो रास्ते में आफ़ाक से नाम भी नहीं पूछा था।
जब वह मोटर से उतरने लगी तो उसने सामने लगे हुए बड़े-बड़े पोस्टर देखे। MOMENT TO MOMENT पिक्चर लगी हुई थी।
शहर में ये बात… उसे सच में ख़ौफ़ होने लगा था। पहले वह आम लड़कियों की तरह हर पोस्टर को ग़ौर से देखा करती थी। कंधे उचकाती थी, बाल झटकती थी और हंगामा बरपा करती हुई सिनेमा के अंदर जाती थी।
अब न जाने उसे क्या हुआ। बाहर निकलते ही दुपट्टा खोलकर अपना सिर ढक लिया और उसे कंधों पर फैला लिया। फिर नज़रें झुकाकर एक कोने में जाकर खड़ी हो गई।
जब आफ़ाक मोटर खड़ी करके आया तो वह दीवार की तरफ़ मुँह किए खड़ी थी, जैसे वह इस शहर में बिल्कुल अजनबी हो। न सिर्फ़ अनजानी, बल्कि अनपढ़ भी।
आफ़ाक आगे-आगे और वह पीछे-पीछे दोनों गैलरी में जाकर बैठ गए। लोग आ रहे थे, बैठ रहे थे। कुछ जोड़े थे, कुछ दोस्त थे, कुछ सहेलियाँ थीं। हँसी-ख़ुशी थी, ज़िंदादिली थी… और क्या नहीं था।
यही सब उसे भाया करता था। सिनेमा हॉल के अंदर दुनिया ही अलग होती है। जब हर व्यक्ति ख़्वाबों के घोड़े पर सवार हो जाता है और अपना हर दुख, हर उलझन थोड़ी देर के लिए उस दरवाज़े के बाहर छोड़कर आ जाता है।
मगर फ़लकी का हाल उन सबसे अलग था। पहले वह मुतमइन, मसरूर और मग़रूर हुआ करती थी। आज वह बे-यक़ीन थी…
ज़िंदगी में मोहब्बतें और चाहतें भी देखी थीं… नफ़रतों का मज़ा भी चखा था… शब-ए-तन्हाई भी काटी थी… तकलीफ़ें भी सही थीं… और एक नए दौराहे पर आ खड़ी हुई थी।
और ये दोराहा और ये मरहला सबसे कठिन था। अंजाम का उसे पता नहीं था। आफ़ाक के दिल में क्या है, वह बिल्कुल नहीं जानती थी।
और कभी-कभी दूसरों के दिल का हाल जानना ही ज़िंदगी की तमन्ना बन जाता है। बला से उसकी मर्ज़ी हमारे हक़ में जाती हो या नहीं, मगर वह ज़िंदगी का सवाल ज़रूर बन जाती है।
पिक्चर शुरू हो गई थी। हॉल में अँधेरा हो गया था। सीटियाँ और सरगोशियाँ बंद हो गई थीं। माहौल रोमांटिक होता जा रहा था। एक-दूसरे के क़ुर्ब का एहसास जागने लगा था। मगर फ़लकी सहमी जा रही.थी और वह भी सिमटकर और सिकुड़ती जा रही थी। शुक्र है, वह सबसे आख़िरी गैलरी में बैठी हुई थी। वरना इधर-उधर कोई और होता तो ज़रूर उसे टोक देता।
वह यूँ अँधेरे में आफ़ाक के इतना क़रीब कभी नहीं बैठी थी और न ही कभी उसने इस तरह बैठने का सोचा था। आफ़ाक की ख़ुशबू बहुत क़रीब से आ रही थी। उसका एहसास फ़लकी के वजूद पर छाता जा रहा था।
वह डर रही थी। जाने इश्क़ क्या कर बैठे। इश्क़ तो मजनूँ है, दीवाना है। घर नहीं देखता, जंगल नहीं देखता, सहरा नहीं देखता। इश्क़ गरेबान चाक कर देता है।
जो कुछ भी थी… गरेबान चाक करने से वह बहुत डरती थी।
आफ़ाक ने कितना ज़ुल्म किया। उसे अपने साथ ले आया। जाने और कितने इम्तिहान लेना चाहता है उसके…
वह खींचकर फ़िल्म की तरफ़ ध्यान लगाती और ध्यान पलट-पलटकर आफ़ाक की जानिब आ जाता। और आफ़ाक यूँ बैठा था जैसे वह तन्हा आया है। यहाँ उसके साथ और कोई भी नहीं आया है।
उस अँधेरे में एक मद्धम-सी रोशनी के ज़ेर-ए-असर उसने कितनी ही दफ़ा आफ़ाक के सपाट चेहरे की तरफ़ देखा था। उसे पिक्चर में यूँ डूबे देखकर उसे ख़याल आया कि उसे भी फ़िल्म ध्यान से देखनी चाहिए। इस फ़िल्म में ज़रूर कोई बात होगी।
वह भी फ़िल्म को ग़ौर से देखने लगी और जब फ़िल्म ख़त्म हुई तो उसे बेचैनी-सी महसूस होने लगी।
आख़िर आफ़ाक उसे एक हरजाई हीरो की फ़िल्म दिखाने क्यों लाया है?
उसकी क़नाअतियत दो-चंद होने लगी।
क्या आफ़ाक उसे ऐसी बीवी समझता है?
काश आफ़ाक जान सके कि वह क्या से क्या हो गई है।
उसकी ज़िंदगी बदल गई है।
है?
एतिमाद बदल गए हैं।
ज़िंदगी के सारे नज़रिए बदल गए हैं।
लेकिन क्या आफ़ाक उसे माफ़ कर सकेगा… पिछले गुनाह तो ख़ुदा भी माफ़ कर देता है।
वे दोनों जब मोटर में आकर बैठे तो आफ़ाक ने दूसरा गाना छेड़ दिया—
“तू ख़ुदा है न मेरा, इश्क़ फ़रिश्तों जैसा,
दोनों इंसाँ में तू क्यों इतने हिजाबों में…”
फ़लकी ने हाथ बढ़ाकर टेप बंद कर दी।
“क्यों? क्या बात है?” आफ़ाक ने पूछा।
“पिक्चर पसंद नहीं आई… अच्छा नहीं लगा! आज अरसे बाद फ़िल्म देखी तो मेरे सिर में दर्द होने लगा।”
“क्या ख़याल है, कहीं से खाना न खा लें?” आफ़ाक ने पूछा।
“खाना तो घर में भी तैयार है,” फ़लकी ने जल्दी से कहा।
“कभी-कभी बाहर भी खा लेना चाहिए।”
“जैसे आपकी मर्ज़ी।”
“कहाँ खाना पसंद करेंगी आप?”
“जहाँ आप पसंद करें।”
फ़लकी को अपनी इस हालत पर बहुत तअज्जुब हुआ। होटलों में खाना उसकी एक और कमज़ोरी थी। और ख़ास तौर पर चाइनीज़ खाना तो उसकी जान था। हफ़्ते में एक बार वह ज़रूर किसी न किसी चाइनीज़ रेस्टोरेंट में जाया करती—कभी सहेलियों के साथ, कभी दोस्तों के साथ।
और अब उसने कितने मज़े से कह दिया था—”जहाँ आप पसंद करें।”
और आफ़ाक चलते-चलते आफ़ाक ने मोटर एक रेस्टोरेंट की तरफ़ मोड़ दी तो वह एकदम परेशान हो गई। यह वही चाइनीज़ रेस्टोरेंट था जहाँ वह अपने दोस्तों के साथ बार-बार आ चुकी थी। रेस्टोरेंट का मालिक उसे अच्छी तरह पहचानता था।
और अब वह अंदर जाते हुए घबरा रही थी। लेकिन आफ़ाक ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। आगे बढ़ता ही चला गया। फिर हॉल में जाकर एक कोने वाली मेज़ पर बैठ गया।
फ़लकी भी उसके पीछे चलती गई और जान-बूझकर हॉल के दरवाज़े की तरफ़ पीठ करके बैठ गई।
आज होटल के मालिक ने उसे पहचानकर सिर झुकाकर सलाम किया तो उसे ज़रा संतोष हुआ कि अब वह एक इज़्ज़तदार आदमी की बीवी है। लेकिन फिर भी वह लगातार डर रही थी।
वह नहीं चाहती थी कि इस रेस्टोरेंट में कोई पुराना वाक़िफ़ या कोई भी जानने वाला मिल जाए। यह बात नहीं थी कि वह आफ़ाक से अपना माज़ी छिपाना चाहती थी। आफ़ाक से वह कुछ भी छिपाना नहीं चाहती थी। मगर आफ़ाक के अलावा वह किसी और का सामना करना पसंद ही नहीं करती थी।
आफ़ाक के आगे हर चेहरा फीका लगता था।
“फिर कैसी लगी पिक्चर आपको?” खाने का ऑर्डर देने के बाद उसने पूछा।
“कहानी कैसी लगी?”
“मुझे कहानी की कोई ख़ास समझ नहीं है।”
“इसका मतलब है कुछ आपको अच्छी नहीं लगी?”
“कह सकते हैं?”
“मुझे तो बहुत पसंद आई।”
वह ये न पूछ सकी कि उसे क्यों पसंद आई थी। ऐसे ही जैसे फ़लकी के मन में कोई चोर था। उसकी सारी भूख मिट गई थी और वह दिल में सोच रही थी कि आफ़ाक क्या जाने… कि वह आफ़ाक के लिए क्या कर सकती है। खाने के दौरान भी उसने बहुत कम बातें कीं।
सड़क पर आकर आफ़ाक ने पूछा,
“पान खाएँगी?”
“खिला दीजिए।”
आफ़ाक ने मोटर मार्केट की तरफ़ मोड़ ली। जब वे पान की दुकान पर पहुँचे तो दुकानदार का रेडियो ऊँची आवाज़ में चीख़ रहा था—
“रांझा रांझा करदी वे, मैं आपे रांझा होई…”
उस वक़्त बजता हुआ ये रिकॉर्ड फ़लकी को इतना अच्छा लगा कि उसका दिल चाहा, आफ़ाक सारी रात यहाँ खड़ा रहे और वह ये गीत सुनती रहे।
जब छोटे लड़के से पान पकड़कर आफ़ाक ने कार स्टार्ट कर दी तो उसने उसके हाथ से पान लेते हुए कहा,
“ये कौन-सा स्टेशन लगा हुआ था?”
