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Home»Hindi Novel»Lagan ( hindi novel )

Lagan Hindi Novel Part 2

umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailAugust 1, 2026Updated:August 1, 2026 Lagan ( hindi novel ) No Comments53 Mins Read
Lagan Hindi Novel Part 2,feature image
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Lagan part 2

 

घर में शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कार्ड बाँटे जा चुके थे। खाने की सूची तैयार हो गई थी। हर रोज़ घर में व्यवस्थापकों की एक टोली आती, जिन्हें डैडी सारी व्यवस्थाओं के बारे में हिदायतें देते। पूरे घर में नया पेंट हो गया था, ऐसा लग रहा था जैसे घर की भी शादी हो और उसे दुल्हन की तरह सजाया जा रहा हो। और तो और, थी भी अपने सारे काम छोड़कर शादी की तैयारियों में लगी रहतीं। ज्यादा से ज्यादा यह होता कि उनकी सारी सहेलियाँ सुबह आ जातीं और घर में एक कॉफी पार्टी जैसा माहौल बन जाता। खैर, यह सब भी अच्छा लग रहा था।

मम्मी  को अपने कपड़ों की भी बहुत चिंता थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह हर चीज़ खुद के लिए भी बनवाना चाहती थी। उसने बाकायदा गहने भी खरीद लिए थे। लेकिन क्योंकि डैडी ने कभी उनके मामले में दखल नहीं दिया था और टोकने की हिम्मत नहीं थी, इसलिए वे कुछ नहीं कहते थे, बस चुपचाप सुनते रहते थे।
शॉपिंग के लिए फलक नाज़ को दस दिन मिले थे, और इन दस दिनों में ही उसने सैकड़ों चीजें खरीद ली थीं और हज़ारों रुपये उड़ा दिए थे।

यूं तो इस घर में जो कुछ भी था, वह सब फ़लक नाज़ का था। मम्मी  ने पहले से ही उसके लिए बेहिसाब कपड़े और गहने बनवाए हुए थे। लेकिन अब वह आधुनिक अंदाज़ की हर चीज़ खरीदना चाहती थी और बेतहाशा पैसे खर्च करके उसने असंख्य खूबसूरत और फैशनेबल परिधान सिलवाए थे। इसके साथ-साथ, उसने नए ज़ेवरात बनवाए थे, जूते और पर्स भी बेहिसाब खरीदे थे। घर की हर एक चीज़ का ऑर्डर पहले ही डैडी ने दे दिया था।

कौन सी नेमत थी जो उसे नहीं मिल रही थी? उसका ज़्यादा समय अपने शाही परिधान की डिज़ाइनिंग में बीतता था। वह पूरी दुनिया से अनोखा और नायाब जोड़ा पहनना चाहती थी। ऐसा न हो और वैसा न हो—यही सोचकर उसने अपनी सभी सहेलियों के साथ घूम-घूमकर बहुत महंगा और खूबसूरत कमख़ाब चुना था। दुपट्टे और क़मीज़ पर हज़ारों का काम करवाया था। जूतियों पर सोने के घुंघरू लगवाए थे और वैसे ही घुंघरू उसके पर्स पर भी लटक रहे थे।

उस दिन उसने जो ज़ेवरों का सेट पहना था, वह असली याकूत से बनवाया गया था। सिर्फ़ सेट की क़ीमत पचास हज़ार रुपये थी। ग़रारा सूट पर लाखों रुपये खर्च हुए थे। उसकी सभी सहेलियाँ कहती थीं कि उसने राजकुमारियों जैसा लिबास बनवाया है। उसे पहनकर वह सच में किसी महारानी जैसी लगेगी…

लेकिन कोई नहीं जानता था कि फ़लक के दिल में क्या है।

 

उसके भीतर की हालत अजीब और अनोखी थी। वह चाहती थी कि पहली रात वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत और आकर्षक औरत की तरह उसके सामने आए। इतनी शानदार, इतनी मनमोहक, इतनी ऊँची और इतनी दिल में उतर जाने वाली लगे कि सामने आते ही आफ़ाक़ जल जाए…
भस्म हो जाए…
उसके क़दमों में गिर पड़े…

पहले सजदे के बाद वह उसे उठने की मोहलत नहीं देगी।

उसकी नज़र में औरत की बाहरी ख़ूबसूरती ही दुनिया की सबसे बड़ी हक़ीक़त थी। यह हक़ीक़त वह कई बार सुन भी चुकी थी। वह जानती थी कि ख़ूबसूरत औरत के आगे मर्द बिल्कुल पालतू जानवर की तरह दुम हिलाने लगता है। वह चाहती थी कि आफ़ाक़ के गले में अपने हुस्न की ज़ंजीर डाल दे—इस तरह कि वह उसकी इजाज़त के बिना हिल भी न सके।

वह मर्द को ग़ुलाम बनाने वाली फ़ितरत लेकर आई थी। यही वजह थी कि वह पहले शादी की क़ायल नहीं थी। वह कहती थी कि शादी का फंदा इतनी जल्दी अपनी गर्दन में नहीं डालना चाहिए। लेकिन अगर शादी हो ही जाए, तो मर्द की पूरी दुनिया सिर्फ़ एक औरत के इर्द-गिर्द घूमनी चाहिए… हाँ, और एक बात भी वह कहती थी कि ख़ूबसूरत औरत को इस आज़ाद दुनिया में खुलकर जीने की इजाज़त होनी चाहिए। ख़ूबसूरत चेहरा इसलिए होता है कि उसे पूजा जाए, चाहा जाए, दीवानगी से देखा जाए। ख़ूबसूरत औरत शो-केस में रखी उस हसीन गुड़िया की तरह होती है, जिसे हर राहगीर दिलचस्पी से देखता है, बल्कि उसके लिए ज़रा देर ठहर भी जाता है। यही हुस्न की क़ीमत है, और हुस्न को हमेशा क़ीमत मिलनी चाहिए।

मर्द को इस मामले में तंगदिल नहीं होना चाहिए। वे ख़ुद तो दुनिया भर की आज़ादियाँ मांगते हैं, लेकिन औरत को पिंजरे में क़ैद करके रखते हैं। उसे पिंजरों से नफ़रत थी—चाहे वे रेशम और कमख़ाब के हों या लोहे के।

हाँ, लेकिन मर्द के लिए वह एक ज़ंजीर की क़ायल ज़रूर थी।

 

इतनी शानदार तैयारी के बावजूद, बेशकीमती कपड़ों और होश उड़ा देने वाले ज़ेवरों के बावजूद, उसका दिल बेचैन सा था। यह कैसी बेचैनी थी, वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी! उसे अपने बारे में किसी हीनभावना का एहसास भी नहीं था।

वह वैसे भी मर्दों के बारे में बहुत कुछ जानती थी। उसकी परवरिश में पर्दे या हिजाब का कोई दखल नहीं था। वह हर काम बेझिझक करती थी।

वह बेहद आत्मविश्वासी थी, और डैडी की दौलत उसका दोगुना आत्मविश्वास थी। अगर कोई औरत एक साथ दौलत और हुस्न की मालिक हो, तो उसे घबराने की ज़रूरत नहीं होती। हालात हमेशा उसका साथ देते हैं। लेकिन कभी-कभी वह घबरा जाती। पता नहीं, आफ़ाक़ कैसा होगा? अभी तक तो वह अमेरिका से नहीं आया था।

हर रोज़ वह इस उम्मीद में जागती कि कोई आकर उसे आफ़ाक़ के आने की ख़बर देगा। लेकिन घर के सारे लोग कितने निश्चिंत थे, जैसे उन्हें पूरा यक़ीन हो कि आफ़ाक़ ज़रूर आएगा। उनके इस यक़ीन को देखकर कभी-कभी वह भी निश्चिंत हो जाती—”अगर उन्हें फ़िक्र नहीं है, तो मुझे क्यों हो?” लेकिन फिर उसके दिल को जाने क्या होने लगता। अजीब-सी बेचैनी तारी हो जाती। कुछ समझ नहीं आता।

फिर वह कल्पना करती कि वह दुल्हन बनी बैठी है। इस कल्पना के साथ कई और तस्वीरें ज़िंदा हो जातीं। वह हमेशा अपनी कल्पना में आफ़ाक़ को घुटनों के बल झुका हुआ देखती। “आफ़ाक़ मेरे सामने झुका हुआ कितना अच्छा लगेगा!”

उसे अपने हुस्न पर ग़ुरूर था, और ज़ाहरी   ख़ूबसूरती के अलावा उसके पास आफ़ाक़ को देने के लिए कोई और तोहफ़ा नहीं था। यही उसकी पूरी दुनिया थी, और उसी पर उसने दांव खेल रखा था। लेकिन उसे अपनी जीत का पूरा यक़ीन था, क्योंकि वह हार मानने वालों में से नहीं थी।

अब तक उसने जो चाहा, वह पाया था, और जो कहा, वह किया था। ठीक उसी तरह जैसे अहंकारी और ज़िद्दी आफ़ाक़ खुद-ब-खुद उसकी ओर झुका चला आ रहा था और अब तक़दीर के आगे झुकने के लिए और भी क़रीब आ रहा था।

 

शादी के दिन उनके घर में बहुत भीड़ थी। एक तो डैडी और मती के ढेरों दोस्त और जानने वाले थे, ऊपर से उसकी अपनी सहेलियों का दायरा भी कम नहीं था। फिर…

उसका शौहर देखने का लोगों में जबरदस्त क्रेज था। बड़ी तादाद में भीड़ उमड़ पड़ी थी। लेकिन इतना बेहतरीन इंतज़ाम था कि भीड़ के बावजूद कोई अव्यवस्था नहीं हो रही थी।

पेय पदार्थों की सर्विंग और चहल-पहल जारी थी। गाड़ियाँ भरी हुई आ रही थीं और खाली होकर पार्क हो रही थीं। पुलिस के लोग ट्रैफ़िक को कंट्रोल कर रहे थे। रोशनी की नहरें बह रही थीं। शामियाने जगमगा रहे थे। कपड़ों और गहनों की चमक-दमक से आँखें चुंधिया रही थीं। इतनी सर्दी के बावजूद ठंड का एहसास नहीं हो रहा था।

इसी वक़्त, पिछले दरवाज़े से फ़लक नाज़ घर के अंदर दाख़िल हुई। वह ब्यूटी सैलून से आ रही थी। वह दोपहर दो बजे से वहाँ गई हुई थी, जहाँ उसे पूरी तरह तैयार होना था। और आज, उसने मेकअप आर्टिस्ट से साफ़-साफ़ कह दिया था कि हर पुरानी कहावत उसके आगे फीकी पड़ जानी चाहिए। जिसे कहते हैं कि “हुस्न को चार चाँद लगना”—तो आज चार की बजाय आठ चाँद लगने का दिन था।

उसकी तमाम सहेलियाँ उसके इर्द-गिर्द जमा थीं और साथ-साथ अपनी राय भी दे रही थीं। पूरे चार घंटे में उसका मेकअप मुकम्मल हुआ। जैसे ही वह तैयार हुई, वह ऐसी लग रही थी जैसे जन्नत की कोई हूर हो, कोई अप्सरा हो, या कोई आसमानी मख़लूक। कोई उस पर नज़र तक नहीं टिका पा रहा था।

जब उसने अपना चेहरा शीशे में देखा, तो खुद ही हैरान रह गई। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसमें इतना रूप छुपा हुआ था। अब उसके तीरों का तरकश पूरी तरह भर चुका था। उसे आफ़ाक़ के दिल पर तरस आने लगा, जिसे आज रात इन तीरों का निशाना बनना था।

 

अब वह आफ़ाक़ के सहमे हुए चेहरे का तमाशा देखने के लिए पूरी तरह तैयार थी। हल्के-हल्के क़दम बढ़ाती, अपने शानदार लिबास को संभालती, लंबी हील की नोक पर अपना वज़न डालती, संभलती हुई, एक शाही अंदाज़ में अपनी कार में जाकर बैठ गई।

जब वह घर पहुँची, तो घर मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था। लेकिन उसने किसी से बात नहीं की और पिछले दरवाज़े से ऊपर सीढ़ियाँ चढ़ गई।

आज उसकी सारी सहेलियों ने ऊपर की मंज़िल पर एक ऐसा कमरा चुना था, जहाँ से नीचे का पूरा नज़ारा देखा जा सकता था। जब वह ऊपर अपने कमरे में पहुँची, तो बाकी बची हुई सहेलियों ने उसे घेर लिया।

“या अल्लाह… या खुदाया!”

