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Home»Hindi Novel»Lagan ( hindi novel )

Lagan (Hindi Novel) Part 8

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailAugust 6, 2026Updated:August 6, 2026 Lagan ( hindi novel ) No Comments68 Mins Read
Lagan Hindi Novel Part 8,novelkistories Feature Image
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Lagan part 8…

 

“आपको और कुछ चाहिए?” उसने जाने से पहले पूछा।

“चाहिए।” आफ़ाक़ ने गंभीर आवाज़ में कहा।

वह सिर से पाँव तक जैसे इंतज़ार बनकर खड़ी रह गई।

“पहले चाय बनाइए।”

फलकी ने हमेशा की तरह उसके प्याले में चाय बनाकर सामने रख दी।

“एक प्याली और बनाइए।”

फलकी ने दूसरी प्याली भी बना दी।

“वहाँ कुर्सी पर बैठकर यह चाय पी लीजिए।”

वह कुर्सी पर बैठकर चाय पीने लगी। अब तक फलकी समझ चुकी थी कि उसके सामने बहस या आनाकानी नहीं करनी चाहिए। उसकी भलाई इसी में थी कि एक रोबोट की तरह उसकी हर बात मान ले।

वह चुपचाप चाय पीती रही और आफ़ाक़ एक पत्रिका के पन्ने पलटता रहा।

चाय ख़त्म करके वह उठी, अपना प्याला ट्रे के निचले खाने में रख दिया और फिर चुपचाप खड़ी हो गई।

आफ़ाक़ ने नज़र उठाकर उसकी ओर देखा।

सिर से पाँव तक उसे गौर से देखा, फिर पूछा,

“अपने इस हुलिए के बारे में आपका क्या ख़याल है?”

फलकी ने घबराई हुई नज़रों से खुद को देखा। अभी तक उसके कपड़ों पर घास के तिनके चिपके हुए थे। सामने शीशे में नज़र गई तो उसके बाल ऐसे बिखरे हुए थे, मानो उनमें किसी चिड़िया ने घोंसला बना लिया हो।

फलकी ने शर्म से सिर झुका लिया।

“और ये आपके कपड़े क्यों फटे हुए हैं?”

“मैं अभी जाकर कपड़े बदल लेती हूँ।” यह कहकर वह मुड़ने लगी।

“ठहरिए। मौसम बदल गया है। क्या आपके पास इस मौसम के नए कपड़े हैं?”

“जी… हैं तो… लेकिन मेरे पास ऐसे कपड़े नहीं हैं जिन्हें पहनकर आराम से काम किया जा सके। काम करते समय वे कहीं अटक जाते हैं या जल जाते हैं। मैं क्या करूँ?”

“फिर आपने मुझसे पहले क्यों नहीं कहा?”

“डर लगता था।”

“क्या मुझसे डर लगता था कि मैं आपको खा जाऊँगा?”

“नहीं… लेकिन आप बहुत ताने देते हैं।”

आफ़ाक़ कुछ देर तक चुप रहा। फिर बोला,

“कल आप मेरे साथ बाज़ार चलिए और अपनी पसंद के कपड़े खरीद लीजिए।”

फलकी को अपनी सुनने की शक्ति पर ही विश्वास नहीं हुआ। वह हैरानी से आँखें फैलाकर आफ़ाक़ की ओर देखने लगी।

“अगर मेरे साथ नहीं जाना चाहतीं, तो ड्राइवर के साथ चली जाइए।”

फिर भी फलकी को यकीन नहीं आया।

वह चुपचाप खड़ी रही।

“क्या मैं आपको लिखित में देकर दूँ, तब यकीन होगा?”

“नहीं…”

“फिर?”

“मैं… मैं जाती हूँ।”

इतना कहकर वह जल्दी से कमरे से बाहर निकल गई। उसे डर था कि कहीं आफ़ाक़ अपनी बात से मुकर न जाए।

“…कहीं अपनी बात से मुकर न जाए।”

अगली सुबह जब आफ़ाक़ नाश्ता करके जाने लगा, तो फलकी ने कहा,

“मैं बाज़ार नहीं जाऊँगी।”

“क्या मेरे साथ जाना पसंद नहीं… या कोई और बात है?”

“ऐसी कोई बात नहीं। मेरे पास बाज़ार जाने का समय नहीं है। आप अपनी पसंद के कपड़े खरीद लाइए।”

“क्या आप मेरी पसंद स्वीकार कर लेंगी?”

“जी हाँ।” फलकी ने नज़रें झुका लीं।

आफ़ाक़ कुछ देर तक उसे घूरता रहा, लेकिन फलकी ने नज़रें नहीं उठाईं। उसे पता था कि आफ़ाक़ उसे देख रहा है। अगर वह उसकी ओर देखती, तो वह आँखों-ही-आँखों में उसके जवाब की पुष्टि करना चाहता।

इसीलिए वह चुपचाप ज़मीन की ओर देखती रही।

“अजीब… अविश्वसनीय घटनाएँ हो रही हैं।”

यह कहकर आफ़ाक़ बाहर निकल गया।

आफ़ाक़ की यह बात सुनकर फलकी को हँसी भी आई और थोड़ी हैरानी भी हुई। सच तो यह था कि आफ़ाक़ को भी शायद यकीन नहीं हो रहा होगा।

वह सोचने लगी कि वह उसके साथ बाज़ार क्यों जाए? वहाँ तो वह उसे सबके सामने शर्मिंदा करेगा। बात-बात पर ताने देगा, दुकानदारों के सामने उसकी खिंचाई करेगा। और अगर संयोग से रास्ते में उसका कोई जान-पहचान वाला मिल गया, तो उसके सामने भी उसकी छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाएगा।

कहीं ऐसा न हो कि बाज़ार जाकर वह कोई नई मुसीबत ही खड़ी कर दे।

बड़ी मुश्किल से उसकी ज़िंदगी में कुछ सुकून आया था। बहुत कठिनाई के बाद उसकी दिनचर्या एक ढर्रे पर आई थी। इस परीक्षा जैसी ज़िंदगी में…

रास्ते भर वह ऐसे चल रही थी, जैसे कोई काँच के टुकड़ों पर चल रहा हो। अब तक काफ़ी सफ़र तय हो चुका था, फिर वह क्यों कोई नई मुसीबत मोल ले?

यह भी हो सकता है कि आफ़ाक़ उसे परख रहा हो। वह तो बड़ा चालाक है। कई दिनों से उसे कोई नई बात नहीं मिली थी जिस पर वह उसे टोक सके। लॉन वाला मामला भी अब सुलझ चुका था, इसलिए शायद वह कोई नया झगड़ा शुरू करना चाहता हो।

यही सब सोचकर उसने बाज़ार जाने से साफ़ इनकार कर दिया।

वह मन ही मन संतुष्ट थी कि कम-से-कम इस बार उसने एक समझदारी भरा फ़ैसला लिया है।

फिर वह खाना बनाने के लिए रसोई में चली गई।

वहाँ अब भी ट्रांजिस्टर रेडियो रखा हुआ था।

उसने रेडियो को ऐसे देखा, जैसे वह कोई साँप हो, जिसे छेड़ते ही वह डस लेगा। न जाने कितने दिनों से उसने रेडियो देखा तक नहीं था। न कोई गीत सुना था, न कोई धुन उसके कानों में गूँजी थी। गीतों और आवाज़ों के बिना यह घर कितना सूना और ठंडा लगता था। उसके कान भी जैसे संगीत सुनना ही भूल गए थे। वह सोचने लगी, पता नहीं अब रेडियो सुनना कैसा लगेगा।

डरते-डरते उसने रेडियो के नॉब पर हाथ रखा। फिर हिम्मत करके उसे घुमा दिया।

अचानक कई तरह की आवाज़ें एक साथ सुनाई देने लगीं। एक स्टेशन पर तेज़ आवाज़ में कोई गीत बज रहा था। उसकी धुन इतनी ऊँची थी कि फलकी घबराकर तुरंत रेडियो बंद कर बैठी।

उसे ऐसा लगा मानो घर की दीवारें चीख रही हों। चारों ओर तबले, सारंगी और दूसरे साज़ एक साथ गूँज रहे हों।

“तौबा… क्या संगीत भी इतना डरावना हो सकता है!”

वह वहाँ से हट गई और अपने काम में लग गई।

करीब बारह बजे, जब उसे थोड़ी फुर्सत मिली, तो उसके मन में फिर ख़याल आया कि रेडियो चलाकर देखना चाहिए।शायद आफ़ाक़ उसे यहीं भूल गया था। हो सकता है कल उठाकर अपने कमरे में ले जाए या फिर वापस दफ़्तर ही ले जाए। उसने सोचा, थोड़ी देर गीत सुन लेने में क्या हर्ज़ है?

उसने रेडियो की आवाज़ धीमी कर दी और किसी स्टेशन पर लगा दिया। मधुर सुरों में संगीत बजने लगा। वही उद्घोषक की आवाज़ थी, वही गीत थे—लगभग सभी पहले सुने हुए। प्रस्तुत करने का अंदाज़ भी वैसा ही था। सब कुछ पहले जैसा ही था।

लेकिन उसकी ज़िंदगी बदल चुकी थी।

उसकी शादी को पूरे नौ महीने हो चुके थे और इन नौ महीनों में न जाने क्या से क्या हो गया था।

फलकी अब वह पहले वाली फलकी नहीं रही थी। उसके दिन और रात भी पहले जैसे नहीं रहे थे। आसमान वही था, ज़मीन भी वही थी। दुनिया की कोई चीज़ नहीं बदली थी, लेकिन इंसान बदल जाता है।

वह टूटता रहता है…

संवरता रहता है…

बिखरता रहता है…

और फिर भी जीता रहता है।

शायद इसी का अर्थ है कि इस पूरी कायनात में सबसे मज़बूत चीज़ इंसान ही है।

इंसान, जो दुनिया की हर चीज़ से ज़्यादा नश्वर है।

दुनिया की हर वस्तु की एक निश्चित उम्र होती है—घास, पौधे, पेड़, नदियाँ, समुद्र, इमारतें और न जाने क्या-क्या। लेकिन इन सबमें सबसे कम उम्र इंसान की होती है।

यही इंसान है, जिसके हाथों में इन सब चीज़ों को बनाने की शक्ति है। जिसकी बुद्धि ने दुनिया को अनगिनत अजूबों से भर दिया है। हर दिन नई-नई खोजें होती हैं, नए-नए रास्ते निकलते हैं। इंसान अपनी बुद्धि के अनगिनत चमत्कार इस दुनिया में छोड़ जाता है।

लेकिन…

वह स्वयं नश्वर है।

वह ढलने वाला है।

एक दिन मिट जाने वाला है।

वह बस एक बुलबुला है…

एक क्षण है…

एक बूँद है…

और अंततः…

मिट्टी है।

जब यही इंसान ज़िंदगी से जूझता है, तो कितना मज़बूत बन जाता है। वह युद्ध लड़ता है, बीमारियों का सामना करता है, नदियों का रुख मोड़ देता है और पूरी दुनिया को मिटा देने तक की योजनाएँ बना डालता है।

एक दिन वह सिंहासन पर होता है, तो दूसरे ही दिन फाँसी के तख़्ते पर। कभी मख़मली बिस्तरों पर सोता है, तो कभी जेल की अँधेरी कालकोठरी भी झेल लेता है। कभी सम्राट बनता है, तो कभी गलियों में भिखारी बनकर भटकता है।

हर हाल में, हर मौसम में और हर रूप में वह अपने आपको ढाल लेता है।

वाह! क्या अद्भुत रचना है इंसान।

यही तो आत्मबोध है।

उसका दिल कहने लगा—

“कम-से-कम अब तुम्हें इतना तो समझ में आ गया होगा। अगर शादी से पहले कोई तुमसे कहता कि तुम्हें ऐसे माहौल में रहना पड़ेगा, तो तुम साफ़ कह देतीं—’मैं तो मर जाऊँगी। एक दिन भी ज़िंदा नहीं रह सकूँगी।’

लेकिन आज देखो… तुम न सिर्फ़ ज़िंदा हो, बल्कि हालात से समझौता भी कर चुकी हो। जी रही हो, खाती हो, पीती हो, अपनी इच्छा के विरुद्ध बातें भी करती हो, और फिर भी ऐसा जताती हो जैसे बहुत खुश हो।

और अगर परिस्थितियाँ इससे भी अधिक कठिन हो जाएँ, तब भी तुम जीती रहोगी। क्योंकि न मरना इंसान के बस में है, न जीना।”

“चलो, फलकी बेगम! उठो, चपातियाँ बनाओ। किस सोच में डूबी हुई हो? अब तो तुम दार्शनिक भी बनती जा रही हो।”

“यह सब अल्लाह की देन है।”

शाम को जब आफ़ाक़ घर लौटा, तो उसके हाथों में कई लिफ़ाफ़े थे। आते ही उसने वे सारे लिफ़ाफ़े पलंग पर रख दिए। फिर उसने फलकी को आवाज़ देकर कहा,

“अपने कपड़े…”

फलकी ने पहले आफ़ाक़ की ओर देखा, फिर पलंग पर बिखरे हुए लिफ़ाफ़ों की तरफ़। कुछ कपड़े लिफ़ाफ़ों से बाहर झाँक रहे थे और कुछ अब भी उनके अंदर थे।

उसने एक-एक करके सभी लिफ़ाफ़े खोल दिए। उनमें आठ-दस सूट थे। सभी बेहद ख़ूबसूरत प्रिंट वाले, बेहतरीन और उम्दा कपड़े के बने हुए। ज़्यादातर बढ़िया कॉटन के थे, जो गर्मियों के मौसम के लिए बिल्कुल उपयुक्त थे।

फलकी कपड़े को हाथ लगाकर उसकी महीन बनावट महसूस कर रही थी कि तभी आफ़ाक़ ने पूछा,

“बताइए, क्या यह कपड़ा पसंद आया?”