“कहाँ?”
“पान की दुकान पर।”
“वो रांझा रांझा वाला?”
“जी।”
“ये पान की दुकान वाला गीत है।”
न तो आफ़ाक ने रेडियो ऑन किया और न हाथ बढ़ाकर सूई घुमाने की ज़हमत की।
वाह! ये क्या जज़्बा है? फ़लकी ने सोचा। जिनके कारण ये रोग लिया है, वही पूछते हैं क्यों रोगी बनी…
वह चुपचाप बैठी रही। सामने घर आ गया।
गेट के बाहर घर का नाम “राज़दाँ” रोशनी में चमक रहा था। पहले भी कई बार उसने इस नाम पर ग़ौर किया था। जिस तरह आफ़ाक अनोखा और निराला था, उसी तरह उसकी हर बात भी निराली थी और घर का नाम भी कितना अनूठा था—“राज़दाँ”।
“आपके घर का नाम बहुत ख़ूबसूरत है।” फ़लकी ने एकदम कहा।
“क्या ये आपका घर नहीं है?” आफ़ाक ने मुड़कर देखा और इस अंदाज़ में पूछा कि फ़लकी बौखला गई।
अफ़! किस क़दर ग़लत सवाल कर दिया था उसने…
वह क्या जवाब देती? क्या कहती? क्या ये कहती कि वह तो इस घर में रहने के क़ाबिल नहीं है… या ये कहती कि मेरा इस घर में क्या मक़ाम है… या… एतराफ़ कर लेती…
कि यही घर तो मेरी जन्नत है। मुझे ये जन्नत आबाद करने की इजाज़त दो। मेरा मन क़बूल कर लो। मेरा ईमान क़बूल कर लो। ये मर्द मेरे मुक़द्दर में लिख दो। तुम्हारा क्या जाता है…
मगर उसके गले में जैसे फंदे पड़ गए।
“मेरा ख़याल था कि मोहब्बत की राज़दाँ बीवी होती है और मियाँ-बीवी का राज़दाँ घर होता है। इस वास्ते मैंने अपने घर का नाम ‘राज़दाँ’ रख दिया था।”
“बहुत मुनासिब नाम है।” फ़लकी ने जैसे आँसुओं के बीच कहा, “गो आपकी क़िस्मत में अच्छी बीवी नहीं थी, मगर फिर भी आपका घर तो ‘राज़दाँ’ ही साबित हुआ है।”
“भई, ये बात तो मैं आपके बारे में भी कह सकता हूँ ना?”
क्या वह उसकी वज़ाहत चाहती थी?
घर की गाड़ी पोर्च में आकर रुक चुकी थी।
और चौकीदार दरवाज़ा खोल रहा था। फ़लकी बाहर निकल आई। बाहर निकलकर वह सीधी रसोई में गई। अब्दुल करीम अभी तक उनके इंतज़ार में जाग रहा था।
उसने अब्दुल करीम से कहा,
“वह खाना खाकर सो जाए। हम लोग बाहर से खाना खा आए हैं।”
आधी रात को जब फ़लकी की आँख खुली तो उसका दिल धक से रह गया। आफ़ाक उसके ऊपर झुका हुआ था और हैरानी से उसकी आँखों में देख रहा था।
“क्या हुआ… क्या बात है?”
वह घबराकर उठ बैठी।
“कुछ नहीं।”
वह शांत स्वर में बोला और थोड़ा-सा हटकर बैठ गया।
“फिर… फिर ऐसा क्यों?” फ़लकी अविश्वास से उसे देखते हुए बोली।
इससे पहले वह कभी उसके बिस्तर के पास भी नहीं आया था, और आज वह न सिर्फ़ बिस्तर पर बैठा था बल्कि उसके चेहरे के इतना करीब भी झुक आया था।
फ़लकी की आँखों में अविश्वास देखकर आफ़ाक थोड़ा और दूर खिसक गया।
“आप मुझे पुकार रही थीं?”
“मैं… मैं नहीं… मैंने तो किसी को नहीं पुकारा। कभी नहीं पुकारा।”
“हो सकता है, आप सपने में डर गई हों।”
“सपने में…!” फ़लकी खो-सी गई।
“हाँ, शायद मैंने कोई सपना देखा होगा।”
कई दिनों से वह एक भयानक सपना देख रही थी। कई दिनों से उसके अवचेतन में…कई दिनों से उसके भीतर जैसे आँधियाँ उठ रही थीं। अतीत लगातार उसे कचोट रहा था। वह अक्सर सपने में डरकर जाग जाती थी। आज भी शायद उसने कोई डरावना सपना देखा था।
लेकिन सपने में तो वह अपनी मम्मी को पुकार रही थी। उसने तो आफ़ाक का नाम भी नहीं लिया था। उसने फिर शक भरी नज़र से आफ़ाक को देखा।
“मैं तो मम्मी और डैडी को पुकार रही थी…”
“हाँ, उन्हें भी पुकारा होगा, लेकिन जब मेरी आँख खुली तो आप कह रही थीं— ‘आफ़ाक… आफ़ाक… आओ… मुझे बचाओ… मुझे बचाओ।’”
“मैंने कहा… आफ़ाक?”
“हाँ…!”
फ़लकी उदासी भरी मुस्कान मुस्कुरा दी। दिल ही दिल में तो वह हमेशा उसे “आफ़” कहकर ही पुकारती थी। शायद वही नाम ज़ुबान पर भी आ गया होगा। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं थी।
“क्या आपको कोई मानसिक परेशानी है? अगर आप मुझे इस क़ाबिल समझें तो बता दीजिए। शायद मैं किसी तरह आपकी मदद कर सकूँ।”
आफ़ाक ने इतने अपनापन और नरमी से कहा कि फ़लकी ने नज़र उठाकर उसकी आँखों में देखा।
“आप मुझ पर भरोसा कर सकती हैं।”
“नहीं…”
फ़लकी अचानक रो पड़ी।
“मुझे कोई परेशानी नहीं है। मैं बहुत खुश हूँ। मैं अब किसी को नहीं पुकारती। अब मुझे डर नहीं लगता। अब तो मैं इसकी आदी हो गई हूँ…”
“ठीक है।”
आफ़ाक खड़ा हो गया।
“शायद मुझे ही ग़लतफ़हमी हुई होगी। वैसे भी मेरी नींद बहुत गहरी होती है। जब तक कोई मुझे झिंझोड़कर न जगाए, मेरी आँख नहीं खुलती। आप इतनी ज़ोर से…”“…इतनी ज़ोर-ज़ोर से मुझे पुकार रही थीं कि मैं उठकर आपके पास आ गया। यह मेरा नैतिक फ़र्ज़ था। इसे आप मेरी बदनीयती मत समझिए।
मैं कई दिनों से आपको परेशान देख रहा हूँ, इसलिए पूछ लिया। अगर कोई बोझ आपके दिल या दिमाग़ पर है, तो मुझे बता दीजिए। शायद मैं उसे बाँट सकूँ। वरना आपकी निजी ज़िंदगी में दख़ल देने का मुझे कोई हक़ नहीं है।
हम जिन शर्तों पर यह ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, वहाँ इस तरह की समझदारी की कोई ज़रूरत भी नहीं है… फिर भी…
अच्छा, अब सो जाइए।”
आफ़ाक अपने बिस्तर पर चला गया।
शायद उसकी नींद भी उड़ चुकी थी। इसलिए सोने के बजाय उसने सिरहाने रखा टेबल लैंप जला लिया और एक पत्रिका खोलकर पढ़ने लगा।
फ़लकी अब भी अपने खुले बालों के साथ बिस्तर पर बैठी थी। उसके चेहरे से साफ़ लग रहा था कि वह बुरी तरह सहमी हुई है। उसने सपना ही ऐसा देखा था।
वह तो रोज़ ही सपने में चीख़ पड़ती थी, लेकिन आज शायद उसकी आवाज़ सपने की सीमा तोड़कर बाहर निकल आई थी।
वह भला आफ़ाक की नीयत पर शक क्यों करती? यह सोचकर उसे हल्की-सी हँसी आ गई।
आफ़ाक तो कई महीनों से उसी के कमरे में सो रहा था, और वह भी सिर्फ़ इसलिए कि फ़लकी को रात में डर लगता था।
जब पति-पत्नी के बीच मोहब्बत न हो, तो उनके बीच हज़ारों मील की दूरियाँ पैदा हो जाती हैं—चाहे वे एक ही कमरे में सोएँ या एक ही बिस्तर पर।
वह जानती थी कि आफ़ाक को उससे ज़रा भी मोहब्बत नहीं है। जिस तरह उसने कभी आफ़ाक को अपने जाल में फँसाना चाहा था, उसी तरह आफ़ाक ने भी शायद उसे सबक सिखाने के लिए अपने पास रख छोड़ा था।
लेकिन फिर, उसी क़ैद में रहते-रहते वह उस क़ैद की आदी हो गई थी।
उसे उस पिंजरे से ही मोहब्बत हो गई थी।
पैरों की ज़ंजीर ही उसका सिंदूर बन गई थी। नए जज़्बातों ने उसे उसके अपने ही दिल का क़ैदी बना दिया था।
ज़रूरी तो नहीं था कि आफ़ाक भी उन्हीं जज़्बातों से गुज़र रहा हो। इतना ज़रूर था कि उसके व्यवहार में बदलाव आ गया था, लेकिन उस बदलाव को शिष्टाचार या हमदर्दी तो कहा जा सकता था, मोहब्बत हरगिज़ नहीं।
शायद आफ़ाक का दिल मोहब्बत से बिल्कुल खाली था। या शायद वह औरतों से नफ़रत करता था, या फिर किसी ख़ास तबके की औरतों से।
आफ़ाक का दिल जीतना कितना मुश्किल था!
और वह कौन-सी खुशकिस्मत औरत होगी जिसे उसके दिल तक पहुँचने का रास्ता मिलेगा?