हर तरफ़ से यही आवाज़ें गूंजने लगीं। आज उसकी ख़ूबसूरती पर किसी की नज़र नहीं लग सकती थी। हर कोई उसके बेमिसाल हुस्न की तारीफ़ कर रहा था—

“हाय अल्लाह, फ़लकी! तू आज कितनी प्यारी लग रही है! आईने में खुद को देखा है?”
“अरे, आज तो तू उसे मार ही डालेगी!”
“बेचारा… हमें उस पर तरस आ रहा है! आज के बाद कहाँ कभी गर्दन उठा सकेगा?”
“मुझे तो उसकी क़िस्मत पर जलन हो रही है!”
“वाक़ई, जो हमारी फ़लकी का दूल्हा है, वह बहुत ही ख़ुशक़िस्मत है!”
“फ़लकी! आज की रात उसकी सारी ग़लतियाँ माफ़ कर देना!”

किसी ने एक आँख बंद करके शरारती अंदाज़ में कहा, तो पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा।

 

बड़े से दीवान पर गद्दे-तकिये के सहारे, अपनी ढेरों सहेलियों के बीच वह किसी शहज़ादी की तरह बैठी थी।

गुलनारी रंग के मखमली झिलमिलाते ग़रारे सूट के साथ याकूत का भारी सेट अजब बहार दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे अंगारों में कोई शोला लपक रहा हो। खूबसूरत बालों का ऊँचा सा जूड़ा बना कर उसके बीच में उसने एक नन्हा सा ताज सजा रखा था। सफेद-सफेद मोतियों के बीच एक बड़ा सा याकूत चमक रहा था। इसी तरह की एक नाज़ुक सी नथ उसकी नाक में थी। वह सचमुच किसी शहज़ादी की तरह लग रही थी।

“हाय, फलकी! तुझे तो किसी देश की शहज़ादी होना चाहिए था। यकीनन, क्या औरत को सिर्फ दिल की मलिका होना चाहिए? खैर, दिल की मलिका तो यह आज बन ही जाएगी!”
“अच्छे से संभाल कर रखना साहब बहादुर को, समझी!”

लड़कियाँ जाने कैसी-कैसी हिदायतें उसे दे रही थीं। इतने में बैण्ड की पुरसोज़ और दिलकश आवाज़ गूंजी—

“बारात आ गई!”
“बारात आ गई!”

लड़कियाँ बेइख्तियार होकर नीचे और झरोखों की तरफ दौड़ पड़ीं।
“अरे फलकी, तू भी देख ले!” किसी ने कहा।

मगर फलकी से उठा ही नहीं गया।

 

उसका इरादा तो यही था कि वह बारात के आने से लेकर आख़िर तक सारा हंगामा अपनी आँखों से देखेगी, मगर अब उससे उठा नहीं जा रहा था। दो-तीन बार सहेलियों ने बुलाया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। फिर वे सब नीचे जाकर झरोखों से देखने में मग्न हो गईं।

ऐसी बात नहीं थी कि उसे शर्म आ रही थी।
न जाने क्या हुआ, बैंड की आवाज़ सुनकर उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था।

इससे पहले भी उसने कई शादियों में बैंड की धुनें सुनी थीं, मगर उसका यह हाल कभी नहीं हुआ था।
न जाने यह कौन सी संगीत की धुन थी।
कितने ऊँचे सुरों पर बाजा बज रहा था।

उसकी हर आवाज़ और हर धड़क सीधी दिल पर लग रही थी। बैंड या शहनाई का संबंध दिल से होता है, यह बात उसे आज महसूस हुई।

शादी के ये बाजे उसे अलग-अलग एहसासों से भरने लगे—
खुशी भी, जोश भी, जज़्बा भी और सोज़ भी।

जितनी परमानंद और हलचल से भरी यह घड़ी थी, उतना ही यह दिल में मीठा-मीठा दर्द भी जगा रही थी।

यह दर्द किस बात की निशानी थी?
विसाल की नई ज़िंदगी की?
माता-पिता से बिछड़ने की?
या एक नई राह चुनने की?

पहले बैंड की आवाज़ सिर्फ़ रोमांचित कर देती थी।
मगर अब ऐसा लग रहा था जैसे बैंड की ध्वनि दिल के साथ एक लय में आ गई हो।

कभी वह कोई मधुर नग़मा लगती,
कभी कोई पुकार लगती।

 

हाँ, हर धुन जैसे साफ़ शब्दों में कह रही हो—
“गोरी, तेरा सांवरिया तुझे बुला रहा है… गोरी, आ!”

गोरी अगर उसकी बाहों में समा जाए…
मगर हर पुकार पर जाने क्यों आँसू निकल आते थे।
दिल तार-तार हो रहा था, जैसे बिखर रहा हो।

सांवरिया बाँहें फैलाए खड़ा था, मगर गोरी लगातार रो रही थी।
क्या यह माँ और डैडी से बिछड़ने का दुख था?

नहीं, ऐसा तो नहीं था!
वे तो यहीं कहीं पास ही होंगे।

तो क्या वह अपनी शादी पर उदास थी?
नहीं, यह भी नहीं!

फिर इस बेनाम उदासी की वजह क्या थी?

बैंड की आवाज़ उसके एहसासों को जैसे नोकदार तीर से झकझोर रही थी।
और वह यूँ ही मूर्तिवत दीवान पर बैठी रही।

मन तो कर रहा था कि उठकर देखे, एक नज़र उस सितमगर को भी देखे, जिसके साथ बेशुमार सपने जुड़ते जा रहे थे।
मगर उससे उठा नहीं गया।

फिर अचानक बैंड ने अपनी आखिरी धुन बजाकर ख़ामोशी ओढ़ ली।
“मुबारक! सलामत!” के शोर से माहौल गूंज उठा।

 

उसकी एक सहेली ने पलटकर देखा और बोली—
“निखत, अगर अब उठकर नहीं आई, तो पछताएगी। खुदा की कसम, देखने वाला…”

“नज़ारा है!”

“अफ्फोह! कितनी खूबसूरत कार है। कितने फ़नकाराना अंदाज़ में सजाई गई है। और देखो तो, आफ़ाक कितना डैशिंग लग रहा है!”

“जल्दी आ, प्लीज़ जल्दी-जल्दी!”

आफ़ाक का नाम सुनते ही जैसे उसके दिल को सुकून मिल गया।

शुक्र है, वो आ गया!
सुबह ही उसके आने की ख़बर मिली थी और तब से उसने इत्मिनान की एक लंबी सांस ली थी।

और अब अचानक उसे देखने की बेचैनी होने लगी।

वह अपनी तेज़ सांसों को काबू में रखते हुए जब झरोखे तक पहुँची, तो आफ़ाक नज़रों से ओझल हो चुका था।
शायद उसे बड़े आदर और सम्मान के साथ अंदर ले जाया गया था।

बाकी मेहमानों का फूलों के हार डालकर स्वागत किया जा रहा था।

“अब आती है, जब आफ़ाक अंदर जा चुका है!” सहेली ने हँसकर कहा।

मगर फिर भी उसने झरोखे में उसके लिए जगह बना दी।

वह मुस्कुराते हुए मेहमानों को देखने लगी। मेहमान भी बहुत ज़्यादा थे।
करीब सौ कारें आई थीं, और सब शान-ओ-शौकत के साथ आए थे।

उसने दिल में एक गर्व की लहर महसूस की।
उसका आफ़ाक कोई मामूली आदमी नहीं था, और रुतबे में डैडी से किसी भी तरह कम नहीं था।

निकाह का शोर उठा, तो वह जल्दी से आकर अपने दीवान पर बैठ गई।

कुछ लोग फ़ार्म और रजिस्टर उठाए ऊपर आए, और फिर सब कुछ पारंपरिक अंदाज़ में होने लगा।

उसने ज़्यादा शरमाने-लजाने की ज़रूरत नहीं समझी, बल्कि दस्तख़त करने के बाद जैसे ही वह हल्की-फुल्की हो गई।

तौबा! इस एक लम्हे के लिए वह कितने कर्ब से गुज़री थी।

  • कहीं शादी हो या ना हो…
  • कहीं आफ़ाक बदल ना जाए…
  • ख़ुदा जाने, वह लौट कर आएगा भी या नहीं…
  • पता नहीं, कहीं उसने मज़ाक तो नहीं किया था…

मगर नहीं!
यह मज़ाक नहीं था। यह ज़िंदगी की सबसे बड़ी हक़ीक़त थी।

अब वह मिसेज़ आफ़ाक थी।
आफ़ाक उसका था, उसका हक़ था, और दुनिया की कोई ताकत आफ़ाक को उससे नहीं छीन सकती थी।

निकाह के बाद जब छोहारे बाँटे गए,
तो शादी का हंगामा अपने शबाब पर पहुँच गया।

फलकी की सहेलियाँ बार-बार नीचे जाकर उसके लिए नई-नई चीज़ें ला रही थीं।
अब वह भी छनक रही थी, खूब बोल रही थी।

“अरी, मत बोल! सारा रूप बिखर जाएगा!”
“अब बस, उसी के साथ जाकर बोलना… आज रात उसने तुझे सोने तो नहीं देना!”

 

इन्हीं हँसी-मज़ाक के बीच खाने का वक़्त हो गया।
आज की दावत इतनी शानदार थी कि हर ज़ुबान पर बस एक ही बात थी—
“वाह! वाह!”