“बहुत अच्छा है।” फलकी ने धीमे स्वर में कहा।

आफ़ाक़ बोला,

“आप पर सूती कपड़ा ही अच्छा लगेगा। और सच कहूँ तो मुझे किसी भी चीज़ में मिलावट पसंद नहीं है—न मोहब्बत में, न शक्ल-सूरत में, न दोस्ती में, न रिश्तों में और न ही खाने-पीने की चीज़ों में।

मुझे या तो प्योर कॉटन (Pure Cotton), प्योर वूलन (Pure Woollen) या प्योर सिल्क (Pure Silk) पसंद है। कृत्रिम (Synthetic) चीज़ें मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। इसलिए मैं बनावटी चीज़ों से कभी प्रभावित नहीं होता।”

“बाक़ी सब तो मेरी समझ में आ गया,” फलकी ने हिम्मत करके पूछा, “लेकिन शक्ल-सूरत में मिलावट कैसे होती है?”

आफ़ाक़ मुस्कराया और बोला,

“ज़रूरत से ज़्यादा मेकअप, नकली पलकें, नकली बाल, नकली नाखून… और न जाने क्या-क्या। अब कहाँ तक गिनाऊँ? आप ख़ुद एक औरत हैं, अच्छी तरह जानती हैं कि आजकल औरतें अपने सौंदर्य में कितनी मिलावट कर लेती हैं।”

फिर उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“शायद इसी वजह से आजकल की लड़कियाँ मुझे ज़्यादा प्रभावित नहीं कर पातीं।”

फलकी चुप रही।

फलकी कहना तो यह चाहती थी कि ज़रूरी नहीं, आजकल की सभी लड़कियाँ बनावटी हों। लेकिन वह कुछ कह न सकी। उसे लगा, कहीं आफ़ाक़ यह न समझ ले कि वह अपनी ही सफ़ाई दे रही है।

इसलिए उसने बात वहीं छोड़ दी।

“क्यों, क्या मैंने कुछ ग़लत कहा?” आफ़ाक़ ने पूछा।

“मेरी इतनी हिम्मत कहाँ कि मैं ऐसा सोचूँ?” फलकी ने शांत स्वर में उत्तर दिया।

उसका यह जवाब सुनकर आफ़ाक़ ज़ोर से हँस पड़ा।

“कम-से-कम मैंने आपको बोलना तो सिखा दिया।”

“आपने मुझे और भी बहुत कुछ सिखाया है।” फलकी ने सहजता से कहा।

“लाइए, इसी बात पर हाथ मिलाते हैं।”

आफ़ाक़ ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। फलकी ने झिझकते हुए अपना ठंडा हाथ उसके हाथ में रख दिया।

हाथ मिलाते ही आफ़ाक़ को एहसास हुआ कि उससे कुछ अनुचित हो गया है। फलकी का हाथ उसके हाथ में हल्का-सा काँप उठा। उसने बिना हाथ दबाए तुरंत उसका हाथ छोड़ दिया।

फलकी अपने तेज़ धड़कते दिल को सँभालते हुए सारे कपड़े तह करने लगी। फिर कपड़ों का बंडल उठाकर उसने आफ़ाक़ की ओर देखा और पूछा,

“लेकिन इन्हें सिलवाऊँगी कहाँ से?”

“आप ख़ुद सिलेंगी।”

“मैं…? मुझे तो सिलाई करना नहीं आता।”

“जब आप यहाँ आई थीं, तब आपको कुछ भी नहीं आता था। लेकिन अब आप यह नहीं कह सकतीं कि आपको कुछ नहीं आता। कम-से-कम अब आप यह दावा तो कर सकती हैं कि आप एक गृहिणी बनने की राह पर हैं।”

फलकी मुस्कराकर बोली,

“लेकिन सिलाई में सबसे ज़रूरी काम तो कपड़ा काटना होता है। मुझे न शलवार काटनी आती है, न क़मीज़।”

“सिलाई मशीन चलानी तो आती है?”

“जी हाँ। मैं सिलाई मशीन चलाया करती थी। कभी-कभी अपने कपड़ों की सिलाई भी कर लिया करती थी।”

“या फिर कपड़ों को तंग करते-करते अब हमें तंग करने आ गई हैं?”

आफ़ाक़ फिर अपने चुटीले अंदाज़ में बोल पड़ा।

फलकी के माथे पर हल्की-सी शिकन उभर आई।

आफ़ाक़ ने फिर कहा,

“ऐसा कीजिए… अपनी कोई पुरानी क़मीज़ और शलवार पूरी तरह उधेड़ लीजिए। फिर उसके ऊपर कागज़ रखकर उसका पैटर्न बना लीजिए। उसी कागज़ की मदद से एक नया सूट काटकर सिलिए। पहले उसे पहनकर देखिए। अगर वह ठीक बन जाए, तो फिर अल्लाह का नाम लेकर बाकी सारे कपड़े भी सिल लीजिए।”

सलाह वाक़ई बहुत अच्छी थी।

फलकी को हैरानी हुई कि यह बात आफ़ाक़ के दिमाग़ में कैसे आ गई। यह ख़याल तो शायद उसे ख़ुद आना चाहिए था।

“लेकिन… सिलाई मशीन कहाँ से लाऊँगी?” उसने पूछा।

“अगर मैं मशीन का इंतज़ाम कर दूँ, तो मुझे इनाम में क्या मिलेगा?”

“आप… कैसे?”

“अगर अभी इसी वक़्त आपके सामने मशीन रख दूँ, तो क्या देंगी?”

फलकी के दिल में आया कि कह दे, “मेरे पास देने के लिए है ही क्या?” लेकिन वह कुछ न बोली। बस हैरानी से उसकी ओर देखती रह गई।

“आइए, मेरे पीछे-पीछे।”

आफ़ाक़ उसे एक स्टोर-रूम में ले गया। वहाँ एक अलमारी के अंदर सिंगर की सिलाई मशीन रखी हुई थी।

उसने मशीन बाहर निकाली, उसकी धूल साफ़ की और मेज़ पर रख दी।

“यह मशीन बिजली से भी चलती है और हाथ से भी। जिस तरह चाहें, वैसे चला सकती हैं।”

“और यह मशीन किसकी है?” फलकी की हैरानी अब भी कम नहीं हुई थी।

“लोहे की ही है।” आफ़ाक़ ने पूरी गंभीरता से जवाब दिया।

फलकी उसकी बात सुनकर उलझन में पड़ गई। तब वह मुस्कराकर बोला,

“मेरी अम्मी पिछले साल जब यहाँ आई थीं, तो अपनी सलीक़ेमंद बहू के लिए यह मशीन तोहफ़े में लाई थीं।”

“बहू के लिए?”

“हाँ। उनका ख़याल था कि पहले से लाकर रख देनी चाहिए। हो सकता है मेरी होने वाली बहू सिलाई में माहिर हो और उसे आते ही इसकी ज़रूरत पड़ जाए।”

वह आगे बोला,

“मेरी अम्मी ऐसी और भी बहुत-सी चीज़ें लाकर रख गई हैं… लेकिन उस बहू के लिए जो इस घर में रहना पसंद करे। अगर आप चाहें, तो इस मशीन का इस्तेमाल कर सकती हैं। इसके अंदर कैंची, धागे, सुइयाँ, फीते और सिलाई की ज़रूरत का लगभग सारा सामान मौजूद है।”

फलकी ने सिलाई मशीन उठाई और अपने कमरे में रख दी।

अगले दिन सुबह घर का काम निपटाने के बाद उसने आफ़ाक़ की बताई हुई तरकीब अपनाई। सचमुच वह बहुत काम की साबित हुई।

उसने अपनी एक पुरानी क़मीज़ और शलवार का पैटर्न बनाकर नए कपड़े की कटिंग की। जब कपड़ा कट गया, तो उसे सिलने का उत्साह भी बढ़ गया।

पूरा दिन मेहनत करके उसने अपना सूट सिल लिया।

शाम को जब उसने वह सूट पहनकर देखा, तो खुद हैरान रह गई।

सूट उसे बिल्कुल ठीक फिट आया था। बस एक कमी रह गई थी—गला गोल होने के बजाय थोड़ा टेढ़ा बन गया था और सिलाई की टाँकें भी कुछ मोटी-मोटी दिखाई दे रही थीं।

लेकिन उसने सोचा, यह सब तो अभ्यास से ठीक हो जाएगा।

कम-से-कम अब उसे यह भरोसा हो गया था कि वह अपने कपड़े ख़ुद सिल सकती है और उसे आफ़ाक़ के सामने शर्मिंदा भी नहीं होना पड़ेगा।

उसका मन ही नहीं हुआ कि वह नया सूट उतारे। वही पहने हुए वह पूरे घर में दौड़-दौड़कर काम करती रही।

जान-बूझकर वह कई बार आफ़ाक़ के सामने से गुज़री, इस उम्मीद में कि शायद वह उसके नए सूट पर एक नज़र डाले या कुछ कहे।

लेकिन आफ़ाक़ ने जैसे उस पर ध्यान ही नहीं दिया।

यह देखकर उसका मन बुझ-सा गया।

कल तो उसी ने कपड़ा लाकर दिया था, और आज उसे जैसे याद ही नहीं रहा।

रात तक वह आफ़ाक़ के आगे-पीछे घूमती रही, लेकिन सब व्यर्थ रहा। आखिर वह सोने के लिए अपने कमरे में चली गई।

आज वह चाहती थी कि उसकी मेहनत की कोई तारीफ़ करे। इसी उम्मीद में उसने अपने नए कपड़े भी नहीं बदले थे।

थोड़ी देर बाद जब आफ़ाक़ कमरे में आया, तो फलकी आईने के सामने खड़ी अपने आपको देख रही थी। उसने आईने में अपनी परछाईं देखते हुए पूछा,

“कैसा है?”

“जिस्म… या सूट?”

“बहुत मज़ाकिया हैं।” फलकी ने मन ही मन कहा।

फिर बोली,

“मैंने सूट के बारे में पूछा था। यह मैंने आज ही सिलकर पहना है।”

“अच्छा…” आफ़ाक़ ने “अच्छा” शब्द को थोड़ा लंबा खींचते हुए कहा। “अब समझा। मैं तो समझा था कि आप अपने जिस्म की तारीफ़ सुनना चाहती हैं।”

फिर वह बोला,

“यह तो आप भी जानती हैं और मैं भी, कि आप एक ख़ूबसूरत जिस्म की मालकिन हैं। लेकिन उस जिस्म का क्या फ़ायदा, जिसकी खोपड़ी में दिमाग़ न हो।”

फलकी का दिल जल उठा।

आख़िर वह भी एक औरत थी। हर बार वही गलती कर बैठती थी। उसे लगा था कि शायद उसने आफ़ाक़ का दिल जीत लिया है।

तौबा…

आफ़ाक़ के सीने में जैसे दिल था ही नहीं।

फिर दिल जीतने या हारने का सवाल ही कहाँ उठता था?

वह तो पत्थर था…

और उसे उसी पत्थर से अपना सिर टकराना था।

वह चुपचाप जाकर अपने बिस्तर पर लेट गई।

आफ़ाक़ भी लेट चुका था। उसने सिर उठाकर फलकी की ओर देखा, फिर बोला…

“अगर यह सूट आपने ख़ुद सिला है, तो यह सचमुच हैरानी की बात है। आपने कमाल कर दिया है। और यह सूट आप पर बहुत अच्छा लग रहा है।”

“मेरे रंगों के चुनाव की भी कुछ तारीफ़ कर दीजिए।”

अब इस तारीफ़ का क्या फ़ायदा था?

फलकी आँखों में आँसू लिए चुपचाप लेट गई।

पहले उसका दिल दुखाया, और अब उसी पर मरहम लगाने की कोशिश कर रहा था। किसी का दिल दुखाना तो जैसे उसे बहुत अच्छी तरह आता था। शायद वह इस दुनिया में लोगों का दिल तोड़ने और उन्हें तकलीफ़ पहुँचाने के लिए ही आया था।

फलकी ने बत्ती बुझा दी।

फिर वह करवटें बदलते हुए दिन गिनने लगी। पता नहीं उसकी यह परीक्षा कब ख़त्म होगी। छह महीने बीत चुके थे और इन छह महीनों में उसने वह हर काम किया था, जिससे उसे कभी घृणा थी।

उसने बाथरूम साफ़ किए थे।

आफ़ाक़ का शेविंग का सामान धोया था।

उसकी बनियानें और अंडरवियर तक धोए थे।

उसके जूते पॉलिश किए थे।

हल तक चलाया था।

ऐसा कौन-सा काम था जो उसने नहीं किया था?

फिर भी आफ़ाक़ का दिल नहीं पिघला था।

न जाने अभी कितनी और परीक्षाएँ बाकी थीं।

अब अगर उसे इस सब से छुटकारा मिल जाए, तो वही अच्छा था।

लेकिन कहीं ऐसा न हो कि आफ़ाक़ अपने वादे से मुकर जाए। उसका क्या था? वह तो अपनी मर्ज़ी का ख़ुद मालिक था।

वह ख़ुद भी चुप रहती थी, क्योंकि अभी उसकी अम्मी और डैडी नहीं आए थे। वैसे भी वह अपनी अम्मी से नाराज़ थी, क्योंकि उन्होंने उसे एक भी ख़त नहीं लिखा था।

उसे समझ नहीं आता था कि वह अम्मी से नाराज़ क्यों थी। अगर अम्मी के ख़त उसे नहीं मिले थे, तो इसमें अम्मी का क्या क़सूर था? यह तो पूरी तरह आफ़ाक़ की चाल थी।

फिर भी वह अपना सारा ग़ुस्सा अम्मी पर ही उतार रही थी।

एक दिन जब आफ़ाक़ दफ़्तर से लौटा, तो उसके हाथ में कुछ लिफ़ाफ़े और कुछ रंगीन कार्ड थे।

आते ही उसने वे सब चीज़ें फलकी के सामने रख दीं।

“ये क्या हैं?” फलकी ने पूछा।

आफ़ाक़ ने मुस्कराकर कहा,

“ये आपकी अम्मी के प्रेम-पत्र हैं!”

“मेरे नाम आए हैं?”

“कुछ आपके नाम हैं और कुछ मेरे नाम।”

“लेकिन अम्मी ने मुझे दफ़्तर के पते पर ख़त क्यों भेजे?”

“ये दफ़्तर के पते पर नहीं, घर के पते पर आए हैं।”

“फिर मुझे पहले क्यों नहीं मिले?”