फ़लकी यही सोचती रहती। उसके नसीब में तो यह ख़ुशी हरगिज़ नहीं थी।
वह फ़ना फ़िल महबूब की मंज़िल में क़दम रख चुकी थी। आँखें मूँदकर वह अपने आप को कुचलती हुई आगे बढ़ती जा रही थी कि अचानक जैसे उसे ठोकर लगी और वह गिर पड़ी।
भले ही उसका अतीत विश्वासघाती रहा था, लेकिन उसने अब तक अपना अतीत आफ़ाक से छिपाकर रखा था। एक दिन भी उसने उसके सामने अपने गुनाहों का इक़रार नहीं किया था।
जब तक वह अपने बीते हुए गुनाहों को स्वीकार नहीं करती, तब तक उसे अपनी आने वाली ज़िंदगी के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सकता था।
हालाँकि उसने ख़ुद को पूरी तरह बदल लिया था। वह आफ़ाक के रंग में ढल चुकी थी, लेकिन…
मैले और दाग़दार कपड़े को पहले धोया जाता है, फिर उस पर इस्त्री की जाती है, फिर उसे ख़ुशबू लगाई जाती है। तब जाकर वह नमाज़ पढ़ने के क़ाबिल होता है।
उसके ऊपर एक और सफ़ेद कपड़ा बिछा देने से उसकी गंदगी दूर नहीं होती।
कई दिनों से वह इसी आग में जल रही थी।
जब भीतर की आग भड़क उठती, तो उसे उसमें अपने अतीत के कई दृश्य दिखाई देने लगते। ऐसे हादसे, जिन्हें पहले वह कभी डरावने नहीं मानती थी; उन्हें तो वह महज़ इत्तिफ़ाक कहा करती थी।
लेकिन अब…?
अब उसका दिल चाहता था कि वह सब कुछ आफ़ाक को बता दे… उससे पूछे…
आफ़ाक पहले ही उससे जी भरकर नफ़रत कर चुका था। अब उससे ज़्यादा और क्या नफ़रत करेगा?
और अगर उसके बारे में सब कुछ जान लेने के बाद वह उससे और भी ज़्यादा घृणा करने लगे, तो भी फ़लकी उसे सह लेगी।
क्योंकि अब वह उस मंज़िल पर पहुँच चुकी थी जहाँ इश्क़ बे-तलब हो जाता है और मोहब्बत किसी सिले की उम्मीद नहीं रखती।
इश्क़ में मिट जाना ही इश्क़ की सबसे ऊँची मंज़िल है।
अगर इश्क़ न हो, तो शरीअत और दीन भी सिर्फ़ बहस और कल्पनाओं का विषय बनकर रह जाते हैं।
लेकिन फिर… पता नहीं क्या बात थी कि वह भीतर ही भीतर घुलती चली जा रही थी। यहाँ तक कि अब तो नींद में भी उसे डरावने सपने आने लगे थे, और वे सपने उसके छिपे हुए राज़ खोलने लगे थे।
उसने नज़र उठाकर देखा। आफ़ाक अब भी पत्रिका पढ़ रहा था।
उसने घड़ी की ओर देखा। रात के पिछले पहर का एक बज चुका था। आधी रात बीत चुकी थी और आधी अभी बाकी थी।
उसने आफ़ाक को भी बेचैन कर दिया था। वह तो सुबह पाँच बजे उठने का आदी था। अब शायद बाकी रात उसे नींद नहीं आएगी।
“अब मैं क्या करूँ?”
उसका दिल चाहता था कि वह चुपचाप जाकर आफ़ाक के गले से लिपट जाए और जी भरकर रो ले।
रात एक अजीब-से पल पर आकर ठहर गई थी, और रात का हर पल किसी जादूगर की तरह लगता था।
रात का हर पल जादूगर होता है। ख़तरनाक होता है। भारी होता है… और शैतानी होता है। इसी वजह से रात के शर से पनाह माँगी जाती है।
रात का अँधेरा इंसान को बिखेर देता है, कुचल देता है, जला डालता है। उसके अस्तित्व का दामन चाक कर देता है, उसे तार-तार कर देता है, उसकी नज़रें झुका देता है।
उस शर से पनाह माँगनी चाहिए… इससे पहले कि…
इससे पहले कि वह फिर उसी गड्ढे में गिर पड़े, उसे अपने महबूब के सामने घुटने टेककर अपने गुनाहों का इक़रार कर लेना चाहिए।
आफ़ाक उससे जितनी ज़्यादा नफ़रत करेगा, उतना ही वह इस शर से महफ़ूज़ रहेगी।
अचानक उसे लगा जैसे वह एकदम बहादुर लड़की बन गई हो।
“आफ़ाक…!”
उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी। पहले तो आफ़ाक को लगा जैसे यह उसका भ्रम हो।
“जी…?”
वह चौंककर उठा। सिर उठाकर देखा तो फ़लकी उसकी ओर इल्तिज़ा भरी नज़रों से देख रही थी।
“आपने मुझे बुलाया?”
“जी… लेकिन इस बार नींद में नहीं, बल्कि पूरे होशो-हवास में बुलाया है।”
“फ़रमाइए।”
“आपने कभी मुझसे मेरे बारे में कुछ नहीं पूछा।”
आफ़ाक कुछ देर तक उसके चेहरे को देखता रहा। फिर बोला,
“शायद इसलिए कि मुझे लगता है, मैं आपके बारे में सब कुछ जानता हूँ।”
“हो सकता है आपका ख़याल सही हो। लेकिन फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो कभी किसी के इल्म में नहीं आ पातीं।”
“आप कहना क्या चाहती हैं?”
“आपने मुझसे टूटकर नफ़रत की। मेरी आदतों का मज़ाक उड़ाया। मेरी हर बेहूदगी का ज़िम्मेदार मुझे ही ठहराया। लेकिन क्या आपने कभी ठहरकर यह सोचा कि यह ग़लती… यह सब… आख़िर शुरू कहाँ से हुआ?
गुनाहगार तो मैं ही हूँ। मैं अपनी सफ़ाई नहीं दे रही… लेकिन हो सकता है, हालात ने मुझे ऐसा बना दिया हो।”
“मैं जानता हूँ… समझता हूँ। मैं आपको दोष नहीं देता।”
“जब से मैं यहाँ आई हूँ, मुझे सोचने की आदत पड़ गई है। सोचते-सोचते पुरानी बातें इस तरह याद आने लगी हैं, जैसे ज़मीन की खुदाई करने पर सदियों पुरानी तहज़ीब के निशान मिल जाते हैं।
मुझे बचपन की एक कहानी बार-बार याद आती है और वही मुझे बेचैन करती रहती है। मैं वह कहानी आपको सुनाना चाहती हूँ… अगर…”
“ज़रूर… ज़रूर सुनाइए।”
आफ़ाक ने पत्रिका बंद कर दी और दीवार से टिककर बैठ गया।
फ़लकी ने एक लंबी साँस ली और आँखें बंद कर लीं। ऐसा लगा जैसे वह वहम और यादों की किसी गहरी दुनिया में खो गई हो। इतनी दूर निकल गई हो कि वहाँ से लौटना उसके लिए मुश्किल हो।
आफ़ाक हैरानी से उसके चेहरे को देख रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि फ़लकी किसी गहरी कशमकश में फँसी हुई है—शायद यह तय नहीं कर पा रही कि वह कहानी सुनाए या नहीं।
लेकिन आफ़ाक ने उसे टोका नहीं। वह चुपचाप उसके बोलने का इंतज़ार करता रहा।
काफ़ी देर बाद जब फ़लकी ने बोलना शुरू किया, तो उसके लहजे के साथ-साथ उसकी आवाज़ भी बोझिल हो चुकी थी।
बेगम सदरुद्दीन अपने दौर की बेहद ख़ूबसूरत, नफ़ासत-पसंद और आकर्षक महिला थीं। वह उन खुशकिस्मत लोगों में से थीं जो मानो सोने का चम्मच लेकर चाँदी के पालने में पैदा होते हैं।
उनके माता-पिता बेहद दौलतमंद थे। उन्होंने अपनी इकलौती बेटी के सारे नाज़-नखरे उठाए। अलीगढ़ से बी.ए. करने के बाद वह फ़ाइन आर्ट्स की पढ़ाई के लिए पेरिस चली गईं।
लेकिन पेरिस पहुँचकर उन्होंने फ़ाइन आर्ट्स से ज़्यादा ध्यान फ़ैशन, पहनावे, सदाबहार ख़ूबसूरती और लंबे समय तक जवान दिखने की कला पर दिया। आख़िरकार उन्होंने फ़ाइन आर्ट्स की पढ़ाई ही छोड़ दी।
वहीं पेरिस में उनकी मुलाक़ात सदरुद्दीन से हुई। हैसियत और दौलत में दोनों एक-दूसरे के बराबर थे। कुछ ही समय बाद दोनों की शादी हो गई।
सदरुद्दीन का सारा कारोबार लाहौर में था, इसलिए शादी के बाद वे पाकिस्तान आ गए।
नाज़ली सदरुद्दीन को पाकिस्तान में रहना ज़्यादा पसंद नहीं था, लेकिन आना तो पड़ता ही था। फिर धीरे-धीरे उनका एक तयशुदा रूटीन बन गया—सर्दियों के तीन महीने वे पाकिस्तान में बितातीं और बाकी के नौ महीने दुनिया के अलग-अलग देशों की सैर करती रहतीं।