खाने वाले खेमे से “कुछ लुभावनी और तरह-तरह की खुशबुएं आ रही थीं। शेख सदरुद्दीन ने दिल खोलकर अपनी बेटी की शादी पर पैसे लुटा दिए हैं। हर कोई यही कह रहा था।

खाने के बाद लोग समूहों में बिखर गए और अपने-अपने मतलब की बातें करने में व्यस्त हो गए। ऊपर से यह दृश्य बहुत सुंदर लग रहा था। कोई समूह वहां खड़ा हंसी-मज़ाक कर रहा था। कोई यहां बातचीत में तल्लीन है। कहीं महिलाएँ चर्चा का विषय हैं। किसी समूह में महिलाएँ ही केंद्र में हैं। कहीं सिर्फ महिलाएँ पुरुषों की बुराई कर रही हैं। गंगा-जमनी हंसी और मिली-जुली चेहरे एक माहौल बना रहे थे।
आज ऐसा लग रहा था जैसे आकाश से खुशियाँ और रंग धरती पर उतर आए हैं और धरती अपने निवासियों पर इन्हें बिखेर रही है।
फलकी के दिल में एक अजीब हलचल हो रही थी। यह सारा हंगामा उसी की वजह से था।
यह खुशियाँ वह बाँट रही थी।
और इन खुशियों के पीछे कौन था?
आफ़ाक?
आफ़ाक के लिए उसने एक स्थायी कदम उठाया और इतने लोगों में खुशियाँ और खुशबुएँ बाँटी।
अरे, उधर देखो, यह
उधर गुलाब के फूलों वाली सड़क पर कोई सहेली चिल्लाई।
“कहाँ?”
फलकी ने अपनी मधुर आँखें ऊपर उठाईं।
वह सामने, जहाँ रोशनियों का एक नगारा बना हुआ है, बीन क्यों रही है, वहाँ
तेरा चाँद जो खड़ा है।”

“ओह…

आखिरकार फलकी ने ढूंढ ही लिया। वहाँ कुछ लोगों के साथ आफाक खड़ा हुआ था। उसका दिल धड़क उठा, लेकिन वह अपनी नजरें वहां से हटा नहीं पाई।
आज आफाक की सजधज बिल्कुल अलग थी।
वह तो समझ रही थी कि उसने कोई आधुनिक अमेरिकी सूट पहना होगा, सिर पर कोई हेयरकट होगा, कलाई पर चमकती घड़ी होगी और मुँह में कोई इम्पोर्टेड सिगरेट दबाए इधर-उधर देख रहा होगा।
लेकिन वह तो उसकी कल्पना के बिल्कुल विपरीत निकला।
उसने काले रंग की अचकन और सफेद शलवार पहनी हुई थी। अचकन के गले पर थोड़ा बहुत कढ़ाई का काम था। पैरों में सलीम शाहि जोड़ी और सिर पर पगड़ी थी। पगड़ी के ऊपर उसने अपना फूलों वाला सेहरा इस तरह लपेट रखा था जैसे कि सिर पर फूलों का कोई गट्ठर उठा रखा हो। शायद उसने सेहरा पहनना अनुपयुक्त नहीं समझा होगा और इस तरह सिर पर लपेट लिया हो। हाँ, बिल्कुल पारंपरिक दूल्हा बना हुआ था। इतने शिक्षित और फैशन-सेवी आदमी से उसे इस रूप की उम्मीद नहीं थी। उसने दिल में सोचा कि वह आज उससे यह जरूर पूछेगी कि यह कपड़ा उसने अपनी इच्छा से पहना था या अपनी माँ की इच्छा का सम्मान करते हुए पहन लिया था।
खैर, एक बात का उसे स्वीकार करना पड़ा।
इस कपड़े में भी वह बहुत खूबसूरत लग रहा था।
बिलकुल मुग़ल शहजादा लग रहा था। अल्लाह ने उसे शरीर और रूप बहुत अच्छा दिया था।”

 

“और उसके कपड़े में सलीका और दबदबा था। उसे दिल में थोड़ी सी जलन महसूस हुई।
वह चाहती थी कि आज आफाक ज़रा भी अच्छा न लगे। बस वही पूरी दुनिया की नजरों में छाई रहे।
उसके सामने आफाक का कोई जलवा न चले।
जो आदमी खुद इतना स्मार्ट और खूबसूरत हो, वह भला पत्नी से क्या मुकाबला कर सकता है? खैर, उसने वहीं खड़े-खड़े सोचा।
अच्छा तो लग रहा है, लेकिन उसका अपना क्या मुकाबला? वह खुद आकर्षण का पूर्ण उदाहरण थी।
भला उसके सामने कौन टिक सकता था?
आज मुकाबले की रात थी। और यह जानना था, कौन किसे हराएगा। दोनों अपने-अपने हथियार लिए हुए थे।
कोई बात नहीं, वह बिल्कुल नहीं घबराई। उसका पलड़ा भारी था। आज उसके पास ममता और नज़ाकत का पूरा खज़ाना था। फिर उसे किसी प्रकार का हीनभावना का एहसास भी नहीं था। वह संतुष्ट हो गई। जब कयामत का वक्त आएगा, तब देखा जाएगा।
आफाक काफी दूर खड़ा था। वह उसका चेहरा नहीं देख सकती थी। उसके चेहरे पर क्या प्रतिक्रिया थी, वह आज क्या महसूस कर रहा था, यह जानने की कोशिश नहीं कर सकती थी। वैसे दूर से तो वह काफी खुश नजर आ रहा था। बड़े मजे से अपने दोस्तों के साथ बातें कर रहा था। थोड़ी-थोड़ी देर में मेज़बानों में से कोई उसे खाना, फल या पान पेश करता तो वह मुस्कुराकर धन्यवाद कहता और थोड़ा सा उठा लेता। आज वह सबकी नजरों का केंद्र था। मेहमान-ए-ख़ास था। बारात का दूल्हा था। आकाश का चाँद था।”

“क्या वह इस बात पर इतराकर चल रहा है या नहीं?” फ़लक़ी बड़ी बेचैन थी यह जानने के लिए। “लेस कर, क्या उसे नज़र लगाने का इरादा है?”

पीछे से पिंकी ने एक धप्प मारी, तो वह चौंक उठी।
“देख रही हूँ, काफ़ी देर से मैं बस इसी को आँखों ही आँखों में पी रही हूँ!”

फ़लक़ी कुछ शर्मिंदा होकर मुस्कराई और झरोखे से हट गई।
“आज की रात जी भर के दीदार के जाम पीला और पिलाना!” – पिंकी शरारत से बोली।

“कमसख्त! बकवास बंद कर, मैं तो बस यूँ ही देख रही थी।”

“वहाँ ऐसे ही? ज़रा अपना चेहरा देखो, शौक़ की आग में जल रहा है! बेवकूफ़! यह आलम रहा तो कहीं आज मामला उल्टा न हो जाए।”

फ़लक़ी ने क़द-आदम आईने के आगे खड़े होकर अपना चेहरा देखा। सच में, उस पर एक अजीब रंग चढ़ा हुआ था।

“मामला उलट होने से क्या मतलब?” उसने पलटकर पिंकी से पूछा।

“अरे, वही जो कहते हैं ना – ‘इश्क़ पहले महबूब के दिल में पैदा होता है’। कहीं ऐसा न हो कि आज रात वह महबूब बन जाए और तुम आशिक़!”

“हूँ…!”

फ़लक़ी ने घमंड से नाक चढ़ाकर कहा – “ऐसी उम्मीद तो कभी मत रखना! अब इतनी भी गई-गुज़री नहीं हूँ, और तुम जानती हो!”

“कल सुबह पूछेंगे!” पिंकी ने शरारत से कहा।

 

“अच्छा, अब जल्दी से खाना खा लो, क्योंकि नीचे आरसी मुसहफ़ के लिए बुलाया गया है।”

“जा रहा है, और जाने के लिए तो तुम भी बेकरार होगी!”

“मुझे बिल्कुल भी भूख नहीं है, पिंकी!”

“हाँ, हर लड़की पहली रात यही कहती है – ‘मुझे भूख नहीं है’। शौक़-ए-विसाल में भूख उड़ जाती है, मगर पेट खाली हो तो… रात संभालनी मुश्किल हो जाती है!”

“कमिनी!” – उसने पिंकी को गाली दी।

“ज़रा सा कुछ तो खा ले!”

बैरे खाने के थाल उठाए अंदर आ गए थे। उन्होंने फ़लक़ी के आगे सारा खाना सजा दिया।

गर्मागर्म खाने से अच्छी ख़ुशबू और भाप उठ रही थी, मगर फिर भी फ़लक़ी का खाने को मन नहीं कर रहा था।
कोई भी निवाला उसके गले से नीचे नहीं उतर रहा था। पता नहीं क्यों…

“कुछ खा लो, ऐसा न हो कि कमजोरी के मारे गिर पड़ो!”

उसे याद आया कि उसने सुबह से कुछ नहीं खाया था। शाम को भी बस एक प्याली चाय पी थी।
कमज़ोरी तो बिल्कुल महसूस नहीं हो रही थी, लेकिन उत्साह (Excitement) बहुत था।
और शायद इसी वजह से भूख का एहसास नहीं हो रहा था।

पिंकी के ज़ोर देने पर उसने थोड़ा सा रोस्ट ले लिया, मगर पहला ही निवाला गले से नीचे नहीं उतरा।
पानी के घूंट से निगलना पड़ा। फिर उसने सिर्फ़ फ़िरनी पर ही संतोष किया और पूरी एक प्लेट खा ली।

 

बाकी सारी सहेलियों ने, जो उसके साथ ऊपर बैठी थीं, खूब जी भर कर खाया!

थोड़ी देर बाद आवाज़ आई कि दुल्हन को नीचे बुलाया जा रहा है।
फ़लक़ी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

हालाँकि उसे लगता था कि वह बिल्कुल नर्वस नहीं होगी…

“अब उस सितमगर का सामना होगा…
न जाने पहला वार किस तरफ़ से होगा और कैसा होगा…?”**

सहेलियाँ उसे अच्छी तरह से सजाकर-संवारकर नीचे ले जाने लगीं।
वह खुद भी गंभीरता और ठहराव के साथ, धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई उस शमीाने की ओर चली,
जो विशेष रूप से उसके लिए तैयार किया गया था।

“दुल्हन आ गई!”
“दुल्हन आ गई!”

एक शोर मच गया।

हर कोई उसे देखने के लिए ख़ेमे की ओर दौड़ पड़ा।
कुछ देर तक खूब गहमागहमी रही।

हर कोई उसे इस तरह देखने आ रहा था, जैसे उसने अभी-अभी नया जन्म लिया हो।

जिसने भी देखा, बस तारीफ़ ही की।

हर ज़ुबान से एक ही बात निकली –

“माशा अल्लाह! दुल्हन तो चौदहवीं के चाँद जैसी लग रही है!”

फ़लक़ी भी फूली नहीं समा रही थी जब सब यही कहते थे कि –

“फ़लक़ी तो बिल्कुल अपनी अम्मी की जवानी की तस्वीर लग रही है!”

और यही जुमला मिसेज़ सदरुद्दीन हर मर्द और औरत के मुँह से बार-बार सुनना चाहती थीं।

 

इसीलिए वह सबको खींच-खींचकर लातीं और दुल्हन को दिखातीं!

