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Home»Hindi Novel»Lagan ( hindi novel )

Lagan (Hindi Novel) Part 5

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailAugust 2, 2026Updated:August 2, 2026 Lagan ( hindi novel ) No Comments38 Mins Read
Lagan Hindi Novel Part 5,novelkistories Feature Image
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बेहद ख़तरनाक क़दम है।

फिर उसे कई ग़रीब लोगों का ख़याल आया। फ़क़ीरों की याद आई। जब भी उसकी कार बाज़ार में जाकर रुकती, कई फ़क़ीर और बच्चे हाथ फैला कर कहते—
“रात से भूखा हूँ, रोटी खिला दो!”

अगरचे वह पैसे दे देती, मगर दिल में सोचती— उन्हें खाने की क्या ज़रूरत है? ये सूखी हड्डियाँ और काली चमड़ी… खाने-पीने से क्या फ़ायदा?
अगर ये लोग न भी खाएँ तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा? अगर ग़रीब ज़िंदा भी रहें तो कौन-सी कमी हो जाएगी?
अगर लोगों के पास रोटी नहीं है तो इसमें मेरी क्या गलती? फिर क्या ये ज़रूरी है कि इंसान सिर्फ़ रोटी ही खाए?
फल खाए जा सकते हैं, आइसक्रीम खाई जा सकती है, केक-बिस्किट खाए जा सकते हैं… मगर नहीं, ये सब रोटी के लिए ही मरे जा रहे हैं!

आज उसे एहसास हुआ कि हर कोई रोटी क्यों माँगता है। हर इंसान रोटी की दौड़ में क्यों भाग रहा है।

उसने कभी रोज़ा नहीं रखा था। उसे रोज़े से बहुत डर लगता था।
उसके घर में कोई भी रोज़ा नहीं रखता था और उसकी मम्मी हमेशा कहतीं—
“तू अभी बच्ची है, तुझे रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं!”

वैसे भी, मम्मी का मानना था कि रोज़ा सिर्फ़ मिडिल क्लास लोगों की चीज़ है। ऐसे ही अल्लाह को ख़ुश करने के लिए रोज़ा रख लेते हैं।
फिर उसे डर भी लगता था। वह हर समय कुछ न कुछ खाती रहती थी। वह सोचती, अगर मैंने रोज़ा रख लिया, तो ज़रूर मर जाऊँगी!

एक बार हॉस्टल में उसकी सहेलियों ने ज़बरदस्ती उससे रोज़ा रखवा दिया।
सुबह नाश्ते के वक़्त से ही उसने रोना शुरू कर दिया था। उसकी हालत देखकर वार्डन ने उसका रोज़ा तुड़वा दिया।

फिर उसने यह कारनामा मम्मी को भी आकर सुनाया था।
मम्मी हंसकर बोली थीं—
“बेचारी डार्लिंग! तुझे क्या ज़रूरत थी रोज़ा रखने की? अल्लाह का दिया हुआ सब कुछ है, मुझे तो इसमें कोई समझदारी नज़र नहीं आती। दुनिया की नेमतें तेरे चारों ओर बिखरी हैं और तू ख़ामख़ा भूखी-प्यासी बैठी रहे!”

मगर आज उसे एहसास हो रहा था कि रोज़ा क्यों ज़रूरी है।
अगर उसने कभी रोज़े रखे होते, तो उसकी आत्मसंयम की शक्ति जाग चुकी होती।
कम से कम चौबीस घंटे तो वह ज़िंदा रह सकती थी।

मगर अब तो ऐसा लग रहा था जैसे जान ही निकल जाएगी।
ऐसा महसूस हो रहा था कि आज ही उसके सारे गुनाहों की सज़ा मिल जाएगी।

 

“हाय अल्लाह!”
दिल अंदर ही अंदर धंसता जा रहा था।
आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था।
हाथ-पैर ठंडे होते जा रहे थे।
रोना चाहा, मगर रोने की ताकत भी न रही।
निढाल होकर वह सोफे पर गिर पड़ी और अपने मरने का इंतज़ार करने लगी।

“मेरे डैडी तो यही समझेंगे कि उनकी लाड़ली का हार्ट फेल हो गया।”
लेकिन उन्हें कौन बताएगा कि नाज़ों में पली-बीती फ़लक़ी एक निवाले के लिए तरस गई थी!

यह सोचते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए।
मगर इस बार आँसू भी बहुत तकलीफ़ से आए, जैसे ज़ख़्मों से गुज़रकर बह रहे हों।
दोनों आँखें बोझिल हो गईं, पलके दुखने लगीं।
क्या आँसुओं का ख़ज़ाना भी ख़त्म हो गया?
और अब आँखों से जैसे जिस्म का ख़ून बहने लगा।

उसका सिर एक तरफ़ झुक गया।
दो-चार आँसू गिरे… और फिर रुक गए।

बारह बजे…
एक बजे…
दो बजे…
और तीन बज गए…

भूखे-प्यासे पच्चीस घंटे हो चुके थे।
कल दोपहर दो बजे उसने आख़िरी बार खाना खाया था।
पता नहीं, उसकी मौत कैसी होगी?

वह सोचने लगी— कम से कम उठकर बिस्तर पर ही लेट जाऊँ…
शायद नींद आ जाए…

मगर बिस्तर तक जाने की भी हिम्मत न हुई।
अपने आप को ख़ुदा के हवाले करके वह वहीं सोफ़े पर बैठी रही।

उसका दिल चाहा कि उठकर एक चिट्ठी डैडी के नाम लिख दे—
“किसी और दुनिया में जा रही है आपकी फ़लक़ी!”

 

मगर उसके पास पेन तक नहीं था!
वैसे भी उसे अपने पर्स में पेन रखने का शौक़ नहीं था।
उसके पर्स में तो बस लिपस्टिक और आईशैडो रखा रहता था…

उसका दिल चाहा कि उठकर कमरे में कुछ तलाश करे—
शायद कोई पेन या पेंसिल मिल जाए…
मगर उठने की हिम्मत न हुई।

जब ज़बरदस्ती खड़ी होने की कोशिश की, तो ऐसा चक्कर आया कि लडख़ड़ाकर वापस बैठ गई।
इसके बाद कुछ भी उसके क़ाबू में न रहा।

धीरे-धीरे कमरे में अंधेरा उतरने लगा।
उसे एहसास हुआ— शाम हो गई है!

“हाय अल्लाह… अभी तो रात भी आ जाएगी!”
उसमें तो बत्ती जलाने की भी ताकत न थी।
और फिर… रात कैसे गुज़रेगी?

रात के ख़याल से ही उसे डर लगने लगा।
उसका पूरा जिस्म ठंडा पड़ गया।
अपनी बेबसी पर चीखने-चिल्लाने का दिल किया, मगर अब तो चिल्लाने की भी ताक़त नहीं थी।
शायद वह बेहोश हो चुकी थी या फिर ख़ून की कमी से सुन्न पड़ी थी।

तभी… अचानक दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

मगर वह अपनी जगह से हिल भी न सकी।
दरवाज़ा खुलने की ख़ुशी तक महसूस न कर सकी।

अंधेरे में कोई अंदर दाख़िल हुआ…
और अंदर आते ही उसने बत्ती जला दी।

कमरा रोशनी से भर गया।

फलक़ी ने देखा— वो “आफ़ाक़” था।

कमज़ोरी के मारे न वह उठ सकी, न ही ठीक से देख सकी।
आफ़ाक़ के हाथ में चाय की एक गर्म प्याली थी।

 

उसने चुपचाप तिपाई उठाकर फलक़ी के सामने रख दी…
और फिर उस पर चाय की प्याली रख दी…

प्याली  से गर्म-गर्म भाप निकल रही थी। फ्लकी की जान निकल रही थी।
दिल अंदर ही अंदर बैठा जा रहा था।
कौन जानता था कि कभी ऐसी स्थिति भी होगी।

उसे मालूम था कि यही चाय की गर्म-गर्म प्याली इस वक्त उसे बचा सकती है।
घर की इज्जत का तकाज़ा था कि वह यह प्याली उठाकर आफ़ाक़ के मुंह पर दे मारे, उसे धक्के देकर यहां से निकाल दे, उसके गिरेबान की धज्जियां उड़ा दे।
आह! वह क्या करे, क्या न करे?