“यह अपने चौकीदार से पूछिए कि वह आपको रोज़ की डाक क्यों नहीं देता रहा।”

“चौकीदार तो आपका नौकर है। वह आपकी ही हिदायतों पर चलता है…”

“यह भी ठीक है।” आफ़ाक़ ने शांत स्वर में कहा।

“और अगर माँ के ख़त भी इस घर में सेंसर किए जाते हैं, तो मुझे उन्हें पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं।”

यह कहकर फलकी ने ख़तों को हाथ तक नहीं लगाया। वे वहीं पड़े रहे।

वह ग़ुस्से में बोली,

“और इतने दिनों से जमा हुए ये सारे ख़त… आज मुझे दिए जा रहे हैं!”

आफ़ाक़ ने सहजता से कहा,

“ये मेरी गाड़ी में ही पड़े रहे। मुझे आपको देना याद ही नहीं रहा।”

“तो अब भी इन्हें अपनी गाड़ी में ही रहने दीजिए। इनके बिना भी मेरा गुज़ारा हो रहा है।”

“सचमुच… इनके बिना भी आपका गुज़ारा हो रहा है?” आफ़ाक़ ने व्यंग्य भरे लहजे में पूछा।

“जी हाँ। जिसे गुज़ारा कहते हैं, वही हो रहा है।”

“तो फिर बहुत अच्छी बात है।”

आफ़ाक़ ने कहा,

“बस यही दो शब्द अपनी अम्मी को भी लिख दीजिए।”

“मेरी अम्मी मुझे अच्छी तरह जानती हैं। उन्हें कुछ लिखने की ज़रूरत नहीं है।”

“फिर भी… ख़त मिलने की रसीद तो देनी पड़ेगी।”

“जिसे इतने दिनों तक ये ख़त मिलते रहे हैं, वही उनकी रसीद भी भेज दे।”

“जी हाँ,” आफ़ाक़ ने मुस्कराते हुए कहा, “मैं तो हर ख़त का बाक़ायदा जवाब लिखता रहा हूँ।”

“और यह भी लिखा होगा कि मैं और फलकी बहुत खुश हैं?”

“वाह! मेरी संगत में आप काफ़ी समझदार हो गई हैं।”

फलकी का दिल तो चाहता था कि तुरंत कह दे, “अल्लाह तआला आपकी संगत से बचाए!” लेकिन उसने अपने शब्दों को होंठों तक आने से रोक लिया।

अब वह पहले जैसी नहीं रही थी। पहले वह बिना सोचे-समझे जवाब दे देती थी, लेकिन अब जैसे ही उसे लगता कि बात बढ़ने वाली है, वह ख़ामोश हो जाती।

आफ़ाक़ ने कहा,

“ये ख़त उठा लीजिए और पता भी नोट कर लीजिए। शायद कभी ज़रूरत पड़ जाए। वैसे मैं उन्हें हर हफ़्ते एक ख़त लिख देता हूँ…”

“…और मुझे पता है कि उसमें क्या लिखते होंगे।”

फलकी ने ग़ुस्से में सारे ख़त उठाए और दराज़ में बंद कर दिए।

पूरा दिन उसने उन्हें खोला तक नहीं।

उसका मन चाहता था कि अम्मी सामने हों और वह ये सारे ख़त उनके मुँह पर दे मारे।

लेकिन शाम तक जब उसका ग़ुस्सा कुछ ठंडा हुआ, तो उसने सोचा—इसमें अम्मी का क्या कसूर था? वे तो बेचारी हमेशा की तरह नियमित रूप से ख़त लिख रही होंगी। यह सारी हरकत तो आफ़ाक़ की थी, जिसने उसे इतने दिनों तक माँ के ख़तों के लिए तड़पाया।

धीरे-धीरे जब उसका ग़ुस्सा पूरी तरह उतर गया, तो उसने दराज़ से ख़त निकाले और पढ़ना शुरू किया।

उनमें छह शुभकामना-कार्ड और चार लंबे ख़त थे।

जिस देश में उसकी अम्मी कुछ दिनों के लिए ठहरी थीं, वहीं से उन्होंने उसे विस्तार से पत्र लिखा था।

अम्मी ने जिस देश में कुछ दिन ठहरकर समय बिताया था, वहाँ से लंबा पत्र लिखा था और जिन देशों से केवल गुज़री थीं, वहाँ से शुभकामना-कार्ड भेजे थे।

हर ख़त आफ़ाक़ और फलकी—दोनों के नाम था।

इस लिहाज़ से आफ़ाक़ का उन ख़तों पर अपना अधिकार जताना पूरी तरह ग़लत भी नहीं था।

लेकिन फिर भी फलकी उसे माफ़ करने के लिए तैयार नहीं थी।

अम्मी ने ढेर सारा प्यार भेजा था। उन्होंने लिखा था कि बहुत जल्द वे आफ़ाक़ की अम्मी की मेहमान बनने वाली हैं। आफ़ाक़ की अम्मी ने उन्हें ख़ास तौर पर न्यूयॉर्क बुलाया था। उनका इरादा था कि वे वहाँ लगभग एक महीने तक रहेंगी।

उधर…

दोनों माएँ आपस में गहरे रिश्ते की नींव मज़बूत कर रही थीं।

और उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि फलकी के दिल में क्या चल रहा है।

फलकी तो आफ़ाक़ की गुलामी से आज़ाद होने के लिए हर तरह की कठिनाइयाँ सह रही थी। न जाने कैसी-कैसी परीक्षाओं से गुज़र रही थी, क्या-क्या नहीं कर रही थी।

काश, ये बड़े-बुज़ुर्ग इस सच्चाई से अनजान न होते।

फिर भी उसने अम्मी के किसी भी ख़त का जवाब नहीं दिया।

और न ही उसका जवाब देने का कोई इरादा था।

उसने सोचा,

“ठीक है… झूठी-सच्ची बातें अगर लिखनी ही हैं, तो आफ़ाक़ ही लिखता रहे। कल जब मैं घर वापस जाऊँगी, तो कम-से-कम अपने माँ-बाप के सामने शर्मिंदा नहीं होऊँगी। न मैंने कोई झूठ बोला होगा और न ही मुझसे कोई सफ़ाई माँगी जाएगी।”

फलकी ने चादर मुँह तक खींच ली और सोचने लगी—

“इन दिनों अम्मी अमेरिका में होंगी और आफ़ाक़ की अम्मी की मेहमान बनी होंगी।”

फिर उसने मन ही मन तय किया,

“अभी आफ़ाक़ को उसका वादा याद दिलाना ठीक नहीं होगा। कुछ दिन और इंतज़ार कर लेती हूँ…”

जब अम्मी न्यूयॉर्क से वापस चली जाएँगी, तब वह आफ़ाक़ को उसका वादा याद दिलाएगी। उससे पहले न वह कोई गलती करेगी, न कोई झगड़ा करेगी और न ही उससे उलझेगी।

यह फ़ैसला करके फलकी निश्चिंत हो गई।

अगली सुबह फलकी ने रसोई में बहुत धीमी आवाज़ में रेडियो चला रखा था। रेडियो कई दिनों से वहीं रखा हुआ था। उसकी समझ में नहीं आता था कि उसे रसोई में रखने का मक़सद क्या था।

कभी-कभी वह काम करते हुए रेडियो चला लेती, लेकिन उसने उसे कभी उसकी जगह से हटाया नहीं।

आफ़ाक़ अंदर अपने कमरे में तैयार हो रहा था और फलकी रसोई में नाश्ता बना रही थी। रेडियो की आवाज़ इतनी धीमी थी कि आफ़ाक़ के कमरे तक नहीं पहुँच रही थी।

वह अंडे तल रही थी कि तभी न जाने कब आफ़ाक़ अपनी क़मीज़ और टाई हाथ में लिए रसोई में आ गया।

उसकी आहट पाकर फलकी ने मुड़कर देखा तो घबरा गई। उसके हाथ से कलछी छूटकर नीचे गिर गई।

बिना कुछ कहे वह आगे बढ़ी और तुरंत रेडियो बंद कर दिया।

आफ़ाक़ के एक हाथ में नीली धारियों वाली क़मीज़ थी और दूसरे हाथ में टाई।

उसने पूछा,

“आपने रेडियो क्यों बंद कर दिया?”

फलकी ने घबराए हुए स्वर में कहा,

“मुझे रेडियो चलाकर काम करने की आदत नहीं है। आज तो बस यूँ ही चला लिया था।”

आफ़ाक़ ने हैरानी से कहा,

“आपको मालूम है, यह रेडियो मैं सिर्फ़ आपके लिए लाया था। कमाल है, आपने इसे अब तक रसोई में ही रखा हुआ है!”

“जी… मेरे लिए?” फलकी ने आश्चर्य से पूछा।

“हाँ, आपके लिए… ताकि आप काम करते हुए अपने पसंदीदा गीत सुन सकें।”

फलकी ने झिझकते हुए कहा,

“लेकिन… मैंने तो आपसे कभी नहीं कहा था।”

“मुझे मालूम है, आपने नहीं कहा था। लेकिन शायद आपको यह नहीं पता कि हर विभाग में तरक्की देने के कुछ नियम होते हैं।”

“तरक्की देने के?” फलकी ने हैरानी से पूछा।

“हाँ। जब कोई कर्मचारी ईमानदारी से अपना काम करता है, तो उसे तरक्की दी जाती है या फिर कुछ सुविधाएँ और इनाम दिए जाते हैं।”

“मैं अभी भी नहीं समझी।”

“समझने की ज़रूरत भी क्या है? बस रेडियो सुनकर अपना मन बहलाया कीजिए।”

“लेकिन अब तो मुझे इसकी आदत नहीं रही।”

“फिर से पड़ जाएगी।”

वह मुस्कराया और बोला,

“चलिए, मेरे सामने ही रेडियो चला दीजिए।”

जब फलकी अब भी अविश्वास से वहीं खड़ी रही, तो आफ़ाक़ खुद आगे बढ़ा और रेडियो चालू कर दिया।

उसी समय एक दर्द भरा गीत बजने लगा—

“ऐ मेरे सनम, तेरी वफ़ा भी गवारा, तेरी जफ़ा भी गवारा…
यह इत्तिफ़ाक़ है, मैं तेरे इख़्तियार में हूँ।”

गीत के शब्द सुनकर फलकी अनायास चौंक उठी और उसने आफ़ाक़ की ओर देखा।

उधर आफ़ाक़ की नज़र भी उसी पर थी।

एक पल के लिए दोनों की नज़रें एक-दूसरे से मिलीं।

फलकी की आँखें जैसे ख़ामोशी से यही कह रही थीं—

“यह इत्तिफ़ाक़ है… मैं तेरे इख़्तियार में हूँ…
मैं तेरे इख़्तियार में हूँ…”

अगले ही क्षण आफ़ाक़ जैसे अपने ख़यालों से बाहर आ गया।

उसने सामान्य स्वर में कहा,

“अगर आपको तकलीफ़ न हो, तो मेरी क़मीज़ का यह बटन टाँक दीजिए।”

यह सुनते ही फलकी भी जैसे अपने ख़यालों से बाहर आ गई।

जब आफ़ाक़ ने अपने मज़बूत हाथों में पकड़ा हुआ बटन फलकी के घी से सने हाथों में दिया, तो दोनों की उँगलियाँ एक-दूसरे से छू गईं।

मानो उस स्पर्श के साथ फलकी का रोम-रोम यही कह उठा—

“यह इत्तिफ़ाक़ है… मैं तेरे इख़्तियार में हूँ।”

बटन टाँकने के लिए फलकी अपने कमरे में चली गई।

जब नाश्ते की मेज़ पर आफ़ाक़ आया, तो वह हमेशा की तरह बेहद आकर्षक लग रहा था। सफ़ेद सूट के साथ उसने नीली धारियों वाली क़मीज़ पहन रखी थी और लाल रंग की टाई बाँध रखी थी।

वह जहाँ भी बैठता, उसके आसपास उसकी ख़ुशबू की महक फैल जाती।

कभी-कभी फलकी सोचती—

“काश! मैं भी कोई ख़ुशबू होती, जो हमेशा आफ़ाक़ से लिपटी रहती।”

जब फलकी नाश्ते की ट्रे लेकर मेज़ पर आई, तो उसने सुना कि आफ़ाक़ अपनी गंभीर और भावपूर्ण आवाज़ में धीमे-धीमे गुनगुना रहा था—

“तेरा सितम भी गवारा, तेरी जफ़ा भी क़बूल…
यह इत्तिफ़ाक़ है, मैं तेरे इख़्तियार में हूँ।”

गीत सुनकर फलकी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

वह मन ही मन सोचने लगी—

“कैसा उलटा गीत गा रहे हैं… यह तो मुझ पर ज़्यादा ठीक बैठता है।”

लेकिन आफ़ाक़ जाने क्यों उसी मिसरे को बार-बार दोहराता रहा।

उसकी आवाज़ में न जाने कैसी कशिश थी कि रात की सारी कसक और शिकायतें धीरे-धीरे फलकी के दिल से मिटने लगीं।

जब आफ़ाक़ दफ़्तर चला गया, तो वह उसके कहे हुए वाक्यों को याद करके मुस्कराने लगी—

“हर विभाग में तरक्की देने के कुछ नियम होते हैं। जब कर्मचारी ईमानदारी से अपना काम करते हैं, तो उन्हें कुछ सुविधाएँ और इनाम दिए जाते हैं।”

तो इसका मतलब यह था कि फलकी ईमानदारी से अपना काम कर रही थी, बल्कि बहुत अच्छे ढंग से कर रही थी। इसी वजह से आफ़ाक़ ने उसे रेडियो की सुविधा दी थी, ताकि इस एकांत भरे जीवन में संगीत उसकी तन्हाई को कुछ कम कर सके।

यह सोचकर फलकी का मन खुशी से भर गया।

रात की सारी उदासी जैसे पल भर में गायब हो गई।

सचमुच…

दिल भी कितनी अजीब चीज़ है।

कल रात तक वही दिल आफ़ाक़ के लिए शिकायतों और नाराज़गी से भरा हुआ था, और आज उसकी ज़रा-सी मेहरबानी ने उसी दिल को उसकी मोहब्बत का तलबगार बना दिया।

वैसे आफ़ाक़ जैसे इंसान का दिल जीतना कितना मुश्किल था!

उससे अपनी बात मनवाना कितना कठिन था!

कभी-कभी तो उसे लगता, पता नहीं उसके सीने में दिल है भी या नहीं।

लेकिन…

कोशिश करने में क्या हर्ज़ है?