थोड़ी देर बाद दूल्हे के नाम की घोषणा हुई।
और फिर बड़े शान से झूमता हुआ वह आया और सोफे पर दुल्हन के करीब बैठ गया। एक खूबसूरत सी खुशबू फलक की नाक तक पहुँची।
आज यह खुशबू हर खुशबू पर भारी थी। पता नहीं उसने कौन सा परफ्यूम लगाया था। उसके भारी-भरकम वजूद की नजदीकी से फलक हल्के से कांपने लगी।
पता नहीं, आज की रात कैसे गुज़रेगी।

ऐसा लग रहा था कि उसके हर इरादे के कदम डगमगा रहे हैं, लेकिन उसने यह ज़ाहिर नहीं होने दिया कि वह नर्वस हो रही है।
आरसी मुशफ (दूल्हा-दुल्हन का पहली बार शीशे में एक-दूसरे को देखना) के समय इतनी भीड़ थी कि उसे आफ़ाक़ का चेहरा ठीक से दिख भी नहीं पाया।

फिर किसी शरारती ने कहा:
“बताओ, यह शीशे का झंझट क्यों, ऐसे ही दूल्हा-दुल्हन को एक-दूसरे का चेहरा देख लेने दो!”

फिर फोटोग्राफर आ गए।
और चारों तरफ फ्लैश चमकने लगीं।
“इधर देखिए।”
“प्लीज़, इधर देखिए।”
“ऐसे बैठिए।”
“उन्हें बुलाइए।”
“आप आइए।”

 

ऐसा लग रहा था कि हर कोई तस्वीर खींचने में ही मग्न है और बाकी सब बस दुल्हन के साथ फोटो खिंचवाने को ही एक सम्मान समझ रहे हैं।

इस तस्वीर खींचने की धूम से वह तंग आ गई थी।
बार-बार इधर-उधर रुख करने से उन्होंने एक-दूसरे को बहुत अच्छे से देख लिया था।
जब भी वह चोरी-चोरी आफ़ाक़ की तरफ़ देखती, वह मुस्कुरा रहा होता। उसके चेहरे की मुस्कान इतनी दिलकश थी कि वह उसमें खो जाती।

क्या आफ़ाक़ आज रात उतना ही खुश है जितना दिख रहा है? वह बार-बार अपने दिल से यही सवाल करती।

फिर विदाई का समय भी आ गया।

“शुक्र है!” उसने अपने दिल में कहा।
लोग बेवजह समय बर्बाद कर रहे हैं। इन्हें इस बात का अहसास ही नहीं कि दूल्हा-दुल्हन के लिए यह रात कितनी अहम होती है।

विदाई का दृश्य उसे हमेशा एक नाटक लगता था।
अगर किसी को रोना न भी आ रहा हो तो भी वे रोते हैं।
लड़कियाँ अंदर से कितनी खुश होती हैं, शादी का शौक़ सबको होता है, वे दिन गिन-गिन कर काटती हैं।
मगर विदाई के समय, जब सारी दुनिया इकठ्ठा होती है, तो ज़रा सा नाटक कर देती हैं।

वह इसी लम्हे से डर रही थी।

हालाँकि, उसे अपनी माँ पर पूरा-पूरा यक़ीन था।
क्योंकि वे खुद रूढ़ियों को नहीं मानती थीं, इसलिए ऐसा कोई भावुक दृश्य बनने ही नहीं देतीं।

उसे आफ़ाक़ की माँ को देखने की बड़ी तमन्ना थी।
संयोगवश, विदाई के समय वे खुद ही करीब आ गईं।

उन्होंने उसका बाजू पकड़कर उठाया और बोलीं, “चलो बेटी! अब अपने घर चलो!”

 

हज़ार कोशिशों के बावजूद, उसकी नज़र उठ ही गई।

वह एक बेहद शानदार और प्रभावशाली औरत थीं।
भारी-भरकम शरीर, बेदाग़ सफ़ेद रंगत, मुग़लिया दौर के नफ़ीस नख़्श।
बड़ी-बड़ी और साफ़ आँखें।

सादे सूट के ऊपर उन्होंने एक कश्मीरी शाल लपेट रखी थी।
उनके चेहरे पर एक गहरा रौब और एक अलग ही तरह की गरिमा थी।

“वाह! ऐसी शानदार माँ तो उसने पहले कभी देखी ही नहीं थी।”

अब तक जो माएँ उसने देखी थीं, वे बिल्कुल अलग थीं।
वे महिलाएँ थीं, जो हर शाम क्लब जाती थीं।
स्लीवलेस ब्लाउज़ पहनती थीं, अंदाज़ से सिगरेट थामती थीं।
सुबह कॉफ़ी पार्टियों में जातीं, शाम को ब्रिज (ताश का खेल) खेलतीं।
उनके खुले कंधे और गर्दन कभी उनकी उम्र की चुग़ली नहीं करते थे।

वे अपने पतियों को “यार” कहकर बुलाती थीं और उनके दोस्तों के कंधों पर ठहाके लगाते हुए हाथ मारकर बातें करती थीं।
बच्चों को छोड़कर दुनिया के हर विषय पर बोल सकती थीं।
बच्चे उनके लिए एक साइड बिज़नेस की तरह थे, जिनकी देखभाल गवर्नेस या आया करती थी।
कम बच्चे और ज़्यादा नौकर-चाकर – यह उनका स्टेटस सिंबल था।

रात को पार्टियों में वे डांस करतीं,
मन करता तो शराब भी पी लेतीं,
लेकिन किचन और खाना बनाने से उन्हें बेहद घिन आती थी।

खाने से ज़्यादा उन्हें अपने खूबसूरत नाखून प्यारे थे।
वे ज़्यादातर डाइट कंट्रोल करती थीं और अपनी काया की हिफ़ाज़त अपने बच्चे से भी ज़्यादा करती थीं।

उनके पति उनके ग़ुलाम होते थे।
बड़ी-बड़ी गाड़ियों और ईरानी क़ालीनों की तरह उनके आगे-पीछे घूमते रहते थे।

हाँ, इन औरतों की एक ख़ूबी थी, जो फ़लक को बहुत ज़्यादा पसंद थी…

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वह एक खुले दिल और खुले विचारों वाली माँ थीं।
उन्होंने बच्चों को पूरी आज़ादी दे रखी थी। वह कहती थीं, “इन बेचारों को भी जीवन का पूरा आनंद लेने का अधिकार होना चाहिए।”
दोस्त बनाने, पार्टियों में जाने और अपनी पसंद के काम करने की अनुमति मिलनी चाहिए।

इसीलिए फ़लक को अपनी माँ बहुत पसंद थी।
माँ ने कभी उसकी ज़िन्दगी में दखल नहीं दिया था, और न ही चाहती थीं कि कोई उनकी ज़िन्दगी के मामलों में दखल दे।

लेकिन आफ़ाक़ की माँ तो बिल्कुल अलग थीं।
वह एक ऐसी माँ थीं, जिनका ज़िक्र सिर्फ़ कहानियों में ही होता था।

कुछ समय के लिए, उसके दिल में अजीब सा अहसास उठा। फिर उसे आफ़ाक़ की माँ से एक गहरा रिश्ता महसूस हुआ।

लेकिन उसने अपने दिल को समझाया, “कहाँ पाकिस्तान में रहना है, वह तो अमेरिका चली जाएगी, और फिर वह आफ़ाक़ की पूरी ज़िन्दगी पर अपना हक़ जता लेगी।”

एक तरफ़ से माँ ने उसका हाथ पकड़ा हुआ था और दूसरी तरफ़ से आफ़ाक़ की माँ ने।
वह मोड़ के करीब पहुँच गई।

पता नहीं किसकी किस्मत थी, लेकिन वह फूलों और सोने की तारों से सजी हुई थी।
बाकी लोग भी पास आ गए।

किसी ने आफ़ाक़ का हाथ पकड़कर उसे उसके पास खड़ा कर दिया।
उसका दिल धड़कने लगा।

 

वह थोड़े से घूंघट के पीछे से आफ़ाक़ को ध्यान से देख रही थी।

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वह बहुत खूबसूरत लग रहा था और उसके होंठों पर एक दिलकश मुस्कान निरंतर झूम रही थी। उसकी आँखों में एक शरारत सी थी।
ऐसा लगता था जैसे आफ़ाक़ आज बहुत खुश है। उसके चेहरे पर चाँद-तारे देख कर फ़लक के मन में सचमुच शहनाइयाँ बजने लगीं।
अचानक उसे आफ़ाक़ से प्यार करने का मन करने लगा।

उसने महसूस किया, जैसे वह दोनों जहान उससे दिल खोल कर प्यार कर सकती है।

तभी किसी ने दरवाज़ा खोला। वह पीछे बैठ गई। फिर उसे बिलकुल पास, आफ़ाक़ को बैठा दिया गया।
दूसरी ओर उसकी माँ आकर बैठ गई।
वह बीच में थी।
एक ओर आफ़ाक़ का इतना पास होना, और दूसरी ओर आफ़ाक़।

किसने क्या किया, कितने फूल कार से गिराए गए और कितने पंखुड़ियाँ उछाली गईं, उसने कुछ नहीं देखा।
वह सिर्फ आफ़ाक़ के उस सुंदर, भरे-भरे चमकदार हाथ को देख रही थी, जो सामने उसके घुटने पर रखा था।
उसमें एक सुनहरी और सफेद अंगूठी चमक रही थी।
दूसरे हाथ से वह सिगरेट पी रहा था।

 

वह कितना करीब था, वह चाहती थी कि उसका हाथ छूकर देखे, लेकिन फिर उसे आफ़ाक़ की माँ

गुस्सा आने लगा।
अच्छा क्या था उन्हें साथ बैठाने की?
अगर वह अकेली होती तो क्या वह आफ़ाक़ के हाथ को छूने की हिम्मत कर पाती?
शायद, उसने दिल में सोचा। मगर नहीं। आफ़ाक़ और तरह का आदमी था। जो काम खुद उसे करना चाहिए था,
शायद वह अपनी दुल्हन से ऐसी उम्मीद न रखता हो।

अच्छा हुआ कि उसकी माँ साथ आकर बैठ गईं, वरना शायद वह कोई ओछी हरकत कर ही बैठती।
उत्साह में आदमी अंधा हो जाता है।

“बस थोड़ा और सब्र!”
वह अपने आप से कहने लगी।
फासला अब थोड़ा कम हो चुका था। थोड़ी देर में ही सब कुछ बदलने वाला था।

फिर वह आयी और उसका आफ़ाक़ घर आ चुका था।
लोग उसे कार से उतार रहे थे।

यहां उसने अपनी नजरें झुका लीं और धीरे-धीरे दुल्हन बन कर अपनी सास के साथ कदम से कदम मिला कर चलने लगी।

यहां भी बहुत शानदार इंतज़ाम था।
एक बड़े हॉल में उसके लिए एक ऊंचा पलंग लगा दिया गया था।
वह वहां बिठाई गई।