फ्लकी ने दुख से आंखें बंद कर लीं।
आफ़ाक़ चाय रखकर बाहर चला गया।
फ्लकी ने फिर आंखें खोलीं। कुछ देर तक उस भाप को देखती रही, जो चाय में से निकल रही थी।
तब उसे ख्याल आया कि यह हल्की, नज़र न आने वाली हवा जो ऊपर उठ रही है, बिल्कुल इंसानी रूह से मिलती-जुलती है, जो जिस्म से निकलकर ऊपर की ओर गोल-गोल घूमती चली जाती है।
उसे एकदम झुरझुरी आ गई।

नहीं!
उसके शरीर पर ठंडा-ठंडा पसीना आ गया।

उसने फैसला कर लिया कि वह चाय ज़रूर पिएगी, चाहे यह बेगैरती ही क्यों न हो।
चाय पीने के बाद उसके जिस्म में गर्मी लौट आएगी और तब वह आफ़ाक़ से लड़ने के काबिल हो सकेगी।

हाँ, भला खाली पेट भी कोई किसी से लड़ सकता है?

 

वह ज़रा सा सीधी हो कर बैठी और अपने कमज़ोर हाथों से प्याली उठा ली।

जल्दी से मुंह से लगाया। होंठ जल गए। जीभ भी जल गई। मगर ज़रा-सी ज़िंदगी की गर्माहट महसूस हुई।
फिर धीरे-धीरे उसने पूरी प्याली खत्म कर ली। वाह! पेट भी अजीब चीज़ है।
खाना कितनी बड़ी हक़ीक़त है।

सिर्फ़ एक चाय की प्याली से ही जान में जान आ गई थी।
वरना उसे लग रहा था कि वह मर चुकी है।

दस-पंद्रह मिनट यहीं बैठी रही।
खाली पेट के लिए सिर्फ़ एक प्याली चाय काफ़ी नहीं थी, बल्कि अब तो भूख और भी तेज़ हो गई थी।
कुछ और खाने का मन कर रहा था।

थोड़ी देर बाद आहट हुई और फिर आफ़ाक़ कमरे में दाख़िल हुआ।
अब उसके हाथ में एक बड़ा थैला था। उसने उसे टेबल पर रख दिया।
एक प्लेट में नमकीन बिस्किट थे और दूसरी प्लेट में ताज़ा फल रखे हुए थे।
फिर वह चला गया।

फ्लकी ने बिस्किट वाली प्लेट उठा ली और एक-एक करके खाने लगी। बहुत अच्छे लग रहे थे।
देखते ही देखते उसने पूरी प्लेट ख़ाली कर दी… और उसके बाद फल खाने लगी।

 

वाकई, एक दिन की भूखी रहकर वह भारी खाना नहीं खा सकती थी।
पहले पेट को ऐसी हल्की-फुल्की चीज़ों की ज़रूरत थी।

पेट भर चुका था और शरीर में भी ताक़त लौट आई थी।
खाने के बाद थोड़ी देर तक वह सोफे पर आधी लेटी रही। फिर उठकर खड़ी हो गई…
कमरे में टहलने लगी।

अब वह ठीक थी।

जैसे ही शरीर में ज़िंदगी की लहर दौड़ी, उसके पुराने जज़्बात भी जागने लगे।
आफ़ाक़ के खिलाफ़ सारी नफ़रत ज़हर की तरह उभरने लगी।
मगर अब दरवाज़ा खुला था। वह बाहर जा सकती थी।

रात के आठ बज रहे थे।

काफ़ी देर तक वह बैठी सोचती रही—अब क्या करे?
उसे लगा कि आफ़ाक़ खुद अंदर आएगा।
हालाँकि उससे अपने रवैये पर माफ़ी मांगने की उम्मीद तो नहीं थी, फिर भी कोई ऐसी बात तो ज़रूर करेगा जिससे उसका दिल और जले।
बातचीत की शुरुआत तो करेगा ही।

मगर वह खुद क्या कहेगी?
क्या कोई फ़ैसला कर पाएगी?
काश! वह कोई फैसला ले पाती…

इस आदमी के सामने तो उसकी कभी नहीं चली।
अगर लड़ाई हुई तो?
तो-तो, मैं-मैं होगी।

पर इसका नतीजा क्या निकलेगा?

पहली बार जब उसने ज़ुबान चलाई थी… तो मार खाई थी।
अगर ज़्यादा बोलने की कोशिश की तो…?
मतलब यही होगा कि लगातार मार खाती रहेगी…

क्यों…?

 

उसने साफ़ बता दिया था कि ज़ुबान चलाने वाली औरत का अंजाम क्या होता है।

न उसके सामने कोई धमकी काम करती थी, न जुबान चलाने से फर्क पड़ता था,
न कोई चालाकी कारगर होती थी।

“ख़ुदाया! मैं क्या करूँ? मैं हार गई हूँ…”

नहीं! हारने का मतलब होगा कि उसे उस आदमी के इशारों पर चलना पड़ेगा,
उसकी पाबंदियों में रहना होगा—और ये वह हरगिज़ नहीं होने देगी!

तो फिर क्या किया जाए?

जब तक मम्मी और डैडी को हमख़्याल न बनाया जाए,
तब तक उससे निजात मिलना मुमकिन नहीं।

असलियत तो यह थी कि इतनी मार खाने के बाद वह उससे डर गई थी।
अब उसके मुँह नहीं लगना चाहती थी।
पूरा एक दिन और एक रात उसे भूखा-प्यासा कमरे में क़ैद करके
आफ़ाक़ ने उसे दिखा दिया था कि वह कितनी हद तक
सख़्ती और तशद्दुद कर सकता है।

“या अल्लाह! एक हफ़्ते में ही इतनी बड़ी तब्दीलियाँ आ गईं।
मेरी पूरी दुनिया बदल गई।”

और… इससे भी बुरा कुछ हो सकता था।

हाँ, वह उसे मार भी सकता था…
क़त्ल भी कर सकता था?

फ्लकी को झुरझुरी आ गई।

उसने घड़ी देखी—रात के दस बज रहे थे।

कमरे का दरवाज़ा खुला था। मगर ऐसा लग रहा था कि बाहर कोई नहीं है।

क्या वह फिर चला गया?
लेकिन दरवाज़ा खुला क्यों छोड़ गया?

 

छत्तीस घंटे हो चुके थे उसे इस कमरे में क़ैद हुए…

बस इसलिए उसका दिल चाह रहा था कि वह बाहर निकल जाए।
सो, उसने अपनी गरम शॉल उठाई और बाहर निकल गई।
मगर बहुत धीरे-धीरे, क़दम-क़दम रखते हुए।

वह लॉन्ज में आ गई।
वहाँ आकर उसके क़दम ठिठक गए।
कमरा ख़ाली-ख़ाली लग रहा था।

ग़ौर करने पर उसने देखा कि वहाँ जो एक टीवी पड़ा था, वह ग़ायब था।
रेडियो, कैसेट रिकॉर्डर… यहाँ तक कि टेलीफ़ोन भी नहीं था!

“ये सब चीज़ें कहाँ गईं?”

क्या कोई चुरा कर ले गया?
मुमकिन है…
रात को जब आफ़ाक़ उसे क़ैद करके गया था,
किसी नौकर या चोर ने मौक़ा पाकर सब उठा लिया हो।

वह कुछ आगे बढ़ी, मगर तभी ठिठक गई।

दूसरे बेडरूम में आफ़ाक़ था।
वह पलंग पर आधा लेटा हुआ था।
टेबल लैंप जल रहा था और वह कोई किताब पढ़ रहा था।

“अच्छा, तो ये यहाँ सोता है!”
उसने देख कर मन में सोचा।

फिर वहाँ से आगे बढ़ गई और किचन में पहुँच गई।
यह सब वह अनजाने में कर रही थी, मगर किचन में पहुँचकर
उसे एहसास हुआ कि उसे बहुत भूख लगी है।

किचन में कोई नौकर नहीं था।
वह नौकरों की फ़ौज जाने कहाँ चली गई थी!