आज न जाने क्यों फलकी के मन में जैसे घुँघरू बज उठे।

उसने सोचा—

“एक औरत की असली जीत तो यही होती है कि वह अपने पति का दिल जीत ले, न कि उससे छुटकारा पाकर भाग जाए।”

लेकिन आफ़ाक़ का दिल जीतने का कोई रास्ता उसे समझ में नहीं आ रहा था।

उसे यह भी नहीं पता था कि उसकी कमज़ोरी क्या है, उसकी दुखती रग कहाँ है, किस बात से उसे चोट पहुँचती है और किस बात से उसके दिल में दर्द उठता है।

आफ़ाक़ तो उसे एक फ़ौलाद जैसा इंसान लगता था।

जिस चीज़ से भी वह टकराता, उसे पलटकर लौटा देता।

फिर भी…

वह दूसरे आदमियों से बिल्कुल अलग था।

पूरी तरह अलग।

उसकी यही बात कभी-कभी खटकती भी थी और आकर्षित भी करती थी।

फलकी की ज़िंदगी में अब तक जितने भी पुरुष आए थे, लगभग सभी की कमज़ोरी औरत या दौलत थी।

लेकिन आफ़ाक़…

उन सबसे अलग था।

औरत और दौलत—दोनों ही उसके पैरों तले जैसे कोई मायने नहीं रखती थीं।

वाक़ई, वह कितना अजीब इंसान था।

ऐसे आदमी को अपना बना लेना शायद दुनिया की सबसे बड़ी जीत होती।

और कई बार…

लड़कियाँ ऐसे ही आदमी का दिल जीतने के लिए अपनी जान तक दाँव पर लगा देती हैं।

“है ना…?”

यह सोचकर वह हल्का-सा मुस्करा दी।

उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर उसके दिल में आफ़ाक़ को लेकर इतनी उत्सुकता क्यों जागने लगी थी।

हालाँकि वह अच्छी तरह जानती थी कि आफ़ाक़ की मेहरबानियों पर भरोसा करना मूर्खता होगी।

उसका मिज़ाज कब बदल जाए, कोई नहीं जानता था।

अभी तो देखना यह था कि वह फलकी पर और कितनी मेहरबानियाँ करता है… और उसे कितनी “तरक्कियाँ” देता है।

लगभग एक हफ़्ते बाद फिर एक अजीब घटना हुई।

शाम को जब आफ़ाक़ घर लौटा, तो उसके पीछे-पीछे एक नौकर बड़ा-सा टेलीविज़न उठाए हुए आया।

आफ़ाक़ ने उसे ड्रॉइंग रूम (टीवी लाउंज) में रखवा दिया।

नौकर के जाने के बाद उसने डिब्बा खोला, तारें निकालीं और टेलीविज़न को ठीक से जोड़ने लगा।

फलकी दूर सोफ़े पर बैठी आश्चर्य से यह सब देखती रही।

एंटीना ठीक करने के बाद जैसे ही आफ़ाक़ ने टीवी चालू किया, उस पर रंगीन तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

पहले घर में जो टीवी था, वह ब्लैक एंड व्हाइट था, लेकिन यह नया टीवी रंगीन था।

जब रंगीन फ़िल्म चलने लगी, तो आफ़ाक़ भी जाकर दूसरे सोफ़े पर बैठ गया।

फलकी अब भी हैरान थी, लेकिन उसने कोई सवाल नहीं किया।

वह जान चुकी थी कि आफ़ाक़ से बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं करनी चाहिए।

इसलिए वह चुपचाप सही मौक़े का इंतज़ार करती रही।

वह हमेशा इसी इंतज़ार में रहती थी कि पहले आफ़ाक़ ही बात शुरू करे, ताकि उसे उसके मूड का अंदाज़ा हो जाए।

जब कार्यक्रम समाप्त हुआ, तो आफ़ाक़ ने मुड़कर फलकी की ओर देखा और पूछा,

“बताइए, आपको टीवी कैसा लगा?”

अनायास ही फलकी के मुँह से निकल गया,

“यह टीवी किसका है?”

आफ़ाक़ मुस्कराया।

“यह भी, हुज़ूर… आपका ही है।”

फलकी ने झिझकते हुए कहा,

“मेरा मतलब था… यह किराए का है या किसी से माँगकर लाए हैं?”

उसकी बात सुनकर आफ़ाक़ इतनी ज़ोर से हँसा कि काफ़ी देर तक हँसता ही रहा।

फिर बोला,

“वैसे आप काफ़ी समझदार हैं… और बातें भी अच्छी तरह याद रखती हैं।”

थोड़ा रुककर उसने कहा,

“इतना बता दूँ कि अभी तो इसे किराए का ही समझिए… लेकिन अब यह यहाँ से वापस नहीं जाएगा।”

“क्यों?”

“ताकि आप और मैं शाम को साथ बैठकर टीवी देखा करेंगे।”

फलकी का दिल ज़ोर से धड़क उठा।

वह धीरे से बोली,

“आप देखा कीजिए… मुझे तो शाम के समय और भी बहुत-से काम होते हैं।”

“अरे-अरे… इतनी भी क्या नाराज़गी!”

आफ़ाक़ मुस्कराया।

“वैसे भी आप मेरे साथ दो मीठी बातें करने को तैयार नहीं होतीं। कम-से-कम इसी बहाने साथ बैठ जाया करेंगी। शाम भी अच्छी गुज़र जाएगी।”

फलकी के मन में जैसे एक हलचल-सी मच गई।

वह सोचने लगी—

“दो मीठी बातें करने को तैयार कौन नहीं होता… मैं या आप?”

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

फिर उसने सीधे आफ़ाक़ की आँखों में देखते हुए पूछा,

“तो… यह दूसरी तरक्की है?”

उसका सवाल सुनकर आफ़ाक़ हँस पड़ा।

शायद उसे फलकी से ऐसे सवाल की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी।

वह बनावटी हैरानी से बोला,

“लगता है, आप काफ़ी समझदार होती जा रही हैं।”

“यह भी आपकी ही मेहरबानी है।” फलकी ने तुरंत जवाब दिया।

“वाह… बहुत ख़ूब!”

आफ़ाक़ मुस्कराया।

“आज तो आपने मुझे बहुत खुश कर दिया। इसी खुशी में मैं आपको सारी रियायतें दे दूँगा।”

अगले ही दिन सचमुच ऐसा ही हुआ।

जैसे ही आफ़ाक़ दफ़्तर गया, कुछ लोग घर आए। उन्होंने टेलीफ़ोन लगा दिया। साथ ही कैसेट रिकॉर्डर, टेप रिकॉर्डर और दूसरे सभी उपकरण अपनी-अपनी जगह पर सजा दिए। घर के चारों कोनों में स्पीकर भी लगा दिए गए।

अब पूरा घर पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा सजा-सँवरा और रौनक़ वाला दिखाई देने लगा।

सारा काम पूरा होने के बाद उन लोगों ने फलकी को बुलाया और बड़े आदर से कहा,

“बेगम साहिबा, ज़रा काम देख लीजिए। अगर आपको सब ठीक लगे, तो हम चलें।”

फलकी ने मन ही मन सोचा—

“किसी सम्मानित इंसान की पत्नी होना कितना सुकून देने वाला एहसास है।”

फिर वह औपचारिक रूप से एक-एक चीज़ देखकर बोली,

“हाँ, सब ठीक है। आप लोग जा सकते हैं।”

वे लोग सलाम करके चले गए।

उनके जाने के बाद फलकी ने पूरे घर को फिर से करीने से सजाया।

ख़ास तौर पर टीवी लाउंज को उसने बड़े मन से व्यवस्थित किया। वहाँ फूल भी सजाए।

उसे मालूम था कि आज रात आफ़ाक़ यहीं बैठकर टीवी देखेगा और नई लगाई गई हर चीज़ पर नज़र डालेगा।

वह अभी आफ़ाक़ के बारे में सोच ही रही थी कि अचानक टेलीफ़ोन की घंटी बज उठी।

अचानक आई उस आवाज़ से वह घबरा गई और चौंककर एक क़दम पीछे हट गई।

कितनी अनजानी और डरावनी लगी थी वह घंटी!

बहुत अरसे बाद इस घर में किसी फ़ोन की घंटी बजी थी।

अब इस सूने घर में फिर से आवाज़ें, बातचीत और जीवन लौटने लगा था।

पहले तो वह काफ़ी देर तक डरी-सहमी खड़ी रही। फिर हिम्मत करके आगे बढ़ी और रिसीवर उठा लिया, लेकिन उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।

“हैलो… हैलो…!”

दूसरी तरफ़ से किसी पुरुष की आवाज़ आ रही थी।

वह इतनी घबराई हुई थी कि आवाज़ तक पहचान नहीं पाई।

पता नहीं कौन बोल रहा है…

उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

बेवजह यह फ़ोन लग गया। एक और झंझट खड़ी हो गई। अब न जाने कितने लोग फ़ोन करेंगे। कितने लोग उसे जानते होंगे और न जाने कौन-कौन उससे बात करना चाहेगा। कहीं कोई मुसीबत ही न खड़ी हो जाए…

उधर से फिर आवाज़ आई—

“हैलो… हैलो… हैलो! भई, कुछ तो बोलिए। मैं आफ़ाक़ बोल रहा हूँ।”

“आफ़ाक़…!”

फलकी ने राहत की लंबी साँस ली और काँपती हुई आवाज़ में बोली,

“जी…”

“यह ‘जी’ कौन है?”

“जी… मैं हूँ।”

“इस पते पर आपका ख़ादिम आफ़ाक़ बोल रहा है। आप अपना नाम बताते हुए इतनी घबरा क्यों रही हैं? क्या मैं आपका मंगेतर हूँ?”

“जी… मैं फलकी हूँ… फल…”

इतना कहते ही उसे तुरंत याद आया कि आफ़ाक़ उसे कभी ‘फलकी’ नहीं कहता। वह हमेशा ‘फलक’ कहकर पुकारता था। और जब तंज़ करना होता, तो ‘बेगम फ़लकनाज़’ कहता।

आफ़ाक़ हँसते हुए बोला,

“अच्छा… तो फलक साहिबा! बड़ा अजीब इत्तिफ़ाक़ है। फ़ोन पर आपकी आवाज़ पहली बार सुनने का मौक़ा मिला है। आपकी आवाज़ बहुत मधुर है… और थोड़ी-सी डरी हुई भी।”

वह कुछ क्षण रुका, फिर मुस्कराकर बोला,

“…अगर यह आवाज़ मैंने शादी से पहले सुन ली होती, तो शायद आपके इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाता।”

यह सुनते ही फलकी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

वह कुछ बोल ही नहीं पाई।

उसने मन ही मन सोचा—

“शायद चुभने वाली बातें करने का यह इनका नया अंदाज़ है।”

आफ़ाक़ ने हँसते हुए कहा,

“अरे, कुछ तो बोलिए! मैंने दफ़्तर का फ़ोन व्यस्त कर रखा है।”

फलकी ने रुक-रुककर कहा,

“आ… आप इश्क़ में गिरफ़्तार होने वालों में से नहीं हैं… मुझे मालूम है।”

आफ़ाक़ मुस्कराया।

“चलिए, एक बात तो आपको मालूम हो गई। धीरे-धीरे बाकी बातें भी मालूम हो जाएँगी।”

“जी…” फलकी बस इतना ही कह सकी।

“वैसे, आप बहुत अच्छा बोल लेती हैं।”

फलकी चुप रही।

आफ़ाक़ ने कहा,

“अच्छा, यह तो पूछिए कि मैंने फ़ोन क्यों किया है।”

“आप ख़ुद ही बता दीजिए।”

“आपकी याद आ रही थी। सोचा, आपसे बात ही कर लूँ।”

“झूठ!”

यह शब्द अनायास ही फलकी के मुँह से निकल गया।

फिर वह जल्दी से बोली,

“जब फ़ोन नहीं था, तब क्या आपकी याद नहीं आती थी?”

“आती थी।”

“तब क्या करते थे?”

आफ़ाक़ ने तुरंत जवाब दिया,

“आपके हाथ का बेस्वाद खाना याद करके सब्र कर लेता था।”

“कमाल के आदमी हैं…” फलकी मन ही मन दाँत पीसकर रह गई।

आफ़ाक़ ने पूछा,

“आपको कुछ कहना है?”

“न… नहीं।”

फिर उसने जल्दी से बात बदलते हुए पूछा,

“यह फ़ोन आपने क्यों लगवाया है?”

“बार-बार मेरे ज़ख़्म मत कुरेदिए,” आफ़ाक़ ने धीमे स्वर में कहा। “आप नहीं जानतीं… दफ़्तर में आपका बिना मेरा मन नहीं लगता। सोचा है कि थोड़ी-थोड़ी देर बाद आपसे फ़ोन पर बात कर लिया करूँ, तो दिन आसानी से गुज़र जाएगा।”

फलकी ने तुरंत कहा,

“या फिर फ़ोन करके यह पता लगाते रहेंगे कि मैं घर में हूँ… या भाग गई हूँ?”

आफ़ाक़ ज़ोर से हँस पड़ा।

“इससे तो मुझे यह अंदाज़ा हो गया कि आपके मन में भागने का ख़याल भी आता है।”

फलकी चुप हो गई।

फिर उसने महसूस किया कि उससे फिर एक ग़लत बात निकल गई थी।

आफ़ाक़ ने मुस्कराकर पूछा,

“बताइए न… भागने का इरादा कब है? उस दिन मैं फ़ोन नहीं करूँगा।”

फलकी ने शांत स्वर में कहा,

“वैसे भी… मेरी तय की हुई अवधि अब पूरी होने वाली है। आपको अपना वादा याद है न?”

“कौन-सा वादा?… अरे हाँ, हाँ… याद है, जनाब! बिल्कुल याद है।”

यह सुनते ही आफ़ाक़ का दिल जैसे एक पल को बैठ-सा गया।

लेकिन इससे पहले कि वह कुछ और कह पाता, फलकी ने फ़ोन रख दिया।

फ़ोन रखने के बाद वह चैन से अपना काम भी नहीं कर सकी।

न जाने आफ़ाक़ की बातों ने उसे इतना बेचैन क्यों कर दिया था।

अभी तक तो उसका मन एक शांत नदी की तरह बह रहा था।

लेकिन अब उसके भीतर फिर से हलचल उठने लगी थी।

जब भी उसके मन में भावनाओं का भँवर बनता, उसका सिर चकराने लगता।

एक दिन आफ़ाक और फ़लकी बैठकर टीवी देख रहे थे कि अचानक आफ़ाक ने टीवी बंद कर दिया और बोला,

“बेगम फ़लक नाज़! क्यों न आपका इम्तिहान हो जाए?”