सभी लोग दुल्हन की अगवानी और फिर मार्गदर्शन के लिए दौड़े जा रहे थे।

थोड़ी देर में ही हलचल थी, तो उसने घड़ी पर समय देखा। रात के ग्यारह बज चुके थे।

वह थकान महसूस कर रही थी।
पता नहीं कब उसे छुटकारा मिलेगा।
लेकिन शुक्र है, मेहमानों से जल्दी ही छुटकारा मिल गया। एक महिला ने उसे उसके बेडरूम में ले जाकर छोड़ा।

वाह!
यह शयनकक्ष तो बिल्कुल एक ख्वाबों की दुनिया जैसा नजर आ रहा था।
फूल और रोशनियाँ एक साथ लहरा रहे थे।
फूलों के बिछाए बिस्तर पर सफेद चमकदार चादर नई कहानियों की दावत दे रही थी।
एक तरफ़ हल्की सी संगीत बज रही थी।
सामने एक बड़ा आईना था। हलके रंग की सिल्क की चादरें वातावरण को और भी आकर्षक बना रही थीं।
हीटर ने कड़ाके की ठंड में कमरे को गरम कर दिया था। इस कमरे में आते ही उसकी सारी थकावट दूर हो गई।

एक महिला ने उसका जरूरी सामान ड्रेसिंग रूम में छोड़ दिया था। जाते हुए, उसने कुछ मजाक भी किया, जिसे उसने जरूरी नहीं समझा।
वह खड़ी सोच रही थी कि अब क्या करना चाहिए।

 

अभी वह कुछ फैसला नहीं कर पाई थी कि उसकी सास अंदर आ गईं।
वह सच में एक बहुत शानदार महिला थीं।
उनके चेहरे पर स्नेह के साथ एक गहरी गरिमा थी।
पता नहीं क्यों, उन्हें देख कर फ़लक का दिल डर से कांपने लगता था।
वह घबराकर सोफ़े पर बैठ गई।

“तवायफ” नावेल हिंदी में पढ़े :

उसने फ़लक के माथे को चूमा और एक हीरे की अंगूठी उसके हाथ में डालते हुए बोलीं:
“मैं सुबह तक नहीं रुक सकती। मेरी दुआ है तुम दोनों खुश रहो। आफ़ाक़ से कहना कि वह तुम्हें अमेरिका लेकर आए। वहां बहुत लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। जब तुम वहाँ आओगी तो मैं एक शानदार दावत का इंतजाम करूंगी।”
फिर उन्होंने कुछ और बातें कीं और बाहर निकल गईं।

उसका दिल चाह रहा था कि उनसे कुछ बात करे। वह कोई शर्मीली भी नहीं थी, लेकिन उनका रौबदार चेहरा देखकर उसकी जुबान जैसे बंध सी गई थी। वह पूछना चाहती थी कि वे क्यों जा रही हैं। सुबह ही तो वलीमा है, और वे वलीमे की दावत में क्यों नहीं शामिल हो सकतीं?
आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है?

लेकिन वह पूछ नहीं सकी। फिर भी उसके अवचेतन में कहीं एक खुशी की हलचल थी।
ऐसी माँ अगर घर में रहती, तो उसका शांति से जीवन जीना मुश्किल हो जाता। अच्छा हुआ, उन्हें दूर ही रहना चाहिए।
वह वैसे भी सास के अस्तित्व से खुश नहीं थी। वह अक्सर कहती थी कि… वह किसी ऐसे आदमी से शादी करेगी, जिसकी माँ मर चुकी हो।

आफ़ाक़ का मामला तो कुछ और था, जिसमें उसने सब कुछ स्वीकार कर लिया था।
लेकिन अब उसे खुशी हो रही थी कि यह कांटा अपने आप हट गया।
इतनी बड़ी कोठी में, इतने आलीशान घर में वह अकेले अपनी मनमानी करेगी, और अमेरिका जाने से पहले ही आफ़ाक़ को इस तरह अपनी मुट्ठी में कर लेगी कि वह उसकी मौजूदगी में अपनी माँ की तरफ़ नज़र भी नहीं उठा सके।

 

आफ़ाक़ का ख्याल आते ही वह खड़ी हो गई।
वह उठ कर आईने के पास गई। थोड़ा सा मेकअप ठीक किया। बाल संवारने लगी।

ज़ेवरात ठीक किए। एक भरपूर अंगड़ाई ली और आकर छपरखट पर बैठ गई।
उसे किस तरह बैठना चाहिए? वह कोई बहुत ही खूबसूरत और दिल चुराने वाला पोज़ सोचने लगी।

आख़िरकार उसने अपने आपको ठीक से सजाया। ग़रारे को अच्छे से चारों ओर फैलाया, दुपट्टे को सिर पर सलीके से रखा और अपने आसपास फैला लिया। बहुत हल्का सा घूंघट निकाला और पलंग की चौखट के सहारे टिककर बैठ गई।

“हाँ, यह पोज़ वाकई अच्छा था।”

शायद उसने किसी फ़िल्म में देखा था या वैसे ही उसके ज़ेहन में आ गया था।

उसका चेहरा दरवाज़े की तरफ़ था।
बाहर जब किसी के क़दमों की आहट आती, उसका दिल तेज़ी से धड़क उठता।
उसने घड़ी देखी—इस वक्त रात के बारह बज रहे थे।

“हाय, अभी तक इस घर में किसी को नींद नहीं आ रही!”
“सारे मेहमान जब टलेंगे, तभी तो आफ़ाक अंदर आएगा।”

आधी रात तो यूँ ही बीत गई, और बची हुई रात सारी बातें करते हुए निकल जाएगी।

वह दिल ही दिल में मीठे लहज़े में मेहमानों को कोस रही थी कि तभी दरवाज़े के बिल्कुल क़रीब से क़दमों की आहट उभरी।

इस बार उसका दिल एक अजीब अंदाज़ में धड़का। उसने नज़ाकत से अपनी गर्दन झुकाई और अपनी लंबी पलकों को झुका लिया।

कोई अंदर आया था।

 

लेकिन उसने ज़रा भी देखने की कोशिश नहीं की। अपनी बेपरवाही बनाए रखते हुए… वह आफ़ाक पर वह साफ़ तौर पर जताना चाहती थी, और फिर आज पहली बार पहल करना, घूंघट उठाना और उसे ऊपर देखने पर मजबूर करना—यह तो आफ़ाक़ के फ़र्ज़ थे। वह ख़ुद क्यों देखती?

उसने लगभग अपनी आँखें मूँद लीं।

कोई बिल्कुल क़रीब आ गया था।

भावनाओं की तीव्रता से उसका चेहरा लाल हो गया और हाथ काँपने लगे।

“आब… अब… अब…”

“भाभी !”

एक पतली-सी आवाज़ ने उसे चौंका दिया।

उसकी बेख़ुदी कुछ इस तरह टूटी जैसे काँच का पूरा सेट मेज़ से गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गया हो।

हैरान होकर उसने नज़र उठाई। वहाँ आफ़ाक़ नहीं था, बल्कि उसकी कोई कज़िन खड़ी थी, जिसके चेहरे पर हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान थी।

फलक़ी शर्मिंदा हो गई।

अपनी तंज़ भरी मुस्कान को खुशमिज़ाजी में बदलते हुए वह कज़िन बोली—

“भाभी, मैं आपको यह बताने आई थी कि आफ़ाक़ भैया अपनी अम्मी को एयरपोर्ट छोड़ने गए हैं। ज़रा देर से आएंगे। आप तब तक आराम कर लें… अच्छा, मैं चलती हूँ।”

वह उसके जवाब का इंतज़ार किए बिना चली गई।

और फलक़ी हक्का-बक्का कमरे में अकेली रह गई।

“यह क्या हुआ?”

“आख़िर हुआ क्या?”

कोई इस तरह भी करता है?
आज की रात से ज़्यादा अहम कोई काम हो सकता है क्या?
घर में इतने ड्राइवर हैं, रिश्तेदार हैं—कोई भी उनकी अम्मी को छोड़ने जा सकता था।

आफ़ाक़ ने ऐसी हरकत क्यों की?
क्या वह मुझे यह जताना चाहता है कि उसकी नज़रों में मेरी कोई अहमियत नहीं?

तो मैं उसे मज़ा चखा दूँगी!
कमीनाः कमबख़्त!
समझता क्या है अपने आपको? क्या मैं निकाह के दो बोल से डर जाऊँगी?

मैं अभी उठकर अपने डैडी के घर चली जाऊँगी!
फिर ज़िंदगीभर उसका मुँह नहीं देखूँगी! मुझे किसी की परवाह नहीं!

वह ग़ुस्से में उठकर खड़ी हो गई और कमरे में तेज़ी से इधर-उधर टहलने लगी।
उसका दुपट्टा ज़मीन पर गिर गया, मगर उसे इसका होश भी न था।

“क्या वह अपनी माँ को मुझसे ज़्यादा अज़ीज़ समझता है?”
“ऐसी की तैसी उसकी माँ की!”

“बुढ़िया को सबक़ सिखा दूँगी!”
“कुछ होगी तो अपने घर होगी, इस घर में क़दम रखने की हिम्मत करे तो सही!”

“नीच!”

हाँ, मगर…
बुढ़िया का इसमें क्या क़सूर?
अगर आफ़ाक़ चाहता, तो वह कोई बहाना बना सकता था, कोई माफ़ी माँग सकता था, कोई और इंतज़ाम कर सकता था।

 

और अगर जाना बहुत ज़रूरी था, तो मुझे भी साथ ले जाता!
कम से कम मुझसे कहकर तो जाता, अंदर आकर मुझसे इजाज़त तो लेता!

कोई इस तरह चंद लम्हों की ब्याही दुल्हन को छोड़कर जाता है?
वह तो है ही सनकी…
पागल… अहमक़!

ऐसी बेइज़्ज़ती करूंगी आज कि उसे पता चल जाएगा कि फ़लक़ नाज़ किस चीज़ का नाम है!

वह कभी गुस्से में बड़बड़ाती, कभी उठती, कभी बैठ जाती।
कभी आईने के सामने खड़ी होकर गहने नोच-नोचकर उतारने लगती।

उसे इतना ग़ुस्सा आ रहा था कि बार-बार ठंडा पानी पी रही थी।
इतनी कड़कड़ाती ठंड के बावजूद माथे पर पसीना आ रहा था।

कमरे में टंगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी—
“एक बज रहा था,”
जैसे उसकी बेबसी का मज़ाक उड़ा रही हो।

“फ़लक़ी… फ़लक़ी… फ़लक़ी…”

“बेवकूफ़ लड़की!”

उसका दिल किया कि घड़ी उठाकर पटक दे।
हर चीज़ को तहस-नहस कर दे!

घर में कभी किसी ने उसकी बात नहीं टाली थी।
जो चाहा, वो पाया।
और आज…?
हर चीज़ उसका मज़ाक उड़ा रही थी!

उसे ऐसा लग रहा था कि दीवारों से सिर टकरा दे,
या इस पूरे खूबसूरत कमरे को आग लगा दे!

काफ़ी देर तक ख़ुद को कोसने के बाद, वह थक-हारकर सोफ़े पर बैठ गई।

घड़ी अब भी एक बजा रही थी।

 

“जाने आफ़ाक़ किस वक़्त आएगा?”

“बहरहाल, अब जो होना था, हो गया!”