चूल्हे ठंडे पड़े थे, जैसे किसी ने उन्हें छुआ तक न हो।
“तो फिर ये चाय किसने बनाई थी?”
उसने इधर-उधर बिखरे हुए चाय के बर्तन देख कर सोचा।

फ्रिज खोला।
सब कुछ भरा पड़ा था।

डीप फ्रीज़र खोला।
उसमें गोश्त, क़ीमा, मुर्गियाँ, मछली—हर क़िस्म का गोश्त रखा हुआ था…
और मौसम की ताज़ा सब्ज़ियाँ भी।

 

अचानक उसका दिल चाहा कि कोई गरमा-गरम रोस्टेड मुर्ग़ उसके सामने आ जाए, और वह…… झटपट खा ले।

न जाने ये क्या चक्कर है!

वह सिर पकड़कर एक कुर्सी पर बैठ गई।
किसी से पूछे?

अभी वह यही सोच रही थी कि आफ़ाक़ आता हुआ दिखाई दिया।
डर के मारे उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
न जाने अब क्या होगा?

मगर वह इस तरह सीधा चलता हुआ आया, जैसे उसने फ़लकी को देखा ही न हो।
उसने फ्रिज खोला, उसमें से डबल रोटी निकाली, मक्खन और जैम निकाला।
किचन के काउंटर पर खड़े होकर, उसने दो टुकड़ों पर मक्खन और जैम लगाया,
एक सैंडविच बनाया।

फिर फ्रिज खोला, एक केला, एक सेब और एक संतरा निकाला,
एक प्लेट में रखा और अपने कमरे में ले गया।

“तो फ़लकी बीबी, यही है भूख मिटाने का तरीक़ा!”

अब फ़लकी को समझ आया—आफ़ाक़ ने जान-बूझकर
सारे नौकरों को खुद चलता कर दिया है।
यानी यह उसका एक और तरीका है उसे तड़पाने का,
अलग-अलग तरीकों से उसे तकलीफ़ देने का।

“मेरा भी नाम फ़लकी नहीं, अगर कभी कुछ पका के दूँ!”

काफ़ी देर तक वह वहीं बैठी रही,
फिर जब भूख ने बहुत सताया तो उसने भी उठकर फ्रिज खोला।
डबल रोटी निकाली, मक्खन और जैम लगाया,
दो सैंडविच बनाए और खा लिए।

इसके बाद फिर फ्रिज खोला, अपनी पसंद का फल निकाला,
खूब जी भर के खाया, पानी पिया।

अब सही मायनों में उसे होश आया।
अब वह सोचने-समझने के क़ाबिल हुई थी।

खाना खाकर वह ड्राइंग रूम में चली गई।
इधर-उधर टहलती रही…

… न रेडियो था सुनने को, न टीवी था देखने को।

जब रात के ग्यारह बजे तो वह अपने कमरे में आ गई।
आते हुए रास्ते में उसने उड़ती नज़र आफ़ाक़ के कमरे पर डाली।
लैंप जल रहा था, मगर वह लिहाफ़ ओढ़े बेख़बर सो रहा था।

और सोते हुए कितना मासूम लग रहा था!

उसका दिल जल गया।

कमरे में आकर उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करे?

दरवाज़ा खुला था—
कितनी बड़ी राहत थी कि अब वह क़ैद नहीं थी!
उसे यह भी पता था कि साथ वाले कमरे में आफ़ाक़ सो रहा है।
वह घर में अकेली नहीं थी।

कम से कम रात तो ठीक गुज़र जाएगी।

किसी तरह रात बीत गई।
सुबह छह बजे उसकी आँख खुल गई।
उठकर हाथ-मुँह धोया, फिर बाहर निकल आई।

यह देख कर उसे हैरानी हुई—
आफ़ाक़ मुसल्ले पर बैठा क़ुरान पढ़ रहा था।

“इसका मतलब है, इसने नमाज़ भी पढ़ी होगी!”

कितनी अजीब बात है!

वह मन ही मन बेहद हैरान हुई।
इतना अमीर और फैशनेबल आदमी…
और वह भी इस ज़माने में नमाज़ पढ़ता है!

हैरान होती हुई वह किचन की तरफ़ निकल गई।

चाय की तलब हो रही थी।
और ज़ाहिर है, चाय तो अब उसे खुद ही बनानी थी।
चाय पीए बिना दिन की शुरुआत कैसे हो सकती थी?

मगर किचन में जाकर तो मुश्किल ही और बढ़ गई।
चूल्हा जलाने का तरीक़ा ही नहीं आता था!

कई तीली जलाने के बाद जब वह किसी तरह चूल्हा जला पाई,
तो यह नहीं पता था कि केतली में कितना पानी डालना चाहिए…

 

“अब यह कैसे पता चले?”

… उसने घर में देखा था कि चाय का पानी हमेशा केतली में डालकर उबालने को रखा जाता था,
मगर और कुछ मालूम नहीं था।

बड़ी मुश्किल से उसने बर्तन इकट्ठे किए।
चाय की पत्ती ढूंढी, फ्रिज से दूध की थैली निकाली,
चीनी खोजकर रखी।

जब सब चीजें ट्रॉली पर रख दीं,
तो फिर चायदानी में पत्ती डालकर खौलता हुआ पानी उसमें डाल दिया।

“चम्मच कहां गई?”

चम्मच नहीं मिल रही थी।

पानी डालते वक्त हाथ भी जल गया…
जाने कितनी बार उसने अपने हाथ जलाए!

तब कहीं जाकर उसने चाय बनाई।

ट्रॉली घसीटकर ला रही थी कि तभी…
आफ़ाक़ हाथ में अख़बार पकड़े अंदर आया और बोला—

“अगर आपने चाय बनाई हो, तो मुझे भी दे जाएं।”

जब तक वह नज़रें उठा कर देखती,
वह जा चुका था।

वह खड़ी सोचती रही—

“अब क्या करूं?
इस तरह हुक्म सुना गया है, जैसे मैं इसकी नौकरानी हूं!”

“मैं क्यों दूं चाय बनाकर? मेरी जाती है जूती!”

उसने अपने लिए चाय बनाई,
मगर पीने लगी तो दिल में खटका हुआ—

“कहीं कोई और चाल तो नहीं?”

“अच्छा… दे ही आऊं!”

अपनी प्याली मेज़ पर रखकर,
वह ट्रॉली घसीटते हुए उसके कमरे में ले गई और रख आई।

आने लगी तो वह बोला—

“थैंक यू।”

 

वह ख़ामोशी से बाहर निकल आई…

फिर उसने चाय पी और रसोई में ही बैठ गई। अब किसी तरह भूख मिटानी थी। वही रात वाला तरीका अपनाया। शुक्र है, फ्रिज में डबल रोटी थी। निकाली, स्लाइस बनाए। फिर दिल चाहा कि ऑमलेट बना लिया जाए। मगर कैसे? कभी बनाया तो था नहीं। फिर भी कोशिश करनी चाहिए। सुना था, अल्लाह मेहनत करने वालों का साथ देते हैं।

फ्राई पैन में न जाने कैसे बना दिया? अंडा फेंटा, घी डाला, सब कुछ किया। मगर अंडे की शक्ल देखकर सोचने लगी कि घर पर तो फूला-फूला, पेट की तरह गोल अंडा बनता था, वो कैसे बनता था? अब जो कुछ उसने बनाया था, वही खाना था। जल्दी-जल्दी खाने लगी कि आफ़ाक देख न ले। कितनी बेस्वाद चीज़ थी! कहीं से फीका, कहीं नमक ज्यादा, कहीं कच्चा लगता, तो कहीं ठीक। जल्दी से सब खा लिया, शुक्र है।

जब वह खा चुकी, तो आफ़ाक शेविंग के लिए गर्म पानी लेने आ गया। केतली से उसने खुद ही पानी उंडेल लिया और बोला, “अगर आपको नाश्ता बनाना आता है, तो मेरे लिए भी तकलीफ़ कीजिए। मैं फ्राई एग और टोस्ट खाता हूँ।”

 

फ्राई एग… वह खड़ी-खड़ी सुन्न रह गई। उसे तो आज तक समझ ही नहीं आई थी कि फ्राई एग की ज़र्दी साबुत कैसे रहती है?