सदरुद्दीन उन्हें रोक भी नहीं सकते थे, क्योंकि वह अपने मायके से इतनी बड़ी दौलत लेकर आई थीं कि वह पूरी ज़िंदगी आराम से दुनिया घूम सकती थीं।
सदरुद्दीन साहब को औलाद का बहुत शौक़ था, जबकि नाज़ली सदरुद्दीन माँ बनने के नाम से ही घबराती थीं। उनका मानना था कि बच्चे न सिर्फ़ इंसान की आज़ादी पर ज़ंजीर बन जाते हैं, बल्कि औरत की ख़ूबसूरती और जवानी भी समय से पहले ढलने लगती है। नाज़ली चाहती थीं कि वह ज़िंदगी भर ख़ूबसूरत रहें और हमेशा जवान ही दुनिया से जाएँ।
वह बला की ख़ूबसूरत औरत थीं। उनकी कमर इतनी पतली थी कि लोग उसकी नज़ाकत पर शेर कहा करते थे। उन्हें हर वक़्त यही चिंता लगी रहती कि अगर बच्चा हो गया तो उनकी कमर का नाप बदल जाएगा और हर साल पेरिस, अमेरिका और लंदन से लाए गए ढेरों महँगे कपड़े बेकार हो जाएँगे।
लेकिन आख़िरकार सदरुद्दीन साहब की ख़्वाहिश पूरी हुई और नाज़ली गर्भवती हो गईं।
पहले तो उन्होंने बहुत हंगामा मचाया। साफ़ कह दिया कि वह यह “बदसूरती” हरगिज़ बर्दाश्त नहीं करेंगी। तरह-तरह की बातें करती रहीं, लेकिन आख़िर सदरुद्दीन साहब की मिन्नतों के आगे मान गईं।
हाँ, उन्होंने उनसे एक वादा ज़रूर ले लिया—कि इसके बाद वह दोबारा कभी माँ नहीं बनेंगी, इस बच्चे की परवरिश की ज़िम्मेदारी नहीं उठाएँगी और यह बच्चा उनकी दुनिया-भर की सैर में कभी रुकावट नहीं बनेगा।
सदरुद्दीन साहब ने उनकी सारी शर्तें मान लीं और यहाँ तक वादा किया कि वह ज़िंदगी भर उनके एहसानमंद रहेंगे।
कुछ समय बाद उनके घर चाँद-सी एक बेटी ने जन्म लिया, जिसका नाम फ़लक नाज़ रखा गया।
फ़लक नाज़ की देखभाल के लिए एक नर्स और एक आया रखी गई। दिन में आया उसकी देखभाल करती और रात में नर्स की ड्यूटी होती।
नाज़ली सदरुद्दीन ने फ़लकी को अपना दूध भी नहीं पिलाया।
उन्होंने साफ़ कहा था, “बच्चे को दूध पिलाने से औरत का जिस्मानी हुस्न बिगड़ जाता है। और फिर दूध पीने वाला बच्चा माँ का इतना आदी हो जाता है कि उसका पीछा ही नहीं छोड़ता।”
डिब्बे का दूध, विदेशों से मँगाए हुए कपड़े, महँगे झूले, बच्चों की गाड़ियाँ, दो कृत्रिम माएँ—एक आया और एक गवर्नेस—और न जाने कितने नौकर…
जन्म लेते ही यह सब फ़लक नाज़ के नसीब का हिस्सा बन गया। लोग उसकी किस्मत पर रश्क किया करते थे।
लेकिन उसकी मम्मी… वह तो फ़लक नाज़ के सिर्फ़ तीन महीने की होते ही पेरिस चली गई थीं। उन्हें अपने ढलते हुए हुस्न की इतनी फ़िक्र रहती थी कि रोज़ यही वहम सताता कि कहीं चेहरे पर एक-दो नई लकीरें तो नहीं उभर आईं।
डैडी ने उन्हें पेरिस जाने की इजाज़त दे दी। फिर यही उनका मामूल बन गया।
हर साल बहार के मौसम में वह निकल जातीं—कभी फ़्रांस, कभी जर्मनी, कभी अमेरिका और कभी यूरोप के दूसरे देशों की सैर पर। कभी-कभी डैडी भी उनके साथ चले जाते—कभी कारोबार के सिलसिले में और कभी सिर्फ़ उनकी ख़ुशी के लिए।
इतनी बड़ी कोठी में, जिसके हर कमरे में इटली और हॉलैंड के विशाल झूमर जगमगाते थे, फ़लकी ढेर सारे नौकरों के बीच घुटनों के बल चलना सीख रही थी।
घर के सभी लोग खाते-पीते, आराम करते और अपनी दुनिया में मस्त रहते। वह मुँह में दूध की बोतल लगाए सबको टकटकी बाँधकर देखा करती।
ज़रा-सा रोती तो सारे नौकर इकट्ठे हो जाते, लेकिन उन चेहरों में उसे वह चेहरा कभी दिखाई नहीं देता था, जो उसके लिए सुकून का सहारा बन सकता था।
ममता की कोई किरण उसकी ओर नहीं फूटती थी, जबकि उस घर में दूध की नदियाँ बहती थीं।
वह किसी मीठी, लोरी-सी गूँजती आवाज़ सुनने को तरस जाती, हालाँकि हर कमरे में रेडियो बजता रहता था।
अगर वह डैडी की देखरेख में होतीं… तो उन्हें कहाँ उसका मुँह चूमने की फुर्सत होती! वह अपनी कारोबारी व्यस्तताओं में सारा दिन बाहर रहते और रात को जब घर आते, तो फ़लकी सिसकते-सिसकते मुँह में चुसनी लगाए अपनी आया की बाँहों में सो चुकी होती।
वह आते ही धीमी आवाज़ में नौकरों से पूछते—
“बेबी सो गई है?”
“जी सर।”
“रोई तो नहीं थी?”
“नहीं सर।”
“उसकी तबीयत ठीक है न?”
“जी सर।”
“इस महीने उसे डॉक्टर अलवी के पास ले गए थे?”
“जी सर।”
“वज़न बढ़ रहा है न?”
“जी सर।”
“और बाकी सब ठीक है न?”
“ठीक है सर।”
कभी-कभी डैडी दबे पाँव उसके कमरे में आ जाते। वह झालरों वाले गुलाबी रंग के पालने में सो रही होती। उसके होंठों पर हल्की-सी थरथराहट होती और मासूम माथे पर एक महीन-सी शिकन मौजूद होती।
डैडी जाली वाला पर्दा उठाकर उसका चेहरा देखते और फिर उसे चूमे बिना ही वापस लौट जाते।
काश… वह जाग जाती।
“डैडी… डैडी…”
उसकी साँसें जैसे पुकारने लगतीं—
“मेरा मुँह चूम लीजिए। इस चाँद-से चेहरे की बलाएँ ले लीजिए। मैं आपके होंठों के स्पर्श को तरस गई हूँ। आपकी जगह जब ये नौकर लोग मेरा मुँह चूमते हैं तो मुझे घिन आती है… नफ़रत होती है।”
लेकिन डैडी दबे पाँव कमरे से निकल जाते।
मम्मी दूसरे देशों में जाकर बाक़ायदा फ़ोन किया करती थीं और आया से फ़ोन पर बार-बार पूछतीं—
“बेबी कैसी है?”
“बेबी का ख़याल रखा करो।”
और जब वापस आतीं तो बेबी के लिए ढेरों खिलौने, फ्रॉक, गाड़ियाँ और न जाने क्या-क्या लेकर आतीं।
इसलिए जब बेबी ने आँखें खोलीं तो उसके आसपास दुनिया भर के सपने और रंग-बिरंगे खिलौने थे। बेहद ख़ूबसूरत और क़ीमती कपड़े थे। खाने के लिए हर तरह की नेमत थी और हुक्म बजाने के लिए नौकर थे… क्योंकि उन्हें हुक्म बजाने की ही तनख़्वाह मिलती थी।
जिन चीज़ों की बहुतायत होती है, वही चीज़ें इंसान को डसने लगती हैं। ज़रूरत और अभाव ज़िंदगी की एक ज़बरदस्त हक़ीक़त है।
लेकिन वहाँ अभाव किस चीज़ का था?
सच्चे प्यार की …
माँ की ममता की… पिता के संरक्षण की…
मम्मी कहा करती थीं कि बच्चों को माता-पिता से दूर रखकर पालना चाहिए। इससे वे अनावश्यक भावनाओं और बेवकूफ़ाना आदतों से बचे रहते हैं। आत्मनिर्भर बनते हैं, बहादुर बनते हैं और अपने फ़ैसले ख़ुद करना सीखते हैं।
लेकिन फ़लकी ज़िद्दी और मनमौजी हो गई थी।
बहुत-से बिन माँगे खिलौने किसी आसिब की तरह उसके कमरे में बिखरे रहते और वह बड़ी बेरहमी से उन्हें तोड़ती-फोड़ती रहती। टूटे हुए खिलौनों की जगह आया अंदर से नए खिलौने लाकर रख देती।
“यह देखिए न, फ़लकी बीबी! यह आपका मम्मी पेरिस से लाई थीं। इसमें तेल डालने से इस गुड़िया का मुँह लाल हो जाएगा। फिर यह आँखें झपकाएगी और नमक लगाएगी…”
कई-कई बार फ़लकी उस लाल-मुँह वाली गुड़िया को बड़े गौर से देखती रहती। फिर उसे पकड़कर उसकी गर्दन मरोड़ देती।
“ओह माय गॉड! ये क्या कर दिया आपने, बेबी! दो सौ डॉलर का खिलौना कबाड़ कर दिया!”