“किस बात का इम्तिहान?”

“जैसे कोई पूरा कोर्स पढ़ने के बाद इम्तिहान होता है।”

“जी हाँ।”

“फिर उसका रिज़ल्ट भी आता है और आगे का प्रोग्राम उसी रिज़ल्ट पर निर्भर करता है?”

“जी हाँ।”

“तो फिर आपका भी इम्तिहान हो जाए?”

“कैसा इम्तिहान?”

“यानी आपकी घर-गृहस्थी और खानदारी का।”

“आप साफ़-साफ़ कहिए, क्या कहना चाहते हैं?”

“मैं चाहता हूँ कि अपने सारे दोस्तों को दावत पर बुलाऊँ और सारा खाना…”आप ही पकाइए।”

“मैं… अकेली?”

“जी हाँ।”

“कितने लोग होंगे?”

“अंदाज़न पचास लोग होंगे।”

“पचास लोग… और मैं अकेली उनके लिए खाना बनाऊँ?”

“अब आपको सब कुछ बनाना आ गया है। फिर घबराती क्यों हैं?”

“घर में मैंने कभी इतने लोगों का खाना नहीं बनाया।”

“कोशिश कीजिए, शायद बना ही लें।”

“अगर नहीं बना सकी तो…?”

“इम्तिहान की बात है। अगर इम्तिहान नहीं दिया तो साल बर्बाद हो जाने का डर है।”

फ़लकी ने मन ही मन सोचा, “इतनी मेहनत बेकार हो जाएगी। जब इतने पापड़ बेल ही लिए हैं, तो एक और सही। चलो, जान की बाज़ी लगा लेते हैं। हार-जीत तो अल्लाह के हाथ में है।”

थोड़ी देर सोचने के बाद वह बोली,

“जैसी आपकी मर्ज़ी।”

“शाबाश! तो फिर कागज़ और पेंसिल ले आइए। एक दिन तय करते हैं, मेहमानों की सूची बनाते हैं और मेन्यू भी तैयार कर लेते हैं।”

“क्या यह सब कुछ एक ही दिन में बन जाएगा?”

मेन्यू तैयार हो जाने के बाद फ़लकी ने पूछा।

“हाँ, क्यों नहीं?”

“आप ऐसा करना, कुछ चीज़ें एक दिन पहले ही बनाकर फ़्रीज़र में रख देना। ठीक रहेगा।”

“जी हाँ।”

फ़लकी ने मन ही मन सोचा, “धिक्कार है मेरी अक्ल पर! ऐसी बातें मेरे दिमाग़ में पहले क्यों नहीं आतीं? हर बार आफ़ाक से ही सुझाव क्यों लेना पड़ता है?”

दोनों बैठकर अपने क़रीबी दोस्तों की सूची बनाने लगे। आफ़ाक ने कहा कि वह दफ़्तर से निमंत्रण-पत्र छपवाकर सबके घर भिजवा देगा।

फिर वह फ़लकी से बोला,

“शादी के बाद मेरे घर में यह पहली दावत होगी। इससे पहले दावतों का इंतज़ाम मेरी अम्मी करती रही हैं। हमारे घर की परंपरा है कि दावत बहुत शानदार होती है। अब इस परंपरा को बनाए रखना आपकी ज़िम्मेदारी है।”

“अल्लाह मालिक है।” फ़लकी ने धीरे से कहा।

“अभी बीच में पूरा एक हफ़्ता है। आप मुझे सारी चीज़ों की सूची बना दीजिए, मैं सारा राशन और ज़रूरी सामान मँगवा दूँगा।”

फ़लकी के मन में बहुत घबराहट थी। इतने लोगों का खाना बनाना किसी परीक्षा से कम नहीं था। वह अकेली जान… क्या-क्या करेगी और कैसे करेगी? उसे अब लग रहा था कि कहीं हामी भरकर उसने गलती तो नहीं कर दी। वह यही सोच-सोचकर परेशान होती जा रही थी।

दावत से दो दिन पहले उसने ज़रूरत की सभी चीज़ों की सूची बनाकर आफ़ाक को दे दी। अगले दिन आफ़ाक पूरा राशन लेकर घर आया। उसके साथ एक वर्दी पहने आदमी भी था, जो सब्ज़ियों और गोश्त की टोकरियाँ उठाए रसोई तक ले आया।

फ़लकी घर के दूसरे काम निपटाकर जब रसोई में पहुँची, तो देखा कि वह वर्दी वाला आदमी अब भी वहीं खड़ा है। फ़लकी ने सोचा था कि सामान रखकर वह चला जाएगा, जैसा कि आम तौर पर होता है।

“क्या बात है?” रसोई में आते ही फ़लकी ने पूछा।

“साहब ने कहा था कि यहीं रुकना है।”

“अच्छा।” फ़लकी ने सोचा कि शायद आफ़ाक को उससे कोई काम होगा। यह सोचकर वह फिर अपने काम में लग गई।

जब रात को दोनों बैठकर टीवी देख रहे थे, तो फ़लकी को अचानक उस आदमी की याद आई।

“वह आदमी आपका इंतज़ार कर रहा है।”

“कौन-सा आदमी?” आफ़ाक ने हैरानी से पूछा।

“वही, जो राशन लेकर अंदर आया था।”

“हाँ, वही।” आफ़ाक ने सहजता से कहा, “वह दावत के काम में आपकी मदद करेगा।”

“सच?” फ़लकी ने आश्चर्य से पूछा।

“जी हाँ। मैंने सोचा कि मेहमान ज़्यादा होंगे, इसलिए काम भी ज़्यादा होगा। बर्तन भी बहुत होंगे। अब जब आपने इतनी शराफ़त से सारी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है, तो मुझे भी अपनी शराफ़त का सबूत देना चाहिए।”

“अच्छा… इसे शराफ़त कहते हैं?” फ़लकी मुस्कुराकर बोली।

“तो आपकी ज़ुबान में इसे क्या कहते हैं? आप ही बता दीजिए।”

“मेरी ज़ुबान में तो इसे तरस कहते हैं।”

“चलिए, तरस ही समझ लीजिए।”

यह सुनकर फ़लकी को तसल्ली हो गई। सचमुच उसे एक और आदमी की ज़रूरत महसूस हो रही थी। इतने लोगों के लिए मसाले पीसना, सब्ज़ियाँ तैयार करना और फिर बर्तनों का जो ढेर लगने वाला था, उसे संभालना अकेले उसके बस की बात नहीं थी।

फ़लकी ने दावत से एक दिन पहले ही तैयारियाँ शुरू कर दीं। अब्दुल करीम…

फ़लकी ने अब्दुल करीम को अपने साथ काम पर लगा लिया। अब्दुल करीम इतना समझदार नौकर था कि फ़लकी केवल इशारा करती और वह काम पूरा कर देता। मसाले तैयार करने, सलाद बनाने, मिक्सर चलाने और काम की रफ़्तार बढ़ाने में उसे कुछ भी अलग से समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

तब फ़लकी ने पूछा,

“अब्दुल करीम, क्या तुम खाना बनाना भी जानते हो?”

“जी, बीबी जी।”

“कहाँ काम करते हो?”

“काम तो मैं दफ़्तर में ही करता हूँ, मगर साहब लोगों के लिए अक्सर खाना भी बनाता रहा हूँ। कभी साहब दफ़्तर में बुला लेते हैं, कभी घर पर।”

“अच्छा! मैं तो तुम्हें सिर्फ़ बैरा समझ रही थी।”

“बैरा ही समझिए, बीबी जी! मैं हर तरह का काम जानता हूँ।”

“अच्छा, रोस्ट बना लेते हो?”

“जी, बीबी जी। बकरे का बनवाना है या सिर्फ़ रान का… या फिर मुर्ग़ का?”

“चाँप भी बना लेते हो?”

“जी, बीबी जी। आप जैसी पसंद करें।”

“अच्छा, ऐसा करो। मैं जो-जो कहती जाऊँ, तुम वैसा ही करते जाना। तुम सिर्फ़ मेरी मदद करना, खाना मैं ही बनाऊँगी। तुम जानते हो न, तुम्हारे साहब किसी और के हाथ का बना खाना नहीं खाते?”

“जी, बीबी जी।” उसने अदब से जवाब दिया।

इसके बाद फ़लकी उसे अपने तरीके से मसाले लगाने और खाना पकाने की विधि समझाने लगी। किस चीज़ को कितनी आँच पर पकाना है, कब उतारना है और अलग-अलग तरह के सलाद कैसे तैयार करने हैं—वह सब विस्तार से बताती रही।

यह सब बताते हुए फ़लकी को बहुत खुशी हो रही थी। आज फ़लकी ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार एक अलग ही तरह की आत्मिक खुशी महसूस की। उसे इतने तरह के व्यंजन बनाने आते थे कि किसी साधारण खानसामे के सामने उसे शर्मिंदा नहीं होना पड़ रहा था। अगर उसे कुछ भी बनाना न आता, तो वह दूसरों की तरह उसके सामने बेबस खड़ी रहती और वह अपनी मर्ज़ी से जो चाहता बना देता। न जाने कितनी चीज़ें बर्बाद करता, बेवजह पैसे खर्च करवाता, खाने का रूप बिगाड़ देता और फिर यही कहता कि “यही सही है।”

लेकिन अब कम-से-कम अब्दुल करीम यह जान गया था कि बीबी जी को अच्छी तरह मालूम है कि कोफ्तों का आकार कैसा होना चाहिए, मुर्ग़े की ग्रेवी कितनी होनी चाहिए, साग को कितना भूनना चाहिए, रोस्ट का रंग कैसा होना चाहिए, चाँप कितने प्रकार की होती हैं, रोस्ट के साथ कौन-सा सलाद परोसा जाता है, चाँपों के साथ किस तरह का सूप होना चाहिए, पाव की रंगत कैसी होनी चाहिए और मिठाई कैसी बननी चाहिए।

मिठाई उसने दो तरह की बनाई थी। उसने अब्दुल करीम से साफ़ कह दिया था कि साहब को उसके हाथ की बनी मिठाइयाँ बहुत पसंद हैं, क्योंकि ये सारी मिठाइयाँ उसने खुद साहब से ही सीखी थीं।

खानसामे के सामने उसने सबसे पहले गाजर का हलवा (गजरीला) बनाया। उसने अब्दुल करीम से सिर्फ़ इतना कहा कि वह गाजर कद्दूकस कर दे, बाकी सारा काम वह खुद करेगी। दूसरी मिठाई उसने एक विलायती (पश्चिमी) डेज़र्ट बनाई, जिसमें पुडिंग, कस्टर्ड और केक का इस्तेमाल किया।

अब्दुल करीम हैरानी से देख रहा था कि यह नाज़ुक-सी दिखने वाली लड़की इतने सारे काम जानती है।

अपनी इस सफलता पर फ़लकी बेहद खुश थी। वह भाग-दौड़ कर हर काम संभाल रही थी। कभी रसोई में होती, कभी डाइनिंग रूम में।

“देखना… जलने न पाए।”

“कबाबों का कीमा तैयार हो गया? ज़रा दिखाओ… हाँ, ठीक है।”

उसे हर छोटी-बड़ी बात की पूरी जानकारी थी कि कौन-सी चीज़ किस तरह तैयार की जानी चाहिए।

जब वह गाजर के हलवे के ऊपर चाँदी का वर्क लगा रही थी, तो उसके मन में ख़याल आया—

“आफ़ाक बिल्कुल ठीक कहते थे। जिस औरत को घर-गृहस्थी संभालना नहीं आता, वह अपने स्त्रीत्व को पूरी तरह नहीं निभा पाती। जो महिलाएँ घर नहीं संभाल सकतीं, वे मानो केवल कठपुतलियाँ बनकर रह जाती हैं। घर, घर का एहसास, घर की रसोई… यही तो एक स्त्री की अपनी दुनिया है। और जन्नत किसे कहते हैं? क्या केवल सजने-सँवरने और क्लबों में जाने को? जिन औरतों में अपने घर का एहसास ही नहीं होता, वे घर बसाती ही क्यों हैं? अल्लाह तआला ने दुनिया बसाने के लिए मर्द को भेजा है और घर बसाने के लिए औरत को। औरत को तालीम भी हासिल करनी चाहिए, फैशन भी करना चाहिए… लेकिन अपनी पहचान एक औरत के रूप में बनाए रखते हुए।”

अब यह सब काम करके उसे बेहद खुशी महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था कि उसके व्यक्तित्व में कुछ नया जुड़ गया है। उसे न कोई थकान महसूस हो रही थी और न ही घर का काम उसे छोटा या घटिया लग रहा था।

वह सोचने लगी, “अगर आज मैं यह सब न कर रही होती, तो खुद अपनी नज़रों में कितनी हल्की लगती। किसी काम को जानना… और फिर उसे दूसरों को सिखाना, कितनी तसल्ली देने वाली बात है। क्या इसके लिए मुझे आफ़ाक का शुक्रगुज़ार होना चाहिए?”