…लेकिन वही हुआ ना… चाय बनाकर दी तो वह नाश्ता माँगने आ गया। अब तो यह दोपहर का खाना भी माँगेगा। पूरी नौकरी देनी पड़ेगी! वह चुपचाप जाकर लाउंज में बैठ गई।

थोड़ी देर बाद आफ़ाक तैयार होकर आया। बहुत स्मार्ट लग रहा था और खुशबू की लहरें छोड़ रहा था…

वह उसके पास आकर खड़ा हो गया।
“नाश्ता नहीं बनाया आपने?”
उसने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
“क्यों?”
“मुझे बनाना नहीं आता।”
“आपको क्या आता है?”
“मुझे… कुछ भी नहीं आता।”

“शुक्र कीजिए कि आपकी सास यहाँ नहीं हैं, वरना किचन की हालत देखकर आपकी तो छुट्टी ही करा देतीं!”

“काश करा देतीं…” उसने इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि आफ़ाक सुन नहीं सका।

वह खुद ही किचन में चला गया। एक सेब निकाला, खा लिया और एक गिलास दूध खुद ही पीकर बाहर निकल गया।

 

जब उसकी कार गेट से बाहर चली गई और उसे तसल्ली हो गई कि वह अब लौटकर नहीं आएगा, तो वह टहलती हुई बाहर निकल आई। गेट बंद था…

उसने जोर से खींचकर देखा तो गेट के बाहर की तरफ एक बड़ा ताला लगा हुआ था। उसके बार-बार खींचने से चौकीदार करीब आ गया।

वह छोटी-सी झिरी से देखकर बोला, “बेगम साहिब! सलाम… हुक्म बताइए?”

फलक़ी ने कहा, “ताला खोलो।”

वह बोला, “चाबी तो साहब साथ ले गए हैं।”

फलक़ी का दिल एकदम बैठ गया। आफ़ाक से हर तरह की नीच हरकत की उम्मीद की जा सकती थी।

“ड्राइवर कहाँ है?” उसने फिर पूछा।

“ड्राइवर भी साहब के साथ गया है।”

“और मेरी गाड़ी कहाँ है?” उसने अपनी गाड़ी गैराज में न पाकर कड़े लहज़े में पूछा।

“जी, वह भी साहब दफ़्तर मँगवा चुके हैं।”

“अच्छा…”

फलक़ी का गुस्सा बढ़ने लगा था।

“आख़िर मेरी गाड़ी पर उसका क्या हक़ बनता है? यानी मुझे बाक़ायदा नज़रबंद रखने का पूरा प्रोग्राम बना रखा है!”

अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। फोन कहाँ गया? वही उसे कॉल करना चाहती थी…

मगर क्या करती…? उसका दिल चाह रहा था कि दीवार पर चढ़ जाए और दूसरी तरफ सड़क पर कूदकर भाग जाए। हाँ, ऐसा हो तो सकता था। चौकीदार थोड़ी देर शोर मचाएगा, पीछे भागेगा, फिर चुप हो जाएगा। गोली की तरह फरार होना कोई शरीफ़ाना हरकत तो नहीं थी, मगर कोशिश तो की ही जा सकती थी।

उसने एक गमला उठाया, उसे उल्टा करके दीवार के क़रीब रखा। इस पर सावधानी से एक पैर जमाया और बाहर झाँका।

“क्या बात है, बेगम साहिब!” पठान चौकीदार क़रीब आ गया। “किसी चीज़ की ज़रूरत है? बोलो, हुक्म करो।”

“नहीं,” वह शर्मिंदा-सी हो गई। “मैं यूँ ही देख रही थी।”

“साहब ने बोला था,” वह रुक-रुककर बोला, “अगर कोई गेट पार करे, तो उसको गोली मार दो।”

“इन्ना लिल्लाह…” वह नीचे उतर आई। कमीनापन की भी हद होती है! यहाँ तक कह दिया? यानी उसे शक था कि मैं भागने की कोशिश करूँगी!

बिना कुछ कहे वह अंदर चली गई। घर पूरा सुनसान लग रहा था। जब घर में लोग न हों, रसोई में खाना न पक रहा हो, तो घर वीरान लगने लगता है। घर की रौनक़ लोगों से, बातों से और खाने से होती है। जिस घर में खाना न पकता हो, वह भी कोई घर होता है?

 

बारह बजने वाले थे, भूख तेज़ होने लगी थी। उसका दिल चाहा कि जाकर कुछ खा ले…

मगर उसे तो कुछ भी पकाना नहीं आता था। अगर कभी वह किचन में जाती भी थी, तो “وہ” डाँट देती थीं। कहती थीं, “इतने नौकर-चाकर हैं, भला तुम्हें काम करने की क्या ज़रूरत है? खाना बनाना तो मिडल क्लास लड़कियों का काम है, जो इसी के सहारे शादी के काबिल मानी जाती हैं!”

“तुम्हें तो जिन्दगीभर नौकरों के बीच ही रहना है, तुम्हें कोई काम करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी!”

मगर अब कहाँ गए वो लोग…?

आफ़ाक ने कपड़े और ज़ेवर के अलावा उसकी कोई चीज़ साथ नहीं लाने दी थी। यह कहकर कि “मेरे घर में इतनी जगह नहीं है।” फिर न जाने उसने मम्मी और डैडी पर क्या जादू कर दिया कि उन्होंने भी पलटकर उसकी कोई खबर तक न ली।

क्या समझ बैठे थे वे…?
कितना बड़ा अंधेर है यह!

वह किचन में पहुँच गई। वहाँ ज़रूरत की हर चीज़ मौजूद थी, मगर उसे कुछ भी पता नहीं था।

मुर्गी कैसे पकाते हैं?
गोश्त कैसे गलाते हैं?
प्याज़ और उसका सही इस्तेमाल क्या है?

इतना ज़रूर जानती थी कि प्याज़ हांडी में डाला जाता है, मगर कब और कैसे?

घर में कोई कुकिंग बुक भी नहीं थी जिससे मदद ली जा सके। इधर-उधर घूमकर, सोच-सोचकर वह थक गई।

 

आख़िरकार उसने फैसला कर लिया कि उसे कुछ भी नहीं पकाना चाहिए।
सुबह वाले अंडे जैसा हाल होगा। और अगर किस्मत से कुछ सही पक भी गया, तो आफ़ाक उससे उम्मीदें बाँध लेगा—फिर हमेशा उसे ही पकाकर खिलाना पड़ेगा!

दो बजे के क़रीब उसे ज़बरदस्त भूख लग गई। वही हुआ जिसका डर था। अब इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि वह डबल रोटी और जैम का सहारा ले।

फ्रिज खोलकर देखा तो डबल रोटी के सिर्फ़ चार टुकड़े बचे थे। अगर चारों खा ले, तो फिर रात को क्या करेगी? और अगर आफ़ाक़ ने भी रात को डबल रोटी खानी चाही, तो क्या होगा?

बहुत सोचने के बाद उसने सिर्फ़ दो टुकड़े निकाले, और सुबह की तरह खा लिए। फिर पेट भरने के लिए थोड़ा फल भी खा लिया।

चार बजे तक पेट फिर ख़ाली हो चुका था। तब उसने ख़ुद ही चाय बना ली और एक के बाद एक तीन-चार प्यालियाँ पी गई।

न जाने यह हालात कब तक रहेंगे…

शाम उतर आई थी। न घर में रेडियो था, न टीवी…

इतना सन्नाटा था…
और उसकी अक़्ल काम नहीं कर रही थी…

यह कैसे अजीब घर थे! हمسाए (पड़ोसी) तो ऐसे थे जैसे रहते ही न हों!
हर कोई अपने घर में बंद, अपने हाल में मस्त…
किसी को किसी की कोई ख़बर नहीं थी।

कम से कम इतना ही जान लेते कि साथ वाले घर में एक नई दुल्हन आई है…
और दुल्हन सख़्त मुसीबत में है…

रात के दस बजे

जब वह लाउंज में बैठी जमाइयाँ ले रही थी, तो आफ़ाक आ गया।

 

वह चुपचाप बैठी रही…

आफ़ाक़ ने ज़रा सख़्ती से पूछा, “आज आपने कुछ पकाया है?”

