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Home»Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel)

fatah kabul ( islami tareekhi novel) part 46

fatah kabul part 46
umeemasumaiyyafuzailBy umeemasumaiyyafuzailJanuary 24, 2024Updated:January 21, 2026 Fatah Kabul ( Islamic Historical Novel) No Comments8 Mins Read
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जाबुल पर क़ब्ज़ा …… 

                                         

 

 

 

जाबुल के फरमा रवा को यह बात मालूम हो गयी की मुसलमानो ने बस्त भी फतह कर लिया और अब उसकी तरफ बढ़ रहे है। उसके पास काफी लश्कर था। फिर जो लोग दादर बस्त और खुद जाबुल के इलाक़ा से भाग भाग कर क़िला में आये थे। उसने उनमे से वहु जवानो और ताक़तवर अधेड़ उम्र के लोगो को भी छांट छांट कर फ़ौज में भर्ती कर लिया था।

उसे टिड्डी लश्कर देख कर यह इत्मीनान हो गया था की वह अरसा दराज़ तक मुसलमानो का मुक़ाबला कर सकेगा और अगर मुमकिन हुआ तो शायद शिकस्त देने में भी कामयाब हो जाये। फिर भी उसने महाराजा  काबुल को मदद के लिए लिखा और क़ासिद आगे पीछे रवाना किये।

उसने मुसलमानो को नहीं देखा था। जो लोग दादर के इलाक़ा से  भाग  कर आये थे। उनकी ज़बानी कुछ हालात मालूम हुए। उसे यक़ीन नहीं था की मुसलमान इस क़द्र बहादुर और जान बाज़ होंगे कि ज़ेबुलिस्तान के लोग उनका मुक़ाबला ही नहीं कर सकते।

उसने जंग की तैयारी पूरी कर ली थी। गल्ला (अनाज) भी इस क़द्र फ़राहम कर लिया था की एक साल के लिए तमाम फौजो और क़िला वालो के लिए काफी हो। उसने लोगो को मना कर दिया था  की वह क़िला से बाहर न निकले। न मालूम कब मुसलमान आ जाए।

आखिर एक रोज़ मुस्लमान आ ही गए। जाबुल  के हुक्म ने क़िला पर चढ़ कर देखा। शीरान इस्लाम के दस्ते बड़ी शान से  आ रहे थे। मुसलमान शाम तक आते और ठहर जाते। जब रात हो गयी तो हाकिम ने बड़े सल्तनत और फौजी  अफसरों को मशवरा के लिए बुलाया। वह सब आ गए। हाकिम ने उनसे कहा “तुमने देख लिए मुस्लमान आकर  क़िला के सामने मुक़ीम हो गए है। वह लम्बा और दुश्वार गुज़ार सफर तय करके आये है। थके मांदा है। रात  को बे फ़िक्री नींद सोयेंगे। वह हमारी तरफ से गाफिल होंगे। मैं यह चाहता हु की उन पर शब खून मार कर उन्हें  क़त्ल कर डालो। जो बाक़ी बच रहे उन्हें गिरफ्तार कर लो या भगा दो। ”

और तो सबने उसकी राये  की हिमायत की लेकिन उसके बूढ़े वज़ीर ने कहा ” मुसलमान बुज़दिल और कम हौसला नहीं  .उन पर आसानी  से फतह करना न मुमकिन है पहले तो यह मुनासिब है की उनसे सुलह कर ली जाये। अर्जज के हाकिम ने उनसे मसलेहत कर ली  . वह बदस्तूर हुकूमत कर  रहा है। और अगर सुलह करनी मंज़ूर नहीं  तो देखो  वह क्या करते है। जब वह लड़ाई शुरू कर दे तब किसी रोज़ मौक़ा देख कर उन पर शब् खून मारो। यक़ीन  है इस वक़्त कामयाब हो जाओगे।