ग़ुस्सा करने से क्या फ़ायदा?
ग़ुस्सा करने से कोई मसला हल नहीं होगा।
हो सकता है, हालात और बिगड़ जाएँ!

यह भी मुमकिन है कि आफ़ाक़ किसी मजबूरी में फँस गया हो।
ये लोग बड़े रिवायती (परंपरागत) से लगते हैं, हमारी तरह एडवांस नहीं हैं।
ऊपर से बहुत सलीकेदार बनते हैं, लेकिन अंदर से वही पुराने खयालात के लोग हैं।

हो सकता है, माँ के आगे बोल न सका हो…
जाना मजबूरी बन गया हो।

शायद लौटकर ख़ुद ही माफ़ी माँगेगा।
आख़िर मैंने उसका क्या बिगाड़ा है जो वह मुझसे बदला ले रहा होगा?
दुल्हन से मिलने की जल्दी तो हर किसी को होती है!

शायद उसकी माँ कोई बहुत ज़बरदस्त और हावी रहने वाली औरत हो।
होगी ही, तभी तो वलीमे को छोड़कर जा रही है और बेटे की पहली रात ख़राब कर दी!

“अच्छा हुआ, वह चली गई!”
“ऐसी माँ को यहाँ नहीं रहना चाहिए!”
यहाँ रहकर न जाने और कितने काम बिगाड़ती!

“ख़ुदा करे अब वह उसे जहाज़ पर चढ़ाकर ही लौटे!”
“कहीं ऐसा न हो कि वापस उसे साथ ही ले आए!”

“ख़ुदा न करे, अगर मेरी भी उसके आगे न चली, तो फिर क्या होगा?”

ख़ैर, मेरी तो उससे कभी बनी ही नहीं सकती—इसका तो मुझे पूरा यक़ीन है!

अब बहुत नींद आ रही थी…

बल्कि ग़ुस्सा करके वह इतनी थक चुकी थी कि हिलकान हो गई थी।

वह उठी, बाथरूम गई, चेहरा धोया।

अगर अब वह फिर से तैयार न होती, तो उसका “मिशन” नाकाम हो जाता।

अब ताज़ा दम होकर आई, तो पहले से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही थी!

आईने में देखा तो दिल बाग़-बाग़ हो गया।

 

फिर से जाकर छपरखट (पलंग) पर बैठ गई।
वक़्त देखा—“रात के दो बज रहे थे!”

न जाने किस वक़्त जहाज़ उड़ा होगा…
दो घंटे में तो उसे आ जाना चाहिए था!
ख़ैर, अब आता ही होगा।

“अच्छा हुआ, मैं वक़्त पर संभल गई!”

पहले तो बिल्कुल नहीं बोलूँगी!
सो बार मिन्नत करेगा…
पैर पकड़ लेगा…
क़समें खाएगा…
मैं यूँ ही बेरुख़ी से बैठी रहूँगी।

“फिर कहीं जाकर बोलूँगी!”

आहट होती या न होती, उसका दिल फिर भी तेज़ी से धड़क उठता।
घर में गहरा सन्नाटा था।

“पता नहीं, घर में कौन-कौन होगा…”
“मुझे क्या! बस वो ‘दुश्मन-ए-जहाँ’ (आफ़ाक़) आ जाए, तो मैं सब कुछ भूल जाऊँ!”

“टिक… टॉक… टिक… टॉक…”

घड़ी की आवाज़ उसकी धड़कनों के साथ मिलकर एक अजीब-सा साज़ बजा रही थी।
कोई मैगज़ीन भी पास नहीं थी, जो वह पढ़ लेती।

यूँ ही पलंग पर अधलेटी हो गई।

सोचते-सोचते जाने कब नींद पलकों में उतर आई।
कई रातों से जागी हुई थी, थकान थी,
और फिर… जवानी की मीठी नींद!

ग़ुस्सा, नाराज़गी—सब ताक़ पर रख दिया!

जब आफ़ाक़ कमरे में दाख़िल हुआ, तो उसने देखा—
वह इस तरह सो रही थी, जैसे हज़ार क़यामतें उसके पहलू में ठहरी हों!

“ख़ूबसूरती नींद में हो… और सुहागरात का जादू हो…
तो आदमी अपने दिल पर काबू कैसे रख सकता है?”

वाक़ई, उसे अपने हुस्न पर जितना नाज़ होता, कम था!

आफ़ाक़ ने एक क़दम पलंग पर रखा…
और उस पर झुक गया…

 

तभी वह करवट लेकर जाग उठी…

“ओह…”
“ओह…”

उसके सारे “प्लान” धरे के धरे रह गए!
“अफ़सोस! इस वक़्त आँख लग गई!”

पर शुक्र है, जल्दी खुल भी गई…
वरना पता नहीं क्या हो जाता!

वह चौंककर उठ बैठी और जल्दी से खुद को सँभालकर एक तरफ़ हो गई।
लेकिन उसने अपना चेहरा इस तरह फेर लिया, जैसे नाराज़ हो!

आफ़ाक़ भी सीधा खड़ा हो गया।
उसने अपनी अचकन उतारकर दूर सोफ़े पर फेंक दी…
एक गिलास पानी पिया…
और फिर उसके सामने आकर खड़ा हो गया!

फ़लक़ी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा…
आख़िर वह घड़ी आ ही गई थी…
जब उसका रूँआ-रूँआ चौकस हो गया!

तभी आफ़ाक़ ने अपनी गहरी, मगर सधी हुई आवाज़ में कहा—

“मोहतरमा!
आप यह समझती हैं कि मर्द बेवकूफ़ होता है, या उसे बेवकूफ़ बनाया जा सकता है?”

फ़लक़ी ने हैरानी से सिर उठाया!

“आपको लगता है कि हुस्न बहुत बड़ी ताक़त है… और मर्द को अपने क़दमों में झुका लेता है?”

उसने सख़्त हैरत से आँखें फैला दीं!

“आपका ख़याल है कि ‘सेक्स’ मर्द की सबसे बड़ी कमज़ोरी है?”

“इसीलिए…”“औरत मर्द को अपनी उंगलियों पर नचा सकती है—यही सोचती हैं आप?”

“तो मोहतरमा…”
“आज की रात मैं आपको सिर्फ़ यह बताऊँगा कि मर्द के बारे में आपका हर फ़लसफ़ा और हर ख़याल बिल्कुल ग़लत है!”

“आपके नज़रिए एक गुमराह करने वाले माहौल की पैदावार हैं!”
“आप एक भटकी हुई लड़की हैं!”

“मर्द क्या चीज़ है?”
“आप आज तक जान ही नहीं सकीं!”

“अब, मेरे निकाह में आने के बाद, पहली बार आपको अंदाज़ा होगा कि मर्द क्या होता है!”

“और मुझे उम्मीद है कि बेवक़ूफ़ियों में वक़्त ज़ाया करने के बजाय, आप कुछ सीखने की कोशिश करेंगी!”
“इसी में आपकी और आपके हुस्न की बहुतरी है!”

वह अभी उसकी सारी बातें समझने और फिर कोई नई चाल चलने का सोच ही रही थी…

कि तभी आफ़ाक़ ने अपना लहज़ा बदल लिया!

“उठिए! कपड़े बदल लीजिए!”

“मुझे इस तरह बनी-सँवरी, बनावटी औरतें पसंद नहीं!”

“ज़ेवर और श्रृंगार औरत का हथियार होते हैं…”
“मगर औरत को हथियार से तब लैस होना चाहिए, जब वह जंग के इरादे से मैदान में उतरे!”

“अगर वह एक बेहतरीन हमसफ़र बनकर रहना चाहती है…”
“तो उसकी सादगी और शराफ़त ही उसके सबसे बेहतरीन हथियार होते हैं!”

“कपड़े बदलकर, मुँह-हाथ धोकर सो जाइए!”

वह जाने के लिए मुड़ा…

फिर अचानक रुका…

उसकी तरफ़ मुँह करके बोला—

“मुझे मालूम है, इस रात की आपके लिए कोई अहमियत नहीं होगी…”“शादी की पहली रात…”

“उन लड़कियों के लिए बेहद अहम होती है, जिन्होंने अपनी निस्वानियत (स्त्रीत्व) के असली गहनों को काँच की तरह सँभाल कर रखा होता है!”

“मगर जो लड़कियाँ ‘इज़्ज़त’ के तसव्वुर (अवधारणा) को एक पुरानी सोच समझकर उसके साथ खेलती हैं…”
“वे सुहागरात की हक़दार नहीं होतीं!”

वह इतनी शर्म से पानी-पानी हो गई कि उसका सिर ख़ुद-ब-ख़ुद घुटनों से जा लगा!

“मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानता हूँ!”

अब आफ़ाक़ की आवाज़ और भी गहरी और सख़्त हो गई थी!

“और उन लोगों को भी जानता हूँ, जिनसे तुम्हारे ताल्लुक़ थे!”

“और फिर… तुमने मुझसे शादी सिर्फ़ अपनी ‘लाइफ एंजॉय’ करने के लिए की!”
“तुम्हें कोई ‘शौहर’ नहीं चाहिए था!”

“और वैसे भी, तुम्हारे शहर में तुम्हारे ‘आशिक़’ कोई कम तो नहीं…”
“तो फिर यह ड्रामा सिर्फ़ मेरे साथ ही क्यों?”

“लीजिए, बिस्मिल्लाह कीजिए…”

“मैं हाज़िर हूँ!”

“वैसे, मैं वह नहीं हूँ जो तुमने समझा था…”
“और न ही वह बनूँगा, जो तुम मुझे बनाना चाहती हो!”

“और हाँ…”

“मेरी तरफ़ से इस रात का सबक़ सिर्फ़ इतना है कि आज से ही ‘नेक औरत’ बनने की रिहर्सल शुरू कर दीजिए!”

“शब-ए-ख़ैर!”
और वह दरवाज़ा खोलकर कमरे से बाहर चला
गया…

 

कुछ देर के लिए फ़लक़ी का ज़हन और जिस्म सुन्न हो गया…

ना वह सोच पा रही थी, ना कुछ सुन पा रही थी… और ना ही हिल-डुल पा रही थी!

जहाँ बैठी थी, वहीं जैसे बर्फ़ बन गई!

उसके सारे अंग इस क़दर जकड़ गए कि उसे एहसास ही न रहा कि वह गोश्त-पोस्त की एक इंसान है!

आफ़ाक़ ने एक तकिया उठाया और बाहर निकल गया…

कभी-कभी ऐसा होता है न, जब किसी इंसान पर हैरतों के पहाड़ टूटते हैं…
तो वह कुछ देर के लिए अंधा, बहरा और गूंगा हो जाता है!

कभी-कभी इंसान अपनी ही हैरत पर मर जाना चाहता है!

कभी-कभी शर्मिंदगी इतनी गहरी होती है कि लगता है—
“चुल्लू भर पानी ही काफ़ी है!”

कभी-कभी इज़्ज़त-ए-नफ़्स (स्वाभिमान) इस कदर रौंदा जाता है कि आदमी सोचता रह जाता है—
“क्या इससे पहले मेरी कोई इज़्ज़त थी भी या नहीं?”