वह चुप रही।

“कुछ भी नहीं पकाया?”

वह फिर भी ख़ामोश रही।

“ये इस तरह कब तक चलेगा?” आफ़ाक़ ने उसे घूरते हुए कहा। “आपको मालूम है, ये आपका घर है और अब इस घर को चलाना आपका काम है। आप पकाएँगी, तो मैं भी खा लूँगा। ज़्यादा दिन तक भूखे रहकर काम नहीं चलेगा!”

यह कहकर वह अपने कमरे में चला गया। वह काफ़ी थका हुआ लग रहा था। थोड़ी देर बाद कपड़े बदलकर लौटा और सीधा किचन की तरफ़ बढ़ गया।

फलक़ी चुपचाप उसे देखती रही। उसने फ्रिज खोला, एक प्लेट में फल निकाले, और वापस लाउंज में आकर बैठ गया।

फलक़ी ने देखा—उसने डबल रोटी के वो टुकड़े नहीं खाए थे… क्या उसने जान-बूझकर उसके लिए छोड़ दिए थे?

आफ़ाक़ ने सलीके से सेब काटा और खाने लगा।

“आपने कुछ खाया?”

फलक़ी ने सिर हिलाकर हाँ कहा।

“खाना भी नहीं पकाया, तो फिर सारा दिन क्या करती रही हैं?”

 

फलक़ी ने कोई जवाब नहीं दिया, और ना ही ज़रूरत महसूस की..बैठे बैठे उसका हाथ अपने गाल पर चला गया…

उंगलियों के निशान अभी तक महसूस हो रहे थे।

अचानक वह बोल पड़ी—
“यहाँ फोन पड़ा था, कहाँ गया?”

आफ़ाक़ ने बड़े सुकून से जवाब दिया,
“महकमे वाले उठा कर ले गए।”

“क्यों…?”

“छह महीनों से बिल अदा नहीं किया गया था।”

“क्यों…?”

“‘क्यों’ से आपका क्या मतलब है? जब पैसे नहीं थे, तो बिल अदा नहीं किया!”

“आप इतने अमीर आदमी हैं और आपके पास पैसे नहीं थे?”

आफ़ाक़ हल्के से मुस्कुराया, “आपसे किसने कह दिया कि मैं अमीर आदमी हूँ?”

“लगते तो हैं…!”

“बस, दुनियादारी के लिए दिखावा कर लेते हैं।”

“तो यह मकान भी आपका नहीं है, जिसमें आप रहते हैं?”

“नहीं, यह भी मेरा नहीं है।”

“और क्या-क्या आपका नहीं है?”

आफ़ाक़ ने संजीदगी से कहा, “जो-जो चीज़ अब यहाँ नज़र नहीं आ रही, वो मेरी नहीं थी।”

“तो वो रेडियो, टीवी, कैसेट रिकॉर्डर… ये सब भी किराए के थे?”

“जी हाँ…”

 

“तो ये सब करने की आपको क्या ज़रूरत थी?”

“तुम्हारे माता-पिता पर रौब डालना मकसद था।”
“और अब जब सारा भेद खुल जाएगा तो क्या कहेंगे?”

“कहना तो उन्हें ही होगा।”

वह घबराकर चारों तरफ देखने लगी।

“यह फर्नीचर, ये कालीन, ये पर्दे… सब कुछ… क्या ये सब भी किराए का है?”

“जी हां…”

“आप तो बहुत बड़े फ्रॉड किस्म के इंसान हैं…”

यह कह तो दिया, मगर फिर डरकर उसकी तरफ देखने लगी। वह चुपचाप मुस्कुराता रहा, तो उसकी जान में जान आई।

“जनाब! पसंद तो आपने मुझे ही किया है। आपने अपनी मर्जी से मुझे चुना है। दूसरे शब्दों में कहें तो, मुझे फंसाया है। सही कहा ना?”

“मुझे क्या पता था… मैं… मैं क्या जानती थी…”

“आपके पास तो पहले से ही बेहिसाब दौलत है, फिर आपको किसी अमीर आदमी को फंसाने की क्या जरूरत थी?”

“क्या… क्या आपकी नजर मेरी दौलत पर है?”

“हो भी सकती है?”

“तो फिर आप सच में… क्या सच में…?”

वह चुप हो गई।

 

“कैसे, मोहतरमा?”

वह उठकर उसके करीब आ बैठा।

” कुछ नहीं। ”

वह डर गयी।

आफ़ाक़ क़हक़हा लगाकर बोला, “कैसे? जो भी जी में आता है, कैसे ये?”

“जब आप अमीर नहीं हैं तो अमीर बनकर क्यों दिखाते हैं?”

“लोग इतने भौतिकवादी हो गए हैं और इस तरह के अजीब रिवाज निकल आए हैं कि यह सब कुछ करना पड़ता है। अब देखो ना, जिससे भी मिलो, वह यही दिखाता है कि वह हमसे ज्यादा अमीर है। अमीर बनकर दिखाना कोई बुरी बात नहीं। आज हर कोई अमीर की इज्ज़त करता है। घर में आराम और ऐशो-आराम की सारी चीजें अगर किसी के पास न हों, तो कोई उसे पास भी फटकने की इजाजत नहीं देता।”

“आपका तो इतना बड़ा कारोबार है,” फ़लकी ने रुकते-रुकते कहा।

“अरे, जाने दें। आप कहाँ समझ सकेंगी कि किसका कारोबार है और कौन क्या करता है?”

“मैं अपनी मम्मी को फोन करना चाहती हूँ,” फ़लकी घर आकर उठ खड़ी हुई।

“मैं इतनी जल्दी घबरा गई हूँ। प्लीज़ मुझे बताइए, मैं कैसे फोन करूँ?”

 

“हाँ, अब ठीक से पूछा है आपने। मुझे संदेश दे दीजिए, मैं सुबह दफ्तर से फोन कर दूँगा।”

नहीं, मुझे अभी बात करनी है। मेरा दिल मम्मी  के लिए बहुत उदास है।

“अगर जब आपकी मम्मी अल्जीरिया  चली जाएंगी तो क्या कीजिएगा?”
“क्या? क्या कमी जा रही है?”

“आपसे किसने कहा?”

“हां, मुझे तो आपको बताना याद ही नहीं रहा। कल ही तो उनसे मुलाकात हुई थी। उन्होंने बताया था कि आपके डैडी एक जरूरी काम से अल्जीरिया जा रहे हैं।”

“सच मुच  …”
“मैं झूठ क्यों बोलूंगा?”

“फिर मम्मी ने मुझे इसकी जानकारी क्यों नहीं दी?”
“मुझे जो दे दी!”

निकी बेचैनी से इधर-उधर टहलने लगी। इसका मतलब है कि उसका मामला यूं ही इनकार कर दिया जाएगा।

“कब जा रही हैं वो?”
“परसों।”

“परसों… और आपने मुझे आज बताया है?”

“उन्होंने तो मुझे शादी के तुरंत बाद ही बता दिया था। अब अगर उन्होंने आपको इस काबिल नहीं समझा तो गुस्सा मुझ पर क्यों उतार रही हैं?”

 

वह कुछ देर चुप रही।

घी  सीधी उंगली से नहीं निकलेगा और लकी है, टेढ़ी उंगली से भी निकल जाए। यह सितमगर कोई और सितम तोड़ रहा है।”

मम्मी  से मिलना बहुत जरूरी हो गया था। डैडी भी साथ जा रहे थे।
जाने कब तक के लिए। फिर वह धीरे से आफ़ाक के पास आकर बैठ गई और बड़ी विनम्रता से बोली, “प्लीज़, मुझे सिमी से मिलने की इजाजत दें। उनके जाने से पहले मैं उनसे मिलना चाहती हूँ।”

“मैंने उनसे कह दिया था कि अगर मुमकिन हुआ तो हम आएंगे, वरना नहीं।”

“क्यों?”