किसी ने भी उसकी बात की हिमायत नहीं की। बल्कि कुछ नौजवानो ने तो यह कह दिया की बूढ़े वज़ीर की मत मारी गयी है। .आज से बेहतर मौक़ा शब् खून मारने का नहीं हो सकता।

गरज़ यह तय हुआ की आधी रात को शब  खून मारा जाये। इस वक़्त से लोगो ने तैयारी शुरू कर दी। फ़सील पर मुसलमानो को दिखाने के लिए कि वह होशियार है काफी रौशनी कर दी गयी। और क़िला के सहन में फौजे जमा होने   लगी। आधी रात से कुछ पहले जाबुल का हुक्मरान  आ गया। वह ज़िरह बख्तर पहने हुए थे। उसने आते ही  लश्कर  का जायज़ा लिया और दरवाज़ा खुलवा कर  बाहर निकला।

रात अँधेरी थी। पिछली रात में चाँद निकलने वाला था। जाबुल का तमाम लश्कर पैदल था। सिर्फ राजा और चंद बड़े अफसर  घोड़ो पर सवार थे।

यह लश्कर निहायत ख़ामोशी से इस्लामी लश्कर की तरफ बढ़ा। इत्तेफ़ाक़ से मुहाफ़िज़ मुसलमान इसी तरफ गश्त  कर रहे थे। उन्होंने कुछ आवाज़े सुनी। हज़ारो आदमियों के क़दमों की चाप छिपी न रह सकी। उन्होंने जल्दी जल्दी  मुसलमानो को बेदार किया और होशियार करना शुरू किया। और ख़ामोशी के साथ की शोर व गुल न हो।

क़रीब क़रीब तमाम मुस्लमान होशियार हो कर मुसलाह हो गए थे। लीडर अब्दुर्रहमान भी हथियार  लगा कर आगये। उन्होंने सब मुसलमानो को खेमो की पहली और दूसरी क़तार के पीछे छिपा दिया। मुसलमान नेज़े हाथो में  लेकर  इस तरह बैठ गए की हुक्म होते ही नेजो से हमला कर दे।

जाबुल वाले निहायत एहतियात मगर तेज़ी से बढ़ते चले आरहे थे। वह समझ रहे थे की मुस्लमान गाफिल है। नींद के मज़े ले रहे है। आसानी से काबू में आ जायेंगे।

कैंप के क़रीब आ कर उन्होंने और भी एहतियात शुरू की। बहुत ही दबे क़दमों चले। आखिर जब वह कैंप में दाखिल हुए  और खेमो की पहली क़तार के क़रीब पहुंचे तो अब्दुर्रहमान ने हमला का इशारा किया। मुस्लमान अल्लाहु  अकबर का नारा लगा कर उठ खड़े हुए और नेज़े हाथो में लेकर पूरी लम्बी सफ में तेज़ी से बढे।

नारा तकबीर सुन कर काफिर काँप गए। और जब नेज़े हाथो में लिए मुसलमानो को झपट कर आते देखा तो होश जाते रहे  . उनेक दाहिने हाथ में नंगी तलवार थी और बाए हाथो में  ढाले। मगर वह कुछ ऐसे घबराये की न तलवारे याद  रही न ढाले।

मुसलमानो ने उन्हें नेजो से छेद डाला उनकी पूरी सफ को गिरा दिया। जबकि कुछ नेज़े ऐसे घापे की खींचे से भी बाहर न  निकल सके इसलिए मुसलमानो ने नेज़े छोड़ दिए और तलवारे मियानो में खींच कर निहायत ज़ोर से हमले किये। उनकी तलवारो ने दुश्मनो को काट कर बिछा दिया।