आख़िर दावत का दिन भी आ गया।

फ़लकी समझ नहीं पा रही थी कि वह कौन-से कपड़े पहने। बहुत अरसे से उसने गोटे-किनारी वाले कपड़े नहीं पहने थे। अपनी भारी-भरकम साड़ियाँ उसने संदूकों में बंद कर रखी थीं। गहने भी लंबे समय से नहीं पहने थे।

आज उनके घर में दावत थी, इसलिए अच्छे कपड़े पहनना स्वाभाविक था। लेकिन कपड़े पहनते समय उसके मन में डर भी था। कहीं आफ़ाक ने कोई एतराज़ कर दिया, या ऐन वक़्त पर कुछ ऐसा कह दिया जिससे उसका मन टूट जाए, तो सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा। उसका अपना दिल भी बहुत दुखेगा।

आज उसे ऐसी कोई हरकत नहीं करनी चाहिए थी जिससे आफ़ाक का दिल दुखे।

उधर आफ़ाक बाहर दावत की तैयारियों में इतना व्यस्त था कि ढंग से अंदर आकर बैठने का भी उसे समय नहीं मिल रहा था। फ़लकी चाहती थी कि किसी बहाने उससे पूछ ले कि उसे क्या पहनना चाहिए, लेकिन मौका ही नहीं मिला। समय लगातार बीतता जा रहा था।

आख़िर वह अपने कमरे में गई। उसने अपनी सारी साड़ियाँ और कपड़े देखे। फिर उसने एक काली साड़ी चुनी, जिस पर सुनहरे रंग की हल्की-सी बॉर्डर लगी हुई थी। उसे लगा कि यही सबसे उपयुक्त रहेगी। रात के कार्यक्रम के हिसाब से भी उसका रंग बिल्कुल ठीक था।

उसने सोचा कि इसके साथ काले पत्थरों वाला छोटा-सा लॉकेट और टॉप्स पहन लेगी। एक हाथ में घड़ी और दूसरे हाथ में काली चूड़ियाँ पहन लेगी।

वह मुँह-हाथ धोकर आईने के सामने खड़ी कोल्ड क्रीम लगा रही थी कि तभी आफ़ाक कमरे में आ गया। आते ही उसकी नज़र बिस्तर पर फैली हुई काली साड़ी पर पड़ी, फिर उसने फ़लकी की ओर देखा।

फ़लकी घबरा गई।

आफ़ाक ने पूछा,

“आप आज यही साड़ी पहन रही हैं?”

“जी हाँ।” फ़लकी ने धीरे से जवाब दिया।

“क्या आपके पास कोई और अच्छा कपड़ा नहीं है?”

“जी… तो मैं वह छींट वाला फूलों का सूट पहन लेती हूँ।”

फ़लकी ने जल्दी से उन कपड़ों की ओर इशारा किया जो आफ़ाक उसके लिए लाया था। उसे लगा कि शायद वही सबसे ज़्यादा उपयुक्त होंगे।

आफ़ाक ने वहीं खड़े-खड़े कहा,

“कुछ और…”

“बाकी तो…” वह रुक गई, “मेरी शादी के कपड़े हैं।”

“ज़रा अपनी अलमारी खोलिए।”

यह कहकर आफ़ाक आगे बढ़ गया।

उसने फ़लकी की अलमारी खोल दी। जल्दी-जल्दी सारे कपड़े देखे और उनमें से एक बहुत भारी लाल साड़ी निकालकर बिस्तर पर रख दी।

“आज के इस समारोह के लिए यही ठीक रहेगी। इसके साथ लाल नगों वाले गहने पहनिए। खुशी के मौकों पर लाल रंग पहना जाता है।”

इतना कहकर आफ़ाक बाहर चला गया।

फ़लकी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

यह लाल साड़ी उसने आज तक कभी नहीं पहनी थी। उसने इसे बड़े शौक़ से बनवाया था। उसे हमेशा से लाल रंग बहुत पसंद था। लेकिन सुहागरात को लाल कपड़ों के साथ जो कुछ हुआ था, उसके बाद उसे लाल रंग से ही नफ़रत हो गई थी। इसलिए उसने अपने सारे लाल कपड़े समेटकर रख दिए थे।

और आज वही आफ़ाक उसे लाल कपड़े पहनने के लिए कह गया था।

लाल कपड़े तो सुहागरात की निशानी माने जाते हैं। वे भावनाओं को जगा देते हैं, मन में आग लगा देते हैं। जिस आग को उसने बड़ी मुश्किल से अपने भीतर बुझाया था, वह तो अब तक ठंडी पड़ चुकी थी।

फिर आज यह रंग उसे किस खुशी का संदेश दे रहा था?

खुशी क्या होती है?

क्या यह समारोह सचमुच किसी खुशी के लिए मनाया जा रहा है?

यह तो मेरा इम्तिहान है…

इस इम्तिहान का आख़िरी पेपर…

फिर इस इम्तिहान और मेरी आज़ादी के बीच यह लाल रंग क्यों आकर खड़ा हो गया है?

फ़लकी चुपचाप, खोई हुई-सी बैठी रही।

फिर वह उठी और तैयार होने लगी।

बहुत अरसे बाद उसने आज दिल खोलकर मेकअप किया। बड़े सलीके से बाल बनाए, अपनी खूबसूरत आँखों को सँवारा और ऊँची हील वाली सैंडल पहनी। लाल साड़ी के साथ उसने लाल नगों वाला भारी जड़ाऊ हार और गहनों का सेट भी पहन लिया।

सचमुच, फ़लकी आज नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी।

वह मोम की तरह नाज़ुक थी…

लेकिन ऐसी दुल्हन, जिसे कभी अपने श्रृंगार का सुख न मिल पाया हो। ऐसी कली, जो कभी पूरी तरह खिल ही न सकी हो।

जब कोई कली खिलती है, तो उसका अपना ही एक अलग सौंदर्य होता है।

बाहर निकलते समय फ़लकी को शर्म भी आ रही थी और घबराहट भी हो रही थी। वह सोच रही थी कि उसे इतने भारी श्रृंगार में देखकर आफ़ाक क्या कहेगा। आफ़ाक के साथ रहने के बाद तो उसने अपनी आँखों में काजल तक लगाना छोड़ दिया था।

वह अभी कमरे के अंदर ही खड़ी सोच रही थी कि तभी उसे आफ़ाक की आवाज़ सुनाई दी। शायद वह नौकर से कह रहा था,

“बेगम साहिबा को बुलाओ। मेहमान आने शुरू हो गए हैं।”

नौकर के अंदर आने से पहले ही फ़लकी बाहर निकल आई और सीधे आफ़ाक के पास जाकर खड़ी हो गई।

सचमुच, कुछ मेहमान अपनी गाड़ियों से उतर रहे थे और आफ़ाक उनका स्वागत करने के लिए आगे बढ़ रहा था। फ़लकी भी उसके साथ जाकर खड़ी हो गई।

“वाह! वाह! दूल्हा-दुल्हन तो आज चाँद और सूरज की जोड़ी लग रहे हैं।”

मोटर से उतरते ही आगा साहब ने मुस्कुराते हुए कहा।

आफ़ाक ने आगे बढ़कर आगा साहब से हाथ मिलाया, जबकि फ़लकी ने बेगम आगा से हाथ मिलाकर उनका स्वागत किया।

मिस्टर आगा ने फ़लकी का हाथ थामते हुए कहा,

“वाकई, मिसेज़ आफ़ाक! आज तो आप ग़ज़ब ढा रही हैं।”

तभी आफ़ाक ने नज़र उठाकर फ़लकी के पूरे सोलह श्रृंगार को देखा। एक पल के लिए उसकी आँखों में चमक-सी आ गई।

फिर वह मुस्कुराकर बोला,

“अच्छा हुआ आप लोग समय पर आ गए, वरना आज इनका यह सारा ग़ज़ब मुझ पर ही क़यामत बनकर टूटता।”

यह सुनते ही सब ज़ोर से हँस पड़े।

न जाने क्यों, आज फ़लकी को आफ़ाक की यह तारीफ़ ताना नहीं लगी। बल्कि उसके शब्द उसे अच्छे लगे।

सब लोग हँसते-मुस्कुराते हुए ड्रॉइंग रूम में चले गए। उसके बाद मेहमानों का सिलसिला शुरू हो गया। एक के बाद एक लोग आते गए।

हर बार फ़लकी और आफ़ाक उठकर उनका स्वागत करते, हाथ मिलाते, उन्हें अंदर लाते और उनकी जगह पर बैठाते। हँसी-मज़ाक और अपनापन भरी बातों के साथ सबका हालचाल पूछा जाता।

आज फ़लकी मुस्कुराकर हर मेहमान का स्वागत कर रही थी। वह बैरे को इशारा करती तो वह तुरंत शरबत और दूसरे ठंडे पेय की ट्रे लेकर आ जाता। साथ ही सूप भी परोसा जा रहा था। जिसे जो पसंद आता, वह ले लेता।

आज आफ़ाक ने दो और बैरों का भी इंतज़ाम किया था। वे सफ़ेद चमकदार वर्दी पहने ट्रे उठाए इधर-उधर घूम रहे थे और मेहमानों की ख़िदमत कर रहे थे।

लेकिन आज फ़लकी केवल घर की बेगम बनकर नहीं बैठी थी। मेहमानों को बैठाने के बाद वह तुरंत रसोई का भी एक चक्कर लगा आती। खाना ठीक से बन रहा है या नहीं, यह देखती। फिर डाइनिंग टेबल पर नज़र डालती। अगर नौकरों को कोई और हिदायत देनी होती, तो वह भी देती।

आज पहली बार उसे महसूस हो रहा था कि वह सचमुच इस घर की मालकिन है। उसके भीतर केवल मालकिन होने का एहसास ही नहीं, बल्कि उसे निभाने की क्षमता भी पैदा हो चुकी थी।

उसके भीतर केवल मालिकाना क्षमता ही नहीं आई थी, बल्कि वही मालिकाना आत्मविश्वास, गरिमा और खुशी भी आ गई थी। वह बड़े ठाठ से सबसे मिलती, पूरे आत्मविश्वास से बातें करती और पूरे सम्मान के साथ मुस्कुराती।

आफ़ाक कभी उसका हाथ पकड़कर उसे एक ओर ले जाता, तो कभी दूसरी ओर। और सबसे उसका परिचय कराने का उसका अंदाज़ भी कितना निराला था।

“मिलिए, ये हैं मेरी फ़लक।”

तब कोई हँसकर कह देता,

“अरे, अब बस भी कीजिए! यह तो सब जानते हैं कि ये आपकी फ़लक हैं।”

यह सुनकर फ़लकी शर्म से मुस्कुरा देती, धीरे से अपना हाथ छुड़ाकर किसी और काम में लग जाती।

आज लोगों की बातें भी उसे बहुत अच्छी लग रही थीं।

एक महिला बोली,

“अरे वाह, मिसेज़ आफ़ाक! आप तो पहले से भी ज़्यादा खूबसूरत लग रही हैं।”

फ़लकी मन ही मन सोचने लगी—“इन्हें क्या पता कि मुझ पर चर्बी कैसे चढ़ सकती है? मैंने ज़िंदगी में कितनी मेहनत और कितनी मशक्कत की है। बल्कि मैं तो पहले से और भी दुबली हो गई हूँ। रंगत भी पहले जैसी नहीं रही। फिर भी लोग कह रहे हैं कि मैं पहले से ज़्यादा सुंदर लग रही हूँ।”

दूसरी महिला मुस्कुराकर बोली,

“देखिए तो, कितनी स्मार्ट हो गई हैं। शादी वाली चर्बी तो इन पर चढ़ी ही नहीं!”

फ़लकी के मन में आया—

“अजीब दस्तूर हैं इस दुनिया के। जब कोई फूल अपनी सारी ताज़गी और नर्मी लुटा देता है, तब लोग कहते हैं कि वह और भी खूबसूरत हो गया है।”

तभी एक और महिला ने हैरानी से पूछा,

“अरे, ये मोटी कैसे हो गईं? मोटापा तो बच्चा होने के बाद आता है…”

एक महिला ने प्यार से फ़लकी की कमर में हाथ डालते हुए कहा।

फ़लकी का दिल ज़ोर से धड़क उठा। वह घबराकर आफ़ाक की तरफ़ देखने लगी। वह उधर ही आ रहा था और उस महिला की बात भी सुन चुका था।

फ़लकी के मन में डर समा गया। कहीं आज उसकी ज़िंदगी का यह राज़ खुल न जाए…

उसी समय आफ़ाक उनके पास आकर खड़ा हो गया। उसने फ़लकी का हाथ थामते हुए मुस्कुराकर कहा,

“ख़वातीनो हज़रात! मेरी इस नन्ही-सी फ़लकी को एम्बैरस (Embarrass) मत कीजिए। मैं इतना खुदगर्ज़ नहीं हूँ कि इतनी ख़ूबसूरत बीवी को इतनी जल्दी बच्चों की ज़िम्मेदारी में उलझा दूँ… अभी नहीं।”

इतना कहकर उसने शरारत से एक आँख दबा दी।

उसकी बात सुनते ही पूरे हॉल में ठहाके गूँज उठे।

फ़लकी ने मन ही मन सोचा—

“काश… यह बात सच होती।”

आज तो महफ़िल के लगभग सभी मर्दों की नज़रें बार-बार फ़लकी पर ठहर रही थीं। हर कोई उसकी तारीफ़ कर रहा था। उनकी निगाहें मानो यही कह रही थीं कि आज की शाम की रानी वही है और इस पूरी महफ़िल में सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत भी वही लग रही है।

जमाल साहब तो साफ़-साफ़ बोले,

“यार, तुम्हारी बीवी तो आज भी उतनी ही ताज़ा-दम और ख़ूबसूरत लग रही है। और तुम भी बड़े खुश नज़र आ रहे हो। लगता है किस्मत तुम पर मेहरबान हो गई है।”

आफ़ाक हँस पड़ा।

“जमाल साहब, किस्मत मुझ पर कब मेहरबान नहीं रही? असल बात तो यह है कि मैं दिल का अच्छा आदमी हूँ और बुनियादी तौर पर ईमानदार भी हूँ… है न, फ़लक?”