“मुझे भी चाहिए… मुझे भी चाहिए…”
फ़लकी ज़मीन पर एड़ियाँ रगड़-रगड़कर रोने लगती।
अगर मम्मी उसकी आवाज़ सुन लेतीं तो देखने आ जातीं। फ़लकी की ज़िद सुनकर हँस पड़तीं और फिर कहतीं—
“आया, थोड़ा-सा कोका-कोला छोटे गिलास में डालकर बेबी को दे दो। वह पैक समझकर पी जाएगी।”
आया उनकी बात तुरंत मान लेती, क्योंकि उन्हें बच्चों को समझाने की ज़हमत से बचना था।
उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के बजाय वे ज़िद्दी हो जाते हैं।
आया को बेगम साहिबा का हुक्म हर हाल में मानना पड़ता था। लेकिन आया जितना ज़्यादा फ़लकी की हर बात मानती, फ़लकी उतनी ही ज़्यादा चिड़चिड़ी, ज़िद्दी और ख़ुदसर होती जाती।
वह आया के बाल नोच लेती, नौकरों के मुँह पर बर्तन दे मारती और अपनी ख़ूबसूरत फ्रॉक अलमारी से निकालकर चूल्हे में डाल देती।
कभी-कभी आया उसे बेहद क़ीमती फ्रॉक पहनाकर तैयार करती और कहती—
“देखिए बेबी! आपकी यह फ्रॉक मम्मी वॉशिंगटन से लाई थीं। बहुत क़ीमती है। यहाँ किसी बच्चे के पास ऐसी फ्रॉक नहीं होगी। यह जूते लंदन के हैं, बूट इटली के हैं और यह क्लिप… यह मम्मी ने हांगकांग के एयरपोर्ट से ख़रीदी थी।”
फ़लकी इतने सारे देशों के नाम सुनते ही आग-बबूला हो जाती। शायद उसे दूसरे देश अपने प्रतिद्वंद्वी लगते थे।
और फिर जब आया उसे तैयार करके बाहर निकल जाती, तो वह कहीं से कैंची ढूँढ़कर ले आती और अपनी पूरी फ्रॉक को काट-काटकर तार-तार कर देती। मोज़े काट डालती, जूते काट डालती…
और जब आया कमरे में वापस आती तो फ़लकी नंगी होकर टब में बैठी होती और साबुन का सारा झाग कालीन पर फैला होता।
किसी को उसे मारने या डाँटने की इजाज़त नहीं थी। वह जो भी करे, उसे इसकी पूरी आज़ादी थी…
लेकिन कभी-कभी फ़लकी का दिल चाहता कि उसे कोई मारे। उसके कोमल गाल थप्पड़ के लिए तरसते थे। उसे मार में ही मोहब्बत की शिद्दत दिखाई देती थी।
जब वह देखती कि नौकरों की माएँ अपने बच्चों को मार-मारकर डाँटती हैं और फिर उसी शिद्दत से उन्हें सीने से लगा लेती हैं, तो ऐसा लगता जैसे माँएँ बच्चों को मार नहीं रही हों, बल्कि उन पर अपने हक़ और मालिकाना हक़ का इज़हार कर रही हों।
लेकिन उस पर कोई अपना हक़ जताने वाला नहीं था।
जिस तरह माँगा हुआ कपड़ा पहना जाता है—बहुत संभाल-संभालकर… जिस तरह माँगी हुई चीज़ इस्तेमाल की जाती है—बड़ी सावधानी से… क्योंकि टूट जाए तो वापस करना पड़ता है।
क्या वह किसी को वापस करने के लिए थी?
मम्मी का रवैया तो हमेशा मेहमानों जैसा रहता था।
“ओह, डार्लिंग… ओह डियर… जाओ, अब सो भी जाओ।”
“स्वीटी, ज़रा परे हटो। मेरे साड़ी को गंदे हाथ मत लगाओ। यह नाज़ुक है। आज घर में कुछ आंटियाँ और अंकल आ रहे हैं। डियर, ड्रॉइंग रूम में मत आना। लोग कहेंगे, गंदी बच्ची है।”
“हाय स्वीटहार्ट! तुमने इतना क़ीमती गुलदान तोड़ दिया। मैंने इसे म्यूनिख से ख़रीदा था। ख़ैर, कोई बात नहीं, आया। इसे यहाँ से हटा दो, कहीं इसका कोई नुकीला टुकड़ा इसकी हथेली में न लग जाए… और सारे टुकड़े उठाकर बाहर फेंक दो।”
आख़िर वह एक थप्पड़ तो उसे मार सकती थीं! लेकिन मम्मी को फ़लकी को थप्पड़ मारने की भी फ़ुर्सत नहीं थी।
फ़लकी जान-बूझकर क़ीमती से क़ीमती चीज़ों को नुक़सान पहुँचाती थी। वह मम्मी को नाराज़ करना चाहती थी। वह चाहती थी कि उसकी अम्मी भी उसी तरह उस पर चिल्लाएँ, जिस तरह दूसरे बच्चों की माएँ अपने बच्चों पर चिल्लाती थीं।
वे भी फ़ैशन करती थीं, अंग्रेज़ी बोलती थीं, मेकअप करती थीं और पढ़ी-लिखी भी थीं। फिर भी ग़ुस्सा आने पर अपने बच्चों पर ख़ूब चिल्लाया करती थीं। और चिल्लाते हुए वे एकदम माँ जैसी लगती थीं।
मम्मी तो कभी नहीं चिल्लाती थीं।
मम्मी कहा करती थीं—
“ग़ुस्सा करने से नसें सिकुड़ जाती हैं, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ती हैं, मूड भी ख़राब हो जाता है। इससे त्वचा की ताज़गी और चेहरे की शगुफ़्तगी ख़त्म हो जाती है। इसलिए…”
वह ग़ुस्से को जितना हो सके, अपने से दूर रखती थीं। उन्हें अपने चेहरे की बहुत फ़िक्र थी। वह हर वक़्त मुस्कुराती रहतीं ताकि तरोताज़ा नज़र आएँ और उनकी मुस्कान के सामने डैडी भी कुछ नहीं बोल पाते थे।
मम्मी रात को सोने से पहले अपने चेहरे और शरीर की मसाज किया करती थीं। वह फ़लकी को प्यार करना भूल जातीं, मगर मसाज करना नहीं भूलती थीं।
वह आया को हुक्म देती थीं कि बच्ची को सात बजे सुला दिया करे, क्योंकि सभी तरक़्क़ी-पसंद देशों में बच्चे सात बजे सो जाया करते हैं।
सुबह उठकर मम्मी ख़ाली पेट एक गिलास पानी में नींबू का रस मिलाकर पीती थीं। सर्दियों में उसमें एक चम्मच शहद भी मिला लेती थीं। इसके बाद वह अपनी एक्सरसाइज़ वाली साइकिल पर बैठकर कसरत करतीं।
उनके पास व्यायाम करने की बहुत-सी मशीनें थीं। कभी हाथ उल्टे चलातीं, कभी सीधे। कभी टाँगों की कसरत करतीं और कभी पेट की।
फ़लकी पर्दों के पीछे छिपकर मम्मी के ये करतब देखा करती थी।
डैडी बेचारे उठकर नौकरों पर चिल्लाते हुए दफ़्तर चले जाते। उनके जाने के बाद मम्मी अपने चेहरे पर एक मास्क लगा लेतीं, बालों में रोलर लगातीं और गर्म पानी के शावर में बैठ जातीं। कभी-कभी वहीं बैठकर कॉफ़ी भी पीतीं।
ग्यारह बजे तक वह पूरी तरह तैयार हो जाती थीं, क्योंकि उनके दोस्तों के घेरे में कहीं न कहीं “कॉकटेल पार्टी” या “ब्रिज पार्टी” होती रहती थी।
जिस दिन ऐसी कोई पार्टी नहीं होती थी, उस दिन वह दोपहर में सोती थीं।
शाम को जब डैडी घर आते तो वह नए सिरे से तैयार होतीं। शाम को दोनों क्लब जाते और डिनर बाहर ही करते।
कभी-कभी अगर किसी के घर आने की उम्मीद होती तो दोनों घर पर ही रुक जाते।
और इस इतने बड़े महलनुमा घर, जिसका नाम “फ़लकबोस” था, उसमें फ़लकी बादलों की तरह इधर-उधर घूमती रहती… चीज़ें तोड़ती रहती… नौकरों को मारती रहती।
कहीं न कहीं से चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आती रहतीं। और अगर ऐसा कुछ न होता तो वह किसी भी कमरे में जाकर रेडियो तेज़ आवाज़ में चला लेती।
और जब मम्मी देश से बाहर चली जातीं… तो उस घर के दिन-रात और भी बेरंग हो जाते। मम्मी के रहते फिर भी कुछ रौनक़ रहती थी। यहाँ कुछ लोग आते रहते… कुछ जाते रहते… आवाज़ें आती रहतीं… फ़ोन आते रहते… शॉपिंग होती रहती…
मम्मी को ख़ूबसूरत कपड़ों का भी बहुत शौक़ था। उन्हें हर चीज़ की हवस थी… सिवाय औलाद के।
और एक बेटी की माँ बनने के बाद तो ऐसा लगता था जैसे उन्होंने डैडी पर कोई बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो।
वह हर वक़्त कहतीं—
“देखो, मेरी कमर में दो इंच का फ़र्क़ पड़ गया है। कहाँ…?”