अब जाबुल के लोगो को होश आया। उन्होंने भी हमले शुरू किये। घमसान की लड़ाई शुरू हो गयी। सरो पर सर कट कट  कर गिर रहे थे। कटे हुए धड़ो से खर खर की आवाज़े आने लगी। खून के पुर नाले बह गए। काफिरो ने हस्बे आदत शोर व गुल भी शुरू कर दिए। मुस्लमान निहायत ख़ामोशी से दाढीआ दांतो में बी भींच भींच कर जोश में  आ आ कर निहायत सख्त हमले कर रहे थे। उनकी तलवारे भी या तो ढाले फाड़ रही थी या मुसलमानो को क़त्ल  कर रही थी।

मुसलमानो को इस वक़्त बड़ा जोश आ जाता था जब कोई मुस्लमान शहीद हो कर गिर पड़ता। शहीद होने वाले मुस्लमान  के क़रीब जो मुस्लमान होते थे ,वह जोश व गज़ब में आ कर हमला करके एक मुस्लमान के बदले में जब तक  दस बीस को न मार डालते थे क़रार न लेते थे।

किसी मुस्लमान का शहीद हो जाना गज़ब हो जाता। और मुस्लमान शेर की तरफ बिफर कर हमले करके न सिर्फ उस  मुस्लमान का शहीद करने वालो को मार डालते थे बल्कि जो काफिर उनके सामने आ जाता था उसे ही क़त्ल कर डालते  थे। गरज़ मुसलमानो ने दम के दम में बे शुमार दुश्मनो को क़त्ल कर डाला। उनकी लाशो से मैदान पाट दिया। हर मुसलमान खूंखार शेर बन गया और पुर ज़ोर हमला करके लाशो के ढेर  लगा दिए।

राजा खुद भी लड़ रहा था और अपनी सिपाह को लड़ने को कह रहा था। उसके सिपाही बड़ी दीदा दिलेरी से लड़ भी रहे थे। मगर मुसलमानो के सामने  उनकी पेश न जाती थी। वह जोश में आकर हमला करते थे। जो लोग जोश    में आकर हमला करते थे और मुसलमान उन्हें तलवारो की धारो पर रख लेते थे। जो लोग जोश में आकर बढ़ते थे मुसलमान  उनके टुकड़े कर डालते थे।

अब्दुर्रहमान ,इल्यास  और दूसरे अफसर बड़ी जान बाज़ी से लड़ रहे थे। उनकी तलवारे हर उस चीज़ को काट डालती  थी जिन पर पड़ती थी। उन्होंने अपने गिर्द लाशो के अम्बार लगा दिए थे।

जबकि खून रेज़ जंग जारी थी। अब्दुर्रहमान ने अल्लाहु अकबर का नारा लगाया। तमाम मुसलमानो ने इस नारा की तकरार  की और इस ज़ोर से हमला किया की दुश्मनो के सैकड़ो सिपाहियों को मार डाला।

इस हमला से घबरा कर जाबुल वालो के क़दम उखड़ गए। वह बे तहाषा भाग निकले। मुस्लमान उनके पीछे दौड़े वह उनके पीछे दौड़ते  और उन्हें क़तल करते भागे।

इस वक़्त चाँद निकल आया था। और चांदनी की रौशनी फैलने लगी थी। पहले अँधेरा घप हो रहा था अब काफी रौशनी  हो गयी थी  ,इस रौशनी में कुफ्फार भागते और मुस्लमान उनका पीछा करते नज़र आ रहे थे।

जाबुल वालो का ख्याल था की मुस्लमान थोड़ी दूर तक पीछा करके वापस लौट जायेंगे जब मुसलमानो ने उनका पीछा  न छोड़ा तो वह सहम गए। और कुछ लोग इधर उधर भाग गए। कुछ क़िला में घुस गए। मुस्लमान भी क़िला के अंदर जा पहुंचे और काफिरो को क़त्ल करने लगे। इस हंगामे में राजा मारा गया। लोगो ने घबरा कर हथियार दाल दिए  .मुसलमानो ने जाबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया।

 

 

अगला पार्ट (बदहवासी )

 

 

 

fatah kabul part 46 Islami Novel
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