रिहाई……. दीना और इल्यास दोनों निहायत ख़ामोशी और एहतियात से कोठरी से निकले और दबे क़दमों चले। अभी तक दीना के नरम हाथ इल्यास का हाथ था। उसने उनके कान में कहा बिलकुल खामोश रहना न कुछ कहना पूछना। दीना हसीन वा नौजवान थी। इल्यास चाहते थे वह उनसे अलग रहे उन्होंने उसके हाथ में से अपना हाथ छुड़ाना चाहा उसने और दबा लिया और उनके मुँह के पास अपना मुँह लेजाकर कहा। “तुम्हारे हाथ में लाल नहीं है ?मै छीन लेंगे यूही चले…
Author: umeemasumaiyyafuzail
इक़रार ,,,,,,,,,,,, जब सुगमित्रा चली गयी तो इल्यास तज़बज़ब में पड़ गए। वह सर झुकाये हुए थे फिर क़दमों की चाप हुई। उनहोंने नज़र उठा कर देखा। वही लड़की जो सुगमित्रा के पास वक़्त ख़त्म होने का पैगाम लायी थी। वो खाने की थाल लिए हुए थी। उसने थाल इल्यास के सामने रख दिया और कहा “सुगमित्रा ने तुम्हारे लिए खाना भेजा है। इल्यास :उनका बहुत बहुत शुक्रिया। मुझे अब भूक नहीं रही है। लड़की : उन्होंने कहा है के अगर आपने मेरी और कोई बात नहीं मानी तो यह ज़रूर मान लीजिये खाना खा लीजिये। इल्यास : यह…
गिरफ़्तारी …… इल्यास को ताज्जुब हुआ के पेशवा ने उन्हें क्यू रोका। वह एक तरफ खड़े हो कर गौर करने लगे। उनकी समझ में कुछ न आया। वह उन हसीन लड़कियों को रुखसत होता देखने लगे जो दुआ में शरीक हुई थी। वह सुगमित्रा को भी देखना चाहते थे। लेकिन डरते थे उसकी सूरत देखते ही उनके दिल पर तीर सा लगता था। जब आँखे टकरा जाती थी तो बिजली सी गिर पड़ती थी। …
हूरविष सुगमित्रा। …….. भी दादर पहुंच गया। दादर के तीन अएतराफ़ में पथ्हर चट्टानें फ़सील की तरह उठती चली गयी थी और सामने की दीवार मज़बूत बड़े बड़े पथ्तरों से बनाई गयी। चुकी और तरफ चट्टानें थी इसलिए उधर दरवाज़े नहीं थे। जो दीवार बनाई गयी थी उसमे तीन दरवाज़े थे। एक दरवाज़ा जो दरमियान में था वह इतना बड़ा था के हाथी उसमे गुज़र सकता था। और दरवाज़े जो इसके इधर उधर थे वह भी इतने बड़े थे के घोड़े…
हमदर्द नाज़नीन। …….. जब यह लोग दादर के क़रीब पहुंचे तो उन्होंने मशवरा किया के जो कपडे अब्दुल्लाह ने कबिलियो जैसे दिए है। वह बदल ले या अपना ही लिबास पहने रहे । सलेही ने कहा : अगर हम लिबास दब्दील कर भी ले तो अपनी सुरते नहीं बदल सकते इसलिए लिबास बदलना फ़ुज़ूल है। मसूद ने कहा : मेरे ख्याल में हमें दाढ़ी वालो को तो लिबास नहीं बदलना चाहिए लेकिन इल्यास बदल ले यह उनमे…
तिजारत। …… थोड़ी देर के बाद अब्दुल्लाह आये। उन्होंने इल्यास से मुखतिब हो कर कहा “मैंने पहचान लिया .औरत वही है जो राबिया को लायी थी। इल्यास खुश हो गए। उन्होंने कहा “खुदा का शुक्र है। यक़ीनी है के अब राबिया का पता चल जायेगा। अब्दुलाह :मुझे खौफ है के शायद अभी हमें कामयाबी न होगी। इल्यास : क्यू ?…
सुराग रसी……… हिंदी का नाम अब्दुल्लाह रखा गया। अब्दुल्लाह ने कहा। “अगर मैं इस बात को ज़ाहिर न करू के मैं मुस्लमान हो गया हु तो कोई हर्ज तो नहीं। सलेही :कोई हर्ज नहीं है। अब्दुल्लाह :मैं इसलिए अभी ज़ाहिर नहीं करना चाहता के यहाँ के लोग सब बुध मज़हब के पेरू और मुसलमानो के खिलाफ है। मैं ऐसे बहुत से लोगो से वाक़िफ़ हु जो किसी अच्छे मज़हब की तलाश है। मैं कोशिश करूँगा के वह भी मुस्लमान हो जाये। अगर वह मुस्लमान हो गए तो यहाँ का हुक्मरा भी मुस्लमान…
तब्लीग इस्लाम,,,,,,, इन लोगो ने रात निहायत आराम से बसर की। सुबह को नमाज़ पढ़ कर तिलावत करने लगे। इल्यास निहायत खुश थे। एक तो क़ुरान की निहायत ही शीरें ज़बान है। दूसरे इल्यास का लहजा बड़ा ही प्यारा था। सुनने वालो को वजद आजाता था। जिस वक़्त वह कर रहे थे वही हिंदी जो ज़रनज का सिपह सालार था आगया। उनके क़रीब बैठ कर सुनने लगा। जब उन्होंने तिलवात ख़त्म की तो ” कैसा है यह क्या है? इल्यास : यह वह मुक़द्दस किताब है जो परवरदिगार आलम ने अपने मुहतरम रसूल खुदा हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल अल्लाह…
एक हमदर्द ,,,,,,,,, मुसलमानो को इस बात का बहुत अफ़सोस हुआ के शहर ज़रनज के मर्ज़बान ने उनकी मदारत करना तो दरकार उन्हें अपने शहर में रात बसर करने की भी इजाज़त न दी। वह इस बात को समझ गए के उसे मुसलमानो से क़ल्बी अदावत है। इस बात का सुराख़ लगाने का मौक़ा न मिल सका के वह मुसलमानो से लड़ाई की तैयारी तो नहीं कर रहा है। रात उन्होंने मैदान में जाकर बसर की और सुबह होते ही वहा से कश की तरफ चल पड़े। अब वह उस इलाक़े में सफर कर रहे थे जो बिलाद हिन्द…
मर्ज़बान की अदावत,,,,,,,, जासूसों का काफला जो सौदागरों के भेस में काबुल रवाना हुआ था। चार आदमीओ पर मुश्तमिल था। उनके नाम यह है :सालेही ,अब्बास ,मसूद और इल्यास। इनमे सलेही मेरा काफला थे। इस क़ाफ़ले में सबसे कमसिन इल्यास थे। चुके पहाड़ी इलाक़े में सफर करने का ख्याल था इसलिए ऊँट साथ ले गए थे घोड़ो पर ही सामान तेजारत बार किया गया और घोड़ो पर ही यह लोग सवार हुए। इन लोगो ने अपना मख़सूस अरबी…