“क्यों…? यह आप मुझसे पूछ रही हैं? हर वक्त आप यही सोचती रहती हैं कि मौका मिले तो इस घर से भाग जाएं। अगर मम्मी से मिलें तो उन्हें एक की दस सुनाएं। डैडी से मिलें तो उन्हें मेरे जुल्मों के ऐसे किस्से सुनाएं कि उनके रोंगटे खड़े हो जाएं। आपकी झूठी-सच्ची बातों को सुनकर वे इतने सवाल करेंगे जिनके जवाब देने का मेरे पास वक्त नहीं होगा। मैं क्यों खुद को एक नई मुसीबत में डालूं?”

“तो क्या शादी के बाद लड़की का अपने माता-पिता से मिलना गलत होता है?”

“कुछ हालात में यह गलत हो सकता है।”

“अपने माता-पिता से मिलने का हर लड़की को हक होना चाहिए। शादी के बाद भी माता-पिता का दर्जा पति से कम नहीं होता। आप खुद सोचिए।”

फलकी  रोने लगी।

 

“आपने मेरे साथ क्या सलूक किया है?”

“आप खुद सोचें कि आपके साथ ऐसा क्यों हुआ है?”
“मुझे कुछ नहीं पता!” वह रोते हुए बोली।

“खुदा के वास्ते, मुझे मम्मी के पास जाने दें!”

“शादी मज़ाक नहीं होती, फ़लक नाज़!” यह कहकर आफ़ाक़ उठ गया और अपने कमरे में चला गया।

थोड़ी देर तक नलकी मीठी रोती रही, फिर वह भी अपने कमरे में चली गई।

बचने का कोई रास्ता नहीं था।

वह मीठी सोचती रही। उसने कई तरकीबें आज़माईं, लेकिन जानती थी कि आफ़ाक़ के सामने उसकी कोई नहीं चलेगी। जब रात के ग्यारह बज गए, तो उसने सोचा—जो काम मिन्नत से हो सकता हो, उसके लिए ज़िद करने से क्या फायदा? मम्मी से एक बार मिलना बेहद ज़रूरी था, और इसके लिए उसे आफ़ाक़ की हर शर्त मंज़ूर थी। बस एक मुलाक़ात का मौका मिल जाए, फिर वह सब कुछ कह देगी।

कहीं ऐसा न हो कि आफ़ाक़ सो जाए! यह सोचकर वह उठी और आफ़ाक़ के कमरे की ओर चल पड़ी।

वह लिहाफ़ में लिपटा हुआ लेटा था और एक किताब पढ़ रहा था।

बिना बुलाए उसके कमरे में जाना कितना अजीब लग रहा था! वह कितनी स्वाभिमानी और खुद्दार लड़की थी। ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहती थी। लेकिन कहते हैं ना, वक़्त आने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।

 

सौदा धीरे-धीरे चलते हुए, अपनी ही धड़कनों से बचती हुई, अपने इरादे पर शर्माती हुई, बड़ी मुश्किल से उसके दरवाज़े के सामने जाकर खड़ी हो गई।

जब बहुत देर तक उसने चौंक कर नहीं देखा तो फ़लक का दिल चाहा कि अब भी लौट जाए। वापस चली जाए। खुद को यूँ ज़लील करने का क्या फ़ायदा? लेकिन फिर उसने अपने कदम रोक लिए। यह सोचकर कि अगर एक बार चली गई, तो फिर दोबारा यह हिम्मत नहीं कर पाएगी। अगर आ ही गई है तो अपनी खुद्दारी को एक तरफ़ रखकर इस मुश्किल घड़ी से भी गुज़र जाना चाहिए।

उसने गला साफ़ किया और बहुत ज़ोर लगाकर बोली—
“मैं… आ जाऊँ?”

शायद आफ़ाक़ ने सुना नहीं, या फिर जानबूझकर अनसुना कर दिया। या फिर वह इतनी ऊँची आवाज़ में बोल ही नहीं पाई। हर हाल में, थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद उसने दोबारा हिम्मत की।

“मैं अंदर आ जाऊँ?”

अबकी बार आफ़ाक़ चौंक पड़ा। उसने लिहाफ़ को एक तरफ़ किया और उठकर बैठ गया। पहले कुछ पलों तक हैरानी से उसे देखता रहा, फिर बोला—
“फरमाइए… क्या बात है?”

फ़लक धीरे-धीरे चलती हुई अंदर आई और जल्दी से एक कुर्सी पर बैठ गई। अगर वह न बैठती तो शायद गिर जाती।

“मैंने आपकी आवाज़ पहले भी सुनी थी, लेकिन यह सोचकर टाल दिया कि शायद मेरे कान बज रहे हैं।”

“तो बताइए, क्या मसला है?”

 

फ़लक की आँखों में आँसू आ गए। वह धीमी आवाज़ में बोली—
“मुझे मम्मी से मिलना है, और इसके लिए मैं आपकी हर शर्त मंज़ूर करने को तैयार हूँ।”

“… जो भी आप कहें, और जैसा आप कहेंगे, मैं वही करूँगी।”

“तो बेगम फ़लक नाज़, मैं आपसे सिर्फ़ एक ही बात कहूँगा—मियाँ-बीवी को अपने झगड़े खुद ही सुलझाने चाहिए। कभी भी माँ-बाप को इसमें नहीं घसीटना चाहिए। शादी एक बहुत बड़ा गोरखधंधा है। यह कोई फ़िल्म की कहानी नहीं कि एक ही बैठक में इसका अंजाम सामने आ जाए। अगर आप अपने घर की बातें अपनी माँ को बताएँगी, तो आप उनसे कभी नहीं मिल पाएँगी।”

फ़लक की आँखों से आँसू फिर बहने लगे।

“मैं कुछ नहीं बताऊँगी… कुछ भी नहीं बताऊँगी।”

“वह यही समझती हैं कि हम दोनों बहुत खुश हैं, तो उन्हें इसी खुशफ़हमी में जीने दें। दूसरी बात यह कि आप इस घर को सच में घर बनाएँगी। इसमें दिल लगाएंगी, खाना बनाएंगी और वह सब कुछ करेंगी जो एक अच्छी गृहिणी को शोभा देता है।”

“करूँगी… सब करूँगी…” फ़लक ने रोते हुए कहा।

“अगर आपका वादा सच्चा है, तो मैं आपको मम्मी से ज़रूर मिलवाऊँगा। मगर… परसों एयरपोर्ट पर, जब वह जा रही होंगी।”

“परसों?” वह चीख़ कर बोली, “कल क्यों नहीं?”

 

“कल आप उनसे नहीं मिल सकतीं!” आफ़ाक़ ने ग़ुस्से से कहा। “परसों सुबह नौ बजे मैं आपको एयरपोर्ट ले चलूँगा… और आप अपना वादा याद रखेंगी!”

रोती हुई फ़लक उठकर अपने कमरे में आ गई। उसे मालूम था कि उसके आंसुओं से कुछ बदलने वाला नहीं।

“तो अब रोने का क्या फ़ायदा…?”