यह कहकर उसने फ़लकी की ओर देखा।

आज फ़लकी भी बार-बार आफ़ाक को देख रही थी। काले ड्रेस सूट, सफ़ेद कमीज़ और लाल……लाल प्रिंट वाली टाई में वह अपनी उम्र से भी कम दिखाई दे रहा था। काले ड्रेस सूट, सफ़ेद कमीज़ और लाल प्रिंटेड टाई में आफ़ाक बेहद आकर्षक लग रहा था। उसके चेहरे पर मासूमियत झलक रही थी। कहीं भी बनावटीपन या चालाकी का कोई निशान नहीं था।

जब भी कोई फ़लकी की ख़ूबसूरती की तारीफ़ करता, तो वह चाहती कि आफ़ाक भी वह तारीफ़ सुन ले। उसे अपने भीतर एक अजीब-सा बदलाव महसूस हो रहा था।

पहले जब वह सज-धजकर महफ़िलों में जाती थी, तो इधर-उधर घूमती रहती। अगर कोई पुरुष उसकी तारीफ़ कर देता, तो वह अपने नाज़-ओ-अंदाज़ से बार-बार उसी पर ध्यान देती और उसकी प्रशंसा का आनंद लेती।

लेकिन आज उसे पुरुषों की बेबाक तारीफ़ बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही थी। आज वह सिर्फ़ एक इंसान की तारीफ़ सुनना चाहती थी—आफ़ाक की।

उसे लग रहा था कि उसकी सुंदरता पर राय देने का हक़ सिर्फ़ आफ़ाक को है। इसलिए वह ज़्यादातर समय उसी के पास जाकर खड़ी रहती, ताकि उसकी गैरमौजूदगी में किसी को उससे कुछ कहने का मौका न मिले। और अगर कोई कुछ कहे भी, तो आफ़ाक खुद सुन ले। वह चाहती थी कि आफ़ाक समझ जाए कि उसके सामने किसी और की राय उसके लिए कोई मायने नहीं रखती।

लेकिन फ़लकी ने देखा कि आफ़ाक बार-बार एक काली साड़ी पहने महिला के पास जाकर खड़ा हो जाता था।

अनायास ही फ़लकी की नज़रें भी उसका पीछा करते-करते वहीं जाकर ठहर जातीं।

वह एक युवा लड़की थी, जो सबसे आखिर में आई थी। उसने काली साड़ी पहन रखी थी और उसके साथ काफ़ी छोटा ब्लाउज़ पहना था। उसका मेकअप बहुत सलीके से किया गया था। वह इतनी ख़ूबसूरत थी कि पहली ही नज़र में उसे देखकर फ़लकी को एक झटका-सा लगा।

फ़लकी को महसूस हुआ कि पूरी महफ़िल में शायद वही एक ऐसी महिला है जो उससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत है। और अगर ख़ूबसूरती में उससे आगे नहीं भी थी, तो उसके बराबर तो ज़रूर थी। शायद दोनों की सुंदरता का अंदाज़ अलग-अलग था। अपनी-अपनी जगह दोनों ही बेहद आकर्षक लग रही थीं।

जब वह महिला महफ़िल में आई थी, उस समय फ़लकी रसोई में नौकरों को हिदायतें देने गई हुई थी। जब वह वापस लौटी, तो उसने देखा कि आफ़ाक उसी काली साड़ी वाली महिला से बातें कर रहा है।

जब फ़लकी उनके पास से गुज़रने लगी, तो आफ़ाक ने कहा,

“फ़लक, क्या तुम नूरी को जानती हो?”

“नहीं।” फ़लकी ने सिर हिलाकर जवाब दिया।

आफ़ाक ने परिचय कराया,

“ये अमेरिका में मेरी क्लासफ़ेलो थीं।”

“अच्छा… आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई।”

यह कहते हुए फ़लकी आगे बढ़ी और नूरी से हाथ मिला लिया।

फिर जैसे ही आफ़ाक किसी दूसरे मेहमान से बात करने लगा, फ़लकी ने तुरंत नूरी से पूछा,

“आजकल आप कहाँ हैं?”

“आजकल तो मैं पाकिस्तान में हूँ।”

“क्या आप हमेशा के लिए वापस आ गई हैं?”

“लगभग… आ ही गई हूँ, या यूँ कहिए कि अब यहीं रहने वाली हूँ।”

“अमेरिका क्यों छोड़ दिया?”

इतने में आफ़ाक फिर उनकी ओर आ गया। उसने फ़लकी के सवाल का जवाब खुद ही दे दिया,

“क्योंकि इनका दिल पाकिस्तान में था।”

यह सुनते ही नूरी इतनी ख़ूबसूरती से हँसी कि फ़लकी को पहली बार एहसास हुआ कि झरने जैसी हँसी किसे कहते हैं।

नूरी मुस्कुराकर बोली,

“आफ़ू ने बिल्कुल सच कहा है। मेरा दिल पाकिस्तान में ही था। मैंने सोचा, जब दिल ही पाकिस्तान में है तो अपना शरीर अमेरिका में रखकर क्या करूँगी?”

इतने में किसी ने फ़लकी को आवाज़ दी और वह दूसरी ओर चली गई।

लेकिन उसके बाद भी, जब-जब वह किसी से बात करती, किसी मेहमान को कुछ परोसती, या इधर-उधर आती-जाती, उसकी नज़र अनायास ही उस काली साड़ी वाली नूरी पर जाकर ठहर जाती।

वह लगातार मिस्टर आफ़ाक……से बातें कर रही थी। उसकी मुस्कुराती हुई सूरत काली साड़ी में ऐसे निखर रही थी, जैसे काले आसमान में चाँद चमकता हो। हर कोई उससे बात करना चाहता था। कोई न कोई उठकर उसके पास पहुँच जाता।

पता नहीं वह अपनी बातों में ऐसा क्या जादू घोल देती थी, या उसकी बातचीत में ऐसी क्या मिठास और ख़ुशबू थी कि जो भी उसके पास जाकर खड़ा होता, मुस्कुराए बिना नहीं रहता।

तब फ़लकी को पहली बार महसूस हुआ कि किसी औरत के लिए केवल ख़ूबसूरत होना ही काफ़ी नहीं होता। उसे ख़ूबसूरती से बात करना भी आना चाहिए। उसके शब्दों का चुनाव भी सलीकेदार और शालीन होना चाहिए। और सबसे बढ़कर उसकी हँसी… उसकी हँसी उसकी शख़्सियत की जान होनी चाहिए।

उसे लगा कि केवल अकड़कर रहने वाली औरतें पुरुषों को पसंद नहीं आतीं। अगर बातचीत में ज्ञान, अपनापन और मिठास न हो, तो कोई भी लंबे समय तक प्रभावित नहीं होता।

फ़लकी नहीं जानती थी कि वह कैसी बातें करती है और कैसे मुस्कुराती है, लेकिन उसे पूरा यक़ीन था कि वह नूरी की तरह विद्वता और काव्यमय अंदाज़ में बातें कभी नहीं कर सकती। उसकी हर बात और हर अदा में केवल घमंड झलकता था—अपनी जवानी और अपनी ख़ूबसूरती का घमंड।

हाँ… सचमुच…

उसे बचपन से ही लोगों से कुछ तिरस्कार और ऊँचेपन के भाव से बात करने की आदत थी। यही व्यवहार उसने आफ़ाक के साथ भी अपनाया था।

वह सोचने लगी—

“क्या कोई पति भी ऐसे व्यवहार से अपना बनता है?”

यह ख़याल आते ही उसके दिल में एक टीस-सी उठी। उससे कितनी गलतियाँ हुई थीं।

आज की इस महफ़िल में वह हर महिला को ध्यान से देख रही थी। कोई भी महिला अशिष्ट व्यवहार नहीं कर रही थी। न कोई अपने पति से ऊँची आवाज़ में बात कर रही थी और न ही किसी की हँसी में अभद्रता या बेबाकी की झलक थी।

फ़लकी के मन में आया—

“ज़िंदगी में सीखने के लिए कितना कुछ है… और मैंने अब तक क्या सीखा है?”

इस बार जब फ़लकी आफ़ाक और नूरी के पास से गुज़री, तो उसने नूरी को हल्की-सी मदहोश आवाज़ में कहते सुना,

“ओ आफ़ू! जब से तुमने अमेरिका छोड़ा है, मैंने तो उस झील के किनारे जाना ही छोड़ दिया।”

“अच्छा…?”

“हाँ, तुम्हें तो पता है, कमल के फूल मेरी जान हैं।”

आफ़ाक मुस्कुराकर बोला,

“ऐसे मत कहो, कहीं लोगों को कमल के फूलों से ही जलन न होने लगे।”

यह सुनकर नूरी फिर उसी झरने जैसी खनकती हँसी हँस पड़ी।

फ़लकी वहाँ से तो गुज़र गई, लेकिन उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके पैर में बिच्छू का डंक मार दिया हो।

नूरी ने कोई ऐसी ख़ास बात नहीं कही थी। आफ़ाक ने भी कोई ऐसा इशारा नहीं किया था। फिर भी… न जाने क्यों फ़लकी यह सब सुन नहीं पा रही थी।

उसे तो आफ़ाक का बार-बार नूरी के पास जाकर खड़ा होना भी अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए वह कभी किसी बहाने से उनकी दाईं ओर से गुज़र जाती, तो कभी बाईं ओर से।

कभी उनकी अधूरी बातें उसके कानों में पड़तीं, तो कभी कोई पूरा वाक्य। हर बार वह भीतर-ही-भीतर जलती और कुढ़ती हुई वहाँ से निकल जाती।

न आफ़ाक उसे बुलाता, न नूरी। दोनों आपस की बातचीत में इतने मग्न थे कि जैसे उन्हें आसपास की दुनिया का ध्यान ही न हो।

कुछ देर बाद फ़लकी दूर बैठकर ही उन दोनों को देखने लगी।

उसे लगा कि आफ़ाक आज बहुत खुश दिखाई दे रहा है। वह नूरी की ओर भी बड़े अपनापन और दिलचस्पी से देख रहा था।

फ़लकी के मन में एक टीस उठी—

“कहीं ऐसा तो नहीं कि ये दोनों बचपन से एक-दूसरे को चाहते हों? अगर ऐसा था… तो फिर मुझसे शादी क्यों की?”

…तो उसी से शादी कर लेता। मुझसे शादी करने की क्या ज़रूरत थी? पता नहीं कैसी मजबूरी रही होगी कि दोनों की शादी नहीं हो सकी… और अब यह मेरी ज़िंदगी बर्बाद करने आ गई है।

अचानक फ़लकी खुद ही अपनी सोच पर हल्का-सा हँस पड़ी।

“मैं कैसी बातें सोच रही हूँ! मेरी ज़िंदगी का आफ़ाक से आख़िर क्या रिश्ता है? उसने मुझसे मोहब्बत का दावा ही कब किया था? और मैं भी कब उसके साथ रहना चाहती थी? मैं तो हर वक़्त यहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर चले जाने की सोचती रहती हूँ। फिर मुझे क्या फ़र्क पड़ता है कि वह किसके साथ रहे, किससे मोहब्बत करे या किससे इश्क़…”

“हाँ…”

फ़लकी ने झटके से अपने ख़यालों को रोक दिया।

“मुझे आफ़ाक की क्या परवाह?”

लेकिन इसके बावजूद उसकी नज़र बार-बार उसी काली साड़ी पर जाकर ठहर जाती।

वह मन ही मन सोचने लगी—

“मुझे तो कह दिया था कि काली साड़ी मत पहनना… और खुद उसी पर नज़रें टिकाए हुए है।”

फिर एक और ख़याल आया—

“शायद इसी वजह से उसने मुझे काली साड़ी पहनने से मना किया था। उसे तो पहले से पता था कि उसकी सहेली काली साड़ी पहनकर आने वाली है।”

यह सोचते ही अचानक उसे अपनी लाल साड़ी और अपने पूरे श्रृंगार से नफ़रत-सी होने लगी।

उसका मन किया कि सब कुछ उतारकर फेंक दे।

न जाने क्यों उसकी आँखें बार-बार भर आ रही थीं।

वह बार-बार खुद को समझाती—

“मुझे कोई परवाह नहीं… बिल्कुल भी नहीं। मुझे इससे ज़रा भी फ़र्क नहीं पड़ता। मेरे जूते की नोक पर…”

लेकिन उसके दिल में लगातार एक टीस उठ रही थी। वह एक अजीब-सी पीड़ा से गुज़र रही थी।

“यह कैसा दर्द है?”

वह खुद भी समझ नहीं पा रही थी।

हाँ, इतना वह ज़रूर समझ गई थी कि अपने चेहरे या अपनी बातों से अपने जज़्बात ज़ाहिर नहीं होने देने हैं। इसलिए वह बाहर से मुस्कुराते हुए सबसे बातें कर रही थी, लेकिन कोई नहीं जानता था कि उसके दिल पर क्या बीत रही है।

इसी बीच खाने का समय हो गया। आफ़ाक उसके पास आया और बोला,

“ज़रा खाना लगवा दो।”

हाय…

आज उसने कितने अरमानों से सारा खाना अपने हाथों से बनाया था। वह कितनी खुश थी कि आज उसने खुद को एक पूर्ण गृहिणी के रूप में साबित कर दिया है। उसे उम्मीद थी कि आज आफ़ाक उसका शुक्रगुज़ार होगा, उसके साथ रहेगा और मेहमानों के सामने उसकी मेहनत की तारीफ़ करेगा। उसे लगा था कि दोनों साथ-साथ मेहमानों के बीच इस तरह घूमेंगे जैसे उनसे बढ़कर कोई जोड़ी ही न हो।

शुरुआत में तो सब कुछ वैसा ही हुआ भी था…

लेकिन फिर यह नूरी आ गई और जैसे पूरे माहौल का रंग ही बदल गया।

फिर उसने खुद ही सोचा—

“नहीं… इसमें नूरी का क्या कसूर? अगर आफ़ाक उसे न बुलाता, तो शायद ऐसा कुछ भी न होता।”

वह खाना भी परोसती जा रही थी और साथ-साथ इन्हीं ख़यालों में खोई हुई थी।

जब बैरों ने सारा खाना डाइनिंग टेबल पर सजा दिया, तो वह डाइनिंग हॉल में आई। उसने एक नज़र सभी मेज़ों पर डाली और फिर आफ़ाक की ओर देखा।

आफ़ाक ने सभी मेहमानों से खाने की मेज़ की ओर आने का अनुरोध किया। सब लोग धीरे-धीरे डाइनिंग हॉल की तरफ़ बढ़ने लगे।

तभी अलग-अलग आवाज़ें सुनाई देने लगीं—

“वाह! कितनी प्यारी ख़ुशबू आ रही है!”

“मुझे तो सिर्फ़ ख़ुशबू सूँघते ही भूख लग जाती है।”

“देखने से ही लग रहा है कि खाना बहुत लज़ीज़ होगा।”

“आफ़ाक, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी कि तुम हमेशा अपने घर की परंपरा और मेहमाननवाज़ी की रिवायत को बनाए रखोगे।”

“ख़वातीनो हज़रात!”

आफ़ाक ने अचानक ऊँची आवाज़ में पुकारा।

“जहाँ-जहाँ आपके हाथ और चम्मच हैं, वहीं रोक लीजिए। पहले मैं आपको एक ख़बर सुनाना चाहता हूँ।”

कुछ मेहमान अपनी प्लेटों में खाना परोस चुके थे। कुछ अभी परोस रहे थे और कुछ पहला निवाला मुँह तक ले जाने ही वाले थे।

आफ़ाक की बात सुनते ही सब रुक गए।

पूरा हॉल एक पल के लिए शांत हो गया।

फ़लकी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

“अब यह क्या कहने वाले हैं?”