“या फिर मैं हमेशा से ही इसी तरह रुसवा की जाती रही हूँ?”

आज की रात फ़लक़ी के लिए ‘हैरतों’ और ‘इम्तेहानों’ की रात थी…

हर क़दम पर उसे हैरानी हो रही थी,
मगर यह आख़िरी वाक़िआ उसकी ज़िंदगी का सबसे दर्दनाक और दिल तोड़ने वाला हादसा था!

“वह जो आसमानों पर उड़ रही थी…”
“जिसकी ज़िंदगी फूलों और इंद्रधनुषों में बसी थी…”

जिसने जो चाहा, वही पाया…
जिसकी मनमानी ही उसकी पहचान थी…

“कभी ‘डैडी’…
“ने  आँखें दिखाई न थी, न ही घूरा । सोने चांदी के पालने में झूलती, भूलती वह, और फिर जवानी भी कैसी शानदार थी… जिसने देखा, दिल पेश किया। दिलों को ठुकराना उसका शगल था। जज़्बों का मज़ाक उड़ाना उसकी आदत थी। कमज़ोरियों से खेलना उसकी सरच थी और सबसे बड़ी बात ये थी कि वह पुरुषों को एक बेवकूफ मखलूक समझती थी। वह यही जानती थी कि औरत और रहिम पुरुष की कमजोरी होते हैं और इस कमजोरी का सहारा लेकर उन्हें जिस हद तक चाहो मोड़ दो, तोड़ दो और मचलाओ, भला पुरुष की जिंदगी का उसके सिवा मकसद ही क्या है कि वह हमेशा सुंदरता के तले के तले चाटता रहे। वह भी खूबसूरत औरत के… खूबसूरत औरत तो सिर्फ चाहिए जाने के लिए, पूजा करवाने के लिए होती है। उसने चांद-चंदन की और उन औरतों की कहानियाँ पढ़ी थीं, जिन्होंने अपने हुस्न की आग से एक और नहर तबाह कर दी थी। ‘क्लो पीड़ा’ फिर उसने कई बार देखी थी। आखिरकार तो सहेलियाँ उसे ‘क्लो पीड़ा’ कहने लगी थीं। और वह सोचा करती थी कि अगर औरत आर्थिक रूप से मजबूत हो तो उसे कभी पुरुष की गुलामी नहीं करनी पड़ती। पुरुष को यही ज़ख़्म है, ताकि वह औरत का काफ़िल है, तो उसके डैडी की सारी जायदाद उसके नाम थी। वह एक मुनासिब माहवारी आमदनी की मालिक थी। ज़ेवर, कपड़े का कोई हिसाब नहीं था। उसके दिल में कोई हसरत नहीं थी। मचलने से पहले उसे हर चीज़ मिल जाया करती थी।”

हां, ग़ुस्सा उसकी फ़ितरत में बहुत था।
अगर कोई चीज़ न मिलती तो जी भर के ग़ुस्सा करती। तोड़-फोड़ करती और कभी-कभी इतना ग़ुस्सा आता कि कोई चीज़ हासिल करके उसे तबाह कर देती।
जब हर इच्छा पूरी हो रही हो तो बेवजह ग़ुस्सा करने को जी चाहता है। हां, अगर आफ़ाक़ उसकी तरफ़ माइल न होता तो वह जाने क्या कर बैठती। ग़ुस्से का वह तूफ़ान किस-किस को ले डूबता।
बनाया था।
मगर आफ़ाक़ ने तो बाक़ायदा उसे पसंद करने का ढोंग रचाकर उसे बेवकूफ़ बना लिया था।
ख़ुद अपने ही निशाने से वह घायल हो गई थी। ख़ुद अपने तरकश का तीर उसकी कनपटी में लग गया था। ख़ुद अपने अंदाज़ों ने उसे रसवा कर दिया था। ज़िंदगी में पहली बार सब कुछ ग़लत हो गया था। ऐसे में वह जितना भी ग़ुस्सा करती, कम था।
आज तो उसे इस पूरे घर को तहस-नहस कर देना चाहिए था। छत को धमाके से उड़ा देती। ड्रेसिंग टेबल का आईना चूर-चूर कर देती। सर से ज़ेवरों को मुठ्ठी में ले कर रेज़ा-रेज़ा कर देती। शादी के जोड़े को तार-तार कर देती।
महरी के फूल नोच लेती।
चिल्ला-चिल्ला कर सारा घर सिर पर उठा लेती।
हर बात की उससे उम्मीद थी। हर अनपेक्षित हरकत वो कर सकती थी, मगर… जब वह हैरत के इर्द-गिर्द के जबड़े से बाहर की तो रंज और दुख के मालिक
महिब बादलों ने उसे घेर लिया।
अफ़सोस! यह क्या हो गया!
और उसके साथ।”

“इस कदर फूट-फूट के वह रोई कि आलमाँ, शायद आफ़ाक़ भी उसे इस हाल में देख लेता तो उसे उस पर तरस आ जाता।
आख़िरकार एक कमजोर औरत ही तो थी न?
बिस्तर के ऊपर उंढे मुँह गिर कर वह तबाह क़िस्म की नमाज़ में रोई है। बिस्तर की हर शिकन से लिपट-लिपट कर उसने अपनी सिसकियाँ और दहाई में क़ाबुल भर के आँसू सफेद चादर पर काले होते लगते रहे। अधखुली और की कलियाँ उसके चेहरे से लिपट-लिपट गईं। कभी क्यों मैं मुँह छिपाकर कभी कमियों को बता देना,
वह जितना रो सकती थी, रोई। कभी-कभी रोने के सिवा कोई चारा नहीं दिखाई देता और फिर जब दिल में विभिन्न प्रकार के जज़्बात एकत्र हो जाएं तो समझ नहीं आता कि अब क्या करना चाहिए, कष्ट सहना चाहिए या ग़िला। अच्छा हुआ या बुरा। तक़दीर का लिखा था या अपना क्या।
अपने आमालों की सज़ा थी या इम्तिहान। क्या हम इस सज़ा के हक़दार थे या नहीं?
फरियाद करनी चाहिए या सब्र रखना चाहिए।
जब इन बातों की समझ नहीं आती तो इंसान रो पड़ता है। आँसू इंसान की बेबसी की आख़िरी निशानी होते हैं।
जब इंसान हथियार डाल देता है और कुदरत के आगे दम मारने की हिम्मत नहीं रखता,
अपने जज़्बातों की आह और फ़ग़ां नहीं सुन सकता,
तो फिर जी भर के रोता है। लोग कहते हैं रोना बزدली है। तो फिर बहादुरी क्या है?”

 

“ठाठे  मारते हुए बाग़ी जज़्बातों के तेज़ और तंड तूफ़ान को कैसे रोका जा सकता है?
जब आदमी दूसरे को खत्म नहीं कर सकता,
अपने सीने में छुरा नहीं घोंप सकता,
तो क्या करे…
फिर रोना ही अच्छा होता है।
ऐसे में रोने से बड़ी तस्सली होती है।
पूरी ज़िंदगी व्यक्तिगत इच्छाओं पर मचलने वाली और छोटे-मोटे आँसुओं से रोने वाली फ़लक को आज ये पता चला कि आँसू क्या होते हैं। दिल की तकलीफ़ क्या होती है। चोट कैसे लगती है।
दर्द कैसे उठता है। अकेलेपन का क़र्ब क्या है।
बिना ज़बान के कौन से परिंदे का नाम है।
और हालात के आगे दौलत, रुतबा, इक्तदार, हुस्न सब गुलाम बन जाते हैं।
हथियार डाल देते हैं। सबसे सख़्त जान चीज़ इंसान है, जो हर तरह के हालात से गुजरता है।
पता नहीं इतने आँसू कहां से आ गए थे, खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थे।
ज़ेवरों का क्या हुआ…?
सारी दुपहर  श्रृंगार पर खर्च कर दी थी।”

“जोड़े का क्या हश्र हुआ?
वह जिस पुल सिरात पर थी, वहाँ सिर्फ आँसू थे। पछतावे के थे। यार-नज़दीकी के। आँसू एक विशाल असीम सागर बनते जा रहे थे। और वह उन में डूबती जा रही थी।
फिर इंसान आँसुओं से भी थक जाता है। खुद से थक जाता है।
पता नहीं कब उसकी सिसकियाँ धीमी होती गईं। पता नहीं कब नींद उसे थपकियाँ देने लगी। उसे झूला झलाने लगी। इंसान पागल है।
फरेब  माँगता है।
और फिर नींद का क्या है? जितनी मासूम है, उतनी ही क्रूर भी है। सज़ा पर भी आ जाती है। काँटों पर भी आ जाती है।
हर जगह अपनी ज़बरदस्त हक़ीकत को मनवाती है।
सुबह के चार बजे होंगे,
जब वह उल्टी पड़ी, वैसे ही सिसकती हुई नींद में डूब गई। कितनी अच्छी है नींद।
थोड़ी देर के लिए हर चीज़ पर पर्दे डाल देती है। ज़ख्म छिपा देती है। दर्द से बेगाना कर देती है।
एक नए जहान में ले जाती है जहाँ शोर-शराबा नहीं होता।
रुसवाइयाँ और अज़ाब नहीं होते।”

आदमी खो जाता है। गुम हो जाता है। अपने आप से बेगाना हो जाता है।

सुबह जब उसकी नींद खुली तो पहली नज़र घड़ी पर पड़ी। दिन के दस बज रहे थे। अफ़ोह! वह इतनी देर तक सोती रही। फिर उसकी नज़र अपने बिस्तर पर गई, अपने गहनों पर गई, जो चारों ओर बिखरे पड़े थे। फिर उसने हैरानी से अपनी बनारसी साड़ी को देखा, जिसे उसने अब तक पहना हुआ था। और उसे अचानक याद आ गया कि रात उसकी सुहागरात थी। और वह बीत गई… किस तरह बीती!

एक-एक बात उसे याद आने लगी। उसने करवट लेनी चाही, पर ले नहीं पाई। जैसे वह सोते-सोते अकड़ गई थी। उसका बाजू चेहरे के नीचे था और गाल दुख रहा था। हाँ, वह तकिया सारी रात उसके गाल को दबाता रहा और उसे इसका एहसास तक नहीं हुआ। अब सारे एहसास एक-एक कर जाग रहे थे।

 

अपना चेहरा शीशे में देखने का मन किया। देखे तो उसके चेहरे पर क्या बीती? वह धीरे-धीरे उठी… पैर बिस्तर के नीचे लटकाए, तो ठिठक कर रह गई। उसने फिर से आंखें मलकर देखा।

वाकई, सामने सोफ़े पर आफ़ाक़ बैठा था।
बिल्कुल साफ़-सुथरा, नहा-धोकर ताज़ा। उसने अभी तक ड्रेसिंग गाउन पहना हुआ था। शेव भी कर ली थी। उसके मुँह में पाइप था और सामने रखी अंग्रेज़ी अख़बार को गहराई से पढ़ रहा था।

उसे देखते ही फ़लकी का ख़ून खौलने लगा। रात उसने कितनी बदतमीज़ी दिखाई थी और अब कितना सभ्य बनकर बैठा था! उसका दिल किया कि उसके चेहरे पर थूक दे और अपने घर चली जाए। अब क्या मजबूरी थी? जो होना था, हो चुका था।

वह अचानक ग़ुस्से से खड़ी हो गई। आफ़ाक़ ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा—यादों की राह जैसे बस सरसरी नज़र से देखी जाती है।

फिर उसने पाइप मुँह से निकालकर कहा:
“सुप्रभात, महोदया!”