जिस दिन मम्मी को जाना था, उस दिन वह सुबह जल्दी उठ गई। उसने नाश्ता बना लिया और खुद को बहुत अच्छे से तैयार किया। बिल्कुल उसी तरह, जैसे नई दुल्हनें सजती हैं। आखिर उसे आफ़ाक़ को ख़ुश भी करना था।

उसके दिल में उम्मीद थी कि कोई न कोई मौक़ा ज़रूर मिलेगा, जिससे वह अपने दिल की बात कह सके।

जब वे दोनों एयरपोर्ट पहुँचे, तो वहाँ मम्मी और डैडी पहले से मौजूद थे। उनके अंदर जाने में अभी एक घंटा बाकी था।

मम्मी ने हमेशा की तरह उसकी पेशानी चूमी। मम्मी के होठों का स्पर्श पाते ही फ़लक की आँखों से आँसू बह निकले। बड़ी मुश्किल से रोके हुए आँसू उसकी पलकों की सरहद तोड़कर बाहर आने लगे। वह उन्हें रोकने की कोशिश कर रही थी, उसे आफ़ाक़ से डर लग रहा था। वह अपना वादा तोड़ रही थी, मगर कर भी क्या सकती थी? आँसू उसके क़ाबू में नहीं थे।

मम्मी हमेशा की तरह आफ़ाक़ से हंसी-मज़ाक कर रही थीं, और आफ़ाक़ भी हमेशा की तरह उनके हर सवाल का हाज़िरजवाब दे रहा था।

“क्यों रो रही हो, चाँद?” मम्मी ने उसे सीने से लगाकर कहा।

“मम्मी, आप इतनी दूर जा रही हैं… और फ़लक आपकी इकलौती बेटी है। इसी लिए बेचैनी महसूस कर रही है,” डैडी ने कहा।

“अरे, मैं तो हर साल जाती हूँ, और इस बार तो ज़्यादा दूर भी नहीं जा रही!” मम्मी ने हंसते हुए कहा।

 

“मगर अब बात अलग है ना?” आफ़ाक़ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा। “अब फ़लक पराई हो गई है। अब उसे माँ की ज़्यादा क़दर आ रही है।”

“नहीं, मैं तो खुश हूँ। मेरी फ़लक अब अपने घर की हो गई है। हर लड़की को अपने घर जाना होता है। अब फ़लक का सबसे बड़ा रिश्ता तुमसे है, बेटा।”

यह सुनते ही फ़लक की आँखों से आँसू और तेज़ी से बहने लगे। “मम्मी ऐसी कभी भी नहीं थीं!” यह सब आफ़ाक़ का फैलाया हुआ जाल था। वरना अपनी बेइंतहा मोहब्बत में वह हमेशा यही कहती थीं— “मैं फ़लक को जाने नहीं दूँगी। उसके शौहर को घर जमाई रखूँगी!”

“मम्मी, इसे प्यार से तसल्ली दें ना?” आफ़ाक़ ने फिर कहा।

“आख़िर तू रोती क्यों है?”

मम्मी ने फिर फ़लक को अपने सीने से लगा लिया। डैडी भी पास आ गए।

“घबराती क्यों हो? हम सिर्फ़ छह महीने के लिए जा रहे हैं।”

“छह महीने?” फ़लक को लगा जैसे उसका दम घुट रहा हो। छह महीनों में न जाने उस पर क्या बीत जाएगी…

“तू ख़त लिखेगी ना?”

फ़लक ने रोते हुए सिर्फ़ सिर हिलाकर हामी भरी।

“और तुम भी लिखना!” मम्मी ने आफ़ाक़ की तरफ़ देख कर कहा।

“ज़रूर मम्मी… मैं तो आपसे फ़ोन पर भी बात करता रहूँगा और फ़लक की भी कराऊँगा। बस जाते ही अपना फ़ोन नंबर और पता ज़रूर भेजिएगा।”

“ज़रूर, डार्लिंग…”

 

अब तक फ़लक मम्मी के बाजुओं में लिपटी हुई थी। बिल्कुल उस बच्ची की तरह, जो पहली बार स्कूल जाने लगती है और अध्यापिकाओं के डर से अपनी माँ के गले लगकर रोती है।

… जैसे माँ के गले लगकर रोती हुई बच्ची चाहती है कि उसे स्कूल न भेजा जाए, फ़लक भी अपनी मम्मी से लिपटी रही।

डैडी मुस्कुराते हुए पास आ गए और फ़लक के सिर पर प्यार से हाथ फेरा। आज फ़लक का दिल चाह रहा था कि वह डैडी के सीने से लगकर ज़ोर-ज़ोर से रोए। वही डैडी, जिन्हें वह हमेशा दूर समझती थी। जिन्हें वह सिर्फ़ “पैसा कमाने की मशीन” समझती थी, जो सिर्फ़ बिज़नेस में व्यस्त रहते थे। वह सोचती थी कि डैडी को सिर्फ़ काम से मतलब है, लेकिन आज वही डैडी उसे बहुत बड़े और महान लग रहे थे। आज उसे उनका सीना सबसे महफ़ूज़ जगह लग रहा था।

उसका दिल चाह रहा था कि वह डैडी से लिपट जाए, उनकी शफ़ीक़ (ममता भरी) खुशबू को महसूस करे। शायद इस तरह वह उसके दिल का दर्द समझ पाते। लेकिन डैडी अपनी सादगी में बस मुस्कुराए जा रहे थे। जैसे फ़लक अभी भी वही मासूम बच्ची हो, जिसे उन्होंने ढेर सारे खिलौने लाकर दिए हों।

आफ़ाक़ उसके पास खड़ा था। सब आपस में बातें कर रहे थे। वक़्त तेज़ी से बीत रहा था। वह जो कहना चाहती थी, जो कहने आई थी… वह कह ही नहीं पाई।

छह महीने…

और वादाख़िलाफ़ी की क्या सज़ा होगी?

छह महीने उसे आफ़ाक़ के साथ रहना था, उसके रहमोकरम पर, बिना किसी सहारे के।

तभी माइक्रोफ़ोन पर विदेश जाने वाले यात्रियों को बुलाया गया।

मम्मी को आख़िरी बार गले लगाने का वक़्त आ गया।

फ़लक जी भर के रोई, जैसे आज उसकी विदाई हो रही हो।

मम्मी ने उसके आँसुओं को नज़रअंदाज़ करते हुए मुस्कुराकर कहा,
“चाँद, तुम्हारे लिए क्या लाऊँ?”

 

फ़लक चुप रही। मम्मी फिर मुस्कुराकर बोलीं…

“लाऊँगी…” मम्मी ने हल्के से मुस्कुराकर कहा।

“मुझे पता है, तुम हमेशा अमेरिका से ढेर सारी चॉकलेट्स मंगवाती हो!”

“मेरे लिए भी, मम्मी!” आफ़ाक़ आगे बढ़कर बोला। “मुझे भी बहुत पसंद हैं!”

“आफ़ाक़, मैं अमेरिका में तुम्हारी मम्मी से मिलूँगी, बल्कि वहीं रहूँगी। मैंने ‘अम्मी जान’ को पहले ही लिख दिया है।”

“अच्छा! तो फिर ठीक है!” आफ़ाक़ ने मम्मी के हाथ को चूमा, डैडी से हाथ मिलाया, फिर एक हाथ से फ़लक का और दूसरे हाथ से मम्मी का बाज़ू पकड़कर उन्हें आख़िरी हद तक छोड़ने गया।

मम्मी बार-बार पीछे मुड़कर “ख़ुदा हाफ़िज़” कहती हुई अंदर लॉन्ज़ में ग़ायब हो गईं।

फ़लक और आफ़ाक़ बाहर निकल आए। एयरपोर्ट पर बहुत भीड़ थी।

फ़लक अब ख़ुद पर क़ाबू पा चुकी थी। वह ग्रिल के पास खड़ी होकर मम्मी के जहाज़ को उड़ते हुए देखना चाहती थी, मगर आज उसने कोई ज़िद नहीं की।

पहली बार उसे अहसास हुआ कि इस बाज़ी को जीतने के लिए उसके पास कोई भी पत्ता नहीं था।

आफ़ाक़ ने कार का दरवाज़ा खोला, और फ़लक चुपचाप उसमें बैठ गई।

जब आफ़ाक़ ने कार मोड़कर शहर की तरफ़ चलानी शुरू की, तो फ़लक ने एयरपोर्ट की तरफ़ एक हसरत भरी नज़र डाली।

उसे ऐसा महसूस हुआ…

जैसे वह इस भरी दुनिया में बिल्कुल तन्हा रह गई हो।

कोई उसे देखने वाला नहीं, कोई हमदर्द नहीं, कोई दोस्त नहीं…

ख़ुली और वीरान जगह में वह अकेली खड़ी है, और ऊपर जलता सूरज सवा نیزे पर चमक रहा है…

… और उसकी जान घुलती जा रही थी।

बिना किसी आवाज़ के उसके आँसू बहने लगे।

उसके हलक़ में अजीब-सी घुटन थी, जैसे कोई चीख़ अंदर ही अंदर दम तोड़ रही हो—

“मम्मी, लौट आओ…”

“डैडी, ख़ुदा के लिए वापस आ जाओ…”

“मम्मी, मुझे भी साथ ले जाओ…”

“मम्मी… डैडी… ख़ुदा के वास्ते वापस आ जाओ!”