आफ़ाक ने दोनों हाथ ऊपर उठाए हुए थे और मुस्कुरा रहा था। जब उसने देखा कि सब लोग सचमुच रुक गए हैं और उसकी बात सुनने का इंतज़ार कर रहे हैं, तो वह बोला,

“आप सबकी जानकारी के लिए मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि आज की दावत का पूरा खाना मेरी प्यारी बीवी, बेगम फ़लक नाज़, ने अपने ख़ूबसूरत हाथों से तैयार किया है। एक-एक चीज़…”

फिर उसने मुस्कुराते हुए फ़लकी की कमर में हाथ रखा और कहा,

“अब आप लोग खाना शुरू कीजिए और अपनी राय सीधे इन्हें दीजिए।”

यह सुनते ही पूरे हॉल में ज़ोरदार तालियाँ गूँज उठीं।

उसके बाद फिर से प्लेटों, चम्मचों और छुरियों की आवाज़ों के साथ खाने का दौर शुरू हो गया।

लेकिन इस घोषणा का असर उम्मीद से भी ज़्यादा अच्छा हुआ।

हर निवाले के साथ फ़लकी को नई-नई तारीफ़ें मिलने लगीं।

किसी को रोस्ट बहुत पसंद आया, किसी को चाँप। किसी ने क़ोरमा की तारीफ़ की, तो किसी ने साग की। कोई पुलाव की प्रशंसा कर रहा था, तो कोई सलाद का स्वाद सराह रहा था। किसी को मिठाई लाजवाब लगी, तो कोई कोफ़्तों का दीवाना हो गया।

कई महिलाओं को तो यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी सारी चीज़ें फ़लकी ने अकेले अपने हाथों से बनाई हैं।

फ़लकी मुस्कुराते हुए सबकी तारीफ़ें स्वीकार कर रही थी।

आख़िर वही हुआ था, जिसकी उसने दिल से चाह की थी।

फिर भी…

न जाने क्यों वह पूरी तरह खुश नहीं थी। उसकी खुशी में जैसे कहीं कोई कमी रह गई थी। उसका दिल बार-बार भारी हो जाता। आँखें भर आतीं। सब कुछ अजीब-सा उदास लग रहा था।

इसके बावजूद फ़लकी पूरे सम्मान और गरिमा के साथ मेहमानों की ख़ातिरदारी करती रही और उनकी तारीफ़ें मुस्कुराकर स्वीकार करती रही।

खाने के दौरान भी और उसके बाद भी ऐसा कोई मेहमान नहीं था जिसने खाने की प्रशंसा न की हो।

सब लोग खाने की तारीफ़ तो कर रहे थे, लेकिन साथ ही बार-बार हैरानी से फ़लकी की ओर भी देख लेते। जैसे उन्हें यक़ीन ही न हो कि इतनी नाज़ुक, फैशनेबल और सजी-धजी लड़की इतना लज़ीज़ खाना भी बना सकती है।

खुद फ़लकी को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि इतनी बड़ी दावत का पूरा इंतज़ाम उसने अकेले किया है। उसने दो दिनों तक जी-जान लगाकर मेहनत की थी। पता नहीं क्यों उसने इस दावत को अपनी ज़िंदगी की सबसे कठिन परीक्षा मान लिया था।

उसने हर व्यंजन बनाते समय अल्लाह से दुआ की थी, और सचमुच हर चीज़ रंग, ख़ुशबू और स्वाद—हर लिहाज़ से बेहतरीन बनी थी।

हर किसी की ज़ुबान पर बस एक ही शब्द था—

“वाह!”

लेकिन…

फिर फ़लकी के दिल से बार-बार आह क्यों निकल रही थी?

वह खुद भी इसका जवाब नहीं समझ पा रही थी।

उसकी नज़रें बार-बार आफ़ाक की तरफ़ उठ जातीं। हालाँकि आफ़ाक ने अभी तक खुद खाने की तारीफ़ नहीं की थी, लेकिन वह भी बहुत खुश दिखाई दे रहा था। वह मेहमानों से मिल रहा था, उनकी बधाइयाँ और तारीफ़ें स्वीकार कर रहा था, कभी किसी को कोई डिश परोस देता…

और फिर लौटकर नूरी के पास जाकर खड़ा हो जाता।

बस यही बात फ़लकी के दिल में चुभ रही थी।

वह चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाती। वह कोई-न-कोई डिश उठाकर बार-बार उन दोनों के पास चली जाती।

नूरी ने नाज़ुक अंदाज़ में पूछा,

“अरे, ये कटलेट भी आपने ही बनाए हैं?”

फ़लकी ने बस चुपचाप सिर हिलाकर “हाँ” कह दिया।

नूरी ने एक निवाला खाते हुए कहा,

“सुब्हानअल्लाह! कितने लज़ीज़ हैं। मैं तो चार खा चुकी हूँ। आफ़ू, तुम बहुत ख़ुशनसीब हो कि तुम्हें ऐसी बीवी मिली है।”

आफ़ाक मुस्कुराकर बोला,

“ख़ुशनसीब मैं हूँ… या ये?”

जवाब में नूरी मुस्कुरा दी। उसकी हँसी चाँदी के घुँघरुओं-सी खनक उठी। फिर उसने फ़लकी की आँखों में देखते हुए कहा,

“तो अब तक तुम आफ़ू के दिल तक पहुँच गई होगी?”

आफ़ाक ने शरारती अंदाज़ में कहा,

“यह तो तुम जानती हो… वहाँ इन दिनों बहुत ट्रैफ़िक है।”

“हाँ…” नूरी ने “हाँ” को थोड़ा लंबा खींचते हुए कहा, “मुझसे बेहतर यह कौन जान सकता है?”

फिर उसने एक और निवाला खाया और मुस्कुराकर बोली,

“बहरहाल, फ़लकी एक बहुत अच्छी लड़की है।”

यह सुनकर फ़लकी वहाँ से हट गई। अब उसके लिए वहाँ एक पल भी खड़े रहना मुश्किल हो गया था।

नूरी की आँखें बहुत ख़ूबसूरत थीं—बड़ी-बड़ी, काली और चमकदार। जब वह पूरी आँखें खोलकर किसी से बात करती, तो लगता जैसे सामने वाला उन आँखों की गहराई में डूबता चला जाए।

फ़लकी को उसकी आँखें काले नाग की तरह लगीं, जिनका डसा हुआ पानी भी नहीं माँगता।

ज़िंदगी में पहली बार…

पहली बार फ़लकी को किसी दूसरी औरत से ईर्ष्या महसूस हुई।

बहुत गहरी… बहुत तीखी ईर्ष्या।

वरना आज तक वह किसी को अपना मुकाबला ही नहीं समझती थी। उसे हमेशा लगता था कि न तो कोई उससे ज़्यादा ख़ूबसूरत है और न ही उससे ज़्यादा आकर्षक या सलीकेदार।

…और सबसे बढ़कर, आफ़ाक का हर समय नूरी के आसपास मंडराना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे कोई उसकी सबसे अनमोल चीज़ उससे छीनकर ले जा रहा हो।

फिर उसने खुद को समझाया—

“मुझे क्या…? मुझे आफ़ाक की क्यों परवाह हो? मैं उसे क्या समझती हूँ? मुझे कौन-सा सारी उम्र उसके साथ रहना है। क्या पता, उसकी आदत ही ऐसी हो। शायद उसकी और भी कई सहेलियाँ हों…”

“मुझे क्या…”

“मुझे क्या…”

वह बार-बार अपने दिल को यही समझाने की कोशिश करती, लेकिन न जाने क्यों उसका मन और भी बुझता जा रहा था।

खाना खत्म हो गया। सभी मेहमान आपस में बातचीत में व्यस्त हो गए।

फ़लकी रसोई की ओर बर्तन उठवाने चली गई। काम करते-करते उसकी साड़ी कहीं उलझ गई। उसी पल उसे अपनी लाल साड़ी इतनी बुरी लगी कि उसका मन किया उसे आग लगा दे।

न जाने क्यों लाल रंग उसके नसीब में नहीं था, जबकि यही रंग उसे सबसे ज़्यादा पसंद था। आज उसने बेवजह यह लाल साड़ी पहन ली थी।

वह सोचने लगी—

“काश, मैंने वही काली साड़ी पहन ली होती। शायद उसमें मैं नूरी से ज़्यादा अच्छी लगती।”

उसके कदम जैसे भारी हो गए थे।

तभी अचानक आफ़ाक की आवाज़ सुनाई दी—

“अरे फ़लक! कहाँ हो? मेहमान विदा लेना चाहते हैं।”

वह जल्दी-जल्दी बाहर आई।

उसने देखा, नूरी दरवाज़े के पास खड़ी थी।

नूरी ने आगे बढ़कर फ़लकी का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा,

“अच्छा, अब मुझे इजाज़त दो। खाना बहुत मज़ेदार था, महफ़िल भी बहुत ख़ूबसूरत रही। तुमसे मिलकर सचमुच बहुत खुशी हुई।”

फ़लकी ने धीमे और कुछ बुझे हुए स्वर में पूछा,

“लेकिन… आप इतनी जल्दी क्यों जा रही हैं?”

“मैं भी इन्हें रोक रहा हूँ,” आफ़ाक बोला, “अभी तो महफ़िल जमेगी। गाना-बजाना होगा। इतनी ज़ौक़ीन होकर भी तुम इतनी जल्दी क्यों जा रही हो?”

नूरी मुस्कुराकर बोली,

“देखो आफ़ू, तुमसे वादा किया था, इसलिए आ गई। वरना इतने कम समय की सूचना पर मेरा आना बहुत मुश्किल था। आज मेरी एक कज़िन की मेहंदी है। अब थोड़ी देर के लिए वहाँ भी जाना पड़ेगा। अगर नहीं गई, तो मेरी ख़ैर नहीं।”

आफ़ाक हँसते हुए बोला,

“मुझे तो आज दोपहर में ही पता चला कि तुम अमेरिका से वापस आ गई हो। तभी तुरंत फ़ोन कर दिया। तुमने भी तो आकर कोई ख़बर नहीं दी थी।”

नूरी ने हल्की शिकायत के अंदाज़ में कहा,

“आफ़ू! तुम्हारा फ़ोन नंबर मुझसे खो गया था। मुझे किसी ने बताया था कि तुम्हारी शादी हो गई है। मैं तुम्हें मुबारकबाद देना चाहती थी, लेकिन मुझे पाकिस्तान आए अभी सिर्फ़ एक महीना हुआ है। सोच रही थी कि तुम्हें ढूँढ़ निकालूँगी।”

आफ़ाक मुस्कुराया,

“और उससे पहले मैंने तुम्हें ढूँढ़ लिया।”

नूरी हँसकर बोली,

“तुम हमेशा ऐसा ही करते हो।”

दोनों ज़ोर से हँस पड़े।

फिर नूरी ने फ़लकी से हाथ मिलाया और विदा ली। आफ़ाक उसे दरवाज़े तक छोड़ने गया।

दरवाज़े तक भी दोनों की हँसी की आवाज़ें लगातार सुनाई देती रहीं।

फ़लकी बुझी-बुझी-सी वापस आकर मेहमानों के बीच बैठ गई।

कुछ देर बाद आफ़ाक भी लौट आया।

फिर महफ़िल अपने पूरे रंग में आ गई। ढेर सारी बातें होने लगीं। पुराने गीतों के रिकॉर्ड बजाए गए। पुरानी यादें ताज़ा की गईं। वही सब कुछ हुआ, जो ऐसी महफ़िलों में अक्सर होता है।

लेकिन फ़लकी पूरे समय चुप रही।

रात लगभग बारह बजे मेहमान एक-एक करके विदा होने लगे। जैसे ही एक व्यक्ति उठा, उसके पीछे-पीछे बाकी सभी भी उठकर जाने लगे।

मेहमानों को विदा करते-करते साढ़े बारह बज गए।

जब पूरा हॉल खाली हो गया, तो फ़लकी ने नौकरों को बत्तियाँ बुझाने और दरवाज़े अच्छी तरह बंद करने की हिदायत दी। फिर वह अपने कमरे में चली गई।

उसने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े बदले। भारी गहने अब उसे बोझ लग रहे थे। जैसे ही उसने हल्के रात वाले कपड़े पहने, उसे एक अजीब-सा सुकून महसूस हुआ।

शायद आफ़ाक भी अपने कमरे में कपड़े बदलने चला गया था।

कुछ देर वह अपने बिस्तर पर चुपचाप बैठी रही। फिर उठकर बाहर आ गई।

हवा में हल्की-सी ठंडक थी। रात की रानी और मोगरे की ख़ुशबू पूरे आँगन में फैली हुई थी। नौकर बत्तियाँ बुझा चुके थे और अब दरवाज़े बंद कर रहे थे।

फ़लकी ने टीवी लाउंज की बड़ी काँच वाली खिड़की का पर्दा सरका दिया।

बाहर खुले आसमान में रात का चाँद धीरे-धीरे उग रहा था।

फ़लकी का मन बहुत उदास हो रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज उसे क्या हो गया है। रोने का भी मन नहीं था… बस गहरी उदासी ने उसे घेर लिया था।

कभी-कभी ऐसा होता है न…

मानो दिल पर मनों बर्फ़ जमने लगे…

जज़्बात सुन्न पड़ जाएँ…

आँखें कुछ भी देखने से इनकार कर दें…

कान किसी आवाज़ को सुनना न चाहें…

और होंठों पर ख़ामोशी की मुहर लग जाए।

ऐसे समय इंसान का मन करता है कि चारों तरफ़ सिर्फ़ सन्नाटा हो…

ख़ामोशी हो…

तन्हाई हो…

और कोई भी आसपास न हो…

कोई भी यह न जान पाए कि उसके भीतर क्या चल रहा है।

बस दिल की धड़कन सुनाई देती रहे…

और फिर इंसान खुद से भी बेगाना हो जाए।

अपने आप से तो वह जाने कब की बेगानी हो चुकी थी।

लेकिन आज…

न जाने वह कौन-सी मंज़िल थी…

शायद अपने ही एहसास से परे…

एक ऐसी मंज़िल, जो समझ और चेतना की सीमा से भी आगे थी।

 

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