फ़लकी ने जवाब देने की ज़रूरत नहीं समझी। उसने फिर पाइप मुँह में डाल लिया और अख़बार पढ़ने लगा।

फ़लकी जब भारी क़दमों से चलने लगी, तो कोई ज़ेवर लटककर उसके पाँव पर गिर पड़ा। कहीं से कोई फूल गिर गया। कहीं दुपट्टा उलझ गया। कहीं ग़रारा फँस गया…

“या अल्लाह…!”

आज कुछ भी उसके बस में नहीं था। उसने दिल में सोचा।

सब कुछ झटककर…
वह जल्दी से ड्रेसिंग रूम में चली गई।

 

इन कपड़ों से उसे घबराहट हो रही थी।

ड्रेसिंग रूम में आई तो वहाँ उसकी गुलाबी रंग की ख़ूबसूरत और काफ़ी महँगी नाइटी टंगी हुई थी।

“हाय क़िस्मत!”
उसे पहनना तो नसीब ही न हुआ।

कैसे-कैसे ख़याल इस नाइटी से जोड़े थे उसने। उसका दिल किया कि इसे आग लगा दे।
मगर उसने ऐसा नहीं किया।

भारी जोड़ा उतारकर नाइटी पहन ली। कितनी हल्की-फुल्की और मुलायम लगी!
फिर वह बाथरूम में चली गई।

आईने में अपना चेहरा देखा। आँखें रो-रोकर बेतहाशा सूज गई थीं। जहाँ कंगन चुभा था, वहाँ एक अजीब-सा भद्दा निशान बन गया था—जैसे किसी ने नाखून गड़ा दिए हों।

वह हाथों से रगड़-रगड़कर उस निशान को मिटाने लगी, मगर जिस्म के निशान इतनी जल्दी मिटते हैं क्या?

ठंडे-ठंडे पानी के छींटे आँखों पर मारे तो कुछ सुकून मिला।
बाथरूम से बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा था।

उसने सोचा—“नहा लेती हूँ। नहाने से तबीयत भी हल्की हो जाएगी। यह जो सिर में भारीपन है, निकल जाएगा। और कुछ वक़्त भी यहीं कट जाएगा।”

 

“हाँ, यह ठीक रहेगा।”

जल्दी से उसने शावर खोला। ठंडे और गरम पानी को मिलाया और फिर उसकी बौछारों के नीचे बैठ गई। नर्म-नर्म छींटे कितने अच्छे लग रहे थे। पानी जब उसके गालों को छूता, तो उसे और भी ज़्यादा रोना आता।

उसका दिल चाहा कि जल्दी से अम्मी के पास जाए, उनके सीने से लगकर खूब रोए और उन्हें बताए कि उसके साथ क्या ज़ुल्म हुआ है। फिर दिल किया कि अपनी सहेलियों के पास जाए, चीख-चीखकर रोए और कहे—

“आज तुम्हारी फ़लकी कट गई। आसमान से ज़मीन पर आ गिरी।”

एक काइयाँ इंसान ने उसे पैरों तले रौंद डाला।

“तौबा! कितना दिल कर रहा है घर जाने का!”

यह घर और इसकी हर चीज़ उसे ज़हर लग रही थी।

बाहर वह मनहूस बैठा हुआ था। उसकी तरफ़ देखने का भी दिल नहीं कर रहा था। औरत की इससे बड़ी और क्या तौहीन हो सकती है? अब तो वह एक पल भी उसके साथ नहीं रहेगी।

काफ़ी देर तक वह नहाती रही, अपने दिल की जलन को पानी से मिटाती रही।

बाहर निकलकर उसे समझ नहीं आया कि कौन से कपड़े पहने, क्योंकि कपड़े अभी ट्रंक में बंद थे। इसलिए उसने वही नाइटी पहन ली और ऊपर मोटा ड्रेसिंग गाउन डाल लिया। न जाने क्यों उसे आफ़ाक़ से डर लग रहा था।

अपने बाल तौलिए से सुखाए और फिर बेडरूम में आ गई।

 

आफ़ाक़ के सामने एक ट्रे रखी थी और साथ में एक वेटर खड़ा था।

चुपचाप ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी हो गई। थोड़ी सी कोल्ड क्रीम चेहरे पर लगाई और फिर चांदी के हत्थे वाली कंघी उठाकर अपने बाल सुलझाने लगी।

“बेगम साहिबा के लिए नाश्ता लाओ,”
आफ़ाक़ ने वेटर को आदेश दिया, जिसे उसने भी सुना, मगर मुड़कर नहीं देखा।

उसका ज़रा भी चाय पीने का मन नहीं था। बस अम्मी के पास जाने का दिल कर रहा था।

वह बेवजह आफ़ाक़ से बात नहीं करना चाहती थी।

कंघी करने के बाद उसने मुड़कर देखा। आफ़ाक़ चाय पी रहा था और उसके बिस्तर की तरफ़ देख रहा था।

बिस्तर देखकर उसे फिर रोना आ गया।

वहाँ उसके सारे गहने बिखरे हुए थे।

वे कलियाँ, जिन्हें उसके मोहक बदन का दीदार करना था, सहमी हुई थीं।
और बिस्तर की हल्की-सी सिलवटें आफ़ाक़ की बेरुख़ी की पूरी कहानी बयान कर रही थीं।

“मेरा ख़याल है, वेटर के आने से पहले आप अपने क़ीमती ज़ेवर बिस्तर से हटा लें,”
आफ़ाक़ ने सपाट लहजे में कहा।

वह यह हुक्म मानना नहीं चाहती थी। मगर उसे मानना पड़ा।

 

धीरे-धीरे चलते हुए आई और सारे गहने समेट लिए। साथ ही, बिस्तर पर पड़े सभी फूल नीचे गिरा दिए। रज़ाई को तह लगाया और बिस्तर पर कवर डाल दिया।

बिस्तर ठीक कर दिया।

पता नहीं, उसने ऐसा क्यों किया…? क्या आफ़ाक़ के डर से…? नहीं…

उसके मन में ही कुछ था।

उसे लग रहा था कि यह बिस्तर हर आने-जाने वाले को रात की कहानी सुना देगा।
और उस कहानी में उसकी पूरी बेइज़्ज़ती थी।

इसीलिए उसने बिस्तर को छिपा दिया।

गहने उठाकर ड्रेसिंग टेबल की दराज में रख दिए।

इतने में वेटर एक और ट्रॉली लेकर अंदर आया।

“बेगम साहिबा के लिए चाय बना दो,”
आफ़ाक़ ने फिर आदेश दिया।

वेटर ने यंत्रवत चाय बनाई और बढ़ाकर उसे दी। आफ़ाक़ के सामने ही एक दूसरा सोफ़ा पड़ा था, और उसे मजबूरी में उस पर बैठना पड़ा।

पैर भारी हो रहे थे। उसे पता था कि इस वक़्त इनकार नहीं कर सकती।

इसलिए, न चाहते हुए भी उसने कप उठा लिया और चाय की चुस्कियाँ लेने लगी।

वेटर किसी फ़रिश्ते की तरह सिर पर खड़ा रहा।

चाय ख़त्म होते ही उसने बाक़ी चीज़ें भी आगे बढ़ानी शुरू कर दीं।

 

दिल तो नहीं चाह रहा था, मगर उसने एक फ्राइड एग लिया और टोस्ट के साथ खाने लगी।

इस हालात पर उसे बेहद ग़ुस्सा आने लगा।

“कितने बनावटी होते हैं ऐसे आदमी!” उसने सोचा।

“जान-बूझकर इस वेटर को यहाँ खड़ा कर दिया है ताकि कोई और बात न करनी पड़े और मैं भी कुछ खा लूँ।”

“ओह नहीं…!”

“आख़िर इनकार क्यों नहीं कर देती, फ़लकी?”

उसके दिल ने उससे सवाल किया।

“पता नहीं, कौन-सी मजबूरी है।” उसने खुद ही जवाब दिया।

समझ नहीं आ रहा था कि इस हालात से कैसे निपटे।

बहरहाल, वह न चाहते हुए भी निवाले ज़हर मारने की तरह निगलती रही।

नज़र उठाकर देखा, तो साढ़े दस बज रहे थे।

“वाह! ये भी कोई नाश्ते का वक़्त है…?”

ख़ैर, अपने घर में भी तो वह हमेशा दस-ग्यारह बजे ही उठती थी। मगर इस घर में भी अब तक किसी के जागने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।

पता नहीं, आफ़ाक़ किस वक़्त से उठा हुआ था…

जाने वह कहाँ सोया था…?

और फिर उठकर इस कमरे में क्यों आ गया था…?

“कुछ तो गड़बड़ है ये आदमी!”

 

अब भी अख़बार सामने रखे ऐसे नाश्ता कर रहा था, जैसे इस कमरे में अख़बार के अलावा कोई और अहम चीज़ ही नहीं हो।

“अल्लाह रे बेपरवाही…!”

जी चाह रहा था कि ऐसा थप्पड़ मारूँ कि इसे होश आ जाए!

ग़ुस्से से खून खौल रहा था कि अचानक बाहर शोर उठा। फिर एक झुंड अंदर आ गया।

“ओहो! ये तो उसकी सारी सहेलियाँ थीं!”

और सबसे आख़िर में अम्मी भी आ गईं।

अम्मी को देखकर वह तुरंत खड़ी हो गई। उसका दिल भर आया।

ज़िंदगी में पहली बार उसका दिल किया कि वह अम्मी के गले लगकर जी भरकर रोए।

और फिर उसने वही किया—दौड़कर अम्मी के सीने से लग गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

माँ-बेटी का गले लगकर रोना वह हमेशा ड्रामा समझती थी, मगर आज पहली बार अहसास हुआ कि माँ होती ही किसलिए है… क्यों उसके सीने से लगकर रोने को दिल करता है… और इस तरह रोकर कैसी सुकून मिलता है…

वह गले लगी रो रही थी और अम्मी उसके गीले बालों पर हाथ फेर रही थीं।

सारी सहेलियाँ कभी आफ़ाक़ को देखतीं, कभी फ़लकी को, और कभी पूरे कमरे को।

फिर उनकी नज़रें बिस्तर पर जाकर टिक गईं—एक बेहद ख़ूबसूरत और दिलकश सेज थी।

फ़लकी का व्यवहार समझ नहीं आ रहा था।

“बस, अब बंद करो ये रोना-धोना और अम्मी को बिठाओ!”

 

आफ़ाक़ खड़ा हो गया और उसके बाज़ू से पकड़कर ज़ोर से झटका जैसे वह इस बाज़ू पर पूरा हक़ रखता हो।

 

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