डैडी उनकी कमर में बाँहें डालकर कहते—
“अभी तक तो तुम्हारी कमर मेरे एक ही हाथ में आ जाती है। तुम तो इस दुनिया की लाजवाब औरत हो।”
इस पर मम्मी बहुत इतरातीं।
मम्मी का दिल चाहता था कि दुनिया के सारे मर्द हर वक़्त उन्हीं की तारीफ़ करते रहें। अगर कोई शायर हो तो उनके क़सीदे लिखता रहे। अगर कोई अदीब हो तो उन पर किताबें लिखता रहे। अगर कोई चित्रकार हो तो उनकी तस्वीरें बनाता रहे। अगर कोई संगीतकार हो तो उनकी प्रशंसा में राग छेड़ता रहे।
मम्मी चाहती थीं कि उनके दोस्तों के घेरे में हर शख़्स उनका दीवाना हो। उनकी ख़ूबसूरती का ज़िक्र हर ज़बान पर हो… और फिर उनके सामने भी उसकी तारीफ़ की जाए।
उनके दोस्त और परिचित मम्मी की इस कमज़ोरी से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे, इसलिए उनकी तारीफ़ करना कभी नहीं भूलते थे।
वह ख़ूबसूरत थीं। नफ़ासत-पसंद और आकर्षक थीं… दौलतमंद थीं, मगर बुद्धिमत्ता का कोना बिल्कुल ख़ाली था।
और वह उस वक़्त बड़ी मज़ाक़िया लगतीं, जब इंटेलेक्चुअल बनने की कोशिश करतीं और ख़ुद को कला की पारखी साबित करने की कोशिश करतीं।
इसके लिए वह बेहद बेहूदा पेंटिंग्स भी महँगे दामों पर ख़रीद लेतीं। शायरों और अदीबों की महफ़िलें सजातीं, संगीत से भरी पार्टियाँ दिया करतीं। चित्रकारों की तस्वीरों की प्रदर्शनियाँ आयोजित करतीं। दिल खोलकर चंदा देतीं और दिल खोलकर ख़र्च करतीं। जहाँ कहीं उनका नाम हो रहा होता, उसी ओर दौड़ जातीं।
वैसे लोगों ने उनका नाम “सदा बहार” रख छोड़ा था। इसमें कोई शक नहीं था कि उनका शरीर और ख़ूबसूरती सचमुच सदा बहार थी। वह अपने शरीर और चेहरे का इतना ख़याल रखती थीं कि काफ़ी लंबे समय तक वह इक्कीस-बाईस साल की ही नज़र आती रहीं। इसमें उनकी कोशिशों का भी बहुत बड़ा हाथ था।
फ़लकी बड़ी हो गई, मगर उसके साथ हमेशा एक आया रहती थी। आया के चले जाने पर मम्मी को बहुत तकलीफ़ होती थी। इस वजह से वह आया के बहुत नख़रे उठाती थीं। एक आया के जाने से पहले ही दूसरी आया का इंतज़ाम कर देती थीं।
वह जम्बो जेट में बैठकर सारी दुनिया का सफ़र तो कर सकती थीं, मगर अपनी बच्ची को पंद्रह मिनट से ज़्यादा नहीं संभाल सकती थीं।
धीरे-धीरे फ़लकी ने स्कूल जाना शुरू कर दिया। वही कार, ड्राइवर और आया उसके साथ स्कूल जाते।
स्कूल में भी वह कोई ख़ास अच्छी नहीं थी। बच्चों पर वैसे ही उसकी मोटर कार का रौब पड़ गया था।
यह उन दिनों की बात है जब फ़लकी नौ साल की थी और चौथी कक्षा में पढ़ती थी।
फ़लकी की आया का दामाद मर गया और उसे अचानक छुट्टी लेकर जाना पड़ा। हालाँकि मम्मी ने कह दिया था कि वह दो दिन बाद ज़रूर वापस आ जाए, लेकिन वह वापस नहीं आ सकी।
उसका ख़त आया कि—
“दामाद के मरने से मेरी बेटी का दिमाग़ उलट गया है और जब तक मेरी बेटी ठीक नहीं हो जाती, मैं वापस नहीं आ सकूँगी।”
मम्मी एक अजीब-सी उलझन में फँस गईं। कमबख़्त ने न तो आने के बारे में ठीक से बताया था और न ही नौकरी छोड़ने के बारे में साफ़ शब्दों में कुछ लिखा था।
फिर भी उन्होंने दो-चार दिन इंतज़ार करने के बाद इधर-उधर दूसरी आया के लिए कहना शुरू कर दिया।
उन्हीं दिनों उन्होंने एक नया और जवान नौकर रखा था, जो मम्मी के कपड़े इस्त्री करता था, मेज़ पर बर्तन लगाता था और घर के बाकी छोटे-मोटे काम भी करता था।
फ़लकी को सुबह-सुबह आया के हाथों तैयार होने की आदत थी। वह सुबह-सुबह ख़ूब शोर मचाया करती थी। इससे मम्मी की नींद भी ख़राब होती थी, क्योंकि वह रात को बारह-एक बजे सोती थीं और नहीं चाहती थीं कि उनकी नींद में कोई ख़लल पड़े।
उन्होंने शेर ख़ान की ड्यूटी फ़लकी के कमरे में लगा दी।
फ़लकी को जाने क्यों शेर ख़ान बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। वह जिस तरह फ़लकी को देखता, उसे देखते ही फ़लकी को ग़ुस्सा आ जाता। उसे शेर ख़ान की नज़रें बड़ी अजीब लगती थीं, मगर उसकी शिकायत करना बेकार था। मम्मी ने फ़लकी के सारे छोटे-छोटे काम उसी के ज़िम्मे लगा दिए थे।
उस रात क्लब में न्यू ईयर की पार्टी थी। डैडी को अचानक एक कारोबारी सिलसिले के लिए कराची जाना पड़ गया था। हालाँकि वह मम्मी से बहुत माफ़ी माँगते हुए गए थे और साथ ही यह वादा भी किया था कि शाम तक लौटने की कोशिश करेंगे, मगर उन्होंने मम्मी से साफ़ कह दिया था कि वह उनके इंतज़ार में अपनी पार्टी बर्बाद न करें। अगर वह वापस आ गए तो ख़ुद ही क्लब पहुँच जाएँगे।
उस पार्टी के लिए मम्मी ने बेहद शानदार साड़ी मँगवाई थी। न्यूयॉर्क से वह एक महँगा कोट भी लाई थीं। दोपहर के कई घंटे उन्होंने ब्यूटी ट्रीटमेंट में बिताए थे।
शाम को छह बजे जब वह नए अंदाज़ में बाल कटवाकर घर में दाख़िल हुईं तो फ़लकी मचलने लगी। उसकी छठी इंद्रिय ने बता दिया था कि आज फिर मम्मी रात भर के लिए बाहर..जाने वाली हैं। शेर ख़ान ने जब मम्मी की साड़ी इस्त्री करके पलंग पर फैलायी तो फ़लकी ने अपना सारा ग़ुस्सा उस साड़ी पर निकाल दिया। उसने अपने गंदे हाथों से उसे मसल-मसलकर ख़राब कर दिया।
इस पर फ़लकी ने पहली बार शेर ख़ान के बाल नोचे और उसे बुरा-भला कहा। उसे डराया भी और धमकाया भी।
मम्मी तैयार होती रहीं और फ़लकी सिसक-सिसककर रोती रही। मम्मी मेकअप करती रहीं, उतारती रहीं और फ़लकी अपनी भीगी आँखों से उन्हें देखती रही।
उसने दिल ही दिल में तय कर लिया था कि वह आज मम्मी को जाने नहीं देगी, या फिर ख़ुद उनके साथ जाएगी।
मम्मी ने मेकअप करने में इतनी देर लगा दी कि रोते-रोते और सिसकते-सिसकते फ़लकी वहीं उनके बिस्तर पर सो गई।
मम्मी ने जब तैयार होकर उसकी तरफ़ मुड़कर देखा तो इत्मीनान की साँस ली। बच्ची सो गई थी।
ठीक आठ बजे पार्टी शुरू होनी थी और पौने आठ बजे मम्मी घर से निकल पड़ीं। जाते-जाते उन्होंने शेर ख़ान से कहा—
“शेर ख़ान! बेबी को मेरे कमरे से उठाकर उसके कमरे में ले जाओ। उसका हीटर ऑन कर देना और बेबी को अच्छी तरह कंबल ओढ़ा देना। मेरे आने तक तुम बेबी के कमरे में रहना। नींद आए तो वहीं कालीन पर सो जाना…
और हाँ, अगर साहब आज आएँ तो उन्हें क्लब भेज देना।”
“बहुत अच्छा, हुज़ूर।”
यह कहकर शेर ख़ान ने अदब से सिर झुका दिया।
मोटर गेट से बाहर निकल गई। फिर चौकीदार ने गेट बंद कर लिया।
शेर ख़ान बेगम साहिबा के कमरे में आ गया। कमरे में तरह-तरह की ख़ुशबुएँ फैली हुई थीं, जैसे अभी-अभी कोई वहाँ से तैयार होकर निकला हो।
उसने उस ख़ुशबू में एक मदहोश कर देने वाली साँस ली। फिर साहब की दराज़ से विलायती सिगरेट निकाली, लाइटर उठाया, एक सिगरेट सुलगाई और लंबे-लंबे कश लेने लगा।
सिगरेट पीने के बाद उसने बेगम साहिबा की बिखरी हुई चीज़ें…उसने उनके कपड़े उठाए। नाइटी और नाइट गाउन निकालकर हैंगर पर टाँग दिए। कमरे को बिल्कुल व्यवस्थित कर दिया।
फिर टीवी चला कर एक तरफ़ बैठ गया।
टीवी देखकर जब उसका दिल भर गया और अंग्रेज़ी फ़िल्म में उसे नंगी टाँगों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया, तो उसने टीवी बंद कर दिया।
दस बजने वाले थे, लेकिन साहब अभी तक नहीं आए थे। वह उठकर फ़लकी के कमरे में गया। वहाँ उसका हीटर ऑन किया, बिस्तर ठीक से लगाया और उसके बिखरे हुए खिलौने समेटकर अलमारी में रख दिए।
बेबी ने रात के कपड़े भी नहीं बदले थे और अगर बेगम साहिबा ने सुबह नाश्ते पर उसे रात के कपड़ों में देख लिया तो क़यामत बरपा कर देंगी।
उसने बेबी की नाइटी निकालकर पलंग पर रख दी। रोज़ ही वह उसके कपड़े बदलवाया करता था। आज सोते में ही बदलवा देगा। बस, ज़रा-सा मचलेगी।
यह सोचकर वह फिर बेगम साहिबा के कमरे में चला गया। वहाँ एक कैसेट रिकॉर्डर रखा था। ज़रा गाने सुनने को जी चाहा… उसने उसे चला दिया।
दो-चार और सिगरेटें पीं। ग्यारह बज गए। अब तो साहब के आने की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी।
उसने फ़लकी को उठाया और उसके कमरे में ले आया।
फ़लकी के गालों पर अभी तक आँसुओं के निशान थे। सोते हुए उसने ऐसा मुँह बनाया हुआ था, जैसे सारी दुनिया से रूठी हुई हो।
माशाअल्लाह, वह काफ़ी स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट थी। एक तगड़े नौजवान से भी उसे उठाना आसान नहीं था। कहने को वह नौ साल की थी, मगर क़द-काठी से बारह साल की लगती थी।
भरा-भरा शरीर, ख़ूबसूरत और सुडौल टाँगें, स्वस्थ गोल चेहरा, आँखों में शरारत और होंठ इतने नाज़ुक कि वह उन्हें दाँतों से काटती…
फ़लकी नींद में और भी भारी लग रही थी। शेर ख़ान ने उसे किसी तरह उठाकर कमरे में लाया और बिस्तर पर लिटा दिया। उसके सुनहरे बाल बिखरे हुए थे और आँसुओं के निशान अब भी चेहरे पर मौजूद थे।
उसने उसके जूते और मोज़े उतार दिए और उसे रात के कपड़े पहनाने की कोशिश करने लगा। फ़लकी नींद में भी बेचैन होकर हाथ-पाँव चला रही थी और बार-बार उससे छूटने की कोशिश कर रही थी।
शेर ख़ान ने बाहर देखा। घर में सन्नाटा था। उसने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया और फिर फ़लकी के कपड़े बदलने लगा।
रात अब पूरी तरह सुनसान और ख़ामोश हो चुकी थी। गेट का पहरेदार अपने केबिन में जा चुका था, जबकि बेगम साहिबा क्लब में अपने एक विदेशी मेहमान के साथ नृत्य कर रही थीं
जब फ़लकी की दिल दहला देने वाली चीख़ों से महल की दीवारें तक काँप उठीं… तो शेर ख़ान ने फ़लकी के मुँह पर इतनी ज़ोर से हाथ रख दिया कि उसकी साँस रुकने लगी और वह बेहोश हो गई।
तीन बजे रात थी। मम्मी झूमती-सी, पर्स लटकाए घर में दाख़िल हुईं। बाहर चौकीदार ने गेट खोलकर उन्हें सलाम किया था। ड्राइवर ने कार का दरवाज़ा खोलकर उन्हें बड़े अदब से बाहर उतारा था।
“अब तुम जाकर आराम कर दो।”
निहायत शाही अंदाज़ में उन पर ख़ुशामद और ख़ातिरदारी की बारिश करने के बाद जब मम्मी ने प्रवेश-द्वार को हाथ लगाया तो वह अपने आप खुल गया।
लाउंज में खड़े होकर उन्होंने शेर ख़ान को दो-तीन बार आवाज़ दी। जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो वह अपनी ऊँची एड़ी की चप्पलों की टक-टक के साथ गुनगुनाती हुई अपने कमरे की तरफ़ चली गईं।
कमरा अपने रोज़मर्रा के मुताबिक़ बिल्कुल व्यवस्थित था। होटल की तरह बिस्तर पर सफ़ेद चादरें और कंबल सलीके से लगे हुए थे। उनकी गुलाबी नाइटी और पायजामा हैंगर पर लटक रहे थे। गुलाबी सॉफ्ट स्लीपर बिस्तर के पास रखे थे। ड्रेसिंग टेबल भी साफ़ हो चुकी थी।
इसका मतलब था कि शेर ख़ान बेबी को उसके कमरे में सुलाकर जा चुका था।
“वेरी गुड…”
आज की पार्टी तो कमाल की थी। वैसे डैडी कभी भी मम्मी के किसी शौक़ में रुकावट नहीं बनते थे, मगर उनकी मौजूदगी में मम्मी को ख़ुद ही कुछ लिहाज़ आ जाता था।
आज उन्होंने खुलकर अपनी ख़ूबसूरती और अपने शरीर का प्रदर्शन किया था। पार्टी ख़ूब अच्छी रही थी। वह बहुत ख़ुश थीं… बेहद प्रसन्न…!