“वापस आ जाओ और मुझे अपनी गोद में छुपा लो…
मुझसे इस दुनिया के तल्ख़ हक़ीक़तों का सामना नहीं होता!”

“मैं मिट्टी की वो गुड़िया हूँ, जिस पर सिर्फ़ खूबसूरत रंग-रोगन किया गया है…
मैं बिखर रही हूँ… मैं टूट जाऊँगी… मैं घुल जाऊँगी…”

“मेरी माँ… मुझे पहचानो!”
“मेरे बाबा… मेरी आवाज़ सुनो!”

 

“तुम दोनों आओ… मुझे बचा लो…
मुझे अपनी छाती से लगा लो…!”

फ़लक़ी की शादी को एक महीना हो चुका था।

कहने को एक महीना कोई बड़ी बात नहीं, मगर यह तो फ़लक़ी ही जानती थी कि यह एक महीना एक सदी बनकर गुज़रा था।

ज़िंदगी की बहती नदी अगर ठहर जाए, तो वक़्त एक भारी चट्टान बन जाता है—
ऐसा लगता है कि यह बोझ कभी हल्का नहीं होगा, बस सीने पर चढ़ता जाएगा।

सर्दियों के उदास और छोटे दिन, और भारी-भरकम शामें…
लंबी, काली रातें जो किसी ज़ुल्फ़-ए-महबूब से भी ज्यादा गहरी लगतीं।

बेहिस और ठंडी रातें…
अगर सुहागन के हिस्से में आएँ, तो चाँद-तारे तक क़िस्मत बन जाते हैं…
फिर किसे वक़्त का एहसास होता है…?

मगर आह!

वे ख़ूबसूरत दिन और रातें,
जिन्हें वसल की लोरियों में मदहोश होना था,
अब कैदख़ाने के दिन-ओ-रात बन गए थे।

 

वो हल्की-हल्की सरगोशियाँ,
जो हर रात ख़्वाबों के गुलशन को रौशन करने वाली थीं,
अब आह बनकर होठों पर दम तोड़ रही थीं…

और वो बातें…

वो बेइंतहा बातें,
जो आशिक़ और महबूब अपनी तन्हाई में एक-दूसरे से करते हैं,
अब नफ़रत की फुँफकार बनकर बाहर आ रही थीं।

फ़लक़ी दिन-रात अंगारों पर जल रही थी।

वो रंगीन और कीमती लिबास जो कभी उसके हुस्न की शान थे,
अब संदूकों में बंद-बंद ठंडे पड़ चुके थे।

जे़वरात…
जो कभी उसके बदन की ज़ीनत थे,
अब बेजान पड़े थे,
जैसे किसी से अपनी बेपरवाही की शिकायत कर रहे हों।

सिंगार का सामान मेज़ पर सजा था,
मगर चेहरा… वो मुरझा चुका था।

आँखें…
जो कभी प्यार की चमक से जगमगाती थीं,
अब रो-रोकर वीरान हो चुकी थीं।

दिल…
जो कभी एक मीठे अहसास से धड़कता था,
अब फोड़े की तरह दुख रहा था।

दिमाग़…
जो कभी हसीन ख़्वाबों की दुनिया में खोया रहता था,
अब सोच-सोचकर सुन्न हो चुका था।

ये सब क्यों हुआ? अब क्या किया जाए?

घर के माहौल में कोई तब्दीली नहीं आई थी।
आफ़ाक़ हर सुबह नाश्ता करके दफ़्तर चला जाता,
दोपहर का खाना वहीं खा लेता,
और रात को कुछ बाहर से लाकर खा लेता।

फ़लक़ी से उसकी बस नाम की बात होती थी।
वो भी बस इतनी ही जितनी ज़रूरी हो।

आफ़ाक़ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था।
वो रात को ज़्यादातर किताबें पढ़ता रहता,
जैसे घर में कोई और दिलचस्पी का सामान ही न हो।

…और सच में, था भी क्या यहाँ?

न रेडियो, न टीवी, न टेलीफ़ोन…
ना कोई घंटी बजती,
ना कोई घर में आता।

 

फ़लक़ी को ऐसा लगता,
जैसे वो सन्नाटों के एक वीरान शहर में आ गई हो…

वह हमेशा सन्नाटों से डरती थी, और अब तो उसकी ज़ुबान को भी जंग लग गया था।

वह इतनी बातूनी थी कि एक मिनट के लिए भी कभी चुप नहीं रहती थी।
स्कूल में, कॉलेज में और फिर घर में।
यहाँ तक कि वह दफ्तर में भी लगातार बोलती रहती थी।

मगर अब उसकी अपनी ही आवाज़ उसे अजनबी लगने लगी थी।
जब दिल बहुत घबराने लगता तो वह रोने लगती।
थक जाती तो चुप हो जाती।

वह इस बड़े से घर में एक प्यासी रूह की तरह भटक रही थी।
बार-बार उसकी निगाहें बंद गेट से टकरातीं।

ये गेट था या किसी जादुई किले का दरवाजा!
उस तरफ से कोई दस्तक नहीं होती थी।

शायद उसके दोस्त-रिश्तेदार सब उसे भूल गए थे।
कोई भी उसकी खबर लेने नहीं आता था।

मम्मी-पापा ने शहर क्या छोड़ा, जैसे उसके लिए पूरी दुनिया ही वीरान हो गई हो।
ऐसा लगता था जैसे शहर में उसका कोई अपना ही नहीं रहा।

पता नहीं, ये किस जुर्म की सज़ा थी!
कम से कम जेल में कैदियों को उनके गुनाह का पता तो होता है।
उन्हें अपनी सफाई देने का मौका भी मिलता है, और फिर सज़ा भी सुनाई जाती है।

मगर यहाँ तो सब कुछ अनजान था।
ना कोई जुर्म बताने वाला, ना सफाई देने का मौका।

 

बस, सज़ा बराबर मिल रही थी…

और यह सज़ा कब खत्म होगी, उसे कुछ पता न था।
ऐसा लगता था जैसे उसे “काले पानी” भेज दिया गया हो, या वह उम्रकैद की सज़ा काट रही हो।

“हे भगवान!”
उसका दिल डूबने लगता। अगर यह सच में उम्रकैद है, तो यह उम्र कैसे कटेगी?

कभी-कभी वह आत्महत्या के बारे में सोचने लगती।
मगर मरने से उसे बहुत डर लगता था।

ज़िंदगी कितनी कीमती चीज़ है, और यह बार-बार नहीं मिलती।
इस दुनिया में कौन बार-बार आता है?
क्यों न इस ज़िंदगी का फायदा उठाया जाए?
खुश रहा जाए, ऐश-ओ-इशरत की ज़िंदगी जी जाए?

वह तो हमेशा यही कहा करती थी।
फिर इस तरह मायूस और बेबस होकर उसका मरने को भी मन नहीं करता था।

लेकिन…
उसने अपने दिल में सोच लिया था कि अगर हालात बहुत बुरे हो गए, और कोई रास्ता न बचा, तो वह भागने का आखिरी रास्ता अपनाएगी।

अगर कुछ भी ठीक न हुआ, और हालात बद से बदतर हो गए, तो वह आत्महत्या कर लेगी।
मगर कैसे…?

वह बड़ी गंभीरता से सोचती—
“क्या मैं बिजली के नंगे तार को छू लूँ?”

“नहीं, नहीं…”
यह सोचते ही उसका बदन कांप उठा।

“बिजली से मरना भी कोई शराफ़त है?”
उसे वैसे भी करंट से डर लगता था।

अगर वह करंट से चिपक गई, और छुड़ाने वाला कोई न हुआ, तो रात तक उसका क्या हाल होगा?

फिर वह सोचती—
“मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा लूँ?”
क्योंकि उसने ऐसी बहुत सी कहानियाँ सुनी थीं।

मगर यह सोचकर ही उसे झुरझुरी आ जाती।
आग लगाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए।

 

अगर उसने आग लगा भी ली, तो बाद में उसका ….

 

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