हालाँकि अब वह बुरी तरह थक चुकी थीं।
कपड़े बदलते ही बिस्तर में घुस गईं। गर्म-गर्म बिस्तर में उन्हें बहुत सुकून मिला। उसी समय उन्हें फलकी का ख्याल आया। रो-रोकर सो गई थी, जाने अब कैसी होगी? शेर खान भी नहीं आया था। वह कमबख्त वहीं सो गया होगा। उठकर एक नजर बच्ची को देख लें तो अच्छा है। जी तो नहीं चाह रहा था। न उनकी आदत में यह शामिल था कि रात को उठकर भी उसे देखा करें। जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें उठकर जाने पर मजबूर कर दिया।
फलकी के कमरे का दरवाजा खुला था। अंदर दाखिल हुईं तो उनकी चीख निकल गई।
खून में लथपथ फलकी को देखकर उन्हें तुरंत ही ख्याल आया कि उनकी जान जा चुकी है, मगर जरा होश संभालकर उसके करीब गईं। माथा छुआ… नब्ज देखी तो स्थिति कुछ-कुछ समझ में आई। जितनी घबराई हुई थीं, उतनी ही होशियार बनने की कोशिश भी कर रही थीं।
उस समय सुबह के चार बज रहे थे और डैडी के आने से पहले हर मामला ठीक हो जाना चाहिए था। उन्होंने उसी समय अपनी एक डॉक्टर सहेली को फोन करके बुलाया। फलकी को उठाकर अपने कमरे में ले गईं।
शेर खान क्यों गायब हो गया? यह बात उनकी समझ में आ गई थी। उन्होंने डरी-सहमी नौकरों के सामने इस बात को कोई ज्यादा महत्व नहीं दिया। उन्हें खुशी थी कि उस रात घर में और कोई नौकर नहीं था। आया भी नहीं थी और डैडी भी नहीं थे। डैडी संयोग से दो दिन बाद आए।
फलकी इसी तरह बीमार थी और मम्मी के कमरे में लेटी रहा करती थी। मम्मी ज्यादातर उसे सोने की दवा देकर सुला दिया करती थीं, मगर जब वह जागती तो चीखने-चिल्लाने लगती। वह अपने कपड़े फाड़ती और चीखकर कहती…“मुझे बचाओ! मुझे बचाओ! मुझे बचाओ!”
“मम्मी, इसे कह दो मुझे न छुए।”
“मम्मी, मुझे डर लगता है।”
“मम्मी, मुझे अपने पास सुला लो।”
डैडी उसकी इस हालत से परेशान हो गए तो मम्मी ने उन्हें समझा दिया, “आया के साथ बहुत हिली-मिली हुई थी। उसके जाने के बाद उदास हो गई है। एक रात सोते में डर गई थी। इसलिए मैं इसे अपने कमरे में ले आई हूँ… धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी।”
“तुम इसके लिए जल्दी किसी आया का बंदोबस्त करो।”
“देख रही हूँ। अब इस ज़माने में बिना सोचे-समझे नौकर नहीं रखे जा सकते।”
“और वह कमबख्त शेर खान क्यों भाग गया? कुछ और की देखभाल करें, कहीं कोई कीमती चीज चुराकर न भाग गया हो…”
“था, चला गया।”
“मैंने सब कुछ देख लिया है।” मम्मी सोचते हुए कहतीं। कमबख्त को जाना था।
हालाँकि वह जानती थीं कि वह इस घर की सबसे कीमती चीज चुराकर भाग गया है।
लेकिन फलकी धीरे-धीरे ठीक होने के बजाय और खराब होती गई। उसने खेल-कूद में हिस्सा लेना छोड़ दिया। वह स्कूल जाने से घबराती। जब किसी नए आदमी को देखती, चिल्लाने लगती। अपने कमरे में अकेली न बैठती। अगर कोई पास से भी गुजर जाता तो डरने लगती। कोई प्यार करने लगता तो उसके बाल नोच लेती। सारा समय चुपचाप बैठी शून्य में घूरती रहती। रंग मुरझाकर पीला हो गया था। ज्यादातर मम्मी के कमरे में ही रहती। बात-बात में रोती।
किसी से बात नहीं करती थी और खास तौर पर नौकरों के तो करीब ही नहीं जाती थी। उसकी आँखों में जैसे कोई भयानक घटना आकर ठहर गई थी, इसलिए उसकी खूबसूरत आँखें दहशत से भर गई थीं। फटी-फटी और दीवानी-सी आँखें…
डैडी कहते, “यह बैठी शून्य में क्या देखा करती है कि आँखें झपकना भी भूल जाती है?”
मम्मी कहतीं, “बच्चों पर अलग-अलग तरह के दौर आते हैं। इनकी इतनी चिंता नहीं करनी चाहिए।”
मम्मी उसे नियमित रूप से मनोचिकित्सक के पास ले जाया करती थीं। उसे फिर से एक सामान्य बच्ची बनाने के लिए वह रुपया पानी की तरह बहा रही थीं। बल्कि अपनी आदत के खिलाफ उसे ज्यादातर अपने साथ भी रखती थीं। मगर उसकी हालत में कोई फर्क नहीं आया था।
डरपोक तो वह इस कदर हो गई थी कि आया भी उसके करीब से गुजरती तो डरकर चिल्लाने लगती। स्कूल की अध्यापिकाएँ शिकायतें लिखकर भेजतीं कि यह तो वह कभी नहीं थी—खुशमिजाज, खुश रहने वाली और आक्रामक बच्ची—मगर अब हर समय डरी-सहमी एक कोने में बैठी रहती थी।
छुट्टी के समय दौड़कर गाड़ी में आ बैठती। अगर ड्राइवर उसे बाजू से पकड़कर उतारने लगता तो चिल्लाने लगती। कहती, “इसने मुझे छुआ क्यों है?”
शाम को मम्मी उसे घुमाने के लिए ले जातीं तो वह कार के शीशे चढ़ा लेती। कोई फकीर भी शीशे पर दस्तक देता तो चिल्लाने लगती।
बार-बार सपने में डर जाती। महीने में एक बार बुखार आ जाता।
नतीजा यह हुआ कि वह अपनी कक्षा में फेल हो गई। स्कूल से उसका मन उचट गया। इंसानों से मुँह मोड़ लिया और अलमारियों के पीछे छिपकर बैठी रहती।
मौसम-ए-बहार में मम्मी उसे अपने साथ यूरोप ले गईं। इस बार मम्मी ने यह ट्रिप फलकी के लिए खास तौर पर प्लान किया था।
बच्चे फरिश्ते होते हैं और फरिश्तों की रूह दागदार कर दी जाए तो उनके पंख…टूट जाते हैं।
फलकी के पंख टूट गए थे।
और यह बात मम्मी ने हर डॉक्टर, हर प्रोफेसर को बड़ी स्पष्टता से बताई थी, क्योंकि वहाँ कोई पर्दा नहीं था और वहाँ ऐसे घटनाएँ अक्सर सुनने में आती थीं। डॉक्टरों ने मम्मी को सलाह दी कि कुछ समय फलकी को उसके घर और उसके माहौल से दूर रखा जाए। और हर संभव कोशिश की जाए कि वह अपनी जिंदगी की इस दिल दहला देने वाली घटना को भूल जाए।
“बच्चों के मन में गाँठ पड़ जाती है और आप लोग ज़रा भावुक किस्म के होते हैं। इस घटना को ज्यादा महत्व न दें और ऐसा व्यवहार करें जैसे कोई खास बात हुई ही न हो।”
मम्मी ने वह पूरा एक साल विदेश में ही बिताया। फलकी को खूब घुमाया। खूब फिल्में दिखाईं। समुद्र के किनारे भी ले जाया करतीं। स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहनकर खुद भी नहाया करतीं और उसे भी तरह-तरह से समझातीं कि औरत चूँकि खूबसूरत चीज है, इसलिए उसका बेनकाब और बेपर्दा हो जाना ही बेहतर है।
फलकी का मासूम और कच्चा मन मम्मी का यह दर्शन नहीं समझ सकता था, मगर उसका दिल बहलता जा रहा था। दुनिया के रंग-बू में वह अपनी मसली हुई सूरत भूलती जा रही थी। मम्मी उसके चेहरे पर मुस्कुराहटों की नई चमक देखकर फूली नहीं समाती थीं।
पूरे डेढ़ साल बाद मम्मी वापस आईं तो फलकी पहले से ज्यादा स्वस्थ और बड़ी लगती थी। उसके लंबे सुनहरे बाल उसके गले में झूल रहे थे और वह ऑस्ट्रिया के समुद्र तटों की खुशमिजाज और बेफिक्र-सी हसीना लगती थी।
वापस आकर मम्मी ने उसे एक नए स्कूल में दाखिल कर दिया। नई लड़कियाँ, नया माहौल, नया स्कूल… और स्कूल भी अमेरिकन था। फलकी का दिल लग गया। वैसे मम्मी ने…एक और काम भी किया गया।
शाम को फलकी को बाकायदा क्लब ले जाया जाता। वहाँ सब लोग उसे हाथों-हाथ लेते। एक तो नाज़ली सदरुद्दीन की बेटी, उस पर इतनी खूबसूरत और शोख…
कभी डैडी गोल्फ खेलते रहते और वह अपने सुनहरे बाल लहराती हुई गेंद के पीछे दूर-दूर तक जाती।
कभी मम्मी कार्ड्स खेलती रहतीं और वह मम्मी के दोस्तों के कंधों पर… पीठों पर सवार रहती।
इस क्लब में घुड़सवारी का भी बंदोबस्त था। शाम को बाकायदा एक साईस उसे घुड़सवारी कराने ले जाता। कभी-कभी मम्मी किसी अंकल को साथ कर देतीं। इस क्लब में बेशुमार अंकल और बेशुमार आंटियाँ थीं।
क्लब की दुनिया फलकी को बहुत पसंद आई। कोई किसी बात को बुरा या अनुचित नहीं समझता था। ऐसा लगता था कि क्लब खुशगवार बातों और खुशफहमियों की एक अलबेली दुनिया है।
मम्मी किसी अंकल से कह देतीं, “इसे ज़रा बेबी को डांस सिखा दो।”
किसी से कहतीं, “इसे वायलिन बजाना सिखा दो।”
कोई अंकल उसे गाड़ी चलाना सिखाता। कोई कैरम बोर्ड के दाँव-पेंच सिखाता। कोई कोक पिलाने ले जाता।
बेशुमार अंकलों की गोदियों में हँसती-खेलती फलकी जवान हो गई थी।
उसने आँख ही क्लब में खोली थी। मैट्रिक करते ही कॉलेज में दाखिल हो गई। मगर बाकी सब लड़कियों से अलग रही। मम्मी ने उसके दिमाग में यह बात बिठा दी थी कि—
“अस्मत का विचार एक पुरानी और घिसी-पिटी परंपरा है। अस्मत कोई चीज़ नहीं होती। जिंदगी की बहुत-सी खुशियाँ हासिल करने के लिए इस सीमा को जल्दी तोड़ देना चाहिए। इतना कुछ हासिल करने के लिए थोड़ा-बहुत गँवाना भी पड़ता है। इस रोशन ज़माने के साथ चलने के लिए रोशनी को अपने साथ लेकर चलना चाहिए। अँधेरों को पीछे छोड़ देना चाहिए।”
फर्ज़ी और घिसी-पिटी परंपराएँ…
घिसे-पिटे विचार…
सुनी-सुनाई बातें…
मम्मी ने उसे इन सबसे नफरत करना सिखाया था। उन्होंने बचपन के एक दाग को धोने के लिए फलकी का पूरा जीवन-दर्शन ही बदल दिया था।
“प्यार करो और प्यार करवाओ।”
“उमंगों के साथ जियो।”
“जिस चीज से जी भर जाए, उसे छोड़ दो।”
“उसके लिए अपनी जिंदगी दुश्वार मत करो।”
ये मम्मी के उसूल थे।
मम्मी के कई दोस्त फलकी को बहुत पसंद करते थे। उन्होंने वक्त से बहुत पहले फलकी को बता दिया था कि वह कौन-सी कयामत उठाने वाली है। कई लोग तो मम्मी के सामने ही उससे इश्क का इज़हार करते, मगर कभी फलकी ने हामी नहीं भरी।
बल्कि जब लोग कहते—
“मिसेज़ सदरुद्दीन! हमें तो अभी तक समझ नहीं आई। आप दोनों में से कौन…”“ज़्यादा खूबसूरत कौन है?”
तो नाज़ली सदरुद्दीन बड़ी अदा से ठहाका लगातीं। उन्हें यकीन था कि वह हमेशा फलकी से ज़्यादा खूबसूरत और दिलकश रहेंगी, इसलिए उन्हें फलकी से कोई ईर्ष्या नहीं होती थी।
कॉलेज में भी फलकी को बहुत खुला माहौल मिला। एक कार, बेशुमार कपड़े, फुर्सत, पार्टियाँ, दावतें, फिल्में और बॉयफ्रेंड्स।
ज़्यादा से ज़्यादा लड़कों को अपने इश्क़ में गिरफ्तार करना और उन्हें तड़पाना उसका सबसे पसंदीदा शौक बन चुका था।
जब मम्मी ने कोई रोक-टोक ही नहीं रखी और साफ़ कह दिया कि अस्मत कोई चीज़ नहीं होती, तो फिर फलकी अपने मन के नीच और बेलगाम जज़्बातों को क्यों रोकती? अंग्रेज़ी उपन्यासों और अंग्रेज़ी फिल्मों ने तो सोने पर सुहागा कर दिया।
अपने तन की दौलत लुटाते हुए उसे कभी दुख नहीं हुआ और मन की आँखें खोलकर देखने की उसे कोई आरज़ू भी नहीं थी।
वह खूबसूरत थी… जवान थी… दौलतमंद थी…
ज़िंदगी का भरपूर आनंद लेने के लिए ही थी और मम्मी ने कहा था, “जवानी के पेड़ पर बार-बार फल लगते हैं और बार-बार उनका आनंद लेना चाहिए।”
यों…
अनजाने में…
या फिर बेलगाम आज़ादी के नशे में… वही होता रहा, जो नहीं होना चाहिए था…
उसे क्या पता था कि मोहब्बत क्या होती है? शौहर किसे कहते हैं? शादी का बंधन क्यों बनाया गया है?
शादी का मकसद क्या है?
घर-बार किसे कहते हैं?
बच्चे क्यों ज़रूरी होते हैं? और यह गृहस्थी…!
और यह जागरूकता… समझ… आत्मबोध…
ये सब… ये सारे राज़ उस पर “राज़दाँ” में आकर खुले। राज़दाँ ने उसे ज़िंदगी की असली समझ दी, तो उसके अवचेतन के बंद रोशनदान अपने-आप खुल गए।
यहाँ वह अकेली रहती थी और सोचती रहती थी।
तन्हाई में इंसान का दिमाग एक ऐसी मशाल बन जाता है, जिसकी रोशनी बहुत दूर तक जाती है। जहाँ-जहाँ वह उस रोशनी को डालती, वहाँ छिपी हुई घटनाएँ दिखाई देतीं। वह उन्हें कुरेदती और फिर आगे बढ़ जाती।
उसने अपने बारे में इतना ज़्यादा सोच लिया था कि उसके मन में अपनी बीती हुई ज़िंदगी की एक पूरी, जुड़ी हुई कहानी बन गई थी। तब उसे अपना आप बहुत घटिया और तुच्छ लगने लगा था।
आफ़ाक उसे एक महान देवता जैसा दिखाई देता और वह खुद अपने आपको सड़क पर पड़ी एक जूती से भी तुच्छ समझने लगी थी।
शायद वह यह सब अपने दिल में ही दबाए रखती… अगर एक दिन…
एक तेज़ हवा का झोंका न आया होता।
आज उसका दिल चाह रहा था कि इस बदली हुई लड़की को वह अपने सीने से लगा ले।
वह अपने बिस्तर से उठकर उसके पलंग पर आकर बैठ गया और बोला,
“क्या आपने कभी नमाज़ पढ़ी है?”
फलकी ने हैरानी से उसकी आँखों में देखते हुए न में सिर हिला दिया।
“नमाज़ पढ़ने से भी उतना ही सुकून मिलता है, जितना गुनाहों का इक़रार करने से।”
“लेकिन मैंने तो कभी नमाज़ नहीं पढ़ी… अब अल्लाह मियाँ क्या कहेंगे?”
“अल्लाह मियाँ कुछ नहीं कहते। अल्लाह का दर हमेशा खुला रहता है। वह कभी अपने बंदों से मायूस नहीं होता। बल्कि चाहता है कि उसके बंदे उसे पुकारें। नमाज़ पढ़नी आती है?”
“जी…” उसने नज़रें झुकाते हुए कहा।
“उठिए, आज मेरे साथ नमाज़ पढ़िए।”
जब फलकी वुज़ू करके लॉन्ज में आई, तो सुनहरी और बैंगनी-सी भोर फूट रही थी। आसमान के धूसर किनारों से नूर से भरे बादल फटते और बिखरते जा रहे थे।
एकाएक उसके दिल में एक अजीब-सा दर्द उठने लगा।
क्या… क्या ख़ुदा इस नूरानी सुबह में छिपा है?
क्या… क्या… ख़ुदा यहीं आस-पास है… दिल में है… कहाँ है…?
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
“तो तुम अपने रब की कौन-कौन-सी नेमतों को झुठलाओगे?”
आफ़ाक के कमरे से तिलावत की बेहद दर्दभरी और दिल में उतर जाने वाली आवाज़ आ रही थी।
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